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	<title>3 तीर्थंकर &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>3 तीर्थंकर &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>अक्षय तृतीया पर खुलता है कुबेर का भंडार : शांति और समृद्धि लाता है यह पर्व </title>
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		<pubDate>Tue, 14 Apr 2026 08:21:05 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[हस्तिनापुर तीर्थ एक प्राचीन नगरी है। यहां पर जैन धर्म के 3 तीर्थंकरों की जन्मभूमि है। भगवान शांतिनाथ, भगवान कुंथुनाथ एवं भगवान अरहनाथ इन तीन तीर्थंकरों के चार-चार कल्याणकों से पावन एवं पवित्र भूमि है। इसी के साथ अनेक ऐतिहासिक घटनाओं के साथ यह भूमि जुड़ी हुई है। अक्षय तृतीया के अवसर पर आज पढ़िए, [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>हस्तिनापुर तीर्थ एक प्राचीन नगरी है। यहां पर जैन धर्म के 3 तीर्थंकरों की जन्मभूमि है। भगवान शांतिनाथ, भगवान कुंथुनाथ एवं भगवान अरहनाथ इन तीन तीर्थंकरों के चार-चार कल्याणकों से पावन एवं पवित्र भूमि है। इसी के साथ अनेक ऐतिहासिक घटनाओं के साथ यह भूमि जुड़ी हुई है। <span style="color: #ff0000">अक्षय तृतीया के अवसर पर आज पढ़िए, विजयकुमार जैन का विस्तारित आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>हस्तिनापुर तीर्थ एक प्राचीन नगरी है। यहां पर जैन धर्म के 3 तीर्थंकरों की जन्मभूमि है। भगवान शांतिनाथ भगवान कुंथुनाथ एवं भगवान अरहनाथ इन तीन तीर्थंकरों के चार-चार कल्याणकों से पावन एवं पवित्र भूमि है। इसी के साथ अनेक ऐतिहासिक घटनाओं के साथ यह भूमि जुड़ी हुई है। रक्षाबंधन पर्व यही से प्रारंभ हुआ एवं भगवान ऋषभदेव की पारणा भूमि यही है। इसी के साथ भगवान मल्लिनाथ का समवसरण यहां पर आया था। ऐसी अनेक धार्मिक घटनाएं यहां से जुड़ी हुई है। अक्षय तृतीया पर्व का विशेष महत्व है। यहां भगवान ऋषभदेव को एक वर्ष 39 दिन पश्चात् इस हस्तिनापुर नगरी के राजा श्रेयांस ने आहार दे करके दान की प्रथा को प्रारंभ किया। इससे पूर्व लोग ये नहीं जानते थे कि जैन साधु को आहार किस प्रकार दिया जाता है। राजा श्रेयांस एवं उनकी भाई सोमप्रभ को भगवान ऋषभदेव के आने के पूर्व रात्रि में स्वप्न आया, जिस स्वप्न में उन्हें सुमेरूपर्वत का दर्शन किया एवं उस स्वप्न का फल यह था कि ऐसा महापुरुष इस धरती पर आने वाला है। जिसका सुमेरू पर्वत पर इंद्रों द्वार अभिषेक हुआ हो। भगवान ऋषभदेव का दर्शन करते ही उन्हें जाति स्मरण (पूर्वभव की याद) हो गया। जिससे उन्होंने भगवान को नवधा भक्तिपूर्वक पड़गाहन करके इच्छु रस (गन्ने के रस) का आहार दिया। आहार देते ही देवों ने आकाश से पंचाश्चर्य (रत्नों) की वृष्टि की एवं खूब जय-जयकार के साथ भगवान की भक्ति की। भगवान के आहार के प्रताप से वह दिन अक्षय तृतीय के नाम से जाने जाना लगा एवं जिस पात्र से भगवान को आहार दिया गया था। उस दिन उस पात्र में रस समाप्त नहीं हुआ। वह अक्षय हो गया। चक्रवर्ती की पूरी सेना भी उस पात्र से रस पी जाए तब भी रस समाप्त नहीं होता है।</p>
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<p><strong>कैसे मनाते है अक्षय तृतीय पर्व </strong></p>
<p>वर्तमान में देश एवं विदेश में जो भी जैन श्रद्धालुगण रहते हैं। वे वर्षीतप एवं वर्ष में उपवास करते हैं। कोई 6 माह का 3 माह का एवं एक माह का या एक वर्ष का। उन सभी श्रद्धालुओं की मान्यता है कि भगवान ऋषभदेव का एक वर्ष पश्चात् यहां पर पराणा हुआ था। इसलिए इस भूमि को वे अत्यंत ही पावन एवं पवित्र मानते हैं और यहां पर आ करके अपने इष्टमित्रों एवं परिजनों के साथ में आकर के उपवास करने वाले तपसी श्रावक या श्राविका को ढोल बाजे के सााथ में इच्छु रस का पारणा करवाते हैं एवं अपने आपको धन्य मानते हैं। अनेक महीनों पूर्व धर्मशालाओं एवं अनेक व्यवस्थाओं की व्यवस्था एवं बुकिंग करते हैं। ऐसे ही जैन साधु इस भूमि पर आकर के उस दिन इच्छु रस का आहार ग्रहण करते है एवं सारे देश में जैन साधु-साध्वियां जहां भी विराजमान है, वहां पर वह इच्छु रस का ही आहार ग्रहण करते हैं। यह परम्परा अनेकों वर्षों से चली आ रही है।</p>
<p><strong>अक्षय तृतीया का इतिहास</strong></p>
<p>जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से जुड़ा है अक्षय तृतीया पर्व का इतिहास। भगवान ऋषभदेव ने अयोध्या में जन्म लिया एवं प्रयाग की (इलाहाबाद) धरती पर जैनेश्वरी दीक्षा को धारण किया। जो कि इस युग की प्रथम दीक्षा थी क्योंकि, भगवान ऋषभदेव वर्तमान चौबीसी के प्रथम तीर्थंकर हैं। दीक्षा को धारण करते ही ध्यान लगा करके भगवान बैठ गए। भगवान के साथ में 4 हजार राजाओं ने दीक्षा ग्रहण की। 6 माह बाद भगवान ऋषभदेव आहारचर्या बतलाने के लिए कि जैन साधुओं को किस प्रकार आहार करना चाहिए। लोगों को इस विधि का ज्ञान हो सके, इसलिए आहार के लिए निकले लोगों को ज्ञान ही नहीं था कि जैन साधुओं को आहार किस प्रकार से करना चाहिए। महायोगी ऋषभदेव जिस ओर कदम रखते थे वहीं के लोग प्रसन्न होकर के बड़े आदर के साथ उन्हें प्रणाम करते थे और कहते थे कि भगवान प्रसन्न हो जाइए। कहिये क्या काम है, कितने ही लोग भगवान के पीछे-पीछे चलने लगते थे, अन्य कितने ही लोग बहुमूल्य रत्नलाकर भगवान के सामने रखकर कहते थे कि हे देव इन रत्नों ग्रहण कर लीजिए और कितने ही लोग अन्य प्रकार के पदार्थ वस्त्र आभूषण, माला, कन्या, भवन, सवारी आदि दिखाकरके कहते थे कि प्रभु इसे ग्रहण कर लीजिए और हमें कृतार्थ कीजिए। तीर्थंकर भगवन अपनी चर्या में विघ्न मान करके आगे बढ़ जाते थे। लोेग निराश होकर के प्रभु की ओर देखते रह जाते थे और सोचते थे कि किस प्रकार से भगवान को उनकी महचाही वस्तु देकर के हम कृतार्थ हो सकें। इस प्रकार से भगवान को 6 महा व्यतीत हो जाते हैं। कुल मिलाकर के 1 वर्ष पूर्ण हो जाता है और महामुनि कुरूजांगल देश के आभूषण ऐसे हस्तिनापुर नगर के समीप पहुंचते हैं।</p>
<p><strong>जैन श्रद्धालु आहार दान की महिमा का वर्णन करते हैं</strong></p>
<p>अक्षय तृतीया का प्राचीन इतिहास हस्तिनापुर तीर्थ से ही प्रारंभ हुआ है। वैशाख सुदी तीज को अक्षय तृतीय के नाम से जाना जाता है। अक्षय का अर्थ है जिस वस्तु का कभी क्षय न हो अर्थात् वस्तु समाप्त न हो और वह महीना वैशाख का था और तिथि तृतीया थी। इसलिए इसका नाम अक्षय तृतीया पड़ा। लोगों का मानना है कि इस दिवस किया जाने वाला कार्य वृद्धि को प्राप्त होता है। भगवान ऋषभदेव को हुए कोड़ा कोड़ी वर्ष (करोड़ों करोड़ों साल) व्यतीत हो गए लेकिन, आज भी अक्षय तृतीया का पर्व मनाने के लिए देश एवं विदेश से जैन श्रद्धालु हस्तिनापुर की धरती पर आते हैं। जैन श्रद्धालु आहार दान की महिमा का वर्णन करते हुए इस पवित्र धरती पर आते हैं। इस पवित्र दिवस का ये महत्व है कि बिना मुहुर्त के ही हजारों विवाह संपन्न होते हैं। अगणित ग्रह प्रवेश आदि मांगलिक कार्य संपन्न किए जाते हैं और इसे सर्वश्रेष्ठ मुर्हूत माना जाता है।</p>
<p><strong>भगवान ऋषभदेव को प्रथम पारणा का रहस्य</strong></p>
<p>हस्तिनापुर नगरी के शासक राजा सोमप्रभ और उनके भाई श्रेयांस कुमार थे। पिछली रात्रि में राजा श्रेयांस को उत्तम-उत्तम 7 स्वप्न दिखाई देते हैं। प्रातः वह अपने स्वप्नों को अपने भाई सोमप्रभ से उन स्वप्नों को बताकर उनका फल पूछते हैं। प्रथम स्वप्न में मैने सुमेरूपर्वत देखा है, दूसरे में एक कल्पवृक्ष देखा है, जिसकी शाखाओं पर आभूषण लटक रहे हैं, तीसरे में सिंह देखा है, चौथे में बैल, पांचवें में सूर्य और चंदमा, छठे में लहरों से सुशोभित समुद्र तथा सातवें में अष्ट मंगल द्रव्यों को हाथों में धारण किये व्यंतर देवों को देखा है। इन स्वप्नों का उत्तम फल जानकरके अति प्रसन्न चित्त हो करके के चिंतन ही कर रहे होते हैं कि तभी सुनने में आता है कि तीर्थंकर ऋषभदेव हस्तिनापुर में प्रवेश कर चुके हैं। चारों ओर भारी जन समुदाय एकत्र होकर के भगवान का दर्शन करता है। उनके चरणों की पूजन करता है।</p>
<p><strong>प्रभु के चरणों में नम्रता पूर्वक नमस्कार करते हैं</strong></p>
<p>कोई कहता है कि अहो बड़े आश्चर्य की बात है कि ये तीन लोक के स्वामी भगवान ऋषभदेव समस्त राज्य वैभव का त्याग कर पूर्ण दिगंबर होकर आज अकेेले ही इस पृथ्वीतल पर विचरण कर रहे हैं। इतने में ही द्वारपाल द्वारा सूचना प्राप्त होती है कि प्रभु समीप में ही पधार चुके है और इधर ही आ रहे हैं। राजा सोमप्रभ और श्रेयांस महल के बाहर आ जाते हैं प्रभु के चरणों में नम्रता पूर्वक नमस्कार करते हैं। इतने में ही राजकुमार श्रेयांस को पूर्वभव का जाति स्मरण हो जाता है कि जब में राजा बज्रजंघ की रानी श्रीमती की पर्याय में मुनियों को दिए गए आहार दान की सारी विधि स्मरण में आ जाती है।</p>
<p><strong>इच्क्षु रस का हुआ पारण, आखा तीज महान</strong></p>
<p>महाप्रभु ऋषभदेव को देखते ही राजा श्रेयांस एवं सोमप्रभ ने हे भगवन् अत्रो-अत्रो, तिष्ठो-तिष्ठो आहार जल शुद्ध है, मन शुद्धि, वचन शुद्धि, काय शुद्धि आहार-जल शुद्ध है मुद्रा छोडिये आहार ग्रहण करिये नवधा भक्ति पूर्वक पड़गाहन कर लेते हैं एवं अष्ट द्रव्य से पूजन कर नमस्कार करते हैं ऐसे निवेदन कर प्रभु से आहार ग्रहण करने हेतु प्रार्थना करते हैं भगवान ऋषभदेव करपात्र में आहार प्रारंभ कर देते हैं, बड़ी भक्ति के साथ राजा श्रेयांस इच्छुरस (गन्ने) का आहार देते हैं। उसी समय आकाश से देवों द्वारा रत्न वृष्टि होने लग जाती है नाना प्रकार सुगंधित पुष्पों की वृष्टि होने लग जाती है। देवता भी धन्य है यह दान धन्य यह पात्र धन्य ये दाता ऐसे शब्दों से आकाश गुंजायमान कर देते हैं एवं देवों द्वारा पांच अतिशय पंचाश्चर्य कहलाते हैं राजा श्रेयांस प्रभु को आहार देने में मग्न हैं देवतागण हर्ष विभोर होकर के पंचाश्चर्य की वृष्टि कर रहे हैं। प्रभु ऋभषदेव आहार करके वन की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। उस दिन सारे नगर में गन्ने के रस का प्रसाद वितरण किया जाता है। लेकिन फिर भी गन्ने का रस समाप्त नहीं होता है। वह अक्षय हो जाता है।</p>
<p>इच्क्षु रस का हुआ पारण, आखा तीज महान।</p>
<p>जय जय ऋषभदेव भगवान, जय जय ऋषभदेव भगवान।।</p>
<p><strong>भरत चक्रवती के द्वारा राजा श्रेयांस को दान तीर्थ की उपाधि</strong></p>
<p>राजा श्रेयांस ने प्रथम आहार दान दिया क्योंकि इस युग के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव थे। तो यह प्रथम आहार था भरत चक्रवर्ती ने अयोध्या से पूरी सेना के साथ हस्तिनापुर आकर के राजा श्रेयांस व सोमप्रभ का खूब सम्मान किया एवं दान तीर्थ प्रवर्तक की उपाधि से उन्हें अलंकृत किया। इससे पूर्व दान देने की प्रथा इस धरती पर नहीं थी इसका शुभांरभ राजा श्रेयांस के द्वारा ही हुआ। तो यह दानवीर भूमि भी कहलाई।</p>
<p><strong>अक्षय हो गई यह भूमि गन्ने की खेती से</strong></p>
<p>तब से लेकर के आज तक ये हस्तिनापुर की धरती के समीप वर्ती क्षेत्रों में इच्क्षुु (गन्ना) खेती खूब पाई जाती है उस दिन से इस धरती पर गन्ने की खेती भी अक्षय हो गई समीपवर्ती सभी क्षेत्रों में गन्ने की खेती होती है एवं ऐसा मानते है कि जैन साधु जहॉं पर भी विराजमान है उनको आज के दिन गन्ने के रस का आहार करवाया जाता है। जो लोग वर्षीय उपवास करते हैं वे पारणा करने के लिए हस्तिनापुर की धरती पर आकर के अपना उपवास समाप्त करके पारणा इच्क्षु रस से करते है और अपने आप को धन्य मानते हैं यह इस भूमि का असीम पुण्य है। अक्षय तृतीय आखा तीज के नाम से भी जाना जाता है।</p>
<p>हस्तिनापुर जम्बूद्वीप स्थल पर जैन समाज की सर्वाेच्च साध्वी गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की पावन प्रेरणा से आहार महल का निर्माण किया गया हैै। जिसमें भगवान ऋषभदेव व राजा श्रेयांस की प्रतिमा विराजमान की गई है। प्रत्येक वर्ष इस प्रतिमा के समक्ष इच्क्षुरस का आहार करवाया जाता है एवं आने वाले भक्त भगवान को आहार देने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं एवं गन्ने के रस का प्रसाद ग्रहण करते हैं। अक्षय तृतीया का पावन पर्व हस्तिनापुर से ही प्रारंभ हुआ है। इसकी पहचान ही हस्तिनापुर से है। तब से लेकर के आज तक करोड़ों वर्ष बीत गये लेकिन, उसी मान्यता को लेकर भक्तगण आज भी इस धरती पर आ करके अक्षय तृतीया के दिन तीर्थ पर विराजमान साधुओं को आहार देकर के अपने जीवन को धन्य मानते है।</p>
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