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	<title>Acharya Shri Vardhman Sagar श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>Acharya Shri Vardhman Sagar श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का गुणानुवाद सभा में सुनाए संस्मरण : त्रिदिवसीय 35वां आचार्य पदारोहण समारोह शुरू  </title>
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		<pubDate>Sat, 06 Jul 2024 07:22:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज 48 साधु सहित बाहुबली कॉलोनी बांसवाड़ा में विराजित हैं। 5 जुलाई से 7 जुलाई तक आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का 35वां आचार्य पदारोहण दिवस उत्साह भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। 5 जुलाई को प्रातः काल श्री जी के पंचामृत अभिषेक शांतिधारा पूजन [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज 48 साधु सहित बाहुबली कॉलोनी बांसवाड़ा में विराजित हैं। 5 जुलाई से 7 जुलाई तक आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का 35वां आचार्य पदारोहण दिवस उत्साह भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। 5 जुलाई को प्रातः काल श्री जी के पंचामृत अभिषेक शांतिधारा पूजन के बाद आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का गुणानुवाद सभा में आर्यिका श्री निर्णयमति, आर्यिका श्री प्रमोदमति, आर्यिका श्री विलोकमति ,मुनि श्री प्रबुद्ध सागर जी,मुनि श्री पुण्य सागर जी ने गुरु के उपकार गुणों वात्सल्य आदि अनेक गुणों का विवेचन भाव विभोर होकर किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बांसवाड़ा। </strong>पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज 48 साधु सहित बाहुबली कॉलोनी बांसवाड़ा में विराजित हैं। 5 जुलाई से 7 जुलाई तक आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का 35वां आचार्य पदारोहण दिवस उत्साह भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। 5 जुलाई को प्रातः काल श्री जी के पंचामृत अभिषेक शांतिधारा पूजन के बाद आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का गुणानुवाद सभा में आर्यिका श्री निर्णयमति, आर्यिका श्री प्रमोदमति, आर्यिका श्री विलोकमति ,मुनि श्री प्रबुद्ध सागर जी,मुनि श्री पुण्य सागर जी ने गुरु के उपकार गुणों वात्सल्य आदि अनेक गुणों का विवेचन भाव विभोर होकर किया।</p>
<p>दोपहर को श्री शांति विधान की पूजन आचार्य संघ सानिध्य में पुण्यार्जक परिवारों द्वारा की गई। शाम को श्री जी और आचार्य श्री की आरती पश्चात भजन संध्या हुई। समाज अध्यक्ष महेंद्र वोरा, समाज प्रवक्ता महेंद्र कवलिया कमल सगरीय अनुसार आर्यिका श्री निर्णय मति जी ने गुरु आचार्य वर्धमान सागर जी में परमात्मा का गुण और रूप बताया। गुरु दीपक, चंदन, पारस मणि और दर्पण समान होते हैं। आर्यिका श्री प्रमोदमति माताजी ने बताया कि आचार्य श्री ने बचपन के जन्म मरण,संयोग वियोग, सुख दुःख का चिंतन करते थे सनावद में अनेक साधुओं के समागम से वैराग्य पुष्ट होता गया।</p>
<p>अनेक संस्मरण बताए कि त्यागी संयमी की अनुमोदना रक्षा देवता भी करते हैं। आर्यिका श्री विलोक मति जी ने अनेक संस्मरण में बताया कि दीपावली पर दीप का, बसंत ऋतु में फुल का साधुओं आचार्यों में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का महत्व है। गुरु का आदेश नहीं मानने पर क्षति होती हैं क्षपक साधु की समाधि अच्छे से आचार्य श्री कराते हैं। मुनि श्री प्रबुद्ध सागर जी ने कोहिनूर के समान, विश्व में यश फैलाने वाले यशवंत जी का गुणगान किया। मुनि श्री पुण्य सागर जी ने गुणानुवाद में गुरु को छाते बस्ते के समान चारित्र और ज्ञान के गुण बताए।</p>
<p>गुरु का गुणानुवाद पुण्य से प्राप्त होता है। देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री भी 35 वर्षों से उसी पद पर नहीं हैं, आपको आचार्य पद पर 35 वर्ष हो गए। गज्जू भैया, राजेश पंचोलिया अनुसार 6 जुलाई को अभिषेक शांति धारा विनयांजलि सभा के बाद दोपहर को वर्धमान सागर मंडल विधान की पूजन ओर रात्रि में आचार्य श्री की गौरव गाथा का मंचन होगा।</p>
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		<title>आचार्य पदारोहण शताब्दी महोत्सव में होंगे कई कार्यक्रम : आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज का 152वां वर्ष वर्धन 27 जून को </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 27 Jun 2024 06:23:47 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलेख]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती गुरुणाम गुरु आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज का 152वां वर्ष वर्धन &#8220;दिवस आषाढ़ कृष्णा छठ 6 दिनांक अनुसार 27 जून 2024 को है। आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज का आचार्य पद वर्ष 1924 में हुआ वर्ष 2024 में आचार्य पदारोहण शताब्दी महोत्सव आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के मार्गदर्शन में अखिल [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती गुरुणाम गुरु आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज का 152वां वर्ष वर्धन &#8220;दिवस आषाढ़ कृष्णा छठ 6 दिनांक अनुसार 27 जून 2024 को है। आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज का आचार्य पद वर्ष 1924 में हुआ वर्ष 2024 में आचार्य पदारोहण शताब्दी महोत्सव आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के मार्गदर्शन में अखिल भारतीय स्तर पर अक्टूबर 24 से अक्टूबर 25 तक मनाया जावेगा। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सुनील जैन संचय का विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती गुरुणाम गुरु आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज का 152वां वर्ष वर्धन &#8220;दिवस आषाढ़ कृष्णा छठ 6 दिनांक अनुसार 27 जून 2024 को है। आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज का आचार्य पद वर्ष 1924 में हुआ वर्ष 2024 में आचार्य पदारोहण शताब्दी महोत्सव आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के मार्गदर्शन में अखिल भारतीय स्तर पर अक्टूबर 24 से अक्टूबर 25 तक मनाया जाएगा। आपसे मुनि दीक्षा गुरु श्री देवेंद्र कीर्ति स्वामी ने पुनः दीक्षा ली इस कारण आपको गुरुणाम गुरु की उपाधि दी गई। श्री सातगोंडा जी का जन्म सन 1872 में हुआ आपने सन 1915 में क्षुल्लक दीक्षा ,सन 1919 में ऐलक दीक्षा ,सन 1920 में मुनि दीक्षा ली ।और सन 1924 में आपको आचार्य पद पर विभूषित किया गया।</p>
<p><strong>आहारदान के कठोर नियम</strong></p>
<p>प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा को जानने का प्रयास करें। प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज द्वारा जो आहार लिया जाता था।वह आहार कुएं के पानी का कोयले की सिगडी पर बनता है जो आज भी वही परंपरा है। आहार देने वालो को आजीवन शूद्र जल त्याग त्याग का नियम होता है, वह सामूहिक रसोई में खाना नहीं खाते और अंग्रेजी लिक्विड दवाई का प्रयोग भी नहीं करते हैं। अंतरजातीय विवाह, विधवा विवाह वालों को आहार देने की तब से आज तक अनुमति नहीं हैं। आहार के वस्त्र पॉलीथिन में मान्य नहीं हैं। आहार के वस्त्र भी सूत नारियल की रस्सी या लोहे के तार पर सुखाना होते हैं । संघ में साधुओं का पड़गाहन कर परिक्रमा कर नवधाभक्ति, चरण प्रक्षालन, पूजन अर्घ्य चढ़ाया जाता हैं। संघ में जब आचार्य श्री दक्षिण से उत्तर भारत सम्मेद शिखर जी की यात्रा पर गए तब के पहले से संघ के साथ चलित मंदिर चेत्यालय भी साथ में रखा जिस पर पंचामृत और महिला अभिषेक होता रहा, जो आज भी आचार्य श्री शांति सागर जी की परंपरा में जितने भी आचार्य साधु हुए हैं उन सभी के संघ में श्री जी के चेत्यालय आज भी रहते हैं जिनमें पंचामृत अभिषेक महिला अभिषेक हरे फल नारियल फल फूल नैवेद्य चढ़ाए जाते हैं।शासन देवी देवताओं का अनादर नही होता है</p>
<p><strong>सभी रसों का किया त्याग</strong></p>
<p>प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी वर्ष 1924 से वर्ष 1955 तक आचार्य पद पर रहे। संल्लेखना के कारण अपने प्रथम मुनि शिष्य श्री वीरसागर को लिखित पत्र से आचार्य पद दिया ।आचार्य श्री वीर सागर जी परंपरा के प्रथम पट्टाधीश सन 1955 से सन 1957 तक रहे। आपकी समाधि के बाद आपकी भावना इक्छा अनुसार शिष्य श्री शिव सागर जी परंपरा के सन 1957 से 16 फरवरी सन 1969 तक दिव्तीय पट्टाधीश होकर आचार्य पद पर रहे ।आपकी भावना अनुसार परंपरा के तृतीय पट्टाधीश आचार्य श्री धर्म सागर जी 24 फरवरी 1969 को बनाए गए । यहां यह महत्वपूर्ण है कि आचार्य श्री शिव सागर जी के विद्यमान संयम साधना में रहते मुनि श्री ज्ञान सागर जी को नसीराबाद समाज ने 7 फरवरी 1969 को आचार्य बनाया। अर्थात आचार्य श्री शिव सागर जी की समाधि 16फरवरी 1969 के पूर्व श्री ज्ञान सागर जी आचार्य बने। आचार्य श्री धर्म सागर जी 24 फरवरी 1969 से 22 अप्रैल 1987 समाधि तक परंपरा के तृतीय पट्टाधीशआचार्य रहे। आपकी समाधि के बाद चतुर्थ पट्टाधीश आचार्य श्री अजित सागर जी संघ द्वारा बनाए गए। परंपरा के चतुर्थ पट्टाधीश आचार्य श्री अजित सागर जी 7 जून 1987 से समाधि होने सन 1990 तक आचार्य रहे। आपकी समाधि के बाद आचार्य श्री अजित सागर जी के लिखित आदेश पत्र अनुसार परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 24 जून 1990 आषाढ़ सुदी दूज से वर्तमान तक संयम साधना से धर्म प्रभावना कर रहे हैं ।श्री सातगोंडा जी का जन्म सन 1872 में हुआ। 9 वर्ष की उम्र में 6 वर्ष की कन्या से विवाह हुआ जो 6 माह जीवित रही। आपने 18 वर्ष की उम्र में आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लिया। 32 वर्ष की उम्र से धी और तेल का आजीवन त्याग और एक समय भोजन का नियम लिया।आपने सन 1915 में क्षुल्लक दीक्षा ,सन 1919 में ऐलक दीक्षा ,सन 1920 में मुनि दीक्षा ली और सन 1924 में आपको आचार्य पद पर विभूषित किया गया। आपने 88 भव्य प्राणियों को संयम दीक्षा दी । 26 मुनि 5 आर्यिका ,16 ऐलक ,28 क्षुल्लक और 13 क्षुल्लिका दीक्षा दी । संयम काल में 9938 से अधिक उपवास किए। जैन मंदिर में विजातीय प्रवेश के विरोध में 1105 दिन अन्न आहार का त्याग किया । जिनालय ,जैन धर्म की संस्कृति जिनवाणी के संरक्षण के लिए आपकी प्रेरणा मील का पत्थर होकर स्वर्णिम इतिहास हैं ।आपने 18 करोड़ से अधिक मंत्र जाप किए। जीवन में सर्प,सिंह मकोड़े , चीटी मानव जन्य उपसर्ग समता भाव से सहन किए। अनेक बार आहार की विधि कई दिनों तक नही मिलने से आपके उपवास हुए। मिट्टी के कलश से पड़गाहन की विधि 8 दिन बाद मिली।अनेक वर्षों तक आहार में केवल दूध चावल पानी ही दिया। एक बार 8 दिनों तक आहार में पानी नही दिया 9 वे दिन आहार में केवल पानी ही लिया । एक बार अंजुली में अत्यधिक गर्म दूध देने से आप मूर्छित हो गए । आप उपवास इतने करते थे कि एक नगर में चातुर्मास में 6 माह में से 4 माह उपवास में निकल गए। देहली में शासकीय महत्वपूर्ण इमारतों के समक्ष इस कारण फोटो निकलवाए ताकि दिगंबर साधुओं का विहार में बाधा नहीं हो। निजाम राज्य में भी दिगंबर साधुओं के विहार पर रोक थी देवी सपने से निजाम अधिकारी ने आदेश वापस लिया ।</p>
<p>आचार्य श्री के बचपन,खेती के कपड़ा दुकान के स्वाध्याय संबंधी ,दूरदर्शिता बुद्धि कोशल, आहार चर्या,उपवास,उपसर्ग बाल विवाह पर रोक, अन्य समाज को मांसाहार के त्याग आदि बहुत प्रसंग दिल को द्रवित करते हैं । नेत्रों में मोतियाबिंद होने पर स्वस्थ होने के बाद भी संल्लेखना लेकर 36 दिनों में मात्र 12 बार जल लिया । एक नगर में चातुर्मास में पूरी अवधि सभी साधुओं ने रस का त्याग किया। आपकी समाधि सन1955 में हुई।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : कर्म के बंधन से परिजनों से होता है राग &#8211; द्वेष &#8211; आचार्य श्री वर्धमान सागर  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/karma_leads_to_attachment_with_family_hatred_acharya_shri_vardhman_sagar/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Jun 2024 12:20:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मनुष्य गति में आप दरिद्रता से, रोग से दुखी होते हैं। संपन्न व्यक्ति खुश दिखता है किंतु उसे भी अलग-अलग चिंता होने से शरीर बीमार होता है और उसकी भी असमय मृत्यु होती है। वस्तु स्थिति में चारों गति ही संसार है। इससे जन्म-मरण से मुक्त होने पर ही सुख मिलेगा। जैसे अपराधी या पशु [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मनुष्य गति में आप दरिद्रता से, रोग से दुखी होते हैं। संपन्न व्यक्ति खुश दिखता है किंतु उसे भी अलग-अलग चिंता होने से शरीर बीमार होता है और उसकी भी असमय मृत्यु होती है। वस्तु स्थिति में चारों गति ही संसार है। इससे जन्म-मरण से मुक्त होने पर ही सुख मिलेगा। जैसे अपराधी या पशु को बंधन से मुक्त कर दिया जाए तो उसे खुशी होती है, इसी प्रकार आप भी संसार रूपी आवागमन से मुक्त होने पर सिद्ध बनने पर वास्तविक शाश्वत सुख को प्राप्त करेंगे। यह मंगल देशना वात्सल्य वारिधी पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने खांदू कालोनी बांसवाड़ा की धर्म सभा में प्रगट की। पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट&#8230;</strong></p>
<hr />
<p><strong>बांसवाड़ा।</strong> यह जीव अनादिकाल से संसार में परिभ्रमण कर रहा है। उसे अपना वास्तविक घर नहीं मिल रहा है। संसार में भ्रमण करते हुए अनंत काल बीत गया किंतु किनारा नहीं मिला। इसी प्रकार संसार रूपी समुद्र में भी सही गंतव्य की जानकारी नहीं होने से जहाज में बैठकर किनारा नहीं मिलता क्योंकि सही दिशा पता नहीं है। इसी प्रकार वन में भी आप भटकते रहते हैं आपको रास्ता नहीं मिलता। इसी प्रकार आज का प्राणी जीवन रूपी चौराहे पर खड़ा है उसे किस रास्ते पर जाना है उसे ज्ञान नहीं है, आपने बहुत आरंभ परिग्रह किए हैं। इससे नरक गति, मायाचारी करने से व्यक्ति तिर्यंचगति में जाता है, अच्छे कार्य करने से मनुष्य देव गति में जाता है। जीवन के इस चौराहे पर किस लक्ष्य को जाना है नरक गति तिर्यंच गति के दुख साक्षात देख रहे हैं। नरक गति से आपको डर भय लगता है।देवगति में सुख और दुख दोनों हैं। देव 4 प्रकार के होते हैं भवनवासी, व्यंतरवासी, ज्योतिषवासी और वैमानिक देव। इसमें मात्र वेमानिक देव सम्यक दर्शन प्राप्त कर सकते हैं किंतु शेष तीन देव मिथ्यादृष्टि होते हैं वैमानिक देव गति में भी बलशाली प्रभावशाली देव के अधीन रहना होता है। कभी-कभी किन्हीं देवों के वाहन हाथी सिंह आदि बनना होता है। इसलिए चारों गति में दुख ही दुख है। मनुष्य गति में आप दरिद्रता से, रोग से दुखी होते हैं। संपन्न व्यक्ति खुश दिखता है किंतु उसे भी अलग-अलग चिंता होने से शरीर बीमार होता है और उसकी भी असमय मृत्यु होती है। वस्तु स्थिति में चारों गति ही संसार है। इससे जन्म-मरण से मुक्त होने पर ही सुख मिलेगा। जैसे अपराधी या पशु को बंधन से मुक्त कर दिया जाए तो उसे खुशी होती है, इसी प्रकार आप भी संसार रूपी आवागमन से मुक्त होने पर सिद्ध बनने पर वास्तविक शाश्वत सुख को प्राप्त करेंगे। यह मंगल देशना वात्सल्य वारिधी पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने खांदू कालोनी बांसवाड़ा की धर्म सभा में प्रगट की।</p>
<p><strong>बैर कष्ट देता है अनेक भव तक</strong></p>
<p>ब्रह्मचारी गज्जू भैया, समाज सेठ अमृतलाल अनुसार आचार्य श्री ने बताया कि कर्म के बंधन से परिजनों से राग द्वेष होता है और शत्रु के प्रति बैर भाव कारण द्वेष होता है। आज सगा भाई भी एक दूसरे के प्रति द्वेष रखता है और शत्रुता अधिक समय होने पर वह बैर के रूप में परिवर्तित हो जाती है और यह बैर अनेक भव तक कष्ट देता है। भगवान पारसनाथ और कमठ की कहानी आप सभी जानते हैं कि कमठ ने अगले 10 भवों तक पारसनाथ भगवान के जीव पर उपसर्ग पहुंच कर उन्हें दुखी किया। प्राणी चाहे तो मनुष्य गति और तिर्यंच गति में भी सम्यक दर्शन प्राप्त कर सकता है। पारसनाथ भगवान के जीव ने उपसर्ग कारण मृत्यु होने तिर्यंच गति में हाथी बन मुनिराज के उपदेश से धर्म ,अणुव्रत धारण किया। आज के मानव को छोटे-छोटे नियम व्रत प्रतिमा लेने में बहुत विचार आता है कि हम नियमों का पालन नहीं कर सकते हैं किंतु पारसनाथ भगवान के हाथी की पर्याय को आप देखिए। जब स्वाध्याय करेंगे तभी वास्तविक ज्ञान मिलेगा। वह हाथी हरे पत्ते नहीं खाता था, पानी के पास जाता था तो पानी नहीं पीता था। तब अन्य भले प्राणी उसे पानी को हिलाते थे पानी हिलने से वह जल प्रासुक हो जाता था, तब वह हाथी पानी पीता था, अन्य प्राणी उसके लिए सूखे पत्ते आदि थे तो वह हाथी सूखे पत्ते खाकर उसने अपने अणुव्रत नियम की रक्षा की। उसने धर्म का दृढ़ता पूर्वक अणुव्रत का पालन कर अपनी पर्याय को ठीक कर लिया। आचार्य श्री बताते हैं कि आप जैसे परिणाम करेंगे उसे अनुसार आयु का बंध होता है। जिस प्रकार माता वात्सल्य ममतामई होती है ,वह बच्चों को दुलार करती है बच्चे को दुखी नहीं देख सकती बच्चे का दुख दूर करने का प्रयत्न करती है । इस प्रकार जिनवाणी माता के स्वाध्याय करने से हमें ज्ञान मिलता है और यही ज्ञान हमारे दुख को दूर करता है। राजेश पंचोलिया और समाज प्रवक्ता अक्षय डांगरा अनुसार आचार्य ने बताया कि मनुष्य गति में सुख और दुख दोनों मिलते हैं। इसलिए आपको नियमित जिनवाणी शास्त्र का स्वाध्याय करना चाहिए। शास्त्र के स्वाध्याय से ज्ञान प्राप्त होता है। इस ज्ञान से तत्व को समझें धर्म के प्रति श्रद्धा से सम्यक दर्शन प्राप्त होगा और आपको मोक्ष का सही मार्ग प्राप्त होता है। इसलिए मनुष्य भव में देव दर्शन अभिषेक पूजन आचार्य साधु परमेष्टि की देशना सुनने को मिलती है ।मृत्यु हर उम्र की होती है इसलिए सावधानी और सजकता से धर्म को धारण कर मनुष्य जीवन को धन्य और सार्थक करने का पुरुषार्थ करें।</p>
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