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	<title>Acharya Shri Samay Sagar Maharaj श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : शुभ उपयोग रहते हुए भी विषयों की ओर दृष्टि जाती है &#8211; आचार्य श्री समयसागर जी महाराज </title>
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					<description><![CDATA[ आचार्य श्री समयसागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि उपादेयभूत पदार्थ कौन सा है और येभूत पदार्थ कौन सा है। पढ़ने में तो बहुत कुछ आ रहा है और पहचानने में भी बहुत सारा विषय आ जाता है। बल्कि उसका कोई अंत भी नहीं इसके बावजूद भी ग्रहण करने योग्य जो पदार्थ [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> आचार्य श्री समयसागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि उपादेयभूत पदार्थ कौन सा है और येभूत पदार्थ कौन सा है। पढ़ने में तो बहुत कुछ आ रहा है और पहचानने में भी बहुत सारा विषय आ जाता है। बल्कि उसका कोई अंत भी नहीं इसके बावजूद भी ग्रहण करने योग्य जो पदार्थ हैं उसके प्रति आस्था होते हुए भी उसी और उपयोग हमारा रह नहीं पाता। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुंडलपुर (दमोह)।</strong> सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य परम पूज्य आचार्य श्री समयसागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि उपादेयभूत पदार्थ कौन सा है और येभूत पदार्थ कौन सा है। पढ़ने में तो बहुत कुछ आ रहा है और पहचानने में भी बहुत सारा विषय आ जाता है। बल्कि उसका कोई अंत भी नहीं इसके बावजूद भी ग्रहण करने योग्य जो पदार्थ हैं उसके प्रति आस्था होते हुए भी उसी और उपयोग हमारा रह नहीं पाता। आस्था भी है रुचि भी है इसके बाद भी ऐसा क्यों होता? क्यों होता है? यह पूछो नहीं हो तो रहा है क्यों नहीं पूछता किंतु नहीं चाहते हुए भी उस और बार-बार उपयोग जा रहा है। उपयोग जा नहीं रहा है हम ले जा रहे हैं ।उपयोग स्वयं हम बुद्धि पूर्वक ले जाते हैं।</p>
<p>उस समय वह आस्था क्या काम करती है आस्था का अभाव नहीं शुभ उपयोग का अभाव नहीं सम्यक दर्शन के प्रति पक्षियों का क्षयोपशम अथवा उपशम हो चुका है। मान लो तो शुभ उपयोग हो जाता है किंतु शुभ उपयोग की दशा में भी दशा कुछ अलग ही हो जाती है। आत्मा की क्योंकि क्षयोपशम सम्यक दर्शन का जो काल बताया है वह 66 सागर प्रमाण बताया। 66 सागर तक का सम्यक दर्शन पदार्थ बना रहता है शुभ उपयोग का काल इतना लंबा चौड़ा है क्षयोपशम की अपेक्षा इसके बाद भी शुभउपयोग रहते हुए भी विषयों की ओर दृष्टि जाती है। विषयों की ओर दृष्टि जाने मात्र से अशुभ उपयोग हुआ है ऐसा नहीं कहा गया है।विषयों की ओर दृष्टि जाते हुए भी विषयों के ग्रहण के भाव होते उस समय भी शुभ उपयोग बना रहता है।</p>
<p>शुभ उपयोग का अर्थ है क्षयोपशम भाव है। किंतु उपयोग किस ओर जा रहा है जिसको हमने हेय के रूप में श्रद्धान का विषय बनाया है उसके बाद भी उसको उठाने का भाव जो आ रहा है यह कौन सा भाव है। इसको बोलते औदयिक भाव औदयिक भाव के बिना इच्छा संभव ही नहीं। क्षयोपशम भाव तो बना है ,बना है मान रहे हैं पर वस्तु को ग्रहण करने का भाव जो आ रहा है उस समय क्रोध, मान, माया ,लोभ किसी न किसी एक कषाय का उदय हुआ है और उसी उदय में हम जब भी ग्रहण करते हैं किंतु उदय होते हुए भी ग्रहण हो यह भी अनिवार्य नहीं ।बड़ी विचित्र दशा है सम्यक दर्शन छूट रहा है ऐसा नहीं नहीं छूटते हुए भी दशा दुर्दशा हो रही है आत्मा की ।</p>
<p>ये क्यों? संयम की ओर हमेशा दृष्टि नहीं जाती ।संयम पालन किया जा रहा है लेकिन पालन करते हुए भी फोकस जिसको बोलते हैं उसके ऊपर निर्धारित है। टॉर्च आपके हाथ में किंतु जिस पदार्थ के ऊपर फोकस किया जाता है किया है वह पदार्थ अच्छे तरीके से प्रकाशित होकर के सामने आता है अन्य पदार्थ के ऊपर रिफ्लेक्शन पड़ सकता है फोकस नहीं उसमें ।बड़े बाबा का दर्शन कर रहे उस समय आपकी दृष्टि उनके मुख की ओर है यह फोकस बनाया किंतु बड़े बाबा का पूरा का पूरा चित्र वह प्रतिमा आती है सामने लेकिन वह रिफ्लेक्शन। रिफ्लेक्शन इसी को बोलते हैं। ग्रंथ खोल दिया सारे के सारे अक्षर आ रहे हैं देखने किंतु फोकस जिस ओर किया वही अक्षर पढ़ने में आते हैं अन्य अक्षर गौण हैं। इसमें शुभ उपयोग एक प्रकार से बॉर्डर है ऑफलाइन है। सद्भाव में फोकस आपने किसके ऊपर किया है सारा का सारा उतार चढ़ाव निर्धारित है ।</p>
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		<title> धर्मसभा में दिए प्रवचन :  मोक्ष मार्ग में भी कर्मों का आश्रव निरंतर होता रहता है- आचार्य श्री समयसागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Fri, 21 Jun 2024 08:03:31 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि पाप कर्म की निर्जरा और पुण्य कर्म की निर्जरा इसमें क्रम है। पाप पहले मिटता है। फिर बाद में पुण्य का क्षय होगा। मोक्ष मार्ग में पुण्य बाधक नहीं है। कुछ लोगों की धारणा हो सकती है। स्वाध्यायशील होते हुए अनभिज्ञ रहे [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि पाप कर्म की निर्जरा और पुण्य कर्म की निर्जरा इसमें क्रम है। पाप पहले मिटता है। फिर बाद में पुण्य का क्षय होगा। मोक्ष मार्ग में पुण्य बाधक नहीं है। कुछ लोगों की धारणा हो सकती है। स्वाध्यायशील होते हुए अनभिज्ञ रहे हैं। उन्हें ज्ञात कर लेना चाहिए पाप का क्षय और पुण्य का क्षय करना है, ये दोनों समान हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुंडलपुर दमोह।</strong> सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि शरीर में कर्म के उदय से व्याधि आ जाती है और इसका निष्कासन औषधि उपचार आदि माध्यम से हो जाता है।महत्वपूर्ण यह है बहुत जल्दी वह रोग से मुक्त हो सकता है। रोग आया है, किस द्वार से आया है इसका परीक्षण करना है। यह तो बार-बार व्याधि होती है और औषधि दवाई लेते चले जाते हैं किंतु रोग का निष्कासन इसलिए नहीं होता जिस द्वार से रोग का प्रवेश हो रहा है, वह द्वार बंद नहीं कर पा रहे। दवाई बिल्कुल अच्छी क्वालिटी की दवाई है, डॉक्टर भी अच्छा है दवाई रामबाण है। पथ्य का पालन भी होना भी उसके साथ आवश्यक है।</p>
<p>परहेज नहीं रखेंगे तो रोग बढ़ेगा। औषधि के द्वारा रोग बढ़ रहा है, ऐसा नहीं है। आहार के द्वारा रोग आया है, आहार के अलावा और बहुत सारे निमित्त हो सकते हैं। निमित्तों की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। उसी प्रकार मोक्ष मार्ग में भी कर्मों का आश्रव निरंतर होता रहता है। किंतु वह आश्रव अपने आप आश्रव नहीं होता, अपने आप बंध नहीं होता फिर आश्रव निरोधा संवर सूत्र बनाने की क्या आवश्यकता है। किंतु ऐसा नहीं है। आश्रव होता है वह बुद्धि पूर्वक भी होता है और अबुद्धि पूर्वक भी आश्रव होता है। अबुद्धि पूर्वक जो आश्रव है उसको रोकने का प्रावधान अलग है, उसको पुरुषार्थ के माध्यम से नहीं रोका जाता वह ऑटोमेटिक रुक जाता है, कब रुकता है, कहां रुकता है इसकी चर्चा बाद में करेंगे।अभी बुद्धि पूर्वक जो आश्रव अथवा बंध हो रहा है, उसको रोकना है बिना हेतु संभव नहीं है। बिना हेतु के बंध हो जाए, आचार्य उमा स्वामी सूत्र दे रहे हैं मिथ्या तृष्णा &#8211;कषाय योगा वंध हेतवा -स्पष्ट हुआ बिना कारण के वंध होता नहीं। पहले कारण की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। तो शुभ और अशुभ का आश्रव होता है अथवा पुण्य और पाप का आश्रव होता है तो उसके लिए मन वचन काय की कुछ ऐसी चेष्टाएं हैं जिन चेष्टाओं के माध्यम से पाप का आश्रव होता है और ठीक इसके विपरीत कुछ आत्मगत परिणाम होते जिनके फल स्वरुप पुण्य का भी आश्रव होता है।</p>
<p>तो क्रम है गुरुदेव का कहना है कर्म का जो आश्रव होता है उसकी निर्जरा करनी है। पाप कर्म की निर्जरा और पुण्य कर्म की निर्जरा इसमें क्रम है। पाप पहले मिटता है। फिर बाद में पुण्य का क्षय होगा। मोक्ष मार्ग में पुण्य बाधक नहीं है। कुछ लोगों की धारणा हो सकती है। स्वाध्यायशील होते हुए अनभिज्ञ रहे हैं। उन्हें ज्ञात कर लेना चाहिए पाप का क्षय और पुण्य का क्षय करना है, ये दोनों समान हैं। आगम ग्रन्थों में कुंदकुंद देव ने कहा है कि चाहे लोहे की बेड़ी हो चाहे, स्वर्ण की बेड़ी हो बेड़ी तो बेड़ी है बंधन तो बंधन है। बंधन किसको ईष्ट है। संसार से मुक्त होना चाहता है संसारी प्राणी हम बंधन से मुक्त होना चाहते हैं महाराज। चाहे पाप हो चाहे पुण्य हो, दोनों को एक तराजू में तोल लेते हैं और ठीक नहीं माना जाता। पुण्य और पाप दोनों बेड़ी तो हैं जो संसार में प्रवेश कराता वह सुशील कैसे हो सकता, यह कहा है कुंदकुंद स्वामी ने।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : साधना के लिए कई प्रकार के साधन हुआ करते हैं, जिनसे होता है आत्मा का विकास &#8211; आचार्य श्री समय सागर जी </title>
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		<pubDate>Fri, 21 Jun 2024 08:00:28 +0000</pubDate>
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<hr />
<p><strong>आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि साधना के लिए कई प्रकार के साधन हुआ करते हैं जिनके माध्यम से आत्मा का विकास होता है।कभी-कभी नौकर्मों से बचने के लिए भी उपदेश देते हैं। नौकर्मों से बचने का भाव भी नहीं होना चाहिए क्योंकि जो बचता है वह साधक कमजोर माना जाता है। किसी भी परिस्थिति में तटस्थ भाव के साथ वस्तु का स्वभाव जो दिख रहा है उसका प्रतिकार नहीं करना चाहिए। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुंडलपुर दमोह।</strong> सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि साधना के लिए कई प्रकार के साधन हुआ करते हैं जिनके माध्यम से आत्मा का विकास होता है।कभी-कभी नौकर्मों से बचने के लिए भी उपदेश देते हैं। नौकर्मों से बचने का भाव भी नहीं होना चाहिए क्योंकि जो बचता है वह साधक कमजोर माना जाता है। किसी भी परिस्थिति में तटस्थ भाव के साथ वस्तु का स्वभाव जो दिख रहा है उसका प्रतिकार नहीं करना चाहिए। जो साधक प्रौण होता है वह किसी प्रकार से प्रतिकूलताओं से बचता नहीं बल्कि तटस्थ भाव के साथ रहता है। उस भाव में वह निर्णय करता चला जाता है, प्रतिकार का भाव क्यों? प्रतिकार का भाव जब आता है, उस समय धर्म ध्यान नहीं कर पाता। प्रतिकार और ग्रहण यह दोनों प्रकार के भाव होते हैं। धर्म ध्यान में संभव नहीं है इस प्रकार बड़े-बड़े जो साधक होते हैं।</p>
<p>किसी प्रकार से मन से वचन से काय से प्रतिकार नहीं करते। प्रतिकार यदि करना है तो नौकर्म का प्रतिकार मत करो। क्योंकि नौकर्म के माध्यम से कर्म अपना फल देता है। नौकर्म को कब तक हटाते रहोगे, आप इसी में पूरा समय निकल जाएगा। मान लो स्वाध्याय करने के लिए बैठे हैं, श्रमण और एक दो व्यक्ति आकर के सामने ही बैठ गए डिस्टर्ब हो रहा है उनको हटाओ। उनको हटाते हैं वह चले जाते हैं तो दूसरे चार और आते हैं। उनको हटाओ इसके अपेक्षा से स्वयं हटकर के मान लो अन्यत्र पहुंच गए। वहां पर आकर के बैठ जाते हैं। सुगंध फैलती रहती है तो भ्रमर वही आएंगे, कहां-कहां प्रतिकार करोगे। क्षेत्र से क्षेत्रांतर होने के उपरांत भी सामने जो व्यक्ति है वह भी कुछ चाहता है, वह आएगा। वह आपके लिए बाधक सिद्ध हो सकता है, नहीं भी हो सकता है।</p>
<p>इसलिए अपने को तटस्थ भाव के साथ क्योंकि बहुत अल्प समय बचा है और प्रत्येक व्यक्ति के प्रतिकार करने लग जाते हैं। उससे होना कुछ भी नहीं है। गुरुदेव का यह कहना है चार दीवार के बीच में बैठे हो फिर भी प्रतिकार करना चाहते मान लो कोई श्रमण महाश्रमण है और वह अन्यत्र पहुंच जाए। वहां पर भयानक वन में पहुंच जाए और गुफा में पहुंच जाए। प्रश्न खड़ा होता है गुफा के अंदर क्यों वहां पर भी सुरक्षा का प्रावधान है। शरीर की रक्षा, आत्मा की रक्षा करो। शरीर की क्या रक्षा करना चाहे चार दीवार के बीच रहो, पूरा का पूरा एयर टाइट करके रहो फिर भी परिणमन रुकने वाला नहीं है। समझने के लिए बे मौसम के फल फ्रिज आदि में रखते ताकि वे फल सुरक्षित रहें। ध्यान रखो कहीं भी रखो काल वहां भी विद्यमान है। उसके द्वारा परिणमन वह रुकने वाला नहीं है।</p>
<p>इसलिए हम प्रतिकार करें चाहे ना करें हमारा अंतरंग जो कर्म का उदय करने वाला है, वह फल दे रहा। उस का क्षय करने के लिए इसलिए साधना बताई गई है। नौकर्म से बचने बार-बार प्रयास करता कमजोर साधक ऐसा करता ये मुझे दुख दे रहा है मुझे पीड़ा पहुंचा रहा है। यह मेरा शत्रु है, यह मेरा मित्र है, यह सहयोगी है, यह साधक है, यह मेरे लिए बाधक है। इस प्रकार का जो भाव है इस प्रकार के भाव से कभी भी धर्म ध्यान होने वाला नहीं। चाहे आज विचार कर लो, चाहे चार दिन बाद कर लो, चार साल बाद कर लो, चार भव के बाद कर लो, कुछ भी कर लो रास्ता तो यही है। इसलिए प्रतिकार का भाव हमें नहीं करना।</p>
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