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	<title>14 नवंबर &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>भगवान महावीर का तप कल्याणक 14 नवंबर को: तिथि के अनुसार मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी को मनाया जाता है तप कल्याणक </title>
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		<pubDate>Thu, 13 Nov 2025 12:11:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का तप कल्याण 14 नवंबर को मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी के दिन पूरे धार्मिक उल्लास और पारंपरिक भक्ति के अनुसार मनाया जाएगा। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संशोधित प्रस्तुति&#8230; इंदौर। जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का तप कल्याण 14 नवंबर को मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी के दिन पूरे धार्मिक उल्लास और पारंपरिक भक्ति के अनुसार मनाया जाएगा। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संशोधित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का तप कल्याण 14 नवंबर को मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी के दिन पूरे धार्मिक उल्लास और पारंपरिक भक्ति के अनुसार मनाया जाएगा। मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी के दिन भगवान महावीर ने दीक्षा ग्रहण कर तप आरंभ किया था। इस दिन देश और विदेश के दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान महावीर की विशेष आराधना, पूजन, विधान, अभिषेक, शांतिधारा, पाठ सहित अन्य धार्मिक क्रियाएं की जाएंगी। इंदौर शहर के भी सभी प्रमुख दिगंबर जैन मंदिरों तथा चैत्यालयों में भी तप कल्याणक पूरी आस्था और श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। भगवान महावीर का जन्म करीब ढाई हजार वर्ष पहले (ईसा से 599 वर्ष पूर्व), वैशाली गणराज्य के क्षत्रिय कुंड में क्षत्रिय परिवार हुआ था। 30 वर्ष की आयु में महावीर ने संसार से विरक्त होकर राज वैभव का त्याग कर दिया और संन्यास धारण कर आत्म कल्याण के पथ पर निकल पड़े। 12 वर्षाें की कठिन तपस्या के बाद उन्हें मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी के दिन केवल ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद भगवान महावीर ने समवशरण में ज्ञान का प्रकाश प्रसारित किया।</p>
<p>72 वर्ष की आयु में उन्हें पावापुरी से मोक्ष की प्राप्ति हुई। इस दौरान महावीर स्वामी के कई अनुयायी भी बने। जिसमें उस समय के प्रमुख राजा बिम्बिसार, कुणिक और चेटक भी शामिल थे। जैन समाज महावीर स्वामी के जन्म दिवस को महावीर जयंती तथा उनके मोक्ष दिवस को दीपावली के रूप में धूमधाम से मनाता है। कार्तिक शुक्ल एकम को निर्वाण लाडू चढ़ाया जाता हैं।</p>
<p><strong>तीर्थंकर सभी जीवों को बताते हैं आत्मिक सुख का उपाय </strong></p>
<p>जैन ग्रंथों के अनुसार समय-समय पर धर्म तीर्थ के प्रवर्तन के लिए तीर्थंकरों का जन्म होता है। जो सभी जीवों को आत्मिक सुख प्राप्ति का उपाय बताते हैं। तीर्थंकरों की संख्या चौबीस ही कही गयी है। भगवान महावीर वर्तमान अवसर्पिणी काल की चौबीसी के अंतिम तीर्थंकर थे और हिंसा, पशु बलि, जात-पात का भेद-भाव जिस युग में बढ़ गया, उसी युग में भगवान महावीर का जन्म हुआ। उन्होंने दुनिया को सत्य, अहिंसा का पाठ पढ़ाया। तीर्थंकर महावीर स्वामी ने अहिंसा को सबसे उच्चतम नैतिक गुण बताया। उन्होंने दुनिया को जैन धर्म के पंचशील सिद्धांत बताए। इनमें अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य (अस्तेय),ब्रह्मचर्य हैं। उन्होंने अनेकांतवाद, स्यादवाद और अपरिग्रह जैसे अद्भुत महाव्रती सिद्धांत दिए।</p>
<p><strong>महावीर का आत्मधर्म जगत की प्रत्येक आत्मा के लिए समान </strong></p>
<p>महावीर के सर्वाेदयी तीर्थों में क्षेत्र, काल, समय या जाति की सीमाएं नहीं थीं। भगवान महावीर का आत्मधर्म जगत की प्रत्येक आत्मा के लिए समान था। दुनिया की सभी आत्मा एक-सी हैं, इसलिए हम दूसरों के प्रति वही विचार एवं व्यवहार रखें जो हमें पसंद हो। यही महावीर का ‘जियो और जीने दो’ का सिद्धांत है।</p>
<p><strong>12 वर्ष तक किया था भगवान महावीर ने तप </strong></p>
<p>भगवान महावीर का साधना काल 12 वर्ष का था। दीक्षा लेने के बाद भगवान महावीर ने जिन कल्पी श्रमण की कठिन चर्या को अंगीकार किया। उन्होंने केवल ज्ञान की प्राप्ति भी जिनकल्पी अवस्था में ही की। अपने पूरे साधना काल के दौरान महावीर ने कठिन तपस्या की और मौन रहे। इन वर्षों में उन पर कई उपसर्ग भी हुए, जिनका उल्लेख कई प्राचीन जैन ग्रंथों में मिलता है। जैन ग्रंथों के अनुसार केवल ज्ञान प्राप्ति के बाद भगवान महावीर ने उपदेश दिया। उनके 11 गणधर (मुख्य शिष्य) थे, जिनमें प्रथम इंद्रभूति थे।</p>
<p><strong>भगवान महावीर ने बताए पांच व्रत</strong></p>
<p>सत्य― सत्य के बारे में भगवान महावीर स्वामी कहते हैं, हे पुरुष! तू सत्य को ही सच्चा तत्व समझ। जो बुद्धिमान सत्य की ही आज्ञा में रहता है, वह मृत्यु को तैरकर पार कर जाता है।</p>
<p>अहिंसा- इस लोक में जितने भी त्रस जीव (एक, दो, तीन, चार और पांच इंद्री वाले जीव) है, उनकी हिंसा मत कर, उनको उनके पथ पर जाने से न रोको। उनके प्रति अपने मन में दया का भाव रखो। उनकी रक्षा करो। यही अहिंसा का संदेश भगवान महावीर अपने उपदेशों से हमें देते हैं।</p>
<p>अचौर्य- दूसरे की वस्तु बिना उसके दिए हुए ग्रहण करना जैन ग्रंथों में चोरी कहा गया है।</p>
<p>अपरिग्रह- आवश्यक चीजों का उपयोग ही किया जाए।</p>
<p>ब्रह्मचर्य- महावीर स्वामी ब्रह्मचर्य के बारे में अपने बहुत ही अमूल्य उपदेश देते हैं कि ब्रह्मचर्य उत्तम तपस्या, नियम, ज्ञान, दर्शन, चारित्र, संयम और विनय की जड़ है। तपस्या में ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ तपस्या है। जैन मुनि, जैन साध्वी इन्हें पूर्ण रूप से पालन करते हैं, इसलिए उनके महाव्रत होते हैं और श्रावक, श्राविका इनका एक देश पालन करते हैं, इसलिए उनके अणुव्रत कहे जाते हैं।</p>
<p>क्षमा- क्षमा के बारे में भगवान महावीर कहते हैं-मैं सब जीवों से क्षमा चाहता हूं। जगत के सभी जीवों के प्रति मेरा मैत्री भाव है। मेरा किसी से बैर नहीं है। मैं सच्चे हृदय से धर्म में स्थिर हुआ हूं। सब जीवों से मैं सारे अपराधों की क्षमा मांगता हूं। सब जीवों ने मेरे प्रति जो अपराध किए हैं, उन्हें मैं क्षमा करता हूँ। वे यह भी कहते हैं ‘मैंने अपने मन में जिन-जिन पाप की वृत्तियों का संकल्प किया हो, वचन से जो-जो पाप वृत्तियां प्रकट की हों और शरीर से जो-जो पापवृत्तियां की हों, मेरी वे सभी पापवृत्तियाँ विफल हों। मेरे वे सारे पाप मिथ्या हों।श्</p>
<p>धर्म- धर्म सबसे उत्तम मंगल है। अहिंसा, संयम और तप ही धर्म है। भगवान महावीर जी कहते हैं जो धर्मात्मा है, जिसके मन में सदा धर्म रहता है। उसे देवता भी नमस्कार करते हैं। भगवान महावीर ने अपने प्रवचनों में धर्म, सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, क्षमा पर सबसे अधिक जोर दिया। त्याग और संयम, प्रेम और करुणा, शील और सदाचार ही उनके प्रवचनों का सार था।</p>
<p><strong>‘समाजवाद’ तब तक सार्थक नहीं होगा, जब तक है आर्थिक विषमता </strong></p>
<p>महावीर की अहिंसा केवल सीधे वध को ही हिंसा नहीं मानती है, अपितु मन में किसी के प्रति बुरा विचार भी हिंसा है। वर्तमान युग में प्रचलित नारा ‘समाजवाद’ तब तक सार्थक नहीं होगा, जब तक आर्थिक विषमता रहेगी। एक ओर अथाह पैसा, दूसरी ओर अभाव। इस असमानता की खाई को केवल भगवान महावीर का श्अपरिग्रहश् का सिद्धांत भर सकता है। अपरिग्रह का सिद्धांत कम साधनों में अधिक संतुष्टि पर बल देता है। यह आवश्यकता से ज्यादा रखने की सहमति नहीं देता है।</p>
<p><strong>मुक्ति की सरल और सच्ची राह भी दिखाई</strong></p>
<p>भगवान महावीर के अनुयायी उनके नाम का स्मरण श्रद्धा और भक्ति से करते हैं। उनका यह मानना है कि महावीर ने इस जगत को न केवल मुक्ति का संदेश दिया, अपितु मुक्ति की सरल और सच्ची राह भी दिखाई। भगवान महावीर ने आत्मिक और शाश्वत सुख की प्राप्ति के लिए अहिंसा धर्म का संदेश दिया।</p>
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		<title>धर्मनिष्ठ, व्यवहार कुशल, प्रभावशाली श्री विमल चंद जी जैन पाटनी नहीं रहे : 1 जनवरी 1946 को धर्म प्राण नगरी उज्जैन जिले के परसोली में हुआ था जन्म </title>
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		<pubDate>Tue, 19 Nov 2024 12:43:39 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[धर्मनिष्ठ व्यवहार कुशल प्रभावशाली श्री विमल चंद जी जैन पाटनी का स्वर्गवास अष्टानिका पर्व चतुर्दशी के दिन 14 नवंबर गुरुवार दोपहर 12.30 मिनिट पर हो गया। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट&#8230; कोटा (राजस्थान)। धर्मनिष्ठ व्यवहार कुशल प्रभावशाली श्री विमल चंद जी जैन पाटनी का स्वर्गवास अष्टानिका पर्व चतुर्दशी के दिन 14 नवंबर गुरुवार दोपहर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>धर्मनिष्ठ व्यवहार कुशल प्रभावशाली श्री विमल चंद जी जैन पाटनी का स्वर्गवास अष्टानिका पर्व चतुर्दशी के दिन 14 नवंबर गुरुवार दोपहर 12.30 मिनिट पर हो गया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>कोटा (राजस्थान)।</strong> धर्मनिष्ठ व्यवहार कुशल प्रभावशाली श्री विमल चंद जी जैन पाटनी का स्वर्गवास अष्टानिका पर्व चतुर्दशी के दिन 14 नवंबर गुरुवार दोपहर 12.30 मिनिट पर हो गया। नमोकार महामंत्र, मेरी भावना, तत्वार्थ सूत्र, वैराग्य भावना सुनते हुए उन्होंने अपनी देह का त्याग किया।</p>
<p><strong>व्यवहार कुशल, प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी, धर्मनिष्ठ थे श्री विमल पाटनी जी</strong></p>
<p>मां चर्मण्यवती के पावन तट पर स्थित संपूर्ण भारत में शिक्षा के लिए सुविख्यात शिक्षा की काशी धर्म प्राण नगरी कोटा के देव, शास्त्र, गुरु के परम भक्त, व्यवहार कुशल, प्रभावशाली व्यक्तित्व एवं धर्मनिष्ठ आदरणीय श्रीमान विमल चंद जी पाटनी का जन्म 1 जनवरी 1946 को धर्म प्राण नगरी उज्जैन जिले के परसोली ग्राम में श्रावक श्रेष्ठी श्रीमान केसरीमल जी एवं माताश्री श्रीमती केसर बाई के घर आंगन में हुआ। आदरणीय श्रीमान विमल चन्द जी पाटनी के तीन भाई एवं तीन बहिनों का परिवार है। जो क्रमशः तेज कुमार जी, नेमीचंद जी, बहनें शांति जी टोंग्या, कमला जी लुहाड़िया एवं गुणमाला जी बेनाडा है। विमलजी स्वयं दूसरे नम्बर के सुयोग्य सुपुत्र थे। उनके पुत्र ने बताया कि 16 अगस्त 2022 को ब्रेन पैरालाइसिस अटैक की बीमारी से ग्रसित हो गए थे। तभी से उनके सुपुत्र श्री पारस जी पार्श्वमणि एवं पुत्र वधु सारिका जी ने दिन रात आपकी काफी सेवा सुश्रुषा की। प्रतिदिन उनको नमोकार महामंत्र, मेरी भावना विनय पाठ, भक्तामर पाठ, तत्वार्थ सूत्र वैराग्य भावना इत्यादि प्रतिदिन सुनाते थे।</p>
<p><strong>श्रीमती शांति देवी जी के साथ हुआ शुभ विवाह</strong></p>
<p>आदरणीय श्रीमान विमल चंद जी पाटनी का शुभ विवाह आगर मालवा जिले के तनोडिया ग्राम के श्रावक श्रेष्ठी श्रीमान चम्पा लाल जी बाकलीवाल की सुयोग्य, संस्कारवान सुपुत्री श्रीमती शांति देवी जी के साथ हुआ। आपके एक सुयोग्य सुपुत्र, सर्व श्रेष्ठ संवाददाता, अवॉर्ड विजेता, 35 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र के उल्लेखनीय योगदान दिया। 15 लाख मासूम बच्चों को मांसाहारी होने से बचाया, भाव पूर्ण भजनों की शानदार प्रस्तुति देने वाले श्री पारस जी जैन पार्श्वमणि हैं। जिनका शुभ विवाह बारां कुंजेड़ निवासी श्रावक श्रेष्ठी श्रीमान कैलाश चंद जी-श्रीमती कौशल्या देवी जी की सुयोग्य सद संस्कारों से युक्त सुपुत्री श्रीमती सारिका जी के साथ संपन्न हुआ। अभी हाल ही में राजस्थान की राजधानी गुलाबी नगरी जयपुर में मुख्यमंत्री निवास पर पहली बार सामूहिक क्षमावाणी का भव्य आयोजन किया गया। उस अवसर पर श्री पारस जी जैन पार्श्वमणि को वर्तमान का श्रवण कुमार एवं श्रीमती सारिका जी जैन को सतयुग की नारी की उपाधि से अलंकृत मुख्य मंत्री द्वारा किया गया। अपार जन सैलाब की उपस्थिति में आचार्य शशांक सागर जी महाराज सहित 13 दिगंबर श्वेतांबर संतों के पावन सानिध्य में किया गया। आपकी सुपुत्री श्रीमती ममता जी जैन का शुभ विवाह (अटरु वाले) श्री राजेन्द्र जी अजमेरा के साथ हुआ, जो अभी महावीर नगर द्वितीय में निवास करते हैं। उनकी दो पोत्रियां खुशबू एवं गरिमा जैन है एवं एक नाती प्रबल जैन और एक नातिन चंचल जैन है।</p>
<p><strong>21 साधु-संतों का आशीर्वाद प्राप्त हुआ, समाज जनों ने दी वियनांजलि</strong></p>
<p>हाल ही में उन्होंने दसलक्षण महापर्व पर आठ उपवास एवं दो व्रत किए। उन्हें 21 साधु-संतों का आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ। हम सभी जिनेन्द्र देव के चरणों में निवेदन करते हैं कि दिवंगत आत्मा को शांति एवं सद्गति मिले। उनके परिजनों को इस असहनीय दुःख को सहन करने की शक्ति प्राप्त हो। संचालन जीवंधर सोगानी ने किया। राजकुमार जी टिल्लू झालरापाटन द्वारा रचित विनयांजलि को विवेक जैन ने बहुत ही भावपूर्ण होकर सुनाया। राजमल पाटौदी कोटा, रविंद्र जैन काला बूंदी इंदौर, दिगम्बर जैन समाज के वरिष्ठ समाजसेवी डॉ. जैनेन्द्र जैन ने भी भाव पूर्ण विनियांजलि प्रस्तुत की।</p>
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