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	<title>Acharya Shri Vardhaman Sagar Ji &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>Acharya Shri Vardhaman Sagar Ji &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>जयपुर में श्रावक-श्राविकाओं की श्रद्धा से भर आईं आंखें : अध्यात्म के शिखर पर विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित    </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 12 Jun 2026 07:14:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के प्रति दिगंबर जैन समाज की संस्थाओं, मंदिरों सामाजिक, धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने बुधवार को श्री चंद्रप्रभ जिनालय चंद्रपुरी, बड़ के बालाजी में श्रीफल भेंट कर भावभीनी कृतज्ञता ज्ञापित कर भविष्य में भी लंबे प्रवास की याचना की। जयपुर से पढ़िए, डॉ. राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;  जयपुर। राजस्थान [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के प्रति दिगंबर जैन समाज की संस्थाओं, मंदिरों सामाजिक, धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने बुधवार को श्री चंद्रप्रभ जिनालय चंद्रपुरी, बड़ के बालाजी में श्रीफल भेंट कर भावभीनी कृतज्ञता ज्ञापित कर भविष्य में भी लंबे प्रवास की याचना की। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, डॉ. राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> जयपुर।</strong> राजस्थान की राजधानी जयपुर राजनीतिक दृष्टिकोण के साथ धार्मिक अध्यात्म की दृष्टि से भी राजधानी हैं। लगभग 300 से अधिक जिनालयों की गुलाबी नगरी जयपुर जिले में विगत 4 माह से धर्म की गंगा प्रवाहित करने वाले 76 वर्षीय 58 वर्षों से संयम साधना करने वाले 36 वर्षों से आचार्य, 36 मूलगुण धारी, 36 साधुओं के संघ नायक आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के प्रति दिगंबर जैन समाज की संस्थाओं, मंदिरों सामाजिक, धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने बुधवार को श्री चंद्रप्रभ जिनालय चंद्रपुरी, बड़ के बालाजी में श्रीफल भेंट कर भावभीनी कृतज्ञता ज्ञापित कर भविष्य में भी लंबे प्रवास की याचना की। गुरु भक्त सुरेश सवलावत ने बताया कि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी, 10 मुनिराज, 20 आर्यिकाएं, 1 ऐलक, 4 क्षुल्लक एवं 1 क्षुल्लिका सहित कुल 37 पिच्छी के मंचासीन होने के बाद अनेक वक्ताओं ने आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के अनेक संस्मरण भावांजलि प्रस्तुत की।</p>
<p><strong>जयपुर समाज ने साधुओं को अपनी श्रद्धा के बल पर संभाला-आचार्य श्री</strong></p>
<p>इस मौके पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने कहा कि समाज जब अपने मन में सारी बातें सोच लेती है और गुरु जनों का समागम लेती है तो उनके सभी कार्यों में सफलता निश्चित रूप से मिलती है। गुलाबी नगरी के जैन मंदिरों को देखकर ऐसा लगता है हमारे पूर्वजों ने चौकड़ी मोदीखाना के मंदिरों में अपना तन मन धन लगाया और जैन संस्कृति को प्रकट किया है। गुलाबी नगरी की जैन समाज अपनी श्रद्धा भक्ति के बल पर बड़े-बड़े संघों को संभाल लेती है।</p>
<p><strong>विवेकवान व क्रियावान को कहते हैं श्रावक-मुनि हितेन्द सागर जी </strong></p>
<p>श्रमण व श्रावक जब दोनों रहते हैं तो धर्म रहता है। इसलिए श्रमण व श्रावक धर्म के मूल है। सच्चा श्रमण वही होता है जो हर पल सजग रहता है। जागृत रहने के साथ-साथ सुप्त अवस्था में भी जो सजग रहता है वही सच्चा श्रमण कहलाता है। विवेकवान और क्रियावान जो होता है वही श्रावक कहलाता है। श्रावक सो जाए तो श्रमण की चार्य पालन नहीं हो सकती।</p>
<p><strong>इन लोगों ने की कृतज्ञता ज्ञापित </strong></p>
<p>गुरु भक्त सुरेश सबलावत ने बताया कि जैन समाज के भामाशाह अशोक पाटनी, श्री दिगंबर जैन आचार्य संस्कृत महाविद्यालय के अध्यक्ष एनके सेठी, श्री दिगंबर जैन अतिशक्षय क्षेत्र श्री महावीर जी के अध्यक्ष सुधांशु कासलीवाल, प्रमुख रतन व्यवसायी विवेक काला, श्री महावीर दिगंबर जैन शिक्षा परिषद के अध्यक्ष उमरावमल संघी, राजस्थान जैन सभा के अध्यक्ष सुभाष पांड्या, तीर्थ क्षेत्र कमेटी राजस्थान के अध्यक्ष राजकुमार कोठारी, श्री दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र क्षेत्र पदमपुर के मानद् मंत्री हेमंत सोगाणी, जस्टिस एनके जैन, प्रदीप चूड़ीवाल, निहाल पांड्या, कमल चांदवाड, प्रमुख समाजसेवी चंद्र प्रकाश पहाड़िया, राजस्थान जैन सभा के महामंत्री मनीष वैद, शैलेश सोगानी, आलोक जैन, महावीर भानगडिया, कमल काला, नवीन जैन बस्सी वाले सहित गुलाबी नगरी जयपुर के सैकड़ों श्रद्धालुओं के साथ राजस्थान युवा महासभा के अध्यक्ष प्रदीप जैन, विनोद कोटखावदा, प्रतिष्ठा आचार्य विमल कुमार बनेठा, पीके जैन, भारत भूषण जैन सहित अन्य मंदिरों का प्रतिनिधित्व कर रहे पदाधिकारी ने आचार्य श्री के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए और प्रवास देने की बात कही।</p>
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		<title>श्री चंद्रप्रभ भगवान का द्रव्यों से किया पंचामृत अभिषेक : पूजन आचार्य संघ सान्निध्य में हुआ संपन्न  </title>
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		<pubDate>Tue, 09 Jun 2026 14:25:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[गणिनी आर्यिका श्री सुपार्श्वमति जी की समाधि स्थली श्री चंद्रप्रभ जिनालय में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 36 साधु सहित ग्रीष्मकालीन वाचना के लिए विराजित हैं। पिछले चार माह से आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ससंघ के सान्निध्य से जयपुर की धरा धन्य हो रही है। पढ़िए, जयपुर से डॉ.राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट&#8230; जयपुर। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>गणिनी आर्यिका श्री सुपार्श्वमति जी की समाधि स्थली श्री चंद्रप्रभ जिनालय में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 36 साधु सहित ग्रीष्मकालीन वाचना के लिए विराजित हैं। पिछले चार माह से आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ससंघ के सान्निध्य से जयपुर की धरा धन्य हो रही है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए, जयपुर से डॉ.राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर।</strong> गणिनी आर्यिका श्री सुपार्श्वमति जी की समाधि स्थली श्री चंद्रप्रभ जिनालय में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 36 साधु सहित ग्रीष्मकालीन वाचना के लिए विराजित हैं। पिछले चार माह से आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ससंघ के सान्निध्य से जयपुर की धरा धन्य हो रही है। गुरुवर के वात्सल्य, आशीर्वाद और उपदेशों से सभी को बहुत धर्मलाभ मिला है। गुरुभक्त सुरेश सबलावत ने बताया कि 10 जून को प्रातः 8 से 10 बजे तक सभी मंदिर गुरुचरणों में अपनी श्रद्धा, भक्ति और कृतज्ञता अर्पित कर तथा विनम्र निवेदन करेंगे कि जयपुर को उनके सान्निध्य का लाभ आगे भी मिलता रहे। असम गुवाहाटी के भागचंद, सुनीता चूड़़ीवाल सहित समस्त चूड़़ीवाल परिवार ने आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सानिध्य में जयपुर बड़ के बालाजी चंद्रपुरी में मंगलवार को श्री चंद्रप्रभ भगवान का पंचामृत अभिषेक और पूजन किया।</p>
<p>दोपहर को मंडल विधान का पूजन हुआ। आचार्य संघ सानिध्य में प्रातः काल भगवान श्री चंद्रप्रभ का भव्य पंचामृत अभिषेक जल, नारियल पानी, शर्करा, विभिन्न फलों और सूखे मेवों के रसों, दूध, घी, दही, सर्वाेषधि, विभिन्न पुष्प केशर, सुगंधित जल, चार कलश से शांतिधारा हुई। यहां यह उल्लेखनीय है कि प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के प्रथम पट्टाचार्य श्री वीरसागर जी महाराज से दीक्षित गणिनी आर्यिका श्री सुपार्श्व मतीजी चूड़ीवाल परिवार की है। गणिनी आर्यिका श्री सुपार्श्व मति जी की समाधि इसी स्थान पर हुई। भव्य मंदिर के साथ वैराग्य का दिग्दर्शन प्रतीक समाधिस्थल भी बनाया गया हैं।</p>
<p>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का 10 वर्षों बाद छठी बार वर्ष 2026 में, 10 मुनिराज, 20 आर्यिका, 1 ऐलक, 3 क्षुल्लक 34 साधु सहित जयपुर में मंगल प्रवेश हुआ। इसके पूर्व सन 1969 में दीक्षा गुरु आचार्य श्री धर्म सागर जी के साथ आपने वर्षायोग किया था। आचार्य श्री वर्धमान सागरजी ने आचार्य बनने के बाद सन 1999 में भट्टारक जी की नसिया में चातुर्मास किया था। उसी वर्ष में क्षुल्लिका और आर्यिका दीक्षा श्री अचल मति को और श्री नमित सागरजी को ऐलक दीक्षा दी थी तथा आर्यिकाश्री अचल मति और आर्यिका श्री सरस्वती मति जी 2 साधुओं की समाधि हुई। वर्ष 2000 में नेमीनगर कॉलोनी में पंच कल्याणक प्रतिष्ठा की। उसी में मुनि श्री देवेंद्र सागर और मुनि श्री देवेश सागर जी को मुनि दीक्षा प्रदान की। वर्ष 2014 में श्यामनगर जयपुर में पंच कल्याणक प्रतिष्ठा हुई। वर्ष 2016 में बड़के बालाजी में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं आर्यिका श्री गुप्तिमति जी की दीक्षा और आर्यिका श्री रिद्धि मति की समाधि हुई। वर्ष 2026 मंगलम सिटी में सलूम्बर के पति पत्नी ने दीक्षा ली।</p>
<p>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मालवीय नगर जयपुर के पुत्रः एवं पिता को क्रमशः मुनि श्री हितेंद्र सागर जी एवं मुनि श्री भुवन सागर दीक्षा देकर बनाया। आचार्य श्री ने जयपुर निवासी मुनि श्री विवर्जित सागर जी एवं जयपुर निवासी मुन्नालाल टकसाली को दीक्षा देकर मुनि श्री गुणोदय सागर बनाया। प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी एवं पूर्वाचार्यों से जयपुर के निवासियों ने दीक्षा लेकर आत्म कल्याण किया है।</p>
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		<title>आहार दान देने से भव्य जीव तीर्थंकर श्री शांतिनाथ बने : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रातः दान का महत्व और व्यसन के दुष्परिणामों को बताया </title>
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		<pubDate>Thu, 04 Jun 2026 16:54:20 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आर्यिका श्री सुपार्श्वमति जी की समाधि स्थली श्री चन्द्रप्रभ जिनालय में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी चंद्रप्रभ जिनालय में 36 साधु सहित ग्रीष्म कालीन वाचना हेतु विराजित हैं। प्रतिदिन चुड़ीवाल परिवार की ओर से चंद्रपुरी में चातुर्मास के लिए श्रीफल चढ़ाया जाता हैं। जयपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230; जयपुर। आर्यिका श्री सुपार्श्वमति जी की समाधि [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आर्यिका श्री सुपार्श्वमति जी की समाधि स्थली श्री चन्द्रप्रभ जिनालय में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी चंद्रप्रभ जिनालय में 36 साधु सहित ग्रीष्म कालीन वाचना हेतु विराजित हैं। प्रतिदिन चुड़ीवाल परिवार की ओर से चंद्रपुरी में चातुर्मास के लिए श्रीफल चढ़ाया जाता हैं। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर।</strong> आर्यिका श्री सुपार्श्वमति जी की समाधि स्थली श्री चन्द्रप्रभ जिनालय में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी चंद्रप्रभ जिनालय में 36 साधु सहित ग्रीष्म कालीन वाचना हेतु विराजित हैं। प्रतिदिन चुड़ीवाल परिवार की ओर से चंद्रपुरी में चातुर्मास के लिए श्रीफल चढ़ाया जाता हैं। मॉर्निंग वॉक ग्रुप ने श्याम नगर तथा अन्य कॉलोनी से पवन कुमार गंगवाल, कमल कुमार चांदवाड़, विनोद कुमार पांड्या, प्रदीप कुमार चूड़ीवाल, सुरेश सबलावत, रवींद्र कुमार पाटनी, पुखराज बाकलीवाल, शैलेष सोगानी ने आचार्य श्री के कक्ष में अध्ययन प्राप्त किया। धीरे-धीरे यह धर्म की बयार, धर्म की गंगा में भक्तों की संख्या सैकड़ों हो गई। दोपहर से किशनगढ़ के सैकड़ों भक्तों ने वर्ष 2026 के चातुर्मास के लिए निवेदन किया। बुधवार को आर्यिका श्री पद्मयश मति जी ने केश लोचन किए। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रातः दान का महत्व और व्यसन के दुष्परिणामों को बताया। दान- अपने और पर के उपकार के लिए चतुर्विधसंघ (मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका) को जो दान दिया जाता है, वह दान कहलाता है। सुरेश सबलावत, भागचंद चूड़ीवाल के अनुसार आचार्य श्री वर्धमान सागरजी ने दान के चार प्रकार में बताया कि आहार दान, औषधदान, ज्ञानदान, अभयदान होते हैं।</p>
<p>मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका आदि उत्तम, मध्यम, जघन्य पात्रों को यथाशक्ति नवधा भक्तिपूर्वक सप्तगुण सहित जो दान दिया जाता है वहआहार दान है। श्रीषेण राजा आहार दान में प्रसिद्ध हुए हैं। श्रीषेण राजा ने श्री अमित ओर श्री अरिंजय मुनिराज को आहार दान दिया। पुण्य से भोग भूमि में देव होकर मनुष्य गति में 16 वें तीर्थंकर श्री शांतिनाथ हुए। रोग को दूर करने के लिए शुद्ध निर्दोष औषधि से उपचार करना औषधिदान है औषधि दान में सेठ पुत्री वृषभसेना प्रसिद्ध को प्राप्त हुई। इस दान के फल स्वरुप उसे सर्वोषधी रिद्धि प्राप्त हुई। जिसके प्रभाव से उसके स्नान के जल से सभी भयंकर रोग और विष दूर हो जाते थे।शास्त्र दान के प्रभाव पुण्य से ग्वाला बाद में जिनवाणी के पारंगत श्रुत केवली श्री कुंदकुंद आचार्य हुए। जीवों को भय से निकालना, उनकी रक्षा करना और भवन आदि बनवाना अभय दान है अभय दान में सुकर प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ। व्यसन बुरी आदतों को व्यसन कहते हैं। व्यसन अर्थात् खोटी, बुरी आदत जो आत्मा के स्वरूप को भुला दे तथा आत्मा का कल्याण न होने दें, उसे व्यसन कहते हैं। व्यसन सेवन करने वाले व्यसनी कहलाते हैं।वव्यसन सात होते हैं- जुआ खेलना, मांस खाना,शराब पीना,वेश्या गमन, शिकार खेलना,चोरी करना, परस्त्री सेवन करना। धन, सम्पत्ति, रुपये-पैसे आदि से हार-जीत की शर्त लगाकर किसी भी खेल को खेलने की आदत, जुआ खेलना व्यसन कहलाता है।यह सभी व्यसनों का मूल पाप की खान है। जुआ व्यसन में &#8216;पाण्डव&#8217; प्रसिद्धि को प्राप्त हुए।</p>
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		<title>धर्म संवर्धन संस्कृति शिविर में बच्चों ने सीखे संस्कार: 30 मई को होगा संस्कृति शिविर का समापन  </title>
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		<pubDate>Thu, 28 May 2026 10:48:55 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी चंद्रप्रभ जिनालय चंद्रपुरी बड़ के बालाजी में 36 साधुओं सहित ग्रीष्मकालीन वाचना के लिए विराजित हैं। श्रावक-श्राविकाओं की भावना रहती हैं कि आचार्य संघ का सानिध्य अधिक से अधिक मिले। इसके उपाय में धार्मिक अनुष्ठान ,कार्यक्रम आयोजित करते हैं ताकि संत समागम अधिक से अधिक समय मिले। जयपुर से [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी चंद्रप्रभ जिनालय चंद्रपुरी बड़ के बालाजी में 36 साधुओं सहित ग्रीष्मकालीन वाचना के लिए विराजित हैं। श्रावक-श्राविकाओं की भावना रहती हैं कि आचार्य संघ का सानिध्य अधिक से अधिक मिले। इसके उपाय में धार्मिक अनुष्ठान ,कार्यक्रम आयोजित करते हैं ताकि संत समागम अधिक से अधिक समय मिले। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, डॉ.राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर।</strong> पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी चंद्रप्रभ जिनालय चंद्रपुरी बड़ के बालाजी में 36 साधुओं सहित ग्रीष्मकालीन वाचना के लिए विराजित हैं। श्रावक-श्राविकाओं की भावना रहती हैं कि आचार्य संघ का सानिध्य अधिक से अधिक मिले। इसके उपाय में धार्मिक अनुष्ठान ,कार्यक्रम आयोजित करते हैं ताकि संत समागम अधिक से अधिक समय मिले। जब से गुरुदेव पधारे हैं नियमित धार्मिक आयोजन हो रहे हैं। सुनीता भागचंद चूड़ीवाल ने बताया कि 21 से 30 मई तक धर्म संवर्धन संस्कृति शिविर का आयोजन किया गया है। जिसमें आचार्य श्री वर्धमान सागर जी, मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ,श्री प्रभव सागर जी, श्री मुमुक्षु सागर जी ,आर्यिका देवर्धि मति श्री पद्मयशमति सहित अनेक साधुओं द्वारा तत्व तत्वार्थ सूत्र, छहढ़ाला ,धार्मिक संस्कार प्रथम एवं द्वितीय भाग, भक्तामर स्त्रोत, द्रव्य संग्रह आदि धार्मिक विषयों पर शिक्षण शिविर में उपदेश दिया जा रहा है। जिसमें भक्तों द्वारा भाग लिया जा रहा है। जोबनेर मंगलम सिटी, श्याम नगर, मालवीय नगर आदि से सभी उम्र के भक्त शामिल हो रहे हैं।</p>
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		<title>चातुर्मास के लिए आचार्य श्री के चरणों में किया निवेदन : चन्द्र प्रभ जिनालय प्रबंध समिति बड़ के बालाजी के पदाधिकारी ने लिया आशीर्वाद </title>
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		<pubDate>Tue, 26 May 2026 09:17:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[चन्द्र प्रभ जिनालय प्रबंध समिति बड़ के बालाजी ने वर्ष 2026 के चातुर्मास के लिए आचार्य श्री वर्धमान सागर जी को श्रीफल भेंट किया है। आचार्य श्री शशांक सागर जी चरण वंदना के लिए पहुंचे। जयपुर से डॉ. राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट&#8230; जयपुर। चन्द्र प्रभ जिनालय प्रबंध समिति बड़ के बालाजी ने वर्ष 2026 के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>चन्द्र प्रभ जिनालय प्रबंध समिति बड़ के बालाजी ने वर्ष 2026 के चातुर्मास के लिए आचार्य श्री वर्धमान सागर जी को श्रीफल भेंट किया है। आचार्य श्री शशांक सागर जी चरण वंदना के लिए पहुंचे। <span style="color: #ff0000">जयपुर से डॉ. राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर।</strong> चन्द्र प्रभ जिनालय प्रबंध समिति बड़ के बालाजी ने वर्ष 2026 के चातुर्मास के लिए श्रीफल भेंट किया है। आचार्य श्री शशांक सागर जी की चरण वंदना के लिए पहुंचे। गणिनी आर्यिका श्री सुपार्श्व मति माताजी की समाधि स्थल चंद्रपुरी बड़ के बालाजी श्री चंद्रप्रभ जिनालय में संघ सहित विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज जी को सुनीता चुड़ीवाल एवं परिजनों ने संघ सहित वर्ष 2026 के चातुर्मास का निवेदन किया।आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की चरण वंदना के लिए आचार्य श्री शशांकसागर जी संघ सहित पधारे। मुनि श्री हितेंद्र सागर जी सहित साधुओं एवं सुनीता भागचंद चुड़ीवाल ने आचार्य श्री शशांक सागर जी की अगवानी की। आचार्य श्री शशांक सागर जी ने आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की 3 परिक्रमा कर चरण वंदना प्रक्षालन किए।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-medium wp-image-107332" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/05/IMG-20260526-WA0013-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/05/IMG-20260526-WA0013-300x225.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/05/IMG-20260526-WA0013-1024x768.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/05/IMG-20260526-WA0013-768x576.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/05/IMG-20260526-WA0013-1536x1152.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/05/IMG-20260526-WA0013-2048x1536.jpg 2048w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/05/IMG-20260526-WA0013-74x55.jpg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/05/IMG-20260526-WA0013-111x83.jpg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/05/IMG-20260526-WA0013-215x161.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/05/IMG-20260526-WA0013-990x743.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/05/IMG-20260526-WA0013-1320x990.jpg 1320w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" /></p>
<p>प्रातःकालीन उपदेश में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने आचार्य परमेष्ठि के 36 मूल गुणों की विवेचना में बताया कि आचार्य परमेष्ठी 12 तप, 10 धर्म, 5 पंचाचार, 6 आवश्यक और तीन गुप्ति का पालन करते हैं। 12 तप के बारे में बताया कि अनशन अर्थात निर्जल उपवास करना, उनोदर भूख से कम आहार लेना, व्रत परिसंख्यान में आहार के लिए विधि लेकर जाना, विधि नहीं मिलने पर उपवास करना है। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया कि प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी ने शीत काल ठंड के दिनों में गीले कपड़े से पडगाहन की विधि ग्वालियर में ली और उसी दिन विधि मिली। मिट्टी के कलश पर श्रीफल से पड़गाहन की विधि 8 दिन बाद मिली। आचार्य श्री ने स्वयं के संस्मरण में बताया कि एक बार दो मौसंबी के पड़गाहन की विधि 3 दिन नहीं मिलने से 3 उपवास लगातार हुए।</p>
<p>6 प्रकार के रस होते हैं। नीरस अर्थात 6 रसों का उस दिन त्याग या आंशिक रस का परित्याग, विविक्त शय्यासन, कायक्लेश, पायश्चित, विनय, वैय्यावृत्ति, स्वाध्याय,व्युत्सर्ग ओर ध्यान के बारे में विस्तृत उपदेश दिया। सुरेश सबलावत, भागचंद चुड़ीवाल के अनुसार आचार्य श्री ने दस धर्म की विवेचना में उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य शौच, संयम तप, त्याग आकिञ्चन उत्तम ब्रह्मचर्य की व्याख्या की। पाँच पंचाचार में दर्शनाचार, ज्ञानाचार, तपाचार,चारित्राचार और वीर्याचार के बाद षट् आवश्यक समता, वंदना,स्तुति. प्रतिक्रमण. प्रत्याख्यान ओर कायोत्सर्ग का बताया। मनोगुप्ति, वचनगुप्ति, कायगुप्ति कुल 36 मूलगुण के बाद जो संघ में रहकर स्वयं पढ़ते हैं और अन्य मुनिगणों को पढ़ाते हैं, उन्हें उपाध्याय परमेष्ठी कहते हैं। जिनेन्द्र द्वारा प्रतिपादित जिनवाणी को विद्वानों ने स्वाध्याय कहा है। जो उस स्वाध्याय का उपदेश देते हैं। वह उपाध्याय कहलाते हैं। उनके 25 मूल गुण होते हैं। जिसमें 11 अंग और 14 पूर्व के भेद सहित 25 मूलगुण होते हैं।</p>
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		<title>आत्म कल्याण के लिए धर्म को जीवन में धारण करें :  आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्मसभा में सत्कर्म के लिए किया प्रेरित </title>
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		<pubDate>Sat, 23 May 2026 14:23:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने शनिवार चंद्रपुरी, बड़ के बालाजी की पाठशाला में बताया कि मनुष्य जीवन केवल खाने-पीने और सुख भोगने के लिए नहीं, बल्कि आत्मा को समझने और अच्छे कर्म करने के लिए मिला है। जयपुर से पढ़िए, डॉ. राजेश पंचोलिया की यह रिपोर्ट&#8230; जयपुर। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने शनिवार [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने शनिवार चंद्रपुरी, बड़ के बालाजी की पाठशाला में बताया कि मनुष्य जीवन केवल खाने-पीने और सुख भोगने के लिए नहीं, बल्कि आत्मा को समझने और अच्छे कर्म करने के लिए मिला है। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, डॉ. राजेश पंचोलिया की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर</strong>। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने शनिवार चंद्रपुरी, बड़ के बालाजी की पाठशाला में बताया कि मनुष्य जीवन केवल खाने-पीने और सुख भोगने के लिए नहीं, बल्कि आत्मा को समझने और अच्छे कर्म करने के लिए मिला है। कर्म कैसे बंधते हैं?की विवेचना में आचार्य श्री ने बताया कि जब हम क्रोध करते हैं,अहंकार करते हैं,ईर्ष्या करते हैं,लोभ और मोह में रहते हैं तो बुरे कर्म बंधते हैं। सुरेश सबलावत,भागचंद चुड़ीवाल के अनुसार आचार्य श्री ने आगे कहा कि सच्चे सुख प्राप्ति का मार्ग में भौतिक बाहरी वस्तुओं से मिलने वाला सुख हमेशा नहीं रहता। सच्चा सुख मन की शांति और आत्मा की पवित्रता में है। भगवान ने राग-द्वेष छोड़ा, अहंकार छोड़ा, और आत्मा को पूरी तरह शुद्ध किया। इसलिए उन्हें अनंत ज्ञान और शांति प्राप्त हुई। भगवान का समवसरण हमें आपसी प्रेम और सद्भाव का संदेश देता है। मन बहुत भटकता है। सच्ची साधना वही है जिसमें मन शांत और स्थिर रहे जो व्यक्ति सब कुछ जानने का घमंड करता है, वह सीख नहीं पाता।</p>
<p>विनम्र व्यक्ति ही आगे बढ़ता है साधु-संत कठिन परिस्थितियों में भी शांत रहते हैं। उनका जीवन त्याग, तप और आत्मसंयम का उदाहरण है।जब जीव राग-द्वेष छोड़ता है, अच्छे विचार रखता है,और आत्मा को शुद्ध करता है,तब वह मोक्ष की ओर बढ़ता है। प्रवचन का मुख्य संदेश यही हे कि सभी जीवों से प्रेम करो। क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या छोड़ो। मन को शांत और पवित्र बनाओ।धर्म को जीवन में उतारो। आत्मकल्याण ही जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य है।</p>
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		<title>णमोकार मंत्र धर्म से आत्मा को मोक्ष मार्ग की ओर ले जाता है : श्रद्धा को जागृत करने का भी माध्यम है णमोकार- आचार्य श्री वर्धमान सागर जी </title>
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		<pubDate>Sat, 23 May 2026 14:15:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने चंद्रपुरी बड़ के बालाजी की पाठशाला में दिया पूरा पाठ अत्यंत गूढ़ और सारभूत है। जिसमें ॐ, नमस्कार मंत्र, पंच परमेष्ठी और पंचरंगी ध्वज का अद्भुतआध्यात्मिक रहस्य समझाया है। जयपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230; जयपुर। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने चंद्रपुरी बड़ के बालाजी की पाठशाला में दिया [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने चंद्रपुरी बड़ के बालाजी की पाठशाला में दिया पूरा पाठ अत्यंत गूढ़ और सारभूत है। जिसमें ॐ, नमस्कार मंत्र, पंच परमेष्ठी और पंचरंगी ध्वज का अद्भुतआध्यात्मिक रहस्य समझाया है। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर।</strong> आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने चंद्रपुरी बड़ के बालाजी की पाठशाला में दिया पूरा पाठ अत्यंत गूढ़ और सारभूत है। जिसमें ॐ, नमस्कार मंत्र, पंच परमेष्ठी और पंचरंगी ध्वज का अद्भुतआध्यात्मिक रहस्य समझाया है।इसे सरल और व्यवस्थित रूप से ऐसे समझाया गया जैसे दूध का मंथन करने पर मक्खन निकलता है,मक्खन को तपाने पर घी प्राप्त होता है। वैसे ही द्वादशांग जिनवाणी का मंथन करने पर उसका सार नमस्कार मंत्र है और नमस्कार मंत्र का सार “ॐ” है। ॐ” की रचना कैसे हुई?पंच परमेष्ठी के प्रथम अक्षरों से “ॐ” बना है 1. अरिहंत परमेष्ठी “अ”. सिद्ध परमेष्ठी (अशरीरी) “अ”आचार्य परमेष्ठी “आ” ये तीनों स्वर मिलकर संस्कृत व्याकरण के अनुसार “आ” बनते हैं। उपाध्याय परमेष्ठी “ऊ”“आ” + “ऊ” = “ओ” साधु परमेष्ठी (मुनि) “म् इस प्रकार अ + अ + आ + ऊ + म् = ॐ पंच परमेष्ठी और पंच रंगपंच परमेष्ठियों के साथ पाँच रंगों का भी संबंध बताया गया। अरिहंत,नमो अरिहंताणं, श्वेत,सिद्ध नमो सिद्धाणं लाल आचार्य नमो आयरियाणं पीला उपाध्याय नमो उवज्झायाणं हरा साधु नमो लोएसव्वसाहूणं काला / नीला इसी आधार पर जैन पंचरंगी ध्वज बना।</p>
<p>अरिहंत का चिंतन चारों ओर श्वेत प्रकाश का भाव ,सिद्धों का चिंतन में लाल आभा का अनुभव, आचार्यों का चिंतन में पीत वर्ण का ध्यान ,उपाध्यायों का चिंतन मेंहरित रंग का भाव साधुओं के चिंतन में नीले/काले गंभीर रंग का चिंतन करें। यह केवल रंग नहीं, बल्कि आध्यात्मिक भाव-जागरण की साधना है। नमस्कार मंत्र समस्त निर्वाणियों का सार इस लोक और परलोक का सुधारक है। श्रद्धा और विश्वास से जपा जाए तो अद्भुत प्रभाव देता है।* इसमें सांसारिक कामना नहीं, बल्कि आत्म कल्याण का भाव है। मुख्य संदेश नमस्कार मंत्र कोई साधारण शब्द नहीं,यह पंच परमेष्ठियों का वाचक है। समस्त आगम और जिनवाणी का सार है। श्रद्धा, भाव और ध्यान से इसका प्रभाव प्रकट होता है। “नमोकार मंत्र आत्मा को निर्मल करने वाला,श्रद्धा को जागृत करने वालाऔर मोक्षमार्ग की ओर ले जाने वाला महामंत्र है।</p>
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		<title>भगवान का पंचामृत अभिषेक में भक्ति का अपार दृश्य : धर्म के संस्कार पूर्व जन्म के पुण्य से मिलते हैं- आचार्य श्री वर्धमान सागर जी </title>
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		<pubDate>Fri, 15 May 2026 10:58:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी चंद्रपुरी बड़ के बालाजी जयपुर में 36 साधुओं सहित विराजित हैं।44 वर्षीय समर कंठाली जैन इंदौर ने अपने जन्म दिन के उपलक्ष्य में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सानिध्य में 14 मई को श्री चन्द्रप्रभ भगवान की पूजन अष्ट द्रव्यों विभिन्न फलों, नैवेद्य,पुष्प सूखे मेवे भक्ति नृत्य पूर्वक की। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी चंद्रपुरी बड़ के बालाजी जयपुर में 36 साधुओं सहित विराजित हैं।44 वर्षीय समर कंठाली जैन इंदौर ने अपने जन्म दिन के उपलक्ष्य में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सानिध्य में 14 मई को श्री चन्द्रप्रभ भगवान की पूजन अष्ट द्रव्यों विभिन्न फलों, नैवेद्य,पुष्प सूखे मेवे भक्ति नृत्य पूर्वक की। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>जयपुर।</strong> आचार्य श्री वर्धमान सागर जी चंद्रपुरी बड़ के बालाजी जयपुर में 36 साधुओं सहित विराजित हैं। 21 वीं सदी की भौतिकवादी चकाचौंध में जहां करोड़पति, अरबपति अपना धन का वैभव शादी, सालगिरह, जन्मदिन विदेश में मनाते हैं किंतु, कुछ पुण्यशाली सक्षम ऐसे युवा भी होते हैं, जो अपने द्रव्य का उपयोग अपना जन्मदिन गुरु सानिध्य में भगवान की पूजन और पंचामृत धार्मिक अनुष्ठान आचार्य श्री वर्धमान सागर जी सान्निध्य में करते हैं। 44 वर्षीय समर कंठाली जैन इंदौर ने अपने जन्म दिन के उपलक्ष्य में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सानिध्य में 14 मई को श्री चन्द्रप्रभ भगवान की पूजन अष्ट द्रव्यों विभिन्न फलों, नैवेद्य,पुष्प सूखे मेवे भक्ति नृत्य पूर्वक की। 15 मई को आचार्य संघ सनिध्य में भगवान श्री चंद्रप्रभ का भव्य पंचामृत अभिषेक जल,नारियल पानी,शर्करा,विभिन्न फलों और सुखे मेवों के रसों, दूध , धी,दही, सर्वोषधि,विभिन्न पुष्प केशर,सुगंधित जल ,चार कलश एवं शांतिधारा की। यहां यह उल्लेखनीय है कि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी से दीक्षा लेकर आपके नाना जी मुनिश्री चारित्र सागर जी, ममेरी बहन आर्यिका श्री महायश मति एवं जन्मदायिनी माता आर्यिका श्री निर्मोह मति जी आचार्य श्री संघ में संयम साधना कर रही हैं। विगत 3 वर्षों में चातुर्मास में चौका लगाने के बाद वर्ष 2025 टोंक चातुर्मास के बाद से स्वयं निरंतर चौका परिजनों मामा, मामी, मौसाजी,मौसी, बहन,ओर परिजनों के सहयोग से चला रहे हैं।</p>
<p><strong>अंतरंग संस्कार पूर्व पुण्य से आते हैं</strong></p>
<p>सुरेश सबलावत ,भागचंद चुड़ीवाल के अनुसार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने उपदेश में बताया कि धर्म और संस्कार पूर्व जन्मों के पुण्य का परिणाम हैं। यदि आज जैन कुल मिला,धर्ममिला,गुरुदेव मिले,तो यह पूर्व जन्मों के पुण्य और सत्संग का परिणाम है।यही कारण है कि भीतर से भावना आती है मैं पाप न करूँ, पुण्य करूँ। संतान में भी संस्कार साथ आते हैं बालक जन्म से ही कुछ संस्कार लेकर आता है। यदि घर में धर्म और सत्संग का वातावरण हो तो बच्चों के मन में भी पाप से बचने और पुण्य करने की प्रेरणा रहती है। संगति का प्रभाव बाद में पड़ता है, लेकिन अंतरंग संस्कार पूर्व पुण्य से आते हैं। शुभ लक्ष्य से हर क्रिया पुण्यदायी बन जाती है।यदि मन में संकल्प हो “मुझे जिनेंद्र भगवान के दर्शन करने जाना है तो उसके बाद की सारी क्रियाएँ पुण्यदायी बन जाती हैं। स्नान करना,शुद्ध वस्त्र पहनना,मंदिर की ओर चलना, पूजा सामग्री लेना, मंदिर तक पहुँचना। क्यों?क्योंकि लक्ष्य भगवान का दर्शन है।मंदिर जाने की भावना से पुण्य की श्रृंखला शुरू हो जाती हैजैसे ही मन में भाव आया “मुझे भगवान के दर्शन करने जाना है”उसी क्षण से पुण्य आरंभ हो जाता है।और जैसे-जैसे व्यक्ति आगे बढ़ता है पुण्य और विशुद्धि बढ़ती जाती है।अंत में भगवान के दर्शन और परिक्रमा से अनंत पुण्य का बंध होता है।</p>
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		<title>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का 10 वर्षों के बाद भव्य मंगल प्रवेश : श्री दिगंबर चंद्रप्रभ मंदिर चंद्रपुरी बड़ के बालाजी ठिकरिया गांव में हुुई भव्य अगवानी  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 06 May 2026 10:41:14 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की अक्षुण्ण पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का 5 मई को 6.5 किमी विहार कर श्री दिगंबर चन्द्रप्रभ मंदिर चंद्रपुरी बड़ के बालाजी ग्राम ठिकरिया में हाथी धोड़े, सैकड़ों ध्वज पताका भक्ति नृत्य के साथ भव्य मंगल प्रवेश हुआ। जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की अक्षुण्ण पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का 5 मई को 6.5 किमी विहार कर श्री दिगंबर चन्द्रप्रभ मंदिर चंद्रपुरी बड़ के बालाजी ग्राम ठिकरिया में हाथी धोड़े, सैकड़ों ध्वज पताका भक्ति नृत्य के साथ भव्य मंगल प्रवेश हुआ। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>जयपुर।</strong> प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की अक्षुण्ण पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का 5 मई को 6.5 किमी विहार कर श्री दिगंबर चन्द्रप्रभ मंदिर चंद्रपुरी बड़ के बालाजी ग्राम ठिकरिया में हाथी धोड़े, सैकड़ों ध्वज पताका भक्ति नृत्य के साथ भव्य मंगल प्रवेश हुआ। भागचंद सुनीता चुड़ीवाल परिवार ने आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर मंगल आरती की। आचार्य श्री के साथ 10 मुनिराज, 20 आर्यिका, 1 ऐलक, 4 क्षुल्लक और 1 क्षुल्लिका सहित 37 पिच्छी का प्रवेश हुआ। सुनीता भागचंद चुड़ीवाल अनुसार इसके पूर्व 28 फरवरी 2016 को आचार्य श्री संघ का जयपुर महानगर के बड़ के बालाजी में प्रवेश हुआ था। आचार्य संघ श्री जी के दर्शन, पंचामृत अभिषेक के बाद मंचासीन हुए। श्री चंद्रप्रभ भगवान के चित्र अनावरण कर दीप प्रज्वलन ब्रह्मचारी गज्जू भैय्या एवं अतिथियों सुनीता, भागचंद चूड़ीवाल परिवार ने किया। नृत्य मंगलाचरण के बाद मुनि श्री हितेंद्रसागर जी के प्रवचन हुए। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने समाधिस्थ आर्यिका श्री सुपार्श्व मतिजी के जन्म स्थली सनावद में वर्ष 1964 चातुर्मास का उल्लेख कर यादें साझा की।</p>
<p><strong>आत्मा को कोई नहीं देखता </strong></p>
<p>आचार्यश्री वर्धमानसागर जी ने कहा कि देव शास्त्र और गुरु परम आराध्य हैं। इनकी भक्ति से कर्म नष्ट प्रक्षालन होता हैं। देव ,शास्त्र ,गुरु जैनधर्म के प्राण हैं और उनका जीवन, संसार के प्राणी के लिए मार्गदर्शक होता है। चाहे देव हो, चाहे शास्त्र हो या गुरु हो। उनके द्वारा प्राप्त मार्गदर्शन जो होता है। उस मार्गदर्शन से संसार का प्राणी अपने जीवन को संवारता है। जब आप घर से निकलते हैं तो दर्पण आपके सामने होता है। दर्पण के सामने आप खड़े होते हैं और उस दर्पण में अपने शरीर कमी को देखकर ठीक करते हो। आत्मा को कोई नहीं देखता कि आत्मा कर्मों से मलीन है। शरीर को देखते हैं कि अब हम घर से बाहर जा रहे हैं हमारा शरीर ठीक है या नहीं है।</p>
<p><strong>जब पाप कर्मों का उदय आता है, जब जीवन में बाधा कष्ट आते हैं</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने आगे बताया कि ममता कहंे या मोह कहें। इस मोह से ऊपर उठने के लिए भगवान जी के चरणों में जाया जाता है। अभिषेक पूजन भक्ति की जाती है। धार्मिक कार्यों से आत्मा पुण्य कमाती अर्जित करती है। उस पुण्य के फल से श्रेष्ठ मानव कुल प्राप्त होता है। श्रेष्ठ कुल में मार्गदर्शक गुरुजन जो है, वो मार्ग जैसा बताते हैं। वैसे कर्म करने से पाप कर्म पुण्यकर्म किए जाते हैं। जब पाप कर्मों का उदय आता है, जब जीवन में बाधा कष्ट आते हैं। आचार्य श्री ने कहा कि हमें याद आती गणिनी आर्यिका श्री सुपार्श्व मति जी, उन्होंने दीक्षा का संकल्प लिया था उसे पूरा किया।</p>
<p><strong>आर्यिका श्री सुपार्श्व मति जी को याद कर आचार्यों का भी किया स्मरण</strong></p>
<p>आचार्यश्री वर्धमानसागर जी ने कहा कि वचन का पालन करना साधु का परम कर्तव्य होता है। जिनके जीवन में धर्म का आलंबन होता है, वे ठीक-ठीक प्रकार से विचार कर दृढ़ संकल्प को पूर्ण करते हैं। अपनी गृहस्थ अवस्था और आर्यिका श्री सुपार्श्व मति जी के चातुर्मास का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि हम बहुत छोटे थे, उस वर्षायोग में माताजी के पास बैठकर के अध्ययन करने का एक अवसर मिला था। माताजी ने हमें सन 1965 में देखा था लेकिन, उनके मन में एक भाव था, क्या देखा था? क्या उनका ज्योतिष ज्ञान था? कुछ पता नहीं लेकिन, उन्होंने कहा कि इस व्यक्ति में कुछ दम योग्यता गुण तो है। चतुर्थ पट्टाधीश श्री अजित सागर जी महाराज ने आचार्य पद का निर्णय किया। उस निर्णय को मुहर लगाने का काम माताजी ने किया था। माताजी ने यही कहा था कि मैंने 1965 में उनको उनके घर में देखा था। मेरा ज्ञान कहता है कि यह आचार्य जरूर बनेंगे। आचार्य श्री धर्म सागर जी महाराज, आचार्य श्री अजीत सागर जी महाराज का मस्तक पर हाथ रखा हुआ आशीर्वाद साथ रहा। आचार्य श्री अजीत सागर जी महाराज भी अस्वस्थ थे और अस्वस्थता के कारण उन्होंने 4 लाइन का श्लोक लिखकर भेजा। आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज की समाधि के बाद हम सब लोग अजमेर में थे। 4 लाइन का 1 श्लोक लिखा हुआ, जिस की अंतिम पंक्ति थी। मैं प्रतीक्षा कर रहा हूं पर मिलाने वाला दुर्लभ है। संघ में साधुओं ने निर्णय लिया आज ही चलेंगे देखें दुर्लभता क्या करती है और उसी समय संघ ने विहार कर दिया और जाकर मिल गए।</p>
<p><strong>भक्ति में वो शक्ति है और शक्ति प्राप्त होती है</strong></p>
<p>आचार्यश्री ने कहा कि हमें अवसर मिला आचार्य श्री की सेवा करने का। बंधुओं देव शास्त्र, गुरु की, भक्ति करें, पूजन करें, आराधना करें, इससे पुण्य अर्जन करें। ये 3 द्रव्य तो ऐसे हैं कि जिनकी भक्ति कभी खाली नहीं जाती है। आवश्यकता इस बात की है कि वैसे हमारा मन बने यदि देव शास्त्र, गुरु की भक्ति करते हैं। सुनिश्चित बात है कि उसका फल अवश्य प्राप्त होता है क्योंकि, उनकी भक्ति में वो शक्ति है और शक्ति प्राप्त होती है। भक्ति करने वाले को वह अपने जीवन में सुकार्य शुभ कार्य करता है, पुण्य अर्जन करता है और पुण्य अर्जन करने के बाद उसे उसका प्रतिफल पूरे रूप में मिलता है। पीले पीले वस्त्र ड्रेस कोड हो गया। पुरुषों ने 1 ड्रेस कोड बना लिया। पीला कुर्ता और सफेद पाजामा। ड्रेस कोड का बड़ा महत्व होता है। भगवान का अभिषेक करने के लिए भी सुनिश्चित ड्रेस धोती दुपट्टा है। देव गुरु हमारे परम आराध्य है। सारे कर्मों का प्रक्षालन भी देव शास्त्र गुरु की परम भक्ति करके ही कर सकते हैं।</p>
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		<title>संयम धारण करने से ही जीवन का निर्माण होता है : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने जीवन निर्माण से लेकर निर्वाण के सूत्र बताए </title>
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		<pubDate>Tue, 28 Apr 2026 07:00:54 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 35 पिच्छी का निर्माण नगर पारस जिनालय से नेमिनाथ जिनालय नेमी सागर कॉलोनी में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230; जयपुर। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 35 पिच्छी का निर्माण नगर पारस जिनालय से नेमिनाथ जिनालय नेमी सागर कॉलोनी में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 35 पिच्छी का निर्माण नगर पारस जिनालय से नेमिनाथ जिनालय नेमी सागर कॉलोनी में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>जयपुर।</strong> आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 35 पिच्छी का निर्माण नगर पारस जिनालय से नेमिनाथ जिनालय नेमी सागर कॉलोनी में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। इस अवसर पर आयोजित धर्मसभा में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ, व्यसन और फैशन,संस्कार ,संस्कृति, संयम से जीवन का निर्माण से शाश्वत आध्यात्मिक सुख निर्वाण प्राप्त करने के महत्वपूर्ण सूत्र में प्रतिपादित किए। आचार्य श्री ने प्रवचन में बताया कि श्री नेमिनाथ कुमार को पशुओं की करुण पुकार सुनने से वैराग्य का निमित्त मिला और बगैर विवाह किए उन्होंने संयम धारण कर लिया। होने वाली पत्नी राजुल ने भी उसी मार्ग का अनुसरण कर संयम आर्यिका दीक्षा धारण की।</p>
<p><strong>तीर्थंकरों का चरित्र महान चरित्र</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने उपदेश में बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ अभियान में उच्च शिक्षा से व्यसन और फैशन से बालिकाओं की संस्कार हीनता पर चिंता प्रकट की। उन्होंने कहा कि श्री नेमिनाथ भगवान सहित सभी तीर्थंकरों का चरित्र महान चरित्र है, वैराग्य पद है, सभी को तीर्थंकरों का चरित्र पढ़ना चाहिए। वैराग्य से जीवन का निर्माण होता है तभी शाश्वत निर्वाण सुख की प्राप्ति होती है। पांच बाल ब्रह्मचारी तीर्थंकरों में श्री पारसनाथ, श्री नेमिनाथ भगवान बाल ब्रह्मचारी तीर्थंकर हुए हैं।अनेक तीर्थंकरों ने विवाह कर संसार बसाकर भी संयम धारण किया। संयम धारण करने से ही जीवन का निर्माण होता है।</p>
<p><strong>29 अप्रैल को जैनेश्वरी दीक्षा होगी</strong></p>
<p>जैन धर्म आध्यात्मिक धर्म है। श्री नेमिनाथ भगवान का संघ सानिध्य में 26 वर्षों पूर्व पंचकल्याणक हुआ। तब दो भव्य प्राणियों ने दीक्षा ली। भगवान का पूजन करना तभी सार्थक होगा जब भगवान के चरित्र से महत्वपूर्ण अनंत गुणों को देखें। संयम धारण करने से आध्यात्मिक सुख प्राप्त होता है, जो भौतिक सुख की तुलना में बड़ा और महान होता है। 28 अप्रैल को अन्य कॉलोनी में आचार्य संघ का प्रवेश होगा। 29 अप्रैल को मंगलम सिटी में 2 जैनेश्वरी दीक्षा आचार्य श्री के सिद्धहस्त कर कमलों से होगी।</p>
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