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	<title>साहित्य &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>भारतीय संविधान एवं सुप्रीम कोर्ट भी जैन धर्म को स्वतंत्र अस्तित्व मानता है : सुप्रीम कोर्ट के भोजशाला संबंधी निर्णय के संबंध में दृष्टिकोण  </title>
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		<pubDate>Mon, 18 May 2026 13:53:13 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भारतीय सभ्यता विश्व की उन प्राचीनतम सभ्यताओं में है जहाँ विविध धार्मिक परंपराएँ समानांतर रूप से विकसित हुईं। जैन धर्म उन्हीं महान आध्यात्मिक परंपराओं में से एक है, जिसकी उत्पत्ति अत्यंत प्राचीन काल में हुई और जिसने भारतीय चिंतन, दर्शन, नैतिकता, कला, साहित्य तथा सामाजिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया। पढ़िए, डॉ.यतीश जैन का [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भारतीय सभ्यता विश्व की उन प्राचीनतम सभ्यताओं में है जहाँ विविध धार्मिक परंपराएँ समानांतर रूप से विकसित हुईं। जैन धर्म उन्हीं महान आध्यात्मिक परंपराओं में से एक है, जिसकी उत्पत्ति अत्यंत प्राचीन काल में हुई और जिसने भारतीय चिंतन, दर्शन, नैतिकता, कला, साहित्य तथा सामाजिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए, डॉ.यतीश जैन का आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>भारतीय सभ्यता विश्व की उन प्राचीनतम सभ्यताओं में है जहाँ विविध धार्मिक परंपराएँ समानांतर रूप से विकसित हुईं। जैन धर्म उन्हीं महान आध्यात्मिक परंपराओं में से एक है, जिसकी उत्पत्ति अत्यंत प्राचीन काल में हुई और जिसने भारतीय चिंतन, दर्शन, नैतिकता, कला, साहित्य तथा सामाजिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया। जैन धर्म का मूल आधार अहिंसा, अनेकांत, अपरिग्रह, आत्मशुद्धि और मोक्ष की साधना है। यह धर्म वेदों की सर्वाेच्चता को स्वीकार नहीं करता, न ही सृष्टि के रचनाकार ईश्वर की अवधारणा को मानता है। इसकी अपनी स्वतंत्र तीर्थंकर परंपरा, आगम साहित्य, दार्शनिक पद्धति और साधना व्यवस्था है। इसी कारण भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर जैन धर्म को एक स्वतंत्र और पृथक धर्म के रूप में स्वीकार किया है। सर्वाेच्च न्यायालय तथा विभिन्न उच्च न्यायालयों के अनेक निर्णय इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि जैन धर्म केवल हिंदू धर्म का एक संप्रदाय नहीं, बल्कि अपनी विशिष्ट पहचान वाला स्वतंत्र धर्म है।</p>
<p>जैन परंपरा के अनुसार वर्तमान अवसर्पिणी काल में चौबीस तीर्थंकर हुए, जिनमें प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव और अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी हैं। भगवान महावीर ने छठी शताब्दी ईसा पूर्व में जैन धर्म को पुनः संगठित रूप प्रदान किया। विश्व का सबसे प्राचीन संवत 2552 वा वीर निर्वाण संवत चल रहा है।</p>
<p>यह वह काल था जब भारत में वैदिक कर्मकांड, पशुबलि और जातिगत कठोरता के विरुद्ध अनेक वैचारिक आंदोलनों का उदय हुआ। जैन धर्म ने आत्मसंयम, अहिंसा और तप को जीवन का सर्वाेच्च आदर्श माना। जैन दर्शन के अनुसार प्रत्येक जीव स्वतंत्र आत्मा है और कर्मबंधनों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर सकता है। यह सिद्धांत वेदवादी ब्राह्मण परंपरा से मूलतः भिन्न है। जैन धर्म न तो वेदों को अपौरुषेय मानता है और न ही वेदाधारित यज्ञीय परंपरा को स्वीकार करता है। यही कारण है कि न्यायालयों ने जैन धर्म की स्वतंत्र दार्शनिक पहचान को विशेष महत्व दिया।</p>
<p>भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने “Bal Patil v. Union of India” (Civil Appeal No. 4730 of 1999, निर्णय दिनांक 8 अगस्त 2005) में जैन धर्म की स्वतंत्रता पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। इस प्रकरण में जैन समुदाय ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक का दर्जा प्रदान किए जाने की मांग की थी। न्यायालय ने कहा</p>
<p>“Jainism is undoubtedly a religion distinct from Hinduism.”</p>
<p>अर्थात “जैन धर्म निस्संदेह हिंदू धर्म से भिन्न एक स्वतंत्र धर्म है।” इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार किया कि जैन धर्म की अपनी धार्मिक परंपरा, दर्शन और साधना प्रणाली है। न्यायालय ने यह भी माना कि संविधान सभा की चर्चाओं में जैन समुदाय को पृथक धार्मिक समुदाय के रूप में देखा गया था। यद्यपि इस निर्णय में भारतीय सांस्कृतिक समन्वय की दृष्टि से हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख परंपराओं के बीच ऐतिहासिक संबंधों का उल्लेख किया गया, तथापि इससे जैन धर्म की स्वतंत्र धार्मिक पहचान समाप्त नहीं होती। निर्णय का केंद्रीय तत्व यही था कि जैन धर्म एक विशिष्ट और पृथक धर्म है।</p>
<p>इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने “Committee of Management Kanya Junior High School v. State of U.P.” (Civil Appeal No. 9595 of 2003, निर्णय दिनांक 21 अगस्त 2006) में और अधिक स्पष्ट शब्दों में कहा</p>
<p>“Jain religion is indisputably not a part of Hindu religion.”</p>
<p>अर्थात “जैन धर्म निर्विवाद रूप से हिंदू धर्म का भाग नहीं है।” यह कथन भारतीय न्यायिक इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। न्यायालय ने कहा कि जैन धर्म वेदों की सर्वोच्चता को स्वीकार नहीं करता, इसकी अपनी स्वतंत्र धार्मिक परंपराएँ हैं और इसकी साधना प्रणाली पूर्णतः पृथक है। न्यायालय ने यह भी माना कि जैन धर्म किसी सुधारवादी आंदोलन के रूप में उत्पन्न नहीं हुआ, बल्कि यह एक स्वतंत्र धार्मिक दर्शन है जिसकी अपनी मौलिकता है। यह निर्णय जैन धर्म की संवैधानिक स्थिति के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।</p>
<p>सर्वोच्च न्यायालय का “Commissioner, Hindu Religious Endowments, Madras v. Sri Lakshmindra Thirtha Swamiar” (AIR 1954 SC 282), जिसे शिरूर मठ प्रकरण के नाम से जाना जाता है, भारतीय धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक है। इस मामले में न्यायालय ने अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या करते हुए कहा कि भारत में अनेक स्वतंत्र धार्मिक परंपराएँ विद्यमान हैं जिनमें जैन और बौद्ध धर्म भी शामिल हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धर्म केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि उसकी अपनी धार्मिक प्रथाएँ, सिद्धांत और संस्थागत संरचना भी होती है। इस निर्णय में जैन धर्म को स्वतंत्र धार्मिक व्यवस्था के रूप में स्वीकार किया गया।</p>
<p>उच्च न्यायालयों ने भी अनेक मामलों में जैन धर्म की पृथक पहचान को मान्यता दी है।</p>
<p>“Gateppa v. Eramma” (AIR 1927 Madras 228) में मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा—</p>
<p>“Jainism as a distinct religion was flourishing several centuries before Christ.”</p>
<p>अर्थात जैन धर्म ईसा से कई शताब्दियों पूर्व से स्वतंत्र धर्म के रूप में विकसित था। यह निर्णय इस तथ्य को स्थापित करता है कि जैन धर्म किसी अन्य धर्म से निकला हुआ संप्रदाय नहीं, बल्कि अत्यंत प्राचीन स्वतंत्र धार्मिक परंपरा है।</p>
<p>इसी प्रकार “Hirachand Gangji v. Rowji Sojpal” (AIR 1939 Bombay 377) में बंबई उच्च न्यायालय ने कहा</p>
<p>“It is wrong to think that the Jains were originally Hindus.”</p>
<p>न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जैन धर्म की अपनी स्वतंत्र दार्शनिक और धार्मिक संरचना है तथा जैनों को मूलतः हिंदू मानना ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से गलत है। यह निर्णय जैन धर्म की स्वतंत्रता को स्वीकार करने वाले प्रमुख न्यायिक निर्णयों में गिना जाता है।</p>
<p><strong>बंबई उच्च न्यायालय के</strong></p>
<p>“Bombay Harijan Temple Entry Act Case”</p>
<p>में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एम.सी. छागला ने कहा</p>
<p>“Jains have an independent religious entity.”</p>
<p>यह कथन अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें न्यायालय ने जैन समुदाय को स्वतंत्र धार्मिक इकाई माना।</p>
<p>इसी प्रकार “Ratilal Panachand Gandhi v. State of Bombay” (AIR 1954 Bom 388) में न्यायालय ने माना कि जैन धार्मिक संस्थाओं को अपने धार्मिक कार्यों के संचालन का पूर्ण अधिकार है और उनकी धार्मिक संपत्तियों की प्रकृति स्वतंत्र रूप से निर्धारित होगी।</p>
<p>भारतीय संविधान भी जैन धर्म की स्वतंत्र पहचान को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करता है। संविधान के अनुच्छेद 25 की Explanation II में “हिंदू” शब्द के अंतर्गत जैन, बौद्ध और सिख का उल्लेख किया गया है, परंतु यह उल्लेख केवल सामाजिक सुधार और सार्वजनिक धार्मिक संस्थाओं में प्रवेश संबंधी विधायी सुविधा के लिए किया गया था। इसका उद्देश्य इन धर्मों का हिंदू धर्म में विलय करना नहीं था। संविधान सभा में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि यह केवल कानूनी सुविधा हेतु है। यदि जैन धर्म हिंदू धर्म का ही अंग माना गया होता, तो अलग से “जैन” शब्द का उल्लेख करने की आवश्यकता ही नहीं होती।</p>
<p>संविधान सभा की बहसों में भी जैन समुदाय को पृथक धार्मिक समुदाय के रूप में देखा गया। अल्पसंख्यक अधिकारों से संबंधित चर्चाओं में जैन प्रतिनिधियों की सहभागिता यह दर्शाती है कि संविधान निर्माताओं की दृष्टि में जैन धर्म स्वतंत्र धार्मिक पहचान रखता था। यही कारण है कि बाद के वर्षों में विभिन्न राज्यों ने जैन समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा प्रदान किया।</p>
<p>भारत सरकार ने 27 जनवरी 2014 को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 की धारा 2(c) के अंतर्गत जैन समुदाय को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक घोषित किया। यह निर्णय केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं था, बल्कि भारतीय राज्य द्वारा जैन धर्म की स्वतंत्र धार्मिक पहचान की संवैधानिक स्वीकृति थी। इस अधिसूचना के बाद जैन समुदाय को राष्ट्रीय स्तर पर धार्मिक अल्पसंख्यक के रूप में अधिकार प्राप्त हुए।</p>
<p>जैन धर्म की स्वतंत्रता केवल न्यायालयों के कथनों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दार्शनिक आधार भी इसे स्पष्ट करते हैं। जैन धर्म का “अनेकांतवाद” विश्वदृष्टि का अद्वितीय सिद्धांत है जो सत्य की बहुआयामी प्रकृति को स्वीकार करता है। “स्याद्वाद” तर्कशास्त्र की ऐसी पद्धति है जिसका अन्य भारतीय दर्शनों में समकक्ष नहीं मिलता। जैन धर्म आत्मा की स्वतंत्र सत्ता को मानता है तथा कर्म सिद्धांत को अत्यंत वैज्ञानिक और सूक्ष्म रूप में प्रस्तुत करता है। जैन आचार प्रणाली में पंचमहाव्रत, तप, संयम, अपरिग्रह और जीवदयालुता को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। यह सम्पूर्ण जीवन-दर्शन जैन धर्म को एक विशिष्ट धार्मिक और दार्शनिक पहचान प्रदान करता है। भारतीय संस्कृति में जैन धर्म का योगदान भी इसकी स्वतंत्रता का सशक्त प्रमाण है। प्राकृत साहित्य, अपभ्रंश काव्य, मंदिर स्थापत्य, मूर्तिकला, गणित, ज्योतिष, तर्कशास्त्र, चिकित्सा और व्यापारिक नैतिकता में जैनाचार्यों का महान योगदान रहा है। आचार्य कुंदकुंद, उमास्वाति, समंतभद्र, हेमचंद्र, जिनसेन और हरिभद्र जैसे विद्वानों ने भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध किया। यदि जैन धर्म केवल किसी अन्य धर्म का उपसंप्रदाय होता, तो इतनी विशाल स्वतंत्र दार्शनिक और साहित्यिक परंपरा विकसित नहीं होती।</p>
<p>इस प्रकार भारतीय न्यायपालिका, संविधान, इतिहास, दर्शन और सांस्कृतिक परंपरा में सभी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि जैन धर्म एक स्वतंत्र और प्राचीन धर्म है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया यह कथन कि “Jain religion is indisputably not a part of Hindu religion” केवल कानूनी टिप्पणी नहीं, बल्कि भारतीय धार्मिक इतिहास की वास्तविकता की न्यायिक स्वीकृति है। जैन धर्म की स्वतंत्र पहचान भारतीय लोकतंत्र की उस महान परंपरा का प्रतीक है जिसमें विविधता को सम्मानपूर्वक स्वीकार किया गया है और प्रत्येक धार्मिक समुदाय को अपनी विशिष्टता के साथ विकसित होने का अधिकार प्राप्त है।</p>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 35 आचार्य श्री नरेंद्र कीर्ति की वाणी, लेखनी, साहित्य सबकुछ प्रभावशाली: राजस्थान के जैन संतों ने जनमानस को खूब प्रभावित किया </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 Apr 2025 00:30:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजस्थान के संत]]></category>
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					<description><![CDATA[राजस्थान के जैन संत, उनकी वाणी, उनकी लेखनी, उनका साहित्य इतना प्रभावशाली है कि पढ़ने वाला भावविभोर हुए बिना नहीं रहता। राजस्थान के संतों की परंपरा में आचार्यश्री नरेंद्र कीर्ति जी का भी विशिष्ट स्थान है। इन्होंने आग्रह पर भी रचनाकर्म कर साहित्य लेखन में योगदान दिया। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>राजस्थान के जैन संत, उनकी वाणी, उनकी लेखनी, उनका साहित्य इतना प्रभावशाली है कि पढ़ने वाला भावविभोर हुए बिना नहीं रहता। राजस्थान के संतों की परंपरा में आचार्यश्री नरेंद्र कीर्ति जी का भी विशिष्ट स्थान है। इन्होंने आग्रह पर भी रचनाकर्म कर साहित्य लेखन में योगदान दिया। <span style="color: #ff0000">जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 35वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का आचार्य श्री नरेंद्र कीर्ति के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> राजस्थान के जैन संत, उनकी वाणी, उनकी लेखनी, उनका साहित्य सभी कुछ इतना प्रभावशाली रहा है कि पढ़ने वाला भावविभोर हुए बिना नहीं रहता। राजस्थान के संतों की परंपरा में आचार्यश्री नरेंद्र कीर्ति जी का भी विशिष्ट स्थान है। इन्होंने आग्रह पर भी रचनाकर्म कर साहित्य लेखन में योगदान दिया है। राजस्थानी धरती पर जैन संतों का प्रभाव 17वीं सदी में भी खूब था। कालांतर में कई और संतों का आगमन हुआ। जिन्होंने अपने संदेशों, उपदेशों से जैन धर्म की ध्वजा को फहराए रखा। इसी क्रम में आचार्यश्री नरेंद्र कीर्ति के बारे में जानते हैं। यह संक्षिप्त जानकारी है। आचार्यश्री नरेंद्र कीर्ति 17वीं सदी के संत थे। भट्टारक वादिभूषण एवं सकल भूषण दोनों संतों के ये शिष्य थे और दोनों की ही इन पर विशेष कृपा थी। एक बार वादिभूषण के प्रिय शिष्य ब्रह्म नेमिदास ने जब इनसे ‘सगर प्रबंध’ लिखने की प्रार्थना की तो इन्होंने उनकी इच्छा के अनुसार ‘सगर प्रबंध’ कृति को निबद्ध किया। प्रबंध का रचनाकाल 1646 आसोज सुदी दशमी है। यह कवि की एक अच्छी रचना है। आचार्य श्री नरेंद्र कीर्ति की ही दूसरी रचना ‘तीर्थंकर चौबीसना छप्पय’ है। इसमें कवि ने अपने नामोल्लेख के अतिरिक्त कोई परिचय नहीं दिया है। दोनों की कृतियां उदयपुर के शास्त्र भंडारों में संग्रहित है।</p>
<p><strong>आचार्य श्री नरेंद्रकीर्ति की रचना&#8230;</strong></p>
<p>तेह भवन माहि रह्या चौमास, महा महोत्सव पूगी आस।</p>
<p>श्री वादिभूषण देशनां सुधा पान, कीरति शुभमना।</p>
<p>शिष्य ब्रह्म नेमिदास तणी विनय प्रार्थना देखी धणी।</p>
<p>सूरि नरेंद्र कीरति शुभ रूप, सागर प्रबंध रचिं रसकूप।</p>
<p>मूलसंघ मंडन मुनिराय, कलिकालिं जेगणधर पाय।</p>
<p>सुमतिकीरति गछपति अवदीत, तस गुरु बोधव जग विख्यात।</p>
<p>सकल भूषण सूरीश्वर जेह, कलि माहि, जंगम तीरथ तेह।</p>
<p>ते दोए गुरु पद कंजम न धरि, नरेंद्र कीरति शुभ रचना करी।</p>
<p>संवत सोलाछितालिं सार, आसोज सुदि दशमी बुधवार।</p>
<p>सगर प्रबंध रच्यो मनरंग, चिररू नंदो जा सायर गंग।</p>
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		<title>सेमिनार : प्राकृत टाइम्स’ के संपादक डॉ. अरिहन्त ‘नेशनल गौरव अवार्ड’ से सम्मानित </title>
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		<pubDate>Fri, 17 Feb 2023 15:54:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[प्राकृत भाषा एवं साहित्य की समृद्ध परंपरा को वैश्विक स्तर पर पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से प्रथम बार अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित होने ‘प्राकृत टाइम्स’ में प्राचीन आचार्यों, प्राकृत एवं साहित्य के लिए समर्पित सुप्रसिद्ध मनीषियों के योगदान, महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का परिचय, अंग्रेजी अनुवाद के साथ प्राकृत गाथाओं तथा देश-विदेशों में चल रहे प्राकृत [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>प्राकृत भाषा एवं साहित्य की समृद्ध परंपरा को वैश्विक स्तर पर पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से प्रथम बार अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित होने ‘प्राकृत टाइम्स’ में प्राचीन आचार्यों, प्राकृत एवं साहित्य के लिए समर्पित सुप्रसिद्ध मनीषियों के योगदान, महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का परिचय, अंग्रेजी अनुवाद के साथ प्राकृत गाथाओं तथा देश-विदेशों में चल रहे प्राकृत अध्ययन, कार्यशालाओं, सेमिनारों, कांफ्रेंस आदि गतिविधियों की सूचनायें मुख्यता के साथ प्रकाशित होती हैं। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट </span></strong></p>
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<p><strong>नई दिल्ली।</strong> नेशनल मीडिया फाउंडेशन के 45वें स्थापना दिवस पर डॉ. अरिहन्त कुमार जैन (मुंबई) को पत्रकारिता के क्षेत्र में ‘प्राकृत टाइम्स इंटरनेशनल न्यूजलेटर’ के माध्यम से विश्व भर में प्राकृत भाषा एवं साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए ‘नेशनल गौरव अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। सर्वप्राचीन प्राकृत भाषा एवं साहित्य की समृद्ध परंपरा को वैश्विक स्तर पर पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से प्रथम बार अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित होने ‘प्राकृत टाइम्स’ में प्राचीन आचार्यों, प्राकृत एवं साहित्य के लिए समर्पित सुप्रसिद्ध मनीषियों के योगदान, महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का परिचय, अंग्रेजी अनुवाद के साथ प्राकृत गाथाओं तथा देश-विदेशों में चल रहे प्राकृत अध्ययन, कार्यशालाओं, सेमिनारों, कांफ्रेंस आदि गतिविधियों की सूचनायें मुख्यता के साथ प्रकाशित होती हैं, जिस <a href="https://prakrittimes.wordpress.com/">prakrittimes.wordpress.com</a> पर पढ़ा जा सकता है। ‘प्राकृत टाइम्स’ के पाठकों की संख्या देश-विदेश में लगातार बढ़ रही है। इसके माध्यम से प्राकृत भाषा एवं साहित्य के प्रति जैन-जैनेतर लोगों की रुचि एवं जिज्ञासा बढ़ी है। डॉ. जैन के इस अभिनव कार्य की पूज्य साधु-संतों एवं देश-विदेशों के कई सुविख्यात मनीषियों, भाषाविदों ने भरपूर सराहना की है और कहा है कि ‘प्राकृत टाइम्स’ भारत और पश्चिमी देशों के बीच ‘प्राकृत सेतु’ का कार्य कर रहा है, और क्रमशः अपने उद्देश्यों में पूर्णतः सफलता भी प्राप्त कर रहा है।</p>
<p><strong>सेमिनार और सम्मान समारोह</strong></p>
<p>17 फरवरी 2023 को नेशनल मीडिया फाउंडेशन द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार एवं सम्मान समारोह में देश भर से अनेक प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जिसमें पत्रकार, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया, स्वतंत्र पत्रकार, साहित्यकार, कवि, लेखक, पर्यावरणविद्, समाजसेवी आदि शामिल थे। इस अवसर पर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. प्रियरंजन त्रिवेदी (कुलाधिपति,द ग्लोबल ओपन यूनिवेर्सिटी,नागालैंड), सम्मानित अतिथि डॉ. मणींद्र जैन (राष्ट्रीय अध्यक्ष, दिगंबर जैन महासमिति), नरेंद्र भण्डारी (अध्यक्ष, इंद्रप्रस्थ प्रेस क्लब ऑफ इंडिया), नेशनल मीडिया फाउंडेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेन्द्र जैन, राष्ट्रीय महासचिव डॉ. ओ. पी. यादव, राष्ट्रीय सलाहकार जवाहर जयरथ एवं सभी प्रदेशों के महासचिव, सचिव, उपाध्यक्ष, कार्यकारी अध्यक्षों ने डॉ. अरिहन्त को बधाई दी।</p>
<p><strong>बनाई है डॉक्युमेंट्री</strong></p>
<p>डॉ. अरिहन्त ने श्रीक्षेत्र श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) के ऐतिहासक एवं पुरातात्विक महत्त्व तथा प्राकृत भाषा में उल्लिखित शिलालेखों को दर्शाते हुए ‘प्राकृत भाषा – एक प्राचीन समृद्ध परंपरा’ नामक एक महत्त्वपूर्ण रिसर्च डॉक्युमेंट्री फिल्म का भी निर्माण किया है, जिसे राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में प्रदर्शित भी किया जा चुका है। आप जैन दर्शन के प्रख्यात विद्वान प्रो. फूलचन्द जैन प्रेमी और डॉ. श्रीमती मुन्नी जैन (वाराणसी) के छोटे बेटे हैं। आप वर्तमान में जैन अध्ययन केंद्र, क. जे. सोमैया इंस्टीट्यूट को धर्मा स्टडीज़, सोमैया विद्याविहार विश्वविद्यालय, मुंबई में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।</p>
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