<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>Acharya Shri Shanti Sagar Ji &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
	<atom:link href="https://www.shreephaljainnews.com/tag/acharya-shri-shanti-sagar-ji/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://www.shreephaljainnews.com</link>
	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
	<lastBuildDate>Fri, 19 Dec 2025 15:39:19 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=7.0.2</generator>

<image>
	<url>https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/09/cropped-shri-32x32.png</url>
	<title>Acharya Shri Shanti Sagar Ji &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
	<link>https://www.shreephaljainnews.com</link>
	<width>32</width>
	<height>32</height>
</image> 
	<item>
		<title>आचार्य संघ सान्निध्य में होगा 22 दिसंबर से सिद्धचक्र महामंडल विधान: आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने विधान का महत्व बताया  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/siddhchakra_mahamandal_vidhan_will_be_held_from_december_22_in_the_presence_of_acharya_sangh/</link>
					<comments>https://www.shreephaljainnews.com/siddhchakra_mahamandal_vidhan_will_be_held_from_december_22_in_the_presence_of_acharya_sangh/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 19 Dec 2025 15:39:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Shanti Sagar Ji]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Vardhman Sagar JI]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya's order]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Jain]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Sadhu]]></category>
		<category><![CDATA[jain community]]></category>
		<category><![CDATA[Jain muni]]></category>
		<category><![CDATA[jain news]]></category>
		<category><![CDATA[jain sadhvi]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Society]]></category>
		<category><![CDATA[mangal kalash]]></category>
		<category><![CDATA[Niwai]]></category>
		<category><![CDATA[Rath Yatra]]></category>
		<category><![CDATA[Shriphal Jain News]]></category>
		<category><![CDATA[Siddhchakra Mahamandal Vidhan]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य आज्ञा]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री शांति सागर जी]]></category>
		<category><![CDATA[जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन मुनि]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समुदाय]]></category>
		<category><![CDATA[जैन साध्वी]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर जैन]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर साधु]]></category>
		<category><![CDATA[निवाई]]></category>
		<category><![CDATA[मंगल कलश]]></category>
		<category><![CDATA[रथ यात्रा]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[सिद्धचक्र महामंडल विधान]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=96719</guid>

					<description><![CDATA[आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज की मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी टोंक जिले के निवाई में संघ सहित विराजित है। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के मंगल सान्निध्य में चवरिया परिवार की ओर से 22 से 30 दिसंबर तक सिद्धचक्र महामंडल विधान एवं विश्व शांति महायज्ञ [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज की मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी टोंक जिले के निवाई में संघ सहित विराजित है। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के मंगल सान्निध्य में चवरिया परिवार की ओर से 22 से 30 दिसंबर तक सिद्धचक्र महामंडल विधान एवं विश्व शांति महायज्ञ होगा। <span style="color: #ff0000">निवाई से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>निवाई।</strong> आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज की मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी टोंक जिले के निवाई में संघ सहित विराजित है। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के मंगल सान्निध्य में चवरिया परिवार की ओर से 22 से 30 दिसंबर तक सिद्धचक्र महामंडल विधान एवं विश्व शांति महायज्ञ होगा। बहुत पुण्य और सौभाग्य से सिद्धचक्र महा मंडल की पूजन करने, पूजन देखने ओर पूजन में चढ़ाए जाने वाले अर्ध्य में सिद्ध प्रभु का गुणानुवाद सुनने का अवसर मिलता है। विधान में पूजन में भावों और परिणामों की निर्मलता जरूरी है। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने संत भवन में सिद्ध चक्र मंडल विधान के पुण्यार्जक परिवार को आशीर्वाद देकर प्रकट की। आचार्य श्री ने प्रतिदिन सिद्धचक्र विधान में समर्पित किए जाने वाले अर्घ्य के समय भगवान के गुणों का विस्तार से वर्णन कर बताया कि सिद्ध चक्र विधान की पूजा में मुख्य रूप से 2040 अर्घ्य चढ़ाए जाते हैं। सिद्ध चक्र विधान की पहली पूजा में मुख्य 8, दूसरी पूजा में 16, तीसरी पूजा में 32, चौथी में 64, पांचवीं में 128 और छठी पूजा में 256 अर्घ्य चढ़ाए जाते हैं।</p>
<p>आगे सातवीं पूजा में 512 आठवीं पूजन में 1024 अर्ध्य चढ़ाए जाएंगे। महिपाल एवं मोहित चवरिया ने बताया कि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी सहित 33 साधुओं के सान्निध्य में सिद्ध चक्र मंडल विधान का शुभारंभ 22 दिसंबर जिनेंद्र, आचार्य आज्ञा, मंगल कलश और रथ यात्रा के साथ होगा। रथयात्रा बड़ा मंदिर से प्रारंभ होगी। इसका समापन संत निवास पार्श्वनाथ उद्यान में होगा। आचार्य श्री वर्धमानसागर जी संघ सान्निध्य में सन्मति, कमलेश देवी, सुकुमाल, नीलम, शालू एवं परिवार ध्वजारोहण करेंगे। विमल जोला विधानाचार्य के निर्देशन में मंडप स्थल शुद्धि, इंद्र प्रतिष्ठा, सकलीकरण अंकुरारोपण होगा। सभी समाज जनों को विधान में सम्मिलित होकर धर्म लाभ लेने का सादर अनुरोध किया गया।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.shreephaljainnews.com/siddhchakra_mahamandal_vidhan_will_be_held_from_december_22_in_the_presence_of_acharya_sangh/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>जिस मंदिर क्षेत्र में चमत्कार होता है वह मंदिर अतिशय क्षेत्र होता है : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्राचीन मंदिर के रहस्यों से पर्दा उठाया  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/the_temple_area_where_miracles_happen_is_called_an_atishay_kshetra/</link>
					<comments>https://www.shreephaljainnews.com/the_temple_area_where_miracles_happen_is_called_an_atishay_kshetra/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 02 Dec 2025 13:55:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Shanti Sagar Ji]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Vardhman Sagar JI]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Jain]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Sadhu]]></category>
		<category><![CDATA[jain community]]></category>
		<category><![CDATA[Jain muni]]></category>
		<category><![CDATA[jain news]]></category>
		<category><![CDATA[jain sadhvi]]></category>
		<category><![CDATA[jain samachar]]></category>
		<category><![CDATA[jain samaj]]></category>
		<category><![CDATA[Moksha Kalyanak]]></category>
		<category><![CDATA[Panch Kalyanak Pratishtha]]></category>
		<category><![CDATA[Pipalda]]></category>
		<category><![CDATA[Positive Energy]]></category>
		<category><![CDATA[Shri Chandraprabhu Bhagwan]]></category>
		<category><![CDATA[Shriphal Jain News]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री शांति सागर जी]]></category>
		<category><![CDATA[जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन मुनि]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समुदाय]]></category>
		<category><![CDATA[जैन साध्वी]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर जैन]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर साधु]]></category>
		<category><![CDATA[पंच कल्याणक प्रतिष्ठा]]></category>
		<category><![CDATA[पीपल्दा]]></category>
		<category><![CDATA[मोक्ष कल्याणक]]></category>
		<category><![CDATA[श्री चंद्रप्रभु भगवान]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[सकारात्मक उर्जा]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=95793</guid>

					<description><![CDATA[आचार्य श्री शांति सागर जी सहित पूर्वाचार्यों के आशीर्वाद से हमने पहली बार किसी मंदिर का जीणोद्धार कर नूतन जिनालय बनाने की प्रेरणा दी। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमानसागर जी ने पंच कल्याणक प्रतिष्ठा के मोक्ष कल्याणक अवसर पर धर्मसभा में प्रकट की। उन्होंने कहा कि अब पीपल्दा गांव नगर हो गया। पीपल्दा से [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्य श्री शांति सागर जी सहित पूर्वाचार्यों के आशीर्वाद से हमने पहली बार किसी मंदिर का जीणोद्धार कर नूतन जिनालय बनाने की प्रेरणा दी। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमानसागर जी ने पंच कल्याणक प्रतिष्ठा के मोक्ष कल्याणक अवसर पर धर्मसभा में प्रकट की। उन्होंने कहा कि अब पीपल्दा गांव नगर हो गया। <span style="color: #ff0000">पीपल्दा से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>पीपल्दा।</strong> पीपल्दा ग्राम अब श्री चंद्र प्रभु अतिशय मंदिर के नाम से भारत में विख्यात होगा। 972 वर्ष प्राचीन जिनालय में विगत 3 वर्षों पूर्व आए थे तब से अभी तक हमने भी अनेक अतिशय देखे और प्रभु की सकारात्मक उर्जा महसूस की। आचार्य श्री शांति सागर जी सहित पूर्वाचार्यों के आशीर्वाद से हमने पहली बार किसी मंदिर का जीणोद्धार कर नूतन जिनालय बनाने की प्रेरणा दी। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमानसागर जी ने पंच कल्याणक प्रतिष्ठा के मोक्ष कल्याणक अवसर पर धर्मसभा में प्रकट की। उन्होंने कहा कि अब पीपल्दा गांव नगर हो गया। प्राचीन जिनालय पहले रोड से 4 फीट नीचे था। वर्षा का पानी मंदिर में आता था। प्रभु के चमत्कार से बिना निकासी के जल निकल जाता था। श्री चंद्रप्रभु भगवान का पंचकल्याण प्रतिष्ठा महोत्सव हुआ। इस दौरान इंदौर जैसे महानगर से भक्त यहां आकर सौधर्म इंद्र बने। कोलकाता, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश सहित अनेक राज्यों के श्रावकों ने तन-मन-धन से भक्ति की।</p>
<p><strong>आचार्यश्री ने कहा-अब यह अतिशय क्षेत्र है</strong></p>
<p>जन्म कल्याणक पर हेलिकाप्टर से पुष्प वर्षा, तप कल्याणक पर प्रसिद्ध भामाशाह का हेलिकाप्टर से आना, मंदिर बहुमंजिला शिखर वाला बनना, संत भवन बनाना,उसके लिए भूमिदान, निर्माण सामग्री का दान ऐसे अनेक चमत्कार अतिशय प्राचीन श्री चंद्रप्रभु द्वारा ही हुए हैं। इसलिए श्री चंद्रप्रभु जिनालय को हम अतिशय क्षेत्र घोषित करते हैं। आपकी ही तरह श्री चन्द्रप्रभु भगवान भी संसारी प्राणी थे। जिन्होंने मनुष्य भव में युवराज बनकर राज संचालन किया। विवाह भी किया। आकाश में बिजली की चमक देखकर वैराग्य का निमित्त मिला।</p>
<p><strong>रोज देवदर्शन और पूजन का संकल्प लें</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि दीक्षा का प्रसंग आपने देखा। तप साधना से चार धातिया कर्मों को नष्ट कर केवल ज्ञान प्राप्त कर विहार कर धर्म देशना समवशरण में देते हैं। सम्मेद शिखर में नियोग धारण कर ध्यान से शेष 4 अधातिया कर्मों को नष्ट कर सिद्ध अवस्था प्राप्त करते हैं। सभी को चमत्कारी अतिशयकारी चंद्रप्रभु श्री का प्रतिदिन देव दर्शन, अभिषेक, पूजन का संकल्प लेना चाहिए। देव गुरु हमारे आराध्य हैं। मंगलवार को सुबह श्रीजी के अभिषेक पूजन के बाद आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व मुनिश्री हितेंद्र सागर जी ने बताया कि अरिहंत भगवान 4 कर्मों के बाद शेष 4 कर्म किस प्रकार श्रेणी बार क्षय कर सिद्धालय विराजित होते हैं। भगवान के मोक्ष जाने के बाद अग्निकुमार देव नख और केश के अग्नि संस्कार करते हैं।</p>
<p><strong>दानदाताओं और सहयोगियों का किया सम्मान </strong></p>
<p>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के संघ के सानिध्य में पंडाल से नूतन श्रीजी को प्रतिष्ठाचार्य मनोज शास्त्री के निर्देशन में रथ में विराजित कर नूतन मंदिर में नूतन वेदी पर मंत्रोच्चार पूर्वक पुण्यशाली परिवारों द्वारा विराजित किया गया। नूतन शिखर पर स्वर्ण कलशारोहण मनोज, संजीव गौरव सोगानी परिवार ने किया। ध्वजदंड आरती सनत निखिल विशाल जैन इंदौर पुण्यार्जक परिवार ने लगाए। मंदिर निर्माण समिति के प्रभारी लल्लूप्रसाद सिंघल, ओमप्रकाश, राजेंद्र, ओमप्रकाश बजाज ने बताया कि कार्यक्रम के दौरान नूतन जिनालय नूतन प्रतिमा वेदी, शासन रक्षक देवी-देवताओं, मंदिर और संत भवन निर्माण में तन, मन और धन से सहयोग करने वाले सभी दान दाताओं और सहयोगियों का तिलक, माला, दुप्पटा, स्मृति चिन्ह से सम्मान कर कृतज्ञता ज्ञापित की गई।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.shreephaljainnews.com/the_temple_area_where_miracles_happen_is_called_an_atishay_kshetra/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>आचार्य श्री शांति सागर जी की नूतन प्रतिमा की स्थापना 14 नवंबर को : ध्यान मंदिर में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सान्निध्य में होंगे कार्यक्रम   </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/a_new_statue_of_acharya_shri_shanti_sagar_ji_will_be_installed/</link>
					<comments>https://www.shreephaljainnews.com/a_new_statue_of_acharya_shri_shanti_sagar_ji_will_be_installed/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 13 Nov 2025 11:36:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[57 वां वर्षायोग]]></category>
		<category><![CDATA[57th Varshayoga]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Shanti Sagar Ji]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Vardhman Sagar JI]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Vardhman Sagar Ji Varshayoga Committee]]></category>
		<category><![CDATA[Atishay Kshetra Tonk]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Jain]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Sadhu]]></category>
		<category><![CDATA[jain community]]></category>
		<category><![CDATA[Jain muni]]></category>
		<category><![CDATA[jain news]]></category>
		<category><![CDATA[jain sadhvi]]></category>
		<category><![CDATA[jain samachar]]></category>
		<category><![CDATA[jain samaj]]></category>
		<category><![CDATA[Meditation Temple]]></category>
		<category><![CDATA[Shriphal Jain News]]></category>
		<category><![CDATA[अतिशय क्षेत्र टोंक]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री शांति सागर जी]]></category>
		<category><![CDATA[जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन मुनि]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समुदाय]]></category>
		<category><![CDATA[जैन साध्वी]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर जैन]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर साधु]]></category>
		<category><![CDATA[ध्यान मंदिर]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=94328</guid>

					<description><![CDATA[आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज जी की मूल बाल ब्रह्मचारी पट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने संयमी जीवन का 57 वां वर्षायोग अतिशय क्षेत्र टोंक में संपन्न किया। नूतन प्रतिमा नवनिर्मित ध्यान केंद्र अमीरगंज श्री आदिनाथ नसिया में14 नवंबर को विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान से साथ विराजित होगी। टोंक [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज जी की मूल बाल ब्रह्मचारी पट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने संयमी जीवन का 57 वां वर्षायोग अतिशय क्षेत्र टोंक में संपन्न किया। नूतन प्रतिमा नवनिर्मित ध्यान केंद्र अमीरगंज श्री आदिनाथ नसिया में14 नवंबर को विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान से साथ विराजित होगी। <span style="color: #ff0000">टोंक से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>टोंक।</strong> आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज जी की मूल बाल ब्रह्मचारी पट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने संयमी जीवन का 57 वां वर्षायोग अतिशय क्षेत्र टोंक में संपन्न किया। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के सानिध्य में आचार्य श्री शांतिसागर जी की नूतन प्रतिमा नवनिर्मित ध्यान केंद्र अमीरगंज श्री आदिनाथ नसिया में 14 नवंबर को विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान से साथ विराजित होगी। भागचंद फुलेता, धर्मचंद दाखिया सकल दिगंबर जैन समाज के सहयोग से प्रबंध समिति दिगंबर समाज अमीरगंज एवं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी वर्षायोग समिति के तत्वावधान में शुक्रवार को प्रातः श्री जी के अभिषेक पूजन के बाद श्रीजी, देव, गुरु से आज्ञा लेकर आचार्य निमंत्रण दिया जाएगा। महिलाओं की घटयात्रा निकाली जाकर पुण्यार्जक कलई परिवार द्वारा मंदिर भूमि शुद्धि की जाएगी।</p>
<p><strong>श्री शांतिसागर ध्यान केंद्र का निर्माण कराया</strong></p>
<p>समाज अध्यक्ष पदमचंद आंडरा, महावीर देवली वाले मंत्री और वर्षायोग समिति के भागचंद फुलेता, धर्मचंद ने बताया कि स्वर्गीय कजोड़ मल की धर्मपत्नी कमला देवी, शिखरचंद, कमलेश, लक्ष्मीदेवी वेणी प्रसाद, पवन, अर्पित, अंकित आदि समस्त कलई परिवार की ओर से श्री शांतिसागर ध्यान केंद्र का निर्माण कराया गया है। इन्हीं कलई परिवार द्वारा 14 नवंबर को नवीन भवन और नूतन वेदी का शुद्धिकरण कार्य आचार्य श्री वर्धमान सागर जी सानिध्य में किया जाएगा।</p>
<p><strong>सेवाभावी सहयोगियों, कार्यकर्ताओं का सम्मान होगा </strong></p>
<p>कमल सराफ के अनुसार ऋतु भरत जीरभार इंदौर आचार्य श्री शांति सागर जी की प्रतिमा के पुण्यार्जक हैं। विगत माह आचार्य पदारोहण शताब्दी महोत्सव में आचार्य श्री शांतिसागर जी की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की गई। आचार्य श्री शांति सागर नवीन ध्यान केंद्र भवन, वेदी प्रतिष्ठा महोत्सव के अंतर्गत 14 नवंबर को प्रातः श्रीजी के अभिषेक के पश्चात याग मंडल विधान होगा। जिसमें वेदी और भूमि शुद्धि, वास्तु विधान, हवन किया जाएगा। दोपहर को आचार्य श्री शांतिसागर महाराज की प्रतिमा नवीन ध्यान मंदिर पर नूतन वेदी पर नूतन भवन पुण्यार्जक परिवार द्वारा विराजित की जाएगी। चातुर्मास समिति द्वारा आचार्य संघ के सेवाभावी सहयोगियों, कार्यकर्ताओं आदि का सम्मान किया जाएगा। आचार्य श्री शांति सागर जी एवं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के पूजन पश्चात आचार्य श्री के उपदेश होंगे।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.shreephaljainnews.com/a_new_statue_of_acharya_shri_shanti_sagar_ji_will_be_installed/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>आचार्य श्री शांति सागर जी का आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव : दो दिवसीय कार्यक्रम में हुए विविध विधि-विधान और धार्मिक क्रियाएं  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/inauguration_centenary_festival_of_acharya_shri_shanti_sagar_ji_as_acharya/</link>
					<comments>https://www.shreephaljainnews.com/inauguration_centenary_festival_of_acharya_shri_shanti_sagar_ji_as_acharya/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 06 Oct 2025 12:02:07 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya post installation]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Shanti Sagar Ji]]></category>
		<category><![CDATA[Centenary Celebration]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Jain]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Sadhu]]></category>
		<category><![CDATA[jain community]]></category>
		<category><![CDATA[Jain muni]]></category>
		<category><![CDATA[jain news]]></category>
		<category><![CDATA[jain sadhvi]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Society]]></category>
		<category><![CDATA[Shri Devendrakirti Swami]]></category>
		<category><![CDATA[Shriphal Jain News]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य पद प्रतिष्ठापना]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री शांति सागर जी]]></category>
		<category><![CDATA[जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन मुनि]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समुदाय]]></category>
		<category><![CDATA[जैन साध्वी]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर जैन]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर साधु]]></category>
		<category><![CDATA[शताब्दी महोत्सव]]></category>
		<category><![CDATA[श्री देवेंद्रकीर्ति स्वामी]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=91801</guid>

					<description><![CDATA[आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज का आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव का दो दिवसीय कार्यक्रम अनेक भव्य कार्यक्रमों के साथ सानंद हुआ। सन 1872 में जन्मे श्री सातगोंडा ने श्री देवेंद्रकीर्ति स्वामी से सन 1915 में क्षुल्लक एवं सन 1920 में मुनि दीक्षा ली। आपका नाम मुनि श्री शांति सागर जी किया गया। टोंक [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज का आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव का दो दिवसीय कार्यक्रम अनेक भव्य कार्यक्रमों के साथ सानंद हुआ। सन 1872 में जन्मे श्री सातगोंडा ने श्री देवेंद्रकीर्ति स्वामी से सन 1915 में क्षुल्लक एवं सन 1920 में मुनि दीक्षा ली। आपका नाम मुनि श्री शांति सागर जी किया गया। <span style="color: #ff0000">टोंक से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>टोंक।</strong> प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की अक्षुण्ण मूलबाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधी आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज अतिशय क्षेत्र टोंकनगर में 57वां वर्षायोग कर रहे हैं। प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज का आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव का दो दिवसीय कार्यक्रम अनेक भव्य कार्यक्रमों के साथ सानंद हुआ। सन 1872 में जन्मे श्री सातगोंडा ने श्री देवेंद्रकीर्ति स्वामी से सन 1915 में क्षुल्लक एवं सन 1920 में मुनि दीक्षा ली। आपका नाम मुनि श्री शांति सागर जी किया गया। संयमी जीवन में, सर्प , सिंह, चींटी, मकोड़े,मानवजन्य के अनेक उपसर्गों को नाम के अनुरूप समता भाव धारण कर सहन किया। सन 1924 आश्विन शुक्ल ग्यारस को आपको आचार्य पद दिया गया। उस दिन 4 दीक्षा दीं। जिनवाणी जिनालयों और धर्म संस्कृति की रक्षा की। जीवन में 9938 उपवास किए। 88 भव्य आत्माओं की दीक्षा दी।</p>
<p><strong>मुनि दीक्षा शताब्दी महोत्सव पारसोला से प्रारंभ हुआ </strong></p>
<p>राजस्थान सरकार के राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के संघ सानिध्य में 3 ओर 4 अक्टूबर 2025 आश्विन शुक्ल 11 एवं 12 से विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों से साथ राष्ट्रीय स्तर पर प्रारंभ हुआ। श्रीजी के पंचामृत अभिषेक मानव चलित श्रीजी की रथयात्रा, ध्वजारोहण भूमिशुद्धि, आचार्य श्री के प्रवचन ,प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर विधान शाम को श्रीजी की आरती ,भजन संध्या का आयोजन हुआ। आचार्य श्री ने प्रवचन में बताया कि हम सभी का सौभाग्यशाली हैं कि 20 वीं सदी के सर्वप्रथम दिगम्बर प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी का आचार्य पद का शताब्दी तथा मुनि श्री वीरसागर जी और मुनि श्री नेमिसागर जी का मुनि दीक्षा शताब्दी महोत्सव पारसोला से प्रारंभ हुआ है और महोत्सव निरंतर आगे भी चलेगा क्योंकि, गुरु का गुणानुवाद समय का मोहताज नहीं है। हर दिन हर समय किया जाता है। आपने आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज के संयम उपकरण पिच्छी कमंडल शास्त्र और सिंहासन का अवलोकन किया। आश्विन शुक्ल एकादशी सन 1924 को 4 दीक्षा देने कारण श्री शांतिसागर जी को आचार्य पद इसी दिन दिया गया। संलेखना के समय प्रथम मुनि शिष्य श्री वीरसागर जी को उन्होंने समाधि के पूर्व आचार्य पद देकर यही आदेश दिया कि परंपरा का निर्दाेष पालन करना और अपने समाधि के पूर्व अपने योग्य शिष्य को आचार्य पद देना। आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा तब से निरंतर निर्दाेष रूप से गुरु परंपरा अनुसार चल रही है।</p>
<p><strong>श्रीजी की विशाल यात्रा महावीर जिनालय अहिंसा सर्किल से प्रारंभ हुई</strong></p>
<p>आचार्य पद से धर्म प्रभावना होती है। आचार्य श्री शांतिसागर जी ने चरित्र के सभी छह अंगों का पालन कर जीवन को प्रयोगशाला बनाया। मृत्यु श्रावक की होती है और संलेखना श्रमण साधु की होती है। यह मंगल देशना प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज के आचार्य पदप्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव के दो दिवसीय कार्यक्रम में पंचम पट्टाधीशआचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रकट की। गुरुभक्त राजेश पंचोलिया के अनुसार आओ शांति मार्ग पर चले के दिव्य संदेश के आह्वान पर आचार्य श्री वर्धमान सागरजी संघ सानिध्य में श्रीजी की विशाल यात्रा महावीर जिनालय अहिंसा सर्किल से प्रारंभ हुई। जिसमें भारतवर्ष के विभिन्न राज्यों के वेशभूषा परिधानों का विशेष आकर्षण रहा। बुलेट गाड़ियों, घोड़े और ऊँट, जिनध्वजा युवा लहराते हुए शोभायमान दृष्टिगत हुए। ढोल-नगाड़ों, बैंड की मधुर ध्वनियों से आच्छादित लहरियों पर युवक-युवतियां थिरक कर भक्ति प्रदर्शित कर रहे थे।</p>
<p><strong>3 किमी की शोभा यात्रा 4 घंटे में पहुंची </strong></p>
<p>पाँच गज (हाथी) पर चयनित कल्पना सुशील कार्वा उदयपुर मुंबई सौंधर्म इंद्र, चक्रवर्ती अलका सुनील जवेरी संघपति परिवार मुंबई,कुबेर, यज्ञ नायक पूर्वा समर कंठाली इंदौर तथा कुबेर इंद्र पुष्पा मोहनलाल छामुनिया तथा श्रुतदेवी जिनवाणी माता को लेकर कन्हैयालाल बारवास परिवार हाथियों पर सवार होकर धर्म प्रभावना कर रहे। अनेक बग्घियों पर इंद्र तथा विशिष्ट गणमान्य अतिथि गृहस्थ अवस्था भोज के परिजन, बारामती के चंदू काका परिवार,श्री अरविंद दोषी परिवार विराजित हुए। शोभा यात्रा में श्री जी आचार्य संघ की आरती की। पुष्प वृष्टि से स्वागत नगर के सभी राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक संगठनों ने कर सामाजिक सदभावना का परिचय दिया। लगभग 3 किमी की शोभा यात्रा 4 घंटे में प्रमुख मार्गाे से होते हुए आर एन फार्म हाउस पहुंची। नगर में सैकड़ों बैनर लगाए गए। प्रशासन द्वारा भी जुलूस की समुचित व्यवस्था की तथा 100 से अधिक नगरों के समाज जान यहां उपस्थित हुए।</p>
<p><strong> पंजाब बैंड की प्रस्तुति आकर्षण का केंद्र </strong></p>
<p>कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु ,मध्यप्रदेश, राजस्थान दिल्ली, गुजरात ,छत्तीसगढ़,बिहार, असम पश्चिम बंगाल आदि अनेक राज्यों से गुरु भक्त कार्यक्रम में सम्मिलित हुए। लाखों भक्तों ने जिनवाणी और वात्सल्य वारिधी यू-ट्यूब से लाइव प्रसारण देखा। कार्यक्रम में आचार्य शांति सागर जी के गृहस्थ अवस्था कर्नाटक के तीसरी पीढ़ी के परिजन विशेष रूप से उपस्थित हुए। जुलूस में श्रावक श्राविकाएं बगैर जूते चप्पल के चल रहे थे। सभी मंडल डीजे, बैंड पार्टी की सुमधुर भजनों पर अनेक भक्त भक्ति नृत्य से प्रस्तुत कर रहे थे। पंजाब बैंड की प्रस्तुति आकर्षण का केंद्र बन गई। मंगल कार्यक्रम के पूर्व दिवस वर्षा कर इंद्र देवता ने नगर एवं भूमि की शुद्धता की। घटयात्रा कलश के पवित्र जल से भूमिशुद्धि की। ध्वज वंदन मंगल कलश स्थापना आदि समस्त मांगलिक क्रियाएं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में प्रतिष्ठाचार्य पंडित हंसमुख जी शास्त्री धरियावद के निर्देशन में हुई।</p>
<p><strong>आचार्य श्री शांतिसागर जी की डॉक्यूमेंट्री दिखाई </strong></p>
<p>ध्वजारोहण श्री अजीत मिंडा मुंबई ,मंडप उद्घाटन सुनील अग्रवाल जयपुर, दीप प्रवज्जलन अनिल सेठी बैंगलोर ,सुरेश सबलावत जयपुर ,राकेश सेठी कोलकाता धर्मचंद जैन टोंक ने किया। कलश स्थापना 6 प्रतिमा धारी सुशीला अशोक पाटनी किशनगढ़ आर के मार्बल ग्रुप ने किया। चरण प्रक्षालन का सौभाग्य अजीत मिंडा, राजकुमार सेठी जयपुर ,शास्त्र भेंट अंकेश जोबनेर ,निर्मल ,शांति, सुबोध सुमति छाबड़ा रायपुर दुर्ग ने तथा आचार्य शांतिसागर जी के सिंहासन, संयम उपकरण पिच्छी, कमंडल शास्त्र का अनावरण राजेश गुणमाला जवेरी मुंबई परिवार ने किया। प्रवचन के बाद आचार्य श्री शांतिसागर जी की डॉक्यूमेंट्री दिखाई गई। आचार्य ससंघ की आहार चर्या इसके बाद दोपहर को इंद्र प्रतिष्ठा सकलीकरण क्रिया हुई। जिसमें 125 प्रमुख और प्रति इंद्रों द्वारा आचार्य श्री शांति सागर मंडल विधान की पूजन की गई।</p>
<p><strong>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का पूजन कर द्रव्य अर्पित किए</strong></p>
<p>इस विधान के लिए यज्ञनायक स्पर्श समर कँठाली इंदौर द्वारा पूजन के सभी द्रव्यों के 100 थाल स्थापना, जल ,कलश, चंदन कलश अक्षत थाल प्रकार के देश-विदेश के पुष्प प्रकार के नैवेद्य में मिठाई नमकीन दीप थाल धूप प्रकार के विभिन्न फल सूखे मेवे अर्ध्य सभी द्रव्य सभी इंद्र परिवार द्वारा आचार्य श्री शांति सागर जी एवं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का पूजन कर द्रव्य अर्पित किए। मुनि श्री हितेंद्र सागर जी एवं आर्यिका श्री महायश मति जी ने विधान की पूजन कराई। पूजन के दौरान चढ़ाए जाने वाले द्रव्यों अर्ध्य में आचार्य श्री के गुणों बाबद भी बताया। दोपहर को मुनि श्री दर्शित सागर जी के केशलोचन हुए। दोपहर को आचार्य श्री वर्धमान सागर जी द्वारा प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी की नूतन प्रतिमा की विधि विधान मंत्रोच्चार से प्राणप्रतिष्ठा की गई। कार्यक्रम का सुंदर संचालन बसंत वेद ने किया। किशनगढ़ समाज ने आचार्य संघ को किशनगढ़ में आगमन शताब्दी महोत्सव एवं वर्ष 2026 का चातुर्मास करने हेतु श्रीफल अर्पित किया।</p>
<p><strong>आचार्य श्री की प्रेरणा से ही मूलाचार ग्रंथ का प्रकाशन </strong></p>
<p>रात्रि को श्री जी ओर आचार्य श्री की 2500 दीपक आरती की गई आमंत्रित कलाकारों ने मन मोहक भजनों की प्रस्तुति दी। दूसरे दिन4 अक्टूबर को उपदेश में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया कि आचार्य पद शताब्दी महोत्सव मनाना बहुत ही पुण्य का कार्य है। चार अक्टूबर को अनेक कार्यक्रम हो रहे हैं। दीक्षित मुनि अपने योग्यता गुणों के आधार पर आचार्य बनते हैं। आज आचार्य श्री शांति सागर जी की विशेषता ,उनके गुणों को वाणी से प्रकट करना कठिन है। चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ में उनकी अनेक विशेषता बतलाई है उन्होंने बाहर शरीर से अंतर्मुखी होकर आत्मा के ज्ञान को प्रकट किया और आत्मा में देखने चिंतन करने की प्रवृत्ति को जागृत रखा। देव शास्त्र गुरु हमें मार्ग दिखलाते हैं जिस मार्ग पर वह चले उसको उन्होंने स्वयं निर्मित किया। बने बनाए मार्ग पर चलने से ज्यादा कठिन नया मार्ग बनाकर उस पर चलना महत्वपूर्ण है। गुरु भक्त राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने आगे प्रवचन में बताया कि जीवन में धर्म को धारण कर दीक्षा से जीवन का उत्थान किया जाता है दीक्षा के साथ अहिंसा महाव्रत धारण किया जाता है। यह महाव्रत मन, वचन, काय शरीर से पालन किया जाता है। वाणी में कटुता होना भी हिंसा का सूचक है। 20वीं सदी के आचार्य श्री की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी वर्तमान में भी देखने को मिल रही है। साधु जीवन में मन ,वचन , काय से पवित्र होते हैं। साधु शूरवीर होते हैं वह अपनी आत्मा की वीरता से कर्म रूपी शत्रु से लड़ते हैं। आचार्य श्री शांति सागर जी के जीवन में सरलता, सत्य व्यवहार, धर्म के प्रति अनुराग ,और सब परिस्थितियों में समता भाव त्याग, तप आदि गुण थे। आचार्य श्री ने बताया कि हमें ऐसा लगता है कि हम पूर्व जन्म में भी जैन मुनि रहे हैं। इसी कारण उसे आगम चर्या का हम वर्तमान जीवन में पालन कर रहे हैं। जैन साधु के लिए मूलाचार ग्रंथ तब प्रकाशित नहीं था। आचार्य श्री की प्रेरणा से ही मूलाचार ग्रंथ का अब प्रकाशन हुआ है।</p>
<p><strong>संपूर्ण समाज के लिए मंगल आशीर्वाद दिया</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने सम्यक दर्शन ,सम्यक ज्ञान सम्यक चारित्र जिनागम को जीवन में धारण किया। समाधि के समय भी धर्म से वह परिपूर्ण रहे। और सिद्ध क्षेत्र कुंथल गिरी में 36 दिन की सल्लेखना धारण की। साधु मृत्यु पर विजय प्राप्त करते हैं। इस अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने संघपति जवेरी परिवार मुंबई ,गृहस्थ अवस्था के परिजनों ,चंदू काका बारामती परिवार, डॉ. कल्याण अग्रवाल ,अरविंद दोषी सहित पंडित हंसमुख शास्त्री, भागचंद जी एवं टोंक नगर की संपूर्ण समाज के लिए मंगल आशीर्वाद दिया। आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व अनेक विद्वानों ने , पंडित श्री हंसमुख जी धरियावद, ने भावांजलि प्रस्तुत की।आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व आर्यिका श्री महायश मति जी ने प्रथमाचार्य श्री ओर 9 के अंक का संयोग बताया जन्म दिनांक 27 ,जन्म वर्ष 1872, कमल की 1008 पंखुड़ी ,108 कमल , 18 वर्ष की उम्र, 36 मूलगुण, 36 दिन की सल्लेखना, 18 करोड़ जाप, समाधि दिनांक 18,समाधि माह सितंबर,,108 गुण आदि से भावांजलि प्रस्तुत की।मुनि श्री हितेंद्र सागर जी महाराज ने गुणानुवादमें बताया कि प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज बाल ब्रह्मचारी थे उनकी परंपरा में आचार्य वीर सागर जी, आचार्य श्री शिव सागर जी, आचार्य श्री धर्म सागर जी, आचार्य श्री अजीत सागर जी और वर्तमान पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी सभी बाल ब्रह्मचारी आचार्य हैं। अनेक उपसर्ग सहन किएबाहर से आमंत्रित भक्तों ने चित्र अनावरण कर दीप प्रवज्जलन कर चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भंेट की।</p>
<p><strong>कई आयोजन और सम्मेलन हुए </strong></p>
<p>टोंक नगर में भूगर्भ से प्रतिमाएं निकलने कारण आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने इसे अतिशय क्षेत्र घोषित किया है। प्रथमाचार्य श्री शांति सागर आचार्य पद शताब्दी प्रतिष्ठापना महोत्सव में पूर्व में पत्रकार संगोष्ठी, विद्वत संगोष्ठी, चार्टर्ड एवं एडवोकेट सम्मेलन, शिक्षक सम्मेलन, नारी, युवा सम्मेलन हो चुके है। भागचंद, धर्म चंद, कमल सराफ ,बीना छामुनिया ने बताया कि टोंक समाज द्वारा अनेक प्रकल्पों राष्ट्र सेवा, श्रुत जिनवाणी सेवा, श्रमण साधु सेवा माता-पिता की सहमति से जैन समाज में शादी करना आदि प्रकल्पों के लिए सांकेतिक 100 सदस्यों को देव शास्त्र एवं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के समक्ष संकल्पित कराया। इस अवसर पर गृहस्थ अवस्था की जन्म नगरी भोज से तीसरी पीढ़ी की पद्मश्री पाटिल, चौथी के किरण ,सुरेखा, कुमारी प्रणिता सहित उपस्थित हुए। बारामती के प्रसिद्ध संघपति चंदू काका के परिजन, अरविंद दोषी मुंबई के परिजन, संघ पति प्रतापगढ़ मुंबई के सुनील, अलका जवेरी ने भी सहभागिता की।</p>
<p><strong>यह समाजजन भी मौजूद रहे</strong></p>
<p>आचार्य श्री शांति सागर फाउंडेशन के अनिल सेठी बंगलौर, संजय पापड़ीवाल किशनगढ़, राकेश सेठी कोलकाता, सुरेश सबलावत जयपुर, सुनील अग्रवाल जयपुर राजकुमार सेठी जयपुर, अजीत मिंडा मुंबई, सुनील जवेरी मुंबई, डॉ. कल्याण गंगवाल, भरत जीरभार, समर कँठाली इंदौर, जय, शरद कार्वा उदयपुर, राजेश जवेरी मुम्बई सहित अनेक भक्त उपस्थित हुए। सभी के तन-मन-धन त्याग हेतु तिलक, माला, शॉल, श्रीफल से स्वागत कर स्मृति चिन्ह भेंट किया।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.shreephaljainnews.com/inauguration_centenary_festival_of_acharya_shri_shanti_sagar_ji_as_acharya/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>धर्म रूपी विश्व विद्यालय से ज्ञान मिलता है : आचार्यश्री वर्धमानसागर जी महाराज ने श्री शांतिनाथ भगवान और आचार्य श्री शांति सागर जी का संयोग बताया  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/knowledge_is_obtained_from_the_university_of_religion/</link>
					<comments>https://www.shreephaljainnews.com/knowledge_is_obtained_from_the_university_of_religion/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 30 Sep 2025 13:20:01 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Shanti Sagar Ji]]></category>
		<category><![CDATA[Acharyashree Vardhmansagar Ji Maharaj]]></category>
		<category><![CDATA[Aryika Shri Deshna Mati Ji]]></category>
		<category><![CDATA[Atishay Kshetra]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Jain]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Sadhu]]></category>
		<category><![CDATA[First Tirthankara Rishabhdev]]></category>
		<category><![CDATA[jain community]]></category>
		<category><![CDATA[Jain muni]]></category>
		<category><![CDATA[jain news]]></category>
		<category><![CDATA[jain sadhvi]]></category>
		<category><![CDATA[jain samachar]]></category>
		<category><![CDATA[jain samaj]]></category>
		<category><![CDATA[Shramana Tradition]]></category>
		<category><![CDATA[Shri Shantinath Bhagwan]]></category>
		<category><![CDATA[Shri Shantisagar Discourse Mala]]></category>
		<category><![CDATA[Shriphal Jain News]]></category>
		<category><![CDATA[अतिशय क्षेत्र]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री शांति सागर जी]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्यश्री वर्धमानसागर जी महाराज]]></category>
		<category><![CDATA[आर्यिका श्री देशना मति जी]]></category>
		<category><![CDATA[जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समुदाय]]></category>
		<category><![CDATA[जैन साध्वी]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर जैन]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर साधु]]></category>
		<category><![CDATA[प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव]]></category>
		<category><![CDATA[श्रमण परंपरा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री शांतिनाथ भगवान]]></category>
		<category><![CDATA[श्री शांतिसागर प्रवचन माला]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=91443</guid>

					<description><![CDATA[राग और द्वेष से कर्म बंध होते हैं। इससे सुख का नाश होता है। संसार में जन्म मरण का परिभ्रमण होता रहता है। हमें जो भौतिक पदार्थ पुरुषार्थ से मिले हैं। वह वास्तव में हमारे नहीं है नश्वर है। श्री शांतिसागर प्रवचन माला के तहत आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने कर्मबंध के बारे में [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>राग और द्वेष से कर्म बंध होते हैं। इससे सुख का नाश होता है। संसार में जन्म मरण का परिभ्रमण होता रहता है। हमें जो भौतिक पदार्थ पुरुषार्थ से मिले हैं। वह वास्तव में हमारे नहीं है नश्वर है। श्री शांतिसागर प्रवचन माला के तहत आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने कर्मबंध के बारे में बताया। <span style="color: #ff0000">टोंक से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>टोंक।</strong> राग और द्वेष से कर्म बंध होते हैं। इससे सुख का नाश होता है। संसार में जन्म मरण का परिभ्रमण होता रहता है। हमें जो भौतिक पदार्थ पुरुषार्थ से मिले हैं। वह वास्तव में हमारे नहीं है नश्वर है। घर जिसमें आप रहते हैं। यह भी जेल के समान है। घर में रहना भी बंधन है, इन परिवार ,परिग्रह, राग द्वेष के बंधन कारण आप पराधीन है। इससे उदासीन होकर वैराग्य लेना ही वास्तविक यथार्थ ज्ञान है। यह मंगल देशना श्री शांतिसागर प्रवचन माला के तहत आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने अतिशय क्षेत्र में धर्मसभा में प्रकट की। आचार्य श्री ने श्री शांतिनाथ भगवान और प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी का संयोग बताया कि श्री शांतिनाथ भगवान के समय से धर्म परिवर्तन निरंतर चल रहा है। उसी प्रकार 20वीं सदी में प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी ने श्रमण परंपरा को परावर्तन कर पुनर्जीवित किया। तब से श्रमण परंपरा भी निर्बाध जारी है।</p>
<p><strong>पुरुषार्थ करने पर मोक्ष की राह प्रशस्त होगी</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने उपदेश में आगे बताया कि प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव ने एक लाख वर्ष पूर्व की आयु शेष रहने पर 84 खंड के भवन राज पाठ वैभव को त्याग कर निमित्त से जैनेश्वरी दीक्षा धारण की। आप भी मन, शरीर और आत्मा रूपी तीन खंड के भवन में रहते हैं। आत्मा को सब भूल रहे हैं। आत्मा के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने का पुरुषार्थ करने पर मोक्ष की राह प्रशस्त होगी। जिनशासन ज्ञान में है। धर्म रूपी विश्व विद्यालय से ज्ञान मिलता है। शासन ज्ञान से चलता है, ज्ञान से शांति मिलती है ज्ञान नियमित बनने का मार्ग देता है। संसारी भव्य प्राणियों के लिए धर्म ही मंगलमय और शरणभूत है।</p>
<p><strong>आर्यिका श्री देशना मति जी ने क्रोध और क्षमा की विवेचना की</strong></p>
<p>समाज प्रवक्ता पवन कंटान और विकास जागीरदार, कमल सराफ ने बताया कि आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व आर्यिका श्री देशना मति जी ने क्रोध और क्षमा की विवेचना की। अपेक्षा की उपेक्षा होने से क्रोध आता है। पवन और अंजना सती की कहानी के माध्यम से बताया कि 22 वर्ष तक पति का वियोग सिर्फ इस कारण से हुआ कि उन्होंने जिनेंद्र भगवान की प्रतिमा को 22 मिनट के लिए छुपा दिया था। उन कर्मों के बंधन ने उन्हें यह दुःख दिया। जिसे उन्होंने समता से शांति से सहन किया। क्रोध जब बैर का रूप लेता है तो एक भव नहीं अनेक जन्मों के भव बिगड़ जाते हैं। 2 अक्टूबर को होने वाली अवनीश भाई दीक्षार्थी के परिजनों द्वारा 30 सितंबर को धार्मिक भजन का कार्यक्रम किया गया। दीक्षार्थी परिवार की ओर से प्रभावना का वितरण किया गया। रात्रि में दीक्षार्थी का हल्दी और मेंहदी का कार्यक्रम हुआ।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.shreephaljainnews.com/knowledge_is_obtained_from_the_university_of_religion/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>मुनिसुव्रतनाथ के दर्शन पाने आ पहुंचे हैं वर्धमान: स्वस्ति भूषण चरण पखारे, किया गुरुवर को प्रणाम </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/vardhaman_has_come_to_get_the_darshan_of_munisuvratanathjna/</link>
					<comments>https://www.shreephaljainnews.com/vardhaman_has_come_to_get_the_darshan_of_munisuvratanathjna/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 25 Jun 2025 15:36:03 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Shanti Sagar Ji]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Vardhman Sagar Ji Maharaj Sangh]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Jain]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Sadhu]]></category>
		<category><![CDATA[Ganini Aryika Shri Swastibhushan Mataji]]></category>
		<category><![CDATA[Jahazpur]]></category>
		<category><![CDATA[jain community]]></category>
		<category><![CDATA[Jain muni]]></category>
		<category><![CDATA[jain news]]></category>
		<category><![CDATA[jain sadhvi]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Society]]></category>
		<category><![CDATA[Mangal Awajan]]></category>
		<category><![CDATA[Munisuvratnath]]></category>
		<category><![CDATA[Shriphal Jain News]]></category>
		<category><![CDATA[Swastidham Temple]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री शांति सागर जी]]></category>
		<category><![CDATA[गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी]]></category>
		<category><![CDATA[जहाजपुर]]></category>
		<category><![CDATA[जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन मुनि]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समुदाय]]></category>
		<category><![CDATA[जैन साध्वी]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर जैन]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर साधु]]></category>
		<category><![CDATA[मंगल अगवानी]]></category>
		<category><![CDATA[मुनिसुव्रतनाथ]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[स्वस्तिधाम मंदिर]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=83746</guid>

					<description><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ससंघ की मंगल अगवानी आचार्य श्री शांति सागर जी ( छाणी ) के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री सन्मतिसागर जी शिष्या गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी ससंघ ने बड़े ही भक्ति भाव से की। प्रातः 8 बजे आचार्य संघ(36 पिच्छी) का मंगल प्रवेश हुआ। जय मुनिसुव्रत् जय वर्धमान के दिव्यघोष [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ससंघ की मंगल अगवानी आचार्य श्री शांति सागर जी ( छाणी ) के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री सन्मतिसागर जी शिष्या गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी ससंघ ने बड़े ही भक्ति भाव से की। प्रातः 8 बजे आचार्य संघ(36 पिच्छी) का मंगल प्रवेश हुआ। जय मुनिसुव्रत् जय वर्धमान के दिव्यघोष से स्वस्तिधाम मंदिर और परिसर गुंजायमान हो उठा। <span style="color: #ff0000">जहाजपुर से पढ़िए, सन्मति जैन काका की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जहाजपुर।</strong> गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी श्री 1008 मुनिसुव्रतनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र स्वस्तिधाम जहाज़पुर में ससंघ विराजमान हैं। दो अविरल धाराओं का पावन संगम दर्शन करके हर मनुज धन्य हुआ। आचार्य श्री 108 शांति सागर के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ससंघ की मंगल अगवानी आचार्य श्री शांति सागर जी (छाणी) के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री सन्मतिसागर जी शिष्या गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी ससंघ ने बड़े ही भक्ति भाव से की। जय मुनिसुव्रत जय वर्धमान के दिव्यघोष से समस्त स्वस्तिधाम मंदिर और परिसर गुंजायमान हो उठा।</p>
<p>प्रातः 8 बजे आचार्य संघ (36 पिच्छी)का मंगल प्रवेश हुआ। आचार्य संघ के सानिध्य में श्री मुनिसुव्रतनाथ भगवान के मंगल अभिषेक एवं शांतिधारा का सभी भक्तों ने लाभ उठाया। तत्पश्च्यात मंगल प्रवचन हुए। मंगल सूचना यह है कि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज का 36वां आचार्य पदारोहण दिवस 27 जून को स्वस्तिधाम की भूमि पर मनाया जाएगा।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.shreephaljainnews.com/vardhaman_has_come_to_get_the_darshan_of_munisuvratanathjna/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>आचार्य श्री शांति सागर जी का 153 वां अवतरण दिवस: आषाढ़ वदी 6 जन्मदिन के अवसर पर महा मुनिराज का परिचय </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/153_rd_birth_anniversary_of_acharya_shri_shanti_sagar_ji/</link>
					<comments>https://www.shreephaljainnews.com/153_rd_birth_anniversary_of_acharya_shri_shanti_sagar_ji/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 17 Jun 2025 08:40:18 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[153 वां अवतरण दिवस]]></category>
		<category><![CDATA[153rd Avtar Day]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Shanti Sagar Ji]]></category>
		<category><![CDATA[Ashadh Vadi 6]]></category>
		<category><![CDATA[Belgaum]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Jain]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Sadhu]]></category>
		<category><![CDATA[Father Bhimgouda]]></category>
		<category><![CDATA[jain community]]></category>
		<category><![CDATA[Jain muni]]></category>
		<category><![CDATA[jain news]]></category>
		<category><![CDATA[jain sadhvi]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Society]]></category>
		<category><![CDATA[Mother Satyavati श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[Shriphal Jain News]]></category>
		<category><![CDATA[Yelgul]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री शांति सागर जी]]></category>
		<category><![CDATA[आषाढ़ वदी 6]]></category>
		<category><![CDATA[जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन मुनि]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समुदाय]]></category>
		<category><![CDATA[जैन साध्वी]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर जैन]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर साधु]]></category>
		<category><![CDATA[पिता भीमगौड़ा]]></category>
		<category><![CDATA[बेलगांव]]></category>
		<category><![CDATA[माता सत्यवती]]></category>
		<category><![CDATA[येलगुल]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=83206</guid>

					<description><![CDATA[आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज का 153वां जन्म जयंती महोत्सव मंगलवार को पूरे देश में पूर्ण भक्तिभाव से मनाया जा रहा है। आषाढ़ वदी छठ को आपका अवतरण दिवस आता है। जैन समाज के लिए आचार्यश्री शांतिसागर जी ने कई प्रतिमान रचे और उनपर चलने के लिए प्रेरित किया। आपकी संयम यात्रा अनुकरणीय है। इस अवसर [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज का 153वां जन्म जयंती महोत्सव मंगलवार को पूरे देश में पूर्ण भक्तिभाव से मनाया जा रहा है। आषाढ़ वदी छठ को आपका अवतरण दिवस आता है। जैन समाज के लिए आचार्यश्री शांतिसागर जी ने कई प्रतिमान रचे और उनपर चलने के लिए प्रेरित किया। आपकी संयम यात्रा अनुकरणीय है। <span style="color: #ff0000">इस अवसर पर इंदौर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह विस्तृत रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> दिगंबर साधु संत परम्परा में वर्तमान युग में अनेक तपस्वी, ज्ञानी ध्यानी संत हुए। उनमें आचार्य शांतिसागरजी महाराज एक ऐसे प्रमुख साधु श्रेष्ठ तपस्वी रत्न हुए हैं। जिनकी अगाध विद्वता, कठोर तपश्चर्या, प्रगाढ़ धर्म श्रद्धा, आदर्श चरित्र और अनुपम त्याग ने धर्म की यथार्थ ज्योति प्रज्वलित की। आपने लुप्तप्राय, शिथिलाचारग्रस्त मुनि परम्परा का पुनरुद्धार कर उसे जीवंत किया, यह निग्रन्थ श्रमण परम्परा आपकी ही कृपा से अनवरत रूप से प्रथम पट्टाचार्य श्री वीरसागर जी, द्वितीय पट्टाचार्य श्री शिवसागर जी, तृतीय पट्टाचार्य श्री धर्मसागर जी, चतुर्थ पट्टाचार्य श्री अजित सागर जी तथा पंचम पट्टाचार्य , आचार्य श्री वर्धमान सागर के रूप मेंआज तक प्रवाहमान है।</p>
<p><strong>जन्म &#8211;</strong></p>
<p>दक्षिण भारत के प्रसिद्ध नगर बेलगांव जिला चिकोड़ी तालुका (तहसील) में भोजग्राम है। भोजग्राम के समीप लगभग चार मील की दूरी पर विद्यमान येलगुल गांव में नाना के घर आषाढ़ कृष्णा 6 विक्रम संवत् 1929 सन् 1872 बुधवार की रात्रि में शुभ लक्षणों से युक्त बालक सातगौड़ा का जन्म हुआ था। गौड़ा शब्द भूमिपति-पाटिल का द्योतक है। पिता भीमगौड़ा और माता सत्यवती के आप तीसरे पुत्र थे इसी से मानो प्रकृति ने आपको रत्नत्रय और तृतीय रत्न सम्यकू चारित्र का अनुपम आराधक बनाया।</p>
<p><strong>बचपन-</strong></p>
<p>सातगौड़ा बचपन से ही वैरागी थे। लौकिक आमोद-प्रमोद से सदा दूर रहते थे। बाल्यकाल से ही वे शांति के सागर थे। छोटी सी उम्र में ही आपके दीक्षा लेने के परिणाम थे परन्तु, माता-पिता ने आग्रह किया कि बेटा जब तक हमारा जीवन है तब तक तुम दीक्षा न लेकर घर में धर्मसाधना करो। इसलिए आप घर में रहे।</p>
<p><strong>व्यवसाय-</strong></p>
<p>मुनियों के प्रति उनकी अटूट भक्ति थी। वे अपने कंधे पर बैठाकर मुनिराज को दूधगंगा तथा वेदगंगा नदियों के संगम के पार ले जाते थे। वे कपड़े की दुकान पर बैठते थे तो ग्राहक आने पर उसी से कहते थे कि-कपड़ा लेना है तो मन से चुन लो, अपने हाथ से नाप कर फाड़ लो और बही में लिख दो। इस प्रकार उनकी निस्पृहता थी। आप कभी भी अपने खेतों में से पक्षियों को नहीं भगाते थे। बल्कि खेतों के पास पीने का पानी रखकर स्वयं पीठ करके बैठ जाते थे। फिर भी आपके खेतों में सबसे अधिक धान्य होता था। वे कुटुंब के झंझटों में नहीं पड़ते थे। उन्होंने माता-पिता की खूब सेवा की और उनका समाधिमरण कराया।</p>
<p><strong>संयम पथ-</strong></p>
<p>माता-पिता के स्वर्गस्थ होते ही आप गृह विरत हो गये एवं मुनिश्री देवप्पा स्वामी से 41 वर्ष की आयु में कर्नाटक के उत्तूर ग्राम में ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशी सन् 1915को क्षुल्लक के व्रत अंगीकार किए। आपका नाम शांतिसागर रखा गया। क्षुल्लक अवस्था में आपको कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था, क्योंकि तब मुनिचर्या शिथिलताओं से परिपूर्ण थी। साधु आहार के लिए उपाध्याय द्वारा पूर्व निश्चित गृह में जाते थे। मार्ग में एक चादर लपेटकर जाते थे आहार के समय उस वस्त्र को अलग कर देते थे आहार के समय घण्टा बजता रहता था जिससे कोई विध्न न आए। क्षुल्लक जी ने इस प्रक्रिया को नहीं अपनाया और आगम की आज्ञानुसार चर्या पर निकलना प्रारम्भ किया। गृहस्थों को पड़गाहन की विधि ज्ञात न होने से वे वापस मंदिर में आकर विराज जाते इस प्रकार निराहार 4 दिन व्यतीत होने पर ग्राम में तहलका मच गया तथा ग्राम के प्रमुख पाटील ने कठोर शब्दों में उपाध्याय को कहा-शास्त्रोक्त विधि क्यों नहीं बताते? क्या साधु को निराहार भूखा मार दोगे! तब उपाध्याय ने आगमोक्त विधि बतलाई एवं पड़गाहन हुआ</p>
<p><strong>ऐलक दीक्षा</strong></p>
<p>नेमिनाथ भगवान के निर्माण स्थान गिरनार जी की वंदना के पश्चात् इसकी स्थायी स्मृति रूप अपने ऐलक दीक्षा ग्रहण की। ऐलक रूप में आपने नसलापुर में चतुर्मास किया। वहां से चलकर ऐनापुर ग्राम में रहे।</p>
<p><strong>मुनि दीक्षा</strong></p>
<p>उस समय यरनाल में पंचकल्याणक महोत्सव (सन् 1920) होने वाला था। वहां जिनेन्द्र भगवान के दीक्षा कल्याणक दिवस पर आपने अपने गुरुदेव देवेन्द्रकीर्ति जी से फागुन शुक्ला चतुर्दशी 24 मार्च सन 1920 को मुनि दीक्षा ग्रहण की। सन 2020 में यरनाल मुनि दीक्षा स्थली पर पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में मुनि दीक्षा का शताब्दी वर्ष मनाया गया।</p>
<p><strong>आचार्य पद</strong></p>
<p>समडोली में श्री नेमिसागर जी की ऐलक दीक्षा व श्री वीरसागर जी की मुनि दीक्षा के अवसर पर समस्त संघ ने महाराज को आचार्य पद (सन् 1924) से अलंकृत कर अपने आप को कृतार्थ किया।</p>
<p><strong>चारित्र चक्रवति </strong></p>
<p>गजपंथा में चतुर्मास के बाद सन् (1934) पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव हुआ। इस अवसर पर उपस्थित धार्मिक संघ ने महाराज को चारित्र चक्रवर्ती पद से अलंकृत किया।</p>
<p><strong>संल्लेखना-</strong></p>
<p>जीवन पर्यन्त मुनिचर्या का निर्दाेष पालन करते हुए 84 वर्ष की आयु में दृष्टि मंद होने के कारण संल्लेखना की भावना से आचार्य श्री सिद्धक्षेत्र कुंथलगिरी जी पहुंचे। वहां पर उन्होंने 13 जून को विशाल धर्मसभा के मध्य आपने संल्लेखना धारण करने के विचारों को अभिव्यक्त किया। 15 अगस्त को महाराज ने आठ दिन की नियम-संल्लेखना का व्रत लिया। जिसमें केवल पानी लेने की छूट रखी। 17 अगस्त को उन्होंने यम संल्लेखना या समाधिमरण की घोषणा की तथा 24 अगस्त को अपना आचार्य पद अपने प्रमुख शिष्य श्री वीरसागर जी महाराज को प्रदान कर घोषणा पत्र लिखवाकर जयपुर (जहां मुनिराज विराजमान थे) पहुंचाया। आचार्य श्री ने 36 दिन की सल्लेखना में केवल 12 दिन जल ग्रहण किया।</p>
<p>18 सितम्बर 1955 को प्रातः 6.50 पर ओम सिद्धोऽहं का ध्यान करते हुए युगप्रवर्तक आचार्यं श्री शांतिसागर जी ने नश्वर देह का त्याग कर दिया। संयम-पथ पर कदम रखते ही आपके जीवन में अनके उपसर्ग आये जिन्हें समता पूर्वक सहन करते हुए आपने शांतिसागर नाम को सार्थक किया।</p>
<p>साधु जीवन में सर्प ,शेर आदि के अनेक उपसर्ग हुए। आचार्यश्री का कहना था कि भय किस बात का? यदि वह पूर्व का बैरी न हो और हमारी ओर से कोई बाधा या आक्रमण न हो तो वह क्यों आक्रमण करेगा? बिना किसी भय के आत्मलीन रहते थे। चींटियों का, मकोड़े का, पागल व्यक्ति द्वारा प्रहार सहित अनेक उपसर्ग आपने शांति के सागर बन कर साम्य भाव से सहन किए। आचार्य श्री ने गृहस्थ अवस्था 18 वर्ष में आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लिया कम उम्र 25 वर्ष में जूते तथा बिस्तर का त्याग कर दिया। 32 वर्ष की आयु में घी-तेल का आजीवन त्याग कर दिया था, उनके नमक, शक्कर, छाछ आदि का भी त्याग था। उन्होंने 35 वर्ष के मुनि जीवन में 27 वर्ष 3 माह 23 दिन उपवास किए। कुल 9938 उपवास किए</p>
<p><strong>अन्नाहार का त्याग</strong></p>
<p>बम्बई सरकार ने हरिजनों के उद्धार के लिए एक हरिजन मंदिर प्रवेश कानून सन् 1947 में बनाया। जिसके बल पर हरिजनों को जबरदस्ती जैन मंदिरों में प्रवेश कराया जाने लगा। जब आचार्य श्री को यह समाचार ज्ञात हुआ तो उन्होंने इसे जैन संस्कृति, जैन धर्म पर आया उपसर्ग जानकर, जब तक यह उपसर्ग दूर नहीं होगा तब तक के लिए अन्नाहार का त्याग कर दिया। आचार्य श्री की श्रद्धा एवं त्याग के परिणाम स्वरूप लगभग तीन वर्ष पश्चात इस कानून को हटा दिया गया। तभी आचार्य श्री ने 1105 दिन के बाद 16 अगस्त 1951 रक्षाबंधन के दिन अन्नाहार को ग्रहण किया। दिल्ली में दिगम्बर मुनियों के उन्मुक्त विहार की सरकारी आज्ञा नहीं थी। अतः 10-20 आदमी हमेशा महाराज के विहार के वक्त साथ ही रहते थे। आचार्य महाराज को चतुर्मास के दो माह व्यतीत होने पर जब यह बात ज्ञात हुई तो महाराज ने स्वयं एक फोटोग्राफर को बुलवाया और ज्ञात समय के पूर्व अकेले ही शहर में निकल गए तथा जामा मस्जिद, लालकिया, इंडिया गेट, संसद भवन आदि प्रमुख स्थानों पर खड़े होकर उन्होंने अपना फोटो खिचवाया। समाज में अपवाद होने लगा कि महाराज को फोटो खिचवाने का शौक है। इस विषय में महाराज से पूछे जाने पर उन्होंने ने कहा-हमारे शरीर की स्थिति तो जीर्ण अधजले काठ के समान है। इसके चित्र की हमें क्या आवश्यकता और वह चित्र हम कहां रखेंगे। श्रावकों का कर्तव्य है कि इन चित्रों को सम्हाल कर रखें। जिससे भविष्य में मुनि विहार की स्वतंत्रता का प्रमाण सिद्ध हो सके। हमारे इस उद्योग से सभी दिगम्बर जैन मुनियों में साहस आएगा, दिगंबर जैनधर्म की प्रभावना होगी। हमारे ऊपर उपसर्ग भी आए तो हमें कोई चिंता नहीं। अच्छे कार्य करते हुए भी यदि अपवाद आये तो उसे सहना मुनि धर्म है न कि उसका प्रतिवाद करना।</p>
<p>आगम ग्रन्थों की सुरक्षा को दृष्टि में रखते हुए आचार्य श्री के आशीर्वाद एवं प्ररेणा से सिद्धांत ग्रंथों को ताम्रपत्र पर उत्कीर्ण कराया गया। अनेकों भव्य आत्माओं ने आचार्य श्री से व्रत-संयम ग्रहण कर अपने जीवन का उद्धार किया।</p>
<p><strong>दीक्षित शिष्य</strong></p>
<p>1 मुनि 26</p>
<p>2 आर्यिका 4</p>
<p>3 ऐलक 16</p>
<p>4 क्षुल्लक 28</p>
<p>5 क्षुल्लिका 14</p>
<p>योग 88</p>
<p><strong>गुरुणा गुरु</strong></p>
<p>श्री सात गोड़ा जी ने सन 1915 में मुनि श्री देवेंद्र कीर्ति जी से क्षुल्लक दीक्षा तथा वर्ष 1920 में मुनि दीक्षा ली थी आप सन 1924 में आपका चतुविद संघ होने से आपको आचार्य बनाया गया आपकी आगम अनुरूप चर्या देख कर दीक्षा गुरु श्री देवेंद्र कीर्ति जी ने आपसे पुनः मुनि दीक्षा ली इस कारण आपको गुरुणा गुरु कहा जाता है। वर्ष 1925 में आप श्री श्रवण बेलगोला महामस्तकाभिषेक में भी शामिल हुए थे।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.shreephaljainnews.com/153_rd_birth_anniversary_of_acharya_shri_shanti_sagar_ji/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>आचार्य श्री शांति सागर जी की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा : भक्ति से शक्ति मिलती है संकल्प शक्ति में बल है </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/pran_pratishtha_of_the_statue_of_acharya_shri_shanti_sagar_ji/</link>
					<comments>https://www.shreephaljainnews.com/pran_pratishtha_of_the_statue_of_acharya_shri_shanti_sagar_ji/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 06 Apr 2025 11:53:58 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Shanti Sagar Ji]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Vardhaman Sagar Ji Maharaj]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Jain]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Sadhu]]></category>
		<category><![CDATA[Gem]]></category>
		<category><![CDATA[indore]]></category>
		<category><![CDATA[jain community]]></category>
		<category><![CDATA[Jain muni]]></category>
		<category><![CDATA[jain news]]></category>
		<category><![CDATA[jain sadhvi]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Society]]></category>
		<category><![CDATA[Metal]]></category>
		<category><![CDATA[Pratima Pran Pratishtha]]></category>
		<category><![CDATA[Shiv Sagar Ji Dharmasagar Ji Ajitsagar Ji]]></category>
		<category><![CDATA[Shriphal Jain News]]></category>
		<category><![CDATA[Stone]]></category>
		<category><![CDATA[Varsha Yoga]]></category>
		<category><![CDATA[Veer Sagar Ji]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री शांति सागर जी]]></category>
		<category><![CDATA[इंदौर]]></category>
		<category><![CDATA[जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन मुनि]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समुदाय]]></category>
		<category><![CDATA[जैन साध्वी]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर जैन]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर साधु]]></category>
		<category><![CDATA[धातु]]></category>
		<category><![CDATA[पाषाण]]></category>
		<category><![CDATA[प्रतिमा प्राण प्रतिष्ठा]]></category>
		<category><![CDATA[रत्न]]></category>
		<category><![CDATA[वर्षायोग]]></category>
		<category><![CDATA[वीरसागर जी]]></category>
		<category><![CDATA[शिवसागर जी धर्मसागर जी अजीतसागर जी]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=78365</guid>

					<description><![CDATA[पाषाण, धातु, रत्न की प्रतिमाओं में गुणों का आरोपण कर पूज्यनीय बनाया जाता हैं। यह देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने दी। उनके सानिध्य में आचार्य श्री शांति सागर जी की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा कर गुणों का आरोपण किया गया। प्रतापगढ़ से पढ़िए यह खबर&#8230; प्रतापगढ़। हमने आपने तीर्थंकर नहीं देखे हैं। हो [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p>पाषाण, धातु, रत्न की प्रतिमाओं में गुणों का आरोपण कर पूज्यनीय बनाया जाता हैं। यह देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने दी। उनके सानिध्य में आचार्य श्री शांति सागर जी की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा कर गुणों का आरोपण किया गया। <span style="color: #ff0000">प्रतापगढ़ से पढ़िए यह खबर&#8230;</span></p>
<hr />
<p>प्रतापगढ़। हमने आपने तीर्थंकर नहीं देखे हैं। हो सकता है कि कुछ प्राणी पूर्व जन्म में उस समय रहे हो। तीर्थंकर के बताए मार्ग पर आज दिगंबर गुरुजन चल रहे हैं। यह गुरु आचार्य श्री शांति सागर जी की कृपा से मिल रहे हैं। तीर्थंकरों के जिनालय, जिनवाणी और श्रमण मार्ग का संरक्षण, सुरक्षित उनके अथक प्रयासों की देन है। आचार्य श्री शांति सागर जी की कृपा दृष्टि है कि उन्होंने अनेक कष्ट सहन कर 1100 दिन से अधिक अन्न आहार का त्याग जिनालय संरक्षण के लिए किया। उस समय सारा देश, सारी समाज, विद्वान एक और थे। सबका कहना था कि शासन से कौन मुकाबला कर सकता है किंतु 1100 दिन 3 वर्ष केवल दूध और पानी ही लिया। अन्य दो रस तो उन्होंने दीक्षा के पूर्व से ही त्याग दिए थे। यह देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी की बिंब प्राण प्रतिष्ठा के बाद धर्म सभा में दी। रविवार को आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज द्वारा आचार्य श्री शांति सागर जी की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा कर गुणों का आरोपण किया गया। राजेश पंचोलिया ने बताया कि आचार्य श्री ने कहा कि प्रतापगढ़ का सौभाग्य है कि आचार्य शांति सागर जी ने वर्ष 1936 में शांतिनाथ तीर्थ में वर्षायोग कर पंचकल्याणक कराया था और यहां पर उन्होंने दीक्षाएं भी दी थी।</p>
<p><strong>दिगंबर अर्थात जिसकी दिशा अंबर है</strong><br />
प्रतापगढ़ का एक दुर्भाग्य रहा कि आचार्य श्री शांति सागर जी द्वारा प्रतिष्ठित 1008 पारसनाथ भगवान की प्रतिमा श्री शांतिनाथ जिनालय में विराजित होनी थी किंतु, कुछ कारणों से वह प्रतिमा संघपति मोतीलाल गेंदल मल जवेरी परिवार ने मुंबई-कालका देवी मार्ग पर स्वयं के निजी भवन आवास को तोड़कर वहां भव्य जिनालय बनाकर उसमें विराजित की। प्रतापगढ़ देश का वह नगर है,जहां आचार्य शांति सागर जी, वीरसागर जी, शिवसागर जी धर्मसागर जी अजीतसागर जी और हमने भी कुछ आचार्य ने मुनि अवस्था में वर्षायोग किया है। दिगंबर अर्थात जिसकी दिशा अंबर है। जो वस्त्र रहित दिगंबर साधु होते हैं। आप सभी को देव शास्त्र गुरु के प्रति भक्ति रखना चाहिए क्योंकि, भक्ति से आनंद है और भक्ति में ही शक्ति मिलती है संकल्प शक्ति में बल है।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.shreephaljainnews.com/pran_pratishtha_of_the_statue_of_acharya_shri_shanti_sagar_ji/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>दीक्षा संस्कार देखने का अवसर 52 जिनालय निर्माण का मानस बनाया: आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने दी मंगल देशना </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/the_opportunity_to_see_the_initiation_ceremony_made_me_think_of_building_52_jain_temples/</link>
					<comments>https://www.shreephaljainnews.com/the_opportunity_to_see_the_initiation_ceremony_made_me_think_of_building_52_jain_temples/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 13 Mar 2025 12:12:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[1024 Arghya]]></category>
		<category><![CDATA[1024 अर्घ्य]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Shanti Sagar Ji]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Vardhman Sagar JI]]></category>
		<category><![CDATA[Daily worship]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Jain]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Sadhu]]></category>
		<category><![CDATA[indore]]></category>
		<category><![CDATA[Initiation Ceremony]]></category>
		<category><![CDATA[jain community]]></category>
		<category><![CDATA[Jain muni]]></category>
		<category><![CDATA[jain news]]></category>
		<category><![CDATA[jain sadhvi]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Society]]></category>
		<category><![CDATA[Mangal Deshan]]></category>
		<category><![CDATA[Naimatrik Worship]]></category>
		<category><![CDATA[Rites of Jainism]]></category>
		<category><![CDATA[Shriphal Jain News]]></category>
		<category><![CDATA[Siddhachakra Mandal Vidhan]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री शांति सागरजी]]></category>
		<category><![CDATA[इंदौर]]></category>
		<category><![CDATA[जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन मुनि]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समुदाय]]></category>
		<category><![CDATA[जैन साध्वी]]></category>
		<category><![CDATA[जैनत्व के संस्कार]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर जैन]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर साधु]]></category>
		<category><![CDATA[दीक्षा संस्कार]]></category>
		<category><![CDATA[नित्य पूजा]]></category>
		<category><![CDATA[नैमत्रिक पूजा]]></category>
		<category><![CDATA[मंगल देशना]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[सिद्धचक्र मंडल विधान]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=76549</guid>

					<description><![CDATA[सिद्धचक्र मंडल विधान के पूजन अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मंगल देशना प्रकट की। प्रतिदिन धार्मिक अनुष्ठान क्रियाएं हो रही हैं। जैनत्व के संस्कार शिशुओं में मंत्रोच्चार विधिपूर्वक संघ सानिध्य में किए जाएंगे। 14 मार्च को सुबह श्रीजी के पंचामृत अभिषेक के बाद आचार्य श्री की मंगल देशना के बाद विश्व शांति [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>सिद्धचक्र मंडल विधान के पूजन अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मंगल देशना प्रकट की। प्रतिदिन धार्मिक अनुष्ठान क्रियाएं हो रही हैं। जैनत्व के संस्कार शिशुओं में मंत्रोच्चार विधिपूर्वक संघ सानिध्य में किए जाएंगे। 14 मार्च को सुबह श्रीजी के पंचामृत अभिषेक के बाद आचार्य श्री की मंगल देशना के बाद विश्व शांति के लिए महायज्ञ हवन होगा। <span style="color: #ff0000">धरियावद से पढ़िए राजेश पंचोलिया की खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>धरियावद।</strong> शास्त्रों में श्रावक के 6 प्रमुख कर्तव्य बताए गए हैं। जिसमें दान और पूजा मुख्य हैं। पूजा दो प्रकार की होती है। नित्य पूजा और नैमत्रिक पूजा। इस पूजा के अंतर्गत बड़े-बड़े विधानों की पूजन की जाती है। इससे पुण्य की प्राप्ति होती है। आज सिद्धचक्र मंडल विधान में आप 1024 अर्घ्य चढ़ाएंगे। यह मंगल देशना सिद्धचक्र मंडल विधान के पूजन अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रकट की। आचार्य श्री ने कहा कि पूजन करते समय प्रमाद आलस्य नहीं करना चाहिए क्योंकि,जिनकी हम पूजा कर रहे हैं। उस पूजन में उनके गुणों का वर्णन किया जाता है। सिद्ध भगवान के अनंतानंत गुणों की पूजन करते हुए एक दिन स्वयं भी पूज्य बन सकते हैं। इसलिए धार्मिक विधान में पूजन मनोभाव भक्ति से करना चाहिए। इससे पुण्य की प्राप्ति होती है। हमने नगर प्रवेश के समय कहा था कि धार्मिक महोत्सव प्रारंभ हो गए। प्रतिदिन धार्मिक अनुष्ठान क्रियाएं हो रही हैं। सिद्धचक्र मंडल विधान के पूजन का आयोजन आपने किया। 52 जिनालय निर्माण का मानस बनाया। दीक्षा संस्कार देखने का आपको अवसर मिला। अब आगामी दिन में जिन बच्चों का जन्म पिछली होली से इस होली के मध्य हुआ है। उनमें भी जैनत्व के संस्कार शिशुओं में मंत्रोच्चार विधिपूर्वक संघ सानिध्य में किए जाएंगे।</p>
<p><strong>आचार्य श्री शांति सागरजी का आचार्य पद शताब्दी महोत्सव</strong></p>
<p>आगम में श्रावकों की 53 संस्कार क्रियाएं बताई गई हैं। जिसमें छोटे बच्चों को नवजात शिशुओं को भी जैनत्व के संस्कार दिए जाते हैं। आज का दिन श्रमण परंपरा के लिए बहुत बड़ा दिन है क्योंकि आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज का आचार्य पद शताब्दी महोत्सव पूरे वर्ष भर मनाया जा रहा है। आज के ही दिन फागुन शुक्ल चतुर्दशी को सन 1920 में अपने यरनाल में पंचकल्याणक के अवसर पर मुनि दीक्षा अंगीकार की थी। जिस समय अपने दीक्षा ली थी मुनि धर्म बताने वाला मूलाचार ग्रंथ का प्रकाशन नहीं हुआ था लेकिन, आप में पूर्व जन्म में मुनि दीक्षा लेने के संस्कार थे। जिसके कारण अपने आगम अनुरूप मुनि धर्मचर्या का पालन किया। आपने अपने साधु जीवन में जैन धर्म, जैन मंदिरों, सरस्वती जिनवाणी की रक्षा के लिए अपने प्राणों जीवन की परवाह नहीं की। जिन मंदिर के संरक्षण के लिए 1 हजार105 दिनों तक अन्न आहार का त्यागकर एक आदर्श स्थापित किया। आपके साधु जीवन में आप पर अनेक उपसर्ग आए। आपने 9 हजार 938 उपवास,18 करोड़ मंत्रों का जाप किया।</p>
<p><strong>जैनत्व के संस्कार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी देंगे</strong></p>
<p>पंडित हंसमुख शास्त्री ने बताया कि आचार्य श्री शांति सागर जी की मूल बाल ब्रह्मचारी निर्दाेष अक्षुण्ण परंपरा का पालन वर्तमान में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी विश्वस्तरीय धर्म प्रभावना के साथ कर रहे हैं। प्रतिष्ठाचार्य हंसमुख जी ने बताया कि हमें मुनि श्री महोत्सव सागर जी और मुनि श्री उत्सव सागर जी की 8 दिवसीय उपवास तथा श्राविका तारा जैन अहमदाबाद की 8 दिन उपवास की अनुमोदना का पुण्य अवसर मिला। 14 मार्च को सुबह श्रीजी के पंचामृत अभिषेक के बाद आचार्य श्री की मंगल देशना के बाद विश्व शांति के लिए महायज्ञ हवन होगा। दोपहर को 1 वर्ष के बालक-बालिकाओं में जैनत्व के संस्कार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी मंत्रोच्चार से देंगे।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.shreephaljainnews.com/the_opportunity_to_see_the_initiation_ceremony_made_me_think_of_building_52_jain_temples/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>साधु के जन्म और समाधि का मनाया जाता है मंगल महोत्सव मनुष्य जीवन की सार्थकता होती है संयम धारण करने से  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/mangal_mahotsav_is_celebrated_to_mark_the_birth_and_samadhi_of_a_saint/</link>
					<comments>https://www.shreephaljainnews.com/mangal_mahotsav_is_celebrated_to_mark_the_birth_and_samadhi_of_a_saint/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 28 May 2024 15:35:43 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Shanti Sagar Ji]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Shivsagar Ji]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Vardhaman Sagar Ji]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Veer Sagar Ji]]></category>
		<category><![CDATA[Chaturmas]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Jain]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Sadhu]]></category>
		<category><![CDATA[discourse]]></category>
		<category><![CDATA[jain community]]></category>
		<category><![CDATA[Jain muni]]></category>
		<category><![CDATA[jain news]]></category>
		<category><![CDATA[jain sadhvi]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Society]]></category>
		<category><![CDATA[Lunawa श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[Muni Shri Gun Sagar Ji Maharaj]]></category>
		<category><![CDATA[religious meeting]]></category>
		<category><![CDATA[shreephal jain news]]></category>
		<category><![CDATA[Shri Chidanand Sagar Ji]]></category>
		<category><![CDATA[Shri Dharam Sagar Ji Maharaj]]></category>
		<category><![CDATA[Shri Sammed Shikhar]]></category>
		<category><![CDATA[Shri Shrutsagar Ji Maharaj Banswara]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री वीर सागर जी]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री शांति सागर जी]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री शिवसागर जी]]></category>
		<category><![CDATA[चातुर्मास]]></category>
		<category><![CDATA[जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन मुनि]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समुदाय]]></category>
		<category><![CDATA[जैन साध्वी]]></category>
		<category><![CDATA[जैन सोसायटी]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर जैन]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर साधु]]></category>
		<category><![CDATA[धर्मसभा]]></category>
		<category><![CDATA[प्रवचन]]></category>
		<category><![CDATA[मुनि श्री गुण सागर जी महाराज]]></category>
		<category><![CDATA[लूणवा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री चिदानंद सागर जी]]></category>
		<category><![CDATA[श्री धर्म सागर जी महाराज]]></category>
		<category><![CDATA[श्री श्रुतसागर जी महाराज  बांसवाड़ा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री सम्मेद शिखर]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=61288</guid>

					<description><![CDATA[महापुरुषों और महान आत्माओं का जीवन और समाधिमरण मंगलकारी होता है आज के दिन आचार्य श्री वीर सागर जी से दीक्षित हमारे शिक्षा गुरु आचार्य कल्प श्री श्रुतसागर जी महाराज का समाधि दिवस है ।इन्होनें सही मायने में श्रुत जिनवाणी के सागर में रह कर नाम और साधु जीवन को सार्थक किया ।संसारी प्राणी जन्म [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>महापुरुषों और महान आत्माओं का जीवन और समाधिमरण मंगलकारी होता है आज के दिन आचार्य श्री वीर सागर जी से दीक्षित हमारे शिक्षा गुरु आचार्य कल्प श्री श्रुतसागर जी महाराज का समाधि दिवस है ।इन्होनें सही मायने में श्रुत जिनवाणी के सागर में रह कर नाम और साधु जीवन को सार्थक किया ।संसारी प्राणी जन्म का महोत्सव मनाते हैं । किंतु महान आत्माओं , महापुरुषों का संयम दीक्षा लेकर जन्म और मृत्यु दोनों का मंगल महोत्सव मनाया जाता हैं।यह मंगल देशना बांसवाड़ा की धर्म सभा में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने विनयांजलि सभा में प्रकट किए। <span style="color: #ff0000">पढि़ए विशेष रिपोर्ट ……</span></strong></p>
<hr />
<p>महापुरुषों और महान आत्माओं का जीवन और समाधिमरण मंगलकारी होता है आज के दिन आचार्य श्री वीर सागर जी से दीक्षित हमारे शिक्षा गुरु आचार्य कल्प श्री श्रुतसागर जी महाराज का समाधि दिवस है ।इन्होनें सही मायने में श्रुत जिनवाणी के सागर में रह कर नाम और साधु जीवन को सार्थक किया ।संसारी प्राणी जन्म का महोत्सव मनाते हैं । किंतु महान आत्माओं , महापुरुषों का संयम दीक्षा लेकर जन्म और मृत्यु दोनों का मंगल महोत्सव मनाया जाता हैं।</p>
<p>यह मंगल देशना बांसवाड़ा की धर्म सभा में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने विनयांजलि सभा में प्रकट किए। आचार्य श्री ने शिक्षा गुरु आचार्य कल्प श्री श्रुत सागर जी की गृहस्थ अवस्था का एक संस्मरण बताया कि फागुलाल दोस्तों के साथ श्री सम्मेद शिखर की यात्रा करने गए। शिखर जी में पारसनाथ भगवान की टोक स्वर्ण कूट पर सभी ने अपनी मनोकामना कागज पर लिखकर रखी ,कुछ ने दीवार पर अंकित की ,दोस्तों के कहने पर फागुलाल ने भी अपनी इच्छा पेंसिल से दीवार पर लिखी कि मेरा सर्वनाश हो जाए। दोस्तों के चकित होकर पूछने पर सहजता से फागुलाल ने कहा कि यह जीवन शाश्वत स्थाई नहीं है। आत्म तत्व तभी प्राप्त होगा ,जब हम गृहस्थ अवस्था में नहीं रहेंगे और संयम दीक्षा धारण करेंगे। मैंने संयम दीक्षा धारण करने की कामना की है ।फाल्गुन माह में जन्म होने के कारण आपका नाम फागुलाल रखा गया। ओसवाल समाज के बीकानेर में इनका जन्म हुआ। किंतु व्यापार -व्यवसाय कोलकाता में किया। गज्जू देवी, छोगालाल के पुत्र फागुलाल का जन्म विक्रम संवत 1962 एवं सन् 1905 में हुआ। बसंती देवी के साथ विवाह के पश्चात आपके तीन पुत्र और तीन पुत्री हुए। इन्होने 1954 में क्षुल्लक दीक्षा धारण की तब छोटी पुत्री सुशीला की उम्र मात्र 7 वर्ष की थी ।वर्तमान मेंआर्यिका श्री श्रुतमति राजस्थान में धर्म प्रभावना कर रही है ।आपकी पत्नी ने भी मुनि श्री गुण सागर जी महाराज से आर्यिका दीक्षा धारण की थी।</p>
<p><strong>धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने का मिला सौभाग्य </strong></p>
<p>हिमांशु एवं राजेश पंचोलिया अनुसार आप प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज के प्रथम मुनि शिष्य आचार्य श्री वीर सागर जी से काफी प्रभावित रहे ।इन्होने 7 प्रतिमा एवं गृह त्याग का नियम वर्ष 1954 में लिया । सन् 1954 में ही आपने कार्तिक कृष्ण तेरस को क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण की। आपका नाम श्री चिदानंद सागर जी रखा गया। आप स्वाध्याय करते हुए मुनि दीक्षा के लिए निवेदन करते रहे, क्योंकि मनुष्य जीवन की सार्थकता संयम धारण करने से होती है। आपने सन् 1957 भाद्पद सुदी तीज को आचार्य वीर सागर जी महाराज से मुनि दीक्षा धारण कर मुनि श्री श्रुत सागर जी हुए ।आप आचार्य वीर सागर जी महाराज के अंतिम मुनि शिष्य रहे।हमें भी यह सौभाग्य प्राप्त हुआ कि जब हमने सन 1968 में आचार्य श्री शिवसागर जी के संघ में प्रवेश किया ।तब हमें आपके चरण सानिध्य में शिक्षा, धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने का सौभाग्य मिला। जयपुर खनिया जी में आचार्य शिवसागर जी के सानिध्य में तत्व चर्चा जैन धर्म के ही विभिन्न शाखों के मध्य हुई ।जिसमें सभी पक्ष के विद्वानों ने आचार्य शिवसागर जी महाराज की निष्पक्षता की प्रशंसा की।आपने आचार्य श्री धर्म सागर जी महाराज से 27 अप्रैल 1976 को 12 वर्ष की नियम सल्लेखना धारण की।जयेष्ट माह की भीषण गर्मी में लूणवा जो की बालू रेत का रेगिस्तान है। वहां पर आठ उपवास पूर्ण कर 9 वें दिन आपकी समाधि ज्येष्ठ कृष्ण पंचमी 6 मई सन् 1988 को हुई।इस अवसर पर समाज द्वारा आचार्य संघ सानिध्य में विशेष पूजन किया गया।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.shreephaljainnews.com/mangal_mahotsav_is_celebrated_to_mark_the_birth_and_samadhi_of_a_saint/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
	</channel>
</rss>
