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	<title>संल्लेखना समाधि &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>श्रुत को वर्धमान कर शीतल करने का स्वर्णिम सफर : जल के अतिरिक्त शेष सभी आहार सामग्री का त्याग </title>
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		<pubDate>Thu, 22 Jan 2026 12:33:26 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री शांतिसागर जी महामुनिराज की अक्षुण्ण मूल बालब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के प्रथम पट्टाधीश आचार्य श्री वीर सागर जी के अंतिम मुनि शिष्य आचार्यकल्प श्री श्रुत सागरजी से माध सुदी पंचमी वर्ष 1972 में दीक्षित 83 वर्षीय आर्यिका श्री शीतलमति ने आचार्य श्री वर्धमान सागर के समक्ष जल के अतिरिक्त सभी पदार्थों का त्याग निवाई [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री शांतिसागर जी महामुनिराज की अक्षुण्ण मूल बालब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के प्रथम पट्टाधीश आचार्य श्री वीर सागर जी के अंतिम मुनि शिष्य आचार्यकल्प श्री श्रुत सागरजी से माध सुदी पंचमी वर्ष 1972 में दीक्षित 83 वर्षीय आर्यिका श्री शीतलमति ने आचार्य श्री वर्धमान सागर के समक्ष जल के अतिरिक्त सभी पदार्थों का त्याग निवाई में 19 जनवरी को किया। आर्यिका श्री शीतल मति माताजी ने आचार्य श्री एवं संघ के सभी साधुओं से क्षमायाचना की। <span style="color: #ff0000">निवाई से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>निवाई</strong>। 83 वर्षीय आर्यिका श्री शीतलमति जी के माघ सुदी 5 पंचमी सन 1972 अनुसार 54 वें दीक्षा वर्ष दिवस पर कोटिश वंदामि। आचार्य श्री शांतिसागर जी महामुनिराज की अक्षुण्ण मूल बालब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के प्रथम पट्टाधीश आचार्य श्री वीर सागर जी के अंतिम मुनि शिष्य आचार्यकल्प श्री श्रुत सागरजी से माध सुदी पंचमी वर्ष 1972 में दीक्षित 83 वर्षीय आर्यिका श्री शीतलमति ने आचार्य श्री वर्धमान सागर के समक्ष जल के अतिरिक्त सभी पदार्थों का त्याग निवाई में 19 जनवरी को किया। आर्यिका श्री शीतल मति माताजी ने आचार्य श्री एवं संघ के सभी साधुओं से क्षमायाचना की। इस अवसर पर आर्यिका श्री शीतल मति जी ने संक्षिप्त उद्बोधन में सभी पूर्वाचार्यों को ,दीक्षागुरु आचार्य कल्प श्री श्रुतसागर जी को स्मरण आचार्य भक्ति पूर्वक कहा कि मैं आचार्य शिवसागर जी के समय से संघ में हूं। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संल्लेखना भावना रूपी नैया पार करा दो। गुरु संघ सानिध्य में सभी प्रकार के परिग्रह का त्याग कर धार्मिक भक्ति संग्रह गुटका रखूंगी। अगले आहार में मात्र जल ही लूंगी। संघ में 60 वर्ष हो गए हैं। किसी के प्रति राग द्वेष कषाय मोह उत्पन्न हुआ हो, कोई गलती हुई हो तो आचार्य श्री एवं समस्त साधुओं सहित सबसे क्षमा याचना करती हूं। आचार्य पद पर आचार्य श्री को 36 साल हो गए हैं। गुरुवर के सानिध्य में मेरी समाधि हो, आत्मा की उन्नति हो, आचार्य श्री मुझे क्षमा करें।</p>
<p><strong>गुरु की शरण में मृत्यु पर विजय का मार्ग प्राप्त होता है</strong></p>
<p>इस अवसर पर आचार्य श्री वर्धमानसागर जी ने श्री शीतलमति जी को संबोधित कर बताया कि श्रीमद् जैन धर्म में जन्म के बाद मृत्यु को कैसे विजय प्राप्त कर वरण किया जाता है, इसका वर्णन है। गुरु की शरण में मृत्यु पर विजय का मार्ग प्राप्त होता है। भव्य जीव दीक्षा लेकर आत्मा को परम पावन करता है। उपसर्ग, रोग के कारण शरीर के प्रति ममत्व हटाकर अनेक आत्म साधकों ने आत्मा को सिद्ध करने का प्रयास किया है। श्री शीतलमति जी भी संल्लेखना समाधि की आत्मसाधना कर रही है। उनके दीक्षा गुरु श्री श्रुतसागर जी ने भी आत्म साधना धैर्य पूर्वक की थी। माता जी के समक्ष भी अनेक साधकों ने जीवन को सार्थक करने का पुरुषार्थ किया है। आज के बाद माताजी केवल आहार में जल लेगी। अन्य सभी पदार्थों का उन्होंने त्याग कर दिया है। आत्म साधकों की भावना उत्कृष्ट होती है। अंतरंग और बहिरंग तप में साधक ममत्व, मोह और कषाय को हटाता है। संघ परंपरा में आचार्य धर्मसागर जी सहित अनेक साधकों ने क्रमशः त्याग किया है। माताजी ने सभी साधकों को निकट से देखा है। माता जी की साधना शांतिपूर्वक सफल हो ऐसी मंगल भावना करते हैं।</p>
<p><strong>माताजी का सामान्य परिचय</strong></p>
<p>गामड़ी जिला डुंगरपुर में झकुदेवी श्रेष्ठी न्यालचंद जी धाटलिया की पुत्री गेंदी देवी का जन्म सन 1943 में हुआ। आपका विवाह गोवर्धनलाल पचौरी से हुआ। आप द्वितीय पट्टाचार्य आचार्य श्री अजित सागर जी के समय से संघ में आर्यिका श्री ज्ञानमती जी की प्रेरणा से शामिल हुईं। आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत और 2 प्रतिमा के नियम आचार्य श्री शिव सागर जी से ग्रहण किए। आपने दीक्षा गुरु आचार्य कल्प श्री श्रुतसागर जी से 1971 में क्षुल्लिका और सन 1972 में आर्यिका दीक्षा लेकर आर्यिका श्री शीतल मति हुई। आपके शिक्षा गुरु आचार्य श्री अजित सागर जी हैं। आप आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघस्थ हैं, विगत वर्षों से क्रमश आहार की सामग्री में त्याग कर 19 जनवरी 2026 से दो उपवास के बाद मात्र जल ले रही हैं। आप संल्लेखना समाधि की ओर दृढ़ता से अग्रसर हैं।</p>
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		<title>अजमेर के ब्र. राजेंद्र दनगसिया की संल्लेखना समाधि जारी:  संल्लेखना का सातवां दिन, अन्न जल का त्याग </title>
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		<pubDate>Thu, 29 May 2025 08:48:25 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन साधक क्षपक चितानंद जी (ब्र. राजेंद्र जैन दनगसिया) अजमेर की संल्लेखना आचार्य श्री समयसागर महाराज के ससंघ सान्निध्य एवं कुशल निर्देशन में जारी है। उनकी संल्लेखना समाधि का सातवां दिन है। क्षपक चितानंद जी पूर्ण चेतना अवस्था में संल्लेखना की साधना कर रहे हैं। अजमेर से मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; अजमेर। जैन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन साधक क्षपक चितानंद जी (ब्र. राजेंद्र जैन दनगसिया) अजमेर की संल्लेखना आचार्य श्री समयसागर महाराज के ससंघ सान्निध्य एवं कुशल निर्देशन में जारी है। उनकी संल्लेखना समाधि का सातवां दिन है। क्षपक चितानंद जी पूर्ण चेतना अवस्था में संल्लेखना की साधना कर रहे हैं। <span style="color: #ff0000">अजमेर से मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अजमेर।</strong> जैन साधक क्षपक चितानंद जी (ब्र. राजेंद्र जैन दनगसिया) अजमेर की संल्लेखना आचार्य श्री समयसागर महाराज के ससंघ सान्निध्य एवं कुशल निर्देशन में जारी है। उनकी संल्लेखना समाधि का सातवां दिन है। क्षपक चितानंद जी पूर्ण चेतना अवस्था में संल्लेखना की साधना कर रहे हैं। आचार्य श्री समयसागरजी महाराज, मुनिश्री संभव सागरजी महाराज एवं समस्त मुनिसंघ का निरंतर संबोधन चल रहा है। ब्रह्मचारीजी पूर्ण चेतना से मजबूती के साथ मोक्षमार्ग पर आरूढ़ हैं। ब्र. चिदानंदजी (पूर्व नाम ब्र. राजेंद्र कुमार दनगसिया) ने 1987 में ब्रह्मचर्य व्रत लिया था। आपने आचार्य श्री विद्यासागर महाराज से 1999 में 7 प्रतिमा का व्रत और 2013 में 10 प्रतिमा का व्रत लिया था। 2011 से शाम के जल का त्याग एवं शक्कर का आजीवन त्याग कर दिया एवं 2013 से नमक का भी त्याग किया था।</p>
<p>साधक ब्रह्मचारी राजेंद्र जैन ने अपने जीवन के अंतिम समय में संयम मार्ग को स्वीकार करते हुए संल्लेखना व्रत ग्रहण किया है। आचार्यश्री 108 विद्यासागर महाराज के परम आराधक राजेंद्र जैन दनगसिया ने 45 वर्ष की अल्पायु में गुरुदेव से ब्रह्मचर्य व्रत लेकर संयम के साथ अपना जीवन निर्वहन कर रहे हैं। श्री जैन अपने गुरु आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज को भगवन स्वरूप मानते थे। परिवार के साथ रहकर भी वे अगाध श्रद्धा के फलस्वरूप जैन दर्शन और जैन सिद्धांतों का पूर्णतः पालन करते हुए संयम की साधना में लीन रहे। दिगम्बर जैसवाल जैन उपरोचिया परिवार अजमेर के श्रावक श्रेष्ठी ब्रह्मचारी राजेंद्र जैन ने अपना अंतिम समय निकट समझते हुए जबलपुर में विराजमान आचार्यश्री समयसागर जी महाराज को श्रीफल भेंटकर संल्लेखना हेतु निवेदन किया। गुरुदेव ने राजेंद्र जैन की भावना को देखते हुए उन्हें आजीवन गृह त्याग कराकर दस प्रतिमाओं के व्रत देकर क्षपक चिंतानंद जी नामकरण किया।</p>
<p>गुरुदेव के निर्देशानुसार क्षपक चिंतानंद (राजेंद्र दनगसिया) ने सभी प्रकार के आहार का त्याग कर दिया है। संयम की साधना में लीन श्री राजेंद्र जी जैन का पूरा परिवार, उनके पुत्र अजय जैन दनगसिया, विजय जैन, पुत्रबधु साधना जैन एवं सविता जैन निरंतर यहां ब्रम्हचारी चिदानंदजी (पूर्व नाम ब्र. राजेन्द्र कुमारजी दनगसिया) अजमेर की पूर्णभाव से वैयावृति में लीन हैं। सभी की मंगल भावना है कि ब्रह्मचारी राजेंद्र जैन दनगसिया को उनकी भावना के अनुरूप लक्ष्य की प्राप्ति हो।</p>
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		<title>ब्रह्मचारी राजेंद्र जैन दनगसिया संल्लेखना समाधि की ओर: जल छोड़कर सभी आहार का त्याग </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 28 May 2025 08:31:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन साधक राजेंद्र जैन दनगसिया अजमेर की संल्लेखना आचार्य श्री समयसागर महाराज के ससंघ सान्निध्य एवं निर्देशन में चल रही है। साधक ब्रह्मचारी राजेंद्र जैन ने अपने जीवन के अंतिम समय में संयम के मार्ग को स्वीकार करते हुए संल्लेखना व्रत ग्रहण किया है। आचार्यश्री समयसागर जी महाराज को श्रीफल भेंटकर संल्लेखना हेतु निवेदन किया। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन साधक राजेंद्र जैन दनगसिया अजमेर की संल्लेखना आचार्य श्री समयसागर महाराज के ससंघ सान्निध्य एवं निर्देशन में चल रही है। साधक ब्रह्मचारी राजेंद्र जैन ने अपने जीवन के अंतिम समय में संयम के मार्ग को स्वीकार करते हुए संल्लेखना व्रत ग्रहण किया है। आचार्यश्री समयसागर जी महाराज को श्रीफल भेंटकर संल्लेखना हेतु निवेदन किया। गुरुदेव ने राजेंद्र जैन की भावना को देखते हुए उन्हें आजीवन गृह त्याग कराकर दस प्रतिमाओं के व्रत देकर क्षपक चिंतानंद जी नामकरण किया। <span style="color: #ff0000">अजमेर से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अजमेर।</strong> जैन साधक राजेंद्र जैन दनगसिया अजमेर की संल्लेखना आचार्य श्री समयसागर महाराज के ससंघ सान्निध्य एवं निर्देशन में चल रही है। साधक ब्रह्मचारी राजेंद्र जैन ने अपने जीवन के अंतिम समय में संयम के मार्ग को स्वीकार करते हुए संल्लेखना व्रत ग्रहण किया है। आचार्यश्री 108 विद्यासागर महाराज के परम आराधक राजेंद्र जैन दनगसिया ने काफी समय पूर्व गुरुदेव से ब्रह्मचर्य व्रत लिया था और संयम के साथ अपना जीवन निर्वहन कर रहे थे।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-81785" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250528-WA0009-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1291" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250528-WA0009-scaled.jpg 2560w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250528-WA0009-300x151.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250528-WA0009-1024x517.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250528-WA0009-768x387.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250528-WA0009-1536x775.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250528-WA0009-2048x1033.jpg 2048w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250528-WA0009-990x499.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250528-WA0009-1320x666.jpg 1320w" sizes="(max-width: 2560px) 100vw, 2560px" />जैन अपने गुरु आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज को भगवन स्वरूप मानते थे। परिवार के साथ रहकर भी वे अगाध श्रद्धा के फलस्वरूप जैन दर्शन और जैन सिद्धांतों का पूर्णतः पालन करते हुए संयम की साधना में लीन रहे। दिगम्बर जैसवाल जैन उपरोचिया परिवार अजमेर के श्रावक श्रेष्ठी ब्रह्मचारी राजेंद्र जैन ने अपना अंतिम समय निकट समझते हुए जबलपुर में विराजमान आचार्यश्री समयसागर जी महाराज को श्रीफल भेंटकर संल्लेखना हेतु निवेदन किया।</p>
<p>गुरुदेव ने राजेंद्र जैन की भावना को देखते हुए उन्हें आजीवन गृह त्याग कराकर दस प्रतिमाओं के व्रत देकर क्षपक चिंतानंद जी नामकरण किया। क्षपक चिंतानंद जी की संल्लेखना की साधना आचार्यश्री समय सागर महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य एवं निर्देशन में चल रही है।</p>
<p>क्षपक चिंतानंद (राजेंद्र दनगसिया) ने जल को छोड़कर सभी प्रकार के आहार का त्याग कर दिया है। आज उनके उपवास का तीसरा दिन है। संयम की साधना में लीन राजेंद्र जी जैन का पूरा परिवार अजय जैन, विजय जैन दनगसिया आदि उनकी वैयावृती में भावभक्ति के साथ सहभागिता प्रदान कर रहे हैं। सभी की मंगल भावना है कि ब्रह्मचारी राजेंद्र जैन दनगसिया को उनकी भावना के अनुरूप लक्ष्य की प्राप्ति हो।</p>
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		<title>अतिशय क्षेत्र श्रेयांसगिरि में हुई संल्लेखना :  आर्यिका विमोहिताश्री माताजी की हुआ समाधिमरण </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 17 Jul 2023 11:16:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सलेहा के समीपवर्ती बुंदेलखंड के सुविख्यात प्राचीन दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र श्रेयांसगिरि में परम पूज्य भारत गौरव, राष्ट्रसंत, गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महामुनिराज ससंघ (30 साधु) के पावन सानिध्य में आर्यिका विमोहिताश्री माताजी की संल्लेखना समाधि हुई। पढ़िये राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट&#8230; श्रेयांसगिरि (पन्ना)। सलेहा के समीपवर्ती बुंदेलखंड के सुविख्यात प्राचीन दिगंबर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सलेहा के समीपवर्ती बुंदेलखंड के सुविख्यात प्राचीन दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र श्रेयांसगिरि में परम पूज्य भारत गौरव, राष्ट्रसंत, गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महामुनिराज ससंघ (30 साधु) के पावन सानिध्य में आर्यिका विमोहिताश्री माताजी की संल्लेखना समाधि हुई। <span style="color: #ff0000;">पढ़िये राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>श्रेयांसगिरि (पन्ना)।</strong> सलेहा के समीपवर्ती बुंदेलखंड के सुविख्यात प्राचीन दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र श्रेयांसगिरि में परम पूज्य भारत गौरव, राष्ट्रसंत, गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महामुनिराज ससंघ (30 साधु) के पावन सानिध्य में आर्यिका विमोहिताश्री माताजी की संल्लेखना समाधि हुई। ज्ञातव्य है कि सागर निवासी ब्रह्मचारिणी क्रांति जैन का स्वास्थ्य विगत ढाई महिने से खराब चल रहा था।</p>
<p><strong>अर्पित किया था श्रीफल</strong></p>
<p>भरत सेठ ने बताया कि बीते 9 जुलाई को ब्र. क्रांति जैन ने अपने परिवार के साथ संल्लेखना समाधि हेतु पूज्य गणाचार्यश्री से निवेदन कर श्रीफल अर्पित किया था। पूज्य गणाचार्यश्री ने स्थिति गंभीर देखते हुए ब्र. क्रांति जी को 10 जुलाई को क्षुल्लिका दीक्षा देकर विमोहिताश्री माताजी का नामकरण किया था। 14 जुलाई को समस्त समाज के मध्य उनकी आर्यिका दीक्षा संपन्न हुई थी। पूज्य गणाचार्यश्री अपने संघ के साथ माताजी की सेवा संबोधन, वैयावृत्ति मे संलग्न थे। साथ ही श्रेयांसगिरि अंचल का जैन समाज माताजी को पाठ आदि सुनाने में तत्पर था।</p>
<p><strong>माताजी की अद्भुत त्याग तपस्या</strong></p>
<p>पारिवारिक जनों ने बताया कि माताजी ने अपना पूरा जीवन संयम साधना में बिताया। उन्होंने लगभग 4000 एकासन उपवास अपने किए तथा भगवान की भक्ति में सतत तत्पर रहकर लगभग 20 हजार श्रीफल द्वारा प्रभु की महाअर्चना कर चुकी हैं।</p>
<p><strong>गुरु के लिए समर्पित संपूर्ण जीवन</strong></p>
<p>माताजी ने गृहस्थ में रहकर 21 वर्ष पूर्व पूज्य गणाचार्यश्री से सागर में 2 प्रतिमा के व्रत ग्रहण किए तथा 2 माह पूर्व बड़ा मलहरा में सात प्रतिमा के व्रत ग्रहण कर पूज्य गुरुवर के चरणों में समाधि करने की भावना व्यक्त की, तदनुसार श्रेयांसगिरि मे आकर आपने गुरु चरणों में घर का त्याग कर आचार्य संघ में प्रवेश लिया। 10 जुलाई को दीक्षा लेकर माताजी ने केवल 3 दिन आहार ग्रहण किया, जिसमें मात्र जल, दूध ही आहार में लिया लेकिन ऐसी अवस्था में भी इतनी सहजता देख स्वयं पूज्य गणाचार्यश्री ने कहा था कि विमोहिता श्री माताजी समता की प्रतिमूर्ति हैं।</p>
<p><strong>अन्न जल का आजीवन किया त्याग</strong></p>
<p>14 जुलाई को माताजी ने स्वेच्छा से गुरुचरण सानिध्य में अन्न जल का त्याग किया, तब से वह प्रभु भक्ति एवं आत्म ध्यान में तल्लीन होकर समाधि साधना में रत थी। समाधि होने की सूचना मिलते ही दूर-दूर से बड़ी संख्या में दर्शनार्थियों का आवागमन जारी है।</p>
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		<title>माताजी की सेवा संबोधन, वैयावृत्ति मे संलग्न है समाज : समता की प्रतिमूर्ति हैं संल्लेखनारत आर्यिका विमोहिताश्री माताजी </title>
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		<pubDate>Sat, 15 Jul 2023 17:21:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सलेहा के समीपवर्ती बुंदेलखंड के सुविख्यात प्राचीन दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र श्रेयांसगिरि में विगत 7 दिनों से परम पूज्य भारत गौरव, राष्ट्रसंत, गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महामुनिराज ससंघ (30 साधु) के पावन सानिध्य में आर्यिका विमोहिताश्री माताजी की संल्लेखना समाधि चल रही है। पढ़िये राजेश जैन रागी/रत्नेश जैन की रिपोर्ट&#8230;  श्रेयांसगिरि (पन्ना)। सलेहा [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सलेहा के समीपवर्ती बुंदेलखंड के सुविख्यात प्राचीन दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र श्रेयांसगिरि में विगत 7 दिनों से परम पूज्य भारत गौरव, राष्ट्रसंत, गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महामुनिराज ससंघ (30 साधु) के पावन सानिध्य में आर्यिका विमोहिताश्री माताजी की संल्लेखना समाधि चल रही है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िये राजेश जैन रागी/रत्नेश जैन की रिपोर्ट&#8230; </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>श्रेयांसगिरि (पन्ना)।</strong> सलेहा के समीपवर्ती बुंदेलखंड के सुविख्यात प्राचीन दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र श्रेयांसगिरि में विगत 7 दिनों से परम पूज्य भारत गौरव, राष्ट्रसंत, गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महामुनिराज ससंघ (30 साधु) के पावन सानिध्य में आर्यिका विमोहिताश्री माताजी की संल्लेखना समाधि चल रही है। ज्ञातव्य है कि सागर निवासी ब्रह्मचारिणी क्रांति जैन का स्वास्थ्य विगत ढाई महिने से खराब चल रहा है।</p>
<p><strong>अर्पित किया था श्रीफल</strong></p>
<p>भरत सेठ ने बताया कि बीते 9 जुलाई को ब्र. क्रांति जैन ने अपने परिवार के साथ संल्लेखना समाधि हेतु पूज्य गणाचार्यश्री से निवेदन कर श्रीफल अर्पित किया। पूज्य गणाचार्यश्री ने स्थिति गंभीर देखते हुए ब्र. क्रांति जी को 10 जुलाई को क्षुल्लिका दीक्षा देकर विमोहिताश्री माताजी का नामकरण किया। 14 जुलाई को समस्त समाज के मध्य उनकी आर्यिका दीक्षा संपन्न हुई। वर्तमान में पूज्य गणाचार्यश्री अपने संघ के साथ माताजी की सेवा संबोधन, वैयावृत्ति मे संलग्न हैं। साथ ही श्रेयांसगिरि अंचल का जैन समाज माताजी को पाठ आदि सुनाने में तत्पर है।</p>
<p><strong>माताजी की अद्भुत त्याग तपस्या</strong></p>
<p>पारिवारिक जनों ने बताया कि माताजी ने अपना पूरा जीवन संयम साधना मे बिताया। उन्होंने लगभग 4000 एकासन उपवास अपने किए तथा भगवान की भक्ति में सतत तत्पर रहकर लगभग 20 हजार श्रीफल द्वारा प्रभु की महाअर्चना कर चुकी हैं।</p>
<p><strong>गुरु के लिए समर्पित संपूर्ण जी</strong></p>
<p>माताजी ने गृहस्थ में रहकर 21 वर्ष पूर्व पूज्य गणाचार्यश्री से सागर में 2 प्रतिमा के व्रत ग्रहण किए तथा 2 माह पूर्व बड़ा मलहरा में सात प्रतिमा के व्रत ग्रहण कर पूज्य गुरुवर के चरणों में समाधि करने की भावना व्यक्त की, तदनुसार श्रेयांसगिरि मे आकर आपने गुरु चरणों में घर का त्याग कर आचार्य संघ में प्रवेश लिया। 10 जुलाई को दीक्षा लेकर माताजी ने केवल 3 दिन आहार ग्रहण किया, जिसमें मात्र जल, दूध ही आहार में लिया लेकिन ऐसी अवस्था में भी इतनी सहजता देख स्वयं पूज्य गणाचार्यश्री ने कहा कि विमोहिता श्री माताजी समता की प्रतिमूर्ति हैं।</p>
<p><strong>अन्न जल का आजीवन किया त्याग</strong></p>
<p>14 जुलाई को माताजी ने स्वेच्छा से गुरुचरण सानिध्य में अन्न जल का त्याग किया, अब वह प्रभु भक्ति एवं आत्म ध्यान में तल्लीन होकर समाधि साधना में रत हैं। समाधि लेने की सूचना मिलते ही दूर-दूर से बड़ी संख्या में दर्शनार्थियों का आवागमन जारी है, सभी पूज्य गुरुवर एवं पूज्य माताजी के दर्शन कर पुण्यार्जन कर रहे हैं।</p>
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