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	<title>सदाचार &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>पर्यावरण संरक्षण: प्रकृति और मानव का अटूट संबंध :  पर्यावरण हमारे अस्तित्व का आधार </title>
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		<pubDate>Thu, 04 Jun 2026 16:53:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[शुक्रवार को पूरे विश्व में पर्यावरण दिवस मनाया जाएगा। धरती की सुरक्षा के लिए पर्यावरण की रक्षा करना सभी देशवासियों का कर्तव्य है। जल, वायु के साथ-साथ मानव और प्रकृति को सुरक्षित करना सबका दायित्व है। यह विशेष दिन 5 जून को अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस के रूप में विख्यात है। इस पर आज पढ़िए ब्रह्मचारी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>शुक्रवार को पूरे विश्व में पर्यावरण दिवस मनाया जाएगा। धरती की सुरक्षा के लिए पर्यावरण की रक्षा करना सभी देशवासियों का कर्तव्य है। जल, वायु के साथ-साथ मानव और प्रकृति को सुरक्षित करना सबका दायित्व है। यह विशेष दिन 5 जून को अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस के रूप में विख्यात है। <span style="color: #ff0000">इस पर आज पढ़िए ब्रह्मचारी बहन डॉ. सविता जैन का यह विशेष आलेख </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रतलाम।</strong> शुक्रवार को पूरे विश्व में पर्यावरण दिवस मनाया जाएगा। धरती की सुरक्षा के लिए पर्यावरण की रक्षा करना सभी देशवासियों का कर्तव्य है। जल, वायु के साथ-साथ मानव और प्रकृति को सुरक्षित करना सबका दायित्व है। यह विशेष दिन 5 जून को अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस के रूप में विख्यात है।</p>
<p><strong>1. पर्यावरण का अर्थ और इसकी परिभाषा</strong></p>
<p>&#8216;पर्यावरण&#8217; शब्द दो शब्दों के मेल से बना है — &#8216;परि&#8217; + &#8216;आवरण&#8217;। यहाँ &#8216;परि&#8217; का अर्थ है &#8216;हमारे चारों ओर या चारों तरफ&#8217; और &#8216;आवरण&#8217; का अर्थ है &#8216;घिरा हुआ या ढका हुआ&#8217;। सरल शब्दों में कहें तो, हमारे चारों तरफ का वह घेरा जो हमें और इस पृथ्वी पर मौजूद हर जीव को घेरे हुए है, वही पर्यावरण है। यह न केवल हमारे जीवन को प्रभावित करता है, बल्कि हमारे अस्तित्व का आधार भी है।</p>
<p><strong>2. पर्यावरण के मुख्य प्रकार (भेद)</strong></p>
<p>व्यापक रूप से पर्यावरण को दो मुख्य भागों में विभाजित किया जा सकता है:</p>
<p>प्राकृतिक पर्यावरण: इसके अंतर्गत वह सब कुछ आता है जो प्रकृति ने हमें उपहार स्वरूप दिया है। इसमें जीवन के पांच मुख्य आधार (पंचभूत तत्व) शामिल हैं— पृथ्वी (भूमि), अग्नि (ऊर्जा), वायु, जल और वनस्पति। इनके बिना इस धरती पर जीवन की कल्पना भी असंभव है।</p>
<p>मानव निर्मित या सामाजिक पर्यावरण: इसके अंतर्गत मनुष्य का स्वभाव, उसकी आदतें, सामाजिक नियम, संस्कृति और जीवन जीने की शैली आती है। मानवीय जीवन के नैतिक मूल्य, अहिंसा, सदाचार, सात्विकता और परोपकार जैसी भावनाएं मिलकर हमारे सामाजिक पर्यावरण का निर्माण करती हैं।</p>
<p><strong>3. भारतीय संस्कृति और प्रकृति का पूजनीय संबंध</strong></p>
<p>हमारी भारतीय संस्कृति में प्रकृति को हमेशा सर्वोच्च स्थान दिया गया है। हमारे पूर्वज जानते थे कि प्रकृति प्रदत्त उपहारों का सम्मान करना कितना जरूरी है। यही कारण है कि:</p>
<p>प्रकृति का संतुलन न बिगड़े और संसाधनों का नुकसान (अपकार) न हो, इसलिए जल स्रोतों (नदियों, कुओं), वृक्षों, अग्नि और वायु को देवताओं का रूप मानकर उनकी पूजा की जाती है।</p>
<p>इस परंपरा के पीछे मुख्य उद्देश्य यह था कि मनुष्य इन प्राकृतिक संसाधनों का दोहन केवल अपनी आवश्यकतानुसार करे, न कि अपने लालच के लिए।</p>
<p>इस भूमंडल पर उपस्थित सभी जैविक (सजीव) और अजैविक (निर्जीव) तत्व एक-दूसरे से पूरी तरह जुड़े हुए हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं।</p>
<p><strong>4. आधुनिक युग की चुनौतियाँ </strong></p>
<p>आज &#8216;आधुनिकता&#8217; और &#8216;विकास&#8217; की आँधी दौड़ में मनुष्य ने प्रकृति के नियमों को ताक पर रख दिया है। जिसके कारण हमें कई गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है:</p>
<p>अंधाधुंध दोहन: कारखानों, शहरीकरण और विलासिता के लिए जंगलों को काटा जा रहा है और भूजल का स्तर लगातार गिर रहा है।</p>
<p>प्रदूषण का संकट: हवा में ज़हर घुल चुका है, नदियाँ प्रदूषित हो चुकी हैं और प्लास्टिक के कचरे ने पूरी धरती को पाट दिया है।</p>
<p>ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक ताप): जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का चक्र बिगड़ गया है। कहीं सूखा तो कहीं बिन मौसम भारी बाढ़ आ रही है।</p>
<p>प्रकृति के अत्यधिक दोहन के कारण न केवल इंसान, बल्कि पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीव-जंतु एक ऐसे प्रदुषित वातावरण में जीने को विवश हैं, जहाँ एक स्वस्थ जीवन की कल्पना करना भी नामुमकिन होता जा रहा है।</p>
<p><strong>5. हमारा कर्तव्य और समाधान </strong></p>
<p>पर्यावरण दिवस केवल एक दिन मनाने या भाषण देने का विषय नहीं है, बल्कि इसे अपने दैनिक जीवन में उतारने की आवश्यकता है। हम छोटे-छोटे प्रयासों से बड़ा बदलाव ला सकते हैं:</p>
<p>&#8216;एक व्यक्ति, एक पेड़&#8217; का संकल्प: अपने जीवन के विशेष अवसरों (जैसे जन्मदिन) पर कम से कम एक पौधा अवश्य लगाएं और उसकी देखभाल करें।</p>
<p>जल की हर बूंद की कीमत समझें: वर्षा के जल का संचयन (Rainwater Harvesting) करें और घर में पानी की बर्बादी रोकें।</p>
<p>प्लास्टिक को कहें &#8216;ना&#8217;: सिंगल-यूज़ प्लास्टिक का उपयोग पूरी तरह बंद करें और कपड़े या जूट के थैलों का इस्तेमाल करें।</p>
<p>संसाधनों का पुनर्चक्रण (Recycle): कचरे का सही प्रबंधन करें— गीला कचरा और सूखा कचरा अलग रखें ताकि उनका सही से निस्तारण हो सके।</p>
<p><strong>निष्कर्ष</strong></p>
<p>पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, तभी हमारा और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रहेगा। प्रकृति हमें सब कुछ उपहार में दिया है लेकिन यदि हमने प्रकृति के विनाश को नहीं रोका, तो इसके परिणाम बेहद विनाशकारी हो सकते हैं। आइए, आज हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम प्रकृति का शोषण नहीं, बल्कि उसका पोषण करेंगे।</p>
<p>&#8220;पर्यावरण संरक्षण ही जीवन का आधार है।&#8221;</p>
<p>&#8211; ब्रह्मचारी डॉ. सविता जैन अधिष्ठात्री</p>
<p>श्री दिगम्बर जैनधर्मस्थल शीतल तीर्थ रतलाम</p>
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		<title>सलेहा में हुआ जैनत्व संस्कार समारोह : जैन संस्कार समारोह में अहिंसा, सत्य और सदाचार का महत्व बताया </title>
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		<pubDate>Thu, 05 Mar 2026 11:09:16 +0000</pubDate>
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<p><strong>मुनि श्री सर्वार्थ सागर जी महाराज ने कहा की नगर में आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी के करकमलों से 8 वर्ष के छोटे-छोटे बच्चों का जैनत्व संस्कार कराया गया। इस पावन अवसर पर बच्चों को जैन धर्म के मूल सिद्धांत, अहिंसा, सत्य और सदाचार का महत्व बताया गया। <span style="color: #ff0000">अभिषेक अशोक पाटिल की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सलेहा।</strong> मुनि श्री सर्वार्थ सागर जी महाराज जी ने कहा की नगर में आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी के करकमलों से 8 वर्ष के छोटे-छोटे बच्चों का जैनत्व संस्कार कराया गया। इस पावन अवसर पर बच्चों को जैन धर्म के मूल सिद्धांत, अहिंसा, सत्य और सदाचार का महत्व बताया गया। गुरुदेव ने बच्चों को संस्कारित जीवन जीने की प्रेरणा देते हुए कहा कि बचपन से ही धर्म और संस्कारों का बीज बोया जाए तो वही आगे चलकर श्रेष्ठ व्यक्तित्व का निर्माण करता है। संस्कार के दौरान बच्चों ने धर्म के प्रति श्रद्धा और समर्पण का भाव प्रकट किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में जैन समाज के लोग उपस्थित रहे और सभी ने इस पावन संस्कार को देखकर हर्ष व्यक्त किया। पूरे वातावरण में धर्म, भक्ति और उत्साह का अद्भुत दृश्य देखने को मिला।</p>
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		<title>स्वाध्याय मुक्ति के द्वार तक पहुंचाने में सहायक : मुनिराज श्रावकों को करा रहे हैं स्वाध्याय </title>
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		<pubDate>Mon, 14 Jul 2025 04:36:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री विलोकसागर महाराजजी ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा में स्वाध्याय के बारे में बता रहे हैं। नित्य सुबह ग्रंथों के माध्यम से महत्व समझा रहे हैं। रविवार को भी मुनि श्री ने श्रावकों को प्रबोधन दिया। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन की यह खबर&#8230; मुरैना। भौतिकवादी आधुनिक युग में श्रावक स्वाध्याय से दूर होते [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री विलोकसागर महाराजजी ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा में स्वाध्याय के बारे में बता रहे हैं। नित्य सुबह ग्रंथों के माध्यम से महत्व समझा रहे हैं। रविवार को भी मुनि श्री ने श्रावकों को प्रबोधन दिया। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> भौतिकवादी आधुनिक युग में श्रावक स्वाध्याय से दूर होते जा रहे हैं जबकि, स्वाध्याय श्रावक के लिए परम आवश्यक है। स्वाध्याय जीवन के विकास की एक अनिवार्य आवश्यकता होते हुए संयम की साधना में सहायक होता है। यह उद्गार मुनिश्री विलोकसागर महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि स्वाध्याय से मिलने वाला ज्ञान सुरक्षित रहता है तथा श्रावक के ज्ञानकोष में निरंतर वृद्धि होती रहती है। मानव जीवन में सुख की वृद्धि स्वाध्याय से ही होती है। अतः कहा जा सकता है कि स्वाध्याय एक ऐसी साधना है, जो साधक को मुक्ति के द्वार तक पहुंचा देता है।</p>
<p><strong>कर्मों के बंधन से मुक्त होने में मदद करता है</strong></p>
<p>मुनिश्री ने कहा कि स्वाध्याय आत्म-शुद्धि का एक महत्वपूर्ण साधन है। यह व्यक्ति को अपने कुविचारों और दुर्गुणों को दूर करने में मदद करता है, जिससे वह शुद्ध और पवित्र बनता है। जैन धर्म में स्वाध्याय को मोक्ष प्राप्त करने के मार्ग में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। यह श्रावक को कर्मों के बंधन से मुक्त होने में मदद करता है। स्वाध्याय व्यक्ति को मिथ्या विचारों और दुराग्रहों से छुटकारा पाने में मदद करता है। मुनिश्री ने कहा कि जैन धर्म में स्वाध्याय करना श्रावकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण बताया गया है क्योंकि, यह ज्ञान, सम्यक् ज्ञान, सदाचार और आत्म-शुद्धि की प्राप्ति का एक महत्वपूर्ण साधन है। स्वाध्याय के माध्यम से व्यक्ति अपने कुविचारों को दूर कर सकता है। सही और गलत का ज्ञान प्राप्त कर सकता है और जीवन को बेहतर ढंग से जीने की प्रेरणा पा सकता है।</p>
<p><strong>स्वाध्याय व्यक्ति को सदाचारी बनाता है</strong></p>
<p>स्वाध्याय ज्ञान का भंडार है और इसके माध्यम से व्यक्ति नए-नए ज्ञान प्राप्त कर सकता है। यह ज्ञान, चाहे वह सांसारिक हो या आध्यात्मिक जीवन को बेहतर बनाने में मदद करता है। स्वाध्याय सही और गलत का भेद करने में मदद करता है। यह व्यक्ति को सही मार्ग पर चलने और गलत आदतों से दूर रहने के लिए प्रेरित करता है। स्वाध्याय व्यक्ति को सदाचारी बनाता है। यह उसे अच्छे कर्म करने और बुरे कर्मों से बचने के लिए प्रेरित करता है। स्वाध्याय व्यक्ति को जीवन जीने की कला सिखाता है, जिससे वह जीवन को बेहतर ढंग से जी सकता है ।</p>
<p><strong>आत्मा को निर्मल रखने के लिए</strong></p>
<p>स्वाध्याय व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास में मदद करता है। यह उसे आत्म-साक्षात्कार और आत्म-ज्ञान की ओर ले जाता है। स्वाध्याय जैन धर्म का एक अनिवार्य हिस्सा है, जो ज्ञान, सदाचार, आत्म-शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति में मदद करता है। इसलिए श्रावकों को ज्ञान प्राप्ति के लिए, आत्मा को निर्मल रखने के लिए, संयम की साधना के लिए, यहां तक कि मोक्ष प्राप्ति के लिए सदैव पूर्वाचार्यों द्वारा रचित ग्रंथों का अपनी योग्यता के अनुसार सदैव स्वाध्याय करते रहना चाहिए।</p>
<p><strong>इस तरह हो रहा है स्वाध्याय</strong></p>
<p>मुनिश्री विलोक सागर महाराज प्रतिदिन प्रातः 8 से 9 बजे तक समयसार ग्रन्थ, 9 से 9.45 बजे तक रयणसार ग्रन्थ की कथाओं के माध्यम से श्रावकों को स्वाध्याय करा रहे हैं। शाम के समय मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज विशेष कक्षाएं लेकर बच्चों को छहढाला एवं भक्तामर का अध्ययन करा रहे हैं। मुनिराज ने बहुत से नन्हे मुन्ने बच्चों को संस्कृत भक्तामर के अनेकों श्लोकों को कंठस्थ करा दिया है।</p>
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