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	<title>सरदार वल्लभ भाई पटेल &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>मेघा जैन ने नाप दी 17 दिन में 4049 किमी की दूरी: राइड फॉर यूनिटी में साइकिल यात्रा का बना डाला रिकार्ड  </title>
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		<pubDate>Wed, 03 Dec 2025 08:45:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[लुधियाना शहर की 43 वर्षीय मेघा पंजाब से एकमात्र साइकिलिस्ट हैं, जिन्होंने श्रीनगर से कन्याकुमारी तक की 4049 किमी लंबी दूरी मात्र 17 दिन में पूरी कर ऐसी उपलब्धि हासिल कर ली है, जिसे पाना कितने की संघर्षों का सामना करने के बाद भी आसान नहीं होता। लुधियाना से पढ़िए, यह स्पेशल रिपोर्ट&#8230;. लुधियाना। जुनून [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>लुधियाना शहर की 43 वर्षीय मेघा पंजाब से एकमात्र साइकिलिस्ट हैं, जिन्होंने श्रीनगर से कन्याकुमारी तक की 4049 किमी लंबी दूरी मात्र 17 दिन में पूरी कर ऐसी उपलब्धि हासिल कर ली है, जिसे पाना कितने की संघर्षों का सामना करने के बाद भी आसान नहीं होता। <span style="color: #ff0000">लुधियाना से पढ़िए, यह स्पेशल रिपोर्ट&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>लुधियाना।</strong> जुनून और लक्ष्य के प्रति गंभीरता से पूरी लगन और मेहनत की जाए तो कठिन से कठिन मंजिल भी कदमों में हो सकती है। इसे सच में साबित किया है शहर की एक ऐसी साइकिलिस्ट मेघा जैन ने, जो नारी की हिम्मत और जज्बे की मिसाल बन गई। लुधियाना शहर की 43 वर्षीय मेघा पंजाब से एकमात्र साइकिलिस्ट हैं, जिन्होंने श्रीनगर से कन्याकुमारी तक की 4049 किमी लंबी दूरी मात्र 17 दिन में पूरी कर ऐसी उपलब्धि हासिल कर ली है, जिसे पाना कितने की संघर्षों का सामना करने के बाद भी आसान नहीं होता। श्रीफल जैन न्यूज की संपादक रेखा संजय जैन से बातचीत में उन्होंने बताया कि मैंने सोचा भी नहीं था कि आपको इंटरव्यू देने के बाद यह ड्रीम राइड इतनी जल्दी पूरी हो जाएगी। उन्होंने बताया कि इस साइकिल यात्रा के दौरान कठिन पहाड़ी रास्ते, बदलता मौसम, अनगिनत चढ़ाइयां और शारीरिक चुनौतियां थीं, लेकिन दृढ़ संकल्प, हिम्मत और निरंतर प्रयत्न से इस मुकाम को हासिल किया है। जो ऐसा माइल स्टोन है, जिसे हासिल करना केवल सपना ही रहता है, लेकिन यह पूरा हुआ। यह ऐतिहासिक राइड डेयर 2 गियर द्वारा फिट इंडिया के सहयोग से आयोजित की गई थी। उन्होंने बताया कि यह साइकिल यात्रा सरदार वल्लभ भाई पटेल की 150वीं जयंती को समर्पित थी। देशभर से चुने गए 150 साइकिलिस्टों ने इस राइड फॉर यूनिटी में भाग लिया था। जिनमें मेघा जैन का प्रदर्शन प्रेरणादायक रहा। उन्होंने बताया कि 19 से 69 वर्ष के साइकिलिस्टों के समूह में हर पड़ाव पर अदम्य साहस, अनुशासन और मानसिक मजबूती से ही आज यह गौरव हासिल हुआ है। हिमालय की ठंड, मध्य भारत की गर्मी और दक्षिण के उमस भरे मौसम में दृढ़ इच्छा शक्ति से आगे लक्ष्य की ओर अग्रसर हुईं। कन्याकुमारी में आयोजित समापन समारोह में प्रिसिपल डॉ. जी किशोर ने मेघा जैन को सम्मानित किया। लुधियाना साइलिस्ट्सि ने भी इस उपलब्धि पर उनका सम्मान किया।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-95822" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/12/IMG-20251203-WA0008.jpg" alt="" width="900" height="1600" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/12/IMG-20251203-WA0008.jpg 900w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/12/IMG-20251203-WA0008-169x300.jpg 169w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/12/IMG-20251203-WA0008-576x1024.jpg 576w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/12/IMG-20251203-WA0008-768x1365.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/12/IMG-20251203-WA0008-864x1536.jpg 864w" sizes="(max-width: 900px) 100vw, 900px" />परिवार का सपोर्ट और जज्बे ने लक्ष्य तक पहुंचाया </strong></p>
<p>श्रीफल जैन न्यूज से चर्चा के दौरान मेघा जैन ने रेखा संजय जैन को बताया कि परिवार का सपोर्ट ने ही उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। जब शौक जिंदा रखना हो तो सब मैनेज करना पड़ता है। इसमें मेघा का परिवार हमेशा उनके साथ रहा। मेघा जैन का यह संपूर्ण सफर उन महिलाओं के लिए प्रेरणादायक है, जो अपने सपनों को सीमाओं में बांध देती हैं। वह यह सिखाती हैं कि जिम्मेदारियां और सपने एक साथ चल सकते हैं।</p>
<p><strong>संघर्षों से गुजरकर मिली यह सफलता </strong></p>
<p>मेघा बताती है कि यह सफलता संघर्षों से गुजरकर मिली है। यह सफलता उन्हें पंजाव की पहचान बनाती है, बल्कि पूरे देश की महिलाओं के लिए आइकॉन भी। मेघा 2017 से लंबी दूरी की साइकिलिंग कर रही हैं। ऑडेक्स इंडिया रैंडोनर्स से जुड़ी हैं, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऑडैक्स क्ल पेरिसियन से संबद्ध है। अब तक 12 सुपर रैंडोनर सीरीज मेघा पूरी कर चुकी है, जो उत्तर भारत में किसी महिला द्वारा हासिल किया गया रिकार्ड है। मेघा ने विभिन्न टैंडम बाइक सीरीज को राइड पार्टनर डॉ.पवन ढिंगरा के साथ पूरी की। उन्होंने 1 हजार किमी दिल्ली से काठमांडू की राइड भी पूरी की है।</p>
<p><strong>इनका आभार जताया </strong></p>
<p>आयोजकों ने डीडीजी मयंक श्रीवास्तव, निदेशक डॉ. नदीम, पूरी फिट इंडिया टीम और डॉ. भैरवी नाइक जोशी (डायरेक्टर एवं सीइओ बाइक्स इंडिया फ़ाउंडेशन) के दृष्टिकोण, समर्थन और पूरे समन्वय के लिए गहरी कृतज्ञता व्यक्त की। विशेष धन्यवाद अमित शर्मा जी को, जिन्होंने जयपुर तक आकर साइक्लिस्टों को प्रेरित किया और उनकी सुरक्षा के लिए स्थानीय अधिकारियों के साथ समन्वय किया।</p>
<p><strong>इन अतिथियों ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई</strong></p>
<p>हर पड़ाव पर फिट इंडिया क्षेत्रीय समन्वयकर्ताओं ने गर्मजोशी से सवारों का स्वागत किया और सभी व्यवस्थाएं सुचारू रखीं। कन्याकुमारी में समापन कार्यक्रम की शोभा बढ़ाने वाले अतिथियों में डॉ. जी किशोर (प्रिंसिपल एवं रीजनल हेड,एसएआई एलएनसीपीई), बी. राधादेवी, विनू, सुभाष एस और विमल आनंद शामिल थे, जिनकी उपस्थिति ने समारोह को और अधिक विशेष बनाया। जम्मू से अमन एवं उनकी टीम, लुधियाना से पुष्कर एवं उनकी टीम, निशा मैडम एवं उनकी टीम, राजस्थान और गुजरात से मधु एवं उनकी टीम, धर्मपुरी से विठ्ठल, डिंडीगुल से पचैयप्पन एवं उनकी टीम, और कन्याकुमारी से बाला गोपाल, डॉ. किशोर एवं उनकी टीम की उपस्थिति, सहयोग और समर्पण ने इस राष्ट्रीय यात्रा को और भी मजबूत बनाया। इस अभियान की डेयर 2 गियर की टीम ने चौबीसों घंटे मेहनत करते हुए लॉजिस्टिक्स, बाइक तैयारी, सुरक्षा, भोजन और दैनिक समन्वय को संभाला, जिससे सभी प्रतिभागी सुरक्षित और बिना किसी चोट के अपनी यात्रा पूरी कर सके।</p>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 12 बारडोली के संत श्री कुमुदचंद्र जी का साहित्य को अमूल्य योगदान: उनकी गुजरात और राजस्थान में अच्छी प्रतिष्ठा थी </title>
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		<pubDate>Sun, 09 Mar 2025 00:30:32 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[राजस्थान को जैन संतों की भूमि के रूप में ख्याति अर्जित है। प्राचीन काल में भी यहां कई दिव्य संतों का जन्म और भ्रमण हुआ है। संत श्री कुमुदचंद्र जी ऐसे ही संत थे। वे संवत 1656 तक भट्टारक रहे। इतने लंबे समय में इन्होंने देश के अनेक स्थानों पर विहार किया। जन साधारण को [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>राजस्थान को जैन संतों की भूमि के रूप में ख्याति अर्जित है। प्राचीन काल में भी यहां कई दिव्य संतों का जन्म और भ्रमण हुआ है। संत श्री कुमुदचंद्र जी ऐसे ही संत थे। वे संवत 1656 तक भट्टारक रहे। इतने लंबे समय में इन्होंने देश के अनेक स्थानों पर विहार किया। जन साधारण को धर्म आध्यात्म का पाठ पढ़ाया। वे अपने समय के असाधारण संत थे। उनकी गुजरात और राजस्थान में अच्छी प्रतिष्ठा थी। जैन साहित्य एवं सिद्धांत का उन्हें अप्रतिम ज्ञान था। <span style="color: #ff0000">जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 12वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का संत श्री कुमुदचंद्रजी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> बारडोली गुजरात का प्राचीन नगर है। वर्ष 1921में यहां सरदार वल्लभ भाई पटेल ने स्वतंत्रता के लिए सत्याग्रह का बिगुल बजाया था। बाद में वहीं की जनता ने उन्हें सरदार की उपाधि दी थी। 350 वर्ष पूर्व भी यह नगर आध्यात्म का केंद्र था। यहां पर ही संत श्री कुमुदचंद्र को उनके गुरु भट्टारक श्री रत्न कीर्ति जी एवं जनता ने भट्टारक पद पर आरूढ़ किया थ्ज्ञा। इन्होंने यहां के निवासियों में धार्मिक चेतना जाग्रत की। उन्हें सद्चरित्रता, संयम एवं त्यागमय जीवन अपनाने पर बल दिया। इन्होंने गुजरात एवं राजस्थान में साहित्य, आध्यात्म एवं धर्म की त्रिवेणी बहायी। संतश्री कुमुदचंद्रजी वाणी से मधुर, शरीर से सुंदर तथा मन से स्वच्छ थे। जहां भी उनका विहार होता जनता उनके पीछे हो जाती।</p>
<p><strong>संतश्री कुमुदचंद्रजी का जन्म गोपुर गांव में हुआ था</strong></p>
<p>शिष्यों ने अपने गुरु की प्रशंसा में विभिन्न पद लिखे। संयमसागर ने उनके शरीर को 32 लक्षणों से सुशोभित, गंभीर बुद्धि के धारक तथा वादियों के पहाड़ को तोड़ने के लिए व्रज समान कहा है। उनके दर्शन मात्र से ही प्रसन्नता होती थी। वे पांच महाव्रत तेरह प्रकार के चारित्र को धारण करने वाले और 22 परिषह को सहने वाले थे। एक दूसरे शिष्य धर्मसागर ने उनकी पात्र केशरी, जंबुकुमार, भद्रबाहु एवं गौतम गणधर से तुलना की है। उनके विहार के समय कुंकुम छिड़कने तथा मोतियों का चौक पूरने तथा बधावा गाने के लिए भी कहा जाता था। जीवों की दया करने के कारण लोग उन्हें दया का वृक्ष कहते थे। विद्याबल से उन्होंने अनेक विद्वानों को अपने वश में कर लिया था। संतश्री कुमुदचंद्रजी का जन्म गोपुर गांव में हुआ था। पिता का नाम सदाफल एवं माता का नाम पद्माबाई था। इन्होंने मोढ़ वंश में जन्म लिया था। वे जन्म से ही होनहार थे। युवावस्था से पूर्व ही उन्होंने संयम धारण कर लिया था। अध्ययन की ओर विशेष ध्यान था।</p>
<p><strong>कुमुदचंद्र जी बारडोली के संत कहलाने लगे</strong></p>
<p>ये रात-दिन व्याकरण, नाटक, न्याय आगम एवं छंद अलंकार शास्त्र आदि का अध्ययन करते थे। गोम्मट खार आदि ग्रंथों का इन्होंने विशेष अध्ययन किया था। विद्यार्थी अवस्था में ही ये भट्टारक रत्नकीर्तिजी के शिष्य बन गए थे। बारडोली में श्री रत्नकीर्ति जी ने इनको अपना पट्ट स्थापित किया था और संवत 1656 वैशाख मास में इनका जैेनों के प्रमुख संत भट्टारक के पद पर अभिषेक कर दिया। यह सारा कार्य संघपति कान्हजी, संघ बहन जीवादे, सहस्त्रकरण और उनकी धर्मपत्नी तेजलदे, भाई मल्लदास, बहन मोहनदे, गोपाल आदि की उपस्थिति में हुआ। तभी से कुमुदचंद्र जी बारडोली के संत कहलाने लगे थे।</p>
<p><strong>सभी रचनाएं राजस्थानी भाषा में हैं</strong></p>
<p>कुमुदचंद्रजी आध्यात्मिक एवं धार्मिक संत होने के साथ ही साहित्य के परम आराधक थे। अब तक इनकी छोटी-बड़ी 28 रचनाएं और 30 से अधिक पद प्राप्त हो चुके हैं। ये सभी रचनाएं राजस्थानी भाषा में हैं। जिन पर गुजराती का भी प्रभाव है। ऐसा माना जाता है कि ये चिंतन,मनन और धर्मोपदेश के अतिरिक्त अपना सारा समय साहित्य सृजन में लगाते थे। नेमिनाथ के तारणद्वार पर आकर वैराग्य धारण करने की अद्भुत घटन से ये अपने गुरु रत्नकीर्ति जी के सामन बहुत प्रभावित थे। इसलिए इन्होंने नेमिनाथ और राजुल पर कई रचनाएं लिखी हैं। उनमें नेमिनाथ बारहमासा,नेमिश्वर गीत, नेमिजिन गीत आदि उल्लेखनीय है।</p>
<p><strong>संतश्री कुमुदचंद जी का शिष्य परिवार</strong></p>
<p>संत श्री कुमुदचंद्र जी संवत 1656 तक भट्टारक रहे। इतने लंबे समय में इन्होंने देश के अनेक स्थानों पर विहार किया। जन साधारण को धर्म आध्यात्म का पाठ पढ़ाया। वे अपने समय के असाधारण संत थे। उनकी गुजरात और राजस्थान में अच्छी प्रतिष्ठा थी। जैन साहित्य एवं सिद्धांत का उन्हें अप्रतिम ज्ञान था। वैसे तो भट्टारकों के बहुत से शिष्य हुआ करते थे। इनमें आचार्य, मुनि, ब्रह्मचारी, आर्यिका आदि होते थे। अभी जो रचनाएं उपलब्ध हैं। उनमें अभयचंद, ब्रह्मसागर, धर्मसागर,संयमसागर, जयसागर, गणेशसागर आदि के नाम प्रमुख है। ये सभी शिष्य हिन्दी ओर संस्कृत के अच्छे विद्वान थे।</p>
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