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	<title>साइंस ऑफ लिविंग &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>साइंस ऑफ लिविंग &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग सेशन में अध्यात्म की बातें: यह कैसा अध्यात्म? जिसमें है मात्र ख्याति पूजा और लाभ की चाह &#8211; मुनि श्री निरंजन सागर  </title>
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		<pubDate>Sun, 07 May 2023 10:04:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अध्यात्म शब्द का शाब्दिक अर्थ है अधि + आत्मा = अध्यात्म अर्थात् आत्मा के विषय में अथवा आत्मा से सम्बन्ध रखने वाला। आचार्य कहते है अपने शुद्धात्मा में विशुद्धता का आधारभूत अनुष्ठान या आचरण अध्यात्म है। पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा की रिपोर्ट&#8230; दमोह। साइंस आफ लिविंग के इस सत्र में हम अध्यात्म का सही रहस्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अध्यात्म शब्द का शाब्दिक अर्थ है अधि + आत्मा = अध्यात्म अर्थात् आत्मा के विषय में अथवा आत्मा से सम्बन्ध रखने वाला। आचार्य कहते है अपने शुद्धात्मा में विशुद्धता का आधारभूत अनुष्ठान या आचरण अध्यात्म है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>दमोह।</strong> साइंस आफ लिविंग के इस सत्र में हम अध्यात्म का सही रहस्य जानने का प्रयास करेंगे। अध्यात्म शब्द का शाब्दिक अर्थ है अधि + आत्मा = अध्यात्म अर्थात् आत्मा के विषय में अथवा आत्मा से सम्बन्ध रखने वाला। आचार्य कहते है अपने शुद्धात्मा में विशुद्धता का आधारभूत अनुष्ठान या आचरण अध्यात्म है। अध्यात्म में वर्तन करना बहुत सरल है पर इतना सरल होते हुये भी इसका अनुपालन कठिनतम लगता है। आचार्य कहते है कुछ नही करने का नाम अध्यात्म है । द्रव्यसंग्रह ग्रन्थराज में आचार्य नेमिचन्द सिद्धांती देव कहते हैं &#8221; मा चिट्ठह मा जंपह मा चिन्तह किंवि जेण होइ थिरो &#8221; अर्थात् कुछ भी चेष्टा मत करो, बोलो मत चिन्तन (विचार) मत करो जिससे स्थिर हो सको। यह करना बहुत कठिनतम प्रतित होता है? क्योंकि इसमें सब कुछ रूक जाता है और जहाँ सब कुछ रूक जाता है वहाँ इस जीव को आनन्द नही आता है। आज अध्यात्म पढना बहुत आसान हो गया है लेकिन अर्थ की ओर दृष्टि नहीं जाने से सब गड़बड़ हो रहा है। अर्थ निकालना इतना आसान नही है।</p>
<p><strong>अध्यात्ममय जीवन चर्या का विषय </strong></p>
<p>अध्यात्ममय जीवन मात्र चर्चा का नही बल्कि चर्या का विषय है। आज जगह-जगह आध्यात्मिकता परोसी जा रही है और अध्यात्म का विवेचनकर्ता शैली आदि का ऐसा आलम्बन लेते है जैसा कि सिद्ध अवस्था का पूरा अनुभवन हो रहा हो । मात्र ख्याति, पूजा और लाभ को लक्ष्य में रख कर जनता को भ्रमित किया जा रहा है। बस इतना ही अध्यात्म है उनके जीवन मे। मन के लड्डु को लड्डु नही माना जाता है, इतना तो ध्यान रखो। कहते भी हैं &#8220;अधजल गगरी छलकत जाय&#8221; अर्थात् ज्ञान कम प्रदर्शन ज्यादा। आचायों ने स्पष्ट विवेचन दिया है कि अध्यात्म की चर्चा अलग वस्तु है और चर्या अलग वस्तु है। बगैर वस्तु तत्त्व को जाने, उसका अनुपालन असम्भव है। जिसके जीवन में वैराग्य कि एक कणिका तक नहीं और वे अध्यात्म के प्रस्तोता बने बैठे है।</p>
<p><strong>आत्मा के आधार के स्वरूप को जानें </strong></p>
<p>आत्मा की चर्चा के पहले हमे इसके आधार के स्वरूप को सही तरह से जानना होगा। बिना आधार के आधेय की कल्पना नही कि जा सकती है। आचार्य कहते है जीव दो प्रकार के है संसारी और मुक्त। हम संसारी है और संसारी सशरीर होता है। इसलिये बगैर शरीर अर्थात् काय के स्वभाव को जाने हम आत्म तत्त्व को नही जान पाएंगे। बिना आधार को जाने आप आधेय तक नही पहुच सकते। जिस प्रकार वृक्ष के लिये आधार भूमि है और वृक्ष आधेय है। उसी प्रकार शरीर आधार है आत्मा आधेय हैं। आचार्य उमास्वामी जी का कथन है जो तत्त्वार्थ सूत्र के रूप में प्रसिद्ध है। जगत् अर्थात् संसार के और काय अर्थात् शरीर के स्वभाव की भावना संवेग और वैराग्य के लिये कि जाती है। जगत् के स्वभाव का चिन्तन करने से संसार से संवेग होता है। संसार और पाप से भीति और धर्म में प्रीति ही संवेग है। काय का स्वभाव जैसे यह शरीर अनित्य हैं, दुखों का कारण है, निस्सार है अशुचि है इत्यादि। इस प्रकार काय के स्वभाव का चिन्तन करने से विषयों से आसक्ति हटकर वैराग्य उत्पन्न होता है। जो संसार, शरीर विषय भोगो से विरक्त है। वही जीव अपने वैराग्य को दृढ़ बनाते हुये अध्यात्म को प्राप्त कर अपना कल्याण कर सकता है। वरना वह वैराग्य और अध्यात्म किसी काम का नहीं।</p>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग सत्र: मूर्ति और मंत्र ही भारतीय सनातन संस्कृति है &#8211; मुनि श्री निरंजन सागर </title>
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		<pubDate>Sat, 06 May 2023 12:57:42 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[साइंस ऑफ लिविंग के इस सत्र में हम आपको मंत्र और मूर्ति की शक्ति विशेष से परिचय करवाने का प्रयास करेंगे। भारतीय सनातन संस्कृति अनादि काल से, मंत्र और मूर्ति की आराधक रही है। वेदों, पुराणों और ग्रंथों में इनका विशेष महत्व बताया गया है। पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा की रिपोर्ट&#8230; दमोह। साइंस ऑफ लिविंग [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>साइंस ऑफ लिविंग के इस सत्र में हम आपको मंत्र और मूर्ति की शक्ति विशेष से परिचय करवाने का प्रयास करेंगे। भारतीय सनातन संस्कृति अनादि काल से, मंत्र और मूर्ति की आराधक रही है। वेदों, पुराणों और ग्रंथों में इनका विशेष महत्व बताया गया है।<span style="color: #ff0000;"> पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>दमोह।</strong> साइंस ऑफ लिविंग के इस सत्र में हम आपको मंत्र और मूर्ति की शक्ति विशेष से परिचय करवाने का प्रयास करेंगे। भारतीय सनातन संस्कृति अनादि काल से, मंत्र और मूर्ति की आराधक रही है। वेदों, पुराणों और ग्रंथों में इनका विशेष महत्व बताया गया है। कुछ कतिपय अज्ञानी, दुराग्रही और विदेशी आक्रमणकारियों ने भारतीय सनातन संस्कृति के अस्तित्व पर बहुत बड़ा कुठाराघात किया है। इतिहास में स्पष्ट मिलता है कि किस तरह नालंदा विश्वविद्यालय जो कि भारतीय सनातन संस्कृति शिक्षा का केंद्र था। वहां छह माह लगातार वेदो-पुराणों और ग्रन्थों की होली जलाई गई। किस तरह मूर्ति विरोधियों द्वारा मूर्तियों को क्षति पहुचाई गई। आस्था और संस्कृति के केंद्र मंदिरों को तोड़ा गया। यहां तक धर्मान्तरण के लिए भी बाध्य किया गया।</p>
<p><strong>धर्म निरपेक्षता ही भारतीय संविधान का आधार</strong></p>
<p>एक ऐसा दौर हुआ जिसमें धर्म और धार्मिक क्रियाओं को खुलेआम करना भी अपराध माना जाता था। यह भारतीय सनातन संस्कृति बहुत कुछ झेल चुकी है। परन्तु अब इस स्वतन्त्र भारत में भी कुछ लोग इस संस्कृति पर और सांस्कृतिक परिवेश पर कुठाराघात करने मे लगे हुए हैं। धर्म निरपेक्षता ही भारतीय संविधान का आधार है जिसके माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति अपनी धार्मिक क्रियाओं को करने के लिए स्वतन्त्र है। आज भी कई असामाजिक तत्व मन्त्र और मूर्ति का विरोध कर इस भारतीय सनातन संस्कृति पर आघात पहुँचने से पीछे नहीं हट रहे हैं। पाषाण-पाषाण कहकर परमात्मा(मूर्ति) का अपमान करना कहां तक ठीक है। पाषाण हृदय वाला व्यक्ति ही परमात्मा को पाषाण कह सकता है, मंत्र को मिथ्या कह सकता है। श्रद्धा के अभाव में ऐसा विचार उनके मन में आ सकता है। ऐसे वचन उनके मुख से निकल सकते हैं। आचार्यो की वाणी, जिनेन्द्र देव की वाणी पर जिसे श्रद्धा नहीं है, वह कभी त्रिकाल में भी न तो स्वयं का कल्याण कर सकता है और न ही दूसरों का। जो न तो भगवान को मान रहा है और न तो भगवान की मान रहा है। ऐसा व्यक्ति मान कषाय के तीव्र उदय में अपने आपको भगवान मनवाने में लगा हुआ है और अपना मान &#8211; सम्मान करवाता हुआ स्वयं को भगवान मान रहा है।</p>
<p><strong>प्रत्येक जीवात्मा के अंदर भगवान बनने की क्षमता</strong></p>
<p>आचार्य कहते हैं प्रत्येक जीव शुद्ध नय से शुद्ध है। प्रत्येक जीवात्मा के भीतर भगवान बनने की क्षमता(शक्ति) विद्यमान है। चाहे वह एक इन्द्रिय ही क्यों न हो परंतु अभिव्यक्ति की अपेक्षा प्रत्येक जीव भगवान नहीं बन सकता। अभव्य जीव ऐसा परिणामिक भाव वाला जीव है। जो तीन काल मैं भी अपना कल्याण नही कर सकता। योग्यता और पद दोनों अलग-अलग चीजें है, लेकिन योग्यता के बिना पद का कोई मूल्य नहीं है। यदि हमारे पास दया नहीं, श्रद्धा नहीं, गुणवत्ता नहीं, योग्यता नहीं तो हम किसी पद के लायक नहीं है। फिर इस प्रकार के अयोग्य व्यक्ति धर्म नायक कैसे मान सकते है? धर्म नायक हमारे भगवान है। उनकी परंपरा का अनुपालन करने वाले आचार्य, उपाध्याय और साधु हैं। जो व्यक्ति भगवान की तरफ पीठ करके खड़ा होता है, समझ लेता है उसकी शीघ्र ही दुर्गति होने वाली है। भगवान का दर्शन आपके लिए कभी भी अकल्याणकारी नही हो सकता है।</p>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग सत्र में प्रवचन : हम सभी का हित भगवान की भक्ति में ही है &#8211; मुनि श्री निरंजन सागरजी </title>
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		<pubDate>Fri, 05 May 2023 14:01:55 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[साइंस ऑफ लिविंग में मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने कहा कि जिसके जीवन में आगम है, उसके जीवन में दुःख नहीं रह सकता। आ+गम अर्थात् दुःख से आराम ही आगम है। पढ़िए राजेश रागी की रिपोर्ट&#8230; कुम्हारी (दमोह)। साइंस ऑफ लिविंग में मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने कहा कि आज हम [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>साइंस ऑफ लिविंग में मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने कहा कि जिसके जीवन में आगम है, उसके जीवन में दुःख नहीं रह सकता। आ+गम अर्थात् दुःख से आराम ही आगम है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश रागी की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुम्हारी (दमोह)।</strong> साइंस ऑफ लिविंग में मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने कहा कि आज हम एक ऐसा सत्र आपके सामने ला रहे हैं, जिससे आपको वस्तु तत्व का समीचिन बोध प्राप्त करने में सहायता प्राप्त होगी। आचार्यों ने वक्ता के प्रमाणिकता के आधार पर ही वचनों की प्रमाणिकता को स्वीकार किया है। निराधार विवक्षा से वक्ता की प्रमाणिकता पर भी प्रश्न चिह्न खड़ा होता है। &#8220;वक्तुं इच्छा विवक्षा&#8221; वक्ता की इच्छा ही विवक्षा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि आपके मुख में जो आए, वही कहें। आचार्य कहते हैं &#8220;आगम चक्खू साहू&#8221; अर्थात् गणधर परमेष्ठी द्वारा गुम्फित वाणी, जो कि अरिहंत देव द्वारा कही गई है, ऐसी वाणी ही जिनवाणी है। वही साधु के लिए एवं साधु (सज्जन) पुरुष के लिए चक्षु (नेत्र) के समान है। किसी व्यक्ति विशेष के व्यक्तिगत मत को हम जिनवाणी या आगम नहीं कह सकते हैं।</p>
<p><strong>जिनवाणी और जन वाणी में अंतर</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि जिनवाणी और जन वाणी मे बहुत अन्तर होता है। जिसके जीवन में आगम है, उसके जीवन में दुःख नहीं रह सकता। आ+गम अर्थात् दुःख से आराम ही आगम है। आचार्यों ने आधार आधेय सम्बन्ध पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। जैसे गमला आधार है और पौधा आधेय है। बिना आधार के आधेय की परिकल्पना निरर्थक है। वैसे ही द्रव्य आधार है और भाव आधेय है। जैन दर्शन भाव प्रधान दर्शन है। परंतु निराधार नहीं है। भाव प्रधान है, तो द्रव्य गौण है परन्तु यह अभावात्मक नहीं कहा है। तत्वार्थ सूत्र में आचार्य उमास्वामी जी ने सूत्र दिया है &#8220;अर्पितानर्पित सिद्धे:&#8221; वस्तु अनेकान्तात्मक है प्रयोजन के अनुसार उसके किसी एक धर्म को विवक्षा से जब प्रधानता प्राप्त होती है तो वह अर्पित या मुख्य कहलाता है। प्रयोजन के अभाव में जिसकी प्रधानता नहीं रहती, वह अनर्पित या गौण कहलाता है। सामान्य या विशेष रूप कथन शैली का आधार लेकर पदार्थ का विवेचन किया जाता है। आज स्वाध्याय तो बहुत हो रहा है, परन्तु विवक्षा कि समझ का अभाव होने से भटकन ज्यादा हो रही है।</p>
<p><strong>आत्मा में चरण ही ब्रह्मचर्य</strong></p>
<p>ब्रह्म अर्थात् आत्मा में चरण करना ही ब्रह्मचर्य है और इसका कर्ता ब्रह्मचारी कहलाता है। परन्तु आपका चरण और आचरण एकान्त का है तो ऐसे में आप भ्रमचर्य से युक्त भ्रमचारी कहलायेंगे। आपका भव भ्रमण इसी तरह चलता रहेगा। आचार्यों ने स्पष्ट विवेचन दिया है कार्य-कारण व्यवस्था को लेकर। जिस व्यक्ति को कार्य-कारण व्यवस्था की समझ नहीं है, वह कभी व्यवस्थापक नहीं बन सकता है, बल्कि वह व्यवस्था को अव्यवस्था के रूप में परिवर्तित कर सकता है। आचार्य कहते हैं &#8220;कारण सदर्श कार्यम्&#8221; कारण के अनुरूप ही कार्य होता हैं। अशुद्ध कारण से अशुद्ध कार्य की उत्पत्ति होती है और शुद्ध कारण से शुद्ध कार्य की उत्पत्ति होती है। बिना कारण के कभी कार्य की उत्पत्ति नहीं होती है। द्रव्य कारण और भाव कार्य है।</p>
<p><strong>अशुद्ध द्रव्य में नहीं हो सकते शुद्ध भाव</strong></p>
<p>बिना द्रव्य के भाव उत्पन्न नहीं हो सकते हैं। अशुद्ध दृव्य में भी शुद्ध भाव उत्पन्न नहीं हो सकते हैं। कभी बबूल का बीज बोकर किसी को आम की प्राप्ति नहीं हुई है। अशुद्ध दृव्य के आधार से शुद्ध भाव नहीं ठहर सकते है। इसलिए द्रव्य की शुद्धि पूर्वक ही भाव की शुद्धि सम्भव है। बिना मुनि बने अगर कोई मुनिवत् चर्या कर अपने आपको मुनि मानकर या मनवाकर बैठा है तो यह उसका उन्मत्तपना है, यह उसका अज्ञान अन्धकार रूपी मिथ्यात्व है और इससे वह स्वयं का एवं दूसरों का भी अहित ही कर रहा है। हम सभी का हित भगवान की भक्ति में ही है। उसे करते हुए हम सभी अपना आत्मकल्याण कर सकते हैं।</p>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग में प्रवचन : दिगम्बरत्व भारतीय सनातन संस्कृति की पहचान है &#8211; मुनि श्री निरंजन सागर जी </title>
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		<pubDate>Wed, 03 May 2023 13:21:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि इस सत्र में हम सनातन संस्कृति की प्रस्तोता दिगम्बरत्व पर चर्चा करने का प्रयास करेंगे। भारतीय सनातन संस्कृति में जितने भी वेद, पुराण हैं, उन सभी में दिगम्बरत्व को यथास्थान बहुमान दिया है। पढ़िए राजेश रागी की विशेष रिपोर्ट&#8230; कुम्हारी(दमोह)। साइंस [&#8230;]]]></description>
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<p>साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि इस सत्र में हम सनातन संस्कृति की प्रस्तोता दिगम्बरत्व पर चर्चा करने का प्रयास करेंगे। भारतीय सनातन संस्कृति में जितने भी वेद, पुराण हैं, उन सभी में दिगम्बरत्व को यथास्थान बहुमान दिया है। पढ़िए राजेश रागी की विशेष रिपोर्ट&#8230;</p>
<hr />
<p><strong>कुम्हारी(दमोह)।</strong> साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि इस सत्र में हम सनातन संस्कृति की प्रस्तोता दिगम्बरत्व पर चर्चा करने का प्रयास करेंगे। भारतीय सनातन संस्कृति में जितने भी वेद, पुराण हैं, उन सभी में दिगम्बरत्व को यथास्थान बहुमान दिया है। यह निर्विकार दिगम्बर मुद्रा ही प्रमुख कारण है, जिससे यह भारतीय सनातन संस्कृति विश्व गुरु के रूप में अपनी पहचान अनादि काल से बनाए हुए हैं। सम्पूर्ण विश्व आज भी आश्चर्य के साथ इस विषय पर चिन्तन करता है कि निर्विकार अवस्था के साथ यह कैसा जीवन है? वासना विजय का यह स्वरूप आज भी वैसा ही है, जैसा कि भगवान महावीर स्वामी का था। इस मुद्रा के माध्यम से किसी भी प्राणी मे राग की, विकार की, वासना की उत्पत्ति नहीं होती है, बल्कि वैराग्य की उत्पत्ति में यह मुद्रा सशक्त माध्यम है।</p>
<p><strong>सद्दर्शन से ही सद्गति की प्राप्ति</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि, &#8221; कारण सदर्शम् कार्यम् &#8221; अर्थात कारण के अनुरूप ही कार्य होता है। सद्दर्शन से ही सद्गति की प्राप्ति होती है। ऐसी वीतरागी दिगम्बर मुद्रा का दर्शन पाप का नाश करने वाला है। साथ ही साथ स्वर्ग व मोक्ष का साधनभूत है। जिस प्रकार छिद्र सहित हाथों में जल ज्यादा देर तक नहींं ठहरता है अर्थात् नष्ट हो जाता है, उसकी प्रकार इस वीतराग नग्न मुद्रा के दर्शन से वन्दना आदि करने से पाप कर्म का तीव्र उदय भी अधिक समय तक नहीं ठहरता। ऐसी प्रशान्त दिगम्बर मुद्रा का दर्शन पुण्य संचय करने वाला होता है और देवता भी इसके लिए तरसते हैं। विश्व विजेता सिकन्दर भी जब भारत आया था, तब वह भी इस वीतराग मुद्रा को देख मन्त्र मुग्ध हो गया था। आप ही लोग कहते हो &#8221; हे गुरुवर! शाश्वत सुख दर्शक यह नग्न स्वरूप तुम्हारा है जग की नश्वरता का सच्चा दिग्दर्श कराने वाला है।&#8221;</p>
<p><strong>जहां राग है, वहीं सुख नहीं</strong></p>
<p>सम्पूर्ण विश्व आज सुख चाहता है, शान्ति चाहता है और इस संसार में अगर शान्ति है, तो वह है वीतरागी सन्तों के पास, चलते-फिरते भगवन्तो के पास। जहां राग है, वहां सुख नहीं। वीतरागी संत तुम्बी के समान है। जिस प्रकार सुखी तुम्बी पानी में नहीं डूबती और उसका सहारा लेने बाला भी नहीं डूबता, ठीक उसी प्रकार, वीतरागी देव, गुरु हुआ करते हैं। जो इनका सहारा ले लेता है, वह भवसागर में कभी डूबता नहीं पार उतर जाता है। यह दिगम्बर मुद्रा देह से देहातीत होने की यात्रा का द्योतक है। वेदों में, पुराणों में इस दिगम्बर अवस्था को मंगलकारी माना है। इस मुद्रा का दर्शन मात्र कार्य की सफलता का द्योतक है। आचार्यों ने इसे यथाजात रूप कहा है अर्थात् जैसा जन्म के समय बालक होता है, वैसा ही यह स्वरूप है। दिशाएं हैं जिनकी अम्बर, वही सही दिगम्बर है। जिनके पास ना अम्बर (वस्त्र) है और ना आडम्बर (परिग्रह) है, वही सही में दिगम्बर है।</p>
<p><strong> नग्न मुद्रा पूजनीय</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि महाभारत के युद्ध में नारायण श्री कृष्ण ने युद्ध के समय अर्जुन से कहा &#8220;देखो पार्थ, उस ओर से दिगम्बर मुनि आ रहे हैं। यह महान मंगलकारी दर्शन होने से हमारी विजय निश्चित है। भारतीय सनातन संस्कृति मे वेदों, ग्रन्थों पुराणों को प्रमाण माना जाता है और सभी में यह निर्विकार नग्न मुद्रा सम्मानीय दृष्टि से पूज्यनीय स्वीकार की गई है। यह मुद्रा ही मुक्ति का साक्षात् कारण है।</p>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में हुए मुनि के प्रवचन : आपको जो बनना है, आप उनके पास जाएं &#8211; मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Mon, 01 May 2023 15:23:14 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि इस सत्र में हम आपके भविष्य को लेकर चर्चा करने जा रहे हैं। आपको जो बनना है आप उनके पास जाएं, उन पर विश्वास रखें। पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा की ये विशेष रिपोर्ट&#8230; कुम्हारी (दमोह)। साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि इस सत्र में हम आपके भविष्य को लेकर चर्चा करने जा रहे हैं। आपको जो बनना है आप उनके पास जाएं, उन पर विश्वास रखें। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा की ये विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>कुम्हारी (दमोह)।</strong> साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि इस सत्र में हम आपके भविष्य को लेकर चर्चा करने जा रहे हैं। आपको जो बनना है आप उनके पास जाएं, उन पर विश्वास रखें। आचार्य पूज्यपाद स्वामी जी इष्टोपदेश ग्रन्थ में लिखते हैं कि &#8220;ददाति यत्तु यस्यास्ति, सुप्रसिद्धमिदं वच:&#8221; अर्थात् जिसके पास जो होता है, वह वही देता है। यह वचन प्रसिद्ध है। यदि आपको वैज्ञानिक बनना है तो वैज्ञानिक पर विश्वास रखना पड़ेगा, राजनीति के क्षेत्र में जाना है तो राजनेता के पास जाना होगा, ठीक इसी प्रकार आपको वीतरागी बनना है तो वीतरागी देव, गुरु के पास जाना ही होगा। &#8220;अन्यथा शरणं नास्ति&#8221; अन्य प्रकार की शरण आपके लिये कल्याण का मार्ग नही है। आज सबसे बड़ी समस्या है मार्गदर्शन का अभाव और इसका सबसे ज्यादा असर नवयुवक वर्ग पर भी पड़ रहा है। मार्गदर्शन के अभाव मे आज समाज भटक रहा है। मार्ग दर्शन किससे लिया जाये ? यह प्रश्न आज ज्वलंत समस्या के समान सामने खड़ा है। क्योंकि हर कोई मार्गदर्शक बना फिरता है।</p>
<p><strong>किसी की बातों में न आएं</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि मार्गदर्शन वही कर सकता है, जो उस मार्ग पर चलना जानता हो या चल रहा हो। बिना मार्ग को जाने और चले, अगर कोई मार्गदर्शन, कर रहा है तो यह उसका अज्ञान ही कहलायेगा। आचार्य कहते हैं &#8221; य: यत्र अनभिज्ञ: स: तत्र बाल:&#8221;जो जिस क्षेत्र मे अनभिज्ञ है, वह उस क्षेत्र मे बालक है। आपने डॉक्टर की उपाधि तक प्राप्त नहीं की और तत् संबधी प्रशिक्षण भी नहीं लिया और आप आपरेशन करना चाहते हैं। यह कहां की समझदारी है? और इस तरह आप स्वयं का और सामने वाले दोनों का अहित ही कर रहे हैं। आचार्यों ने अपने पूर्वाचार्यों के अनुसार अनुकम्पा दृष्टि के साथ आपके लिये कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया है और आप यद्वा &#8211; तद्वा किसी की भी बातों मे आकर अपना स्वयं का और अपने संबंधियों का भविष्य भी बिगाड़ रहे हैं।</p>
<p><strong>जनता हो रही है भ्रमित</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने यह भी कहा कि जैनदर्शन की सबसे बड़ी विशेषता है दिगम्बरत्व। आज उस दिगम्बरत्व को स्वीकार करने में असमर्थ लोगों के द्वारा जो विष भाषण किया जा रहा है, उसके कारण भोली -भाली जनता भ्रमित हो रही है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में इस तरह की प्रवृति ज्यादा देखने को मिलती है। जिनेन्द्र देव की, आचार्यों की वाणी को गौण करके अपने मन के अनुरूप आचरण करने वाले अपना नया पन्थ और नया साहित्य निर्माण करने में लगे हैं। ख्याति, पूजा, लाभ के प्यासे यह अभदन्त प्राणी अपनी वाह-वाह में लगे हैं। अपनी ढपली &#8211; अपना राग। स्वयं तो निराधार और जग को दिखा रहे आधार। आपका वर्तमान ही आपका भविष्य निर्धारित करता है। इसलिये वर्तमान को सुधारने का प्रयास करें, जिससे भविष्य अपने आप ही संवर जाएगा।</p>
<p><strong>विवेक का प्रयोग करें</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में प्रायः करके ऐसे लोग अपनी पैठ बनाये हुए हैं। ‌शहरी क्षेत्रों में बुद्धिजीवी वर्ग का प्रभाव होने से इस तरह की गलत धारणाओं का प्रचार-प्रसार नहीं हो पाता। मात्र ग्रामीण अशिक्षित वर्ग ही ऐसी विपरीत मान्यताओं को सही मानकर बैठा हुआ है। ग्रामीण शिक्षित वर्ग भी इन्हें स्वीकार्यता नहीं देता है। अपने विवेक का प्रयोग करना प्रत्येक प्राणी का धर्म है। अपने लिये क्या सही है? क्या गलत है? आप सभी जानते है। इसलिए विष के समान इन गलत धारणाओ को समूल नष्ट कर अपने इष्ट की सिद्धि करें, जिससे हम सभी का जन्म-मरण रूपी कष्ट मिट सके।</p>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में हुए मुनि के प्रवचन : प्रतिमा का प्रतिकार भारतीय सनातन संस्कृति पर कुठाराघात है &#8211; मुनि श्री निरंजन सागर </title>
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		<pubDate>Sun, 30 Apr 2023 09:33:25 +0000</pubDate>
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<p><strong>साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि इस सत्र में हम प्रतिमा अर्थात् मूर्ति के महत्त्व को समझने का प्रयास करेंगे। आचार्यों ने ग्रन्थों में निक्षेप अर्थात् न्यास की व्यवस्था हम सभी के लिये दी है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा की ये विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>कुम्हारी (दमोह)।</strong> साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि इस सत्र में हम प्रतिमा अर्थात् मूर्ति के महत्त्व को समझने का प्रयास करेंगे। आचार्यों ने ग्रन्थों में निक्षेप अर्थात् न्यास की व्यवस्था हम सभी के लिये दी है। जिसके चार भेद हैं नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव। नाम निक्षेप जिसके माध्यम से आप और हम सभी का व्यवहार चलता है, जैसे -हमारा नाम मुनि निरंजन सागर है। स्थापना निक्षेप जिसके माध्यम से &#8216;यह वही है। इस रूप ज्ञान होता है। जैसे:-चित्र, प्रतिमा, मूर्ति, प्रतिबिम्ब आदी में &#8220;यह वही है&#8221; &#8220;यह भगवान का चित्र है&#8221; &#8220;यह भगवान की प्रतिमा है&#8221; इस प्रकार स्थापित करना स्थापना निक्षेप है। यह अनादिकालीन व्यवस्था है। इस व्यवस्था को स्वीकार नहीं करना अपने आपमें मूर्खता का प्रतीक है। जिस किसी व्यक्ति ने निक्षेप की व्यवस्था को नहीं जाना, नहीं माना, उस व्यक्ति ने अपनी मन-मानी ही की है।</p>
<p><strong> परिषह-उपसर्ग सहन करने पर ही पूज्यता आती है</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि एक बार किसी विद्वान को एक सभा में आमन्त्रित किया गया और उनसे पूछा कि आप इन पत्थरों को क्यों पूजते हो? क्या होता है? इन पत्थरों के दर्शन से, पत्थरों के अभिषेक से, पत्थरों की पूजा भक्ति और आरती आदि करने से ? उस विद्वान ने उस सभा में चहुंओर देखा और पाया कि सभा में कुछ चित्र लगे थे जो किन्हीं व्यक्ति विशेष के थे। उसने कहा मुझे यह सब चित्र उतरवाकर दे दीजिये। फिर मैं आपको आपके प्रश्न का उत्तर देता हूं। जैसे ही उसको वह चित्र दिये तुरन्त ही उसने उन चित्रों पर थूकना प्रारम्भ कर दिया। यह देख पूरी सभा आक्रोशित हो गई। सभा को आक्रोशित देख उनसे कहा, &#8220;आप लोगों का आक्रोशित होना व्यर्थ है&#8221; जब आप प्रतिमा को पत्थर कहकर उस प्रतिमा अर्थात् भगवान के प्रतिबिंब का अनादर कर सकते हैं तो यह चित्र भी तो कागज है और कागज का अनादर आप सहन नहीं कर पा रहे हैं। यह कैसा न्याय है? जब पाषाण की प्रतिमा बनाते हैं, तब पाषाण की पूजा नहीं, बल्कि उस पाषाण में जो छैनी- हथोड़े की मार से परमात्मा का आकार उभर कर आया फिर उसमें मन्त्रों द्वारा गुणों का अवरोपण किया, उन गुणों की पूजा है, ना कि पाषाण की। उस पाषाण ने छैनी- हथोड़ा, गर्मी- वर्षा आदि उपसर्ग- परिषह को साक्षात् परमात्मा के समान जीता है। जो बताती है कि परिषह-उपसर्ग सहन करने पर ही पूज्यता आती है इसलिए वह पाषाण भी परमात्मा बनकर पूज्य हुआ है। जिस प्रकार बच्चों के लिए छोटे-छोटे कंकर आदि घटा-बढ़ाकर अंकों का और गोला, डण्डा आदि आकृति बनाकर शब्दों का ज्ञान कराया जाता है, उसी प्रकार परमात्मा का ज्ञान, धातु, पाषाण आदि की मूर्ति बनाकर किया जाता है, अत: मूर्ति को भगवान का प्रतीक मानकर पूजा जाता है। मूर्ति स्थापित करके पूजा करते समय यह धातु की है या पाषाण की है, इस प्रकार ध्यान करके भगवान की पूजा नहीं की जाती है, बल्कि आप वीतरागी हैं, अनन्त गुणों से युक्त हैं और घातिया कर्मों को नष्ट किया है, इत्यादि प्रकार से स्तुति की जाती है।</p>
<p><strong>होता है मोक्ष का मार्ग प्रशस्त</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि निर्जीव प्रतिमा से भी वीतरागता की ओर दृष्टि जाती है, राग-द्वेष की ओर दृष्टि नहीं जाती है। यही तो मूर्ति के माध्यम से, मूर्तिमानों के गुणों को ध्यान करना, मूर्ति पूजा का मुख्य ध्येय हुआ करता है। आचार्य कहते हैं मूर्ति के दर्शन, भक्ति, पूजन आदि के द्वारा अनादिकालीन अज्ञान अन्धकार रूपी मित्थात्व को भी नष्ट किया जा सकता है। जिससे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। इसका साक्षात् उदाहरण है कुंडलपुर के बड़े बाबा आदिनाथ भगवान और गोम्मटेश बाहुबली, जिनके दर्शन करने को दूर-दूर से लोग आते हैं।</p>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग सत्र : बिना मन को मारे राम नहीं बना जा सकता &#8211; मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Thu, 30 Mar 2023 13:41:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[इंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि निरंजन सागर महाराज ने कहा कि आज हम उन्हें याद करेंगे, जो हम सभी के अन्तरंग मे रमा है, जिसे राम कहते हैं। पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा/संजय जैन हटा की विशेष रिपोर्ट&#8230; हटा। साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि निरंजन सागर महाराज ने कहा कि आज हम [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>इंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि निरंजन सागर महाराज ने कहा कि आज हम उन्हें याद करेंगे, जो हम सभी के अन्तरंग मे रमा है, जिसे राम कहते हैं। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा/संजय जैन हटा की विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>हटा।</strong> साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि निरंजन सागर महाराज ने कहा कि आज हम उन्हें याद करेंगे, जो हम सभी के अन्तरंग मे रमा है, जिसे राम कहते हैं। श्री रामजी का जीवन, राजभवन से वन और वन से राजभवन एवं पुनः राजभवन से वन की यात्रा का एक ऐसा जीवन्त अनोखा उदाहरण है, जिसने सम्पूर्ण विश्व को एक आदर्श मार्ग दिखा दिया।</p>
<p>सम्पूर्ण विश्व के इतिहास में ऐसे दो महापुरुष हुये है, जो सर्वाधिक प्रसिद्धि को प्राप्त हुये हैं। एक हैं भगवान आदि ब्रह्मा आदिनाथ, जिन्हें ऋषभनाथ, वृषभनाथ भी कहते हैं। जिनके पुत्र सम्राट भरत चक्रवर्ती के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा। दूसरे हैं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी। दोनों महापुरुषों में कई समानताएं है।</p>
<p>जैसे दोनों का जन्म नवमी के दिन ही हुआ। दोनों का जन्म चैत्र मास में ही हुआ। दोनों उसी भव से मोक्ष को प्राप्त हुये। दोनों के पुत्र परम पराक्रमी थे। दोनों शलाका अर्थात् प्रसिद्ध पुरुष थे। दोनों उत्तम लक्षणों से युक्त शरीर के धारी थे। दोनों देवताओं की तरह ही रूप लावण्य धारी थे अर्थात् दोनों के दाढी-मूंछ आदी नहीं थे।</p>
<p><strong>विश्वव्यापी हैं राम</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि राम विश्वव्यापी व्यक्तित्व हैं। जैनाचार्यों ने भी श्री रामजी के जीवन को विश्व के सामने रखा है। आचार्य रविषेण जी महाराज द्वारा लिखित ग्रन्थराज पद्मपुराण, जो की पद्म अर्थात् राम के जीवन के जानने का सशक्त माध्यम है एवं आचार्य गुणभद्र कृत उत्तर पुराण में भी रामजी का जीवन वृतान्त अंकित है। पूरे विश्व मे लगभग हजार प्रकार से राम का जीवन पढ़ने को प्राप्त होता है।</p>
<p>जब भी राम जी के जीवन के चक्र पर चिन्तन करते हैं हर बार एक नया राम सामने आता है। एक ऐसा महापुरुष, जिसने अपने लिये नहीं बल्कि दूसरों के लिये ही जीवन जिया है। पहले पिता के वचनों का मान रखा, फिर पत्नी के सम्मान के लिए युद्ध किया और फिर एक न्यायप्रिय राजा होने के नाते सीता सती की परीक्षा तक के डाली।</p>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग सत्र में प्रवचन : भय से मनुष्य को तब तक डरना चाहिये जब तक वह नहीं आया है -मुनिश्री निरंजन सागर महाराज </title>
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		<pubDate>Wed, 29 Mar 2023 10:26:52 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनिश्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि विपत्ति के समय भी अधीर नहीं होना चाहिए। जब सामने आई परिस्थिति का सामना करना तय है तो क्यों न धैर्य साहस से सामना किया जाये। पढ़िए संजय जैन हटा और राजेश रागी बकस्वाहा की यह रिपोर्ट&#8230; हटा। विपत्ति के समय भी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनिश्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि विपत्ति के समय भी अधीर नहीं होना चाहिए। जब सामने आई परिस्थिति का सामना करना तय है तो क्यों न धैर्य साहस से सामना किया जाये। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए संजय जैन हटा और राजेश रागी बकस्वाहा की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>हटा।</strong> विपत्ति के समय भी अधीर नहीं होना चाहिए। जब सामने आई परिस्थिति का सामना करना तय है तो क्यों न धैर्य साहस से सामना किया जाये। साइंस ऑफ लिविंग सत्र में आचार्य निरंजन सागर महाराज ने कहा कि ज्ञान ही दुःख का मूल है, ज्ञान ही भव का कूल है। राग सहित सो प्रतिकूल है, राग रहित सो अनुकूल है। चुन-चुन इनमें समुचित तू, मत चुन अनुचित भूल है। सब शास्त्रों का सार यही क्षमता बिन सब धूल है। सोचियेगा स्वयं आचार्य महाराज समता के लिए धैर्य के लिये शास्त्रों का सार कह रहे हैं। उन्होंने कहा कि अगर अपने जीवन में बड़े-बड़े ग्रन्थों को, वेदो को, पुराणों को पढ़ लिया, रट लिया पर आपके जीवन में समता नहीं आयी, शान्ति नहीं आयी, आपके जीवन में धैर्य का नामोनिशान तक नहीं तो ऐसा ज्ञान, मात्र भारभूत ही है। सहन वही कर सकता है, जिसने कषायों का दहन कर दिया है। इसका सीधा-सीधा अर्थ है कि आपकी सहनशीलता आपकी कषायहीनता को भी दर्शाती है। जिसने सहन करना सीख लिया, उसकी कर्म निर्जरा भी निश्चित है।</p>
<p><strong>सहन करने वाला होता है महावीर</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा, मार्गाच्यवन निर्जरार्थं परिषोढव्याः परीषहाः अर्थात् मार्ग से च्युतन होने के लिये और कमों की निर्जरा करने तो लिये जो सहन करने योग्य हो वो परीषह है। बिना अग्नि के ताप को सहन किये स्वर्ण में भी शुद्धता नहीं आती है। आज जितनी भी आत्मायें सिद्धालय में विराजमान हैं, उन्होंने भी अपनी सहनशीलता की परीक्षा दी है और उसका ही परिणाम है कि वे आज उस अनन्त सुख को भोग रहे हैं। भय से मनुष्य को तब तक डरना चाहिये जब तक वह नहीं आया है, परन्तु जब आ ही जाये तो निडर होकर उस का सामना करना चाहिये। कहते भी हैं कि मन के हारे हार और मन के जीते जीत, कषाय करने वाला अधीर होता है और सहन करने वाला महावीर होता है।</p>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग सत्र में प्रवचन : सहनशीलता से बड़ा कोई मोटिवेशनल फैक्टर नहीं है -मुनिश्री निरंजन सागर महाराज </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 28 Mar 2023 12:48:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
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		<category><![CDATA[साइंस ऑफ लिविंग]]></category>
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					<description><![CDATA[साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनिश्री निरंजन सागर महाराज ने सेल्फ मोटिवेशन अर्थात् आत्म अभिप्रेरणा का सेल्फ सेटिस्फेक्शन अर्थात् आत्म सन्तुष्टि का मंत्र बताया। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा मोटिवेशनल फैक्टर है। जो जितना अपने जीवन में सहनशील है, वह उतना ही अपने जीवन मे सन्तुष्ट है, सफल है। पढ़िए संजय जैन हटा और [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनिश्री निरंजन सागर महाराज ने सेल्फ मोटिवेशन अर्थात् आत्म अभिप्रेरणा का सेल्फ सेटिस्फेक्शन अर्थात् आत्म सन्तुष्टि का मंत्र बताया। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा मोटिवेशनल फैक्टर है। जो जितना अपने जीवन में सहनशील है, वह उतना ही अपने जीवन मे सन्तुष्ट है, सफल है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए संजय जैन हटा और राजेश रागी बकस्वाहा की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>हटा।</strong> साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनिश्री निरंजन सागर महाराज ने सेल्फ मोटिवेशन अर्थात् आत्म अभिप्रेरणा का सेल्फ सेटिस्फेक्शन अर्थात् आत्म सन्तुष्टि का मंत्र बताया। उन्होंने कहा कि आपकी अपनी सहनशीलता ही आपके जीवन का सबसे बड़ा मोटिवेशनल फैक्टर है। जो जितना अपने जीवन में सहनशील है, वह उतना ही अपने जीवन मे सन्तुष्ट है, सफल है। क्योंकि कहा जाता है कि जहां सन्तुष्टि है वहां सफलता है। आपने अपने जीवन की विपत्ति को सम्पत्ति क्यों नहीं माना ? इतिहास साक्षी है कि जिस किसी भी महापुरुष ने अपने जीवन में आयी विपत्ति को बिना आपत्ति स्वीकार किया है, उसका सहर्ष सामना किया है, उसे सहन किया है, वह विपत्ति उन महापुरुषों के लिये सम्पत्ति का काम कर गयी अर्थात् उन महापुरुषों ने उस विपत्ति को किस धीरता के साथ सहन किया।</p>
<p><strong>विपत्ति में न हों निराश </strong></p>
<p>ध्यान रखना दूध फटने पर वे लोग निराश नहीं होते, ना ही कभी उदास होते हैं, जिन्हें रसगुल्ले बनाना आता है। विपत्ति में धैर्य, अभ्युदय में क्षमा, सभा में वाक्पटुता, युद्ध में विक्रम, यश में अभिरुचि और ज्ञान का व्यसन, ये महापुरुषों के स्वाभाविक गुण हैं। किसी विद्वान ने कहा है कि दु:ख में घबराओ मत और सुख में कभी इतराओ मत। दुःख किसे नहीं आता। महापुरुषों ने भी अपने जीवन मे दुःख को दुःख मानकर सहनशक्ति के बल पर सहन किया है और परिणाम यह निकला कि वही दुःख भी उनके लिये सुख में परिवर्तित हो गया। सज्जनों का धन तो धैर्य ही है। जिसके पास धैर्य है, वह जो भी इच्छा करता है, प्राप्त कर सकता है। अपने धैर्य के बिना और कोई संकट से मनुष्य का उद्धार नहीं कर सकता। संकट के समय धैर्य धारण करना मानो आधी लड़ाई जीत लेना है। जो व्यक्ति स्वभाव से धैर्यवान है, वह महान है।</p>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग में प्रवचन : अर्थ ,काम और धर्म यह तीनों पुरुषार्थ ही त्रिवर्ग कहलाते हैं &#8211; मुनि श्री निरंजन सागर  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 11 Mar 2023 07:28:44 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Society]]></category>
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		<category><![CDATA[Kundalpur श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
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					<description><![CDATA[जिसने जीवन की वास्तविकता को समझ लिया है, उसने जीवन की सात्विकता को पा लिया है। यह बात मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने साइंस ऑफ लिविंग में कही। पढ़िये जयकुमार जैन जलज हटा/राजेश रागी बकस्वाहा की रिपोर्ट&#8230;  कुण्डलपुर। साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में हम हर दिन एक अनोखा प्रयास करते हैं अपने [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जिसने जीवन की वास्तविकता को समझ लिया है, उसने जीवन की सात्विकता को पा लिया है। यह बात मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने साइंस ऑफ लिविंग में कही। <span style="color: #ff0000;">पढ़िये जयकुमार जैन जलज हटा/राजेश रागी बकस्वाहा की रिपोर्ट&#8230; </span></strong></p>
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<p><strong>कुण्डलपुर।</strong> साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में हम हर दिन एक अनोखा प्रयास करते हैं अपने जीवन को समझने का। ताकि हम उस जीवन को भार नहीं उपहार बना सकें। जिसने जीवन की वास्तविकता को समझ लिया है, उसने जीवन की सात्विकता को पा लिया है। यह बात मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने कही। उन्होंने कहा कि वर्तमान परिपेक्ष में हमने लोगों के हिसाब से चलने का मन बना लिया है। जिससे वह सात्विकता और वास्तविकता पर भी पोता-पोती की जा रही है। हर एक कार्य की एक वय होती है। उस उम्र तक ही वह कार्य शोभनीय माना जाता है।</p>
<p>उसके बाद वह निंदनीय कार्य की श्रेणी में आ जाता है। आचार्य कहते हैं, जिसने त्रिवर्ग की समीचीनता को समझ लिया, उसने जीवन के रहस्य को समझ लिया है। यह जीवन का वर्गीकरण है यह सेंस आफ लिविंग है। अर्थ ,काम और धर्म यह तीनों पुरुषार्थ ही त्रिवर्ग कहलाते हैं। अर्थ अर्थात धनार्जन करना, काम अर्थात स्वदार संतोष व्रत। धर्म अर्थात सतकार्य जिससे स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति हो सके। क्लासिफिकेशन ऑफ लाइफ अर्थात जीवन का वर्गीकरण जो जैनाचार्यो ने किया है वैसा सूक्ष्म विवेचन कहीं भी देखने सुनने और पढ़ने को तक नहीं मिलता है। अर्थ, काम , धर्म और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों का अपना काल है , अपना उद्देश्य है और अपनी उपयोगिता है।</p>
<p>अर्थ पुरुषार्थ के लिए षट्कर्म की व्यवस्था दी है।काम पुरुषार्थ के लिए विवाह की व्यवस्था दी है। धर्म पुरुषार्थ के लिए अणुव्रत अथवा महाव्रत की व्यवस्था आचार्यों ने दी है। मोक्ष पुरुषार्थ के लिए श्रेणी आरोहण की व्यवस्था दी है। हमारे आत्म कल्याण की यह कुछ ऐसी अवस्थाएं हैं जिनके माध्यम से हम सभी के अंदर विद्यमान उस आत्म तत्व को सिद्ध किया जा सकता है। यह सभी जानकारी आपको भी हो सकती है। परंतु इसका प्रयोग का कभी विचार नहीं किया, इसलिए यह संसार चक्र चल रहा है। आचार्य कहते हैं कि परे मोक्ष हेतु अर्थात धर्म पुरुषार्थ और मोक्ष पुरूषार्थ मोक्ष के कारण है। अभी आप लोगों से पूछा जाए कि बताओ किस-किस को मोक्ष जाना है? उत्तर मिला सभी को।</p>
<p>पर क्या हमारे लक्षण हमारे लक्ष्य के अनुरूप हैं। मोक्ष हम सभी का लक्ष्य है तो उसके अनुरूप ही हमारे लक्षण होना चाहिए। आज तक किसी ने नहीं सुना होगा कि पोता- पोती करके किसी को मोक्ष मिला है। पोता- पोती का मतलब श्रृंगार। श्रृंगार काम पुरुषार्थ के अंतर्गत आता है। वह भी एक उम्र तक ही सही लगता है। पोता -पोती को संस्कार देना है तो उनके सामने पोता -पोती मत करो। आज प्रायः करके सभी की एक सामान्य शिकायत रहती है कि बच्चे हमारी सुनते नहीं है। हम आज आपसे यह प्रश्न करते हैं कि क्या आप आचार्यों की सुन रहे हैं। आज कोई भी वृद्धावस्था को स्वीकार करना नहीं चाहता। उसके लिए नित नए प्रयोगों के माध्यम से उस पर विजय प्राप्त करना चाहता है।</p>
<p>जिस प्रकार नए-नए युवा- युवती विवाहित हो कर जीवन यापन करना चाहते हैं, उसी प्रकार से आज वृद्धजन भी उसी प्रकार जीवन यापन करना चाहते हैं। यह एक ऐसी निंदनीय मानसिकता बन चुकी है जिससे उनके जीवन से सात्विकता खोती जा रही है। कहते हैं कि लोगों के लिए करना पड़ता है। सब के हिसाब से रहना पड़ता है। वक्त और जमाने के हिसाब से चलना पड़ता है। आपको इस वृद्धावस्था में जब पोता- पोती (मेक-अप )में आनंद आ रहा है। फिर आपको देखने वाले पोता -पोती पर उसका क्या असर होगा आपने इस पर कभी कोई विचार किया है। आप उन्हें कौन से संस्कार दे रहे हैं? यह प्रश्न बहुत बड़ा है। इसका उत्तर भी आपके पास है पोता पोती बालो ध्यान से सुनो अगर आपको अपने पोता -पोती को संस्कारित करना है तो पोता- पोती लीपा-पोती छोड़ो।</p>
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