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	<title>7 november 24 श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>भगवान तेरे ऊपर तो विश्वास है लेकिन तू कुछ करेगा यह विश्वास मत करना : धर्म सभा में हुए प्रवचन &#8211; निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Fri, 08 Nov 2024 09:41:39 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि तुम जो आयु लेकर आए हो उतने दिन जिंदा रहोगे मत सोचना, तुम पुण्य कमाकर आए हो तो पुण्यात्मा ही बने रहोगे मत सोचना, तुम पापी बन कर आए हो तो पापी ही रहोगे यह भी मत सोचना, महान निकृष्ट से निकृष्ट पाप कर्म [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि तुम जो आयु लेकर आए हो उतने दिन जिंदा रहोगे मत सोचना, तुम पुण्य कमाकर आए हो तो पुण्यात्मा ही बने रहोगे मत सोचना, तुम पापी बन कर आए हो तो पापी ही रहोगे यह भी मत सोचना, महान निकृष्ट से निकृष्ट पाप कर्म उदय में आने वाला पापी जिंदगी को पुण्यमय बना लेता है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की एक रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>कौन क्या कितना कर पाता है यह सब अनियत है। कभी-कभी हमारे द्वारा वह कार्य भी हो जाते हैं जिसको करने की हमें कल्पना भी नहीं थी कि मैं यह कार्य भी करने लायक हूँ और कभी-कभी हम वह कार्य भी नहीं कर पाते हैं जिसके करने की तैयारी हमने की थी, हम पूरे समर्थ भी थे, पुरुषार्थ भी किया लेकिन नहीं कर पाए। क्या नियत करूँ कि मैं यह कर पाऊंगा या नहीं इसलिए क्या कर सकते हो, यह सब अनियत के गवाक्षों से देखो। तुम क्या कर पाओगे, क्या होगा इसको कभी नियत मत मानना। करते समय यह निर्णय मत करना कि यह ही होगा, चलते समय मत सोचना कि हम वही पहुचेंगे, जहाँ हम पहुँचना चाहते हैं।</p>
<p><strong>सैकड़ों उदाहरण शास्त्रों में</strong></p>
<p>तुम जो आयु लेकर आए हो उतने दिन जिंदा रहोगे मत सोचना, तुम पुण्य कमाकर आए हो तो पुण्यात्मा ही बने रहोगे मत सोचना, तुम पापी बन कर आए हो तो पापी ही रहोगे यह भी मत सोचना, महान निकृष्ट से निकृष्ट पाप कर्म उदय में आने वाला पापी जिंदगी को पुण्यमय बना लेता है। ऐसे सैकड़ों उदाहरण शास्त्रों में हैं, जो जन्म-जन्म के पापी हैं, पाप करते हुए मरे हैं, पाप करते हुए आये हैं लेकिन उसके बाबजूद भी सातवें नरक का नारकी महान पाप करके चांडाल कुल में जन्म लिया लेकिन वो सबसे बड़ा पुण्यात्मा बन गया। बुरे कर्म के उदय आने पर घबराओ मत, बुरे कर्म के उदय आने पर तुम बुरे ही हो, ऐसा मत समझना। पाप कर्म का उदय है लेकिन तुम पापी हो ऐसा मत समझना। पाप कर्म के उदय में भी तुम श्रेष्ठ पुण्यात्मा बन सकते हो। कोई जन्म जन्म का पुण्यात्मा हो और पुण्यकर्म का उदय हो तो वह भी सबसे बड़ा पापी हो सकता है जैसे मारीच का जीव। कृत, कारित चीज ये काकताली न्याय है, होगा कि नहीं, हमें पता नहीं। नैगमनय हमारे हाथ में है, ऐसी महान शक्ति है जो सबकुछ नियत कर सकती है, इसलिए हम क्या कर पाएंगे, इस चक्कर में मत पड़ो, क्या होगा यह टेंशन मत पा लो।</p>
<p><strong>मंत्र पर विश्वास करना, मंत्र कुछ कर देगा, इस पर विश्वास मत करना</strong></p>
<p>आज तुम्हारा धर्म क्यों डगमगा रहा है क्योंकि तुमने हर वस्तु पर विश्वास कर लिया यह होगा ही, हमें विश्वास है कि हमने भगवान का अभिषेक किया है तो हमारा काम होगा। तुम उतनी ही तेजी से बुराई करोगे जितना तुम भगवान को पूज रहे हो क्योंकि तुम भगवान के प्रति आशान्वित हो गए हो। तुम्हारा भविष्य बहुत खतरे में है क्योंकि जो तुमने निर्णय किया है कि ऐसा होगा ही, वैसा होगा ये कोई नियम नहीं। भगवान भी किसी कृत को नियत नहीं कर सकते। भगवान तेरे ऊपर तो विश्वास है लेकिन तू कुछ करेगा यह विश्वास मत करना। मंत्र पर विश्वास करना मंत्र कुछ कर देगा, इस पर विश्वास मत करना।</p>
<p>कई बार मन में भाव आता है कि मैं जो प्राप्त करना चाहता हूँ, प्राप्त कर ही नहीं पा रहा हूँ तो मन खिन्न हो जाता है, अब आनंद देता हूँ मुनि बनते ही तुम्हें क्या हो रहा है क्या होगा यह विकल्प छोड़ दो, मुनि बनने से तुम कितने पापों से बच गए हो बस इतना सा थोड़ी देर के लिए ध्यान कर लो। क्या प्राप्त कर पाये, इसमें तो बहुत क्लेश होता है। प्रवचन सुनाने आए हो, कुछ मिला नहीं, कुछ समझ में आया नहीं, समय खराब हो गया आपको क्लेश हो गया, आप पूरे प्रवचन को किरकिरा कर दोगे। बताओ जिनवाणी से तुम्हारा समय खराब हो गया, इसी से हम निधत्त निकाचित कर्मों का बन्ध करते हैं। मुनि बनकर ये भाव आ जाये मुनि बनकर कुछ नही मिला, मुनि पद का इतना अपमान, हम मुनि बनना तो छोड़ो, मुनि के दर्शन तक को तरस जाएंगे।</p>
<p><strong>जिंदगी भर की पूजा का पुण्य ज्यादा है</strong></p>
<p>हम गुणों से प्रभावित होकर आते हैं और जो नहीं पाते हैं तो हम अनमोल को निर्मूल कर देते हैं। तुमने जिंदगी भर भगवान को माना हो और अंत में कह दो कि सब बेकार है, इस शब्द का पाप ज्यादा है या जिंदगी भर की पूजा का पुण्य ज्यादा है, वो एक क्षण का पाप निधत्त निकाचित होगा। यदि हमारे गुरु से, माता-पिता से, धर्म से, हमें कष्ट आता है तो उस कष्ट की चिंता मत करना क्योंकि धर्म है और लोभ मत आना नही तो निर्मूल कर दोंगे धर्म को। कुछ कर पाए या ना कर पाए लेकिन अनमोल को निर्मूल मत कर देना। जेल से भागों मत, जेल से छूटकर आओ।</p>
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