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	<title>Acharya Nirbhaysagar &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>Acharya Nirbhaysagar &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : अनुष्ठानों की सफलता के लिए मन की विशुद्धि आवश्यक &#8211; आचार्य निर्भयसागर </title>
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		<pubDate>Fri, 27 Mar 2026 09:17:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सही समय पर किया गया सही कार्य ही प्रशंसनीय और सराहनीय होता है। किसी भी अनुष्ठान को करते समय मन की विशुद्धि अत्यंत आवश्यक है। यदि मन शुद्ध होगा, तो कार्य की शुद्धि और उसकी सफलता स्वतः सुनिश्चित हो जाती है। उक्त उद्गार जैनाचार्य, वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भयसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर, मुरैना [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सही समय पर किया गया सही कार्य ही प्रशंसनीय और सराहनीय होता है। किसी भी अनुष्ठान को करते समय मन की विशुद्धि अत्यंत आवश्यक है। यदि मन शुद्ध होगा, तो कार्य की शुद्धि और उसकी सफलता स्वतः सुनिश्चित हो जाती है। उक्त उद्गार जैनाचार्य, वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भयसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर, मुरैना में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">पढ़िए मनोज जैन नायक की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> धार्मिक आयोजन और अनुष्ठान आत्मकल्याण की भावना से ओतप्रोत होते हैं। हम सभी को समय-समय पर धार्मिक अनुष्ठान और आयोजन करते रहना चाहिए। जब भी हम कोई धार्मिक अनुष्ठान या आयोजन करते हैं, तब हमारे अंतरंग में एक विशेष प्रकार की सुखद अनुभूति होती है और आत्मकल्याण की भावना उत्पन्न होती है। ऐसे अनुष्ठान पतित से पावन बनने, अंतरंग की शुद्धता, विकारों के नाश, भक्ति एवं आराधना, पुण्य संचय तथा पापों के क्षय के लिए किए जाते हैं। सभी धर्मों में अनुष्ठानों का मूल उद्देश्य यही रहता है। सही समय पर किया गया सही कार्य ही प्रशंसनीय और सराहनीय होता है। किसी भी अनुष्ठान को करते समय मन की विशुद्धि अत्यंत आवश्यक है। यदि मन शुद्ध होगा, तो कार्य की शुद्धि और उसकी सफलता स्वतः सुनिश्चित हो जाती है। उक्त उद्गार जैनाचार्य, वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भयसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर, मुरैना में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।</p>
<p><strong>धर्मसभा का शुभारंभ</strong></p>
<p>धर्मसभा का शुभारंभ मंगलाचरण के साथ हुआ। प्रारंभ में श्रावक श्रेष्ठियों द्वारा पूज्य गुरुदेव का पाद प्रक्षालन कर शास्त्र आदि भेंट किए गए। सभा का संचालन प्रतिष्ठाचार्य पंडित संजय शास्त्री सिहोनिया एवं प्रतिष्ठाचार्य अजय भैयाजी ज्ञापन तमूरा वाले, दमोह ने किया।</p>
<p><strong>आयोजनों में कार्यकर्ताओं की भूमिका</strong></p>
<p>आचार्यश्री ने कार्यकर्ताओं की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कार्यकर्ता को सुझाव के साथ सहयोग भी देना चाहिए तथा एकता बनाए रखना आवश्यक है। समर्पण, उत्साह, संयम और प्रेम से युक्त कार्यकर्ता ही सबके लिए आदर्श बनता है। उन्होंने कहा कि कार्यकर्ताओं में आपसी मेल-मिलाप, सहयोग की भावना तथा एक-दूसरे के कार्य की सराहना करने का भाव होना चाहिए। सच्चा कार्यकर्ता वह है जो पानी में रेत या तेल की तरह न होकर शक्कर की तरह हो। जैसे रेत पानी में डालने पर नीचे बैठ जाती है और तेल ऊपर तैरता है, वैसे कार्यकर्ता नहीं होना चाहिए। बल्कि शक्कर की तरह अपने अस्तित्व की परवाह किए बिना कार्यक्रम में घुलकर मिठास बढ़ाने वाला होना चाहिए।</p>
<p><strong>त्रिदिवसीय भगवान महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव</strong></p>
<p>प्रतिष्ठाचार्य संजय शास्त्री सिहोनिया द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, नगर में विराजमान वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भयसागरजी महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य में भगवान महावीर स्वामी जन्म कल्याणक के अवसर पर त्रिदिवसीय महोत्सव 28 मार्च से 30 मार्च तक हर्षोल्लासपूर्वक मनाया जाएगा।</p>
<p><strong>कार्यक्रमों की रूपरेखा</strong></p>
<p>शनिवार, 28 मार्च</p>
<p>प्रातः श्री जिनेंद्र प्रभु का अभिषेक एवं शांतिधारा के पश्चात आचार्यश्री के मंगल प्रवचन होंगे। तत्पश्चात आचार्य श्री विपुलसागरजी महाराज का अवतरण दिवस मनाया जाएगा। शाम 7 बजे श्री जिनवाणी धर्म जागरण यात्रा बड़े जैन मंदिर से कीर्ति स्तंभ तक पहुंचेगी, जहां 48 दीपकों द्वारा भक्तांबर महामंत्र अर्चना की जाएगी।</p>
<p>रविवार, 29 मार्च</p>
<p>प्रातः 5 बजे प्रभात फेरी नगर भ्रमण, 8 बजे महामंत्र णमोकार पाठ, प्रवचन, आचार्य श्री निर्भयसागरजी का आचार्य पदारोहण दिवस एवं भगवान महावीर स्वामी विधान होगा। सायंकाल इंद्र सभा का आयोजन होगा तथा माता के सोलह स्वप्नों का प्रदर्शन किया जाएगा।</p>
<p>सोमवार, 30 मार्च</p>
<p>प्रातः 7 बजे भव्य श्रीजी की रथयात्रा निकाली जाएगी। इसके पश्चात 11 बजे कलशाभिषेक, 12 बजे सामूहिक वात्सल्य भोज तथा सायंकाल भगवान महावीर स्वामी के पालन झुलाने का कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।</p>
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		<title>आत्मा में उतरने पर ही संसार सागर से पार होना संभव है: आचार्य निर्भयसागर के सानिध्य में त्रिदिवसीय महावीर जन्म कल्याणक 28 मार्च से प्रारंभ </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 Mar 2026 16:34:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्यश्री निर्भयसागरजी महाराज ने श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर मुरैना में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान महावीर स्वामी ने न केवल अपनी आत्मा का कल्याण किया, बल्कि प्रत्येक जीवात्मा के कल्याण का मार्ग भी बताया। मुरैना से पढ़िए,मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; मुरैना। आचार्यश्री निर्भयसागरजी महाराज ने श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्यश्री निर्भयसागरजी महाराज ने श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर मुरैना में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान महावीर स्वामी ने न केवल अपनी आत्मा का कल्याण किया, बल्कि प्रत्येक जीवात्मा के कल्याण का मार्ग भी बताया। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए,मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> आचार्यश्री निर्भयसागरजी महाराज ने श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर मुरैना में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान महावीर स्वामी ने न केवल अपनी आत्मा का कल्याण किया, बल्कि प्रत्येक जीवात्मा के कल्याण का मार्ग भी बताया। अपनी आत्मा की खोज करने के कारण वे सबसे बड़े वैज्ञानिक कहलाए। भगवान बाहर नहीं, हमारे भीतर ही विराजमान हैं। हमारा परमात्मा हमारे अंदर बैठा है, परंतु हम उसे बाहर खोजते हैं, इसी कारण संसार में भटकते रहते हैं। जैसे जल बाहर खोजने से नहीं, बल्कि भूमि के भीतर खोदने से प्राप्त होता है, उसी प्रकार भगवान की प्राप्ति भी अपने अंतर में उतरकर ही संभव है। आचार्यश्री ने कहा कि जिस व्यक्ति पर भक्ति का रंग चढ़ जाता है, वह अंतरंग में उतरने की बात करता है। जो अपनी आत्मा में उतर जाता है, वही संसार सागर से पार हो जाता है। आचार्यश्री ने भगवान महावीर के वचनों को स्पष्ट करते हुए कहाकृ “पहले डूबना सीखो, तब तैरना सीखो”, अर्थात पहले अपने अंतर में उतरना आवश्यक है, तभी संसार से पार होने का मार्ग प्रशस्त होता है।</p>
<p><strong>संतों को नवधा भक्ति पूर्वक आहार कराया जाता है</strong></p>
<p>आचार्यश्री ने त्रिकाल पूजा का महत्व बताते हुए कहा कि प्रथम काल की पूजा प्रातःकाल में मंदिर जाकर जिनेन्द्र भगवान की पूजा है। द्वितीय काल की पूजा मध्यकाल में होती है, जब दिगंबर संतों को नवधा भक्ति पूर्वक आहार कराया जाता है। तृतीय काल की पूजा संध्याकाल में आरती एवं स्वाध्याय के रूप में शास्त्र पूजा है।</p>
<p><strong>समाधि मरण अगले भव को सुधारने की चाबी</strong></p>
<p>आचार्यश्री ने कहा कि घर एक प्रकार से मरघट के समान है, परंतु जब उसमें दिगम्बर मुनि आहार ग्रहण करने आते हैं, तब वही घर मंदिर बन जाता है। जब हम किसी की सेवा और सहयोग करते हैं, तब तीर्थंकर प्रकृति का बंध होता है। संत समाज में आत्मा रूपी वस्त्र को निर्मल करने के लिए धोबी के समान आते हैं। प्रेरक संदेश में आचार्यश्री ने कहा कि जन्म हमारे भाग्य के अनुसार होता है, परंतु मरण हमारे पुरुषार्थ के अनुसार होना चाहिए। समाधि मरण अगले भव को सुधारने की चाबी है।</p>
<p><strong>त्रिदिवसीय भगवान महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव</strong></p>
<p>प्रतिष्ठाचार्य संजय शास्त्री सिहोनिया ने बताया कि नगर में विराजमान आचार्यश्री निर्भयसागरजी महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य में भगवान महावीर स्वामी जन्म कल्याणक के अवसर पर त्रिदिवसीय महोत्सव 28 से 30 मार्च तक हर्षाेल्लास पूर्वक मनाया जाएगा। शनिवार 28 मार्च को प्रातः श्री जिनेन्द्र प्रभु के अभिषेक शांतिधारा पश्चात आचार्यश्री के मंगल प्रवचन होंगे। तत्पश्चात आचार्यश्री विपुलसागर जी महाराज का अवतरण दिवस मनाया जाएगा । शाम 7 बजे श्री जिनवाणी धर्म जागरण यात्रा बड़े जैन मंदिर से कीर्ति स्तंभ पहुंचेगी, वहां पर 48 दीपकों द्वारा भक्तांबर महा अर्चना की जाएगी। रविवार 29 मार्च को प्रातः 5 बजे प्रभात फेरी नगर भ्रमण, 8 बजे महामंत्र णमोकार पाठ, प्रवचन, आचार्य श्री निर्भयसागर आचार्य पदारोहण दिवस एवं भगवान महावीर स्वामी विधान होगा। शाम को इंद्र सभा, माता के सोलह स्वप्न दिखाए जाएंगे। सोमवार 30 मार्च को प्रातः7 बजे भव्य श्री जी की रथयात्रा, 11 बजे कलषाभिषेक, 12 बजे सामूहिक वात्सल्य भोज एवं शाम को भगवान महावीर स्वामी का पालन झुलाने का कार्यक्रम होगा।</p>
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		<title>अच्छे विचार और अच्छी दृष्टि ही करती है आचरण का निर्माण: आचार्य निर्भयसागर’ के बड़े जैन मंदिर में हुए मीठे प्रवचन </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Mar 2026 11:30:05 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भावना भाव नासनी होती है। विचार विचार को पैदा करते हैं, मधुर वाणी मधुर वाणी को पैदा करती है,आचरण आचरण को पैदा करता है,पैसा पैसे को पैदा करता है। इसलिए हमेशा मधुर वाणी बोलना चाहिए। यह उद्गार आचार्यश्री निर्भयसागर जी महाराज ने बड़ा जैन मंदिर मुरैना में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। मुरैना [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भावना भाव नासनी होती है। विचार विचार को पैदा करते हैं, मधुर वाणी मधुर वाणी को पैदा करती है,आचरण आचरण को पैदा करता है,पैसा पैसे को पैदा करता है। इसलिए हमेशा मधुर वाणी बोलना चाहिए। यह उद्गार आचार्यश्री निर्भयसागर जी महाराज ने बड़ा जैन मंदिर मुरैना में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>मुरैना।</strong> भावना भाव नासनी होती है। विचार विचार को पैदा करते हैं, मधुर वाणी मधुर वाणी को पैदा करती है,आचरण आचरण को पैदा करता है,पैसा पैसे को पैदा करता है। इसलिए हमेशा मधुर वाणी बोलना चाहिए। यह उद्गार आचार्यश्री निर्भयसागर जी महाराज ने बड़ा जैन मंदिर मुरैना में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हमें सदैव अच्छा आचरण करना चाहिए और धन अर्जन न्याय नीति से करना चाहिए। गांधी जी ने तीन बंदर बतलाए थे-बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत बोलो लेकिन, भगवान महावीर स्वामी ने दो बातें और कहीं बुरा मत सोचो और बुरा मत करो। यदि इन सिद्धांतों को जीवन में उतार दिया जाए तो नियम से सारे विश्व में शांति हो जाएगी। यदि हमारा देखने का नजरिया खराब हो तो दुनिया का नजारा बदल जाता है। इसलिए हमारी अपनी दृष्टि अच्छी होना चाहिए। विचारों का प्रदूषण उत्पन्न होने पर ही परिवार में समाज में और देश में प्रदूषण फैलता है क्योंकि, विचारों के अनुसार ही हमारा आचरण होता है। अध्यात्म के क्षेत्र में विचारों का विनिमय करना चाहिए। साधु उपदेश के माध्यम से सद विचारों का व्यापार अर्थात विनिमय करते हैं। यह विनिमय आत्मा में शांति प्रदान करता है।</p>
<p><strong>आत्म-ज्ञान के लिए चिंतन रूपी औषधि </strong></p>
<p>आचार्यश्री ने जैन दर्शन में भावना भव नाशिनी के सार को समझाते हुए कहा कि-मन में निरंतर शुभ व वैराग्यपूर्ण विचारों का चिंतन करना, जो जन्म-मरण के चक्र को नष्ट कर मोक्ष प्रदान करता है। यह देहात्म-बुद्धि को कम कर आत्मा को आत्मा में रमाने का मार्ग है। मुख्य रूप से बारह भावनाएं संसार के दुःखों से विरक्ति और आत्म-ज्ञान के लिए चिंतन रूपी औषधि हैं। जिस प्रकार शरीर के लिए औषधि की आवश्यकता होती है, वैसे ही आत्मा के लिए भावनाएं संसार के दुःखों को दूर करने वाली होती हैं। ये भावनाएं मन में छिपे विकारों को नष्ट कर, आत्मा को शुद्ध और निर्मल बनाती हैं। शुभ चिंतन से नए कर्मों का आना रुकता है और पुराने कर्मों का क्षय (निर्जरा) होता है। बाहरी वस्तुओं में सुख खोजने के बजाय, ये भावनाएं आत्मा के निज सुख को पहचानने में सहायक होती हैं।</p>
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		<title>जैन समाज ने की भव्य अगवानी : कमला नगर डी ब्लॉक जैन मंदिर से आचार्य निर्भयसागर ससंघ पहुंचे कर्मयोगी एनक्लेव जैन मंदिर </title>
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		<pubDate>Fri, 16 Feb 2024 16:37:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री निर्भयसागर जी महाराज ससंघ का 16 फरवरी को आगरा के कमलानगर स्थित श्री महावीर दिगम्बर जैन मंदिर से प्रातः 7:00 बजे मंगल विहार कर श्री नेमिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, कर्मयोगी एन्क्लेव, कमला नगर पहुंचे। यहां कर्मयोगी एनक्लेव सकल जैन समाज ने आचार्यसंघ का पाद‌ प्रक्षालन कर भव्य अगवानी की। पढ़िए लवली जैन की [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्य श्री निर्भयसागर जी महाराज ससंघ का 16 फरवरी को आगरा के कमलानगर स्थित श्री महावीर दिगम्बर जैन मंदिर से प्रातः 7:00 बजे मंगल विहार कर श्री नेमिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, कर्मयोगी एन्क्लेव, कमला नगर पहुंचे। यहां कर्मयोगी एनक्लेव सकल जैन समाज ने आचार्यसंघ का पाद‌ प्रक्षालन कर भव्य अगवानी की। <span style="color: #ff0000">पढ़िए लवली जैन की रिपोर्ट&#8230;.</span></strong></p>
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<p><strong>आगरा।</strong> आचार्य श्री निर्भयसागर जी महाराज ससंघ का 16 फरवरी को आगरा के कमलानगर स्थित श्री महावीर दिगम्बर जैन मंदिर से प्रातः 7:00 बजे मंगल विहार कर श्री नेमिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, कर्मयोगी एन्क्लेव, कमला नगर पहुंचे। यहां कर्मयोगी एनक्लेव सकल जैन समाज ने आचार्यसंघ का पाद‌ प्रक्षालन कर भव्य अगवानी की। मंदिर में हुए मंगल प्रवेश के बाद आचार्यश्री ससंघ ने मूलनायक भगवान नेमिनाथ की प्रतिमा एवं सभी प्रतिमाओं के दर्शन किए और फिर मंदिर प्रांगण में धर्मसभा का आयोजन हुआ।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-55824" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/02/IMG-20240216-WA0023.jpg" alt="" width="1280" height="575" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/02/IMG-20240216-WA0023.jpg 1280w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/02/IMG-20240216-WA0023-300x135.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/02/IMG-20240216-WA0023-1024x460.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/02/IMG-20240216-WA0023-768x345.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/02/IMG-20240216-WA0023-990x445.jpg 990w" sizes="(max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /> कर्मयोगी नहीं, धर्मयोगी बनो</strong></p>
<p>आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि कर्मयोगी में आज एक योगी का आगमन हुआ है। एक श्रावक पाप रूपी कर्म करता है और साधक पुण्य रूपी धर्म करता है। इसलिए कर्मयोगी नहीं, धर्मयोगी बनो। संसार के सभी प्राणी कर्म कर रहे हैं और यह जीव भी अनादिकाल से कर्म की खेती कर रहा है। आचार्यश्री ने कहा कि कर्म की खेती करने वालों को पाप रूपी खर-पतवार ही मिलती है पर धर्म की खेती करने वालों को अरिहंत और सिद्ध रूपी फसल मिलती है। उन्होंने कर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि कर्म एक पुरा कर्म, विधाता, भाग्य प्रवृत्ति ये एकार्थवाची शब्द हैं। कर्मभूमि में ही कर्म किए जाते हैं, भोग भूमि में नहीं। इसलिए ही कर्म करके ही भोजन करना चाहिए।</p>
<p>बिना कर्म किए भोजन करने वाले अस्वस्थ होते हैं। मन्दिर और गुरु की संगति पाप धोने और पुण्य का संचय करने के लिए होती है। कर्म दुष्कर्म और सत्कर्म की अपेक्षा से दो प्रकार का भी कहा है। योगी श्रावक को दुष्कर्म से छुडा़कर सत्कर्म में लगाते हैं। जो पापकर्म घर में किया जाता है, वह कर्म मन्दिर में भक्ति आराधना करने से धुल जाता है। पाप कर्म छोड़कर कृति कर्म, चितीकर्म, पूतीकर्म और विनय कर्म करना चाहिए। भगवान के सामने हाथ जोड़ना, सिर झुकाना और बैठकर नमन करना कृति कर्म कहलाता है। बुरे विचारों को छोड़कर चित्त में निर्मल विचारों को लाना चितीकर्म कहलाता है। जल चंदन आदि से भगवान की पूजा करना पूतीकर्म कहलाता है और गुरु के आने पर खड़े होना पीछे चलना, हाथ जोड़ना विनय कर्म कहलाता है। जो व्यक्ति दान और पूजा की क्रिया कटे फटे वस्त्रों से नहीं करना चाहिए। जो इनसे करता है उनके परिवार में अशांति होती है और समाज में कलह होती है। गंदे वस्त्रों को पहनकर पूजा- दान आदि करने से रोग उत्पन्न होते है और जीर्ण-क्षीर्ण वस्त्र पहनकर अभिषेक -पूजा करने से दरिद्रता आती है। आचार्यश्री ससंघ के आगमन पर नगरवासी बड़ी संख्या में कर्मयोगी एनक्लेव स्थित जैन मंदिर पहुंचे और सौभाग्यशाली भक्तों ने आचार्यश्री के समक्ष श्रीफल और शास्त्रभेंट कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया।</p>
<p><strong>ये रहे मौजूद</strong></p>
<p>कर्मयोगी एनक्लेव जैन मंदिर में मंगल प्रवेश से पूर्व आचार्यश्री के ससंघ सानिध्य में डी ब्लॉक कमला नगर के श्री महावीर दिगम्बर जैन मन्दिर में अभिषेक एवं शांतिधारा एवं आचार्यश्री का मंगल उद्बोधन हुआ। श्रीजी की शांतिधारा करने का सौभाग्य प्रदीप जैन पीएनसी, नवीन जैन पीएनसी, प्रमोद जैन आरसीएम को प्राप्त हुआ। मंच संचालन मनोज जैन बाकलीवाल ने किया। इस अवसर पर आगरा दिगम्बर जैन परिषद के अध्यक्ष जगदीश प्रसाद जैन, मनोज जैन बाकलीवाल, अनिल जैन रईस, नरेश जैन, अनिल जैन, शिखरचन्द जैन सिंघई, पवन जैन, सुरेन्द्र जैन पाण्ड्या, राकेश जैन पर्देवाले सहित समस्त ग्रेटर कमला नगर जैन समाज के लोग बड़ी संख्या में मौजूद रहे।</p>
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