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	<title>समयसार &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>समयसार &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>प्राकृत भाषा की पुकार, बंद होती संस्थाओं को बचाएं : प्राकृत भाषा हमारी पहचान है </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 06 May 2026 10:32:39 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[प्राकृत भाषा वही भाषा है, जिसे हम शास्त्रीय भाषा के रूप में जानते हैं। आसान शब्दों में कहें तो यह हमारी सबसे प्राचीन और स्वाभाविक भाषा है। ‘प्राकृत’ का अर्थ ही होता है-मूल स्वभाव, यानी वह भाषा जो मन से स्वतः निकलती है। मुरैना/सांगानेर से पढ़िए, मनोज जैन नायक की इस प्रस्तुति में अंशुल जैन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>प्राकृत भाषा वही भाषा है, जिसे हम शास्त्रीय भाषा के रूप में जानते हैं। आसान शब्दों में कहें तो यह हमारी सबसे प्राचीन और स्वाभाविक भाषा है। ‘प्राकृत’ का अर्थ ही होता है-मूल स्वभाव, यानी वह भाषा जो मन से स्वतः निकलती है। <span style="color: #ff0000">मुरैना/सांगानेर से पढ़िए, मनोज जैन नायक की इस प्रस्तुति में अंशुल जैन शास्त्री का आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना/सांगानेर।</strong> प्राकृत भाषा वही भाषा है, जिसे हम शास्त्रीय भाषा के रूप में जानते हैं। आसान शब्दों में कहें तो यह हमारी सबसे प्राचीन और स्वाभाविक भाषा है। ‘प्राकृत’ का अर्थ ही होता है-मूल स्वभाव, यानी वह भाषा जो मन से स्वतः निकलती है। ‎पहले के समय में लोग आपस में प्राकृत में ही संवाद किया करते थे। यह कोई कठिन या भारी भाषा नहीं थी, बल्कि बेहद सरल, सहज और जन-जन की भाषा थी। इसके दो रूप माने जाते हैंकृएक बोलचाल का (कथ) और दूसरा साहित्य का। इसकी व्याकरण भी बहुत व्यवस्थित और प्रमाणिक मानी जाती है।</p>
<p>‎जैन आचार्यों ने प्राकृत भाषा को अपने ज्ञान और दर्शन का माध्यम बनाया। षठखंडागम समयसार, नियमसार, द्रव्यसंग्रह इत्यादि जैसे महान ग्रंथ इसी भाषा में रचे गए। ये सिर्फ ग्रंथ नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर और आध्यात्मिक विरासत हैं। प्राकृत साहित्य इतना व्यापक है कि आज भी कई ग्रंथ उपलब्ध हैं, हालांकि कुछ समय के साथ लुप्त भी हो गए। ‎समय बदला और हम भी बदल गए। आज हम हिंदी में बातचीत करते हैं, लेकिन इसका यह मतलब यह नहीं कि प्राकृत की महत्ता कम हो गई। यह भाषा आज भी हमारे अतीत की पहचान और हमारी जड़ों की आवाज़ है।</p>
<p>पूर्व के विद्वानों और महापुरुषों ने इस भाषा के संरक्षण के लिए कई संस्थाओं और शोध केंद्रों की स्थापना की थी। वहां ग्रंथों का संरक्षण होता था, शोध होता था और भाषा को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जाता था ‎लेकिन, आज की स्थिति थोड़ी चिंताजनक है। देश में ऐसी कई संस्थाएं या तो बंद हो रही हैं या उपेक्षा का शिकार बन चुकी हैं। इसका ताजा उदाहरण बिहार का अहिंसा शोध संस्थान है, जिसे बंद कर दिया गया। यह सिर्फ एक संस्था का बंद होना नहीं, बल्कि हमारी धरोहर पर एक आघात है। ‎अब सोचने वाली बात यह है कि अगर इसी तरह संस्थाएं खत्म होती रहीं तो आने वाली पीढ़ी प्राकृत भाषा से पूरी तरह अनजान हो जाएगी। यह केवल भाषा का नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और इतिहास का भी नुकसान होगा।</p>
<p>अब समय आ गया है कि हम, खासकर जैन समाज, इस विषय पर जागरूक हो। केवल चिंता करने से कुछ नहीं होगा, हमें आगे आकर प्रयास करना होगा। सरकार से भी अपेक्षा रखनी होगी कि वह इन संस्थाओं को पुनः जीवित करे। अंत में बस इतना ही-प्राकृत भाषा सिर्फ अतीत की बात नहीं है, यह हमारी पहचान है। अगर हमने आज इसे नहीं बचाया, तो कल शायद इसे याद करने का भी अवसर नहीं मिलेगा।</p>
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		<title>अनंत ज्ञान का महा-महोत्सव 26 अप्रैल को मनाएं : 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का पावन ज्ञान कल्याणक </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 26 Apr 2026 07:23:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष वैशाख शुक्ल दशमी का दिन जैन जगत में एक ऐतिहासिक और अत्यंत पवित्र अवसर के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष 26 अप्रैल को 24वें और वर्तमान अवसर्पिणी काल के अंतिम तीर्थंकर श्रवण भगवान महावीर स्वामी का ‘ज्ञान कल्याणक’ महोत्सव पूरी श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष वैशाख शुक्ल दशमी का दिन जैन जगत में एक ऐतिहासिक और अत्यंत पवित्र अवसर के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष 26 अप्रैल को 24वें और वर्तमान अवसर्पिणी काल के अंतिम तीर्थंकर श्रवण भगवान महावीर स्वामी का ‘ज्ञान कल्याणक’ महोत्सव पूरी श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल कासंकलित-संपादित आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष वैशाख शुक्ल दशमी का दिन जैन जगत में एक ऐतिहासिक और अत्यंत पवित्र अवसर के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष 26 अप्रैल को 24वें और वर्तमान अवसर्पिणी काल के अंतिम तीर्थंकर श्रवण भगवान महावीर स्वामी का ‘ज्ञान कल्याणक’ महोत्सव पूरी श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। यह वह पावन दिन है, जब 12 वर्ष से अधिक की कठोर तपस्या के पश्चात वर्धमान महावीर ने अपनी आत्मा के शुद्ध स्वरूप को पहचाना और उन्हें अनंत ज्ञान (केवलज्ञान) की प्राप्ति हुई।</p>
<p><strong> धर्मग्रंथों का विशेष आध्यात्मिक महत्व और मंत्र</strong></p>
<p>जैन आगम और विशिष्ट धर्मग्रंथों में भगवान महावीर की वीतरागता और उनके ज्ञान को ब्रह्मांडीय ऊर्जा के रूप में वर्णित किया गया है। ज्ञान कल्याणक के इस विशेष अवसर पर जिनागम का यह परम ‘आध्यात्मिक कोड’ या शाश्वत सूत्र संपूर्ण मानवता के लिए एक संजीवनी है।</p>
<p>परस्परोपग्रहो जीवानाम’ (तत्त्वार्थ सूत्र- 5.21)</p>
<p>अर्थात, सभी जीव एक-दूसरे के उपकार के लिए ही हैं। यह सूत्र ब्रह्मांड के इको-सिस्टम और अहिंसा का सबसे बड़ा वैज्ञानिक कोड है। इसके साथ ही, ज्ञान कल्याणक के दिन अष्टद्रव्य से पूजा करते समय इस विशेष मंत्र का उच्चारण वातावरण को अत्यंत ऊर्जामयी और पवित्र बना देता है।</p>
<p>ॐ ह्रीं श्रीं अर्हं श्री वर्धमान जिनेंद्राय, केवलज्ञान-महिमंडिताय नमः, ज्ञान कल्याणक अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।’’</p>
<p><strong> दिगंबर जैन मंदिरों में गूंजेंगे भक्ति के स्वर</strong></p>
<p>ज्ञान कल्याणक के शुभ अवसर पर देश-दुनिया के सभी दिगंबर जैन मंदिरों में भव्य अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। श्रावक-श्राविकाएं ब्रह्म मुहूर्त में उठकर वीतरागी प्रभु की आराधना में लीन हो जाते हैं। इस दिन की मुख्य गतिविधियों में शामिल हैं।</p>
<p>शांतिधारा और जिनाभिषेक- वैदिक और आगम मंत्रोच्चार के बीच भगवान की मनोहारी प्रतिमा का जल और प्रासुक द्रव्यों से अभिषेक, तथा विश्व शांति की मंगल कामना के साथ ‘शांतिधारा’ की जाती है।</p>
<p>महावीर विधान और महापूजन- श्रावक-श्राविकाएं अष्टद्रव्यों (जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप और फल) से भगवान की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और विधान मंडल पर अर्घ्य समर्पित करते हैं।</p>
<p>शास्त्र स्वाध्याय- जैन धर्मग्रंथों (जैसे समयसार, तत्त्वार्थसूत्र) का वाचन और गुरु भगवंतों के मंगल प्रवचन होते हैं।</p>
<p><strong>ऋजुकूला के तट से समवशरण की दिव्य ध्वनि तक</strong></p>
<p>जैन ग्रंथों के अनुसार 12 वर्ष, 5 महीने और 15 दिन की घोर तपस्या के बाद वैशाख शुक्ल दशमी के दिन जृम्भिक ग्राम के समीप ऋजुकूला नदी के तट पर एक शाल वृक्ष के नीचे भगवान महावीर को ‘केवलज्ञान’ प्रकट हुआ था। उनके चारों घातीय कर्मों का पूर्णतः नाश हो गया था और वे सर्वज्ञ बन गए। केवलज्ञान प्राप्ति के पश्चात सौधर्म इंद्र और कुबेर द्वारा भव्य ‘समवशरण’ (ईश्वरीय सभा) की रचना की गई। इसी समवशरण में भगवान महावीर की ‘दिव्य ध्वनि’ (ओंकार रूपी उपदेश) खिरी। इस दिव्य ध्वनि की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें बिना किसी भेदभाव के मनुष्य, देव और तिर्यंच (पशु-पक्षी) सभी ने उनके वचनों को अपनी-अपनी भाषा में समझा।</p>
<p><strong>युगों-युगों के लिए प्रासंगिक संदेश</strong></p>
<p>भगवान महावीर का ज्ञान कल्याणक मात्र एक ऐतिहासिक घटना नहीं है, बल्कि यह अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के परम प्रकाश की ओर जाने का एक जीवंत मार्ग है। उन्होंने अपनी दिव्य ध्वनि के माध्यम से विश्व को जो सिद्धांत दिए, वे आज के अशांत समय में और भी अधिक प्रासंगिक हैं।</p>
<p>अहिंसा-मन, वचन और कर्म से किसी भी जीव को कष्ट न पहुंचाना। जियो और जीने दो का मूल आधार।</p>
<p>अनेकांतवाद- वैचारिक सहिष्णुता और दूसरों के दृष्टिकोण (नय) का सम्मान करना।</p>
<p>अपरिग्रह-भौतिक वस्तुओं के प्रति मोह और मूर्छा का त्याग कर अपनी आवश्यकताओं को सीमित करना।</p>
<p><strong>ज्ञान कल्याणक का मूलतःसार </strong></p>
<p>भगवान महावीर का ज्ञान कल्याणक हमें स्मरण कराता है कि सच्ची शांति और सच्चा ज्ञान बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर ही विद्यमान है। 26 अप्रैल को जब हम इस पावन दिवस को मनाएं तो हमारा प्रयास केवल बाहरी अनुष्ठानों तक सीमित न रहे। आइए, इस ज्ञान कल्याणक पर हम अपने अंतर्मन के अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर सम्यक् ज्ञान के प्रकाश से अपने जीवन को आलोकित करने का संकल्प लें। जय महावीर! जय जिनेंद्र!</p>
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		<title>भगवान महावीर जन्म कल्याणक 30 मार्च को : भगवान महावीर की शिक्षाएं एवं पर्यावरण परस्परोपग्रहो जीवानाम् </title>
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		<pubDate>Thu, 26 Mar 2026 16:31:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान महावीर की शिक्षाएँ जैन दर्शन में केवल आत्मकल्याण का मार्ग नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के साथ संतुलित और अहिंसक सहअस्तित्व की जीवन-पद्धति के रूप में प्रतिपादित होती हैं। पढ़िए, डॉ यतीश जैन का यह आलेख&#8230; भगवान महावीर की शिक्षाएँ जैन दर्शन में केवल आत्मकल्याण का मार्ग नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के साथ संतुलित और [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भगवान महावीर की शिक्षाएँ जैन दर्शन में केवल आत्मकल्याण का मार्ग नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के साथ संतुलित और अहिंसक सहअस्तित्व की जीवन-पद्धति के रूप में प्रतिपादित होती हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए, डॉ यतीश जैन का यह आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>भगवान महावीर की शिक्षाएँ जैन दर्शन में केवल आत्मकल्याण का मार्ग नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के साथ संतुलित और अहिंसक सहअस्तित्व की जीवन-पद्धति के रूप में प्रतिपादित होती हैं। महावीर जन्मकल्याणक महोत्सव के पावन अवसर पर जब हम उनके जीवन और उपदेशों का स्मरण करते हैं, तब यह स्पष्ट होता है कि उनका दर्शन आज के पर्यावरण संकट से जूझती मानवता के लिए अत्यंत प्रासंगिक और मार्गदर्शक है। जैन परंपरा के प्रमुख ग्रंथ आचार्य उमास्वामी कृत तत्त्वार्थसूत्र, आचार्य कुंदकुंददेव कृत समयसार, पंचास्तिकाय, आचार्य अमृतचंद्र कृत पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, तथा आचार्य पुझ्यपाद कृत सर्वार्थसिद्धि- इन सभी में महावीर की शिक्षाओं का दार्शनिक एवं व्यावहारिक स्वरूप विस्तार से मिलता है।</p>
<p>महावीर जन्मकल्याणक केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि एक चेतना का पर्व है, जो हमें उनके द्वारा प्रतिपादित अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांत और संयम जैसे सिद्धांतों को जीवन में उतारने की प्रेरणा देता है। तत्त्वार्थसूत्र का प्रसिद्ध सूत्र:-</p>
<p><strong>“परस्परोपग्रहो जीवानाम्” (5.21) </strong></p>
<p>इस अवसर पर विशेष रूप से स्मरणीय है, क्योंकि यह हमें बताता है कि समस्त जीव एक-दूसरे पर आश्रित हैं। यही सिद्धांत आधुनिक पर्यावरण विज्ञान का आधार है। जब हम जन्मकल्याणक मनाते हैं, तो यह केवल पूजा-अर्चना तक सीमित न रहकर इस विचार को भी आत्मसात करने का अवसर होना चाहिए कि पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और वनस्पति- ये सभी जीव हैं और इनके प्रति हमारा व्यवहार अहिंसात्मक होना चाहिए।</p>
<p><strong>इसी ग्रंथ में कहा गया है:-</strong></p>
<p>“पृथिव्यापस्तेजोवायुवनस्पतयः स्थावराः”</p>
<p>(तत्त्वार्थसूत्र 2.13)</p>
<p>अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति भी जीव हैं। महावीर जन्मकल्याणक के अवसर पर यदि इस सूत्र को व्यवहार में उतारा जाए तो पर्यावरण संरक्षण अपने आप एक धार्मिक कर्तव्य बन जाता है। वृक्षारोपण, जल संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण—ये सभी केवल सामाजिक कार्य नहीं, बल्कि अहिंसा के प्रत्यक्ष रूप हैं।</p>
<p><strong>आचार्य कुंदकुंददेव कृत समयसार में कहा गया है:-</strong></p>
<p>“रागादयो हि संसारः”</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>अर्थात् राग, लोभ और आसक्ति ही संसार के बंधन का कारण हैं।</p>
<p>जन्मकल्याणक के महोत्सव में जब हम भगवान महावीर के वैराग्य और त्याग का स्मरण करते हैं, तब यह भी समझना आवश्यक है कि आज का पर्यावरण संकट कहीं न कहीं मानव के असीमित उपभोग और संग्रह की प्रवृत्ति का परिणाम है। यदि हम अपरिग्रह को अपनाएँ, तो संसाधनों का संतुलित उपयोग संभव हो सकेगा।</p>
<p><strong>आचार्य अमृतचंद्र कृत पुरुषार्थसिद्ध्युपाय का सूत्र: </strong></p>
<p>“प्रमत्तयोगात् प्राणव्यपरोपणं हिंसा”</p>
<p>(गाथा 44)</p>
<p>यह बताता है कि असावधानी से भी जीवों को कष्ट पहुँचाना हिंसा है। आज के संदर्भ में प्लास्टिक का अंधाधुंध उपयोग, जल और वायु का प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग &#8211; ये सभी प्रमादजन्य हिंसा के उदाहरण हैं। महावीर जन्मकल्याणक का वास्तविक संदेश यही है कि हम अपने जीवन में सजगता लाएँ और ऐसे आचरण से बचें जो प्रकृति को हानि पहुँचाते हैं।</p>
<p>पंचास्तिकाय में जीवों की स्वतंत्र सत्ता और उनके अस्तित्व का सम्मान करने की बात कही गई है। यह सिद्धांत हमें यह सिखाता है कि प्रकृति पर अधिकार नहीं, बल्कि सहअस्तित्व का भाव रखना चाहिए।</p>
<p>जन्मकल्याणक के अवसर पर यदि यह भावना विकसित हो जाए, तो पर्यावरण संरक्षण केवल एक कार्यक्रम न रहकर जीवन का हिस्सा बन सकता है। भगवान महावीर का जीवन स्वयं इस बात का उदाहरण है कि सरलता, संयम और अहिंसा के माध्यम से ही सच्ची प्रगति संभव है। आज जब हम जन्मकल्याणक महोत्सव को धूमधाम से मनाते हैं, तब यह भी आवश्यक है कि हम इसे “हरित उत्सव” के रूप में मनाने का संकल्प लें &#8211; जैसे प्लास्टिक मुक्त आयोजन, वृक्षारोपण, जल संरक्षण और पर्यावरण जागरूकता अभियान। यही भगवान महावीर के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। अतः कहा जा सकता है कि भगवान महावीर का जन्मकल्याणक केवल उनके अवतरण का उत्सव नहीं, बल्कि उनके सिद्धांतों को पुनः जागृत करने का अवसर है। दिगंबर ग्रंथों में प्रतिपादित अहिंसा, अपरिग्रह, संयम और परस्पर सहयोग के सिद्धांत आज के पर्यावरण संकट का स्थायी समाधान प्रस्तुत करते हैं। यदि हम इस अवसर पर इन शिक्षाओं को अपने जीवन में आत्मसात कर लें, तो न केवल व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर परिवर्तन संभव है, बल्कि पृथ्वी को भी संतुलित और सुरक्षित बनाया जा सकता है। यही महावीर जन्मकल्याणक का वास्तविक संदेश और उद्देश्य है।</p>
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		<title>आचार्य श्री शांति सागर जी को बताया आध्यात्मिक उद्योगपति : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने दी मंगल देशना, विद्वानों ने किया गुणानुवाद </title>
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		<pubDate>Sat, 23 Aug 2025 17:23:19 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[टोंक में आयोजित दो दिवसीय विद्वत संगोष्ठी में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने कहा कि आचार्य श्री शांति सागर जी परम तपस्वी और आध्यात्मिक उद्योगपति थे। उनके जीवन में धर्म, तप और संयम की गाथाएं युगों तक प्रेरणा देती रहेंगी। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… टोंक में आचार्य संघ सान्निध्य में दो दिवसीय विद्वत संगोष्ठी का [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>टोंक में आयोजित दो दिवसीय विद्वत संगोष्ठी में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने कहा कि आचार्य श्री शांति सागर जी परम तपस्वी और आध्यात्मिक उद्योगपति थे। उनके जीवन में धर्म, तप और संयम की गाथाएं युगों तक प्रेरणा देती रहेंगी। <span style="color: #ff0000">पढ़िए पूरी रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>टोंक में आचार्य संघ सान्निध्य में दो दिवसीय विद्वत संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। प्रातःकालीन सत्र में वात्सल्य वारिधि पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मंगल देशना देते हुए कहा कि प्रथमाचार्य आचार्य श्री शांति सागर जी परम तपस्वी और आध्यात्मिक उद्योगपति थे। उन्होंने 35 वर्षों के साधु जीवन में 9938 उपवास किए और मंदिर संस्कृति की रक्षा हेतु 1105 दिनों तक अन्न का त्याग किया। आपके जीवन में कथनी और करनी का अद्भुत सामंजस्य था। आप समयसार के जीवंत स्वरूप थे और सदैव आगम परंपरा पालन की प्रेरणा देते रहे।</p>
<p>संगोष्ठी का शुभारंभ भगवान आदिनाथ, आचार्य श्री शांति सागर जी और पूर्वाचार्यों के चित्रों के समक्ष दीप प्रवज्जलन, चरण प्रक्षालन एवं जिनवाणी भेंट से हुआ। कार्यक्रम संयोजक डॉ. सुनील संचय और राजेश पंचोलिया ने बताया कि इस अवसर पर डॉ. अनेकांत देहली, डॉ. फूलचंद प्रेमी (वाराणसी), पंडित श्रेयांश कुमार (बड़ौत) सहित अनेक विद्वानों ने चयनित विषयों पर आचार्य श्री शांति सागर जी के त्याग और तप की गाथाओं का गुणानुवाद किया। मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने प्रवचन में बताया कि आचार्य श्री ने श्रमण परंपरा को पुनर्जीवित किया, नग्न साधुओं के विहार पर लगे प्रतिबंध को हटवाया, बाल विवाह पर रोक के लिए कानून बनवाया और मंदिर संस्कृति व जिनवाणी की सुरक्षा हेतु अद्वितीय कार्य किए। संगोष्ठी के दोपहर सत्र में भी विद्वानों ने आचार्य श्री शांति सागर जी के महान तप, त्याग और धर्म साधना का गुणानुवाद प्रस्तुत किया।</p>
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		<title>स्वयं के बांधे कर्मों का फल स्वयं को ही भोगना है: मुनिश्री विलोकसागर जी ने कथनी-करनी में भेद समझाया  </title>
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		<pubDate>Wed, 20 Aug 2025 11:56:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैनाचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के आध्यात्मिक वर्षायोग में प्रतिदिन प्रवचनों के माध्यम से अमृतवर्षा हो रही है। बुधवार को धर्मसभा में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने कुंद-कुंद स्वामी द्वारा रचित सैद्धांतिक ग्रंथ समयसार की वाचना करते हुए कथनी-करनी के संदर्भ में बताया। मुरैना से पढ़िए मनोज जैन की , [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैनाचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के आध्यात्मिक वर्षायोग में प्रतिदिन प्रवचनों के माध्यम से अमृतवर्षा हो रही है। बुधवार को धर्मसभा में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने कुंद-कुंद स्वामी द्वारा रचित सैद्धांतिक ग्रंथ समयसार की वाचना करते हुए कथनी-करनी के संदर्भ में बताया। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए मनोज जैन की , यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> जैनाचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के आध्यात्मिक वर्षायोग में प्रतिदिन प्रवचनों के माध्यम से अमृतवर्षा हो रही है। बुधवार को धर्मसभा में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने कुंद-कुंद स्वामी द्वारा रचित सैद्धांतिक ग्रंथ समयसार की वाचना करते हुए कथनी-करनी के संदर्भ में बताया। दुनिया में छह द्रव्य जीव पुदगल धर्म अधर्म आकाश और काल के बारे में समझाते हुए कहा कि जीव और पुदगल का संयोग जब होता है तब कर्म बंध होता है। शेष चार द्रव्य धर्म, अधर्म, आकाश और काल तो अपने आप में रहते हैं। जो भी कर्म बंध होता है वह जीव और पुदगल के संयोग से ही होता है। जो भी शुभ अशुभ फल होता है, जो भी बंध होता है वह हमारे स्वयं के द्वारा ही होता है। जब हम कूलर या एसी की हवा खाते हैं तो उसका बिल किसे भरना पड़ेगा, हमें ही तो भरना पड़ेगा, हमें ही तो चुकाना पड़ेगा।</p>
<p><strong>भेद विज्ञान को समझ लेंगे, तब हमारे वस्त्र स्वयं ही छूट जाएंगे</strong></p>
<p>इसी प्रकार हम जिस प्रकार की सांसारिक क्रियाओं में लिप्त रहते हैं तो उनके द्वारा बांधे गए कर्माें का फल हमको ही भोगना पड़ेगा। कोई दूसरा हमारा अच्छा या बुरा नहीं कर सकता। यदि हम अधर्म के कामों में, पाप कर्मों में लिप्त रहेंगे तो परमात्मा भी हमारे दुःखों को हमारे कष्टों को दूर नहीं कर सकता। हमें स्वयं को इसके लिए पुरुषार्थ करना होगा, हमें ही जागृत होना पड़ेगा। जब हम जागृत हो जाएंगे, भेद विज्ञान को समझ लेंगे, तब हमारे वस्त्र स्वयं ही छूट जाएंगे। हम स्वयं ही संसार से विरक्त हो जाएंगे। वस्त्र उतारे नहीं जाते, स्वयं ही उतर जाते हैं। त्याग विरक्ति तो अंतरंग से आती है। जब सच्चाई का ज्ञान हो जाता है, जब स्व और पर का भेद समझ आ जाता है, तब मन संसार से विरक्त होकर जीव मोक्ष मार्गी हो जाता है।</p>
<p><strong>जैन दर्शन में कर्मों के बंधन से मुक्त होना ही मुख्य लक्ष्य</strong></p>
<p>जैन धर्म में, जीव और पुद्गल दो अलग-अलग द्रव्य हैं जो इस ब्रह्मांड का निर्माण करते हैं। जीव चेतन तत्व है, जबकि पुद्गल जड़ (निर्जीव) पदार्थ है। जीव को आत्मा भी कहा जाता है, जो शाश्वत और चेतन तत्व है। यह सुख-दुःख का अनुभव करता है और कर्मों के बंधन में बंधा होता है। जैन धर्म का मुख्य लक्ष्य जीव को कर्मों के बंधन से मुक्त कराना है, जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो सके। पुद्गल जड़ (निर्जीव) पदार्थ है, जो विभिन्न रूपों में मौजूद है। यह दिखाई देने वाला, स्पर्श करने योग्य और परिवर्तनशील है। पुद्गल में वर्ण (रंग), गंध (गंध), रस (स्वाद) और स्पर्श (स्पर्श) गुण होते हैं। शरीर, मन, वचन और सांसें सभी पुद्गल से बनी हैं। जैन धर्म में, पुद्गल को कर्मों के रूप में भी माना जाता है जो आत्मा के साथ बंधते हैं।</p>
<p><strong>जैन दर्शन में जन्म मृत्यु के चक्र से मुक्त होना ही मुख्य ध्येय</strong></p>
<p>जैन धर्म के अनुसार, जीव और पुद्गल अनादि काल से एक दूसरे से बंधे हुए हैं। जीव पुद्गल के साथ मिलकर संसार में जन्म-मरण के चक्र में फंसा रहता है। जीव को कर्मों के बंधन से मुक्त कराने के लिए, उसे पुद्गल से अलग होना होगा, यानी कर्मों से छुटकारा पाना होगा। पुद्गल से मुक्ति पाने के लिए, जीव को सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक चारित्र का पालन करना होता है। जैन धर्म में जीव और पुद्गल दो अलग-अलग तत्व हैं, लेकिन वे एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। जीव को कर्मों के बंधन से मुक्त कराने के लिए, उसे पुद्गल से अलग होना होगा, जो जैन धर्म का मुख्य लक्ष्य है।</p>
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		<title>संगति से भी हमारा पाप, पुण्य में परिवर्तित होता हैः मुनिश्री सुधासागर जी महाराज के प्रवचनों से हो रहा धर्म-ज्ञानार्जन </title>
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		<pubDate>Wed, 23 Jul 2025 13:25:56 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री सुधासागर जी महाराज नगर के सुभाषगंज स्थित जिनालय में धर्मसभा में प्रवचन कर रहे हैं। रोज उनके प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन यहां पहुंच रहे हैं। उनकी वाणी सुनकर वे धर्म-ज्ञानार्जन कर रहे हैं। अशोकनगर से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर&#8230; अशोकनगर। मुनिश्री सुधासागर जी महाराज नगर के सुभाषगंज स्थित [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री सुधासागर जी महाराज नगर के सुभाषगंज स्थित जिनालय में धर्मसभा में प्रवचन कर रहे हैं। रोज उनके प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन यहां पहुंच रहे हैं। उनकी वाणी सुनकर वे धर्म-ज्ञानार्जन कर रहे हैं। <span style="color: #ff0000">अशोकनगर से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अशोकनगर।</strong> मुनिश्री सुधासागर जी महाराज नगर के सुभाषगंज स्थित जिनालय में धर्मसभा में प्रवचन कर रहे हैं। रोज उनके प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन यहां पहुंच रहे हैं। उनकी वाणी सुनकर वे धर्म-ज्ञानार्जन कर रहे हैं। मंगलवार को उन्होंने अपने प्रवचन में कि यदि हमारे चारों तरफ पुण्य आत्मा हो तो हमारा पाप भी कम हो जाता है, पुण्य बढ़ जाता है, उनके घर में कोई भी व्यक्ति ऐसा पुण्य लेकर नहीं आया था कि मैं अकाल में हीं मरूँगा लेकिन, तीर्थंकर के पुण्य से कोई अकाल में नहीं मरता और यदि गर्भ में ऐसा कोई पापी जीव आ जाए तो बड़े-बड़े पुण्यात्माओं का भी पुण्य क्षय हो जाता है। संगति क्यों कराई जाती है क्योंकि, संगति से भी हमारा पाप, पुण्य में परिवर्तित होता है और हमारा पुण्य, पाप में भी परिवर्तित होता है।</p>
<p>निमित्त के अनुसार हमारे कर्मों की उदीरणा होती है। निमित्त मिलने पर भी कर्मों का संक्रमण होता है। जो किस्मत ने लिखा है वही होगा, नहीं हम किस्मत बदल सकते हैं। कितनी भी बुरी किस्मत हो मत घबराना, जो आज चरवाहे थे एक दिन के बाद राजा बन गए और कितनी ही अच्छी किस्मत हो मत इतराना, आज जो राजा बनने वाले थे, कल वे जंगलों में जाते दिखते हैं।</p>
<p><strong>आत्मशक्ति को जागने का मूल सूत्र है समयसार</strong></p>
<p>एक व्यक्ति के साथ हजार लोग खड़े रहते हैं और एक व्यक्ति बुलाए तो भी कोई साथ में नहीं आता। एक व्यक्ति की किस्मत में पीक दान भी सोने की है और एक व्यक्ति वो है जिसको सगाई में मिली अंगूठी भी रोल्ड गोल्ड की है, ऐसा क्यों होता है? संसार में सबसे बड़ा कोई है तो वह है आत्मा, आत्मशक्ति को जागने का मूल सूत्र है समयसार आध्यात्म ग्रंथ, जिसमें मात्र आत्म शक्तियों का जागरण बताया गया है। उन आत्मसशक्ति के जागरण के लिए हम शुरुआत कैसे करे। सारा तीन लोक झुक सकता है लेकिन, एक बार आत्मशक्ति यदि जाग गयी तो वह कभी पराजित नहीं हो सकती। आत्मशक्ति जागृत होने के बाद तीन लोक उलट पलट जाये लेकिन, सिद्ध भगवान का कुछ भी नहीं होने वाला नहीं।</p>
<p><strong>ब्रह्मांड हिल जाएगा शूली सिंहासन बन जाएगी</strong></p>
<p>निज शक्ति जागरण के लिए थोड़ी थोड़ी सी बातों पर टेंशन नहीं करना है, थोड़ी-थोड़ी बातों पर बुरा नहीं मानना है, अंदर चिंतन करना है- कोई बात नहीं। अपनी छोटी सी भी गलती होने पर सीधा बोलना है, नहीं बहुत बड़ी बात है, आई एम सॉरी प्लीज। अपने से की हुई छोटी गलती हमें एक दिन बहुत बड़ा अपराधी बना देगी, इसलिए जब कोई छोटी सी गलती होवे उसे ताड़ बना दो और पश्चाताप की अग्नि में डाल दो अपने को। आपके प्रति दूसरे ने जो अपराध किया है तब भाव लाना है- कोई बात नहीं। फांसी का फंदा लग चुका है, मात्र बटन चटकाने की देरी है और उस समय तुम्हारी आत्मा से निकल जाए कोई बात नही, बस उसी समय ब्रह्मांड हिल जाएगा और शूली सिंहासन बन जाएगी, जैसे सेठ सुदर्शन। दुष्ट, मूर्ख, विक्षिप्त और नारी के सामने कभी सफाई मत देना। विद्वान, जज, गार्जियन, सज्जनों के सामने कभी कुछ छुपाना मत।</p>
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		<title>8 दिवसीय भक्तामर विधान की आराधना की जा रही हैः फाल्गुन माह में अष्टानिका पर्व का विशेष महत्व </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/the_8day_long_bhaktamar_vidhan_is_being_worshipped_on_the_ashtanika_festival_of_the_month_of_falgun/</link>
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		<pubDate>Sat, 08 Mar 2025 12:35:48 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सनावद में श्री महावीर स्वामी जिन मंदिर में फाल्गुन माह की अष्टानिका पर्व पर महावीर जिनालय में प्रतिदिन प्रातः श्रीजी का अभिषेक सामूहिक पूजन एवं जैन परिवार के द्वारा 8 दिवसीय भक्तामर विधान का पूजन किया जा रहा है। फाल्गुन माह में अष्टानिका पर्व का विशेष महत्व होता है। इस अवसर पर भक्तामर विधान रचाया [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सनावद में श्री महावीर स्वामी जिन मंदिर में फाल्गुन माह की अष्टानिका पर्व पर महावीर जिनालय में प्रतिदिन प्रातः श्रीजी का अभिषेक सामूहिक पूजन एवं जैन परिवार के द्वारा 8 दिवसीय भक्तामर विधान का पूजन किया जा रहा है। फाल्गुन माह में अष्टानिका पर्व का विशेष महत्व होता है। इस अवसर पर भक्तामर विधान रचाया गया है। प्रतिदिन विधान पर बड़े भक्ति भाव से 6 अर्घ्य समर्पित किये जा रहे हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सनावद से सन्मति जैन काका की यह पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सनावद।</strong> धर्म नगरी सनावद में श्री महावीर स्वामी जिन मंदिर में फाल्गुन माह की अष्टानिका पर्व पर महावीर जिनालय में प्रतिदिन प्रातः श्रीजी का अभिषेक सामूहिक पूजन एवं डॉ. जगदीश जैन की स्मृति में जवरचंदजी जैन परिवार के द्वारा 8 दिवसीय भक्तामर विधान का पूजन किया जा रहा है। फाल्गुन माह में अष्टानिका पर्व का विशेष महत्व है। इस अवसर पर 7 मार्च से 14 मार्च तक भक्तामर विधान रचाया गया है। पंडित जतीशचंदजी एवं पंडित निलेश जैन ने बताया की प्रतिदिन विधान पर बड़े भक्ति भाव से 6 अर्घ्य समर्पित किये जा रहे हैं।</p>
<p><strong>विशेष प्रवचन हो रहे </strong></p>
<p>विवेक जैन कालू ने बताया की इस अवसर पर मैनपुरी (उ.प्र) से पधारे पंडित अंकुर शास्त्री एवं आदित्य पंचोलिया सनावद के नेतृत्व में बहुत ही भक्ति भाव से विधान पर हर एक टोक का विशेष वर्णन कर के अर्थ समझाया जा रहा है। रात्री में समयसार पर विशेष प्रवचन हो रहे है।</p>
<p><strong>समाजजन धर्म लाभ ले रहे </strong></p>
<p>इस अवसर पर डॉ. रविश जैन, संजय जैन, जनीशचंद जैन, दिनेशचंद, प्रकाशचंद जैन, जवाहरलाल जैन, शैली जैन, माया जैन, अनीता जैन, रितिका जैन, हंसा बहनजी, भावना पंचोलिया, चंदू बहनजी, नैना चौधरी, रीता जैन, सहित अनेक समाजजन इसका धर्म लाभ ले रहे हैं।</p>
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