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	<title>1024 Arghya &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>1024 Arghya &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>जैन दर्शन में अहिंसा धर्म का पालन ही चातुर्मास है : मुनिराजों ने बड़े जैन मंदिर में किया चातुर्मास प्रतिष्ठापन </title>
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		<pubDate>Wed, 09 Jul 2025 11:20:26 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में विराजमान मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विवोधसागरजी महाराज ने श्री जिनेंद्र भगवान के समक्ष भक्ति एवं निर्जल उपवास करते हुए संकल्प पूर्वक चातुर्मास की स्थापना की। इस अवसर पर सकल दिगंबर जैन समाज मुरैना ने श्रीफल अर्पण करके आशीर्वाद प्राप्त किया। इस दौरान प्रवचन भी हुए। मुरैना से [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में विराजमान मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विवोधसागरजी महाराज ने श्री जिनेंद्र भगवान के समक्ष भक्ति एवं निर्जल उपवास करते हुए संकल्प पूर्वक चातुर्मास की स्थापना की। इस अवसर पर सकल दिगंबर जैन समाज मुरैना ने श्रीफल अर्पण करके आशीर्वाद प्राप्त किया। इस दौरान प्रवचन भी हुए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> मुरैना।</strong> जैन साधु साध्वियां पंच महाव्रत अहिंसा, सत्य, अचौर्य, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य का मन वचन काय से निर्दाेष रूप से पालन करते हैं। अहिंसा महाव्रत का पूर्ण रूपेण पालन हो, इसीलिए जैन साधु, मुनिराज चातुर्मास करते हैं। बरसात के मौसम में असंख्यात सूक्ष्म जीव उत्पन्न होते हैं, जो दिखाई भी नहीं देते। इन्हीं जीवों की रक्षार्थ जैन साधु मुनिराज वर्षा ऋतु के चार माह पद विहार न करते हुए एक ही स्थान पर चार माह आत्म साधना करते हैं। स्व कल्याण के साथ साथ प्राणी मात्र के कल्याण हेतु प्रेरित करते हैं। यह उद्गार मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने बड़े जैन मंदिर में चातुर्मास प्रतिष्ठापन के अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि अहिंसा धर्म का पालन करना ही चातुर्मास का मुख्य उद्देश्य होता है। इन चार माह में सभी साधु साध्वियां पूर्वाचार्यों द्वारा रचित ग्रंथों का स्वाध्याय एवं अध्ययन करते हुए तत्व चिंतन करते हैं। जैन दर्शन में दिगंबर जैन संत संयम की साधना करते हुए कर्मों को नष्ट करने हेतु तप करते हुए भगवान महावीर स्वामी द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों को अंगीकार करते हैं। मुनि श्री ने कहा कि आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी को श्री जिनेंद्र प्रभु की भक्तियों का वाचन कर कायोत्सर्ग कर चातुर्मास का प्रतिष्ठान किया जाता है और कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को चातुर्मास का निष्ठापन किया जाता है। सभी साधु व्रत उपवास कर सिद्ध भक्ति, आचार्य भक्ति आदि के माध्यम से संकल्पित होकर वर्षाकाल के चार माह एक ही स्थान पर रुककर अपने महाव्रतों का पालन करते हैं।</p>
<p><strong>बड़े जैन मंदिर में मुनिराजों ने किया चातुर्मास प्रतिष्ठापन</strong></p>
<p>प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी संजय भैयाजी (मुरैना वाले) ने बताया कि श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में विराजमान आचार्य विद्यासागरजी महाराज से दीक्षित आचार्यश्री आर्जव सागर महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विवोधसागरजी महाराज ने श्री जिनेंद्र भगवान के समक्ष भक्ति एवं निर्जल उपवास करते हुए संकल्प पूर्वक चातुर्मास की स्थापना की। इस अवसर पर सकल दिगंबर जैन समाज मुरैना ने श्रीफल अर्पण करके आशीर्वाद प्राप्त किया और संकल्प किया कि हम सभी आपकी साधना में निष्ठा, समर्पण, भक्ति के साथ सहभागी बनेंगे। युगल मुनिराजों ने सबको आशीर्वाद देते हुए कहा साधु अपनी साधना और अहिंसा धर्म का पालन करने के लिए चातुर्मास किया करते हैं। इसमें श्रावक की एक अहम भूमिका रहती है। साधुओं ने तो आपके यहां चातुर्मास करने का संकल्प ले लिया। अब आपका उत्तरदायित्व है कि साधुओं की चर्या में कोई व्यवधान उत्पन्न न हो, इस हेतु संपूर्ण समाज को एकजुटता के साथ सहभागिता निभाने को दृढ़ संकल्पित होना होगा।</p>
<p><strong>चातुर्मास साधु और श्रावक दोनों के लिए </strong></p>
<p>मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने बताया कि जैन दर्शन में चातुर्मास साधुओं और श्रावकों दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। यह आत्म-सुधार, धार्मिक गतिविधियों में संलग्नता और आध्यात्मिक विकास, अध्यात्म के प्रति पुरुषार्थ करने का समय होता है । भूलवश, अज्ञानतावश, जाने अनजाने में हमसे जो पाप हुए हैं, उनको नष्ट करने हेतु इन चार माह में प्रभु आराधना का समय होता है चातुर्मास । जैन धर्म में चातुर्मास का विशेष महत्व है, जैन साधु एवं श्रावक वर्षा ऋतु के चार महीनों में तप त्याग संयम की साधना के साथ इसे मनाते है। इस दौरान जैन साधु-साध्वी एक ही स्थान पर रुकते हैं और धार्मिक गतिविधियों जैसे-स्वाध्याय, प्रवचन और तपस्या में संलग्न होते हैं। श्रावक (गृहस्थ जैन) भी इस दौरान विशेष रूप से धार्मिक गतिविधियों में भाग लेते हैं, उपवास, प्रतिक्रमण और अन्य धार्मिक कार्यों द्वारा आत्म-सुधार का प्रयास करते हैं। श्रावकों के लिए चातुर्मास आत्म-सुधार और धार्मिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेने का एक महत्वपूर्ण समय होता है। इस समय का सभी को सदुपयोग करते हुए लाभ उठाना चाहिए।</p>
<p><strong>विधान में सिद्धों की भक्ति के साथ 1024 अर्घ्य होंगे समर्पित</strong></p>
<p>बड़े जैन मंदिर में चल रहे आठ दिवसीय सिद्धचक्र महामंडल विधान में सातवें दिन सिद्धों की आराधना करते हुए 512 अर्घ्य समर्पित किए गए। जिसमें पंच परमेष्ठी को स्मरण करते हुए पूजा संपन्न हुई एवं पूज्य युगल मुनिराजों के माध्यम से मंत्रोचार किए गए। गुरुवार को आठवें दिन 1024 अर्घ्य समर्पित करते हुए सिद्ध परमेष्ठि की आराधना पूर्ण होगी। शुक्रवार 11 जुलाई को विश्व शांति महायज्ञ का आयोजन होगा। विश्व शांति एवं कल्याण की भावना के साथ महायज्ञ में आहुति दी जाएगी। महायज्ञ के पश्चात श्री जिनेंद्र प्रभु की भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी। श्री जिनेंद्र प्रभु को पांडुक शिला पर विराजमान कर कलशाभिषेक किए जाएंगे।</p>
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		<title>सिद्धचक्र महामंडल विधान अंतिम दिन धर्ममय : महावीर नगर में अष्टह्निका पर 1024 अर्घ्य अर्पित  </title>
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		<pubDate>Fri, 14 Mar 2025 07:57:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्रीजी की रिद्धि मंत्रों से शांतिधारा की अष्टाहिका पर्व पर 8दिनों में 1024 अर्घ्यों से सिद्ध भगवान की आराधना की गई। अनुष्ठान में श्रीजी की रिद्धि मंत्रों के साथ वृहद शांतिधारा की गई। सिद्धचक्र महामंडल विधान में सिद्धचक्र का ध्यान लगाते हुए ग्रंथों से श्रीपाल भूप को सुख मिला। दाहोद से पढ़िए यह खबर&#8230;  दाहोद। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्रीजी की रिद्धि मंत्रों से शांतिधारा की अष्टाहिका पर्व पर 8दिनों में 1024 अर्घ्यों से सिद्ध भगवान की आराधना की गई। अनुष्ठान में श्रीजी की रिद्धि मंत्रों के साथ वृहद शांतिधारा की गई। सिद्धचक्र महामंडल विधान में सिद्धचक्र का ध्यान लगाते हुए ग्रंथों से श्रीपाल भूप को सुख मिला। <span style="color: #ff9900">दाहोद से पढ़िए यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> दाहोद।</strong> महावीर नगर जैन श्री शांतिनाथ जिनालय के तत्वावधान में अष्टह्निका पर्व फाल्गुन सुदी अष्टमी से पूर्णिमा तक अष्टह्निका पर्व मनाया गया। इस अवसर पर श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान महावीर नगर के सदस्यों ने नव निर्मित जिनालय में किया। शुक्रवार अष्टह्निका के अंतिम दिन 128 अर्घ्य से सिद्ध भगवान की विशेष आराधना हुई। अनुष्ठान में श्रीजी की रिद्धि मंत्रों के साथ वृहद शांतिधारा की गई। मंडल पर आठों दिशाओं के आठ विशेष अर्घ्य चढ़ाने का सौभाग्य मिला।</p>
<p><strong>128 अर्घ्यों से सिद्ध भगवान की आराधना</strong></p>
<p>सिद्ध परमेष्ठी 108 प्रकार के पापों से मुक्त होते हैं। इसी भावना के साथ 128 अर्घ्यों के माध्यम से सिद्ध भगवान की आराधना की गई। सिद्धचक्र महामंडल विधान में सिद्धचक्र का ध्यान लगाते हुए ग्रंथों से श्रीपाल भूप को सुख मिला। कुष्ठ मिटाकर मैना ने यश और सुख पाया। जिनवाणी का अध्ययन करते हुए प्रभु की भक्ति शुद्ध भाव से की। किसी कामना या प्रयोजन से नहीं। तब जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और फल प्राप्त होते हैं।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-76606" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250314-WA0015.jpg" alt="" width="1280" height="720" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250314-WA0015.jpg 1280w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250314-WA0015-300x168.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250314-WA0015-1024x576.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250314-WA0015-768x432.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250314-WA0015-990x557.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250314-WA0015-470x264.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250314-WA0015-640x360.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250314-WA0015-215x120.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250314-WA0015-414x232.jpg 414w" sizes="(max-width: 1280px) 100vw, 1280px" />तपाराधना कर पुण्य संचय</strong></p>
<p>महावीर नगर वासियों ने सुबह शांतिनाथ भगवान का अभिषेक शांतिधारा की। विधान में प्रतिदिन दिन 50 से अधिक श्रावक-श्राविकाओं ने पूजा-अर्चना साधना की। तपाराधना कर पुण्य संचय कर रहे हैं। शाम को प्रतिदिन महाआरती का लाभ समाज जन ले रहे हैं।</p>
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		<title>दीक्षा संस्कार देखने का अवसर 52 जिनालय निर्माण का मानस बनाया: आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने दी मंगल देशना </title>
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		<pubDate>Thu, 13 Mar 2025 12:12:16 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सिद्धचक्र मंडल विधान के पूजन अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मंगल देशना प्रकट की। प्रतिदिन धार्मिक अनुष्ठान क्रियाएं हो रही हैं। जैनत्व के संस्कार शिशुओं में मंत्रोच्चार विधिपूर्वक संघ सानिध्य में किए जाएंगे। 14 मार्च को सुबह श्रीजी के पंचामृत अभिषेक के बाद आचार्य श्री की मंगल देशना के बाद विश्व शांति [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>सिद्धचक्र मंडल विधान के पूजन अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मंगल देशना प्रकट की। प्रतिदिन धार्मिक अनुष्ठान क्रियाएं हो रही हैं। जैनत्व के संस्कार शिशुओं में मंत्रोच्चार विधिपूर्वक संघ सानिध्य में किए जाएंगे। 14 मार्च को सुबह श्रीजी के पंचामृत अभिषेक के बाद आचार्य श्री की मंगल देशना के बाद विश्व शांति के लिए महायज्ञ हवन होगा। <span style="color: #ff0000">धरियावद से पढ़िए राजेश पंचोलिया की खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>धरियावद।</strong> शास्त्रों में श्रावक के 6 प्रमुख कर्तव्य बताए गए हैं। जिसमें दान और पूजा मुख्य हैं। पूजा दो प्रकार की होती है। नित्य पूजा और नैमत्रिक पूजा। इस पूजा के अंतर्गत बड़े-बड़े विधानों की पूजन की जाती है। इससे पुण्य की प्राप्ति होती है। आज सिद्धचक्र मंडल विधान में आप 1024 अर्घ्य चढ़ाएंगे। यह मंगल देशना सिद्धचक्र मंडल विधान के पूजन अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रकट की। आचार्य श्री ने कहा कि पूजन करते समय प्रमाद आलस्य नहीं करना चाहिए क्योंकि,जिनकी हम पूजा कर रहे हैं। उस पूजन में उनके गुणों का वर्णन किया जाता है। सिद्ध भगवान के अनंतानंत गुणों की पूजन करते हुए एक दिन स्वयं भी पूज्य बन सकते हैं। इसलिए धार्मिक विधान में पूजन मनोभाव भक्ति से करना चाहिए। इससे पुण्य की प्राप्ति होती है। हमने नगर प्रवेश के समय कहा था कि धार्मिक महोत्सव प्रारंभ हो गए। प्रतिदिन धार्मिक अनुष्ठान क्रियाएं हो रही हैं। सिद्धचक्र मंडल विधान के पूजन का आयोजन आपने किया। 52 जिनालय निर्माण का मानस बनाया। दीक्षा संस्कार देखने का आपको अवसर मिला। अब आगामी दिन में जिन बच्चों का जन्म पिछली होली से इस होली के मध्य हुआ है। उनमें भी जैनत्व के संस्कार शिशुओं में मंत्रोच्चार विधिपूर्वक संघ सानिध्य में किए जाएंगे।</p>
<p><strong>आचार्य श्री शांति सागरजी का आचार्य पद शताब्दी महोत्सव</strong></p>
<p>आगम में श्रावकों की 53 संस्कार क्रियाएं बताई गई हैं। जिसमें छोटे बच्चों को नवजात शिशुओं को भी जैनत्व के संस्कार दिए जाते हैं। आज का दिन श्रमण परंपरा के लिए बहुत बड़ा दिन है क्योंकि आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज का आचार्य पद शताब्दी महोत्सव पूरे वर्ष भर मनाया जा रहा है। आज के ही दिन फागुन शुक्ल चतुर्दशी को सन 1920 में अपने यरनाल में पंचकल्याणक के अवसर पर मुनि दीक्षा अंगीकार की थी। जिस समय अपने दीक्षा ली थी मुनि धर्म बताने वाला मूलाचार ग्रंथ का प्रकाशन नहीं हुआ था लेकिन, आप में पूर्व जन्म में मुनि दीक्षा लेने के संस्कार थे। जिसके कारण अपने आगम अनुरूप मुनि धर्मचर्या का पालन किया। आपने अपने साधु जीवन में जैन धर्म, जैन मंदिरों, सरस्वती जिनवाणी की रक्षा के लिए अपने प्राणों जीवन की परवाह नहीं की। जिन मंदिर के संरक्षण के लिए 1 हजार105 दिनों तक अन्न आहार का त्यागकर एक आदर्श स्थापित किया। आपके साधु जीवन में आप पर अनेक उपसर्ग आए। आपने 9 हजार 938 उपवास,18 करोड़ मंत्रों का जाप किया।</p>
<p><strong>जैनत्व के संस्कार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी देंगे</strong></p>
<p>पंडित हंसमुख शास्त्री ने बताया कि आचार्य श्री शांति सागर जी की मूल बाल ब्रह्मचारी निर्दाेष अक्षुण्ण परंपरा का पालन वर्तमान में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी विश्वस्तरीय धर्म प्रभावना के साथ कर रहे हैं। प्रतिष्ठाचार्य हंसमुख जी ने बताया कि हमें मुनि श्री महोत्सव सागर जी और मुनि श्री उत्सव सागर जी की 8 दिवसीय उपवास तथा श्राविका तारा जैन अहमदाबाद की 8 दिन उपवास की अनुमोदना का पुण्य अवसर मिला। 14 मार्च को सुबह श्रीजी के पंचामृत अभिषेक के बाद आचार्य श्री की मंगल देशना के बाद विश्व शांति के लिए महायज्ञ हवन होगा। दोपहर को 1 वर्ष के बालक-बालिकाओं में जैनत्व के संस्कार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी मंत्रोच्चार से देंगे।</p>
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