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	<title>सरावगी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>2900 वें जन्मकल्याणक पर विशेष: काशी के नाथ तीर्थंकर पार्श्वनाथ </title>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के तेईसवें तीर्थंकर पा‌र्श्वनाथ भगवान के 2900वें जन्मकल्याणक पर पढ़िए विशेष आलेख, जिसे लिखा है राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित प्रो. अनेकांत कुमार जैन ने । प्रो. अनेकांत नई दिल्ली के श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में जैन दर्शन विभाग में आचार्य हैं । जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकरों में से पांच तीर्थंकरों [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के तेईसवें तीर्थंकर पा‌र्श्वनाथ भगवान के 2900वें जन्मकल्याणक पर पढ़िए विशेष आलेख, जिसे लिखा है राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित प्रो. अनेकांत कुमार जैन ने । प्रो. अनेकांत नई दिल्ली के श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में जैन दर्शन विभाग में आचार्य हैं ।</strong></p>
<hr />
<p>जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकरों में से पांच तीर्थंकरों का जन्म अयोध्या में हुआ और चार तीर्थंकरों का जन्म काशी,वाराणसी में हुआ था । जैन धर्म के अंतिम और चौबीसवें तीर्थंकर भगवान् महावीर से लगभग ३०० वर्ष पूर्व अर्थात् आज से लगभग तीन हज़ार वर्ष पूर्व तेइसवें तीर्थंकर पा‌र्श्वनाथ का जन्म बाईसवें तीर्थकर भगवान नेमिनाथ के तिरासी हजार सात सौ पचास वर्ष बाद काशी (बनारस) के राजा काश्यप गोत्रीय अश्वसेन तथा रानी वामादेवी के घर पौषकृष्ण एकादशी के दिन अनिल योग में हुआ था। शास्त्रों के अनुसार तीर्थंकर पा‌र्श्वनाथ के शरीर की कांति धान के छोटे पौधे के समान हरे रंग की थी। मान्यता यह है कि पूर्व जन्मों की श्रृंखला में पा‌र्श्वनाथ पहले भव (जन्म) में ब्राह्मण पुत्र मरुभूति थे तथा उन्हीं के बडे़ भाई कमठ ने द्वेषवश उन पर पत्थर की शिला पटककर उनका प्राणांत कर दिया था। वही कमठ विभिन्न जन्मों में उनके साथ अपना वैर निकालता रहा। किन्तु समता स्वभावी तीर्थंकर पा‌र्श्वनाथ ने किसी जन्म में कभी उसका प्रतिकार नहीं किया और वे प्रत्येक विपत्तियां धैर्यपूर्वक सहन करते रहे। फलस्वरूप अंतिम भव में पा‌र्श्वनाथ का जन्म एक राजघराने में हो गया। किन्तु राजा के यहां सुलभ संसार की सभी भोग संपदाएं विरक्त पा‌र्श्वनाथ को आसक्त नहीं बना सकीं। तीस वर्ष की युवावस्था में वे प्रव्रजित (वैरागी) हो गए ।</p>
<p>पार्श्व पुराण के अनुसार एक दिन वे देवदारु वृक्ष के नीचे ध्यान में लीन बैठे थे। उसी समय कमठ (जो इस जन्म में शंबर नाम का असुर था) आकाश मार्ग से जा रहा था। उसने पा‌र्श्वनाथ को तपस्या करते देखा तो उसे पूर्व जन्मों का बैर स्मरण हो गया । उनसे पुनः बदला लेने के लिए वह उनपर महागर्जना तथा महावृष्टि करने लगा। इसी बीच एक वही सर्प का जोड़ा धरणेंद्र और पद्मावती के रूप में महायोगी पा‌र्श्वनाथ की रक्षा के लिए स्वत: आ गया,जिसको राजकुमार पार्श्व ने मरते समय महामंत्र सुनाया था । उन्होंने उनके मस्तक पर अपना फन फैलाकर कमठ के उपसर्ग (व्यवधान) से उनकी रक्षा की भावना और प्रयास किया । इन सभी घटनाओं से भी विरक्त पा‌र्श्वनाथ अपनी तपस्या से विमुख नहीं हुए और उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हो गई। कैवल्य ज्ञान प्राप्त होने के बाद उनका समवशरण (धर्मसभा) भारत के विभिन्न स्थलों पर लगा, जहां उन्होंने उपदेशों के माध्यम से सभी जीवों को आत्मकल्याण का मार्ग बतलाया। उन्होंने लगभग सत्तर वर्ष तक विहार किया |</p>
<p>उनके समवशरण में स्वयंभू आदि लेकर दस गणधर थे, सोलह हजार मुनिराज, तथा 38000 दीक्षित आर्यिकायें थीं जिसमें प्रमुख आर्यिका का नाम सुलोचना था | एक लाख श्रावक थे और तीन लाख श्राविकाएं थीं | अंत में बिहार में स्थित सम्मेद शिखर पर प्रतिमा योग धारण कर विराजमान हो गए और श्रावण शुक्ला सप्तमी के दिन वहीं से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई थी । उस समय इनकी मुक्ति के साथ साथ 3600 मुनि भी मोक्ष गए थे और उसके अनंतर तीन वर्ष के भीतर इनके 6200 शिष्य मुनिगण को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी । वर्तमान में यह जैन धर्मावलम्बियों का महान पवित्र तीर्थ क्षेत्र है । इसे पार्श्वनाथ हिल के नाम से भी ख्याति प्राप्त है ।</p>
<p>बारहवीं शती के हरियाणा के जैन कवि बुध श्रीधर ने अपभ्रंश भाषा में तीर्थंकर पार्श्वनाथ के जीवन पर आधारित ‘पासणाहचरिउ’ लिखा है जिसकी प्रशस्ति में उन्होंने दिल्ली के हिन्दू सम्राट अनंगपाल के बारे में तथा दिल्ली के तत्कालीन इतिहास की जानकारी दी है अन्यथा मुग़ल सल्तनत के पूर्व की दिल्ली का इतिहास जानना बहुत मुश्किल हो गया था । भारत में प्रसिद्ध नाथ संप्रदाय और नाग पूजा के इतिहास को भी तीर्थंकर पार्श्वनाथ से जोड़कर देखा जाता है ।</p>
<p>तीर्थंकर पा‌र्श्वनाथ के मंदिर भारत में हजारों की संख्या में हैं। बिजौलिया के पार्श्वनाथ,सूरत का चिन्तामणि पार्श्वनाथ मंदिर,द्रोणगिरि के पार्श्वनाथ मंदिर,नैनागिरी सिद्ध क्षेत्र का पार्श्वनाथ मंदिर ,महुवा के विघ्नहर पार्श्वनाथ,दिल्ली चांदनी चौक का प्रसिद्ध लाल जैन मंदिर आदि अन्यान्य मंदिर बहुत ही ज्यादा प्रसिद्ध हैं । खजुराहो का पार्श्वनाथ मंदिर विश्व प्रसिद्ध है । वाराणसी ,काशी में भेलूपुर स्थित श्री पार्श्वनाथ जैन मंदिर उनका जन्म स्थान माना जाता है ।</p>
<p>तीर्थंकर पा‌र्श्वनाथ के अतिशय क्षेत्रों में अहिच्छत्र पार्श्वनाथ,वागोल पार्श्वनाथ ,नागफणी पार्श्वनाथ ,चंवलेश्वर पार्श्वनाथ, अन्देश्वर पार्श्वनाथ ,अड़िन्दा पार्श्वनाथ ,बिजौलियां पार्श्वनाथ , अन्तरिक्ष पार्श्वनाथ ,मक्सी पार्श्वनाथ ,,महुवा-पार्श्वनाथ आदि अन्यान्य तीर्थ क्षेत्र बहुत प्रसिद्ध हैं ।</p>
<p>इनका चिन्ह सर्प है और उनकी पहचान मस्तक के ऊपर सर्प के फण से की जाती है,यद्यपि बिना फण वाली प्रतिमाएं भी प्राचीन काल से ही मिलती हैं तथापि प्रायः प्रतिमाएं फणयुक्त ही होती हैं । आचार्यों और विद्वानों ने उनकी स्तुति में हजारों स्तुतियाँ स्तोत्र लगभग हर भाषा में लिखे हैं । जैन भक्ति साहित्य का आधा से अधिक भाग तीर्थंकर पार्श्वनाथ को ही समर्पित हैं । वर्तमान में सुप्रसिद्ध भजन ‘तुमसे लागी लगन ,ले लो अपनी शरण,पारस प्यारा &#8230;.प्रत्येक भक्त के कंठ का हार बना हुआ है | जैन परंपरा में अधिकांश तंत्र मन्त्र का सम्बन्ध भी पार्श्वनाथ की उपासना से ही है | तीर्थकर पा‌र्श्वनाथ का जीवन में कष्टों में भी समता भाव धारण करने का एक महान उदाहरण है ।</p>
<p>आज हमारे जीवन में भी थोड़ी-सी अनुकूलता हो तो हम फूले नहीं समाते और जरा-सा कष्ट हो तो हाय-तौबा मच देते हैं। हमें तीर्थंकर पा‌र्श्वनाथ के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए कि कष्ट और विपत्ति में भी हम कैसे दुखों से निस्पृह बने रह सकते हैं। उनसे हम सुख-दुख में समता की प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं और अपना जीवन सुखी बना सकते हैं।</p>
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		<title>तीर्थंकर : चंदाप्रभु और पार्श्वनाथ : समानता और विषमताओं पर एक नजर </title>
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		<pubDate>Mon, 08 Jan 2024 03:23:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[तीर्थंकर चंदाप्रभु और पार्श्वनाथ का एक ही तिथि को जन्म और तप कल्याणक, सभी गुण समान पर कद, आयु, रंग और तीर्थकाल में जमीन आसमान का अंतर हैं। दो तीर्थंकरों के जन्म और तप कल्याणक पर विशेष आलेख पढ़िए । आलेख का संकलन किया है वरिष्ठ पत्रकार रत्नेश जैन, राजेश रागी बकस्वाहा ने । पौष [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>तीर्थंकर चंदाप्रभु और पार्श्वनाथ का एक ही तिथि को जन्म और तप कल्याणक, सभी गुण समान पर कद, आयु, रंग और तीर्थकाल में जमीन आसमान का अंतर हैं। दो तीर्थंकरों के जन्म और तप कल्याणक पर विशेष आलेख पढ़िए । <span style="color: #ff0000;">आलेख का संकलन किया है वरिष्ठ पत्रकार रत्नेश जैन, राजेश रागी बकस्वाहा ने ।</span></strong></p>
<hr />
<p>पौष कृष्ण एकादशी जो इस वर्ष 2024 के अंग्रेजी कलैंडर के पहले ही रविवार 07 जनवरी को है , वही दि , जिस दिन दो तीर्थंकरों का जन्म हुआ और तप भी धारण किया , यानि आप कह सकते हैं कि तिथि एक तीर्थंकर दो कल्याणक चार । पूरे वर्ष में ऐसा अनोखा एक ही दिन है पौष कृष्ण एकादशी । वैसे सभी तीर्थंकर गुणों के आइने से समान होते हैं, इतने गुण कि गुरु बृहस्पति भी गुणगान करें तो जीवन पूरा हो जाये पर गुणों की जानकारी पूरी ना हो। दोनों तीर्थंकर फिर भी रंग, कद, आयु और तीर्थकाल में जमीन आसमान का अंतर है जानते हैं ऐसे ही कुछ रोचक तथ्य &#8211;</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-54065" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/01/IMG-20240108-WA0004.jpg" alt="" width="1028" height="717" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/01/IMG-20240108-WA0004.jpg 1028w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/01/IMG-20240108-WA0004-300x209.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/01/IMG-20240108-WA0004-1024x714.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/01/IMG-20240108-WA0004-768x536.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/01/IMG-20240108-WA0004-990x690.jpg 990w" sizes="(max-width: 1028px) 100vw, 1028px" /></p>
<p>-दोनों का जन्म उत्तरप्रदेश में हुआ, 8वें तीर्थंकर श्री चन्दाप्रभु का चन्द्रपुर नगर की महारानी लक्ष्मणा देवी के गर्भ से वहीं 23वें तीर्थंकर पार्श्व प्रभु का काशी (बनारस) में महारानी वामा देवी के गर्भ से।</p>
<p>&#8211; चंदाप्रभु का जन्म 7 वें तीर्थंकर श्री सुपार्श्वजी 900 करोड़ सागर के बाद हुआ, वहीं पारस प्रभु का जन्म 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ जी के 83 हजार 650 वर्ष बाद हुआ।</p>
<p>-चंदाप्रभु वैजयंत नामक अनुत्तर विमान से आयु पूर्ण कर चन्द्रपुर में माता के गर्भ में आये वहीं पारसनाथ जी प्रणत स्वर्ग में आयु पूर्ण कर इस धरा पर जन्मे।</p>
<p>-चंदाप्रभु के शरीर का वर्ण चन्द्रमा के समान श्वेत था वहीं पारस प्रभु का शरीर हरित श्याम रंग का था।</p>
<p>&#8211; जहां चंदाप्रभु की आयु ढाई लाख वर्ष पूर्व थी (यानि 2.5 लाख गुना 84 लाख गुना 84 लाख वर्ष) वहीं पारस प्रभु की आयु मात्र सौ वर्ष थी।</p>
<p>&#8211; चंदाप्रभु का कद 900 फुट था वहीं पारस प्रभु का कद साढ़े 13 फुट था।</p>
<p>&#8211; चंदाप्रभु का राज्यकाल साढ़े 6 लाख पूर्व 24 पूर्वांग रहा वहीं पारस प्रभु ने ना राज्य किया न ही विवाह किया।</p>
<p>&#8211; श्री चंदाप्रभु का जन्म इक्ष्वाकु वंश में हुआ और पारस प्रभु का उग्र वंश में हुआ।</p>
<p>&#8211; श्री चंदाप्रभु जी में अधु्रवादि भावनाओं का चिंतवन करने से वैराग्य की भावना बलवती हो गई वहीं पारसप्रभु जाति स्मरण से वैराग्य की ओर बढ़े।</p>
<p>&#8211; चंदाप्रभु जी को तप के लिये बढ़ते देख एक हजार राजाओं ने भी दीक्षा ग्रहण की वहीं पारस प्रभु को दीक्षा की ओर बढ़ते देख 300 राजा उस ओर बढ़े पर दिन एक ही था &#8211; पौष कृष्ण एकादशी।</p>
<p>&#8211; चंदाप्रभु को 3 माह के तप के बाद केवलज्ञान की प्राप्ति हुई वहीं चार महीने तप के बाद पारस प्रभु को प्राप्ति हुई।</p>
<p>&#8211; चंदाप्रभु का समोशरण 100 किमी विस्तार का था वहीं पारस प्रभु का समोशरण 15 किमी का था।</p>
<p>&#8211; चंदाप्रभु के 93 गणधर थे वहीं पारसप्रभु के 10 गणधर।</p>
<p>&#8211; दोनों ने ही सम्मेद शिखरजी से मोक्ष निर्वाण प्राप्त किया पर चंदाप्रभु ने बिल्कुल पूर्व दिशा में ललित कूट से वहीं पारसप्रभु ने उसके विपरीत पश्चिम दिशा में स्वर्णभद्र कूट से।</p>
<p>&#8211; चंदा प्रभु जी का तीर्थकाल 90 करोड़ सागर चार पूर्वांग का रहा, वहीं पारसप्रभु का तीर्थकाल मात्र 278 वर्ष का रहा 24 तीर्थंकरों में सबसे छोटा तीर्थकाल और फिर भी सबसे लोकप्रिय तीर्थंकर सबसे ज्यादा प्रतिमायें पारस प्रभु की हैं।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-54066" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/01/IMG-20240108-WA0003.jpg" alt="" width="805" height="706" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/01/IMG-20240108-WA0003.jpg 805w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/01/IMG-20240108-WA0003-300x263.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/01/IMG-20240108-WA0003-768x674.jpg 768w" sizes="(max-width: 805px) 100vw, 805px" /></p>
<p>ऐसी अनेक विभिन्नताओं के बावजूद दोनों ही तीर्थंकरों के अन्य तीर्थंकरों की तरह सभी गुण समान थे। आज हम जैन बंधु ही ऐसे अद्वितीय दिन के प्रचार प्रसार व गुणगान को भूल बैठे हैं और अपेक्षा करते हैं अन्य से कि वो आगे नहीं आते। अपने कर्तव्यपथ से भटके जैन समाज में नेतृत्वहीनता बड़ी कमेटियों की उत्साहहीनता इसका बड़ा कारण है। अपनी संस्कृति व धर्म के प्रसार के लिये हमें ही आगे आना होगा। बोलिये 8वें तीर्थंकर श्री चन्द्रप्रभ व 23वें तीर्थंकर श्री पारस प्रभु के 2900वें जन्म &#8211; 2870वें तप कल्याणक की जय-जय-जय।</p>
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		<title>2900वें जन्मकल्याणक पर विशेष : जैन तीर्थ नैनागिरि में प्रथम बार आया था तीर्थंकर पार्श्वनाथ का समवशरण </title>
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		<pubDate>Mon, 08 Jan 2024 03:18:35 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के तेईसवें तीर्थंकर पा‌र्श्वनाथ भगवान के 2900वें जन्मकल्याणक पर पढ़िए विशेष आलेख, जिसका आंकलन किया है वरिष्ठ पत्रकार रत्नेश जैन और राजेश रागी बकस्वाहा ने। नैनागिरी से मनोज नायक की रिपोर्ट    नैनागिरी। जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकरों में से पांच तीर्थंकरों का जन्म अयोध्या में हुआ और चार तीर्थंकरों का जन्म काशी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के तेईसवें तीर्थंकर पा‌र्श्वनाथ भगवान के 2900वें जन्मकल्याणक पर पढ़िए विशेष आलेख, जिसका आंकलन किया है वरिष्ठ पत्रकार रत्नेश जैन और राजेश रागी बकस्वाहा ने। <span style="color: #ff0000;">नैनागिरी से मनोज नायक की रिपोर्ट   </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>नैनागिरी।</strong> जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकरों में से पांच तीर्थंकरों का जन्म अयोध्या में हुआ और चार तीर्थंकरों का जन्म काशी , वाराणसी में हुआ था । जैन धर्म के अंतिम और चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर से लगभग 300 वर्ष पूर्व अर्थात् आज से लगभग तीन हज़ार वर्ष पूर्व तेईसवें तीर्थंकर पा‌र्श्वनाथ का जन्म बाईसवें तीर्थकर भगवान नेमिनाथ के तिरासी हजार सात सौ पचास वर्ष बाद काशी (बनारस) के राजा काश्यप गोत्रीय अश्वसेन तथा रानी वामादेवी के घर पौषकृष्ण एकादशी के दिन अनिल योग में हुआ था। शास्त्रों के अनुसार तीर्थंकर पा‌र्श्वनाथ के शरीर की कांति धान के छोटे पौधे के समान हरे रंग की थी। मान्यता यह है कि पूर्व जन्मों की श्रृंखला में पा‌र्श्वनाथ पहले भव (जन्म) में ब्राह्मण पुत्र मरुभूति थे तथा उन्हीं के बडे़ भाई कमठ ने द्वेषवश उन पर पत्थर की शिला पटककर उनका प्राणांत कर दिया था।</p>
<p>वही कमठ विभिन्न जन्मों में उनके साथ अपना वैर निकालता रहा। किन्तु समता स्वभावी तीर्थंकर पा‌र्श्वनाथ ने किसी जन्म में कभी उसका प्रतिकार नहीं किया और वे प्रत्येक विपत्तियां धैर्यपूर्वक सहन करते रहे। फलस्वरूप अंतिम भव में पा‌र्श्वनाथ का जन्म एक राजघराने में हो गया। किन्तु राजा के यहां सुलभ संसार की सभी भोग संपदाएं विरक्त पा‌र्श्वनाथ को आसक्त नहीं बना सकीं। तीस वर्ष की युवावस्था में वे प्रव्रजित (वैरागी) हो गए ।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-54053" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/01/IMG-20240108-WA0002.jpg" alt="" width="520" height="868" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/01/IMG-20240108-WA0002.jpg 520w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/01/IMG-20240108-WA0002-180x300.jpg 180w" sizes="(max-width: 520px) 100vw, 520px" /></p>
<p>पार्श्व पुराण के अनुसार एक दिन वे देवदारु वृक्ष के नीचे ध्यान में लीन बैठे थे। उसी समय कमठ (जो इस जन्म में शंबर नाम का असुर था) आकाश मार्ग से जा रहा था। उसने पा‌र्श्वनाथ को तपस्या करते देखा तो उसे पूर्व जन्मों का बैर स्मरण हो गया । उनसे पुनः बदला लेने के लिए वह उनपर महागर्जना तथा महावृष्टि करने लगा। इसी बीच एक वही सर्प का जोड़ा धरणेंद्र और पद्मावती के रूप में महायोगी पा‌र्श्वनाथ की रक्षा के लिए स्वत: आ गया,जिसको राजकुमार पार्श्व ने मरते समय महामंत्र सुनाया था । उन्होंने उनके मस्तक पर अपना फन फैलाकर कमठ के उपसर्ग (व्यवधान) से उनकी रक्षा की भावना और प्रयास किया । इन सभी घटनाओं से भी विरक्त पा‌र्श्वनाथ अपनी तपस्या से विमुख नहीं हुए और उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हो गई। कैवल्य ज्ञान प्राप्त होने के बाद उनका समवशरण (धर्मसभा) श्री दिगम्बर जैन सिद्धक्षेत्र रेशंदीगिरि नैनागिरि के अलावा भारत के विभिन्न स्थलों पर लगा, जहां उन्होंने उपदेशों के माध्यम से सभी जीवों को आत्मकल्याण का मार्ग बतलाया।</p>
<p>उन्होंने लगभग सत्तर वर्ष तक विहार किया | उनके समवशरण में स्वयंभू आदि लेकर दस गणधर थे , सोलह हजार मुनिराज तथा 38000 दीक्षित आर्यिकायें थीं , जिसमें प्रमुख आर्यिका का नाम सुलोचना था । एक लाख श्रावक थे और तीन लाख श्राविकाएं थीं । अंत में वर्तमान के झारखण्ड प्रदेश में स्थित सम्मेद शिखर पर प्रतिमा योग धारण कर विराजमान हो गए और श्रावण शुक्ला सप्तमी के दिन वहीं सम्मेद शिखर से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई थी । उस समय इनकी मुक्ति के साथ साथ 3600 मुनि भी मोक्ष गए थे और उसके अनंतर तीन वर्ष के भीतर इनके 6200 शिष्य मुनिगण को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी ।</p>
<p>वर्तमान में यह सम्मेद शिखर जैन धर्मावलम्बियों का महान पवित्र तीर्थ क्षेत्र है । इसे पार्श्वनाथ हिल के नाम से भी ख्याति प्राप्त है । बारहवीं शती के हरियाणा के जैन कवि बुध श्रीधर ने अपभ्रंश भाषा में तीर्थंकर पार्श्वनाथ के जीवन पर आधारित ‘पासणाहचरिउ’ लिखा है जिसकी प्रशस्ति में उन्होंने दिल्ली के हिन्दू सम्राट अनंगपाल के बारे में तथा दिल्ली के तत्कालीन इतिहास की जानकारी दी है अन्यथा मुग़ल सल्तनत के पूर्व की दिल्ली का इतिहास जानना बहुत मुश्किल हो गया था ।</p>
<p>तीर्थंकर पा‌र्श्वनाथ के मंदिर भारत में हजारों की संख्या में हैं जिसमें तीर्थंकर भगवान पारसनाथ की समवशरण स्थली &#8211; श्री दिगम्बर जैन सिद्धक्षेत्र रेशंदीगिरि नैनागिरि तहसील बकस्वाहा जिला छतरपुर मप्र का पारसनाथ मंदिर , बिजौलिया के पार्श्वनाथ , सूरत का चिन्तामणि पार्श्वनाथ मंदिर , द्रोणगिरि का पार्श्वनाथ मंदिर , महुवा के विघ्नहर पार्श्वनाथ , दिल्ली चांदनी चौक का प्रसिद्ध लाल जैन मंदिर आदि अन्यान्य मंदिर बहुत ही ज्यादा प्रसिद्ध हैं । खजुराहो का पार्श्वनाथ मंदिर विश्व प्रसिद्ध है । वाराणसी , काशी में भेलूपुर स्थित श्री पार्श्वनाथ जैन मंदिर उनका जन्म स्थान माना जाता है । तीर्थंकर पा‌र्श्वनाथ के अतिशय क्षेत्रों में अहिच्छत्र पार्श्वनाथ , वागोल पार्श्वनाथ , नागफणी पार्श्वनाथ , चंवलेश्वर पार्श्वनाथ , अन्देश्वर पार्श्वनाथ , अड़िन्दा पार्श्वनाथ , बिजौलियां पार्श्वनाथ , अन्तरिक्ष पार्श्वनाथ , मक्सी पार्श्वनाथ , महुवा-पार्श्वनाथ आदि अन्यान्य तीर्थ क्षेत्र बहुत प्रसिद्ध हैं ।</p>
<p>इनका चिन्ह सर्प है और उनकी पहचान मस्तक के ऊपर सर्प के फण से की जाती है , यद्यपि बिना फण वाली प्रतिमाएं भी प्राचीन काल से ही मिलती हैं तथापि प्रायः प्रतिमाएं फणयुक्त ही होती हैं । आचार्यों और विद्वानों ने उनकी स्तुति में हजारों स्तुतियाँ स्तोत्र लगभग हर भाषा में लिखे हैं । जैन भक्ति साहित्य का आधा से अधिक भाग तीर्थंकर पार्श्वनाथ को ही समर्पित हैं । जैन परम्परा में अधिकांश तंत्र मंत्र का संबंध पार्श्वनाथ की उपासना से ही है। वर्तमान में सुप्रसिद्ध भजन ‘ तुमसे लागी लगन , ले लो अपनी शरण , पारस प्यारा …. प्रत्येक भक्त के कंठ का हार बना हुआ है । जैन परंपरा में अधिकांश तंत्र मन्त्र का सम्बन्ध भी पार्श्वनाथ की उपासना से ही है । तीर्थकर पा‌र्श्वनाथ का जीवन में कष्टों में भी समता भाव धारण करने का एक महान उदाहरण है ।</p>
<p>आज हमारे जीवन में भी थोड़ी-सी अनुकूलता हो तो हम फूले नहीं समाते और जरा-सा कष्ट हो तो हाय-तौबा मच देते हैं। हमें तीर्थंकर पा‌र्श्वनाथ के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए कि कष्ट और विपत्ति में भी हम कैसे दुखों से निस्पृह बने रह सकते हैं। उनसे हम सुख-दु:ख में समता की प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं और अपना जीवन सुखी बना सकते हैं।</p>
<p>यहां यह भी स्मरणीय है कि जैन तीर्थक्षेत्र रेशंदीगिरि नैनागिरि पर ईसा पूर्व वर्ष 706 में भगवान पारसनाथ के प्रथम समवशरण (धर्मसभा) की रचना की गई थी, जिसमें दिव्य ध्वनि/देशना खिरी थी , जिस दिव्य देशना से इस रेशंदीगिरि नैनागिरि तीर्थ के चारों ओर की योजनों प्रमाण भूमि आज भी पवित्र है , उन्हीं की इस दिव्य देशना को अविस्मरणीय बनाने व पुण्य स्मृति को स्थायित्व प्रदान करने के लिए क्षेत्रराज पर विविध निर्माण व गतिविधियां चलती आ रही है और क्षेत्रराज के गिरिराज पर भगवान पारसनाथ के प्रथम मंदिर का वर्ष 1050 में निर्माण किया गया था, जिसका जीर्णोद्धार वर्ष 1564 में श्री श्यामले ब्या द्वारा कराया गया था। गिरिराज पर स्थित विशाल भव्य चौबीसी जिनालय के पीछे करीब 14 एकड़ से अधिक भूमि परिसर में देशना स्थली की परिकल्पना को साकार रुप देने के लिए कमेटी प्रयासरत है, जिस स्थली में विशाल भव्य जिनालय निर्माणाधीन है, जिसमें विराजमान हुए अष्ट धातु की 6 फीट से अधिक उत्तुंग विश्व की अद्वितीय मनोज्ञ पदमाशन त्रय जिनबिम्ब विराजमान की जाकर गत माह 04 से 10 दिसम्वर 2023 तक राष्ट्रसंत गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महाराज ससंघ (41पिच्छी) के सान्निध्य में आयोजित पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के आयोजन में प्रतिष्ठित कराने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। यहां के गिरिराज पर विशाल भव्य चौवीसी जिनालय में भगवान पारसनाथ की देश की अद्वितीय खड्गासन प्रतिमा विराजमान हैं जिसकी विशेषता यह कि भगवान पारसनाथ के मूल शरीर के अवगाहन अनुरूप ही यह प्रतिमा विराजमान हैं जो विश्व में कहीं दूसरी जगह नहीं है। यहां के विशाल पारस सरोवर (तालाब) में स्थित विशाल भव्य समवशरण की रचना से युक्त जिनालय की प्रतिमाओं का सन 1987 में संतशिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज ससंघ के सान्निध्य में पंचकल्याणक गजरथ महोत्सव सअतिशय के साथ सम्पन्न हुआ था , जो विश्व में अद्वितीय है ।आचार्य कुंदकुंद ने ईसा की प्रथम शताब्दी में विरचित प्राकृत निर्वाणकांड में इस रेशंदीगिरि नैनागिरि तीर्थ की वंदना की है</p>
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		<title>जैन समाज का नए साल का संकल्प 2024: सामाजिक समर्पण और तीर्थों की रक्षा  </title>
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		<pubDate>Tue, 02 Jan 2024 12:45:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बीता साल 2023 जैन समाज के लिए एक चुनौतीपूर्ण वर्ष रहा, जिसमें तीर्थ क्षेत्रों पर अतिक्रमण और मुनियों पर हमले जैसी घटनाएं समाज की झकझोर गईं। इसलिए नए साल 2024 का आगमन एक नए संकल्प के साथ होना चाहिए, जिससे समाज सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में कदम बढ़ाए। पढ़िए राखी जैन की विशेष रिपोर्ट । [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>बीता साल 2023 जैन समाज के लिए एक चुनौतीपूर्ण वर्ष रहा, जिसमें तीर्थ क्षेत्रों पर अतिक्रमण और मुनियों पर हमले जैसी घटनाएं समाज की झकझोर गईं। इसलिए नए साल 2024 का आगमन एक नए संकल्प के साथ होना चाहिए, जिससे समाज सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में कदम बढ़ाए। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राखी जैन की विशेष रिपोर्ट ।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर।</strong> बीते साल के अनुभव नए साल के संकल्पों को मजबूत करते हैं और कुछ नया करने का सबक भी। बात जैन धर्म और उसके अनुयायियों की करें तो साल 2023 ने समाज को बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर दिया, कई ऐसी घटनाएं हुईं की शांत चित्त का समाज उद्वेलित हो गया। चाहे वो पावन सम्मेद शिखर को पर्यटन स्थल बनाने की बात हो या जैन मुनि कामकुमार नंदी महाराज का अपहरण कर कथित हत्या किए जाने का मामला। ऐसी घटनाएं दोबारा ना हो इसके लिए जैन समाज को जागरूक और एकजुट होने की जरुरत है । जैन समाज, जिसे अपने अनुपम धारोहर, नैतिकता, और तात्कालिक समस्याओं के प्रति अपनी सजगता के लिए जाना जाता है, उसे जागरूकता की आवश्यकता है। जैन समाज को उत्कृष्टता और सद्गुणों की दिशा में अग्रणी बनाए रखने के लिए हमें समाज को जागरूक करने के लिए सकारात्मक योजनाएं बनानी चाहिए। सबसे पहले उन घटनाओं पर नजर जिनसे जैन समाज को सबक लेना है ।</p>
<p><strong>जैन तीर्थ सम्मेद शिखर अब नहीं बनेगा पर्यटन स्थल: देश भर में प्रदर्शन के बाद फै़सला वापस</strong></p>
<p>सम्मेद शिखर के मुद्दे पर विरोध-प्रदर्शन के बीच केंद्र सरकार ने बड़ा फै़सला लिया और झारखंड के पारसनाथ स्थित जैन तीर्थ स्थल सम्मेद शिखर पर पर्यटन और इको टूरिज्म एक्टिविटी पर रोक लगा दी गई.केंद्र सरकार ने तीन साल पहले जारी अपना आदेश वापस ले लिया। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की ओर से गुरुवार को जारी नोटिफिकेशन में सभी पर्यटन और इको टूरिज्म एक्टिविटी पर रोक लगाने के निर्देश दिए गए।दरअसल झारखंड सरकार श्री सम्मेद शिखर जी यानि पार्श्वनाथ (पारसनाथ) पर्वत को धार्मिक पर्यटन क्षेत्र घोषित करने पर विचार कर रही थी। इसके पीछे उसका मकसद ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देना था। सीएम हेमंत सोरेन के निर्देश पर पारसनाथ के अलावा देवघर, रजरप्पा, इटखोरी समेत कुछ और जगहों के लिए नीति तैयार करने पर विचार किया जा रहा था. जैन समाज का कहना था कि अगर ऐसा होता तो पारसनाथ में होटल और पार्क बनते। लोग दर्शन के साथ छुट्टियां और पिकनिक मनाने भी आते। इससे पवित्र पर्वत पर मांस-मदिरा आदि के सेवन की भी खुली छूट हो जाती. ये युवाओं को मौज मस्ती का अड्डा बन जाता। जैन धर्म में इसकी इजाजत नहीं है।</p>
<p><strong>महेश गिरी के खिलाफ उतरा जैन समाज:गिरनार जी प्रकरण को लेकर समाज हुआ आहत </strong></p>
<p>पूर्वी दिल्ली के पूर्व सांसद और जूनागढ़ के पीठाध्यक्ष महेश गिरी ने 28 अक्टूबर को सनातन धर्म के नाम से साधुओं का सम्मेलन किया था. इस दौरान जूनागढ़ के पीठाध्यक्ष और पूर्व बीजेपी सांसद ने गिरनार पर्वत पर दत्तात्रेय समाज का अधिकार बताते हुए जैन समाज के लिए आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया. उन्होंने जैन समाज, मुनियों और श्रद्धालुओं से पोछा लगवाने, सफाई करवाने की बात कही. न्याय शासनम कानूनी संस्था ने बताया कि महेशगिरी के सहयोगी जैन श्रद्धालुओं के साथ पहले भी मारपीट, धमकी और उन पर जानलेवा हमला कर चुके हैं. इस बयान के बाद पूरा जैन समाज लामबंद हो गया था गुजरात के जूनागढ़ के जैन तीर्थ गिरनार पर मठ बनाकर आधिपत्य स्थापित करने वाले महेश गिरी ने बाद में उसका खंडन करते हुए कहा की ये गुजराती भाषा में अपने नागा बाबाओं के लिए कहा था ना की दिगंबर जैन साधुओं के लिए। इस एक घंटे की वीडियो में महेश गिरी ने अनेक जैन संतो जिनमें मुनि प्रमाण सागर, मुनि सुधा सागर, मुनि पुल्का सागर, आचार्य गुणधर नंदी जैसे बड़े साधुओं के नाम है। जैन समाज इस कृत्य से बहुत आहत हुआ पूरे देश के जैन समाज ने अपने अपने शहर में विरोध भी दर्ज करवाया।</p>
<p><strong>गोम्मट गिरी का विवाद : जैन तीर्थ स्थलों को हड़पने की साजिश</strong></p>
<p>मध्यप्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर के निकट स्थित जैन समाज के गोम्मटगिरी तीर्थ का विवाद लगातार गहराता जा रहा है। जैन संत पुलक सागर जी महाराज ने इंदौर जिले की पहाड़ी पर स्थित गोम्मट गिरी तार्थ के विवाद का निराकरण न होने पर अपनी नाराजगी जाहिर की है। एक वीडियो जारी कर पुलक सागर जी महाराज ने आरोप लगाया है कि सोची समझी साजिश के तहत जैन तीर्थों को लूटा जा रहा है। उन्होंने कहा कि सम्मेद शिखर, गिरनार और पालीताणा और अब गोम्मट गिरी जैसी जगहों पर जैन तीर्थ स्थलों को हड़पने की साजिश की जा रही है।</p>
<p><strong>ये है गोम्मट गिरी का विवाद</strong></p>
<p>दिगम्बर जैन समाज के प्रमुख तीर्थ गोम्मट गिरी की सुरक्षा को लेकर गोम्मट गिरी ट्रस्ट वहां बाउंड्री वॉल बनाना चाहता है। इसकी अनुमति हााईकोर्ट ने भी दी है। इस माह की शुरुआत में पुलिस सुरक्षा के बीच बाउंड्री वॉल बनाने का काम शुरू भी हुआ लेकिन बाद में पुलिस सुरक्षा हटा ली गई। पुलिस वालों के जाते ही कुछ लोगों ने इस जमीन से रास्ता निकालने के लिए चूने की लाइन खींच दी । इसे लेकर इंदौर जैन समाज खासा नाराज हो गया। जैन समाज की लंबे समय से मांग है कि यहां बाउंड्री वॉल बना दी जाए और अवैध कब्जों को तत्काल हटाया जाए।</p>
<p><strong>कर्नाटक में जैन मुनि की हत्या : सकल जैन समाज में रोष की लहर </strong></p>
<p>जैन धर्म अहिंसा परमो धर्म का उद्घोषक कहा जाता है, प्राणी मात्र को मारना भी हिंसा मानता है ऐसे में दिगंबर संत काम कुमार नंदी महाराज की नृंशस हत्या कड़ा प्रश्न खड़ा करता है। बीते साल 2023 में कर्नाटक के चिकोडी के हीरेकुडी गांव में जैन मुनि कामकुमार नंदी महाराज का अपहरण कर कथित हत्या किए जाने का मामला सामने आया। वह बीते 5 जुलाई से लापता थे। शिकायत मिलने पर पुलिस ने संदिग्धों पूछताछ की, जिसके बाद मामले का खुलासा हो सका। कर्नाटक से मिली मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक दिगम्बर जैन संत आचार्य काम कुमार नंदी महाराज बीते लगभग 15 वर्षों से चिकोड़ी जिले में नंद पर्वत पर प्रवास कर रहे थे। वह गणधराचार्य कुंथूनाथ महारज के शिष्य थे। 5 जुलाई 2023 के दिन कुछ लोगों ने उनका अपहरण कर लिया था। जैन संत के लिए अपहरणकर्ता किसी अज्ञात स्थान पर ले गए और हत्या कर दी। शनिवार सुबह उनकी कथित हत्या की सूचना पुलिस के जरिए लगी है। जैन संत के अपहरण के बाद हत्या किए जाने के मामले में कार्रवाई करते हुए पुलिस ने 2 आरोपियों के लिए गिरफ्तार कर लिया है।</p>
<p><strong>साल 2024 और जैन समाज के संकल्प </strong></p>
<p>नए साल में जैन समाज का सबसे महत्वपूर्ण संकल्प सामाजिक समर्पण का होना चाहिए। हमें समझना होगा कि समाज का सर्वोत्तम हित केवल एकदृष्टि में ही नहीं, बल्कि सामाजिक समर्पण के माध्यम से ही संभव है। सामाजिक समर्पण के माध्यम से ही हम एक एकमात्र में एकता और समरसता की दिशा में अग्रणी बन सकते हैं। साहित्यिक साधना नए साल का दूसरा महत्वपूर्ण संकल्प होना चाहिए। जैन साहित्य को समझने और प्रसारित करने के लिए अधिक प्रयासों की आवश्यकता है। इससे समाज में जैन धरोहर और सिद्धांतों की महत्वपूर्ण जानकारी होगी जो समृद्धि और समाज के उत्थान में सहायक हो सकती हैं। तीर्थ क्षेत्रों पर अतिक्रमण के मामलों के खिलाफ एकजुटता बहुत जरुरी है । समाज को यह समझना होगा कि तीर्थ क्षेत्रों का सम्मान करना एक आदर्श जैन नागरिक की पहचान का हिस्सा है और इसे सख्ती से बचाना चाहिए। मुनियों का सम्मान और समर्थन करना समाज की शिक्षा और साधना की परंपरा को बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन संकल्पों को पूरा करने के लिए सामाजिक संगठन की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। समाज को एकजुट होकर सामाजिक सुधारों की दिशा में काम करना होगा। सामाजिक न्याय, शिक्षा, और साहित्य के क्षेत्र में कदम से कदम मिलाकर समृद्धि की ओर बढ़ना होगा।</p>
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		<title>मुनि श्री धैर्य सागर जी महाराज की हुई समाधि: जैन समाज ने किया नमन  </title>
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					<description><![CDATA[प्रज्ञा श्रमण गुरुवर अमित सागर जी महाराज के संघस्थ मुनि श्री धैर्य सागर जी महाराज की समाधि हो गई है । समाधि 27 दिसंबर बुधवार को फ़िरोज़ाबाद में हुई है ।पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट । प्रज्ञा श्रमण गुरुवर अमित सागर जी महाराज के संघस्थ मुनि श्री धैर्य सागर जी महाराज की समाधि हो [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>प्रज्ञा श्रमण गुरुवर अमित सागर जी महाराज के संघस्थ मुनि श्री धैर्य सागर जी महाराज की समाधि हो गई है । समाधि 27 दिसंबर बुधवार को फ़िरोज़ाबाद में हुई है ।<span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट ।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>प्रज्ञा</strong> श्रमण गुरुवर अमित सागर जी महाराज के संघस्थ मुनि श्री धैर्य सागर जी महाराज की समाधि हो गई है । समाधि 27 दिसंबर बुधवार को फ़िरोज़ाबाद में हुई है ।</p>
<p>इंदौर दिगंबर जैन समाज सामाजिक सांसद के मंत्री डॉ जैनेन्द्र जैन फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राकेश विनायका, महावीर ट्रस्ट के अध्यक्ष अमित कासलीवाल, हंसमुख गांधी टीके वेद, संजीव जैन संजीवनी, राजेश जैन दद्दू, परवार समाज महिला संगठन की अध्यक्ष श्रीमती मुक्ता जैन, सारिका जैन आदि ने मुनि श्री को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की और मुनि श्री के चरणों मे कोटि कोटि नमन किया ।</p>
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		<title>वार्षिक रथ यात्रा महोत्सव का हुआ आयोजन: भगवान शांतिनाथ के जयकारों से गूंजा शहर  </title>
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		<pubDate>Wed, 27 Dec 2023 18:36:57 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दिगम्बर जैन समाज अम्बाह के द्वारा वार्षिक रथ यात्रा महोत्सव का आयोजन मंगलवार को भव्यता पूर्ण वातावरण में किया गया इस अवसर पर संत विगुण सागर जी महाराज के सानिध्य में भगवान जिनेन्द्र की रथयात्रा नगर भर में पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निकाली गई। इस रथयात्रा में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। भगवान [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दिगम्बर जैन समाज अम्बाह के द्वारा वार्षिक रथ यात्रा महोत्सव का आयोजन मंगलवार को भव्यता पूर्ण वातावरण में किया गया इस अवसर पर संत विगुण सागर जी महाराज के सानिध्य में भगवान जिनेन्द्र की रथयात्रा नगर भर में पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निकाली गई। इस रथयात्रा में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। भगवान शांतिनाथ के जयकारों से नगर की सड़कें गुंजायमान होती रहीं। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए अजय जैन की रिपोर्ट । </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अंबाह ।</strong> दिगम्बर जैन समाज अम्बाह के द्वारा वार्षिक रथ यात्रा महोत्सव का आयोजन मंगलवार को भव्यता पूर्ण वातावरण में किया गया, इस अवसर पर संत विगुण सागर जी महाराज के सानिध्य में भगवान जिनेन्द्र की रथयात्रा नगर भर में पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निकाली गई। इस रथयात्रा में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। भगवान शांतिनाथ के जयकारों से नगर की सड़कें गुंजायमान होती रहीं। इस अवसर पर 108 कलशों से जगत कल्याण की कामना के साथ हुआ भगवान का अभिषेक ।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-53437" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231228-WA0002.jpg" alt="" width="960" height="1280" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231228-WA0002.jpg 960w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231228-WA0002-225x300.jpg 225w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231228-WA0002-768x1024.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 960px) 100vw, 960px" /></p>
<p>रथयात्रा में जैन धर्मालंबियों के साथ सभी समुदायों के लोग शामिल हुए और रथ में विराजी भगवान की प्रतिमा के दर्शन किए। अहिंसा के प्रवर्तक भगवान जिनेंद्र की यह रथ यात्रा नगर में सामाजिक सदभाव की मिसाल बन गई। आयोजन में सर्व प्रथम कार्यक्रम स्थल पर भगवान शांतिनाथ की प्रतिमा केसरिया वस्त्र पहने रजत मुकुट लगाएं इंद्रों का रूप धारण किए हुए श्रद्धालुओं ने विशाल रथ में विराजमान किया । उसके बाद बैंड बाजे के साथ भगवान जिनेंद्र का यह रथ जैसे ही आयोजन स्थल के द्वार से बाहर निकला तो शोभायात्रा में श्रद्धा का सैलाब उमड़ पड़ा। इस रथयात्रा में तीर्थंकरों के जीवन पर आधारित और जैनत्व संदेशों को दर्शाती झांकियां सभी को अपनी ओर आकर्षित कर रही थीं। वहीं बैंड बाजों पर बज रही धार्मिक धुनों पर हर कोई भक्ति कर रहा था। भीड़ का आलम यह था कि हर कोई भगवान के दर्शन पाने के लिए लालायित हो रहा था।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-53438" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231228-WA0001.jpg" alt="" width="1080" height="809" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231228-WA0001.jpg 1080w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231228-WA0001-300x225.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231228-WA0001-1024x767.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231228-WA0001-768x575.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231228-WA0001-74x55.jpg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231228-WA0001-111x83.jpg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231228-WA0001-215x161.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231228-WA0001-990x742.jpg 990w" sizes="auto, (max-width: 1080px) 100vw, 1080px" /></p>
<p><strong>आरती कर रथयात्रा का किया स्वागत </strong></p>
<p>बैंड बाजों के साथ-साथ बालिका मंडल की टोली नृत्य करते हुए सभी को अपनी ओर आकर्षित कर रही थीं। रथ यात्रा का जगह-जगह लोगों ने आरती उतार कर स्वागत किया गया। शोभा यात्रा संपूर्ण बाजार का भ्रमण करके तीन घंटे में आयोजन स्थल पर पहुंची। जहां मंत्रोच्चारण के मध्य पंडित विमल जैन द्वारा भगवान का महामस्तकाभिषेक कराया गया। इस अवसर पर संत विगुण सागर जी महाराज ने कहा कि जैन समाज अपने संस्कार और आदर्श के लिए जाना जाता है, जिस धार्मिक सोच यानी जगत कल्याण की कामना के लिए यह आयोजन किया गया। वह सर्वसमाज के लिए प्रेरणादायक है। रथ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं ने जगह-जगह भगवान का पुष्प वर्षा कर एवं आरती उतार कर स्वागत किया जिससे संपूर्ण वातावरण धर्ममय हो गया आयोजन में पधारे सभी लोगों के प्रति आभार प्रदर्शन समाज के अध्यक्ष जिनेश जैन एवं व्यवस्थापक संतोष जैन रिठौना वाले व राहुल नायक द्वारा किया गया।</p>
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		<title>सम्मान समारोह का आयोजन : लायन्स क्लब के पूर्व अध्यक्षों का हुआ सम्मान  </title>
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		<pubDate>Wed, 27 Dec 2023 18:34:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[लायन्स क्लब नागदा द्वारा झोन सोश्यो व पूर्व अध्यक्ष सम्मान समारोह आयोजित किया गया । इस अवसर पर इस वर्ष उत्कृष्ट सेवा कार्य करने वालों को भी सम्मानित किया गया ।  नागदा । लायन्स क्लब नागदा द्वारा झोन सोश्यो व पूर्व अध्यक्ष सम्मान समारोह आयोजित किया गया । कार्यकम के सहसंयोजक लायन विरेन्द्र काटियार के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>लायन्स क्लब नागदा द्वारा झोन सोश्यो व पूर्व अध्यक्ष सम्मान समारोह आयोजित किया गया । इस अवसर पर इस वर्ष उत्कृष्ट सेवा कार्य करने वालों को भी सम्मानित किया गया । </strong></p>
<hr />
<p><strong>नागदा ।</strong> लायन्स क्लब नागदा द्वारा झोन सोश्यो व पूर्व अध्यक्ष सम्मान समारोह आयोजित किया गया । कार्यकम के सहसंयोजक लायन विरेन्द्र काटियार के अनुसार झोन चेयरपर्सन लायन कमलेशजी जायसवाल द्वारा लायन्स क्लब नागदा, लायन्स क्लब खाचरौद, लायन्स क्लब खाचरौद श्री साई के पदाधिकारी एवम् क्लब को इस वर्ष किये गये सेवा कार्य के लिए सम्मानित किया गया । क्लब सचिव राजेश इन्द्र ने बताया कि आयोजन की अध्यक्षता लायन प्रमोद जैन ने की । अतिथि के रूप में क्षेत्र के विधायक डाँ. तेज बहादुरसिंहजी चौहान, बिरला ग्राम थाना एस.आई. योगिताजी उपाध्याय, लायन पंकज मारू जी मंचासिन थे । क्लब द्वारा पूर्व अध्यक्ष लायन गोविन्दजी मोहता, लायन डाँ एस.आर. चावला, लायन गुलजारीलालजी त्रिवेदी, लायन डाँ अनीलजी दूबे, लायन सुशील ओझा, लायन अरविन्द नाहर, लायन हरिश तिवारी, लायन रवि शर्मा, लायन कमलेश जायसवाल को सम्मानित किया गया । अतिथियों का स्वागत लायन एन.के. मिश्रा, लायन श्याम भरावा, लायन मनोज सोनी, लायन डाँ प्रदीप शर्मा, लायन पवन गुप्ता, लायन प्रीति जायसवाल, लायन सविता दूबे, ने किया । कार्यक्रम का संचालन लायन आर.के. यादव व लायन शिल्पा गुप्ता ने किया आभार संयोजक बद्रीलालजी पोरवाल ने माना ।</p>
<p><strong>ये रहे मौजूद </strong></p>
<p>कार्यकम को लायन अमित दूबे, लायन एस.एस. शर्मा, लायन डाँ सुनील चौधरी, लायन डाँ हार्षित पोरवाल, लायन डॉ हिमान्शु पाण्डे ,लायन सुरेश पंजाबी, लायन मुकेश मोहता, लायन मनीष अग्रवाल, लायन अनिल प्रजापत, लायन मुकेश विश्वकर्मा, लायन सतिश बजाज, लायन अजय पोरवाल, लायन विनयराज शर्मा, लायन राकेश डाबी आदि सदस्य ने उपस्थित होकर सफल बनाया</p>
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		<title>आर्यिका विज्ञानमति माताजी का विहार : इंदौर से सिध्द क्षेत्र सिद्धवरकूट के लिए हुआ विहार  </title>
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					<description><![CDATA[आर्यिका माँ विज्ञानमति माताजी ने इंदौर में ऐतिहासिक चातुर्मास के बाद सिध्द क्षेत्र सिद्धवरकूट के लिए विहार किया । पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट   इंदौर । संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के आशीर्वाद से आचार्य कल्प 108 श्री विवेकसागर जी महाराज की पंचम शिष्या आर्यिका माँ विज्ञानमति माताजी (ससंघ) का मंगल विहार [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आर्यिका माँ विज्ञानमति माताजी ने इंदौर में ऐतिहासिक चातुर्मास के बाद सिध्द क्षेत्र सिद्धवरकूट के लिए विहार किया । <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट </span></strong></p>
<hr />
<p><strong> इंदौर ।</strong> संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के आशीर्वाद से आचार्य कल्प 108 श्री विवेकसागर जी महाराज की पंचम शिष्या आर्यिका माँ विज्ञानमति माताजी (ससंघ) का मंगल विहार मां अहिल्या की नगरी इंदौर से हुआ।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-53422" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231227-WA0011.jpg" alt="" width="1204" height="1600" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231227-WA0011.jpg 1204w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231227-WA0011-226x300.jpg 226w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231227-WA0011-771x1024.jpg 771w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231227-WA0011-768x1021.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231227-WA0011-1156x1536.jpg 1156w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231227-WA0011-990x1316.jpg 990w" sizes="auto, (max-width: 1204px) 100vw, 1204px" /></p>
<p>राजेश जैन दद्दू ने बताया कि इंदौर में ऐतिहासिक चातुर्मास के उपरांत आर्यिका माँ विज्ञानमति माताजी ने उदयनगर जैन मंदिर से अब सिध्द क्षेत्र सिद्धवरकूट के लिए विहार शुरू किया है ।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-53423" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231227-WA0010.jpg" alt="" width="1600" height="1200" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231227-WA0010.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231227-WA0010-300x225.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231227-WA0010-1024x768.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231227-WA0010-768x576.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231227-WA0010-1536x1152.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231227-WA0010-74x55.jpg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231227-WA0010-111x83.jpg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231227-WA0010-215x161.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231227-WA0010-990x743.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231227-WA0010-1320x990.jpg 1320w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></p>
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		<title>धूमधाम से शुरू हुआ महामहोत्सव : गाजे बाजे के साथ निकला जुलुस  </title>
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		<pubDate>Tue, 26 Dec 2023 18:16:52 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[महाराष्ट्र में धूमधाम के साथ महामहोत्सव मनाया जा रहा है। महोत्सव में दिव्य मंत्रों के साथ उत्कृष्ट सिंहनिष्कीडित व्रतकर्ता-साधना महोदधि अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज के सान्निध्य में आयोजन हो रहे हैं। गाजे बाजे के साथ निकले जुलुस की चमक से पूरे उदगांव को झंकृत कर दिया। यह महोत्सव उदगांव की इस [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>महाराष्ट्र में धूमधाम के साथ महामहोत्सव मनाया जा रहा है। महोत्सव में दिव्य मंत्रों के साथ उत्कृष्ट सिंहनिष्कीडित व्रतकर्ता-साधना महोदधि अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज के सान्निध्य में आयोजन हो रहे हैं। गाजे बाजे के साथ निकले जुलुस की चमक से पूरे उदगांव को झंकृत कर दिया। यह महोत्सव उदगांव की इस पावन धरा पर नया इतिहास बना रहा है। जिसके साक्षी यहां मौजूद हजारों भक्त के साथ इस धरती का कण-कण बन रहा है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राज कुमार अजमेरा और मनीष सेठी की रिपोर्ट । </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कोडरमा ।</strong> श्री ब्रहम्नाथ पुरातन दिगंबर जैन मंदिर टस्ट कुंजवन उदगांव में आदि-सन्मति तीर्थ धाम में कुंजवन महोत्सव मनाया जा रहा है । 22 दिसंबर को भगवान मेला, आनंद महोत्सव का आयोजन किया गया। इसमें सुबह 7 बजे आचार्य श्री को निमंत्रण, गुरूवर्य की आज्ञा उपलब्ध होने पर मंदिर जी से श्रीजी की मूर्ति को रथ में विराजमान करने के साथ ही जुलूस के रूप में भ्रमण कराया गया। । जुलुस में 108 सौभाग्यवती महिलाएं एवं 56 कुमारिकांए की मंगलकुंभ घटयात्रा अपने पवित्र पावन परिधानों के साथ अनोखी आभा से जनमानस को पावनता के अहसास से सराबोर करती रही। जुलूस के कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने से पूर्व मंत्रोच्चारण के साथ ही धार्मिक कियाओं के द्वारा मंडप का उद्घाटनवेदी शुद्धि कर मंडप में भगवान को विराजमान किया गया। यहां अलोकिक दिव्य मंत्रों के साथ अन्तर्मना के सान्निध्य में श्रीजी का अभिषेक किया गया।प्रभु अभिषेक करने वाले और देखने वाले भक्तों की कर्म निर्जरा स्वतः ही शुरू हो जाती है, अभिषेक को भव्यता भक्तों के भावों में होती है। जैसे भाव वैसा ही प्रताप उनके जीवन में उदय होता है। प्रभु अभिषेक के साथ ही शांतिधारा और पूजा होती रही। अन्तर्मना के सान्निध्य में पवित्रमंत्रों के उच्चारण के साथ घ्वजारोहण किया गया।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-53416" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231226-WA0016.jpg" alt="" width="1600" height="1066" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231226-WA0016.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231226-WA0016-300x200.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231226-WA0016-1024x682.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231226-WA0016-768x512.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231226-WA0016-1536x1023.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231226-WA0016-414x276.jpg 414w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231226-WA0016-470x313.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231226-WA0016-640x426.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231226-WA0016-130x86.jpg 130w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231226-WA0016-187x124.jpg 187w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231226-WA0016-990x660.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231226-WA0016-1320x879.jpg 1320w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></p>
<p><strong>मन की शुद्धि का मार्ग है धर्म </strong></p>
<p>इस मौके उत्कृष्ट सिंहनिष्कीडित व्रतकर्ता- साधना महोदधि अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महामुनिराज ने अपने मंगल उदबोधन में, भक्तों को भक्ति का अर्थ और इस मौके पर आयोजित कार्यक्रमों के प्रति भावों की निर्मलता के लाभ बताने के साथ ही मानव जीवन की अलोकिकता से अवगत कराया। उन्होंने कहा कि जीवन की आपाधापी के बीच मानव मन विभिन्न प्रकार के विकारों से ग्रस्त हो जाता है, उसकी प्रतिदिन शुद्धि भी आवश्यक है। मानव मन की शुद्धि का एक ही मार्ग है वह है धरम की शरण, जब हम धर्म की शरण लेते है। तब ही हमारे विचार और भावों में परिवर्तन होते हैं। यही परिवर्तन जीवन की उत्कृष्टता की ओर हमारा पथ प्रशस्त करते हैं । अन्तर्मना के प्रवचन के उपरांत आहार चर्या का पड़गाहन कर भक्तों ने आहार कराया।</p>
<p><strong>सांस्कृतिक कार्यकमों की धूम रही</strong></p>
<p>दोपहर में आचार्य श्री सन्मति सागर जी की मूर्ति का आकार शुद्धि एवं लोकार्पण किया गया। इस मौके पर आचार्य सन्मति सागर जी के स्मरणों का उल्लेख करते हुये उनकी कठिन तपश्चर्या एवं अतिशय के बारे में बताया गया। ऐसे आचार्य धरा पर विरले ही हुये हैं, जिनसे आज भी जन-जन उपकृत हो रहा है। संध्या काल मे सिंहनिष्कीडित व्रतकर्ता-साधना महोदधि अन्तर्मना आचार्यश्री 108 गुरूवर्य प्रसन्न सागर जी महाराज के प्रवचन एवं आनंद यात्रा अन्तर्मना की आरती का आयोजन धूमधाम के साथ हुआ। इसके बाद सांस्कृतिक कार्यकमों की धूम रही। इसमें भक्तों ने तरह-तरह के अभिनय एवं भजनों पर नृत्य कर मौजूद लोगों का मन मोह लिया। 23 दिसंबर को मंत्र स्नान महोत्सव के कार्यक्रम हुए। 24 दिसंबर को तपस्वी सम्राट समाधि महोत्सव 25 को जन मंगल मत्रानुष्ठान महोत्सव, 26 दिसंबर को यागमंडल विधान, गुरु कृपा व्रत संस्कार महोत्सव हुआ । 27 दिसंबर को मंदिर शुद्धि गर्भकल्याणक महोत्सव, 28 दिसंबर को जन्मकल्याणक 29 दिसंबर दीक्षा कल्याणक के कार्यक्रमों का आयोजन होंगे। यह सभी कार्यकम उत्कृष्ट सिंहनिष्कीडित व्रतकर्ता-साधना महोदधि अन्तर्मना आचार्यश्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज के सानिध्य ओर उपाध्याय सौम्य मूर्ति 108 पीयूष सागर जी महाराज के निर्देशन में हो रहा है।</p>
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		<title>जैन तीर्थ टिकटोली में 1 जनवरी को वार्षिक मेला : विमानोत्सव और महामस्तकाभिषेक भी होगा </title>
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		<pubDate>Tue, 26 Dec 2023 18:13:31 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन तीर्थ अतिशय क्षेत्र टिकटोली में 1 जनवरी को वार्षिक मेले और विमानोत्सव का भव्य आयोजन होने जा रहा है । विद्यांचल पर्वत माला के मध्य चंबल अंचल सुरभ्य, अनेक सुंदर प्राकृतिक झरनों से युक्त जैन तीर्थ टिकटोली में भगवान शांतिनाथ, कुंथनाथ, अरहनाथ की प्रतिमाओं सहित अनेकों जैन तीर्थंकरों की प्राचीन प्रतिमाएं विराजमान हैं । [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन तीर्थ अतिशय क्षेत्र टिकटोली में 1 जनवरी को वार्षिक मेले और विमानोत्सव का भव्य आयोजन होने जा रहा है । विद्यांचल पर्वत माला के मध्य चंबल अंचल सुरभ्य, अनेक सुंदर प्राकृतिक झरनों से युक्त जैन तीर्थ टिकटोली में भगवान शांतिनाथ, कुंथनाथ, अरहनाथ की प्रतिमाओं सहित अनेकों जैन तीर्थंकरों की प्राचीन प्रतिमाएं विराजमान हैं । <span style="color: #ff0000;">पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट ।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरेना ।</strong>जैन तीर्थ अतिशय क्षेत्र टिकटोली में 1 जनवरी को वार्षिक मेले और विमानोत्सव का भव्य आयोजन होने जा रहा है । श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र टिकटोली के अध्यक्ष राजेंद्र भंडारी द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार विगत वर्ष की भांति इस वर्ष भी जैन अतिशय क्षेत्र टिकटोली में वार्षिक मेला होने जा रहा है । इस अवसर पर श्री यंग दिगंबर जैन फाउंडेशन द्वारा मुरेना से टिकटोली जाने हेतु निःशुल्क बसों की व्यवस्था के साथ ही क्षेत्र पर कूपन के माध्यम से स्वल्पाहार की व्यवस्था की गई है । क्षेत्र पर आने वाले सभी बंधुओं के भोजन की व्यवस्था अतिशय मित्र मंडल जौरा द्वारा की जा रही है ।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-53408" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231226-WA0013.jpg" alt="" width="1080" height="1039" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231226-WA0013.jpg 1080w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231226-WA0013-300x289.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231226-WA0013-1024x985.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231226-WA0013-768x739.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/12/IMG-20231226-WA0013-990x952.jpg 990w" sizes="auto, (max-width: 1080px) 100vw, 1080px" /></p>
<p><strong>प्राचीन प्रतिमाएं हैं विराजमान</strong></p>
<p>विद्यांचल पर्वत माला के मध्य चंबल अंचल सुरभ्य, अनेक सुंदर प्राकृतिक झरनों से युक्त जैन तीर्थ टिकटोली में भगवान शांतिनाथ, कुंथनाथ, अरहनाथ की प्रतिमाओं सहित अनेकों जैन तीर्थंकरों की प्राचीन प्रतिमाएं विराजमान हैं । इस पावन एवम पुनीत अवसर पर स्थानीय विद्वान महेंद्रकुमार शास्त्री, संजय शास्त्री, चक्रेश शास्त्री, नवनीत शास्त्री, रविंद्र शास्त्री, महावीर भैयाजी, मनोज शास्त्री, देवेंद्र जैन, सूरज जैन विशेष रूप से उपस्थित रहेंगे । कार्यक्रम का संचालन एवम निर्देशन बाल ब्रह्मचारी संजय भैयाजी मुरेना का रहेगा । अरिहंत म्यूजिकल ग्रुप मुरेना अपने संगीत की मधुर स्वर लहरी से जैन भजनों के माध्यम से सभी को मंत्रमुग्ध करेगें ।</p>
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<p>वार्षिक मेले के अवसर पर मांगलिक कार्यक्रमों में सोमवार 1 जनवरी को सुबह साढ़े 8 बजे नित्य नियम पूजन, 9 बजे श्री शांतिनाथ विधान, 10 बजे सांस्कृतिक कार्यक्रम, 11 बजे ध्वजारोहण, 12 बजे चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन, दोपहर 1 बजे शपथ ग्रहण, 2.30 बजे मूलनायक भगवान शांतिनाथ का महामस्तिकाभिषेक होगा । कार्यक्रम के बाद सामूहिक वात्सल्य भोज की व्यवस्था की गई है ।</p>
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