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	<title>20वें तीर्थंकर भगवान श्री मुनिसुव्रतनाथ &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>भगवान मुनिसुव्रतनाथ का जन्म और तप कल्याणक : तिथि के अनुसार ज्ञान कल्याणक वैशाख कृष्ण दशमी को। इस बार 23 अप्रैल को  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 23 Apr 2025 11:02:48 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर भगवान मुनिसुव्रत नाथ का जन्म और तप कल्याण 23 अप्रैल को मनाया जाएगा। भगवान का जन्म वैशाख कृष्ण नवमी के दिन हुआ था। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में अभिषेक, शांतिधारा आदि कार्यक्रम किए जाएंगे। इस अवसर पर श्रीफल जैन न्यूज की श्रंखला के तहत यह विशेष प्रस्तुति उप संपादक [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर भगवान मुनिसुव्रत नाथ का जन्म और तप कल्याण 23 अप्रैल को मनाया जाएगा। भगवान का जन्म वैशाख कृष्ण नवमी के दिन हुआ था। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में अभिषेक, शांतिधारा आदि कार्यक्रम किए जाएंगे। <span style="color: #ff0000">इस अवसर पर श्रीफल जैन न्यूज की श्रंखला के तहत यह विशेष प्रस्तुति उप संपादक प्रीतम लखवाल के संकलन और संयोजन में पढ़िए&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> 20वें तीर्थंकर भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी जन्म और तप कल्याणक इस बार 23 अप्रैल को मनाया जाएगा। मगध देश में राजगृह नाम का नगर में हरिवंश शिरोमणि, काश्यपगोत्रीय, सुमित्र महाराज राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम सोमा था। श्रावण कृष्ण द्वितीया के दिन श्रवण नक्षत्र में रानी ने प्राणत इंद्र को गर्भ में धारण किया। अनुक्रम से नौ मास के बाद रानी ने वैशाख कृष्ण दशमी के दिन पुत्र रत्न को जन्म दिया। देवों ने भगवान का जन्मोत्सव मनाकर मुनिसुव्रत नाम प्रकट किया। मल्लिनाथ के बाद 54 लाख वर्ष बीत जाने पर इनका जन्म हुआ। इनकी आयु 30 हजार वर्ष थी।</p>
<p><strong>भगवान मुनि सुव्रतनाथ का तप</strong></p>
<p>कुमारकाल के 7 हजार 500 साल बीज जाने पर भगवान का राज्याभिषेक हुआ। राज अवस्था में प्रभु के 15 हजार वर्ष बीत जाने पर किसी दिन गरजती हुई घनघटा के समय उनके याग हस्ती ने वन का स्मरण कर खाना-पीना बंद कर दिया। उस समय महाराज मुनिसुव्रतनाथ अपने अवधि ज्ञान से उस हाथी के मन की सारी बातें जान गए। वे कौतुहल से भरे मनुष्यों के सामने हाथी का पूर्व भव कहने लगे कि यह हाथी पूर्व भव में तालपुर नगर का नरपति राजा था। अपने उच्च कुल के अभियान सहित इसने अशुभलेश्याओं से सहित मिथ्या ज्ञानी, पात्र-अपात्र की परीक्षा से रहित किमिच्छिक दान दिया था। उसके फलस्वरूप यह हाथी हुआ है। इस समय भी यह अपने अज्ञान आदि का स्मरण न करता हुआ वन का स्मरण कर रहा है। इतना सुनते ही उस हाथी को अपने पूर्व भव का ज्ञान हो गया। उसने प्रभु से संयामासंयम ग्रहण कर लिया। इसी निमित्त से प्रभु को वैराग्य हो गया और लौकांतिक देवों द्वारा पूजा को प्राप्त भगवान अपराजित नामक पालकी पर बैठकर नीलवन पहुंचे। वहां बेला के उपवास का नियम लेकर वैशाख कृष्ण दशमी के दिन एक हजार राजाओं के साथ दीक्षित हो गए। उनकी प्रथम पारणा का लाभ राजगृह नगर के राजा वृषभसेन को प्राप्त हुआ था।</p>
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		<title>भगवान मुनिसुव्रतनाथ का ज्ञान कल्याणः तिथि के अनुसार ज्ञान कल्याणक वैशाख कृष्ण नवमी को। इस बार 22 अप्रैल को  </title>
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		<pubDate>Tue, 22 Apr 2025 08:22:37 +0000</pubDate>
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<p><strong>जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर भगवान मुनिसुव्रत नाथ का ज्ञान कल्याण 22 अप्रैल को मनाया जाएगा। भगवान का ज्ञान कल्याण वैशाख कृष्ण नवमी के दिन मनाया जाता है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भक्ति आराधना, अभिषेक, शांतिधारा आदि कार्यक्रम किए जाएंगे। <span style="color: #ff0000">इस अवसर पर श्रीफल जैन न्यूज की श्रंखला के तहत यह विशेष प्रस्तुति उप संपादक प्रीतम लखवाल के संकलन और संयोजन में पढ़िए&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी जैन धर्म के 20वें तीर्थकर थे। उनका ज्ञान कल्याणक इस बार 22 अप्रैल को मनाया जाएगा। उन्होंने जैन धर्म की प्रभावना को भारत वर्ष ही नहीं समूचे विश्व के जैन समाज में पहुंचाई। उनका ज्ञान कल्याणक वैशाख कृष्ण नवमी के दिन मनाया जाता है। उन्हें इस तिथि पर कैवल ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। भरत क्षेत्र के अंग देश के चंपापुर नगर में हरिवर्मा नाम के राजा थे। किसी दिन वहां के उद्यान में अनंतवीर्य नाम के निग्ररंथ मुनिराज पधारे। उनकी वंदना करके राजा ने धर्माेपदेश सुना। तत्क्षण विरक्त होकर अपने बड़े पुत्र को राज्य देकर अनेक राजाओं के साथ संयम धारण किया। उन्होंने गुरु के समागम से 11 अंगों का अध्ययन किया और दर्शनविशुद्धि आदि सोलह कारण भावनाओं का चिंतवन तीर्थंकर गोत्र का बंध किया। चिरकाल तक तपश्चरण करते हुए अंत में समाधिपूर्वक मरण करके प्राणत स्वर्ग में इंद्र हो गए। वहां 20 सागर की आयु थी और उनका साढे़ तीन हाथ लंबा शरीर था।</p>
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		<title>भगवान मुनिसुव्रतनाथ का मोक्ष कल्याण 25 फरवरी को: तिथि से मोक्ष कल्याणक फाल्गुन कृष्ण द्वादशी को आता है </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 25 Feb 2025 03:25:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर भगवान मुनिसुव्रत नाथ का 25 फरवरी मंगलवार यानि फाल्गुन कृष्ण द्वादशी के दिन मोक्ष कल्याणक है। इस दिन दिगंबर जैन जिनालयों में भक्ति भाव से आराधना, अभिषेक, शांतिधारा सहित विधान किए जाएंगे। भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी ने जैन धर्म के पूर्व तीर्थंकरों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए भरत क्षेत्र में [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर भगवान मुनिसुव्रत नाथ का 25 फरवरी मंगलवार यानि फाल्गुन कृष्ण द्वादशी के दिन मोक्ष कल्याणक है। इस दिन दिगंबर जैन जिनालयों में भक्ति भाव से आराधना, अभिषेक, शांतिधारा सहित विधान किए जाएंगे। भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी ने जैन धर्म के पूर्व तीर्थंकरों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए भरत क्षेत्र में विहार कर धर्म प्रभावना कर जैन समाज को धर्म, संयम, नियम आदि के मार्ग पर चलकर मोक्ष का संदेश दिया। इस अवसर पर श्रीफल जैन न्यूज की श्रंखला के तहत <span style="color: #ff0000">यह विशेष प्रस्तुति उप संपादक प्रीतम लखवाल के संकलन और संयोजन में पढ़िए&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर</strong>। भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी जैन धर्म के 20वें तीर्थकर थे। उन्होंने जैन धर्म की प्रभावना को भारत वर्ष ही नहीं समूचे विश्व के जैन समाज में पहुंचाई। उनका मोक्ष कल्याणक फाल्गुन कृष्ण द्वादशी के दिन रात के पिछले भाग में शरीर से रहित अशरीरी सिद्ध हो गए। भगवान एक मास की आयु अवशेष रहने पर विहार बंद करके सम्मेद शिख पर पहुंचे तथा  एक हजार मुनियों के साथ प्रतिमा योग में तीन हो गए। जैन धर्म ग्रंथों के अनुसार प्रभु  के छद्मस्थ अवस्था के 11 महीने बीत जाने के बाद वे उसी नीलवन में पहुंचे और बेला नियम सहित ध्यानारूढ़ हो गए। वैशाख शुक्ल दशमी के दिन श्रवण नक्षत्र में शाम के समय प्रभु को केवल ज्ञान प्रकट हुआ। भगवान के समवसरण में मल्लि को आदि लेकर 10 गणधर थे। 30 हजार  मुनिराज, पुष्पदंता को आदि लेकर 50 हजार आर्यिकाएं, एक लाख श्रावक तथा 3 लाख श्राविकाएं थीं।</p>
<p><strong>भगवान मुनिश्री सुव्रतनाथ का परिचय</strong></p>
<p>भरत क्षेत्र के अंग देश के चंपापुर नगर में हरिवर्मा नाम के राजा थे। किसी दिन वहां के उद्यान में अनंतवीर्य नाम के निग्ररंथ मुनिराज पधारे। उनकी वंदना करके राजा ने धर्मोपदेश सुना। तत्क्षण विरक्त होकर अपने बड़े पुत्र को राज्य देकर अनेक राजाओं के साथ संयम धारण किया। उन्होंने गुरु के समागम से 11 अंगों का अध्ययन किया और दर्शनविशुद्धि आदि सोलह कारण भावनाओं का चिंतवन तीर्थंकर गोत्र का बंध किया। चिरकाल तक तपश्चरण करते हुए अंत में समाधिपूर्वक मरण करके प्राणत स्वर्ग में इंद्र हो गए। वहां 20 सागर की आयु थी और  उनका साढे तीन हाथ उंचा शरीर था।</p>
<p><strong>गर्भ और जन्म </strong></p>
<p>मगध देश में राजगृह नाम का नगर है। उसमें हरिवंश शिरोमणि, काश्यपगोत्रीय, सुमित्र महाराज राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम सोमा था। श्रावण कृष्ण द्वितीया के दिन श्रवण नक्षत्र में रानी ने प्राणत इंद्र को गर्भ में धारण किया। अनुक्रम से नौ मास के बाद रानी ने पुत्र रत्न को जन्म दिया। देवों ने भगवान का जन्मोत्सव मनाकरमुनिसुव्रत नाम प्रकट किया। मल्लिनाथ के बाद 54 लाख वर्ष बीत जाने पर इनका जन्म हुआ। इनकी आयु 30 हजार वर्ष थी।</p>
<p><strong>भगवान मुनिसुव्रतनाथ का तप</strong></p>
<p>कुमारकाल के 7 हजार 500 साल बीज जाने पर भगवान का राज्याभिषेक हुआ। राज अवस्था में प्रभु के 15 हजार वर्ष बीत जाने पर किसी दिन गरजती हुई घनघटा के समय उनके याग हस्ती ने वन का स्मरण कर खाना-पीना बंद कर दिया। उस समय महाराज मुनिसुव्रतनाथ अपने अवधि ज्ञान सेउस हाथी के मन की सारी बातें जान गए। वे कौतुहल से भरे मनुष्यों के सामने हाथी का पूर्व भव कहने लगे कि यह हाथी पूर्व भव में तालपुर नगर का नरपति राजा था। अपने उच्चकुल के अभियान सहित इसने अश्ुभलेश्याओं से सहित मिथ्या ज्ञानी, पात्र-अपात्र की परीक्षा से रहित किमिच्छिक दान दिया था। उसके फलस्वरूप यह हाथी हुआ है। इस समय भी यह अपने अज्ञान आदि का स्मरण न करता हुआ वन का स्मरण कर रहा है। इतना सुनते ही उस हाथी को अपने पूर्व भव का स्मरण हो गया। उसने प्रभु से संयामासंयम ग्रहण कर लिया। इसी निमित्त से प्रभु को वैराग्य हो गया और लौकांतिक देवों द्वारा पूजा को प्राप्त भगवान अपराजित नामक पालकी पर बैठकर नीलवन पहुंचे। वहां बेला के उपवास का नियम लेकर वैशाख कृष्ण दशमी के दिनएक हजार राजाओं के साथ दीक्षित हो गए। उनकी प्रथम पारणा का लाभ राजगृह नगर के राजा वृषभसेन को प्राप्त हुआ था।</p>
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