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	<title>सम्यक चरित्र &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>समयसार की वाचना में मुनिश्री ने कहा — कोरा ज्ञान किसी काम का नहीं, आचरण ही सच्चा धर्म है : ज्ञान बोलता है और चारित्र मौन रहता है — मुनिश्री विलोकसागर </title>
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		<pubDate>Mon, 13 Oct 2025 16:48:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुरैना के बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोकसागर जी महाराज ने धर्मसभा में कहा कि केवल ज्ञान को रटने या बोलने से कुछ नहीं होता, उसे आत्मसात करना आवश्यक है। मुनिश्री ने समझाया कि ज्ञान और चारित्र दोनों मोक्ष के साधन हैं — ज्ञान बोलता है पर चारित्र मौन रहकर सिखाता है। पढ़िए मनोज जैन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुरैना के बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोकसागर जी महाराज ने धर्मसभा में कहा कि केवल ज्ञान को रटने या बोलने से कुछ नहीं होता, उसे आत्मसात करना आवश्यक है। मुनिश्री ने समझाया कि ज्ञान और चारित्र दोनों मोक्ष के साधन हैं — ज्ञान बोलता है पर चारित्र मौन रहकर सिखाता है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए मनोज जैन नायक की ख़ास खबर…</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> बड़ा जैन मंदिर में सैद्धांतिक ग्रंथ समयसार की वाचना के दौरान जैन संत मुनिश्री विलोकसागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि आज मनुष्य ज्ञान अर्जित तो कर रहा है परंतु उस पर अमल नहीं करता। केवल शास्त्रों, कथाओं या रामायण का अध्ययन कर लेने से आत्मकल्याण संभव नहीं है, जब तक मनुष्य उन सिद्धांतों को अपने जीवन में नहीं अपनाता।</p>
<p>मुनिश्री ने कहा कि आज लोग “रट्टू तोते” बन गए हैं जो केवल धर्म की बातें करते हैं पर उसका पालन नहीं करते। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सभी जानते हैं कि असत्य, चोरी या हिंसा करना पाप है, फिर भी इनसे दूर नहीं रहते। यही कोरा ज्ञान है, जो व्यक्ति के आचरण में नहीं उतरता। उन्होंने कहा कि “ज्ञान बोलता है और चारित्र मौन रहता है,” क्योंकि ज्ञान को केवल कहा जाता है, जबकि चारित्र अपने आचरण से सिखाता है।</p>
<p>उन्होंने आगे कहा कि सच्चे साधु-संत वही हैं जो अपने जीवन से धर्म के सिद्धांतों का पालन करते हैं। उनके मौन आचरण का प्रभाव उपदेशों से अधिक होता है। जैन दर्शन में ज्ञान और चारित्र का गहरा संबंध है — ज्ञान आत्मा का स्वभाव है और चारित्र उस ज्ञान को प्रकट करने का साधन।</p>
<p>इस अवसर पर मुनिश्री विबोधसागर जी महाराज ने भी धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि “कोरा ज्ञान किसी काम का नहीं होता।” उन्होंने बताया कि सफलता और मोक्ष की प्राप्ति तभी संभव है जब ज्ञान को व्यवहार में लाया जाए। धन और स्वास्थ्य की हानि तो वापस मिल सकती है, लेकिन चरित्र खो जाए तो सब कुछ नष्ट हो जाता है।</p>
<p><strong>तीन रत्न — जीवन के सच्चे आधार</strong></p>
<p>मुनिश्री ने कहा कि जैन दर्शन के अनुसार मोक्ष मार्ग के तीन रत्न — सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र — जीवन के सच्चे आधार हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि ज्ञान को केवल बोलें नहीं, बल्कि उसे आत्मसात करें, तभी जीवन का कल्याण संभव है। धर्मसभा में नगर के अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे जिन्होंने संतों के प्रवचनों को श्रवण कर आत्मविकास का संकल्प लिया। मुरैना जैन समाज के तत्वावधान में समयसार वाचना का यह आध्यात्मिक क्रम निरंतर जारी है, जिसमें प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं सहभागी हो रही हैं।</p>
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		<title>बिना चारित्र के मिले ज्ञान से संसार सागर से मुक्ति नहीं संभव : मुनिश्री विलोकसागर ने ग्रंथराज समयसार को विवेचित किया  </title>
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		<pubDate>Fri, 22 Aug 2025 14:17:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुरैना में मुनिराजों का आध्यात्मिक वर्षायोग जारी है। इसमें रोज प्रवचन हो रहे हैं। बड़ै जैन मंदिर में धार्मिक कार्यक्रमों के साथ सभी गुरु भक्त धर्मसभा का लाभ भी ले रहे हैं। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; मुरैना। नगर में मुनिराजों का आध्यात्मिक वर्षायोग जारी है। इसमें रोज प्रवचन हो रहे [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुरैना में मुनिराजों का आध्यात्मिक वर्षायोग जारी है। इसमें रोज प्रवचन हो रहे हैं। बड़ै जैन मंदिर में धार्मिक कार्यक्रमों के साथ सभी गुरु भक्त धर्मसभा का लाभ भी ले रहे हैं। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> नगर में मुनिराजों का आध्यात्मिक वर्षायोग जारी है। इसमें रोज प्रवचन हो रहे हैं। बड़ै जैन मंदिर में धार्मिक कार्यक्रमों के साथ सभी गुरु भक्त धर्मसभा का लाभ भी ले रहे हैं। आध्यात्मिक वर्षायोग में प्रवचनों की श्रृंखला में चातुर्मासरत मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने ग्रंथ राज समयसार की विवेचना करते हुए कहा कि ज्ञान प्राप्त करना, ग्रंथों और शास्त्रों का अध्ययन करना तो सहज और सरल है। ज्ञान तो प्राप्त किया जा सकता है लेकिन, कोरे ज्ञान को प्राप्त करने से आत्मा का भला होने वाला नहीं हैं। ज्ञान तो हम सभी प्राप्त कर सकते है, लेकिन वह ज्ञान जब तक चारित्र में नहीं आएगा तब तक हमारा कल्याण होना संभव नहीं हैं। जब तक हमें सच्चे ज्ञान की, सही ज्ञान की प्राप्ति नहीं होगी, उस ज्ञान को, उन सिद्धांतों को हम चारित्र में नहीं उतारेंगे, तब तक हम यूं ही इस संसार के जन्म मृत्यु के चक्रव्यूह में भटकते रहेंगे।</p>
<p>जब ज्ञान चारित्र में आता है तो राग द्वेष स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं, निज और पर समझ में आ जाते हैं। आत्मा का हित क्या है, इसका भाव समझ में आ जाता है। संसार से विरक्ति होकर आत्मा अपने में लीन होने का प्रयास करती है। यही मोक्ष मार्ग है। जब राग द्वेष पूर्णतः समाप्त हो जाता है और आत्मा अष्ट कर्मों को नष्टकर सिद्धत्व को प्राप्त कर लेती है।</p>
<p><strong>चारित्र आत्मा के शुद्ध आचरण और संयम को कहते हैं</strong></p>
<p>मुनिश्री ने कहा कि जैन दर्शन में चारित्र का गहरा संबंध है। चारित्र आत्मा के शुभ या शुद्ध आचरण और संयम को कहते हैं, जो मोक्ष प्राप्ति के लिए आवश्यक है। यह जैन धर्म का मूलभूत सिद्धांत है, जो अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह जैसे व्रतों का पालन करके प्राप्त होता है। चारित्र का अर्थ है पाप वृत्तियों का त्याग कर आत्म-शुद्धि की ओर बढ़ना, जो सम्यक् चारित्र के रूप में जीवन के सभी पहलुओं में नैतिक आचरण को अपनाना सिखाता है। जैन दर्शन के अनुसार चारित्र आत्मा की विभाव (अशुद्ध) अवस्था से स्वभाव (शुद्ध) अवस्था की ओर बढ़ना है। मोक्ष मार्ग एक ऐसा मार्ग है जिसके द्वारा आत्मा जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करती है।</p>
<p><strong>चारित्र का अर्थ एवं महत्व</strong></p>
<p>चारित्र का अर्थ है पाप वृत्तियों का त्याग कर आत्म-शुद्धि की ओर बढ़ना, जो सम्यक् चारित्र के रूप में जीवन के सभी पहलुओं में नैतिक आचरण का मार्ग सिखाता है। जैन दर्शन में ष्चारित्रष् आत्मा के शुभ और शुद्ध आचरण को कहते हैं, जो पाप प्रवृत्तियों का त्याग और संयम में संलग्न होकर मोक्ष प्राप्ति का मार्ग है । यह श्री जिनेंद्र भगवान के सिद्धांतों पर आधारित है और आध्यात्मिक विकास के लिए सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन, और सम्यक् चारित्र नामक त्रिरत्न का महत्वपूर्ण हिस्सा है ।विशेष रूप से, यह पांच महाव्रतों- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का पालन करके प्राप्त किया जाता है। चारित्र का अर्थ है आचरण या व्यवहार। जैन धर्म में यह आत्मा के शुद्ध आचरण को दर्शाता है जो मोक्ष की ओर ले जाता है। मोक्ष प्राप्त करने के लिए सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र, तीनों आवश्यक हैं। चारित्र का अर्थ है सभी पाप वृत्तियों और सावध प्रवृत्तियों का त्याग करना, तथा मोक्ष के लिए शुभ और संयमित प्रवृत्ति करना</p>
<p><strong>जैन दर्शन में सम्यक चरित्र </strong></p>
<p>सम्यक चरित्र का अर्थ है ‘सही आचरण’ या ‘सच्चा आचरण’। यह जैन धर्म में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो संसार से मुक्ति के लिए, मोक्ष प्राप्त करने के लिए आवश्यक तीन रत्नों में से एक है। अन्य दो रत्न हैं सम्यक दर्शन और सम्यक ज्ञान हैं। सम्यक चरित्र, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, ‘सही’ या ‘सत्य’ आचरण को संदर्भित करता है। यह न केवल कर्मों के संदर्भ में, बल्कि विचारों और भावनाओं के संदर्भ में भी सही आचरण को दर्शाता है। जैन धर्म में सम्यक चरित्र का पालन करने का अर्थ है,नैतिक नियमों का पालन करना, जीवित प्राणियों को नुकसान पहुंचाने से बचना, और स्वयं को आसक्ति और अन्य अशुद्ध दृष्टिकोणों से मुक्त करना।</p>
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