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	<title>श्री आदिनाथ जिनालय नसिया &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>श्री आदिनाथ जिनालय नसिया &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>तीर्थंकर कुल का मनुष्य जीवन कीमती रत्न के समान है : आचार्यश्री वर्धमानसागर जी ने कहा- इसकी कर्म रूपी चोरों से सुरक्षा जरूरी  </title>
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		<pubDate>Fri, 17 Oct 2025 15:11:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने श्री आदिनाथ जिनालय नसिया में शांतिनाथ विधान के पूजन के समय मंगल देशना में कहा कि आज श्री आदिनाथ जिनालय में आप श्री शांतिनाथ मंडल विधान की पूजन भक्ति भाव से कर रहे हैं। पंचकल्याणक की धार्मिक क्रियाएं भी उत्साह से करना चाहिए। टोंक से पढ़िए, राजेश पंचोलिया [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने श्री आदिनाथ जिनालय नसिया में शांतिनाथ विधान के पूजन के समय मंगल देशना में कहा कि आज श्री आदिनाथ जिनालय में आप श्री शांतिनाथ मंडल विधान की पूजन भक्ति भाव से कर रहे हैं। पंचकल्याणक की धार्मिक क्रियाएं भी उत्साह से करना चाहिए। <span style="color: #ff0000">टोंक से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>टोंक।</strong> आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने श्री आदिनाथ जिनालय नसिया में शांतिनाथ विधान के पूजन के समय मंगल देशना में कहा कि आज श्री आदिनाथ जिनालय में आप श्री शांतिनाथ मंडल विधान की पूजन भक्ति भाव से कर रहे हैं। पंचकल्याणक की धार्मिक क्रियाएं भी उत्साह से करना चाहिए। कुछ समय पूर्व श्री पारसनाथ भगवान की नूतन प्रतिमा नगर में आई हैं। अभी उनमें गुणों का आरोपण नहीं किया गया है। पंच कल्याणक के दौरान सूरी मंत्र द्वारा उस प्रतिमा को प्रतिष्ठित किया जाएगा। भगवान के प्रतिदिन दर्शन, अभिषेक ,पूजन ,ध्यान, स्वाध्याय निराकुलता पूर्वक करना चाहिए। मनुष्य जीवन बहुत ही दुर्लभ है। आपको वितरागी तीर्थंकर भगवान का कुल प्राप्त हुआ है। यह सौभाग्य के पल है, जीवन में प्रतिदिन उम्र बढ़ने के साथ आयु भी कम होती जाती है।</p>
<p><strong>भगवान की भक्ति करने से कर्मों की निर्जरा होती है</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने प्रवचन में आगे बताया कि मानव जन्म बहुत ही कठिनाई से संचित पुण्य से प्राप्त होता है। दिन प्रतिदिन आपकी उम्र कम होती जा रही है। आयु बढ़ने के साथ जीवन भी प्रतिपल कम होता जाता है। अब क्या करना है। इसका चिंतन भगवान को देखकर करना चाहिए कि भगवान ने जो प्राप्त किया है, वह आप कैसे प्राप्त कर सकते हैं। भगवान की भक्ति करने से कर्मों की निर्जरा होती है। कर्मों का हर पल भय, डर होना चाहिए नवीन कर्मों का आश्रव कैसे रुकेगा , धार्मिक विधान कार्य करने से कर्मों का क्षय होता है।</p>
<p><strong>मनुष्य जीवन भी कीमती रत्न </strong></p>
<p>आचार्यश्री ने कहा कि हर व्यक्ति भगवान से सुख की कामना करता है। धर्म कार्य करने से सुख मिलता है। भगवान की चरण-शरण से ही मुक्ति मिलती है। इसलिए जीवन में पुण्य अर्जित बढ़ाने का कार्य करना चाहिए। भगवान के शरण में चिंतन करें। श्री पारसनाथ भगवान का पंच कल्याणक होना है। पारसनाथ भगवान और कमथ पूर्व पर्याय में सगे भाई थे पर कमथ ने जीव ने 10 भवों तक पारसनाथ भगवान के जीव पर उपसर्ग किए किंतु पारसनाथ भगवान के जीव ने सभी उपसर्गों को समता भाव से सहन किया। जिस प्रकार कीमती रत्न को आप तिजोरी में सुरक्षित करते हैं। उसी प्रकार मनुष्य जीवन भी कीमती रत्न है। इसकी भी सुरक्षा कर्मों से करना चाहिए। भगवान की शरण का लाभ लेना चाहिए।</p>
<p><strong>सभी ने आचार्य श्री की पूजा की </strong></p>
<p>रमेश काला ने बताया कि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के संघ सानिध्य में 7 से 12 नवंबर तक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा पुराने टोंक के नूतन जिनालय के लिए होगी। आज पंच कल्याणक प्रतिष्ठा समिति के सभी पात्रों और समाज के पदाधिकारियों महिला पुरुषों ने श्री शांतिनाथ मंडल विधान की पूजा की। सभी ने आचार्य श्री की पूजा भी की।</p>
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		<title>समाधि साधना में कर्म रूपी शत्रुओं से सावधानी से रक्षा करना होगी: भामाशाह श्रेष्ठी अशोक पाटनी आरके मार्बल दर्शन को पधारे </title>
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		<pubDate>Thu, 07 Aug 2025 11:59:39 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सहित श्री आदिनाथ जिनालय नसिया में विराजित हैं। देश के प्रसिद्ध भामाशाह श्रेष्ठी अशोक पाटनी आरके मार्बल किशनगढ़ राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागरजी के दर्शन के लिए पधारे और आचार्यश्री ने आशीर्वाद प्राप्त किया। स्थानीय समाज के पदाधिकारियों ने आपका सम्मान किया। टोंक से पढ़िए, यह खबर&#8230; टोंक। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सहित श्री आदिनाथ जिनालय नसिया में विराजित हैं। देश के प्रसिद्ध भामाशाह श्रेष्ठी अशोक पाटनी आरके मार्बल किशनगढ़ राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागरजी के दर्शन के लिए पधारे और आचार्यश्री ने आशीर्वाद प्राप्त किया। स्थानीय समाज के पदाधिकारियों ने आपका सम्मान किया। <span style="color: #ff0000">टोंक से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>टोंक।</strong> आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सहित श्री आदिनाथ जिनालय नसिया में विराजित हैं। देश के प्रसिद्ध भामाशाह श्रेष्ठी अशोक पाटनी आरके मार्बल किशनगढ़ राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के दर्शन के लिए पधारे और आचार्य श्री ने आशीर्वाद प्राप्त किया। स्थानीय समाज के पदाधिकारियों ने आपका सम्मान किया। मुनि श्री चिन्मय सागर जी को संबोधन में आचार्य श्री ने बताया कि आपको गुरु द्वारा दिए गए दीक्षा व्रत का पालन करना है। चारित्र की विशुद्धता पर प्रमाद आलस्य नहीं करें। आपका संयम कीमती रत्न है, इसकी सुरक्षा करनी है।</p>
<p>जीवन का सार चारित्र है। हर समय सजग और सावधान रहना है। जीर्ण काया, शरीर में समाधि रूपी विशुद्धता का लक्ष्य ध्यान में रखना चाहिए। हर समय 12 भावना और पांच नमस्कार भाव की आराधना धीरता पूर्वक करें। संघ के सभी साधु आपकी सेवा में तत्पर रहेंगे। सभी के प्रति आपको साम्य क्षमा भाव रखना है। यह मंगल देशना में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने क्षपक मुनि श्री चिन्मय सागर जी को अमृत रूपी वचनों का पान कराया।</p>
<p><strong>देव, शास्त्र, गुरु और आत्मा की साधना का लक्ष्य रखें</strong></p>
<p>राजेश पंचोलिया ने बताया कि आचार्य श्री ने मुनि श्री को संबोधित कर कहा कि सभी क्रियाएं सजग़ता से करना है। उन्होंने भाव, परिणाम निर्मल रखने, मृत्यु से भयभीत नहीं होने की प्रेरणा दी। आगे बताया कि रत्नत्रय से सज्जित आत्मा में संकल्प, विकल्प, राग, द्वेष, व्याकुलता को दूर कर अंतरंग परिणाम भावों को संभाल कर देव, शास्त्र, गुरु और आत्मा की साधना का लक्ष्य रखे। संयम युद्ध के समान है। जिसमें कर्म रूपी शत्रुओं पर आपको विजय प्राप्त करना है। दीक्षा रुपी मंदिर पर समाधि संलेखना का कलशारोहण करना है। आपने संयम साधना की सफलता की कामना की है। 88 वर्षीय मुनि श्री चिन्मय सागर जी ने वर्ष 1989 में आचार्य श्री अजित सागर जी से मुनि दीक्षा ली। गुरुवार को उन्होंनेे श्रीजी का पंचामृत अभिषेक देखा। श्रीजी एवं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी से क्षमा याचना कर संस्तरारोहण का निवेदन में बताया कि मेरा शरीर अब संयम साधना में बाधक है। इसलिए मेरी संघ सानिध्य में सम्यक समाधि हो, आप मुझे भी संसार समुद्र से पार लगा दीजिए।</p>
<p>संयम साधना में संबल और मार्गदर्शन का निवेदन किया। गुरु और संघ ही माता-पिता सबकुछ है। आपने पुनः आचार्य श्री सहित सभी मुनिराज आर्यिका माताजी से क्षमायाचना की। सभी ने मुनि श्री चिन्मय सागर जी से नमोस्तु कर क्षमा ली। इसके बाद आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने कमरे की मंत्रोच्चार पूर्वक शुद्धि की। इस अवसर पर काफी श्रद्धालुओं ने आपके जयकार लगाकर संयम तपस्या की अनुमोदना की। संस्तरारोहण अर्थात क्षपक साधु जिस स्थान पर बैठते और लेटते हैं, उसे संस्तर कहते हैं और उस पर बैठना, उठना आरोहण कहलाता है। इस प्रकार संस्तरारोहण किया जाता है। मुनि श्री जीवित अवस्था में संयमी जीवन में क्रम पूर्वक आहार का त्याग कर रहे हैं।</p>
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		<title>संत समागम से धर्म की राह चलने पर सच्चा सुख मिलता है: आचार्य वर्धमान सागर जी ने किया धर्मसभा को संबोधित  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/true_happiness_is_achieved_byl_following_the_path_of_religion_through_the_company_of_saints/</link>
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		<pubDate>Sat, 12 Jul 2025 14:29:14 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जीवन में सुविधाजनक यात्रा करने के लिए आप मोबाइल गूगल का सहारा लेते हैं। इसी प्रकार सच्चे सुख का मार्ग संत समागम, देव, भगवान की प्रतिकृति, आचार्य, साधु, परमेष्ठि गुरुजनों से मिलती है। यद्यपि देव भगवान मौजूद नहीं है किंतु उनकी जिनवाणी से भी हमें सही मार्ग पर चलने की राह मिलती है। टोंक से [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>जीवन में सुविधाजनक यात्रा करने के लिए आप मोबाइल गूगल का सहारा लेते हैं। इसी प्रकार सच्चे सुख का मार्ग संत समागम, देव, भगवान की प्रतिकृति, आचार्य, साधु, परमेष्ठि गुरुजनों से मिलती है। यद्यपि देव भगवान मौजूद नहीं है किंतु उनकी जिनवाणी से भी हमें सही मार्ग पर चलने की राह मिलती है। <span style="color: #ff0000">टोंक से विकास जैन की पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>टोंक</strong>। जीवन में सुविधाजनक यात्रा करने के लिए आप मोबाइल गूगल का सहारा लेते हैं। इसी प्रकार सच्चे सुख का मार्ग संत समागम, देव, भगवान की प्रतिकृति, आचार्य, साधु, परमेष्ठि गुरुजनों से मिलती है। यद्यपि देव भगवान मौजूद नहीं है किंतु उनकी जिनवाणी से भी हमें सही मार्ग पर चलने की राह मिलती है। इसी कारण कहा जाता है कि देव शास्त्र गुरु हमें धर्म की राह दिखाते हैं। संत समागम से हमें सज्जनता और आत्म हित का मार्ग मिलता है। टोंक नगर को संघ का चातुर्मास भाग्य और पुण्य से प्राप्त हुआ है। यह प्रबोधन आचार्यश्री वर्धमानसागर जी ने शनिवार को दिया। उन्होंने कहा कि नश्वर संसार में आपके साथ आपके कर्म पुण्य पाप के रूप में जाते हैं। परिजन साथ में नहीं जाते हैं। बच्चों को लौकिक संस्कार एवं धर्म की शिक्षा आप तभी दे सकते हैं जब माता-पिता स्वयं संस्कारित हो। यह धर्म देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने श्री आदिनाथ जिनालय नसिया में दी। आचार्य श्री ने प्रवचन में महत्वपूर्ण सूत्र बताया कि छोटे-छोटे नियम व्रत धारण करने से आप धर्म के मार्ग पर चल सकते हैं। इससे पुण्य प्राप्त होता है और आप सुखी रहते हैं। आचार्य श्री के धर्म देशना से पहले आर्यिका श्री देशनामति माताजी ने प्रवचन में बताया कि आप इच्छा लालसा के कारण दुखी है, धरमपूर्वक अर्थ पुरुषार्थ करना होगा। राग द्वेष मोह विषय भोगों के कारण कर्मों का बंध होता है। धर्म धारण कर 12 प्रकार के तप करने से कर्मों की निर्जरा होती है। समाज प्रवक्ता पवन कंटान एवं विकास जागीरदार ने बताया कि धर्म सभा के पूर्व श्री आदिनाथ भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा हुई। संघ चैत्यालय में आचार्य श्री सानिध्य में श्रीजी का पंचामृत अभिषेक हुआ। चित्र अनावरण दीप प्रवज्लन के बाद आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेंट की गई। पूर्वाचार्यों को अर्घ्य समर्पित कर आचार्य श्री का पूजन किया गया।</p>
<p><strong>आचार्य संघ की आहारचर्या हुई</strong></p>
<p>आहारचर्या को सिंहवृत्ति कहते हैं। आहारचर्या नवधा भक्ति पूर्वक दिया जाता हैं। साधु एक ही स्थान पर खड़े होकर दोनों हाथों को मिलाकर अंजुली बनाते हैं, उसी में भोजन करते हैं। यदि अंजुली में भोजन के साथ चींटी, बाल, कोई अपवित्र पदार्थ या अन्य कोई जीव आ जाए तो उसी समय भोजन लेना बंद कर देते हैं। अपने हाथ छोड़ देते हैं। उसके बाद पानी भी नहीं पीते हैं। इस विधि से भोजन करने से साधु की भोजन के प्रति आसक्ति दूर होती है। किसी को रात्रि भोजन का त्याग करवाते हैं तो किसी को नित्य देव दर्शन का संकल्प दिलवाते हैं। किसी को जमीकंद त्याग का संकल्प दिलवाते हैं। उसी के बाद श्रावक के हाथों से आहार ग्रहण करते हैं। जैन साधु-संत जब आहार के लिए निकलते हैं तो जिन प्रतिमा के दर्शन कर विधि (नियम) लेकर निकलते हैं। विशेष मुद्रा लिए निकलते हैं। पडग़ाहन में श्रद्धालुओं द्वारा शब्दों का उच्चारण किया जाता है। उस दौरान श्रद्धालु मतलब श्रावक के पास नारियल, कलश, लौंग होने का नियम लिया जाता है।</p>
<p><strong>सभी श्रावक आहार जल शुद्ध है का उच्चारण पंक्तिबद्ध करते हैं</strong></p>
<p>नियम के अनुसार ये वस्तु नहीं दिखने पर बिना आहार लिए आ जाते हैं। उसके बाद दूसरे दिन फिर वहीं नियम के साथ आहार के लिए वापस निकलते है। यदि नियम नहीं मिलता है, आहार के लिए उस घर में प्रवेश नहीं करते हैं। फिर अगले दिन का इंतजार किया जाता है। जैन साधु संत का आहार किसके यहां पर होगा, यह पहले से तय नहीं होता है। साधु को देखकर देख कर चौके वाले अपने घर से निकल आते हैं, सभी श्रावक आहार जल शुद्ध है का उच्चारण पंक्तिबद्ध करते हैं। यदि विधि मिल जाती है श्रावक की ओर से तीन प्रदक्षिणा दी जाती है। दिन में एक बार आहार करने के पीछे कई कारण है। शरीर से ममत्व भाव को कम करना। धर्म साधना करते समय आलस्य ना आ जाए। इसलिए भोजन को शुद्धता के साथ बनाया जाता बहुत जरूरी होता है। जैन संत स्वाद के लिए भोजन नही करते है। ये धर्म साधना के लिए भोजन करते है।</p>
<p><strong>बड़ी संख्या में आ रहे हैं गुरु भक्त </strong></p>
<p>प्रतिदिन देश के अनेक प्रांतों से सैकडों गुरुभक्त आचार्य श्री के दर्शन हेतु पधार रहे हैं। टोंक समाज द्वारा नगर की गरिमा अनुरूप सत्कार किया जाता है। संघ सानिध्य में दोपहर को स्वाध्याय तथा रात्रि में श्रीजी की आरती के बाद आचार्य श्री की आरती होती है। कल रात्रि को प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी पर जीवन पर राजस्थान के सलूंबर के जैन फिल्म निर्माता द्वारा फिल्मांकित वृतचित्र को सभी ने मंत्र मुग्ध होकर देखा। इस मौके पर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष भागचंद फूलेता, धर्मचंद दाखिया, मंत्री राजेश सर्राफ, धर्मेंद्र पासरोटिया, कमल सर्राफ, प्रकाश पटवारी, अशोक छाबड़ा, मिट्ठू लाल दाखिया, नीटू छामुनिया, ओम ककोड़, मनीष शिवाड़िया, विकास अतार, मोनू आरटी, कमलेश कल्ली, अनिल ट्रांसपोर्ट, पंकज फूलेता,बाबु लाल धोली आदि समाज के लोग रहे।</p>
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