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	<title>सम्यक् दर्शन &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>जब वैराग्य का मार्ग चुने तो वापस न लौटे: विदिशा में मुनिश्री के प्रवचनों से समाजजनों को मिल रही मंगल देशना  </title>
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		<pubDate>Tue, 20 Jan 2026 10:08:48 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बेटा जब वैराग्य की ओर बढ़ जाता है तो प्रत्येक माता-पिता की इच्छा रहती है कि उसके कदम वापस न हों। यह उद्गार मुनिश्री संभवसागरजी महाराज ने सम्यक् दर्शन के 8 अंगों में से उपगुहन और स्थिरीकरण अंग पर व्याख्यान देते हुए व्यक्त किए। विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230; विदिशा। बेटा जब वैराग्य की ओर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>बेटा जब वैराग्य की ओर बढ़ जाता है तो प्रत्येक माता-पिता की इच्छा रहती है कि उसके कदम वापस न हों। यह उद्गार मुनिश्री संभवसागरजी महाराज ने सम्यक् दर्शन के 8 अंगों में से उपगुहन और स्थिरीकरण अंग पर व्याख्यान देते हुए व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>विदिशा।</strong> बेटा जब वैराग्य की ओर बढ़ जाता है तो प्रत्येक माता-पिता की इच्छा रहती है कि उसके कदम वापस न हों। यह उद्गार मुनिश्री संभवसागरजी महाराज ने सम्यक् दर्शन के 8 अंगों में से उपगुहन और स्थिरीकरण अंग पर व्याख्यान देते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि राजगृही नगरी में राजा श्रैणिक और महारानी चेलना के पुत्र राजा वारिसेन को वैराग्य होता है और वह राजमहल के साथ अपनी बत्तीस सुंदर रानियों को छोड़कर वन की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। समय बीतता है एक दिन मुनिराज वारिसेन का पुनः राजगृही नगरी में आगमन होता है और वह आहारचर्या के लिए निकलते हैं। वह बढ़े चले जा रहे है और उनका पड़गाहन अपने बाल सखा मित्र पुष्पडाल, जिसके विवाह को अभी एक ही दिन हुआ था, वहां होता है। उसकी पत्नी एकांक्षी थी। आहारचर्या के उपरांत पुष्पडाल मुनिराज का कमंडल अपने हाथ में लिए वन की ओर छोड़ने जाते हैं।</p>
<p><strong>पुष्पडाल भी वन में ही दीक्षा ले लेते हैं</strong></p>
<p>रास्ते में वारिसेन अपने मित्र को संसार की असारता का वर्णन से ओतप्रोत कथानक सुनाते हैं। जिससे प्रभावित होकर पुष्पडाल भी वन में ही दीक्षा ले लेते हैं। धीरे-धीरे 12 वर्ष बीत जाते हैं लेकिन, उनके मन में पत्नी के प्रति राग की कणिका विद्यमान रहती है। जिसे गुरु वारिसेन मुनिराज ताड़ लेते हैं और उनके स्थितिकरण के लिये वह राजागृही में राजा श्रैणिक और माता चेलना को संदेश भेजते हैं कि मैं राजमहल की ओर आ रहा हूं। आप सभी रानिओं को अच्छे से तैयार करके महल में हम दोनों मुनिराजों का पड़गाहन करें। यह संदेश सुनकर राजा श्रैणिक और माता चेलना के मन में संशय होता है कि कंही उनका बेटा मोक्षमार्ग से पथ भ्रष्ट तो नहीं हो गया? मन में उठते प्रश्नों के साथ दो चौकी लगाते हैं।</p>
<p><strong>नवधाभक्ति के साथ दोनों मुनिराजों का आहार होता है</strong></p>
<p>पूरा राजमहल दोनों मुनिराज का पड़गाहन करता है और नवधाभक्ति के साथ उनसे बैठने का अनुरोध करते हैं। मुनिराज वारिसेन जैसे ही काष्ट की चौकी पर बैठते हैं तो माता चेलना के मन में जो प्रश्न उठ रहे थे, उसका समाधान मिल जाता है। दूसरी स्वर्ण की चौकी पर साथी मुनिराज पुष्पडाल को इशारा किया और वह उस चौकी पर बैठते हैं नवधाभक्ति के साथ दोनों मुनिराजों का आहार होता है। सभी 32 रानियां एवं राजा श्रैणिक एवं रानी चेलना भी आहार देती है और आहार के उपरांत दोनों मुनिराज वापस लौटते हैं। इस पूरी घटना से पुष्पडाल मन ही मन सोचते है कि वारिसेन ने उन 32 रानियों की ओर एक नजर उठाकर भी नहीं देखा, वह समझ जाते हैं कि गुरु ने यह नाटक क्यों रचा? मेरे मन में जो अपनी पत्नी के प्रति राग की कणिका थी। उसका स्थितिकरण करने के लिये ही मेरे गुर यहां पर मुझे लेकर आए हैं और उनके मन में जो राग की कणिका आई थी वह समाप्त हो जाती है।</p>
<p><strong>तुम उसी मार्ग में रहना वापस मत आना</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि जैसे बेटी को विदा करते समय प्रत्येक माता-पिता की यह भावना रहती है कि वह अपने घर-संसार में सुखी रहे। इसीलिए जब वह बेटी को विदा करता है तो वह कहता है कि अब तुम इस घर की ओर मत देखना, अब तुम्हारा घर तुम्हारी ससुराल है और सास-ससुर ही तुम्हारे माता-पिता हैं। उसी प्रकार जब बेटा वैराग्य की ओर जाता है तो माता-पिता उसे खूब समझाते हैं, फिर भी बेटा यदि नहीं मानता तो वह एक ही संदेश देते है कि अब तुम उसी मार्ग में रहना वापस मत आना।</p>
<p><strong>ध्यान रखना आपको अपना पेपर बनाना है </strong></p>
<p>इस अवसर पर मुनि श्री निस्सीम सागर महाराज कहते है कि ‘सम्यक् दर्शन’ को सुरक्षित रखने के लिए कोई बहुत बड़ा पहाड़ नहीं तोडना पड़ता। यदि आपने दूसरों के दोषों पर मौन रखना शुरु कर दिया तो आप 101 प्रतिशत पास हो जाओगे। गुरुदेव हमेशा कहा करते थे कि आप लोगों को मोक्षमार्ग में मोक्षमार्गी की नकल करने की पूरी छूट है। ध्यान रखना आपको अपना पेपर बनाना है और स्वयं ही उसमें उत्तर लिखना है तथा खुद ही उसे चेक करके नंबर देना है। इस कार्य में पूरी ईमानदारी होना चाहिए। याद रखना कि कोई भी विद्यार्थी फेल नहीं होना चाहिए। प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया मुनिसंघ स्टेशन जैन मंदिर में विराजमान हैं। प्रातः 8.45 से प्रवचन के बाद प्रश्नमंच कार्यक्रम होता है। सही उत्तर देने वालों को तुरंत पुरस्कार दिया जाता है।</p>
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		<title>सम्यक् दर्शन ज्ञान चारित्राणि मोक्षमार्ग: मुनिश्री सारस्वतसागर जी ने धर्मसभा में सम्यक दर्शन और ज्ञान को समझाया  </title>
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		<pubDate>Thu, 03 Jul 2025 14:02:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य विशुद्धसागरजी के शिष्य मुनिश्री सारस्वत सागर जी, मुनिश्री जयंत सागर जी, मुनिश्री सिद्ध सागर जी और क्षुल्लक श्री श्रुतसागरजी अब नांद्रे में विराजित है। इस अवसर पर मुनिश्री सारस्वत सागर जी ने प्रवचन में कहा कि सम्यक् दर्शन ज्ञान चारित्राणि मोक्षमार्ग। यह जैन दर्शन का प्रसिद्ध सूत्र है। नांद्रे से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य विशुद्धसागरजी के शिष्य मुनिश्री सारस्वत सागर जी, मुनिश्री जयंत सागर जी, मुनिश्री सिद्ध सागर जी और क्षुल्लक श्री श्रुतसागरजी अब नांद्रे में विराजित है। इस अवसर पर मुनिश्री सारस्वत सागर जी ने प्रवचन में कहा कि सम्यक् दर्शन ज्ञान चारित्राणि मोक्षमार्ग। यह जैन दर्शन का प्रसिद्ध सूत्र है। <span style="color: #ff0000">नांद्रे से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>नांद्रे।</strong> आचार्य विशुद्धसागरजी के शिष्य मुनिश्री सारस्वत सागर जी, मुनिश्री जयंत सागर जी, मुनिश्री सिद्ध सागर जी और क्षुल्लक श्री श्रुतसागरजी अब नांद्रे में विराजित है। इस अवसर पर मुनिश्री सारस्वत सागर जी ने प्रवचन में कहा कि सम्यक् दर्शन ज्ञान चारित्राणि मोक्षमार्ग। यह जैन दर्शन का प्रसिद्ध सूत्र है। सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र की संयुति ही मोक्ष का मार्ग है। सम्यक् शब्द समीचीनता का द्योतक है। यह तीनों में अनुगत है। यहां दर्शन का अर्थ श्रद्धा है, तत्त्वों के यथार्थ स्वरूप की श्रद्धा को सम्यक् दर्शन कहते हैं। वास्तविक बोध सम्यक् ज्ञान है तथा आत्म-कल्याण के लिए किया जाने वाला सदाचरण सम्यक् चारित्र है।</p>
<p>सम्यक् श्रद्धा, ज्ञान और आचरण तीनों के योग से ही मोक्ष मार्ग बनता है। लोक में रत्नों की तरह दुर्लभ होने के कारण इन्हें रत्नत्रय भी कहते हैं। ये तीनों मिलकर ही मोक्षमार्ग कहलाते हैं। प्रवचन के दौरान महावीर दिगंबर जैन मंदिर के अध्यक्ष जिनेश्वर पाटील, सेक्रेटरी सुधीर चौधरी, अनिल पाचोरे, एनजे पाटील, सुधीर भोरे, मनोज पाटील, शुभम पाचोरे, सुहास पाचोरे, सुदर्शन पाटील,सतीश पाटील (पोपट पाटील), सोनू उपाध्ये, दादासाहेब पाटील (इंगळे), नवीनकुमार पाटील, वैभव चौधरी, सूरज पाचोरे, निखिल पाटील, विनय पाचोरे, भरत पाटील (पांढरे ), अमोल पाटील (लि.), सुहास पाटील (लि.), भरत पाटील (गाका), अभय सकळे, गुलाब मुजावर, भगवान महावीर जैन मंदिर कमेटी व पूजा महा महोत्सव कमेटी, वीर सेवा दल नांद्रे, वीर महिला मंडळ, पार्श्व महिला परिषद, जैन युवा मंच के युवा पदाधिकारी, प्रभावणा समिति के कार्यकर्ता उपस्थित थे।</p>
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		<title>गुणायतन पावनधाम में ध्वजारोहण: वेदी प्रतिष्ठा जिन बिम्ब स्थापना का शुभारंभ </title>
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		<pubDate>Fri, 23 May 2025 07:52:46 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[साधुओं की शोभा साधनों से नहीं उनकी साधना से होती है, श्रावकों की शोभा भवनों से नहीं भावना से होती है। यह मंगल उद्बोधन मुनि श्री समतासागरजी महाराज ने दिए। गुणायतन धाम में गुरुवार को ध्वजारोहण सहित अन्य कार्यक्रमों के साथ वेदी प्रतिष्ठा और जिनबिंब स्थापना महामहोत्सव का शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर मुनिश्री ने [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>साधुओं की शोभा साधनों से नहीं उनकी साधना से होती है, श्रावकों की शोभा भवनों से नहीं भावना से होती है। यह मंगल उद्बोधन मुनि श्री समतासागरजी महाराज ने दिए। गुणायतन धाम में गुरुवार को ध्वजारोहण सहित अन्य कार्यक्रमों के साथ वेदी प्रतिष्ठा और जिनबिंब स्थापना महामहोत्सव का शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर मुनिश्री ने अपनी मंगल देशना से उपस्थित समाजजनों को प्रेरणा प्रदान की। <span style="color: #ff0000">सम्मेद शिखर जी से पढ़िए, राजकुमार जैन अजमेरा की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सम्मेदशिखर जी/कोडरमा</strong>। आचार्य श्री विद्यासागरजी एवं आचार्य श्री समयसागर महाराज के आशीर्वाद से मुनि श्री समतासागर महाराज ससंघ के सानिध्य तथा मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज की प्रेरणा एवं मुनि श्रीपवित्र सागर, मुनि श्री पूज्यसागरजी महाराज, मुनिश्री अतुलसागर जी, मुनिश्री आदिसागरजी, आर्यिका श्री गुरुमति माताजी, आर्यिका दृणमति माताजी तथा संघस्थ 42 माता जी, ऐलक श्री निश्चयसागर, ऐलक श्री निजानंद सागर, क्षुल्लक श्री संयम सागर के संघ सानिध्य में प्रतिष्ठाचार्य वाल ब्रह्मचारी अशोक भैया इंदौर तथा उदासीन आश्रम के अधिष्ठाता अनिल भैया के निर्देशन में घट यात्रा गुणायतन से प्रारंभ हुई जो गाजेबाजे के साथ पावनधाम पहुंची। यहां पर चतुर्विद संघ के सानिध्य में ध्वजारोहण ईशान दिशा के साथ शुभारंभ हुआ। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं गुणायतन के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी वीरेंद्र जैन छाबड़ा ने बताया प्रातः 5.45 बजे भगवान का अभिषेक किया गया। मुनि श्री समतासागर महाराज के मुखारबिंद से शांतिधारा हुई एवं घटयात्रा गुणायतन स्थित जिनालय से निकालकर ‘श्री पावनधाम जिनालय’ पहुंची। मंत्रोच्चारण के साथ ध्वजारोहण सुनील पहाड़िया परिवार जयपुर ने किया। इस अवसर पर मुनि श्री समतासागर महाराज ने कहा कि ईशान दिशा की ओर ध्वजा का जाना संकेत देता है कि धर्म की वृद्धि तो रहेगी ही रहेगी साथ ही धनधान्य की समृद्धि भी रहेगी।</p>
<p><strong>धर्मायतन का निर्माण और साधुओं की सेवा सम्यक् दर्शन का कारण मान्य </strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि सभी धर्मों के अपने अपने ध्वज है जैन परंपरा में पचरंगा ध्वज ‘पंचपरमेष्ठी’ का प्रतीक है। जो अहिंसा और शांति का संदेश दुनिया को प्रदान करता है। मुनिश्री ने कहा कि क्षेत्र विशेष पर जब धार्मिक अनुष्ठान होता है तो हजार गुणा पुण्य की वृद्धि हो जाया करती है। मुनि श्री ने बताया कि मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज कमेटी को बार-बार निर्देश देते हैं। उनको भी चिंता रहती है कि ‘गुणायतन’ में इतनी बड़ी संख्या में पहली बार साधुओं का समागम हो रहा है। लगभग 42 आर्यिका तो वर्तमान में हैं ही तीन और आ रही हैं। अतः वह कमेटी को मार्गदर्शन देकर सुचारू प्रवंध भी देख रहे हैं और कमेटी के पदाधिकारी संपर्क में लगे रहते है। मुनि श्री ने कहा कि ‘साधू की शोभा साधनों से नहीं साधना से होती है, श्रावकों की शोभा भवनों से नहीं भावना से होती है’। हम लोगों की यहां पर आकर बहुत अच्छी साधना चल रही है। ऊपर पहाड़ की भी एक वंदना प्रशस्त वातावरण के साथ हो चुकी है। उन्होंने इस अवसर पर इंदौर के भरत मोदी और अशोक पाटनी आरके मार्बल परिवार के नाम का उल्लेख करते हुए कहा कि धर्मायतन का निर्माण और साधुओं की सेवा साक्षात सम्यक् दर्शन का कारण माना गया है।</p>
<p><strong>‘पंचायत न करो पंचपरमेष्ठी की आराधना करो’</strong></p>
<p>इस अवसर पर पवित्र सागर महाराज ने कहा कि क्षेत्र पर आकर के जो विषय भोग की वस्तुओं में रम जाता है। वह भगवान के दर्शन को प्राप्त नहीं कर सकता। मुनिश्री पूज्यसागरजी महाराज ने कहा कि भारत में अनेक क्षेत्र और सिद्ध क्षेत्र है, लेकिन जिस क्षेत्र में समूची जैन समाज के हमेशा प्राण अटके रहते हैं। ऐसा सिद्ध क्षेत्र है तो वह सम्मेदशिखर जी क्षेत्र है। जिसके नाममात्र से पुण्य का बंध हो जाता है’। इस अवसर पर आर्यिका दृणमति माताजी ने कहा 42 वर्ष पश्चात वंदना करने का अवसर प्राप्त हुआ है वर्ष 1983 में हम यंहा आचार्य श्री के साथ आऐ थे। उन्होंने कहा कि कभी भी किसी की निंदा या उससे ईर्ष्या मत करो। यह जीव दूसरे की निंदा करने से नीच गौत्र का बंध करता है। आचार्य श्री हमेशा कहा करते थे ‘पंचायत न करो पंचपरमेष्ठी की आराधना करो फिर संसार न छूटे तो हमसे कहना’ अर्थात मंदिर में आकर इधर-उधर की बात करना, एक दूसरे से ईर्ष्या या द्वेष रखना, यह सभी संसार को बढ़ाने वाले हैं। उन्होंने सभी को नियम दिया कि कम से कम क्षेत्र पर आकर तो इन सभी कार्य से बचना चाहिए। कार्यक्रम में गुणायतन के यशस्वी अध्यक्ष विनोद काला कोलकाता ने भी संबोधित किया। इस अवसर पर महामंत्री अशोक पांडया, सहित समस्त गुणायतन परिवार एवं बड़ी संख्या में स्थानीय तथा कोडरमा, गया, धनबाद, मधुबन के साथ आसपास के श्रद्धालु उपस्थित थे।</p>
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		<title>सदलगा स्कूल का नाम आचार्य विद्यासागर की स्मृति में रखा जाए: लोकसभा अध्यक्ष से जैन समाज का अनुग्रह  </title>
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		<pubDate>Tue, 29 Apr 2025 08:26:14 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दिगंबराचार्य की जन्म स्थली के स्कूल का नामकरण जैन संत आचार्य विद्यासागर के नाम करने बाबत सकल जैन समाज समिति कोटा ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को ज्ञापन दिया है। आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज का जन्म कर्नाटक प्रांत के ग्राम सदलगा में 10 अक्टूबर 1946 को हुआ था। कोटा से पढ़िए, मनोज जैन नायक की [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दिगंबराचार्य की जन्म स्थली के स्कूल का नामकरण जैन संत आचार्य विद्यासागर के नाम करने बाबत सकल जैन समाज समिति कोटा ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को ज्ञापन दिया है। आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज का जन्म कर्नाटक प्रांत के ग्राम सदलगा में 10 अक्टूबर 1946 को हुआ था। <span style="color: #ff0000">कोटा से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कोटा।</strong> दिगंबराचार्य की जन्म स्थली के स्कूल का नामकरण जैन संत आचार्य विद्यासागर के नाम करने बाबत सकल जैन समाज समिति कोटा द्वारा लोकसभा अध्यक्ष को ज्ञापन दिया गया है। कोटा जैन समाज के वरिष्ठ समाजसेवी सीए अजय जैन ने बताया कि दिगंबराचार्य जैन संत आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज का जन्म कर्नाटक प्रांत के ग्राम सदलगा में 10 अक्टूबर 1946 को हुआ था। बाल्यकाल से ही आपका झुकाव जैन दर्शन की ओर रहा। मात्र 9 वर्ष की अल्पायु में ही आपने जैन दर्शन को अंगीकार करने का मन बना लिया था। केवल 22 वर्ष की यौवन अवस्था में आपने आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज से 30 जून 1968 में जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर संयम का मार्ग स्वीकार किया। संत शिरोमणी की उपाधि से सुशोभित आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज जैन धर्मांवलंबियों के नहीं बल्कि संपूर्ण मानव जाति के संत थे।</p>
<p>आपके प्रति जैन एवं जैनेत्तर समाज देवतुल्य श्रद्धाभाव रखते हैं। पूज्य गुरुदेव सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चारित्र की त्रिवेणी थे। आपकी उत्कृष्ट संयम समाधि 18 फरवरी 2024 को डोंगरगढ़ के चंद्रगिरि में हुई। सकल दिगंबर जैन समाज समिति कोटा द्वारा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को दिए ज्ञापन में ऐसे जैन संत गुरुदेव की स्मृति को चिरस्थाई रखने के लिए उनकी जन्म स्थली ग्राम सदलगा के स्कूल का नामकरण उन्हीं के नाम पर करने का निवेदन किया है।</p>
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