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	<title>Acharya Shri Vinishchay Sagar Maharaj &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>Acharya Shri Vinishchay Sagar Maharaj &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>आचार्यश्री ने कहा-कोई भी कार्य करने से पहले अभ्यास जरूरी : पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में मना तप कल्याणक </title>
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		<pubDate>Mon, 10 Nov 2025 11:12:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में पंच कल्याणक महोत्सव के तृतीय दिवस तप कल्याणक महोत्सव मनाया गया। इसमें सर्वप्रथम श्रीजी का अभिषेक शांतिधारा की गई। इसके बाद पूजन किया गया। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन की यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में पंच कल्याणक महोत्सव के तृतीय दिवस [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में पंच कल्याणक महोत्सव के तृतीय दिवस तप कल्याणक महोत्सव मनाया गया। इसमें सर्वप्रथम श्रीजी का अभिषेक शांतिधारा की गई। इसके बाद पूजन किया गया। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में पंच कल्याणक महोत्सव के तृतीय दिवस तप कल्याणक महोत्सव मनाया गया। इसमें सर्वप्रथम श्रीजी का अभिषेक शांतिधारा की गई। इसके बाद पूजन किया गया। जन्म कल्याणक का हवन आदि किया गया। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी का प्रवचन हुआ। आचार्य श्री ने कहा कि कोई भी कार्य करने से पहले अभ्यास करना होता है। अभ्यास बहुत जरूरी है, व्यक्ति चतुर तो बनता है लेकिन अभ्यास नहीं करता है तो वह फेल हो जाता है। फेल हो जाने के बाद वह परेशान और पछताता है। आचार्य श्री ने कहा कि कोई कार्य में कार्य से ज्यादा अभ्यास में परिश्रम होता है। यदि अभ्यास होता है तो कार्य में परेशानी नहीं आती। उन्होंने कहा कि दिगंबर मुद्रा का अभ्यास केशलोच से शुरू होता है। शरीर टेंपरेरी व्यवस्था है। आज है वह कल नहीं रहेगा। दिगंबर मुद्रा में सबसे पहले अभ्यास कराया जाता है और सबसे पहले केशलोच कराया जाता है।</p>
<p><strong>हमें आध्यात्मिकता की ओर भी अभ्यास शुरू करना चाहिए</strong></p>
<p>उन्होंने मनुष्य के विषय में कहा कि मनुष्य में विशेषता होती है कि वह जैसा चाहे वैसा परिवर्तन कर सकता है। अच्छे को बुरा कर सकता है और बुरे को अच्छा कर सकता है। अभ्यास से कुछ भी संभव हो सकता है। उन्होंने कहा की लौकिक कार्यों का तो भरपूर अभ्यास करते हैं लेकिन, हमें आध्यात्मिकता की ओर भी अभ्यास शुरू करना चाहिए। पूजा पाठ अनुष्ठान से धर्म और अध्यात्म का विकास है। अध्यात्म में हमें वस्तु स्वरूप को जानना होगा और उसमें आनंद उठाना होगा अध्यात्म को समझते हुए यदि हम वस्तु स्वरूप को नहीं समझेंगे तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा।</p>
<p><strong>संस्कार और संस्कृति अच्छी तो पड़ाव भी अच्छा </strong></p>
<p>धर्म में जिसकी जितनी आस्था और ताकत है, वह उसे उतना ही लूट सकता है। धार्मिक अनुष्ठानों में लूटोगे तो पुण्य होगा। संस्कार और संस्कृति के विषय में बोलते हुए गुरुदेव ने कहा कि संस्कार और संस्कृति अच्छी होती है तो पड़ाव भी अच्छा होता है। यदि यह अच्छा नहीं है तो पड़ाव भी अच्छा नहीं होगा, थोड़ा सा बदलना है अध्यात्म से जुड़े महामंत्र से जोड़े मंत्र वाक्य से जोड़ेंगे तो मैं लिख कर देता हूं कि अपन स्वर्ग में मिलेंगे।</p>
<p><strong>ब्रह्मचारी नमन भैया के निर्देशन हुआ पूजन </strong></p>
<p>ब्रह्मचारी नमन भैया के निर्देशन में विनायक यंत्र पूजन किया गया। राजकुमार आदिकुमार का विवाह हुआ। जिसमें आदिकुमार की बारात निकाली गई। जिसमें उत्साह भरपूर दिखा। बग्गी में भगवान के माता-पिता बने सुधा जयकुमार डूंगरवाल, सौधर्म इंद्र-इंद्राणी मयंक विजया सांवला, कुबेर इंद्र मनीष सिंघल बैठे हुए थे। 32 हजार मुकुटबद्ध राजाओं द्वारा भेंट समर्पण, राज्याभिषेक आदि हुआ। साथ ही भरत बाहुबली संवाद हुआ। राज्यसभा में भगवान आदिनाथ ने सभी को आसि मसी कृषि का संदेश दिया अपनी दोनों पुत्री ब्राह्मी सुंदरी को शिक्षा प्रदान की।</p>
<p><strong>तीर्थंकर आदिनाथ का राज्याभिषेक हुआ </strong></p>
<p>तीर्थंकर आदिनाथ का राज्याभिषेक हुआ। राज्य सभा में जैसे ही नीलांजना नृत्य हुआ। राजकुमार आदिनाथ को वैराग्य हो गया और वह दीक्षा लेने चले गए। उस समय का क्षण काफी भावुक था। इसी क्रम में आचार्य श्री के सानिध्य में दीक्षाभिषेक दीक्षा विधि हुई और प्रतिमाओं पर दीक्षा विधि के संस्कार किए गए। आचार्य श्री ने भी तप कल्याणक का महत्व समझाया। एक दिन पूर्व जन्म कल्याणक की रात्रि में बेला में तीर्थंकर बालक का जन्म कल्याणक मनाते हुए पालना झुलाया गया एवं बाल क्रीड़ा की गई।</p>
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		<title>रात्रि विवाह एवं प्री-वेडिंग शूट पर रोक लगाने की दी सलाह : दो दिवसीय विद्वत संगोष्ठी में सामने आए महत्वपूर्ण जनजागरण के विचार  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 02 Oct 2025 13:20:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में हुई दो दिवसीय विद्वत संगोष्ठी का समापन हुआ। इसमें भारत वर्ष से आए विद्वानों ने आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज द्वारा रचित विनिश्चय आगमोदय आधारित ग्रंथ पर अपने आलेख प्रस्तुत किए। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में हुई दो दिवसीय विद्वत संगोष्ठी का समापन हुआ। इसमें भारत वर्ष से आए विद्वानों ने आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज द्वारा रचित विनिश्चय आगमोदय आधारित ग्रंथ पर अपने आलेख प्रस्तुत किए। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में हुई दो दिवसीय विद्वत संगोष्ठी का समापन हुआ। इसमें भारत वर्ष से आए विद्वानों ने आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज द्वारा रचित विनिश्चय आगमोदय आधारित ग्रंथ पर अपने आलेख प्रस्तुत किए। संगोष्ठी के द्वितीय दिवस सभी विद्वानों ने प्री-वेडिंग शूट नहीं होना चाहिए। इस पर जोर दिया इसके साथ ही रात्रि विवाह बंद होना चाहिए। इस पर भी जोर दिया गया कि जैन समाज की महिलाओं को सुंदरी प्रतियोगिता में भी नहीं जाना चाहिए। इस पर भी अपना आलेख प्रस्तुत किया। प्री वेडिंग के विषय में विद्वानों ने कहा कि इससे समस्याएं पैदा हो रही हैं और यह परंपरा बंद होनी चाहिए। विद्वानों ने इस बात का भी उल्लेख किया कि हमें मांसाहारी होटल आदि में भोजन नहीं करना चाहिए। यहां जहां दोनों तरह का भोजन होता हो, वहां भी भोजन नहीं करना चाहिए और ट्रेनों का भोजन बिल्कुल नहीं करना चाहिए क्योंकि, उसमें शाकाहारी एवं मांसाहारी वस्तुओं को एक साथ बनाया जाता है।</p>
<p><strong>जिन मंदिर में ही विवाह हो,</strong></p>
<p>आज हो रही को एजुकेशन जिसमें लड़का एवं लड़की एक साथ पढ़ते हैं। वह भी बंद होना चाहिए। साथ ही विवाह पद्धति पर कहा कि जिन मंदिर में ही विवाह हो, ऐसी परंपरा शुरू होना चाहिए। इसके साथ ही इस विषय पर बोलते हुए आचार्य श्री ने भी विद्वानों से चर्चा करते हुए कहा कि जैन संस्कृति को बचाने के लिए जैन समाज के स्कूल होने चाहिए। जो इतने अच्छे स्तर पर होना चाहिए। जिससे हमारा जैन दर्शन और जैन संस्कृति सुरक्षित रहेगी इसका लाभ भी होगा।</p>
<p><strong> विद्वान वही होता है जो आगम की बात करता है </strong></p>
<p>इस संगोष्ठी में यह भी बात आई विद्वान वही होता है जो आगम युक्त बात करता है। जो एक दूसरे पर दृष्टि रखता है वह कभी विद्वान नहीं होता। आचार्य श्री ने धर्म के सिद्धांतों का समावेश करने के साथ साथ अनुयोगों का वर्णन ग्रन्थ में सरल कर दिया। विद्वानों ने इस बात का भी उल्लेख किया। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने विनिश्चय आगमोदय ग्रंथ की रचना कर अनुयोगों के वर्णन के साथ धर्म के गुण सिद्धांत का समावेश कर इसका सरलीकरण किया है। उन्होंने इस ग्रंथ को उपयोगी बनाने के साथ कृति में पौराणिक एवं सैद्धांतिक आध्यात्मिक दृष्टिकोण भी समाहित किया है।</p>
<p><strong>  अनुभव स्वाध्याय ज्ञान से आता है आचार्य श्री </strong></p>
<p>आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने विद्वत संगोष्ठी में विद्वानों को संबोधित करते हुए कहा कि हमें वही मिलेगा जो कर्म फल होगा। हम इसे समझ नहीं पाते, इसलिए हम भटक रहे हैं। उन्होंने आचार्य श्री विराग सागर महाराज को स्मृति में लाते हुए विद्वानों को कहा कि आचार्य श्री कहते थे कि विद्वानों को एवं किसी को भी अहंकार नहीं करना चाहिए। ज्ञानी वही है जिसे अहंकार नहीं है। यदि हमें अहंकार नहीं है तो हमें ज्ञान मिलता है। यदि आ जाता है तो ज्ञान हमारा मार्ग अवरुद्ध कर देता है।</p>
<p><strong>कीमत समय की है, समय बहुत कीमती है</strong></p>
<p>कीमत समय की है, समय बहुत कीमती है। अनुभव हमें स्वाध्याय और ज्ञान से आता है। ज्ञान को हम इसलिए हासिल करते हैं कि हमें चारित्र की प्राप्ति हो। विद्वानों के विषय में कहा कि विद्वानों में विशेषता होनी चाहिए कि विषय की गहराई में जाएं आप जब विषय की गहराई में जाएंगे तब आप उसे समझेंगे। यदि विद्वान होंगे तो मंथन होगा, तीर्थंकर भगवान की वाणी का प्रचार होगा। आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज, आचार्य श्री विराग सागर महाराज एवं आचार्यों ने समाज को दिया। उन्होंने अच्छी कार्य पद्धति शैली से अनेक विद्वानों को तैयार किया है। उन्होंने आचार्य श्री विराग सागर महाराज को स्मृति में लाते हुए कहा कि आचार्य श्री एक ऐसा व्यक्तित्व रहे, जिनकी साधना सरलता की कोई सीमा नहीं है। उनके उपकारों को हम नही भूल सकते।</p>
<p><strong>विराग स्मृति ग्रंथ का होगा प्रकाशन </strong></p>
<p>इस अवसर पर समस्त विद्वानों ने आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज से आशीर्वाद लेते हुए आचार्य श्री विराग सागर महाराज की स्मृति मे उनके विषय पर आलेख उनके जुड़े हुए संस्मरणों को संकलित करने हेतु विराग स्मृति ग्रंथ के प्रकाशन करने हेतु आशीर्वाद लिया। दोपहर के सत्र का संचालन सुनील जैन संचय ने किया एवं अध्यक्षता प्रख्यात पंडित जयकुमार जैन निशांत ने की। अनेक विद्वानों ने अपने आलेख प्रस्तुत किए। इसके साथ ही मुनि श्री प्रत्यक्ष सागर ने भी अपने भाव प्रकट किए। मुनि श्री प्रांजल सागर महाराज ने ग्रंथ के प्रशासन के विषय में सभी को बताया उन्होंने बताया कि ग्रंथ का 10 वर्ष पहले गाजियाबाद में विमोचन हुआ था। 2015 में यह प्रथम बार प्रकाशित हुआ द्वितीय बार यह 2018 में प्रकाशित हुआ उसके बाद यह भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित हुआ। इसके प्रकाशन में गुरुदेव की मेहनत है। गुरुदेव बताते गए और मैं लिखता गया। इस ग्रंथ में जो कुछ भी है यह सब गुरुदेव का है। आचार्य श्री ने स्वाध्याय करने की ओर जोर दिया। उन्होंने कहा कि समाज को स्वाध्याय की बहुत जरूरत है क्योंकि, नहीं पढ़ने के कारण हमारी परंपराएं टूट रही हैं और व्यक्ति संस्कार से दूर हो रहे हैं। समाज को वक्ताओं की बहुत जरूरत है। जितना अच्छा लिखोगे उतने अच्छा है। वक्ता बनते चले जाओगे समाज को वक्ताओं और लेखन वालों की बहुत जरूरत है। अंत में सभी विद्वानों का सम्मान समाज की ओर से किया गया। समाज की और से संरक्षक अजीत सेठी ने सभी विद्वानों का आभार प्रकट किया।</p>
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		<title>सबके अपने कर्म होते हैं जो अपना फल देते हैं: आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के सान्निध्य में हो रही सिद्धों की आराधना  </title>
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		<pubDate>Thu, 25 Sep 2025 04:34:39 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में हो रहे सिद्धचक्र महामंडल विधान के द्वितीय दिवस सिद्धों की आराधना करते हुए मंडल पर अर्घ्य समर्पित किए गए। भक्ति में झूमते गाते भक्तों ने यह महामंडल विधान किया। यह महामंडल आचार्य श्री संघस्थ ब्रह्मचारी भैयाजन द्वारा हो रहा है। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में हो रहे सिद्धचक्र महामंडल विधान के द्वितीय दिवस सिद्धों की आराधना करते हुए मंडल पर अर्घ्य समर्पित किए गए। भक्ति में झूमते गाते भक्तों ने यह महामंडल विधान किया। यह महामंडल आचार्य श्री संघस्थ ब्रह्मचारी भैयाजन द्वारा हो रहा है। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में हो रहे सिद्धचक्र महामंडल विधान के द्वितीय दिवस सिद्धों की आराधना करते हुए मंडल पर अर्घ्य समर्पित किए गए। भक्ति में झूमते गाते भक्तों ने यह महामंडल विधान किया। यह महामंडल आचार्य श्री संघस्थ ब्रह्मचारी भैयाजन द्वारा हो रहा है। जिसका निर्देशन भारत गौरव प्रतिष्ठाचार्य ब्रह्मचारी डॉ. शोभित भैया मंडावरा, बाल ब्रह्मचारी स्वतंत्र भैया टीकमगढ़, पंडित जयकुमार जैन बड़ागांव, पंडित श्री सुलभ शास्त्री कुटोरा कर रहे है और विधि विधान से महामंडल विधान को पूर्ण कर रहे हैं। यह महामंडल विधान संस्कृत में हो रहा है, जो रामगंजमंडी में प्रथम बार हो रहा है। विधान के क्रम में प्रवचन सभा का शुभारंभ मंगलाचरण से हुआ मंगलाचरण ब्रह्मचारी प्रीती दीदी द्वारा किया गया। इसके बाद नगर के प्रबुद्ध जनों ने आचार्य श्री विराग सागर महाराज के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन किया। आचार्य श्री ने मंगल प्रवचन में कर्म के विषय में बताया। उन्होंने उदाहरण के माध्यम से बताया कि कोई व्यक्ति आम का पौधा लगाता है। इसलिए लगाता है कि इसमें फल मिलेगे। इस संसार में कोई भी व्यक्ति कोई कार्य करता है। वह सोचता है इसका फल मुझे मिलेगा। हम विधान कर रहे है थे यह अपेक्षा है मोक्ष मिले और मोक्ष न मिले तो पुण्य मिले। यह लक्ष्य रहता है लक्ष्य मिल जाए न मिले तो लक्ष्य की ओर बढ़ने वाले कदम मिल जाए। इस संसार में बहुत से लोग दुखी और सुखी हैं। कोई भीख मांग रहा है कोई मजदूरी कर रहा हे कोई नौकरी कर रहा है। कोई बहुत अच्छा व्यापार कर रहा है और कोई व्यक्ति उससे भी अच्छा व्यापार कर रहा है। देखे तो यह पता लगता है तो यह पता चलता है कोई व्यक्ति अर्थ के अभाव में जी रहा है और कोई व्यक्ति अर्थ के सद्भाव में जी रहा है।</p>
<p><strong>यह दुनिया लोगों के कर्म से चलती है</strong></p>
<p>कर्म सबको अपने कर्मों के अनुसार फल देते हैं। आचार्य श्री ने कर्मफल के विषय में बताया कि कर्म व्यक्ति को अपना अपना फल देते हैं जिस व्यक्ति का जैसा कर्म है उसे वैसा फल मिलने वाला है। भगवान कुछ नहीं करता। आचार्य श्री ने कहा कि लोग कहते हैं कि जो कुछ करता है भगवान करता है लेकिन भगवान कुछ नहीं करता है लेकिन, अगर भगवान इस दुनिया को बनाता तो वह ऐसी बनाता बहुत सुंदर बनाता। कचरा नाम की चीज ही नहीं होती। इस दुनिया में और गंदगी की नाम की भी कोई चीज नहीं होती और बुराई नाम की भी कोई चीज नहीं होती। इस अगर भगवान इस दुनिया को बनाएगा तो बहुत अच्छे से बनाएगा। इस दुनिया को भगवान ने नहीं बनाया। यह दुनिया लोगों के कर्म से चलती है। कर्म के उदय और कर्म के फल से चलती है दुनिया। कर्म का फल प्रत्येक जीव को मिलता है। कर्म का फल व्यक्ति को भोगना ही पड़ता है।</p>
<p><strong>आत्मा से बंधे हुए कर्म है जो जीव को परतंत्र करता है </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कर्म के विषय में कहा कि आत्मा से बंधे हुए कर्म होते हैं। जो जीव को परतंत्र करता है, कर्मों की परतंत्रता का कारण ही संसार है और हम परतंत्रता के कारण ही संसार में है। हमारा संसार में रहने का स्वभाव ही नहीं है। यह कर्मों के कारण है हमें संसार में रहना पड़ रहा है। संसार के जन्म मरण को सहना पड़ रहा है क्योंकि, कर्म आत्मा से बंधे हुए हैं क्योंकि कर्म हमने बांधे हैं। यह महामंडल विधान द्रव्य चढ़ाने के लिए नहीं है यह सिर्फ कर्म सिद्धांत को समझने के लिए है। अगर श्रीपाल ने मुनिराज को देखकर अशुभ भाव नही किया होता तो उसे कोढ नही होता</p>
<p><strong>  अपने आपको देखोगे तो मार्ग मिलता है </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि हमें किसी को देखने की जरूरत नहीं है। अपने आप को देखें अपने आप को अगर हम देखेंगे और और चिंतन करेंगे चिंतन होता है तो मार्ग मिलता है। अपने आपको देखने में ही फायदा होता है। जैन दर्शन कहता है किसी को देखो ही मत। अपने आप को देखो इतना देखो की चिंतन समीचीन हो जाए और मार्ग सच्चा हो जाए। उन्होंने कहा लोग दूसरे को देखते हैं और दूसरों को देखने की आदत सी पड़ गई है। अशुभ कर्म बांधने की और आदत पड़ गई अशुभ भाव बनाने की। यदि इसी प्रकार की आदत बनी रही तो ऐसा ही चलता रहेगा जैसा चिंतन जैसा सोच जैसा विचार हमारा होगा सब कुछ वैसा ही होगा।</p>
<p><strong>विशुद्धि बढ़ाने की जरूरत है</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि हमें भी श्रीपाल मेना सुंदरी के जैसे भावों को जगाने की जरूरत है। जब वह भी कर्म भोग सकता है तो हमारी स्थिति क्या हो सकती है। कर्म और कर्म फल हमारा निरंतर पीछा करते हैं हम कहीं भी चले जाएं। यदि हम भी मेना सुंदरी श्रीपाल राजा जैसी विशुद्धि को बढ़ाएंगे तो पुण्य में वृद्धि होगी इसीलिए विशुद्धि को बढ़ाओ। यह जाप विधान के द्वारा बढ़ेगी जैसे-जैसे विशुद्धि बढ़ेगी संसार भी कम होगा। मन में शुभ विचार करने पर शुभ होगा। व्यक्ति जैसा सोचता है वैसा होने लगता है और वैसा ही भाव बनता है। आचार्य श्री की आहारचर्या एवं चरण वंदना का लाभ महावीर कुमार दीपक कुमार शाहजी परिवार रामगंज मंडी को प्राप्त हुआ।</p>
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		<title>सफल दांपत्य जीवन के लिए समझदारी होना चाहिए : आचार्यश्री के सानिध्य में दो दिवसीय दाम्पत्य सेमिनार संपन्न </title>
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		<pubDate>Mon, 22 Sep 2025 09:58:54 +0000</pubDate>
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<p><strong>दो दिवसीय दंपति सेमिनार का समापन रविवार की बेला में हुआ। यह सेमिनार आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में हुआ। इस सेमिनार में बाहर से आए वक्ताओं ने गृहस्थी धर्म में सामंजस्य के साथ संस्कार एवं आपसी मेलजोल के विषय में सभी को समझाया। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी</strong>। दो दिवसीय दंपति सेमिनार का समापन रविवार की बेला में हुआ। यह सेमिनार आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में हुआ। इस सेमिनार में बाहर से आए वक्ताओं ने गृहस्थी धर्म में सामंजस्य के साथ संस्कार एवं आपसी मेलजोल के विषय में सभी को समझाया। इसी के साथ आचार्य श्री के संघस्थ मुनि श्री प्रत्यक्ष सागरजी महाराज, मुनिश्री प्रांजल सागर महाराज ने भी अपनी वाणी से सभी को सफल दांपत्य जीवन के लिए उत्तम सीख दी। साथ ही सभी को आचार्य श्री से भी मोटिवेशन मिला। इस सेमिनार में 130 से अधिक युगलों ने भाग लिया।</p>
<p><strong> सच्चे प्रेम में प्रदर्शन की आवश्यकता नहीं</strong></p>
<p>रविवार की बेला में दोपहर के सत्र में बाहर से आए वक्ताओं ने धर्म और गृहस्थी के संबंधों को मजबूत बनाने पर जोर दिया। दंपति शब्द के विषय में प्रकाश डाला और बताया कि विचारों में चिंतन होना चाहिए। वैमनस्य नहीं होना चाहिए, तब जाकर दंपति कहलाने के हम अधिकारी हैं। चार पुरुषार्थों के विषय में भी समझाया। यह भी समझाया कि विवाह एक संस्कार है और विवाह संस्कार के पुरोधा भगवान ऋषभदेव है। विवाह एक विचार है संस्कार है। इस विषय पर भी चिंता व्यक्त की गई कि समाज की संस्कृति अगर बिगड़ रही है तो विजातीय विवाह के कारण बिगड़ रही है। घर में माता-पिता का सम्मान नहीं है तो वह आदर्श घर नहीं हो सकता। यह बात भी दोहराई गई। दांपत्य जीवन में दिखावा नहीं होना चाहिए। सच्चे प्रेम में प्रदर्शन की आवश्यकता नहीं है।</p>
<p><strong>समझदारी से प्रतिकूलता को अनुकूलता बनाएं</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि जीवन में कोई भी व्यक्ति मांग से मुक्त नहीं हो सकता। व्यक्ति को सारी कला आनी चाहिए और मोक्ष जाने की कला भी आनी चाहिए। उन्होंने कहा कि दुनिया में 100ः लोग समझदार हैं लेकिन, 99.9 प्रतिशत लोगों को समझदारी का प्रयोग करना नहीं आता। जैन दर्शन का उल्लेख करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि समझदारी के अलावा कुछ भी नहीं है। यह समझदारी भी होना चाहिए कि प्रतिकूलता आ जाए तो मैं अनुकूलता बनाऊंगा। यह समझदारी है यदि हम ऐसे समय में समझदारी का प्रयोग करते है तो हम आसानी से समस्या से निकल सकते हैं। उन्होंने कहा कि व्यक्ति में सुनने की क्षमता होनी चाहिए। जिसमें सुनने की ताकत होती है उसे क्रोध नहीं आता।</p>
<p><strong>उस दिशा में चलें जिस दिशा में रुचि हो</strong></p>
<p>संस्कारों के विषय में उन्होंने कहा कि जो कुछ भी आपके जीवन में अच्छा हुआ है। वह संस्कारों के कारण है और वह सब संस्कारों का खजाना है। ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं है। ज्यादा सोचने की आदत अच्छी नहीं होती। ज्यादा सोचेंगे तो परेशान होंगे। उन्होंने कहा कि उस दिशा में चलें जिस दिशा में आपको रुचि है और उसी की गहराई में जाएंगे तो बहुत कुछ कर पाएंगे। इसके संबंध में हम कुछ नहीं कर सकते। इसकी गहराई में यदि हम जाएंगे तो हम कुछ नहीं पा सकते।</p>
<p><strong>समझदारी इसी में है कि स्वयं का मालिक बनो</strong></p>
<p>जैन धर्म का उल्लेख करते हुए कहा कि जैन धर्म की शुरुआत होती है कि हम अपने ही मालिक हैं दूसरे के नहीं। जो व्यक्ति जागा हुआ है उसे ही जगाना चाहिए। यदि सोते को जगाओगे तो उसे क्रोध ही आएगा। उन्होंने कहा जरूरत नहीं है। धन कमाने और मकान और भगवान की भी नहीं है। जरूरत है समझदारी की यदि समझदारी आ जाती है तो इन चीजों की कोई जरूरत नहीं होगी। साथ ही गुरुदेव ने कहा कि परिवार, दुकान और घर कुछ भी चलाना हो तो समझदारी चाहिए। समझदारी इसी में है कि स्वयं का मालिक बनो। दूसरों का मालिक मत बनो। तुम अपने मालिक बनो और अपने अनुसार काम करो और भाव बनाओ। सीधे रोड चलते हैं और वास्तविकता चलते हैं तो हम बहुत कुछ पा सकते हैं। गुरुदेव ने कहा कि अगर हम अपने आप को समाधि तक पहुंचाएं तो यह सेमिनार की सार्थकता होगी।</p>
<p><strong>परिवार में सबसे पहले भरोसा होना चाहिए </strong></p>
<p>प्रातः बेला में मुनिश्री प्रत्यक्ष सागर जी महाराज ने जीवन में अहम और महत्वपूर्ण विवाह को बताया। गृहस्थ जीवन के दायित्व को बताते हुए कहा कि गृहस्थ जीवन के दायित्व मुनियों से ज्यादा होते हैं क्योंकि, इसमें मां-बाप बच्चों और समाज से जुड़ना और समाज का अस्तित्व समझाना होता है। उन्होंने कहा कि परिवार में सबसे पहले भरोसा होना चाहिए। उन्होंने दांपत्य जीवन में सबसे कीमती मुस्कान को बताया कि जब आप तस्वीर खींचते हैं तो आप मुस्कुराते है। इस तरह जीवन में भी मुस्कुराओ।</p>
<p><strong>जीवन में धर्म को भी साथ लेकर चले</strong></p>
<p>प्रातः के सत्र में आचार्य श्री ने दांपत्य जीवन के विषय में काफी कुछ समझाया और कहा कि जैन दर्शन कहता है कि मर्यादाएं समाप्त नहीं होने चाहिए एवं धर्म को छोड़कर अगर दांपत्य जीवन को जिएंगे तो सुकून नहीं मिलेगा। परंपरा मर्यादा और अनुशासन का पालन होना चाहिए और परंपराओं को कायम रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म कहता है कि गृहस्थ को एक ओर नहीं झुकना चाहिए। दोनों पहियों को लेकर चलना चाहिए। यानी कि जीवन में धर्म को भी साथ लेकर चलना चाहिए। प्यार और प्रेम को भी गुरुजी ने समझाया। उन्होंने कहा कि प्यार में राग होता है और प्रेम में धर्म अनुराग होता है। साथ ही गुरुदेव सभी से प्रश्न किए और सभी से सेमिनार के अनुभव को समझा सभी को गुरुदेव ने मंगल आशीर्वाद भी प्रदान किया। इस अवसर पर समाज की ओर से सभी वक्ताओं का सम्मान किया गया।</p>
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		<title>दमदम कोलकाता के संजय जैन सेठी ने 16 उपवास की साधना पूर्ण : आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी के सानिध्य में किया पारणा  </title>
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		<pubDate>Tue, 09 Sep 2025 13:30:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में नगर में अनेक तपस्या हुईं। यहां तक कि बाहर से आए भक्तों ने भी तप आराधना की। इसी कड़ी में दमदम कोलकाता निवासी 60 वर्षीय संजय जैन सेठी ने 16 उपवास की तप साधना पूर्ण की। रामगंजमंडी से पढ़िए, यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में नगर में अनेक तपस्या हुईं। यहां तक कि बाहर से आए भक्तों ने भी तप आराधना की। इसी कड़ी में दमदम कोलकाता निवासी 60 वर्षीय संजय जैन सेठी ने 16 उपवास की तप साधना पूर्ण की। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में नगर में अनेक तपस्या हुईं। यहां तक कि बाहर से आए भक्तों ने भी तप आराधना की। इसी कड़ी में दमदम कोलकाता निवासी 60 वर्षीय संजय जैन सेठी ने 16 उपवास की तप साधना पूर्ण की। विगत एक माह से निरंतर गुरु चरणों में रहकर तन-मन-धन समर्पित करते हुए यह साधना पूर्ण की। इससे पूर्व वर्ष 2024 में उन्होंने आचार्य श्री के कोलकाता के प्रवास के दौरान दसलक्षण पर्व पर 10 उपवास की साधना पूर्ण की। उसके बाद ही उन्होंने मन बना लिया था, जहां भी आचार्य श्री रहेंगे, वहां रहकर 16 उपवास की साधना करूंगा।</p>
<p><strong> आचार्य श्री के सानिध्य कठिन साधना भी लगी रूई जैसी </strong></p>
<p>सेठी ने कहा कि संरक्षक अजीत सेठी, अध्यक्ष दिलीप विनायका, उपाध्यक्ष चेतन बागड़िया, उपाध्यक्ष कमल लुहाड़िया, महामंत्री राजकुमार गंगवाल, मंत्री राजीव बाकलीवाल एवं सभी समाज बंधुओं और मेरी बहन-बहनोई सारिका मनोज चांदवाड ने मुझे पूरा सहयोग किया। सेठी अपनी धर्मपत्नी शोभा सेठी के सहयोग से यह तप आराधना की। तप आराधना पूर्ण होने के बाद सेठी ने तप आराधना के विषय में आचार्य श्री के आशीर्वाद को सर्वाेपरि मानते हुए कहा कि धर्म हमारी आत्मा को पावन-निर्मल बनाता है।</p>
<p><strong>एक अलौकिक अनुभूति का अहसास </strong></p>
<p>16 कारण पर्व धर्म का एक उत्कृष्ट रूप है। उन्होंने कहा कि मैं आचार्य श्री की तप साधना की प्रेरणा और आशीर्वाद से यह तपस्या निर्विघ्न पूर्ण कर पाया। इस तप साधना के दौरान मुझे एक अलग तरह की उर्जा और एक अलौकिक अनुभूति हुई। जिसे शब्दों में वर्णन कर पाना असीमित है। आचार्य श्री के सानिध्य में 16 उपवास जैसी कठिन साधना में मुझे रूई जैसी हल्की प्रतीत हुई।</p>
<p><strong>सभी का आभार जताया </strong></p>
<p>बिना किसी आकुलता के आनंद के साथ पूरे व्रत धर्मध्यान पूर्वक संपूर्ण हुए सुबह से ध्यान, अभिषेक, शांतिधारा, आहार देना, तत्त्वार्थसूत्र, प्रतिक्रमण ये सारी दिनचर्या मेरे जीवन का सबसे अनमोल समय था। जो मेरे लिए अविस्मरणीय है। उन्होंने कहा कि आचार्य श्री और संपूर्ण संघ का ही मेरे ऊपर आशीर्वाद और वात्सल्य रहा। साथ ही ब्रह्मचारी भैयाजी और ब्रह्मचारी दीदियों के साथ रामगंजमंडी के प्रत्येक जन ने मेरा संबल बढ़ाया और जिसका मैं शब्दों रूपी सुमन से आभार प्रेषित करता हूं।</p>
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		<title>लघु सिद्ध चक्र महामंडल विधान कर दसलक्षण पर्व का समापन: आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में तप आराधना हुई, निकाली शोभायात्रा   </title>
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		<pubDate>Sun, 07 Sep 2025 08:43:32 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज सानिध्य में 10 लक्षण पर्व भक्ति भाव से संपन्न हुए। शनिवार की बेला में 10 लक्षण पर्व का अंतिम दिन उत्तम ब्रह्मचर्य के रूप में मनाया गया। सर्वप्रथम आचार्य श्री के सानिध्य में श्रीजी का अभिषेक शांतिधारा की गई। रामगंगजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। आचार्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज सानिध्य में 10 लक्षण पर्व भक्ति भाव से संपन्न हुए। शनिवार की बेला में 10 लक्षण पर्व का अंतिम दिन उत्तम ब्रह्मचर्य के रूप में मनाया गया। सर्वप्रथम आचार्य श्री के सानिध्य में श्रीजी का अभिषेक शांतिधारा की गई। <span style="color: #ff0000">रामगंगजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज सानिध्य में 10 लक्षण पर्व भक्ति भाव से संपन्न हुए। शनिवार की बेला में 10 लक्षण पर्व का अंतिम दिन उत्तम ब्रह्मचर्य के रूप में मनाया गया। सर्वप्रथम आचार्य श्री के सानिध्य में श्रीजी का अभिषेक शांतिधारा की गई। इसके बाद तत्वार्थ सूत्र के तीन मुख्य मंडलों पर अर्घ्य समर्पित किए गए। 10 लक्षण पर्व के अंतिम दिन गुरुदेव ने उत्तम ब्रह्मचर्य पर अपना मंगल उद्बोधन दिया। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज की त्याग, तपस्या एवं प्रेरणा का प्रभाव यह रहा की अनेक लोगों ने तप आराधना की। संरक्षक अजीत सेठी, अध्यक्ष दिलीप विनायका उपाध्यक्ष चेतन बागड़िया, उपाध्यक्ष कमल लुहाड़िया, महामंत्री राजकुमार गंगवाल मंत्री राजीव बाकलीवाल ने बताया कि गुरुदेव की प्रेरणा एवं उनकी तपस्या का प्रभाव यह रहा कि अनेक लोगों ने तप आराधना की। जिसमें 16 उपवास दो तपस्वियों, 10 उपवास 10 तपस्वियों, पांच उपवास 11 तपस्वियों, तथा तीन उपवास 25 तपस्वियों ने किए।</p>
<p><strong>रामगंजमंडी में पहली बार हुआ लघु सिद्धचक्र महामंडल विधान </strong></p>
<p>आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज संघ के सानिध्य में 10 लक्षण पर्व के अंतिम दिन लघु सिद्ध चक्र महामंडल विधान हुआ। इसमें सभी समाज जन ने भक्ति भाव के साथ किया गया। महामंडल विधान में संपूर्ण उत्साह से भरपूर रहा। दोपहर की बेला में नगर के प्रमुख मार्गाे से होते हुए शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा में तपस्वी भी शामिल रहे एवं सभी समाज बंधुओ ने उनके तप की अनुमोदना की। इसके बाद श्रीजी का अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। इसी क्रम में भगवान वासुपूज्यजी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव मनाया एवं निर्वाण लाडू समर्पित किया गया।</p>
<p><strong>सारे 10 धर्म आपको अंगुली पकड़कर यहां तक लाए</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने उत्तम ब्रह्मचर्य पर प्रवचन देते हुए कहा कि ब्रह्मचर्य का महत्व बताते हुए कहा कि ब्रह्म यानी आत्मा चर्या यानी रमण करना इसका अर्थ है आत्मा में रमण करना ब्रह्मचर्य है। सारे के सारे 10 धर्म आपको अंगुली पकड़कर यहां तक लाए। आज हम यहां तक पहुंच गए। अब हमें कुछ छोड़ने की जरूरत नहीं है। अब आनंद उठाने की जरूरत है। हमें आत्मीय आनंद उठाने की जरूरत है। जितना भी ध्यान धर्म ध्यान हम करते हैं कि हम यही कल्पना करते हैं और यही भावना करते हैं कि हमें मुक्ति वधु मिल जाए। उन्होंने कहा आचार्यों ने मोक्ष की कल्पना मुक्ति वधु के रूप में की है। उन्होंने कहा कि 10 दिन में जो आपको मिला है, वह आपकी आत्मा के लिए अपूर्व है। आत्मा हर पर्यूषण में कुछ नया ग्रहण करती है।</p>
<p><strong>सुविधाओं के कारण विकृति बढ़ती जा रही</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि रावण ने जो भूल की, दुर्याेधन ने जो भूल की। आप यह भूल मत करना न मन से, न वचन से, न काय से रावण की भूल और दुर्याेधन की भूल आप सभी को पता है। हमने यह ठान लिया कि यह नहीं करना तो उत्तम ब्रह्मचर्य आएगा। उन्होंने कहा कि सबसे ज्यादा कष्ट सबसे ज्यादा पीड़ा देने वाला मोबाइल है। इस विषय पर बहुत सोचने की जरूरत है नहीं। सोचोगे तो सारे किए पर पानी फिर जाएगा। सबको पता है कौन सी चीज गलत है और कौन सी चीज सही है और कौन सी चीज गलत है। साधन सुविधाओं के कारण विकृति बढ़ती जा रही है और बढ़ती चली जा रही है। हमारी वर्गणाए प्रकृति को प्रभावित करती हैं। आचार्य श्री ने कहा कि हमारी अच्छी और बुरी वर्गणाए प्रकृति को प्रभावित करती हैं।</p>
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		<title>संसार को पसंद मत करो मोक्ष को पसंद करो-आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी : आचार्यश्री को कटारिया परिवार ने किया कमंडल भेंट  </title>
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		<pubDate>Mon, 01 Sep 2025 07:45:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में 10 लक्षण पर्व का चौथा दिन उत्तम शौच धर्म के रूप में मनाया गया। प्रतिदिन की भांति प्रातः 5 बजे आचार्य श्री ने ध्यान कराया। ध्यान उपरांत नगर के प्रमुख मंदिरों में पूजन अभिषेक एवं शांति धारा की गई। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में 10 लक्षण पर्व का चौथा दिन उत्तम शौच धर्म के रूप में मनाया गया। प्रतिदिन की भांति प्रातः 5 बजे आचार्य श्री ने ध्यान कराया। ध्यान उपरांत नगर के प्रमुख मंदिरों में पूजन अभिषेक एवं शांति धारा की गई। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong> रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में 10 लक्षण पर्व का चौथा दिन उत्तम शौच धर्म के रूप में मनाया गया। प्रतिदिन की भांति प्रातः 5 बजे आचार्य श्री ने ध्यान कराया। ध्यान उपरांत नगर के प्रमुख मंदिरों में पूजन अभिषेक एवं शांति धारा की गई। मुख्य पंडाल में भी श्री जी का अभिषेक एवं शांति धारा की गई। इसके उपरांत नित्य नियम पूजन की गई एवं मुख्य तीन मंडलों पर आचार्य श्री के सानिध्य में तत्वार्थ सूत्र के अर्ध समर्पित किए गए। इन अनुपम क्षणों में भक्ति भाव से ओतप्रोत होते हुए प्रेमलता, महेश, नमिता, दर्पक, हार्दिक कटारिया परिवार रामगंजमंडी ने आचार्य श्री के कर कमलों में कमंडल भेंट किया। इस अवसर पर समस्त कटारिया परिवार मौजूद रहा। आचार्य श्री ने उत्तम शौच धर्म पर प्रकाश डाला। आचार्य श्री ने कहा धर्म हमें प्रेरणा देता है कि संसार को पसंद मत करो मोक्ष को पसंद करो लेकिन, हमें संसार पसंद आता है। जब तक संसार में दृष्टि रहेगी। हाथ में कुछ भी नहीं लगने वाला है। हमें मोक्ष को पसंद करना चाहिए। संपूर्ण सुखी अनुभूति मोक्ष में है और संपूर्ण दुखो की अनुभूति संसार में है। हमें पतन की ओर जाना है या उत्थान की ओर जाना है यह निर्णय हमें स्वयं करना होगा।</p>
<p><strong>चमत्कार साधना में होता है </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा किसी वस्तु में चमत्कार नहीं होता है चमत्कार हमारी साधना में होता है। चमत्कार धन में नहीं पुण्य में होता है। लोगों के यहां धन के ढेर लगे होते हैं और वह एक अन्न का दाना भी नहीं खा पाते हैं। चमत्कार धन में नहीं होता है। आप जोड़े चले जा रहे हैं। आप जोड़े चले जा रहे हैं। चमत्कार आपकी आत्मा में है, जो पुण्य हासिल करती है, जो उसे पुण्य के उदय में आकर भोग कर पाती है। लोगों ने मान रखा है कि धन में ही लाभ होता है। इसीलिए लोग धन के पीछे भाग रहे हैं।</p>
<p><strong>लोभ पाप का बाप है </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने लोभ को पाप का बाप बताते हुए कहा कि उन्होंने कहा कि खुद भी प्रेक्टिकल करके देखो। जब भी आपको लोभ आएगा। कोई ना कोई पाप आपसे जरूर होगा। लोभ आपको धन का आएगा। जो भी लोभ आयेगा आपसे सिर्फ पाप कराएंगे और कुछ नहीं कराएंगे।</p>
<p><strong>उत्तम शौच का अर्थ पवित्रता आत्मा की गंदगी को निकालना</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने उत्तम शौच धर्म पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसका अर्थ है पवित्रता आत्मा की गंदगी को निकालना। गुरुदेव ने कहा कि घर में इतनी सी धूल आपके मन को खटकती है और आप प्रयास करते हैं कि यह शीघ्र निकल जाए। हर उपाय करते हो और आत्मा में घर की धूल को साफ करने के लिए बनाने वाले ने इतनी चीजे बना दी कि घर में एक धूल का कण न मिले लेकिन, आत्मा में लगी धूल इसको साफ करने के लिए अनादि से उपाय है उत्तम शौच धर्म धारण कर लो आत्मा की गंदगी धीरे-धीरे बाहर आ जाएगी और एक दिन आत्मा साफ सुथरी मिलेगी। जो गंदा होता है वह कभी गंदा नहीं होता फिर भी अगर गंदा हुआ है तो हम उसे साफ कर सकते हैं। अगर साफ करने के उपाय में आ जाएं तो हम उसे साफ करके ही छोड़ेंगे। इसका सबसे सरल उपाय है निर्लाेभता।</p>
<p><strong>आचार्यश्री ने निर्लाेभता को समझाया </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने निर्लाेभता को समझाया लाभ लो लेकिन लोभ मत करो। लाभ जितना हो उतना ग्रहण करो आसक्ति मत बढ़ाओ संग्रह मत करो उसके कारण लड़ो मत किसी को मारो पिटो नहीं। किसी को दुख और परेशान मत करो। लाभ तो लेना क्योंकि लाभ आपका पुण्य है लेकिन लोभ नहीं होना चाहिए। क्योंकि जहां लोभ आ जाता है वहा आत्मा अपवित्र हो जाती है। उन्होंने कहा लोभ बहुत अच्छी चीज नहीं है। उन्होंने कहा जब पुण्य का उदय होगा तो धन के लिए प्रार्थना करने की जरूरत ही नहीं होगी अपने आप आएगा, फिर थोड़ा सा परिश्रम करना होगा अपने आप धन आ जाएगा। उन्होंने कहा आपको बात माननी ही होगी आप ही कहेंगे कुछ नहीं चाहिए बस सुख चौन चाहिए। उन्होंने कहा अनासक्त भाव से निर्लाेभता आती है। आत्मा पवित्र होती है और उत्तम शौच धर्म आत्मा में बसता है। हमें यह प्रयास करना चाहिए उत्तम शौच धर्म हमारे आत्मा में समाहित हो जाए। हमारी आत्मा में प्रवेश कर जाए ताकि हमारी आत्मा पवित्र हो जाए।</p>
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		<title>स्वतंत्रता का अर्थ स्वतंत्र होना है स्वच्छंद होना नहीं : आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने पापकारी बताकर बचने की दी सलाह </title>
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		<pubDate>Fri, 15 Aug 2025 14:21:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि आज पूरा देश आजादी मना रहा है। आश्चर्य इस बात का है कि आजादी मनाने वाले आजादी का अर्थ नहीं जानते। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि आज पूरा देश आजादी मना रहा है। आश्चर्य इस बात का है कि आजादी मनाने वाले आजादी का अर्थ नहीं जानते। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि आज पूरा देश आजादी मना रहा है। आश्चर्य इस बात का है कि आजादी मनाने वाले आजादी का अर्थ नहीं जानते। स्वतंत्र होना अच्छी बात है। उन्होंने कहा-जब हम लोगों के संघ बने गुरु जी ने एक बात कही- हम तुम्हें स्वतंत्र कर रहे हैं स्वच्छंद नहीं कर रहे। उनका कहने का अभिप्राय था कि अब तक तुम संघ में रहते थे, हमारे अंडर में रहते थे। संघ के अनुशासन में रहते थे। अब आपको बाहर जाना है, मैं नहीं रहूंगा। गुरुजी स्वतंत्र तो कर रहे हैं, लेकिन स्वछंद नहीं कर रहे।</p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि किसी भी आजादी का अर्थ स्वच्छंदता नहीं है। श्रावक चर्या मुनि चर्या का संविधान है। इस भारत में रहने वाले नागरिकों का भी संविधान है। आजादी का मतलब होता है एक कायदे कानून एक नियमों में जीवन व्यतीत करना। जहां पर ऐसा नहीं होता वहां पर स्वच्छंदता आ जाती है। स्वच्छंदता सबसे पहले पाप कराती हैं। जिस पर किसी का कंट्रोल नहीं है। ऐसे व्यक्ति को हम देखते है। वह दिन-रात पाप में ही डूबा रहेगा। यदि कंट्रोल है तो दिन रात पाप में नहीं डूब सकता। यदि हम धार्मिक तरीके से आजादी को देखें तो दो धर्मों का प्रतिपादन हुआ, एक मुनि और एक श्रावक और दोनों के कायदे कानून बनाए गए दोनों के कायदे कानून ऐसे बनाए गए कि दोनों पालन कर सकें।</p>
<p><strong>स्वतंत्रता का आनंद संयम साधना में </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने स्वतंत्रता के विषय में प्रकाश डालते हुए कहा कि स्वतंत्रता का आनंद स्वच्छंदता में नहीं संयम साधना में है। स्वतंत्रता यह कहती है कि अपने धर्म के अनुसार अपने गुणों के अनुसार जीवन को व्यतीत करे लेकिन, हम ऐसा नहीं करते। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि ऐसी स्वतंत्रता से क्या लाभ जो हमें गर्त में ले जाए। स्वतंत्रता ऐसी होनी चाहिए जो हमारा उत्थान करें, हमें इतने उत्थान पर ले जाए कि हम भी ना सोच पाए। स्वतंत्र भारत के स्वतंत्र नागरिक हैं स्वतंत्र हैं स्वच्छंद नहीं है। आप संविधान के विरुद्ध कुछ काम नहीं कर सकते। यदि स्वच्छंदता की कोशिश कर रहे तो आप पर कैस चलेगा और आपको सजा और जेल हो सकती है।</p>
<p><strong>नर्क में भूखा प्यास रहना पड़ता है</strong></p>
<p>यदि इसे धर्म दृष्टि से देखें श्रावक धर्म के हिसाब से देखे यदि अपने धर्म का संविधान तोड़ा तो वह धर्म के विरुद्ध होगा, स्वच्छंद होगा और आपको नरक निगोद जाना पड़ेगा। यहां जेल जाना पड़ता है, वहां नरक जाना पड़ता है। यहां जेल में भूखा प्यास रहना पड़ता है वहां नर्क में भूखा प्यास रहना पड़ता है।</p>
<p><strong> किसी भी बच्चे ने पुण्य करने की आजादी नहीं मांगी होगी</strong></p>
<p>बच्चे बड़े हो गए कहते हैं कि हमें आजादी चाहिए उन्हें पाप करने की आजादी चाहिए। आज तक किसी के भी बच्चे ने पुण्य करने की आजादी नहीं मांगी होगी लेकिन, पाप करने के लिए पाप कार्यों के लिए आजादी मांगी होगी। सब स्वच्छंद होना चाहते हैं। स्वच्छंद होने में हानि बहुत होती है।</p>
<p><strong>सबसे बड़ी परतंत्रता पांच इंद्रियों के वशीभूत होना </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने परतंत्रता के विषय में कहा कि सबसे बड़ी परतंत्रता पांच इंद्रियों के वशीभूत होना है। जीव को इंद्रिया ही नचा रही है। व्यक्ति इंद्रियों से आकर्षित होता है यही परतंत्रता है। पांच इंद्रियों और मन स्वच्छंद होता है। हममें इतनी ताकत ही नहीं है कि हम कंट्रोल कर सकें। कंट्रोल करने का मतलब होता है कि स्वच्छंद समाप्त कर ले। उन्होंने कहा घर की रसोई यदि सही है तो मान के चलना की 99 प्रतिशत यह बात सत्य है कि घर का प्रत्येक व्यक्ति संस्कारी है। स्वतंत्रता का अर्थ होता है इंद्रिय विषयों की पराधीनता को समाप्त करना। उन्होंने कहा हम देश की आजादी मना रहे हैं हम यह सोचे कि हम अपनी आजादी कब मनाएंगे। हमें देश के मौलिक अधिकार मिले। इस देश की नागरिकता मिली। ऐसी स्वतंत्रता कब आएगी कि हम सिद्धालय में विराजमान होंगे। ऐसी स्वतंत्रता वास्तविक स्वतंत्रता है।</p>
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		<title>संपत्ति नहीं संतुष्टि का होना महत्वपूर्ण है: आचार्य श्री विनिश्चय सागर ने धर्मसभा में दी अनमोल सीख  </title>
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		<pubDate>Tue, 29 Jul 2025 12:50:20 +0000</pubDate>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने सोमवार की प्रातः बेला में मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि संपत्ति का होना महत्वपूर्ण नहीं महत्वपूर्ण संतुष्टि का होना है। उन्होंने कहा कि संपत्ति आपके पास है लेकिन, संतुष्टि हो यह जरूरी नहीं है। उन्होंने वर्तमान के मानव के स्वभाव को बताते हुए कहा कि आज का मानव यदि परेशान है तो संपत्ति शरीर परिवार से है और कोई चीज नहीं है, जिससे वह परेशान हो। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने सोमवार की प्रातः बेला में मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि संपत्ति का होना महत्वपूर्ण नहीं महत्वपूर्ण संतुष्टि का होना है। उन्होंने कहा कि संपत्ति आपके पास है लेकिन, संतुष्टि हो यह जरूरी नहीं है। उन्होंने वर्तमान के मानव के स्वभाव को बताते हुए कहा कि आज का मानव यदि परेशान है तो संपत्ति शरीर परिवार से है और कोई चीज नहीं है, जिससे वह परेशान हो। यह तीन चीज किसी भी व्यक्ति को परेशान कर सकती हैं। हमारा जैन धर्म कहता है कि कल का भी नहीं सोचना पल का भी भरोसा नहीं है। इंसान पीढ़ियों की महीनों की सालों की सोच रहा है। अच्छा काम जो करना है आज कर लो। अगर कल पर छोड़ दिया तो उत्साह घट जाता है। यदि यात्रा का भाव बना है तो कल पर नहीं टाल कर आज ही निकल जाना।</p>
<p><strong>एक बार संतुष्ट होकर तो देखें सब विकल्प समाप्त होंगे</strong></p>
<p>अपने आप को भरोसा दें अच्छे काम आज कर ले, बुरे काम को कल पर छोड़ दें यदि किसी प्रति गाली का भाव आए तो कल दूंगा आज नहीं जो चीज़ संपति आदि हमें मिली है, उसमें हम संतुष्ट नहीं है। यह हमें भाग्य उदय से मिली है संपत्ति में नहीं आनंद संतुष्टि में मिले यह प्रयास करना चाहिए। संपत्ति की जगह सुकून को जोड़ना चाहिए हम कर्म अधीन हैं इस पर हमारा हस्तक्षेप नहीं बन सकता लेकिन, हम नासमझ हैं। उन्होंने कहा एक बार संतुष्ट होकर देखो वह आनंद और शांति सुकून मिलेगा। एक बार संतुष्ट होकर तो देखें सब विकल्प समाप्त होंगे। जैन दर्शन में भावों को महत्व दिया है।</p>
<p><strong>मन को भी टाइट करना चाहिए</strong></p>
<p>महाराज श्री ने मानसिकता को ठीक करने पर जोर दिया हम शांतिनाथ भगवान के दर्शन कर रहे हैं और मानसिकता ठीक नहीं है तो कुछ भी नहीं होगा। हमें हमारी मानसिकता को ठीक करने पर ध्यान देना चाहिए। यदि मानसिकता सही है तो दुनिया में कहीं भी चले जाएं सही होगा। धर्म कर रहे हैं और धर्म के अंदर मानसिकता ठीक नहीं है तो धर्म ठीक नहीं कर पाएगा। मन को भी टाइट करना चाहिए मन को कंट्रोल करना चाहिए। मन को शुभ में लगाने के लिए डंडा चाहिए कंट्रोल चाहिए। आपने मन को खुली छूट दी है। मन जो मांगे वह नहीं देना है, जो उसने नहीं मांगा वह देना है। सावधान होकर मन के विरुद्ध चले मन के विरुद्ध चले तो उपलब्धि होगी। रामगंजमंडी की भगवन आत्माओं कहकर संबोधित करते हुए कहा कि यह मैं आपको शक्ति रूप से कह रहा हूं कि मन में गांठ बांधों हम हमेशा संतुष्ट रहें, जो नहीं हो पाया तो भी संतुष्ट रहें।</p>
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		<title>सबसे बड़ा शत्रु व्यक्ति के लिए उसका अहंकार है: आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने मंगल प्रवचन में अहंकार त्यागने पर दिया जोर  </title>
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		<pubDate>Fri, 25 Jul 2025 14:58:11 +0000</pubDate>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि हम दूसरे को देखकर संतुष्ट नहीं होते हैं। यह हमारा जन्म सिद्ध अधिकार हो गया है। हम दूसरे को देख ही नहीं पाते हैं। हमारा धर्म कहता है कि मैत्री भाव और गुणीजनों को देखकर प्रेम उमड़ना चाहिए। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि हम दूसरे को देखकर संतुष्ट नहीं होते हैं। यह हमारा जन्म सिद्ध अधिकार हो गया है। हम दूसरे को देख ही नहीं पाते हैं। हमारा धर्म कहता है कि मैत्री भाव और गुणीजनों को देखकर प्रेम उमड़ना चाहिए। उन्होंने कहा वर्तमान में व्यक्ति का सबसे बड़ा शत्रु अहंकार है। 99 प्रतिशत झगड़े वर्तमान में अहंकार के कारण होते हैं। अगर एक व्यक्ति चुप हो जाता है, अपने आपको सरल करता है, अहंकार को कम करता है तो झगड़ा तीन काल में भी संभव नहीं होगा। अहंकार इसलिए आता है क्योंकि, कषाये अशुभ हेै ये बढ़ती जा रही है। परिणाम ऐसे आ जाते हैं जो हम सोच ही नहीं सकते।</p>
<p><strong>   नीला वर्ण साधु परमेष्ठी का प्रतीक </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने अपने प्रवचन में नीले वर्ण के बारे भी बताया। उन्होंने कहा नीले वर्ण को दो भागों में बांटा गया है। एक शुभ सूचक दूसरा अशुभ सूचक । तिरंगे ध्वज में नीचे रंग नीला रंग होता है साधु परमेष्ठी का प्रतीक है क्योंकि, साधु परमेष्ठी में जब वर्ण का ध्यान किया जाता है तो नीले वर्ण का किया जाता है। भगवान मुनिसुव्रत नाथ, नेमीनाथ भगवान नीले वर्ण के शुभ हैं। जब इस पर रंग घटाया गया व्यक्तित्व पर और व्यक्तित्व के कारण रंग शुभ हो गया है। घटाया गया शुभ व्यक्तित्व पर तो शुभ और अशुभ पर घटाया जाएगा तो अशुभ होगा। वर्ण विज्ञान भावों की विकृति करता है। वर्ण विज्ञान कहता है वर्णों का प्रभाव आत्मा पर गहराई से पड़ता है। वास्तु भी कहता है। पक्के वर्ण नहीं होना चाहिए। यहां यह कलर और पेंट नहीं होना चाहिए था। ऐसा इसलिए क्योंकि, रंगों का प्रभाव पड़ता है। जब इनका प्रभाव पड़ता है तो जीवन भी अस्त व्यस्त होता है। इस बात का भी ध्यान रखना कोई भी रंग का वस्त्र पसंद आ गया ले लिया, नहीं जो आपके भावों को अनुकुलता देता है ऐसे वस्त्र पहनो। यदि पसंद से पहनोगे तो काम गड़बड़ होगा। कोई भी वस्तु कोई भी चीज आप रखते हैं तो उस वर्ण के हिसाब से कुछ मात्र में आपको ठीक रख सकता है। मनचाहे वर्णों में मनचाहे रंगों में आप रहते हैं तो जो चांस आपके अच्छे होने के थे, वे समाप्त हो जाते हैं।</p>
<p><strong>आप धर्मात्मा हो बस इतना ही परिचय हो</strong></p>
<p>नील लेश्या के विषय में समझाते हुए गुरुदेव ने बताया कि आलस प्रमाद की प्रगाढ़ता होती है। नील लेश्या वाले व्यक्ति की आत्मा पर प्रमाद और आलस हावी होता है। हमेशा स्फूर्ति रखना कोई प्रमाद नहीं करना, इस बात को हमेशा करना जो कर्तव्य है उसे में करूंगा। और जो मेरा धर्म है उसे मैं करूंगा। उन्होंने कहा कि रिश्ते को आप कैसे निर्वाह करते हैं। कैसे निभाते हो उसी से आपके व्यक्तित्व और कृतित्व का पता चलता है। उसी से पता चलता है कि आपके भाव शुभ हैं या अशुभ हैं। उन्होंने कहा कि मैं किसी को नहीं जानता हूं और मैं चाहता हूं चार महीने मेरा किसी से परिचय न हो। सिर्फ इतना परिचय हो मैं धर्मात्मा हूं। आप धर्मात्मा हो बस इतना ही परिचय हो। यही परिचय दुनिया का सबसे बड़ा परिचय है।</p>
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