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	<title>18वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ जी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>18वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ जी का गर्भ कल्याणक 20 को: तिथि के अनुसार फाल्गुन शुक्ल तृतीया को मनाया जा रहा है </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 20 Feb 2026 13:31:18 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 18वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ जी का गर्भ कल्याणक 20 फरवरी को महोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। श्री दिगंबर जैन मंदिरों में श्रद्धा, आस्था और भक्ति के साथ हर्ष और उल्लास के साथ भगवान का यह कल्याणक फाल्गुन शुक्ल तृतीया के दिन मनाया जाता है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 18वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ जी का गर्भ कल्याणक 20 फरवरी को महोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। श्री दिगंबर जैन मंदिरों में श्रद्धा, आस्था और भक्ति के साथ हर्ष और उल्लास के साथ भगवान का यह कल्याणक फाल्गुन शुक्ल तृतीया के दिन मनाया जाता है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 18वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ जी का गर्भ कल्याणक 20 फरवरी को महोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। श्री दिगंबर जैन मंदिरों में श्रद्धा, आस्था और भक्ति के साथ हर्ष और उल्लास के साथ भगवान का यह कल्याणक फाल्गुन शुक्ल तृतीया के दिन मनाया जाता है। इस अवसर पर सभी दिगंबर जैन जिनालयों में भक्तजन श्रद्धा और आस्था के रंग में सराबोर होकर पूजा-अर्चना के कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान अरहनाथ जी के जयकारों से वातावरण भक्ति मय होगा। इस अवसर पर सभी श्रावक-श्राविकाएं भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, अर्घ्य समर्पण आदि करते हैं।</p>
<p>इस बारे में जैन विद्वानों का मत है कि भगवान की पूजा, भक्ति, अभिषेक आदि धार्मिक क्रियाओं का प्रभाव मन वचन काया पर पड़ता है और जीवन का विकास धन से नहीं धर्म से होता है। इस अवसर पर कई मंदिरों में भक्तजन भक्तामर विधान पाठ कर भगवान की आराधना करते हैं। प्रभावना पूर्वक की गई आराधना से मन में अपार शांति का अनुभव होता है। भगवान अरहनाथ जी का गर्भ कल्याणक के बारे जैन धर्मग्रंथों में वर्णित है कि भगवान अरहनाथ ने हस्तिनापुर के राजा सुदर्शन और रानी मित्रसेना के गर्भ में फाल्गुन शुक्ल तृतीया को प्रवेश किया था। वे जैन धर्म के 18वें तीर्थंकर, 7वें चक्रवर्ती और 13वें कामदेव थे। उनका प्रतीक चिन्ह मछली है।</p>
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		<title>बच्चों ने अष्टान्हिका पर्व पर पंचमेरु पूजा, नंदीश्वर द्वीप पूजा की : 18वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ के कैवल्य ज्ञान कल्याणक पर अर्घ्य अर्पित किए </title>
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		<pubDate>Sun, 02 Nov 2025 15:46:01 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दिगंबर जैन पाठशाला के बच्चों द्वारा रविवारीय पूजा में अष्टान्हिका पर्व के दौरान पंच मेरु पूजा, नंदीश्वर द्वीप पूजाएं पढ़कर शांतिपाठ किया गया। आयोजन में 14 बच्चों ने हिस्सा लिया। इससे पूर्व गर्भ गृह में बच्चों ने पार्श्वनाथ भगवान का अभिषेक किया। डडूका से पढ़िए, यह खबर&#8230; डडूका। दिगंबर जैन पाठशाला के बच्चों द्वारा रविवारीय [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दिगंबर जैन पाठशाला के बच्चों द्वारा रविवारीय पूजा में अष्टान्हिका पर्व के दौरान पंच मेरु पूजा, नंदीश्वर द्वीप पूजाएं पढ़कर शांतिपाठ किया गया। आयोजन में 14 बच्चों ने हिस्सा लिया। इससे पूर्व गर्भ गृह में बच्चों ने पार्श्वनाथ भगवान का अभिषेक किया। <span style="color: #ff0000">डडूका से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>डडूका।</strong> दिगंबर जैन पाठशाला के बच्चों द्वारा रविवारीय पूजा में अष्टान्हिका पर्व के दौरान पंच मेरु पूजा, नंदीश्वर द्वीप पूजाएं पढ़कर शांतिपाठ किया गया। आयोजन में 14 बच्चों ने हिस्सा लिया। इससे पूर्व गर्भ गृह में बच्चों ने पार्श्वनाथ भगवान का अभिषेक किया। पाठशाला प्रेरक अजीत कोठिया के निर्देशन में बच्चों ने अष्टान्हिका पर्व के महत्व पर जानकारी ली। अष्टान्हिका पर्व साल में तीन बार क्रमशः कार्तिक, फाल्गुन ओर आषाढ़ मास में मनाए जाते हैं। बच्चों ने आज 18वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ के कैवल्य ज्ञान कल्याणक के अवसर पर उन्हें अर्घ्य समर्पित कर उनका पावन णमोकारमयी स्मरण किया।</p>
<p>तीर्थंकर भगवान अरहनाथ का कैवल्य ज्ञान कल्याणक हस्तिनापुर नगरी में हुआ था। बच्चों ने सामूहिक महाअर्घ्य समर्पण से पूर्व आचार्य विद्यासागर जी, आचार्य समय सागर जी एवं गुरु मां विज्ञानमति माताजी को अर्घ्य समर्पित किए। संचालन अजीत कोठिया ने किया। आभार रियल जैन एवं मानवी सेठ ने किया। इससे पूर्व पाठशाला के छात्र कल्प सुधीर सेठ के जन्म दिन पर पाठशाला डडूका परिवार द्वारा बधाई एवं शुभकामनाएं दी गई।</p>
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		<title>भगवान श्री अरहनाथ जी का मोक्ष कल्याणक: तिथि के अनुसार इस बार यह 29 मार्च को आ रहा है मोक्ष कल्याणक  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 29 Mar 2025 06:14:40 +0000</pubDate>
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<p><strong>जैन धर्म में भगवान अरहनाथ जी जिन्हें अरनाथ जी के नाम से भी जाना जाता है। जिनालयों में इनके अभिषेक और पूजन के साथ भक्तिमय आराधना की जाती है। तीर्थंकर भगवानों में अरनाथ जी 18वें तीर्थंकर और 7वें चक्रवर्ती हैं। उन्होंने चैत्र कृष्ण अमावस के दिन मोक्ष प्राप्त किया था। इस बार यह तिथि के अनुसार 29 मार्च को आ रहा है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रंखला में आज उप संपादक प्रीतम लखवाल के संयोजन में यह प्र्रस्तुति पढ़िए&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म में भगवान अरहनाथ जी जिन्हें अरनाथ जी के नाम से भी जाना जाता है। जिनालयों में इनके अभिषेक और पूजन के साथ भक्तिमय आराधना की जाती है। तीर्थंकर भगवानों में अरनाथ जी 18वें तीर्थंकर और 7वें चक्रवर्ती हैं। उन्होंने चैत्र कृष्ण अमावस के दिन मोक्ष प्राप्त किया था। इस बार यह तिथि के अनुसार 29 मार्च को आ रहा है। भगवान अरनाथ के मोक्ष कल्याणक पर देशभर में दिगंबर जैन मंदिरों में विशेष अनुष्ठान आदि किए जाएंगे। भगवान अरनाथ जी ने समवशरण का निर्माण कर संसार के लोगों को सुंदर देशना देकर राग-द्वेष पर विजय पाने का मूल मंत्र बताया। तीर्थंकर भगवान अरहनाथ जी ने कहा कि इस संसार से कौन बांधता है? राग, द्वेष और अज्ञान। अगर अज्ञान चला जाए तो राग और द्वेष भी चले जाते हैं। इसी तरह अगर राग और द्वेष पूरी तरह से चले जाएं तो अज्ञान भी चला जाता है। कुछ लोगों का अज्ञान पहले चला जाता है तो कुछ लोगों का राग और द्वेष पहले चले जाते हैं। जिनका अज्ञान पहले चला जाता है, उनका राग और द्वेष बहुत आसानी से चला जाता है और उनका मोक्ष मार्ग सरल और छोटा हो जाता है। उन्होंने अपनी देशना में कहा कि ज्ञानी पुरुष के अनुसार आसक्ति की परिभाषा आम आदमी की परिभाषा से अलग है। जब हम आत्मा की स्थिति से ‘मैं शरीर हूं’ की स्थिति में पहुंचते हैं तो उसे आसक्ति कहते हैं। सबसे पहली आसक्ति तो अपने शरीर के प्रति होती है। जब शरीर को ‘मैं’ मान लिया जाता है तो उसी क्षण से अपने आप के प्रति आसक्ति शुरू हो जाती है।</p>
<p><strong>भगवान अरनाथ जी का परिचय</strong></p>
<p>इस जम्बूद्वीप में सीता नदी के उत्तर तट पर एक कच्छ नाम का देश है। उसके क्षेमपुर नगर में धनपति राजा राज्य करता था। किसी दिन उसने अर्हंनंदन तीर्थंकर की दिव्य ध्वनि से धर्मामृत का पान किया। जिससे विरक्त होकर शीघ्र ही जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर ली। ग्यारह अंगरूपी महासागर का पारगामी होकर सोलह कारण भावनाओं द्वारा तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर लिया। अंत में प्रायोपगमन संन्यास द्वारा मरण करके जयंति विमान में अहमिंद्र पद प्राप्त किया।</p>
<p><strong>भगवान का गर्भ और जन्म</strong></p>
<p>इसी भरतक्षेत्र के कुरुजांगल देश में हस्तिनापुर नगरी है। यहां सोमवंश में उत्पन्न हुए काश्यप गोत्रीय राजा सुदर्शन राज्य करते थे। उनकी मित्रसेना नाम की रानी थी। रानी ने रत्नवृष्टि आदि देव सत्कार पाकर फाल्गुन कृष्ण तृतीया के दिन गर्भ में अहमिंद्र के जीव को धारण किया। उसी समय देवों ने आकर गर्भ कल्याणक महोत्सव मनाया। रानी मित्रसेना ने नव मास के बाद मगसिर शुक्ल चतुर्दशी के दिन पुष्य नक्षत्र में पुत्ररत्न को जन्म दिया। देवों ने बालक को सुमेरू पर्वत पर ले जाकर जन्माभिषेक महोत्सव करके भगवान का ‘अरनाथ’ नाम रखा। भगवान की आयु 84 हजार वर्ष की थी। तीस धनुष ऊँचा अर्थात् 130 हाथ ऊँचा शरीर था। सुवर्ण के समान शरीर की कांति थी।</p>
<p><strong>भगवान अरनाथ जी का तप</strong></p>
<p>भगवान के कुमार अवस्था के इक्कीस हजार वर्ष बीत जाने पर उन्हें मंडलेश्वर के योग्य राज्यपद प्राप्त हुआ। इसके बाद इतना ही काल बीत जाने पर चक्रवर्ती पद प्राप्त हुआ। इस तरह भोग भोगते हुए जब आयु का तीसरा भाग बाकी रह गया तब शरद ऋतु के मेघों का अकस्मात् विलय होना देखकर भगवान को वैराग्य हो गया। लौकांतिक देवों द्वारा स्तुत्य भगवान अपने अरविंद कुमार को राज्य देकर देवों द्वारा उठाई हुई ‘वैजयंती’ नाम की पालकी पर सवार होकर सहेतुक वन में पहुंचे। तेला का नियम कर मगसिर शुक्ला दशमी के दिन रेवती नक्षत्र में भगवान ने जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर ली। पारणा के दिन चक्रपुर नगर के अपराजित राजा ने भगवान को आहार दान देकर पंचाश्चर्य प्राप्त किया।</p>
<p><strong>केवल ज्ञान और मोक्ष</strong></p>
<p>जब भगवान के छद्मस्थ अवस्था के सोलह वर्ष बीत गए। तब वे दीक्षावन में कार्तिक शुक्ल दशमी के दिन रेवती नक्षत्र में आम्रवन के नीचे तेला का नियम लेकर विराजमान हुए और घातिया कर्मों का नाशकर केवली बन गए। देवों ने आकर समवसरण की रचना करके केवल ज्ञान की पूजा की। भगवान के समवसरण में 30 गणधर, 50 हजार मुनि, 60 हजार आर्यिकाएं, 1 लाख 60 हजार श्रावक, 3 लाख श्राविकाएं असंख्यात देव-देवियां और संख्यातों तिर्यंच थे। इस तरह बारह सभाओं से घिरे हुए भगवान अरनाथ ने बीस हजार नौ सौ चौरासी वर्ष केवली अवस्था में व्यतीत किए। जब एक माह की आयु शेष रही तब भगवान सम्मेद शिखर पर जाकर प्रतिमायोग से स्थित हो गए। चैत्र कृष्ण अमावस्या के दिन रेवती नक्षत्र में रात्रि के पूर्व भाग में संपूर्ण कर्मों से रहित अशरीरी होकर सिद्धपद को प्राप्त हो गए। तीर्थंकर से पूर्व तीसरे भव में ये भगवान धनपति नाम के राजा थे। दीक्षा लेकर सोलहकारण भावनाओं के बल से तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर लिया था। पुनरू जयंत विमान में अहमिंद्र हुए, वहां से आकर अरनाथ तीर्थंकर हुए हैं। इनका मत्स्य का चिन्ह है। भगवान अरनाथ के भी गर्भ, जन्म, तप और केवल ज्ञान ये चारों कल्याणक हस्तिनापुर नगर में ही हुए हैं।</p>
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