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	<title>Acharya Shri Vardhaman Sagar श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>लिया शुद्ध जल ग्रहण का नियम : संयम पथ की पहली सीढ़ी की ओर अग्रसर हुए इंजीनियर युवा </title>
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		<pubDate>Sun, 15 Mar 2026 12:06:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वात्सल्य वारिधि राष्ट्रसंत आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज सहित अठारह त्यागियों की जन्मस्थली सनावद के एक इंजीनियर युवा त्याग, वैराग्य और संयम की गौरवशाली परंपरा की ओर अग्रसर हुए हैं। पढ़िए सन्मति जैन काका की रिपोर्ट&#8230; सनावद। वात्सल्य वारिधि राष्ट्रसंत आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज सहित अठारह त्यागियों की जन्मस्थली सनावद के एक [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वात्सल्य वारिधि राष्ट्रसंत आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज सहित अठारह त्यागियों की जन्मस्थली सनावद के एक इंजीनियर युवा त्याग, वैराग्य और संयम की गौरवशाली परंपरा की ओर अग्रसर हुए हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सन्मति जैन काका की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सनावद।</strong> वात्सल्य वारिधि राष्ट्रसंत आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज सहित अठारह त्यागियों की जन्मस्थली सनावद के एक इंजीनियर युवा त्याग, वैराग्य और संयम की गौरवशाली परंपरा की ओर अग्रसर हुए हैं। त्याग और वैराग्य की परंपरा के लिए प्रसिद्ध नगरी सनावद में इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए 33 वर्षीय नवयुवक इंजीनियर शानिल, सुपुत्र संगीता एवं श्रीमंदर जैन (बडूद परिवार), सनावद ने संयम पथ की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है।</p>
<p>शानिल अपने परिवार के साथ राजस्थान के शिवदासपुरा पहुँचे, जहाँ उन्होंने नगर गौरव आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के समक्ष श्रीफल समर्पित कर यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण किया तथा आजीवन शुद्ध जल ग्रहण करने का नियम लिया। इस अवसर पर उन्होंने आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज को आहार भी प्रदान किया।</p>
<p>बताया गया कि शानिल ने यह नियम लेकर बीसवीं सदी के महान आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज की कठिन संयम परंपरा का पालन करने वाले आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के सान्निध्य में संयम मार्ग की ओर पहला कदम बढ़ाया है।</p>
<p>इस अवसर पर उपस्थित समाजजनों ने शानिल के इन त्याग और संयम भावों की अनुमोदना करते हुए उनके उज्ज्वल आध्यात्मिक भविष्य की मंगलकामनाएँ कीं।</p>
<p><strong>शानिल का परिचय</strong></p>
<p>जन्म : 12 जून 1992</p>
<p>नौकरी : एमडॉक्स कंपनी, पुणे में मैनेजर</p>
<p>शिक्षा : एम.टेक</p>
<p>परिवार में बचपन से ही धार्मिक संस्कार दिए गए हैं। उनके घर में अनेक वर्षों से स्वयं का भगवान का चैत्यालय स्थापित है। साथ ही उनके परिवार को पूर्व में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के मंगल विहार कराने का भी सौभाग्य प्राप्त हो चुका है।</p>
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		<title>लिया शुद्ध जल ग्रहण का नियम : संयम पथ की पहली सीढ़ी की ओर अग्रसर हुए इंजीनियर युवा </title>
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		<pubDate>Sun, 15 Mar 2026 11:51:29 +0000</pubDate>
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<p><strong>वात्सल्य वारिधि राष्ट्रसंत आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज सहित अठारह त्यागियों की जन्मस्थली सनावद के एक इंजीनियर युवा त्याग, वैराग्य और संयम की गौरवशाली परंपरा की ओर अग्रसर हुए हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सन्मति जैन काका की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सनावद।</strong> वात्सल्य वारिधि राष्ट्रसंत आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज सहित अठारह त्यागियों की जन्मस्थली सनावद के एक इंजीनियर युवा त्याग, वैराग्य और संयम की गौरवशाली परंपरा की ओर अग्रसर हुए हैं। त्याग और वैराग्य की परंपरा के लिए प्रसिद्ध नगरी सनावद में इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए 33 वर्षीय नवयुवक इंजीनियर शानिल, सुपुत्र संगीता एवं श्रीमंदर जैन (बडूद परिवार), सनावद ने संयम पथ की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है।</p>
<p>शानिल अपने परिवार के साथ राजस्थान के शिवदासपुरा पहुँचे, जहाँ उन्होंने नगर गौरव आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के समक्ष श्रीफल समर्पित कर यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण किया तथा आजीवन शुद्ध जल ग्रहण करने का नियम लिया। इस अवसर पर उन्होंने आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज को आहार भी प्रदान किया।</p>
<p>बताया गया कि शानिल ने यह नियम लेकर बीसवीं सदी के महान आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज की कठिन संयम परंपरा का पालन करने वाले आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के सान्निध्य में संयम मार्ग की ओर पहला कदम बढ़ाया है।</p>
<p>इस अवसर पर उपस्थित समाजजनों ने शानिल के इन त्याग और संयम भावों की अनुमोदना करते हुए उनके उज्ज्वल आध्यात्मिक भविष्य की मंगलकामनाएँ कीं।</p>
<p><strong>शानिल का परिचय</strong></p>
<p>जन्म : 12 जून 1992</p>
<p>नौकरी : एमडॉक्स कंपनी, पुणे में मैनेजर</p>
<p>शिक्षा : एम.टेक</p>
<p>परिवार में बचपन से ही धार्मिक संस्कार दिए गए हैं। उनके घर में अनेक वर्षों से स्वयं का भगवान का चैत्यालय स्थापित है। साथ ही उनके परिवार को पूर्व में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के मंगल विहार कराने का भी सौभाग्य प्राप्त हो चुका है।</p>
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		<title>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज का चल रहा है चातुर्मास : टोंक जैन नसिया में बनेगा &#8220;आचार्य शांति सागर ध्यान केंद्र&#8221; </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/the_acharya_shanti_sagar_meditation_center_will_be_built_in_tonk_jain_nasia/</link>
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		<pubDate>Sun, 14 Sep 2025 09:10:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के चातुर्मास के दौरान नगर में धर्म की वर्षा निरंतर हो रही है। समाजजन इस अवसर का पूर्ण लाभ उठाते हुए प्रतिदिन विविध धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन कर रहे हैं, ताकि चातुर्मास की यह स्मृति चिरस्थायी बनी रहे। इसी क्रम में जैन नसिया परिसर में 20वीं सदी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के चातुर्मास के दौरान नगर में धर्म की वर्षा निरंतर हो रही है। समाजजन इस अवसर का पूर्ण लाभ उठाते हुए प्रतिदिन विविध धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन कर रहे हैं, ताकि चातुर्मास की यह स्मृति चिरस्थायी बनी रहे। इसी क्रम में जैन नसिया परिसर में 20वीं सदी के प्रथमाचार्य आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज की दिव्य प्रतिमा के साथ एक भव्य ध्यान केंद्र का निर्माण किया जाएगा। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजेश पंचोलिया की विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>टोंक।</strong> आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के चातुर्मास के दौरान नगर में धर्म की वर्षा निरंतर हो रही है। समाजजन इस अवसर का पूर्ण लाभ उठाते हुए प्रतिदिन विविध धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन कर रहे हैं, ताकि चातुर्मास की यह स्मृति चिरस्थायी बनी रहे। इसी क्रम में जैन नसिया परिसर में 20वीं सदी के प्रथमाचार्य आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज की दिव्य प्रतिमा के साथ एक भव्य ध्यान केंद्र का निर्माण किया जाएगा। इस केंद्र का नाम आचार्य शांति सागर ध्यान केंद्र रखा गया है।</p>
<p>शिलान्यास अवसर पर वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ससंघ की पावन उपस्थिति में मंगल मंत्रोच्चार हुआ। आचार्य श्री ने शिलाओं पर केसर से मंगल मंत्र लिखकर शिलान्यास को विधिवत संपन्न कराया। इस पुण्य कार्य का सौभाग्य पुण्यार्जक कलई परिवार—स्व. कजोड़मल जी की धर्मपत्नी कमला देवी एवं सुपुत्र कमलेश कुमार, मेना देवी, बेनी प्रसाद, लक्ष्मी जैन (पूर्व सभापति नगर परिषद टोंक), पवन कुमार, इंद्रादेवी, शेखर कुमार, सुशीला देवी, सम्मेद कुमार, राहुल कुमार, विनायक, अविनाश, पीयूष एवं नमन—ने प्राप्त किया।</p>
<p>समारोह में पवन एवं विकास के अनुसार, श्री आदिनाथ जिनालय नसिया समाज के मंत्री महावीर प्रसाद जैन (देवली वाले), संयुक्त मंत्री टोनी जैन (आंडरा), चातुर्मास कमेटी अध्यक्ष धर्मचंद जैन (दाखिया वाले), राजेश जैन (हाड़ी गांव), पप्पू जैन (नमक वाले), चातुर्मास कमेटी अध्यक्ष भागचंद जैन (फुलेता वाले), राजू सराफ नेमी जी जैन (सिरस वाले) सहित समाज के अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे।</p>
<p>प्रस्तावित ध्यान केंद्र अत्यंत सुसज्जित एवं भव्य स्वरूप का होगा। यहां साधना और ध्यान के साथ आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज की स्मृतियाँ सजीव रहेंगी। यह केंद्र न केवल जैन समाज बल्कि संपूर्ण समाज के लिए आध्यात्मिकता, ज्ञान और साधना का प्रेरणास्रोत बनेगा।</p>
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		<title>श्रुत पंचमी का आध्यात्मिक-धार्मिक महत्व : जिनवाणी माता पहली बार शास्त्र के रूप में हुईं अंकित </title>
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		<pubDate>Sat, 08 Jun 2024 09:27:11 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[देव शास्त्र और गुरु हमारे आराध्य हैं। ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी जैन धर्म की पवित्र तिथि है। जिस दिन जिनवाणी माता पहली बार शास्त्र के रूप में अंकित हुईं, इसी कारण से श्रुत पंचमी कहा जाता है। इस दिन जिनवाणी माता का जुलूस निकाल कर विशेष पूजा की जाती है। पढ़िए आर्यिका श्री महायश मति, संघस्थ [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>देव शास्त्र और गुरु हमारे आराध्य हैं। ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी जैन धर्म की पवित्र तिथि है। जिस दिन जिनवाणी माता पहली बार शास्त्र के रूप में अंकित हुईं, इसी कारण से श्रुत पंचमी कहा जाता है। इस दिन जिनवाणी माता का जुलूस निकाल कर विशेष पूजा की जाती है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए आर्यिका श्री महायश मति, संघस्थ आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का यह विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>देव, शास्त्र, गुरु हमारे आराध्य हैं। भगवान श्री आदिनाथ से लेकर भगवान श्री महावीर स्वामी तक सभी तीर्थंकरों ने केवल ज्ञान को प्राप्त कर समवशरण में दिव्य देशना दी, जिसे गणधर स्वामी के माध्यम से धर्म देशना जिनवाणी सभी तक पहुंचती थी। यह परंपरा से गणधर स्वामी से लेकर अंतिम केवली जंबू स्वामी से होते हुए अनेक आचार्यों से जिनवाणी का प्रसार हुआ। दिगंबर आचार्य धरसेन जी ने यह महसूस किया कि जिनवाणी को लिपिबद्ध होना जरूरी है ताकि आने वाले समय में सभी समाज इसको पढ़कर धर्म लाभ ले सकें। गुजरात गिरनार जी पर्वत पहली टोंक के पीछे सहस्त्रावन की गुफा में उन्होंने उसके लिए अपने सुयोग्य शिष्यों की परीक्षा लेकर चयन किया। दो शिष्य मुनि श्री पुष्पदंत सागर जी और मुनि श्री भूतबली सागर जी का उन्होंने चयन किया। उन्हें एक-एक मंत्र जाप करने को दिया दोनों मुनियों श्री पुष्पदंत सागर और श्री भूतबली सागर ने उन मंत्रों का जब जाप किया तो एक शिष्य के सामने देवी प्रकट हुईं जिसनके दांत बाहर थे, दूसरे शिष्य के सामने देवी प्रकट हुईं जिनकी एक आंख नहीं थी। दोनों मुनि समझ गए कि मंत्र कुछ अशुद्ध हैं। उन्होंने ध्यान से उसे मंत्र को पढ़कर उनमें मात्रा संबंधी जो अशुद्धता थी उसे ठीक की और उन मंत्रों का पुनः जाप किया। जाप पूर्ण होने पर दोनों के समक्ष सुंदर देवियां प्रकट हुईं। दोनों मुनिराज श्री पुष्पदंत सागर जी और मुनि श्री भूतबलीसागर जी आचार्य श्री के पास पहुंचे। उन्हें पूरी घटना बताई। तब आचार्य श्री ने बताया कि मैंने आपकी परीक्षा लेने के लिए मंत्रों में मात्रा कम या ज्यादा की थी, जिसे आपने अपनी बुद्धिमत्ता से ठीक कर मंत्र को सिद्ध किया है। दोनों शिष्यों ने षट्खंडागम शास्त्र रचना की, जिस दिन शास्त्र पूर्ण हुआ, वह दिन ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी का दिन था। उसी कारण समस्त आचार्यों की प्रेरणा से जैन समाज इस पावन पवित्र दिन को श्रुत पंचमी के रूप में नगर में जिनवाणी की शोभा यात्रा निकाल कर उसकी पूजन करते हैं।</p>
<p><strong>प्रभु का चमत्कार</strong></p>
<p>देव शास्त्र और गुरु हमारे आराध्य हैं। ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी जैन धर्म की पवित्र तिथि है। जिस दिन जिनवाणी माता पहली बार शास्त्र के रूप में अंकित हुईं, इसी कारण से श्रुत पंचमी कहा जाता है। इस दिन जिनवाणी माता का जुलूस निकाल कर विशेष पूजा की जाती है। ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी जो 11 जून 2024 को है, वात्सल्य वारिधी पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज द्वारा 24 फरवरी फागुन शुक्ल 8 सन् 1969 मुनि दीक्षा लेने के मात्र तीन माह के भीतर नेत्र ज्योति ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी 19 मई 1969 को अपने आप चली गई थी। उस दिन शारीरिक नेत्र ज्योति चली गई किंतु उसी दिन श्रुत पंचमी पर आत्मा प्रकाशवान हो गई। इस तिथि पर नेत्र ज्योति जाने के बाद जो प्रभु का चमत्कार हुआ जो शांतिभक्ति स्रोत भगवान के आशीर्वाद 47 साधुओं की शुभ भावना से असंभव कार्य संभव हुआ। जैन धर्म का महत्व विश्व के पटल पर सामने आया और यह तिथि इतिहास में अंकित हो गई है। प्रसंग है ज्येष्ठ माह की पंचमी 19 मई 1969 को जब नवदीक्षित 19 वर्षीय युवा मुनि श्री वर्धमान सागर जी महाराज, आचार्य श्री धर्म सागर जी महाराज और 46 साधुओं के साथ जयपुर खनिया जी में विराजित रहे। इसके पूर्व मुनि श्री वर्धमान सागर जी महाराज की मुनि दीक्षा आचार्य श्री धर्म सागर जी के सिद्ध हस्त कर कमलों से 24 फरवरी 1969 को श्री महावीर जी में हुई। ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी को अनायास मुनि श्री वर्धमान सागर जी महाराज की नेत्र ज्योति चली जाती है, शाम के समय डॉक्टरों द्वारा नेत्र परीक्षण किया जाता है। डॉक्टर ने कहा कि अगले दिन नेत्र परीक्षण करेंगे। अगले दिन को प्रातः डॉक्टर द्वारा मुनि श्री के नेत्रों का परीक्षण किया जाता है। डॉक्टर अनुसार अगर अगले 24 घंटे में डॉक्टरी इंजेक्शन और इलाज नहीं किया जाता है तो नेत्र ज्योति हमेशा के लिए चली जाएगी, संघ में विचार विमर्श होता है। अनेक प्रकार की चर्चा चलती है, नव दीक्षित युवा मुनि श्री वर्धमान सागर जी महाराज सोचते हैं मेरे पाप कर्मों का उदय है, मुझे समता भाव से सहन करना होगा। चेहरे पर दर्द वेदना के स्थान पर निर्मोहता और समता झलक रही थी ।</p>
<p><strong>19 वर्षीय मुनि श्री का चिंतन &#8211; उपसर्गों की लंबी श्रृंखला</strong></p>
<p>मुनि श्री वर्धमान सागर जी चिंतन करते हैं कि मैं कायर, पलायनवादी नहीं हूं। अनेक मुनिराजों ने परिषह सहन किए हैं। महामुनि सुकुमाल शिवभूति मुनिराज, पांडव मुनिराज, मुनि गजकुमार, मुनिराज जंबू स्वामी भट्ट अकलंक सहित अनेक मुनियों ने उपसर्ग सहन किए हैं। भगवान पारसनाथ जिन पर अनेक भवों में उपसर्ग हुआ। उन्होंने भी उपसर्ग सहन कर केवल ज्ञान प्राप्त किया। आचार्य श्री शांति सागर जी की परंपरा का मैं मुनि हूं, जिन्होंने दीक्षा काल में सर्प का, सिंह का, चींटी मकोड़े ,अनेक मानवीय उपसर्ग भी सहन किया।अगले दिन कोई सुधार नहीं होता है संघ में चर्चा होती है। युवा है, दीक्षा छेदन करे। इलाज करा कर पुनः दीक्षा दे सकते हैं। मुनि श्री वर्धमान सागर जी महाराज के समक्ष चर्चा आने पर सहजता और दृढ़ विश्वास से कहते हैं कि मैं डॉक्टर से इंजेक्शन और अंग्रेजी दवाई नहीं लूंगा, भले ही मुझको संल्लेखना लेनी पड़े। इस घटनाक्रम में नेत्र ज्योति जाने को 49 घंटे हो चुके थे। मुनि श्री वर्धमान सागर जी महाराज, मुनि श्री श्रुत सागर जी, आर्यिका ज्ञानमती माताजी और अन्य साधुओं के माध्यम से आचार्य श्री तक निवेदन करते कि मुझे श्री चंद्र प्रभु भगवान की वेदी पर भक्ति करनी है। तेज धूप होने के बावजूद मुनि श्री और अन्य साधुओं की इच्छा पर शांतिभक्ति का पाठ मुनि श्री वर्धमान सागर जी प्रारंभ करते हैं। उनके साथ अनेक साधु, माताजी भी शांति भक्ति का पाठ करते हैं। लगातार 3 घंटे शांति भक्ति का पाठ चलता है।</p>
<p><strong>6 रसों का त्याग</strong></p>
<p>साधु वात्सल्य और प्रेम ,अनुराग का अनुपम उदाहरण अंतर्गत मुनि श्री अभिनंदन सागर जी भगवान के समक्ष नेत्र ज्योति वापस आने तक सभी 6 रसों का त्याग करते हैं। आचार्य कल्प श्री श्रुत सागर जी कहते हैं कि भगवान इस अल्पायु में महान दीक्षा और इतना बड़ा उपसर्ग, आर्यिका श्री ज्ञानमती जी कहती हैं कि भगवान आप बड़े हो या डाक्टर, मुनि श्री संभव सागर जी बीमार होने के बाद भी जाप करते हैं। भगवान का चमत्कार होता है और लगातार 3 घंटे शांति भक्ति का पाठ होने के बाद 52 घंटे पूर्व गई नेत्र ज्योति पूर्ववत प्राप्त हो जाती है। उसे समय सभी साधुओं में उपस्थित हजारों समाज जनों में हर्ष व्याप्त हो जाता है। प्रभु की जय- जय कार होती है। नगर में उत्सव का माहौल हो जाता है। आर्यिका श्री ज्ञानमती जी कहती हैं कि मैने अपने जीवन में ऐसी प्रभु भक्ति कभी देखी नहीं है।</p>
<p><strong> 47 साधुओं का सानिध्य</strong></p>
<p>लगातार 24 घंटे शांति भक्ति का पाठ निरंतर चलता है। जिस समय जयपुर में यह घटना हुई, तब आचार्य धर्म सागर जी, आचार्य कल्प श्री श्रुत सागर जी, मुनि श्री अजीत सागर जी ,मुनि दयासागर जी, मुनि श्री श्रेयांस सागर जी, मुनि श्री संभव सागर जी, मुनि श्री सुबुद्धि सागर जी, मुनि श्री अभिनंदन सागर जी सहित 17 मुनिराज तथा आर्यिका श्री वीरमति जी, आर्यिका श्री आदिमती जी, आर्यिका ज्ञानमती जी, आर्यिका श्री शुद्धमतीजी सहित 25 आर्यिका माताजी तथा चार क्षुल्लक और एक क्षुल्लिका माताजी सहित 47 साधु लगातार भक्ति करते रहे।</p>
<p><strong>वर्तमान प्रत्यक्षदर्शी</strong></p>
<p>वर्तमान में स्वयं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी, महाराज गणनी प्रमुख 90 वर्षीय आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी, आर्यिका श्री शीतल मति सहित अन्य साधु और पीठाधीश श्री रविंद्र कीर्ति जी वर्तमान में इस घटना के साक्षी हैं। इनके सहित जयपुर के सैकड़ों व्यक्ति आज भी विद्यमान है जिन्होंने इस घटना को अपनी आंखों से देखा है, इस चमत्कार को देखा है।</p>
<p><strong>शांति भक्ति की रचना</strong></p>
<p>हजारों वर्ष पूर्व पूज्यपाद स्वामी मुनिराज को आकाश गामिनी विद्या हासिल थी, वह आकाश में गमन कर रहे थे, सूर्य की तेज प्रचंड रोशनी से उनके नेत्र ज्योति चली जाती है। तब वह भगवान के समक्ष शांति भक्ति की रचना करते हैं। शांति भक्ति की रचना करने से उनकी नेत्र ज्योति वापस आ जाती है। अगर यह घटना उस समय नहीं होती तो किसी को हमारे प्राचीन आगम प्रणीत ग्रंथों में धार्मिक स्रोत पर विश्वास नहीं होता। आज श्री भक्तामर स्तोत्र की कहानी सभी लोग जानते हैं कि राजा भोज ने जैनाचार्य श्री मानतुंग स्वामी को जेल की 48 कोठरी में बंद कर दिया था। तब श्री मानतुंग आचार्य ने भक्तामर स्त्रोत की रचना की, एक-एक श्लोक पूरा होता गया और एक-एक ताले टूटे गए। 48 काव्य की रचना के बाद सभी ताले टूट गए। जैन धर्म के महत्व को सभी को समझना चाहिए कि आज भी इसमें श्रद्धा और भक्ति से पाठ किया जाए तो उसका लाभ निश्चित मिलता है। जो भी भक्त पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के दर्शन करता है, देवता प्रदत्त उस नेत्र ज्योति से जो वात्सल्य मिलता है, आशीर्वाद मिलता है, उस अनुभूति को भक्त जिंदगी भर नहीं भूल पाते हैं।</p>
<p><strong>संकलन</strong></p>
<p><strong>राजेश पंचोलिया इंदौर</strong></p>
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		<title>आचार्य श्री वर्धमान सागर से ग्रहण की है दीक्षा : विजयदशमी को दीक्षा लेकर कर रहे हैं धर्म की राह रोशन </title>
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		<pubDate>Wed, 25 Oct 2023 12:19:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सारांश देश के विभिन्न राज्यों के नगरों में जन्मे पुण्यशाली भव्य जीव जो धर्मात्मा बनकर परमात्मा बनने की राह पर अग्रसर है, जिन्हें परम उपकारी वात्सल्य वारिधि शताधिक दीक्षा प्रदाता आचार्य शिरोमणि पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने विजयदशमी को कंकर से शंकर बनने की राह प्रशस्त कर अपने सिद्ध हस्त कर कमलों [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>सारांश<br />
देश के विभिन्न राज्यों के नगरों में जन्मे पुण्यशाली भव्य जीव जो धर्मात्मा बनकर परमात्मा बनने की राह पर अग्रसर है, जिन्हें परम उपकारी वात्सल्य वारिधि शताधिक दीक्षा प्रदाता आचार्य शिरोमणि पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने विजयदशमी को कंकर से शंकर बनने की राह प्रशस्त कर अपने सिद्ध हस्त कर कमलों से जैनेश्वरी दीक्षा प्रदान की है। पढ़िए राजेश पंचोलिया की विशेष रिपोर्ट&#8230;</p>
<p>उदयपुर। विजयादशमी भी अक्षय तृतीया जैसी पवित्र तिथि है, जिस पर अनेक जैनेश्वरी दीक्षाएं होती हैं। जैन धर्म की दृष्टि से यह विषय कषाय रूपी बुराइयों पर असीम पुण्योदय रूपी अच्छाइयों का प्रतीक है। इस पुनीत अवसर पर अनेक भव्य आत्माओं ने दृढ़ इच्छा शक्ति से पुरुषार्थ कर दिगंबर जैनेश्वरी दीक्षा धरण की है। देश के विभिन्न राज्यों के नगरों में जन्मे पुण्यशाली भव्य जीव जो धर्मात्मा बनकर परमात्मा बनने की राह पर अग्रसर है, जिन्हें परम उपकारी वात्सल्य वारिधि शताधिक दीक्षा प्रदाता आचार्य शिरोमणि पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने कंकर से शंकर बनने की राह प्रशस्त कर अपने सिद्ध हस्त कर कमलों से जैनेश्वरी दीक्षा प्रदान की है।<br />
जानते हैं इस अवसर पर किन-किन ने ली जैनेश्वरी दीक्षा<br />
-जयपुर के महेंद्र ने मुनि श्री हितेंद्र सागर जी के रूप में 9 अक्टूबर, 2008 को दीक्षा ली।<br />
&#8211; सनावद में जन्मीं अर्चना दीदी ने 9 अक्टूबर, 2008 को शाश्वत सिद्ध क्षेत्र श्री सम्मेद शिखर जी में आर्यिका श्री क्षीर मति बनकर श्री सम्मेद शिखर जी से ही 6 नवंबर, 2008 को समाधि मरण कर मानव जीवन को सार्थक किया।<br />
&#8211; कर्नाटक के ब्रह्मचारी श्री महावीर ने भगवान श्री महावीर की राह पर चलने के लिए सम नाम आचार्य श्री वर्धमान सागर जी से 28 सितंबर, 2009 में मुनि दीक्षा ली।<br />
-उदयपुर नगर से 10 से अधिक भव्य जीवों को आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने दीक्षाएं प्रदान की हैं। इनमें अनूठा संयोग है कि उदयपुर के प्रशंम सागर जी का, उदयपुर में 12 वर्ष के एक युग के बाद प्रथम बार उदयपुर में दीक्षा दिवस मनाने का अवसर मिल रहा है।आपकी दीक्षा 6 अक्टूबर, 2011 को हुई।<br />
&#8211; कर्नाटक के जयपाल दीक्षा ग्रहण करके मुनि श्री अतिशय सागर 6 अक्टूबर, 2011 को बने।<br />
&#8211; किशनगढ़ गौरव ने जीवन में अध्यात्म का शिखर चढ़ाकर क्षपक मुनि श्री भविक सागर जी बन 6 अक्टूबर, 2011 को दीक्षा ग्रहण की थी। सिद्ध क्षेत्र नैनागिर से 10 अप्रैल, 2013 को समाधि मरण प्राप्त किया है।<br />
&#8211; संसार की नश्वरता को समझते हुए साधना के जिस मार्ग पर गृहस्थ अवस्था के पिता मुनि श्री चारित्र सागर जी ने 13 प्रकार के चारित्र को धारण किया, इस मार्ग पर परिवार से मोह छोड़कर भतीजी आर्यिका श्री महायश मति दीक्षा गुरु की दीक्षा स्थली पर आचार्य श्री से 5 अक्टूबर 22 को दीक्षा लेकर आर्यिका श्री निर्मोहमति एक वर्ष पूर्व बनी।<br />
&#8211; दिल्ली की बाल ब्रह्मचारी नेहा पर आचार्य श्री ने स्नेह, वात्सल्य के नेह की वर्षा की और विश्व में यश फैलाने के लिए आर्यिका श्री विश्वयशमति 5 अक्टूबर, 22 को बनाया।<br />
-दीक्षा गुरु की जन्मस्थली सनावद की 17वीं दीक्षार्थी बाल ब्रह्मचारिणी मात्र 26 वर्ष की उम्र में आर्यिका श्री पदमयश मति के रूप में 5 अक्टूबर, 2022 को दीक्षित हुईं।<br />
&#8211; कोटा निवासी बाल ब्रह्मचारिणी ने परिवर्तित नाम को सार्थक कर जीवन की निशा को पूनम में परिवर्तित कर दिव्यता प्राप्त की और 5 अक्टूबर 2022 को आर्यिका श्री दिव्ययश मति बनीं।</p>
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