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	<title>श्री शांतिनाथ जिनालय &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>श्री शांतिनाथ जिनालय में यागमंडल विधान पूर्ण : धार्मिक स्वरलहरियों के साथ विधान किया </title>
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		<pubDate>Tue, 10 Mar 2026 13:44:35 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[रोंडा स्थित नवीन श्री शांतिनाथ जिनालय में वेदी शुद्धि एवं यागमंडल विधान का आयोजन पं.अरिंजय जैन दमोह, देवेंद्र जैन के निर्देशन में आयोजित किया गया। ललितपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230; ललितपुर। रोंडा स्थित नवीन श्री शांतिनाथ जिनालय में वेदी शुद्धि एवं यागमंडल विधान का आयोजन पं.अरिंजय जैन दमोह, देवेंद्र जैन के निर्देशन में आयोजित किया [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>रोंडा स्थित नवीन श्री शांतिनाथ जिनालय में वेदी शुद्धि एवं यागमंडल विधान का आयोजन पं.अरिंजय जैन दमोह, देवेंद्र जैन के निर्देशन में आयोजित किया गया। <span style="color: #ff0000">ललितपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>ललितपुर।</strong> रोंडा स्थित नवीन श्री शांतिनाथ जिनालय में वेदी शुद्धि एवं यागमंडल विधान का आयोजन पं.अरिंजय जैन दमोह, देवेंद्र जैन के निर्देशन में आयोजित किया गया। संगीतकार नीलेश जैन बुढार की धार्मिक स्वरलहरियों के साथ विधान की धार्मिक क्रिया हुईं। विधान के पूर्व ध्वजारोहण एडवोकेट निर्मल</p>
<p>जैन कुम्हैडी परिवार द्वारा किया गया। पुण्यार्जक परिवारों द्वारा मंडल पर कलश स्थापित करने का सौभाग्य राकेश जैन सैदपुर परिवार, शिक्षक राजीव बजाज, डॉ. संजीव जैन बजाज परिवार, राकेश कुमार, सुनील कुमार, आदेश जैन रोंडा परिवार, शिखरचंद्र,सुरेंद्र जैन किसलवास परिवार, पंकज जैन सिमरा परिवार,</p>
<p>राकेश जैन विरधा परिवार को प्राप्त हुआ। सौधर्म इंद्र बनने का सौभाग्य राजकुमार जैन किसलवास परिवार, कुबेर इंद्र बनने का सौभाग्य कोमलचंद्र, राजीव जैन रोंडा परिवार, ईशान इंद्र बनने का सौभाग्य शिखरचंद्र, सुरेंद्र कुमार किसलवास परिवार, सनत कुमार इंद्र बनने का सौभाग्य राजीव जैन रोंडा, माहेंद्र इंद्र बनने का सौभाग्य सुरेंद्र जैन, लोकेश जैन,सिद्धम जैन, शिवम् जैन किसलवास परिवार, विपिन जैन रोंडा परिवार को प्राप्त हुआ। अष्ट कुमारी बनने का सौभाग्य अनुभा मोदी, आशी बजाज, शैली बजाज, देशना जैन को प्राप्त हुआ।इस दौरान शिक्षक राजीव बजाज, गजेंद्र जैन,शिक्षक पुष्पेंद्र जैन,गौरव बजाज मौजूद रहे।</p>
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		<title>जिनकी आशा गुरु पर टिकी होती है उनका जीवन कभी डगमगाता नहीं : मुनि श्री संभवसागरजी ने धर्मसभा में कर्मों के लेखेजोखे के बारे में बताया  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 Feb 2026 11:12:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री संभवसागर महाराज ने श्री शांतिनाथ जिनालय, स्टेशन जैन मंदिर में धर्मसभा में उद्बोधन देते हुए कहा कि मनुष्य संसार में अनेक प्रकार के मुखौटे पहन सकता है। दूसरों की आंखों में धूल झोंक सकता है। अपने दोषों को छिपा सकता है, किंतु कर्म की न्याय व्यवस्था को धोखा नहीं दे सकता। विदिशा से [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनि श्री संभवसागर महाराज ने श्री शांतिनाथ जिनालय, स्टेशन जैन मंदिर में धर्मसभा में उद्बोधन देते हुए कहा कि मनुष्य संसार में अनेक प्रकार के मुखौटे पहन सकता है। दूसरों की आंखों में धूल झोंक सकता है। अपने दोषों को छिपा सकता है, किंतु कर्म की न्याय व्यवस्था को धोखा नहीं दे सकता। <span style="color: #ff0000">विदिशा से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>विदिशा।</strong> मुनि श्री संभवसागर महाराज ने श्री शांतिनाथ जिनालय, स्टेशन जैन मंदिर में धर्मसभा में उद्बोधन देते हुए कहा कि मनुष्य संसार में अनेक प्रकार के मुखौटे पहन सकता है। दूसरों की आंखों में धूल झोंक सकता है। अपने दोषों को छिपा सकता है, किंतु कर्म की न्याय व्यवस्था को धोखा नहीं दे सकता। उन्होंने कहा कि कर्म का सिद्धांत एआई सुपर कंप्यूटर की तरह है। जिसकी कोडिंग पूर्णतः निष्पक्ष है। उसमें हमारे प्रत्येक विचार, प्रत्येक शब्द और प्रत्येक कर्म निरंतर दर्ज होते रहते हैं। कर्म का लेख न मिटता है, न बदलता है और न ही किसी मुखौटे से प्रभावित होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दुकान, घर या समाज की नजरों से आप अपने आपको छिपा सकते हैं, लेकिन कर्म से अपने आपको नहीं छुपा सकते। उन्होंने कहा कि बाहर के पाप को आप प्रभु और गुरु के सामने प्रायश्चित करके कम कर सकते है, परंतु धर्म क्षेत्र में, मंदिर में या पवित्र भावों के मध्य की गई असावधानी कर्म लेख में अमिट रूप से अंकित हो जाती है। दूसरों को धोखा दिया जा सकता है पर आत्मा और प्रकृति की न्याय व्यवस्था को धोखा नहीं दिया जा सकता है। मुनि श्री ने कहा कि जीवन में सजगता, संयम और सत्यनिष्ठा अत्यंत आवश्यक है, कर्मों की “कोडिंग” व्यक्तिगत होती है। अतः भीतर से तथा बाहर से सावधान रहने की आवश्यकता है,जिसने जो किया है, उसका फल उसी को भोगना पड़ेगा।</p>
<p><strong>बुरा लगना ही उपचार की शुरुआत </strong></p>
<p>उन्होंने लोकप्रसिद्ध उक्ति उद्धृत करते हुए कहा कि कोई लाख करे चतुराई, कर्म का लेखा मिटे न भाई। गुरु वाणी के संदर्भ में मुनि श्री ने कहा कि गुरु की वाणी कभी-कभी कड़वी दवा के समान प्रतीत होती है पर उसका उद्देश्य आत्मिक स्वास्थ्य को ठीक करना होता है। जैसे कड़वी दवा रोग को जड़ से समाप्त करती है और काँटा निकालते समय क्षणिक पीड़ा होती है पर बाद में राहत मिलती है वैसे ही गुरु की कठोर लगने वाली बातें हमारे भीतर के क्रोध, मान, माया और लोभ रूपी कांटों को निकालने के लिए होती हैं। बुरा लगना ही उपचार की शुरुआत है। इस अवसर पर मुनि श्री निस्सीम सागर महाराज ने कहा कि यदि हम मन पर जमे कुसंस्कारों को बार-बार दोहराते रहेंगे तो आत्मा कभी निर्मल नहीं हो पाएगी। चौरासी लाख योनियों के चक्र के पश्चात यह मनुष्य जन्म अत्यंत दुर्लभता से मिला है। यदि अब भी नहीं संभले तो पुनः उसी चक्र में भटकना पड़ेगा।</p>
<p><strong> धर्म एक कदम आगे बढ़ाता है</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि जितनी बड़ी दुकान, उतना बड़ा फायदा या उतना ही बड़ा नुकसान। धर्म का अवसर जितना बड़ा है, जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। यदि उत्तम विचारों की लीक नहीं पकड़ी, मन को संयम और साधना में स्थिर नहीं रखा तो पतन भी उतना ही गहरा होगा। धर्म एक कदम आगे बढ़ाता है तो अधर्म सौ कदम पीछे धकेल देता है।</p>
<p>दीक्षा काल के प्रसंग साझा करते हुए मुनि श्री ने बताया कि गुरुदेव जब सैकड़ों किलोमीटर दूर विहार का संकेत देते थे, तब प्रारंभ में मन में अनेक प्रश्न उठते थे। किंतु समय बीतने पर परिणाम देखकर समझ आता था कि गुरु का निर्णय कितना दूरदर्शी और जनकल्याणकारी था।</p>
<p><strong>गुरु जो कहें, आदेश का उल्लंघन मत करो</strong></p>
<p>गुरु का निर्णय व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राष्ट्रहित और निष्पक्ष भावना से प्रेरित होता है। उन्होंने कहा, गुरु जो कहें, उनके आदेश का उल्लंघन मत करो। यदि यह मंत्र अपना लिया तो जीवन आनंदमय हो जाएगा। अंत में उन्होंने कहा कि कठिनाइयां जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हैं, पर जिनकी श्रद्धा अटल है और जिनकी आशा गुरु पर टिकी है, उनका जीवन कभी डगमगाता नहीं। प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि मुनि श्री के आध्यात्मिक प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.45 बजे से आयोजित हो रहे हैं।</p>
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		<title>संपत्ति से नहीं, संयम से आती है महानता विनम्रता से मिलती है ऊंचाई: मुनिश्री संभवसागरजी के प्रवचनों का रसास्वादन कर रहे धर्मप्राण समाजजन  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/greatness_comes_not_from_wealth_but_from_self_control_humility_is_the_way_to_achieve_greatness/</link>
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		<pubDate>Wed, 25 Feb 2026 12:19:47 +0000</pubDate>
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<p><strong>श्री शांतिनाथ जिनालय, स्टेशन जैन मंदिर में प्रातःकालीन धर्मसभा में मुनि श्री संभवसागर महाराज ने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि मनुष्य की वास्तविक महानता बाहरी संपत्ति या ऐश्वर्य से नहीं, बल्कि संयम और विनम्रता से प्रकट होती है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बाहरी भोग-विलास कभी आत्मा को तृप्त नहीं कर सकते। <span style="color: #ff0000">विदिशा से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>विदिशा।</strong> श्री शांतिनाथ जिनालय, स्टेशन जैन मंदिर में प्रातःकालीन धर्मसभा में मुनि श्री संभवसागर महाराज ने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि मनुष्य की वास्तविक महानता बाहरी संपत्ति या ऐश्वर्य से नहीं, बल्कि संयम और विनम्रता से प्रकट होती है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बाहरी भोग-विलास कभी आत्मा को तृप्त नहीं कर सकते। संसार का सुख क्षणिक है जबकि, आत्मा का आनंद शाश्वत और अनंत है। मुनिश्री ने कहा कि आज जब पुण्य के प्रभाव से हमारे पास थोड़ी-सी संपत्ति, पद या मान-सम्मान आ जाता है तो हम दूसरों को छोटा दिखाने का प्रयास करने लगते हैं। जिस वैभव पर हमें विनम्र होना चाहिए। उसी पर हम अहंकार करने लगते हैं। स्मरण रखिए संपत्ति से नहीं, संयम से महानता आती है। वैभव से नहीं, विनम्रता से ऊंचाई मिलती है।</p>
<p><strong> भरत चक्रवर्ती के पास अथाह वैभव था</strong></p>
<p>अपने प्रवचन में मुनिश्री ने भगवान आदिनाथ के पुत्र भरत चक्रवर्ती का उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि भरत चक्रवर्ती के पास अथाह वैभव था। उनके महल सोने-चांदी से दमकते थे। राज्य असीम था और ऐश्वर्य अपार। पौराणिक वर्णनानुसार उनकी 96,000 रानियां थीं। 32,000 म्लेच्छ खंड की राजकुमारियां, 32,000 मुकुटबद्ध राजाओं की पुत्रियां तथा 32,000 विद्याधर राजाओं की कन्याएं। इतना अद्भुत वैभव और असाधारण सुख होने पर भी उन्हें वह सुख, वास्तविक सुख प्रतीत नहीं हुआ। मुनिश्री ने कहा कि इसका कारण यह था कि वे वैभव के मध्य भी वैराग्य की भावना को धारण किए हुए थे। यदि भरत चक्रवर्ती जैसे सम्राट वैराग्य की ओर मुड़ सकते हैं तो हम भी अपने जीवन का आत्मोद्धार क्यों नहीं कर सकते? इस विषय में प्रत्येक व्यक्ति को आत्मचिंतन अवश्य करना चाहिए। इस अवसर पर मुनि श्री निस्सीम सागर जी महाराज एवं मुनि श्री संस्कार सागरजी महाराज मंचासीन रहे।</p>
<p><strong> मुनि संघ के प्रतिदिन प्रातः 8.45 बजे से प्रवचन </strong></p>
<p>सकल दिगंबर जैन समाज के प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि आगामी मार्च माह के द्वितीय सप्ताह में बर्राे वाले बड़े बाबा भगवान आदिनाथ को नवीन मंदिर में नई वेदी पर विराजमान कराने के लिए शीतलविहार न्यास के पदाधिकारियों का प्रतिनिधिमंडल मुक्तागिरी तीर्थ पर आचार्य श्री समयसागरजी महाराज से निवेदन एवं आशीर्वाद प्राप्त करने गया था। आचार्यश्री ने आशीर्वाद प्रदान करते हुए संपूर्ण कार्यक्रम की जिम्मेदारी मुनिश्री संभवसागरजी महाराज को सौंप दी है। मुनि संघ के प्रतिदिन प्रातः 8.45 बजे से प्रवचन संपन्न हो रहे हैं। जिनमें श्रद्धालुजन बड़ी संख्या में उपस्थित होकर धर्मलाभ प्राप्त कर रहे हैं।</p>
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		<title>विदिशा के सेठजी ने किया था षठखंडागम ग्रंथ का सबसे पहला प्रकाशन : मुनिश्री संभवसागरजी ने षठखंडागम ग्रंथ ग्रंथ की रचना के बारे सविस्तार बताया  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/the_first_publication_of_the_shathkhandagama_book_was_done_by_sethji_of_vidisha/</link>
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		<pubDate>Wed, 10 Dec 2025 13:31:39 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री संभवसागरजी महाराज ससंघ विदिशा नगर के श्री शांतिनाथ जिनालय में विराजमान हैं। जैन धर्म और उसके इतिहास पर चर्चा करते हुए मुनि श्री ने कहा कि भगवान महावीर के निर्वाण उपरांत 683 वर्ष निकल गए लेकिन, किसी भी आचार्य ने कोई भी ग्रंथ नहीं लिखा। विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230;  विदिशा। मुनिश्री संभवसागरजी महाराज [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री संभवसागरजी महाराज ससंघ विदिशा नगर के श्री शांतिनाथ जिनालय में विराजमान हैं। जैन धर्म और उसके इतिहास पर चर्चा करते हुए मुनि श्री ने कहा कि भगवान महावीर के निर्वाण उपरांत 683 वर्ष निकल गए लेकिन, किसी भी आचार्य ने कोई भी ग्रंथ नहीं लिखा। <span style="color: #ff0000">विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong> विदिशा।</strong> मुनिश्री संभवसागरजी महाराज ससंघ विदिशा नगर के श्री शांतिनाथ जिनालय में विराजमान हैं। जैन धर्म और उसके इतिहास पर चर्चा करते हुए मुनि श्री ने कहा कि भगवान महावीर के निर्वाण उपरांत 683 वर्ष निकल गए लेकिन, किसी भी आचार्य ने कोई भी ग्रंथ नहीं लिखा। प्रारंभ के 160 वर्ष तक आचार्य भद्रबाहु तक यह ज्ञान उनके मुख से पूर्ण श्रुत के रूप में प्रवाहित होता रहा तथा जब उनकी श्रवणबेलगोला में संल्लेखना हुई तो विषाकाचार्य उनके नए उत्तराधिकारी के रुप में नियुक्त हुए। उनको भी 14 अंग में से 11 अंग का तो ज्ञान था लेकिन, तीन अंग उनसे भी ज्ञान का क्षयोपशम होने से विस्मृत हो गए और धीरे-धीरे यह जो ज्ञान था वह भी घटता जा रहा था।</p>
<p>एक स्थिति ऐसी आ गई कि पूर्व का ज्ञान विस्मृत होने की कगार पर आ गया तो आचार्य धरसेन स्वामी, जो उस समय के सबसे बड़े ज्ञानी थे। उनके पास मात्र एक अंग का ही ज्ञान तथा कुछ और स्मृति शेष बची थी। उन्होंने दूर दृष्टि से सोचा कि जब हमारे आते आते 97 प्रतिशत श्रुत ज्ञान तो विलुप्त हो गया। यदि ऐसा ही रहा तो यह ज्ञान आगे एकदम विलुप्त हो जाएगा तो गुजरात के गिरनार पर्वत पर जाकर एक गुफा में उन्होंने तपस्या की और उनके पास जो ज्ञान शेष बचा था उसे किसी योग्य शिष्य को देने की चिंता हुई। पास में महिमानगरी में यति (मुनि) सम्मेलन हो रहा था वहां बहुत से मुनिराज इकट्ठे हुए थे।</p>
<p>आचार्य धरसेन स्वामी ने उस यति सम्मेलन के प्रमुख आचार्य के पास खबर भेजी कि आपके यति सम्मेलन से दो योग्य मुनिओं को हमारे पास भेजें। जिससे हम भगवान महावीर की दिव्यवाणी के अंश हम उनको दे सकें तो आचार्य श्री ने सुगुप्ती और नरवाहन नाम के दो मुनिराजों को आचार्य धरसेन स्वामी के पास भेजा। जो आगे चलकर आचार्यश्री पुष्पदंत और आचार्यश्री भूतबली के नाम से प्रसिद्ध हुए।</p>
<p>उन्होंने ही ताडपत्र पर षठखंडागम नाम का ग्रंथ लिखा, जो आज भी कर्नाटक प्रांत के मूलबद्री में शास्त्र भंडार में है तथा जिसका सबसे पहले कागज पर प्रकाशन विदिशा नगर के ही सेठ शितावराय लखमीचंद ने किया था तथा षठखंडागम ग्रंथ के आधार पर ही पांच खंडों में धवला की 16 पुस्तकों का प्रकाशन आचार्यश्री वीरसेन महाराज ने किया था। प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि प्रवचन के बाद मुनि श्री निस्सीम सागर महाराज ने प्रश्नों के माध्यम से श्रद्धालुओं के ज्ञान की परीक्षा ली एवं सही उत्तर देने वालों को समग्र पाठशाला समिति की ओर से पुरस्कृत किया।</p>
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