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	<title>समता पूर्वक समाधि &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>मृत्यु महोत्सव का था अदभुत नजारा: हजारों श्रद्धालूओं ने दर्शन पाकर जीवन सवारा </title>
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		<pubDate>Mon, 12 Jan 2026 13:50:27 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री मुक्ति सागरजी महाराज की समता पूर्वक समाधि हुई। श्रद्धालुओं ने नम आंखों से उन्हें विदाई दी। यम सल्लेखना के 16वें दिन समाधि मरण पूर्ण हुआ।  पिड़ावा (झालावाड़)। जी हां मृत्यु महोत्सव का था। अदभुत नजारा हजारों श्रद्धालुओं में दर्शन पाकर जीवन सवारा। कुछ ऐसा ही अविस्मरणीय अपूर्व अनुपम नजारा था धर्म प्राण नगरी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनि श्री मुक्ति सागरजी महाराज की समता पूर्वक समाधि हुई। श्रद्धालुओं ने नम आंखों से उन्हें विदाई दी। यम सल्लेखना के 16वें दिन समाधि मरण पूर्ण हुआ। </strong></p>
<hr />
<p><strong>पिड़ावा (झालावाड़)।</strong> जी हां मृत्यु महोत्सव का था। अदभुत नजारा हजारों श्रद्धालुओं में दर्शन पाकर जीवन सवारा। कुछ ऐसा ही अविस्मरणीय अपूर्व अनुपम नजारा था धर्म प्राण नगरी पिडावा का। जैसे ही 26 दिसंबर को मुनिश्री मुक्ति सागरजी ने अपनी में आहार चर्या में जल लेकर यम सल्लेखना शुरू की। वैसे ही लोगों का दर्शनार्थ एवं आशीर्वाद लेने आना शुरू हो गया। श्री सांवलिया पार्श्वनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र बड़ा मंदिर में समाधिस्थ मुनि भूतबली सागर महाराज के शिष्य मुनिराज मुक्ति सागरजी महाराज की यम संलेखना मुनि श्री मुनि सागरजी महाराज के सानिध्य में धर्म ध्यान पूर्वक चल रही थी। यम सल्लेखना के 16वें दिन बाद रविवार को दोपहर में समाधि मरण हो गया है। इनकी अंतिम डोलयात्रा श्री सांवलिया पार्श्वनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र बड़ा मंदिर से निकाली गई। जिसमें नलखेड़ा, आगर, कानड़, ताकला, मोड़ी सुसनेर, सेमलखेड़ी, भवानीमंडी, झालावाड़, झालरापाटन, सुनेल, कड़ोदिया ड़ोला मंगिसपुर, रटलाई, कोटड़ी, खारपा आदि स्थानों से जैन समाज के श्रावक-श्राविकाएं और समाज जन बड़ी संख्या में आईं।</p>
<p><strong>2022 में बडे मंदिर में चातुर्मास किया था मुनिश्री ने </strong></p>
<p>76 वर्षीय मुनिश्री मुक्ति सागर महाराज ने पिड़ावा में गरु भूतबली सागर महाराज के संघ में 2022 में बडे मंदिर में चातुर्मास किया था। मुनिश्री मुक्ति सागर महाराज का पूर्व का नाम गंगाधर (गंगा अप्पा) कर्नाटक के बेलगांव जिला गाडिकोप्पा नाम के गांव में जन्म हुआ था। इनकी लौकिक शिक्षा तीसरी तक की थी। मुक्ति सागर महाराज को तीन भाषाओं कन्नड़, हिन्दी, मराठी का ज्ञान था। संसारिक जीवन की माता का नाम सावित्री, पिता का नाम बसंत अप्पा था। मुनिश्री मुक्ति सागर महाराज ने 2007 में निज निवास कर्नाटक के बेलगांव जिला के गाडिकोप्पा गांव में ऐलक दीक्षा ली। 2011में देवास में आचार्यश्री भूतबली सागर महाराज से मुनि दीक्षा ली। मुक्ति सागर महाराज शुरू से ही भूतबली सागर महाराज के संघ में रहे मुनिश्री मुक्ति सागरजी महाराज ने 7 वर्षों से सल्लेखना नियम का पालन कर रहे थे।</p>
<p><strong>आहार का पूर्ण त्याग </strong></p>
<p>मुनि श्री ने 23 और 24 दिसंबर को मात्र छाछ का आहार लिया था और 25 और 26 दिसंबर को जल का आहार लिया। उसके बाद इन्होंने यम सल्लेखना धारण करते हुए चारों प्रकार के आहार का त्याग कर दिया। यम सल्लेखना के 16वें दिन मुनिश्री मुक्ति सागर महाराज का दोपहर 3 बजे समता पूर्वक समाधि मरण हुआ।</p>
<p><strong>मंत्रोच्चार के साथ मुनि श्री का अंतिम संस्कार</strong></p>
<p>रविवार को उनके अंतिम संस्कार हेतु ड़ोल यात्रा शाम 4 बजे श्री सांवलिया पार्श्वनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र बड़ा मंदिर से प्रारंभ हुई, जो कि मोहल्ला पीपली चौक खांडुपुरा, नयापुरा होते हुए ब्रह्मानंद सागर नसिया सूरजकुंड पहुंची। डो़लयात्रा में नगर भ्रमण के दौरान बड़ी संख्या में नगरवासी और समाज के लोग सफेद वस्त्रों में बिना चप्पल जूतों के चल रहे थे। मुनि श्री के अंतिम दर्शन के लिए सड़कों तथा अपने अपने मकान की गैलरी और छत पर जमा थे। अंतिम संस्कार स्थल सुरजकुंड़ ब्रह्मानंद सागर नसिया क्षेत्र में विधि विधान एवं मंत्रोच्चार के साथ मुनि श्री का अंतिम संस्कार किया गया।</p>
<p><strong>26 दिसंबर से जारी थी यम सल्लेखना की साधना </strong></p>
<p>मुनि श्री मुक्ति सागर महाराज ने शारीरिक अक्षमता के चलते 26दिसंबर को अपने सभी दायित्वों को संत श्री मुनि सागर को निर्यापक मानकर चारों प्रकार के आहार का त्याग कर यम सल्लेखना शुरू कर दी थी। जिन्होंने 16वें दिन रविवार को 3 बजे उत्कृष्ट परिणामों के साथ सल्लेखना पूर्वक समाधि मरण प्राप्त किया।</p>
<p><strong>इन संतों का रहा सानिध्य </strong></p>
<p>मुनि श्री मुक्ति सागर महाराज की समता पूर्वक समाधि मरण में मुनि श्री विवर्धन सागर जी, मुनि श्री विश्वभद्र सागर जी, निर्यापक मुनि सागरजी, ऐलक श्री मंथन सागरजी महाराज, आर्यिका श्री चिन्मय मति माताजी, क्षुल्लिका चैतन्य मति माताजी ससंघ अनेक संतों का सानिध्य मिला। साथ में बाल ब्रह्मचारी धनसिंह भैया, ब्रह्मचारी सुरेश गुरु, पं.कल्याण जैन कोटा, बाल ब्रह्मचारी मंजुला दीदी आदि त्यागी वृतियों को सानिध्य रहा। और अंत में पं. मुकेश शास्त्री सुसनेर, पं.राजकुमार जैन ने पूजन विधि विधान से अंतिम संस्कार करवाया।</p>
<p><strong>प्रतिष्ठान बंद रख विनयांजलि देने पहुंचे नगरवासी </strong></p>
<p>नगर में मुनि के समाधि मरण की खबर जैसे ही मिली। समाज जनों में शोक की लहर छा गई और समाजजन अपने प्रतिष्ठान बंदकर समाधिस्थ संत के अंतिम दर्शन करने और डोल यात्रा के साथ ब्रह्मानंद सागर नसिया सूरजकुंड पहुंचे। जहां पर मुनि संघ और समाज जनों ने विनयांजलि अर्पित की।</p>
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