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	<title>समाधि दिवस &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>समाधि दिवस &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>आचार्य विद्यासागर समाधि दिवस पर महाआरती एवं भजन होंगे : पूर्वाेत्तर जैन समाज मुनिसेवा समिति की ओर से हो रहा है कार्यक्रम  </title>
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		<pubDate>Wed, 18 Feb 2026 09:11:20 +0000</pubDate>
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<p><strong>इस भारतभूमि के समाधिस्थ आचार्यश्री विधा सागर जी महाराज के द्वितीय समाधि दिवस पर 18 फरवरी शाम 7.30 बजे से संयम स्वर्ण कीर्तिस्तंभ स्थल एमआर 10 श्री चंद्रगुप्त मौर्य चौराहे पर संगीतमय भजन एवं महाआरती का आयोजन होगा। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> इस भारतभूमि के समाधिस्थ आचार्यश्री विधा सागर जी महाराज के द्वितीय समाधि दिवस पर 18 फरवरी शाम 7.30 बजे से संयम स्वर्ण कीर्तिस्तंभ स्थल एमआर 10 श्री चंद्रगुप्त मौर्य चौराहे पर संगीतमय भजन एवं महाआरती का आयोजन होगा। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि यह आयोजन पूर्वाेत्तर जैन समाज द्वारा किया जा रहा है। संजय अहिंसा, प्रदीप जैन मामा, राजू अलबेला, नवीन गोधा, गोलू जैन, संजय काका ने समाजजनों से आह्वान करते हुए कहा कि आज की महाआरती एवं भजन संध्या में अधिक से अधिक संख्या मे समाज जन शामिल होकर गुरुभक्ति कर पुर्ण्याजन करें। साथ ही अपने अपने घर से एक दीपक लेकर आचार्य श्रीजी के चित्र के समक्ष अवश्य लगाएं। पुर्वाेत्तर क्षेत्र जैन समाज मुनिसेवा समिति ने कार्यक्रम में आने का आमंत्रण दिया है।</p>
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		<title>आचार्य विमलसागरजी के समाधि दिवस पर विनयांजलि अर्पित: आचार्य श्री प्राणी मात्र के प्रति रखते थे कल्याण की भावना  </title>
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		<pubDate>Wed, 17 Dec 2025 03:39:34 +0000</pubDate>
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<p><strong>श्रमण संस्कृति के श्रेष्ठ आचार्य श्री विमलसागरजी निमित्त ज्ञानी संत थे और उनके हृदय में प्राणी मात्र के प्रति करुणा उदारता और लोक कल्याण की भावना समाहित थी। ये बात मंगलवार को आर्यिका यशस्विनी माताजी ने मंगलवार को दिगंबर जैन तीर्थ स्वरूप आदिनाथ जिनालय छत्रपति नगर में आचार्य विमल सागर जी महाराज के 32वें समाधि दिवस पर उनका पुण्य स्मरण करते हुए कही। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> श्रमण संस्कृति के श्रेष्ठ आचार्य श्री विमलसागरजी निमित्त ज्ञानी संत थे और उनके हृदय में प्राणी मात्र के प्रति करुणा उदारता और लोक कल्याण की भावना समाहित थी। ये बात मंगलवार को आर्यिका यशस्विनी माताजी ने मंगलवार को दिगंबर जैन तीर्थ स्वरूप आदिनाथ जिनालय छत्रपति नगर में आचार्य विमल सागर जी महाराज के 32वें समाधि दिवस पर उनका पुण्य स्मरण करते हुए कही। माताजी ने आगे कहा कि आचार्य श्री अनुशासन प्रिय महान तपस्वी थे। उन्होंने अपने साधनारत जीवन में 6 हजार से अधिक उपवास किए एवं उनका समूचा व्यक्तित्व अतिशयपूर्ण करुणा और वात्सल्य से परिपूर्ण था। उनमें बचपन से ही जैन धर्म और णमोकार मंत्र के प्रति अगाध श्रद्धा थी। वे सिद्ध पुरुष होने के साथ-साथ वास्तुविद, प्रतिष्ठाचार्य एवं आयुर्वेद के ज्ञाता भी थे। उन्होंने मंत्रों और सिद्धि के माध्यम से हजारों लोगों के कष्टों और शारीरिक व्याधियों को दूर किया और जैन धर्म की महती प्रभावना की जैन समाज उनके उपकारों को कभी नहीं भूल सकता।</p>
<p>धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि इस अवसर पर आर्यिका मनस्विनी माताजी, प्रद्युम्न पाटनी, भूपेंद्र जैन ने भी आचार्य श्री के संस्मरण सुनाते हुए उन्हें विनयांजलि अर्पित की। धर्मसभा का शुभारंभ आचार्य विमल सागर जी के चित्र के समक्ष डॉ. जैनेंद्र जैन, नीलेश जैन, अतुल जैन, रजनी जैन, सरिता जैन ने दीप प्रज्वलन से किया। संचालन सोनाली बागड़िया ने किया।</p>
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		<title>आचार्यश्री शांतिसागर जी का समाधि दिवस पर दी भावांजलि: णमो जिणाणं श्री शांतिसागराचार्य नमः के जयकारों से गूंजा परिसर  </title>
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		<pubDate>Tue, 26 Aug 2025 07:34:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में आचार्यश्री शांतिसागर जी के समाधि दिवस पर मुनिराजों के सानिध्य में गुणानुवाद किया गया। पट्टाचार्य विशुद्धसागरजी महाराज के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लकश्री श्रुतसागरजी महाराज के सानिध्य में आचार्यश्री को भावांजलि अर्पित की [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में आचार्यश्री शांतिसागर जी के समाधि दिवस पर मुनिराजों के सानिध्य में गुणानुवाद किया गया। पट्टाचार्य विशुद्धसागरजी महाराज के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लकश्री श्रुतसागरजी महाराज के सानिध्य में आचार्यश्री को भावांजलि अर्पित की गई। <span style="color: #ff0000">नांद्रे से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटिल की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>नांद्रे।</strong> भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में आचार्यश्री शांतिसागर जी के समाधि दिवस पर मुनिराजों के सानिध्य में गुणानुवाद किया गया। पट्टाचार्य विशुद्धसागरजी महाराज के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लकश्री श्रुतसागरजी महाराज के सानिध्य में आचार्यश्री को भावांजलि अर्पित की गई। मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज कहा कि बीसवीं सदी के एक दूर-दृष्टा, अलौकिक व्यक्तित्व, वीतरागी श्रमण संस्कृती के उन्नायक सद्गुरु दिगंबराचार्य शांतिसागर जी ने विस्मृत मुनि मुद्रा से जनजन, उनके लिए दिगंबरत्व का तप, त्याग, संयम से प्रभाव दिखाकर अशांति, हिंसा आदि कर्माें में जीने वाले लोगों को शांति तथा अहिंसा की स्वमुद्रा से एवं स्व ज्ञानामृत वाणी से बोध कराकर वीतराग मार्ग पर श्रद्धा को स्थापित किया है।</p>
<p>मुनिश्री ने कहा कि आचार्य भगवंत शांतिसागर जी पंथ परंपराओं, अंध रूढियों से परे, विशद विचार, समीचीन सोच के धारक थे। वे एक ओजस्वी, तपस्वी साधक थे। या कहूं जन जन को सद्बोध देनेवाले आध्यात्मिक सद्गुरु, जिनकी विशेषता थी कि वह सभी को अपने लगते थे। आज आचार्य भगवंत की पुण्यतिथि का अवसर हमारे पाप पुण्य कारिणी विद्या का विनाश बने तथा निर्वाण प्राप्ति में सहयोग बने। यही मंगल भावना के साथ आचार्य भगवंत की सिद्ध श्रुत आचार्य भक्ति पूर्वक केवलज्ञान के ज्ञेय प्रमाण वंदना करता हूं।</p>
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		<title>धामनोद में आचार्य श्री शांतिसागरजी का समाधि दिवस मनाया: भक्ति भाव से अष्टद्रव्य से अर्घ्य अर्पित किए  </title>
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		<pubDate>Mon, 25 Aug 2025 14:28:19 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नगर के दिगंबर श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में आचार्य श्री शांतिसागरजी महाराज के 70 वें समाधि दिवस मनाया गया। समाधि दिवस पर सुंदर भावों से भक्ति के साथ अष्ट द्रव्य से अर्घ्य बोलकर चढ़ाया गया। धामनोद से पढ़िए, दीपक प्रधान की यह खबर&#8230; धामनोद। नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में आचार्य श्री [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>नगर के दिगंबर श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में आचार्य श्री शांतिसागरजी महाराज के 70 वें समाधि दिवस मनाया गया। समाधि दिवस पर सुंदर भावों से भक्ति के साथ अष्ट द्रव्य से अर्घ्य बोलकर चढ़ाया गया। <span style="color: #ff0000">धामनोद से पढ़िए, दीपक प्रधान की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>धामनोद</strong>। नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में आचार्य श्री शांतिसागरजी महाराज के 70 वें समाधि दिवस मनाया गया। टोक में विराजमान विराजित शिरोमणि आचार्य वर्धमान सागरजी महाराज की प्रेरणा से राष्ट्रीय स्तर पर शताब्दी वर्ष महोत्सव भी मनाया जा रहा है।</p>
<p>पथरिया में विराजित आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी महाराज की प्रेरणा से धामनोद के जैन मंदिर में प्रथमाचार्य श्री शांतिसागरजी महाराज के समाधि दिवस पर सुंदर भावों से भक्ति के साथ अष्ट द्रव्य से अर्घ्य बोलकर चढ़ाया गया। ध्वजा लेकर मंदिरजी के मूल गेट के परिसर पर ध्वजावंदन हुआ। इस दौरान श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित थी। यह जानकारी अध्यक्ष महेश जैन, राजेश जैन ने दी।</p>
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		<title>बीसवीं सदी के प्रथमाचार्य आचार्य श्री शान्तिसागर जी के समाधि दिवस पर विशेष : दिगंबर साधु परंपरा के पुनरुत्थान और समाधि का अप्रतिम उदाहरण </title>
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		<pubDate>Mon, 25 Aug 2025 06:50:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[हमारे वीतरागी संत केवल अपना ही नहीं, बल्कि समस्त जीव जगत का कल्याण करते हैं। समाज और राष्ट्र को उनका योगदान अतुलनीय है। बीसवीं शताब्दी में इस परंपरा के पुनर्जागरण के सूत्रधार, चारित्र चक्रवर्ती 108 आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज हुए, जिन्होंने दिगंबर मुनि परंपरा को पुनर्जीवित किया। पढ़िए उनके समाधि दिवस पर उदयभान जैन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>हमारे वीतरागी संत केवल अपना ही नहीं, बल्कि समस्त जीव जगत का कल्याण करते हैं। समाज और राष्ट्र को उनका योगदान अतुलनीय है। बीसवीं शताब्दी में इस परंपरा के पुनर्जागरण के सूत्रधार, चारित्र चक्रवर्ती 108 आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज हुए, जिन्होंने दिगंबर मुनि परंपरा को पुनर्जीवित किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए उनके समाधि दिवस पर उदयभान जैन का विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>सच्चे देव-शास्त्र-गुरु ही जैन संस्कृति के मूल बिंदु हैं। भारत की यह पुण्यभूमि त्याग, तप, साधना और चारित्र प्रधान परंपरा के लिए जानी जाती है। यही वह भूमि है जहाँ अयोध्या जैसे शाश्वत तीर्थ और झारखंड का सम्मेद शिखर जी अवस्थित हैं। यही से तीर्थंकरों ने जन्म और मोक्ष प्राप्त कर सिद्ध शिला पर विराजमान होकर जगत का कल्याण किया। आचार्य भगवंतों ने स्पष्ट कहा है कि मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य संयम पथ पर चलकर आत्मकल्याण और अंततः सिद्ध शिला तक पहुँचना है। हमारे वीतरागी संत केवल अपना ही नहीं, बल्कि समस्त जीव जगत का कल्याण करते हैं। समाज और राष्ट्र को उनका योगदान अतुलनीय है। बीसवीं शताब्दी में इस परंपरा के पुनर्जागरण के सूत्रधार, चारित्र चक्रवर्ती 108 आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज हुए, जिन्होंने दिगंबर मुनि परंपरा को पुनर्जीवित किया।</p>
<p><strong>जन्म और प्रारंभिक जीवन</strong></p>
<p>आचार्य श्री का जन्म कर्नाटक राज्य के बेलगाम जिले की चिकोडी तहसील के बेलगुल ग्राम में 25 जुलाई 1872 (आषाढ़ कृष्ण षष्ठी, विक्रम संवत् 1929) को भीमगोड़ा पाटिल और धर्मपत्नी सत्यवतीजी के यहाँ हुआ। बालक का नाम रखा गया गौड़ा। क्षत्रिय वंश में जन्मे इस पुण्यात्मा की मातृभाषा मराठी थी। तीन भाई-बहनों में यह प्रतिभाशाली बालक लौकिक शिक्षा में केवल तीसरी कक्षा तक ही पढ़ पाया, किंतु माता-पिता के धार्मिक संस्कारों ने उनके जीवन की धारा तय कर दी। नौ वर्ष की अल्पायु में विवाह हुआ, किंतु संयोगवश छः माह पश्चात् पत्नी का स्वर्गवास हो गया। इसके बाद उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया। 15 वर्ष की उम्र में ब्रह्मचर्य व्रत लिया और 32 वर्ष की आयु में घी-तेल का त्याग कर एक समयाहार का नियम अपना लिया। दयामयी और करुणामयी प्रवृत्ति से युक्त, वे खेती-बाड़ी और व्यापार में भी जीवों के प्रति संवेदनशील रहे। खेत में पक्षियों-पशुओं को कभी नहीं भगाया और कपड़े के व्यापार में ग्राहकों को पूर्ण स्वतंत्रता दी।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-88406" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/08/IMG-20250825-WA0011.jpg" alt="" width="398" height="534" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/08/IMG-20250825-WA0011.jpg 398w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/08/IMG-20250825-WA0011-224x300.jpg 224w" sizes="(max-width: 398px) 100vw, 398px" />दीक्षा और आचार्य पद</strong></p>
<p>43 वर्ष की आयु में क्षुल्लक दीक्षा और 1920 में आचार्य देवेंद्र कीर्ति से मुनिदीक्षा प्राप्त की। 1924 में ममडोली ग्राम में आचार्य पद से अलंकृत किए गए और वहीं चतुर्विध संघ की स्थापना हुई। उनके नेतृत्व में श्रमण संस्कृति को पुनः जीवंत स्वरूप मिला। समाज को पड़गाहन विधि का ज्ञान, 1930 में करुणाभाव से संघ की रक्षा, और 1931 में दिगंबर मुनियों को स्वतंत्र विचरण की अनुमति—ये सब उनके योगदान रहे। 1937 में गजपंथा जी पर उन्हें चारित्र चक्रवर्ती की उपाधि से विभूषित किया गया।</p>
<p><strong>उपसर्ग विजेता</strong></p>
<p>आचार्य श्री तप और संयम के पर्याय बने। कौन्स गुफा में ध्यान के समय सर्प दो घंटे तक लिपटा रहा, द्रोणगिरि पर शेर उनके पास बैठा रहा, लेकिन वे अविचल सामायिक में लीन रहे। ऐसे अनेक उपसर्गों पर विजय पाकर वे उपसर्ग विजेता कहलाए।</p>
<p><strong>समाधिमरण</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने 36 वर्ष का दीक्षित जीवन व्यतीत किया, जिसमें लगभग 25 वर्ष उपवास में रहे। अंततः कुंथलगिरि में संलेखना पूर्वक 28 अगस्त 1955 (भाद्र शुक्ला द्वितीया) को प्रातः 6:50 बजे “ॐ सिद्धाय नमः” का उच्चारण करते हुए समाधिमरण प्राप्त किया। उनके जीवन ने आने वाली पीढ़ियों को समाधि-मरण का अद्भुत उदाहरण दिया।</p>
<p><strong>अमिट योगदान</strong></p>
<p>आज लगभग 1800 से अधिक दिगंबर साधु चारित्र पथ पर अग्रसर हैं, यह आचार्य श्री की ही कृपा का परिणाम है। उनके शिष्य और परंपरा में आचार्य वीरसागर जी, शिवसागर जी, धर्मसागर जी, श्रेयांससागर जी, अभिनंदनसागर जी और वर्तमान में आचार्य वर्धमान सागर जी तथा अनेकान्तसागर जी आचार्य परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने उनके नाम से सम्मेद शिखरजी पर शान्तिसागर धाम का निर्माण कराया, जहाँ 31 फीट ऊँची भगवान अजितनाथ की प्रतिमा विराजमान है। माताजी के आशीर्वाद और प्रेरणा से समाधि दिवस पर देशभर में संगोष्ठियाँ, प्रदर्शनी, नाटिकाएँ, भाषण और प्रतियोगिताएँ आयोजित होती हैं। आज भी आचार्य श्री का समाधि दिवस पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।</p>
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		<title>समाधि दिवस पर आचार्य श्री विराग सागरजी का पुण्य स्मरण: आचार्यश्री को कोटि-कोटि भावांजलि  </title>
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		<pubDate>Fri, 04 Jul 2025 06:18:28 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[4 जुलाई 2024 को संल्लेखना पूर्वक समाधिस्थ हुए श्रमण संस्कृति के गणाचार्य विरागसागर जी महाराज का आज प्रथम पुण्य स्मरण दिवस है। समाधि दिवस पर हम उनका पुण्य स्मरण करते हुए कोटि-कोटि नमन करते हैं। इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230; इंदौर। 2 मई 1963 को जन्मे और 4 जुलाई 2024 को संल्लेखना पूर्वक समाधिस्थ हुए [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>4 जुलाई 2024 को संल्लेखना पूर्वक समाधिस्थ हुए श्रमण संस्कृति के गणाचार्य विरागसागर जी महाराज का आज प्रथम पुण्य स्मरण दिवस है। समाधि दिवस पर हम उनका पुण्य स्मरण करते हुए कोटि-कोटि नमन करते हैं। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर</strong>। 2 मई 1963 को जन्मे और 4 जुलाई 2024 को संल्लेखना पूर्वक समाधिस्थ हुए श्रमण संस्कृति के गणाचार्य विरागसागर जी महाराज का आज प्रथम पुण्य स्मरण दिवस है। समाधि दिवस पर हम उनका पुण्य स्मरण करते हुए कोटि-कोटि नमन करते हैं। गणाचार्य विराग सागर जी कोई सामान्य संत नहीं थे, आपका भी आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज की तरह अपने आचार्यत्व को सफल करते हुए श्रमण परंपरा के उन्नयन में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। डॉ. जैनेंद्र जैन और राजेश जैन दद्दू ने बताया कि आप एक उत्कृष्ट क्षयोपशम धारी शिरोमणि संत थे और आपने अपनी साधना काल के 45 वर्षों में ऐसे अनेक कीर्तिमान स्थापित किए।</p>
<p>जिसकी गौरव गाथा युगों-युगों तक इतिहास गाता रहेगा। उन्होंने बताया कि लगभग 550 शिष्य, प्रशिष्यों के नायक गणाचार्य विराग सागर जी निमित्तज्ञानी भी थे और अपनी समाधि का काल निकट जानकर एक दिन पूर्व ही उन्होंने अपने अंतिम उपदेश में सार्वजनिक रूप से स्व शिष्य, पर शिष्य, स्व गण,से पर गण से क्षमा याचना पूर्वक उत्तमार्थ प्रतिक्रमण कर आगम की व्यवस्था अनुसार अपने पद का भार एवं उत्तराधिकारी अपने शिष्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज’को दिए जाने की घोषणा करते हुए संघ का परित्याग कर दिया और पूर्ण निर्विकल्प होकर समाधि का एक अभूतपूर्व और सर्वश्रेष्ठ एवं उत्कृष्ट कीर्तिमान स्थापित कर समाधिस्थ हो गए। ऐसे श्रमण संस्कृति के श्रेष्ठ साधक के प्रथम पुण्य स्मरण दिवस पर कोटि-कोटि नमन। नमोस्तु शासन जयवंत हो।</p>
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		<title>आचार्य श्री के प्रथम समाधि दिवस पर विशेष : गुरुवर की अप्रतिम मुस्कान से मुरझाए चेहरे भी खिल-खिल जाते </title>
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		<pubDate>Sat, 08 Feb 2025 10:38:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज, एक महान जैन आचार्य और दिव्य तत्वज्ञानी थे, जिन्होंने भारतीय समाज में अहिंसा, सत्य, और आत्मकल्याण के मार्ग को फैलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे विशेष रूप से अपनी अद्वितीय साधना, गहन ज्ञान और साध्वी-वचनबद्धता के लिए प्रसिद्ध हैं। उनका जीवन और कार्य एक प्रेरणा है जो लाखों अनुयायियों को [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज, एक महान जैन आचार्य और दिव्य तत्वज्ञानी थे, जिन्होंने भारतीय समाज में अहिंसा, सत्य, और आत्मकल्याण के मार्ग को फैलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे विशेष रूप से अपनी अद्वितीय साधना, गहन ज्ञान और साध्वी-वचनबद्धता के लिए प्रसिद्ध हैं। उनका जीवन और कार्य एक प्रेरणा है जो लाखों अनुयायियों को धर्म और आत्मा की सही राह दिखाता है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए स्वप्निल जैन का विशेष आलेख</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर</strong>।एक आत्मदर्शन, आत्मचिंतन, और आत्मकल्याण का भाव धारण किए हुए साधक, जिनकी अप्रतिम मुस्कान ने न जाने कितने जीवों का कल्याण किया। और जिन्होंने समाधि धारण करके मृत्यु को भी पराजित कर दिया। हम धन्य हैं कि हमने आचार्य श्री विद्यासागर के युग में जन्म लिया।</p>
<p>आचार्य श्री जाते-जाते नश्वर देह का उपदेश देकर समस्त संसार को आत्मदर्शन करवा गए। जाना सभी को एक दिन है, परंतु एक वीतरागी होकर समाधि मरण द्वारा मृत्यु को महोत्सव बनाने का दर्शन ही असली भारतीय दर्शन है, जो आत्मा को मोक्ष मार्ग पर ले जाने का मार्ग भी दर्शाता है।</p>
<p><strong>&#8220;जिंदगी समझ नहीं आई तो मेले में अकेला, समझ आ गई तो अकेले में मेला।&#8221;</strong></p>
<p>आचार्य श्री के समाधि मरण के पश्चात यह बात समस्त संसार को समझ में आ गई। आपने एकांत रूपी आत्मदर्शन और मोक्ष मार्ग की यात्रा को सिद्धों के मेले के रूप में चुना। मोक्ष प्राप्ति हेतु सिद्ध शिला को चुना। भारत के दर्शन को जो उन्होंने समझाया, वह हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।</p>
<p>आचार्य श्री विद्यासागर के युग में उनके द्वारा आध्यात्मिक चेतना के माध्यम से जो अलख जगी है, उससे अध्यात्म की राह पर चलने वाले लोग अछूते नहीं रह सकते। आचार्य श्री का आभामंडल इतना विशाल था कि उसके चुंबकीय प्रभाव में हर कोई खींचा चला जाता था। एक बार जो उन्हें देख लेता, वह देखता ही रह जाता था, जैसे अब मन के सारे सवालों के उत्तर मिल गए हों। यह आध्यात्मिक अनुभूति लाखों अनुयायियों ने महसूस की है। आचार्य श्री के समाधि के पश्चात वह आभामंडल अब उनके आशीर्वाद स्वरूप मौजूद है, और उनके अनुयायियों को धर्म की राह पर चलने के लिए सतत मार्गदर्शन प्रदान कर रहा है।</p>
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		<title>ज्ञान के सागर: आचार्य विद्यासागर का अनंत दर्शन </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 05 Feb 2025 15:29:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[एक वर्ष पूर्व माघ शुक्ल नवमी को जब संत शिरोमणि 108 आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने सल्लेखनापूर्वक समाधि ली, तब भारत ने अपने एक ऐसे महान संत को खोया, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन धर्म, संस्कृति और राष्ट्र के उत्थान में समर्पित कर दिया। पढ़िए आचार्यश्री पर विशेष आलेख मुनि श्री अक्षय सागर महाराज की [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>एक वर्ष पूर्व माघ शुक्ल नवमी को जब संत शिरोमणि 108 आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने सल्लेखनापूर्वक समाधि ली, तब भारत ने अपने एक ऐसे महान संत को खोया, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन धर्म, संस्कृति और राष्ट्र के उत्थान में समर्पित कर दिया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए आचार्यश्री पर विशेष आलेख मुनि श्री अक्षय सागर महाराज की कलम से । </span></strong></p>
<hr />
<p>जीवन यात्रा और साधना 10 अक्टूबर 1946 को कर्नाटक के चिक्कोड़ी में जन्मे श्री मल्लप्पाजी अष्टगे और श्रीमती श्रीमंतीजी के सुपुत्र विद्याधर (आचार्यश्री विद्यासागरजी महामुनिराज का पूर्व नाम) ने मात्र 22 वर्ष की आयु में 30 जून 1968 को अजमेर में मुनि दीक्षा ली और 22 नवंबर 1972 को नसीराबाद में आचार्य पद प्राप्त किया। कन्नड़ भाषी होते हुए भी उन्होंने राष्ट्रीय एकता के लिए हिंदी भाषा को बढ़ावा दिया।</p>
<p>एक वर्ष पूर्व जब संत शिरोमणि 108 आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने समाधि ली, तब यह अनुभव नहीं हुआ था कि उनके विचारों का प्रकाश कितना प्रखर है। आज एक वर्ष बाद, उनकी अनुपस्थिति में भी, उनका दर्शन समाज को निरंतर आलोकित कर रहा है। उनका जीवन मात्र एक व्यक्ति का जीवन नहीं, बल्कि एक संपूर्ण दर्शन था, जिसमें करुणा, ज्ञान और कर्तव्य का अद्भुत संगम था।</p>
<p><strong>करुणा की अविरल धारा</strong></p>
<p>आचार्य श्री के जीवन में करुणा एक सहज प्रवाह थी। उनके आचरण में प्राणी मात्र के प्रति अगाध प्रेम झलकता था। पिछले एक वर्ष में उनके द्वारा स्थापित अनेक सेवा संस्थान इसी करुणा को आगे बढ़ा रहे हैं। चाहे वह कैदियों का पुनर्वास हो या गरीबों की सेवा, उनकी करुणा आज भी हजारों लोगों के जीवन को प्रकाशित कर रही है।</p>
<p><strong>ज्ञान का असीम सागर</strong></p>
<p>वास्तव में आचार्य श्री एक ज्ञान वारिधि थे। उनके विचारों को समेटना वैसे ही है जैसे छोटी सी अंजुली में सागर को समेटने का प्रयास। फिर भी, उनके विचारों की कुछ बूंदें भी जीवन को धन्य करने के लिए पर्याप्त हैं। उनका चिंतन प्राचीन भारतीय दर्शन से प्रेरित होते हुए भी अत्यंत मौलिक था। आज के युवा उनके इसी ज्ञान से प्रेरणा लेकर नई राहें तलाश रहे हैं।</p>
<p><strong>राष्ट्र और संस्कृति के प्रति समर्पण</strong></p>
<p>निस्पृह और वीतरागी होते हुए भी आचार्य श्री के विचार भारतीयता और राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत थे। उनका मानना था कि आध्यात्मिक उन्नति और राष्ट्र की प्रगति एक-दूसरे के पूरक हैं। आज जब देश नई ऊंचाइयों को छू रहा है, उनके ये विचार और भी प्रासंगिक हो गए हैं।</p>
<p><strong>शिक्षा का नया आयाम</strong></p>
<p>आचार्य श्री की देशना में ज्ञान और कर्म का अनूठा समन्वय था। उन्होंने शिक्षा को केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे जीवन के सर्वांगीण विकास का माध्यम बनाया।</p>
<p><strong>प्रकृति और पर्यावरण का संरक्षण</strong></p>
<p>आचार्य श्री का जीवन प्रकृति के साथ सामंजस्य का अनूठा उदाहरण था। उनकी सीख थी कि प्रकृति की रक्षा करना मानव धर्म का अभिन्न अंग है। आज जब पर्यावरण संकट विश्व के सामने एक बड़ी चुनौती है, उनके ये विचार मार्गदर्शक बन रहे हैं।</p>
<p><strong>विचारों की जीवंत विरासत</strong></p>
<p>एक वर्ष बीत जाने के बाद भी आचार्य विद्यासागर जी के विचार उतने ही प्रासंगिक हैं जितने पहले थे। उनकी देशना में छिपा जगत कल्याण का मार्ग आज भी समाज को नई दिशा दिखा रहा है। उनका जीवन सिखाता है कि कैसे व्यक्तिगत साधना को सामाजिक कल्याण से जोड़ा जा सकता है।</p>
<p><strong>नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत</strong></p>
<p>आज की युवा पीढ़ी के लिए आचार्य श्री का जीवन एक अमूल्य प्रेरणास्रोत है। वे सिखाते हैं कि कैसे आधुनिक चुनौतियों का सामना प्राचीन मूल्यों और आधुनिक दृष्टिकोण के समन्वय से किया जा सकता है। उनके विचारों में छिपा है वह मार्ग, जो व्यक्तिगत विकास और सामाजिक कल्याण को एक साथ साध सकता है।</p>
<p><strong>चतुर्विध संघ का पुनरुत्थान</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने जैन धर्म की मूल परंपरा को पुनर्जीवित किया। उनके मार्गदर्शन में 190 से अधिक दिगंबर मुनियों और 350 से अधिक आर्यिका माताओं ने दीक्षा ली। इस प्रकार उन्होंने तीर्थंकर भगवंतों के समय से चले आ रहे चतुर्विध संघ को पुनर्प्रतिष्ठित किया। हजारों ब्रह्मचारी भाई और बहनें जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में संलग्न हुए।</p>
<p><strong>शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में योगदान</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने बालिका शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए प्रतिभास्थली ज्ञानोदय विद्यापीठ की स्थापना की। भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। स्वास्थ्य के क्षेत्र में उन्होंने पूर्णायु आयुर्वेद चिकित्सालय एवं शोध संस्थान, जबलपुर की स्थापना में प्रेरणा दी। भाग्योदय चिकित्सालय के माध्यम से जैन समाज को चिकित्सा सेवा के लिए प्रेरित किया।</p>
<p><strong>गौ सेवा और पर्यावरण संरक्षण</strong></p>
<p>दयोदय महासंघ के माध्यम से आचार्य श्री ने गौशालाओं की स्थापना करने की जैन समाज को प्रेरणा दी और उसी का सुपरिणाम है कि देश के विभिन्न राज्यों में 150 से अधिक गौशालाएँ संचालित हैं जिनमें परित्यक्त, कत्लखानों से बचाए गए एक लाख से अधिक गौवंश को संरक्षण दिया जा रहा है। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण और प्राणी कल्याण पर विशेष बल दिया। मांस निर्यात के विरोध में उनकी आवाज ने राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव डाला।</p>
<p><strong>धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने अनेक प्राचीन तीर्थक्षेत्रों का जीर्णोद्धार कराया और नए तीर्थों का सृजन किया। उन्होंने भारतीय संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण पर विशेष बल दिया। भारत के प्राचीन नाम &#8216;भारत&#8217; के प्रयोग पर जोर देते हुए &#8216;इंडिया&#8217; के बजाय &#8216;भारत&#8217; शब्द के प्रयोग को प्रोत्साहित किया।</p>
<p><strong>राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण</strong></p>
<p>कन्नड़ भाषी होते हुए भी आचार्य श्री ने राष्ट्रीय एकता के लिए हिंदी भाषा को बढ़ावा दिया। उन्होंने भारतीय भाषाओं के महत्व को प्रतिपादित किया और शिक्षा में मातृभाषा के प्रयोग पर बल दिया।</p>
<p><strong>एक वर्ष बाद: विरासत का प्रभाव</strong></p>
<p>आज, उनकी समाधि के एक वर्ष बाद, उनके द्वारा प्रेरित संस्थाएं निरंतर प्रगति पथ पर अग्रसर हैं:</p>
<p>&#8211; शैक्षणिक संस्थानों में हजारों छात्र-छात्राएं शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं</p>
<p>&#8211; आयुर्वेदिक चिकित्सालय जन सेवा में संलग्न हैं</p>
<p>&#8211; गौशालाएं गौवंश के संरक्षण में योगदान दे रही हैं</p>
<p>&#8211; धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियां नई पीढ़ी को प्रेरित कर रही हैं</p>
<p><strong>भविष्य की राह</strong></p>
<p>आचार्य विद्यासागर जी का जीवन और उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उनका दर्शन हमें सिखाता है कि कैसे आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ सामाजिक और राष्ट्रीय विकास को साधा जा सकता है। उनकी विरासत न केवल जैन समाज को, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र को प्रेरित करती रहेगी।</p>
<p><strong>एक अनंत यात्रा</strong></p>
<p>भले ही वे शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार, उनका दर्शन, उनकी करुणा आज भी समाज को प्रेरित कर रही है। उनका जीवन सिखाता है कि कैसे सरलता में गहराई, त्याग में समृद्धि, और निस्पृहता में लोक कल्याण समाहित हो सकता है। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है, जो आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करती रहेगी।</p>
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		<title>मुनिश्री के समाधि स्थल मुंगावली में बनाया गया है निःशंकधामः मानस्तंभ का हर साल होता है महा मस्तकाभिषेक </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 17 Dec 2024 02:51:17 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
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					<description><![CDATA[श्री निःशंक सागर जी महाराज जी के 10वें समाधि दिवस पर विशेष जानकारी यहां दी जा रही है। श्री निःशंक सागर जी का इंदौर से भी गहरा नाता रहा है। उनके समाधि दिवस पर उन्हें गुरु भक्त श्रद्धा से स्मरण कर रहे हैं। पढ़िए इंदौर से हरिहर सिंह चौहान की यह खबर&#8230; इंदौर। ‘हमारे साथ [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>श्री निःशंक सागर जी महाराज जी के 10वें समाधि दिवस पर विशेष जानकारी यहां दी जा रही है। श्री निःशंक सागर जी का इंदौर से भी गहरा नाता रहा है। उनके समाधि दिवस पर उन्हें गुरु भक्त श्रद्धा से स्मरण कर रहे हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए इंदौर से हरिहर सिंह चौहान की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> ‘हमारे साथ बारात है आंसुओं की। मैंने दर्द की दुल्हन संग सगाई रचाई है।’ ‘तुम मेरे साथ चलकर मुस्कुरा सको तो विश्वास दिलाता हूं, जिंदगी का उपसंहार उजालांे के आंगन में होगा।’ ‘जहां आंनद की शहनाई और अपनत्व के मंगलाचार का महा महोत्सव होगा’। यह सृजनात्मक विचार संत शिरोमणि आचार्यश्री 108 विधासागर जी महाराज के शिष्य समाधिस्थ एलक श्री निःशंक सागरजी महाराज के हैं। जो मुस्कान के राजहंस थे।</p>
<p>जो अपनी मुस्कान की स्मृतियों को छोड़कर अपने अंतस की चेतना में खो गए। हम सबसे दूर जरूर हो गए। ऐसे एलक श्री निशंकसागर जी का 16 दिसंबर को 10वां समाधि दिवस है। इस अवसर पर हम सभी उन्हें उनकी स्मृतियों को सहेजने के लिए उनके बताए मार्ग पर अपने आप को लगाएं। जन जागृति के साथ समाज और धर्म के मार्ग पर चलकर आगे बढ़ते रहें।</p>
<p><strong><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-71118" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241217-WA0009.jpg" alt="" width="1080" height="1555" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241217-WA0009.jpg 1080w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241217-WA0009-208x300.jpg 208w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241217-WA0009-711x1024.jpg 711w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241217-WA0009-768x1106.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241217-WA0009-1067x1536.jpg 1067w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241217-WA0009-990x1425.jpg 990w" sizes="(max-width: 1080px) 100vw, 1080px" />सेठ हुकुमचंद जी का योगदान भी कम नहीं</strong></p>
<p>इंदौर शहर को अपनी पहचान दिलाने वाले जैन समाज की कीर्ति को जगविख्यात करने वाले सर सेठ हुकुमचंद जी ने संस्कृति और सभ्यता को बचाने के लिए धर्म धारा को प्रवाहमान बनाए रखने के लिए बहुत योगदान दिया। लोग अपने लिए बहुत कुछ करते हैं लेकिन, सेठ हुकुमचंद जी ने पीढियों की दिशा बदल दी। होस्टल, धर्मशाला और विभिन्न मंदिरों का निर्माण किया।</p>
<p><strong><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-71116" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241217-WA0010.jpg" alt="" width="1080" height="1113" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241217-WA0010.jpg 1080w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241217-WA0010-291x300.jpg 291w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241217-WA0010-994x1024.jpg 994w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241217-WA0010-768x791.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241217-WA0010-990x1020.jpg 990w" sizes="(max-width: 1080px) 100vw, 1080px" />श्री निःशंक सागर जी महाराज ने यहां मंदिर में जीर्णाेद्धार कराया</strong></p>
<p>प्राचीनतम धरोहरों में इंदौर शहर के सबसे पुराने दिगंबर जैन मंदिर में पुराने शहर के मध्य जबरी बाग नसिया धर्मशाला स्थित चिंतामणि पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर बहुत अतिशयकारी और जाग्रत है। इस भव्य मंदिर को और भी प्रसिद्ध करने में इस युग के भगवान परम पूज्य आचार्यश्री विधासागर जी शिष्य समाधिस्थ एलक श्री निःशंक सागर जी महाराज ने यहां मंदिर में जीर्णाेद्धार कराया और पंचकल्याणक और अन्य धार्मिक अनुष्ठान कराकर नसियाजी के भगवान पारसनाथ बाबा के अतिशय को भक्तों को बताया। इसी पुण्य योग से प्राचीन मानस्तंभ जो प्रांगण में है। उस मानस्तंभ का हर साल महामस्तकाभिषेक कराए जाने की परंपरा चालू की, जो आज तक निरंतर चल रही है। वहीं इस प्राचीन दिगंबर जैन मंदिर में आचार्य श्री विधासागर जी का दो बार दर्शन का पुण्य प्राप्त हुआ। नसियाजी के बडे़ बाबा और छोटे बाबा का वह अतिशय बहुत पुण्य सौभाग्य से प्राप्त हुआ।</p>
<p><strong>नसिया जी की देशभर में है पहचान</strong></p>
<p>यहां एलक श्री निःशंक सागर जी महाराज का आशीर्वाद ही था, जो आज नसिया जी मंदिर पूरे भारत में अपने अतिशय के लिए जाना जाता है। 16 दिसंबर को बंगला चौराहा मुंगावली अशोक नगर में एलकश्री निःशंक सागर जी की समाधि हुई थी। जहां निःशंक धाम बनाया गया है।</p>
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		<title>भारतवर्षीय दिगम्बर जैन सराक ट्रस्ट एवं प्राच्य श्रावक श्रमण केन्द्रीय समिति के तत्वावधान में हुआ कार्यक्रम : सराकोद्धारक आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज का पंचम समाधि दिवस कार्यक्रम संपन्न </title>
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		<pubDate>Thu, 28 Nov 2024 08:07:46 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सराक बन्धुओं के बीच सराकोद्धारक, सराकों के मसीहा, आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज की विनयांजलि सभा का पंचम समाधि दिवस पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले के लखनपुर में आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम संघस्थ ब्र. मंजुला दीदी जी के सान्निध्य में और श्री ज्ञानसागर भक्त परिवार के सहयोग से भारतवर्षीय दिगम्बर जैन सराक ट्रस्ट एवं [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सराक बन्धुओं के बीच सराकोद्धारक, सराकों के मसीहा, आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज की विनयांजलि सभा का पंचम समाधि दिवस पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले के लखनपुर में आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम संघस्थ ब्र. मंजुला दीदी जी के सान्निध्य में और श्री ज्ञानसागर भक्त परिवार के सहयोग से भारतवर्षीय दिगम्बर जैन सराक ट्रस्ट एवं प्राच्य श्रावक श्रमण केन्द्रीय समिति के तत्वावधान में संपन्न हुआ। <span style="color: #ff0000">पढ़िए मनीष शास्त्री विद्यार्थी की विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>लखनपुर (पश्चिम बंगाल)।</strong> सराक बन्धुओं के बीच सराकोद्धारक, सराकों के मसीहा, आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज की विनयांजलि सभा का पंचम समाधि दिवस पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले के लखनपुर में आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम संघस्थ ब्र. मंजुला दीदी जी के सान्निध्य में और श्री ज्ञानसागर भक्त परिवार के सहयोग से भारतवर्षीय दिगम्बर जैन सराक ट्रस्ट एवं प्राच्य श्रावक श्रमण केन्द्रीय समिति के तत्वावधान में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में हजारों की संख्या में सराक एवं जैन श्रद्धालु झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल से शामिल हुए। दीदी जी के निर्देशन में जनसैलाब के साथ गुरुदेव की झांकियां सहित नगर में जुलूस, शोभा यात्रा, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन, चरण पादुका प्रक्षालन, पूजन और सामूहिक आरती का आयोजन किया गया। इसके बाद, निबंध प्रतियोगिता के प्रतिभागियों ने अपने विचारों का वाचन किया, और विशिष्ट अतिथियों द्वारा गुणानुवाद कराया गया। कार्यक्रम में भावपूर्ण विनयांजलि गुरुदेव को समर्पित की गई।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-70395" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/11/IMG-20241128-WA0013.jpg" alt="" width="1080" height="1271" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/11/IMG-20241128-WA0013.jpg 1080w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/11/IMG-20241128-WA0013-255x300.jpg 255w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/11/IMG-20241128-WA0013-870x1024.jpg 870w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/11/IMG-20241128-WA0013-768x904.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/11/IMG-20241128-WA0013-990x1165.jpg 990w" sizes="auto, (max-width: 1080px) 100vw, 1080px" /> गुरु ज्ञानसागर जी महाराज और सराक बन्धु विषय पर आयोजित निबंध लेखन प्रतियोगिता में प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ और पंचम स्थान प्राप्त प्रतिभागियों को पुरस्कृत किया गया। बालिकाओं ने मंगलाचरण, भक्ति संगीत और गुरु स्मरण भजन के साथ नृत्य प्रदर्शन भी प्रस्तुत किया। अपने पूज्य गुरुदेव के स्मरण में उपस्थित सराक जैन महिला, पुरुष और बाल गोपाल के नयनों में अश्रुपूरित जलधाराएं थीं, जो गुरुदेव के चरणों में समर्पित हो रही थीं। 15 से 20 मिनट तक जनसैलाब में गहरा मातम छा गया। कार्यक्रम का संचालन नितिन शास्त्री, सुरेन्द्र शास्त्री और सागर जी ने किया, जबकि संयोजन में सराक जैन ट्रस्ट के प्रतिनिधि श्री विनोद जी जैन (पुरुलिया) और प्राच्य श्रावक श्रमण केन्द्रीय समिति के पदाधिकारी और सदस्य जैसे रमेशचन्द्र मांझी, रविन्द्रनाथ मांझी, कीरीटी भूषण मांझी, सृष्टि धर मांझी, गौरांग मांझी, आशीष मांझी (रांची), पुटुक माजी, असित लायेक, रामदुलाल मंडल (पुरुलिया), गयाराम माजी, संजय माजी, लखन माजी, सुदांशु माजी और स्थानीय लोग उपस्थित रहे।</p>
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