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	<title>श्री शांतिसागरजी महाराज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>भारतीय संस्कृति में सुगंध दशमी एक सकारात्मक व्रत है : धूप अर्पित करने से शांत वातावरण में सकारात्मकता आती है </title>
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		<pubDate>Mon, 01 Sep 2025 10:55:48 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वर्षा ऋतु का आगमन ही प्रकृति का श्रंृंगार है। धरती पर चारों और हरितिमा फैली है। जन-जन के मन उमंग और उल्लास से परिपूर्ण हैं। ऐसे वर्षाकाल में सुगंध दशमी व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। आत्मिक शुद्धि और आत्मकल्याण, अशुभ कर्मों का क्षय और पुण्य की प्राप्ति [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वर्षा ऋतु का आगमन ही प्रकृति का श्रंृंगार है। धरती पर चारों और हरितिमा फैली है। जन-जन के मन उमंग और उल्लास से परिपूर्ण हैं। ऐसे वर्षाकाल में सुगंध दशमी व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। आत्मिक शुद्धि और आत्मकल्याण, अशुभ कर्मों का क्षय और पुण्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है। <span style="color: #ff0000">टीकमगढ़ से पढ़िए, प्रियंका रेशू जैन का यह आलेख&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>टीकमगढ़।</strong> वर्षा ऋतु का आगमन ही प्रकृति का श्रंृंगार है। धरती पर चारों और हरितिमा फैली है। जन-जन के मन उमंग और उल्लास से परिपूर्ण हैं। ऐसे वर्षाकाल में सुगंध दशमी व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। आत्मिक शुद्धि और आत्मकल्याण, अशुभ कर्मों का क्षय और पुण्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है। सुगंध दशमी व्रत चतुर्थकाल में प्रारंभ हुआ था। तब से लेकर आज तक इस व्रत का पालन बराबर होता चला आ रहा है। आज से लगभग 2570 वर्ष पूर्व तीर्थंकर भगवान् महावीर के समवसरण में राजा श्रेणिक ने 60 हजार प्रश्न गौतम गणधर से किए थे। उन्हीं प्रश्नों के मध्य उन्होंने इस सुगंधदशमी व्रत के बारे में भी गौतम स्वामी से पूछा था कि भगवन! स्ुगंध दशमी नामक इस उत्तम व्रत को कब और किसने किया है</p>
<p>यह व्रत कैसे किया जाता है और इसका फल क्या है? उसी को गौतम स्वामी ने राजा श्रेणिक को बतलाया था। इस कलिकाल में भी कठिन से कठिन व्रतों का पालन करने वाले महापुरुष हुए हैं। बीसवीं शताब्दी के प्रथम दिगंबर जैनाचार्य चारित्र चक्रवर्ती श्री शांतिसागरजी महाराज ने मुनि अवस्था में ‘सिंहनिष्क्रीडित आदि दुरूह व्रतों का पालन किया था। उन्होंने अपने 35 वर्ष के दीक्षित जीवन में 25 वर्ष 6 माह उपवास में व्यतीत किए और मात्र 9 वर्ष 6 मास आहार लिया था। व्रत, नियम, संयम आदि धर्म क्रियाओं से शरीर को कष्ट तो होता है किन्तु इनसे आत्मा को पौष्टिकता- बल प्राप्त होता है और शरीर के पालन-पोषण से, उसकी साज संवार करने से आत्मा निर्बल बनती है, उसका अपकार होता है किन्तु व्रतों के महत्व को जानकर उन्हें शक्ति के अनुसार पालन करने की परम्परा प्राचीनकाल से चली आ रही है।</p>
<p>सुगंध दशमी व्रत कथा के अनुसार एक कलश की स्थापना करके उसमें मन्द अग्नि जलाकर दशांगी धूप जलाना चाहिए। सात प्रकार का धान्य लेकर उससे स्वस्तिक लिखना चाहिए और उसमें दश दीपक रखकर जलाना चाहिए। मंदिर के आँगन में स्तुतियां पढ़ना एवं ष्ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्री शीतलनाथ जिनेंद्राय नमः मंत्र का जाप्य , अल्प रूप में भी भक्ति सहित की जाए तो भी वह बहुत फलदायक होती है। जंबूद्वीप के शिव मंदिर नगर में रानी मनोरमा अथार्त मदनावती ने भी इस व्रत का पालन किया, जिससे उसका शरीर सुगन्धित हो गया और उसे उत्तम सुख प्राप्त हुए।</p>
<p>उज्जयिनी नगरी की उस गरीब ब्राह्मण कन्या दुर्गंधा ने श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन किया। पुनः समाधिपूर्वक मरण करके वह कनकपुर नामक नगर में जिनदत्त नामक सेठ की पत्नी जिनदत्ता के गर्भ में आ गई। जो कोई नर अथवा नारी इस व्रत का पालन करता है, वह इस जन्म में सुख पाता है, स्वाध्याय और धर्म चिंतन करना। धूप अर्पित करने से शांत वातावरण में सकारात्मकता और स्वच्छ सुगंध का प्रसार धार्मिक और नैतिक मूल्यों और मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार आत्मिक शांति और संतुष्टि की प्राप्ति होती है। यह व्रत आत्मिक शुद्धि और आत्मकल्याण के लिए एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है।</p>
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