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	<title>श्रीसिद्धचक्र महामंडल विधान &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>अपने जीवन को संभालना चाहते हो रास्ता बदलिए : मुनि श्री प्रमाणसागर जी ने जीवन को बदलने की राह बताईं </title>
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		<pubDate>Sat, 13 Sep 2025 16:36:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अब बताओ बंटाधार चाहते हो या बेड़ापार? महाराज हम सभी तो बेड़ापार ही चाहते है, लेकिन जो कसम खाए बैठे हैं कि हम अपने आपको हम बदलेंगे नहीं, ऐसे लोगों से क्या बात करें? जब तक रास्ता नहीं बदलोगे जीवन नहीं संभलेगा। अपने जीवन को संभालना चाहते हो रास्ता बदलिए। यह उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अब बताओ बंटाधार चाहते हो या बेड़ापार? महाराज हम सभी तो बेड़ापार ही चाहते है, लेकिन जो कसम खाए बैठे हैं कि हम अपने आपको हम बदलेंगे नहीं, ऐसे लोगों से क्या बात करें? जब तक रास्ता नहीं बदलोगे जीवन नहीं संभलेगा। अपने जीवन को संभालना चाहते हो रास्ता बदलिए। यह उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने जीवन को खुशहाल बनाने का मार्ग प्रशस्त किया। <span style="color: #ff0000">भोपाल से पढ़िए, अविनाश जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>भोपाल(अवधपुरी)</strong>। कमाई चवन्नी और खर्चा रुपैया और कर्जा लाख का बताओ उस आदमी का क्या होगा? प्रश्न करते हुए मुनि श्री से पूछा तो जबाव मिला- बंटाधार। उन्होंने कहा कि अब बताओ बंटाधार चाहते हो या बेड़ापार? महाराज हम सभी तो बेड़ापार ही चाहते है, लेकिन जो कसम खाए बैठे हैं कि हम अपने आपको हम बदलेंगे नहीं, ऐसे लोगों से क्या बात करें? जब तक रास्ता नहीं बदलोगे जीवन नहीं संभलेगा। अपने जीवन को संभालना चाहते हो रास्ता बदलिए।</p>
<p>यह उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने जीवन को खुशहाल बनाने का मार्ग प्रशस्त करते हुए कहा कि ‘जीवन में बदलाव ही हमारे जीवन की शाश्वत उपलव्धि होगी’। मुनि श्री ने कहा कि जो लोग पुण्य के फल में मौजमस्ती और भोग विलास करते हैं। वह अपने पुण्य की पूंजी को गंवा रहे हैं। ऊपर से पाप का कर्जा बड़ा रहे हैं तो उनका बंटाधार तो होंना ही है। यदि बंटाधार से बचना चाहते हो ता ेअपनी पुण्य रूपी संपत्ति को बचाइए।</p>
<p><strong>पुण्य के फल से जीवन में अनुकूलताएं बनी रहती</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि जब खर्च अधिक होता है तो व्यक्ति अपनी आय बढ़ाने की कोशिश करता है। पुण्य के भोग में पुण्य खर्चा ज्यादा हो रहा है तो पुण्य को उपार्जित भी करो। मुनि श्री ने कहा कि कम से कम इतना तो करो कि जितना पुण्य संचित कर लाया था, उतना पुण्य बना रहे।। जिससे बेलेंस सीट ठीकठाक बनी रहे। उन्होंने कहा कि पुण्य के फल को चाहते हो तो पुण्य कमाने का जब भी मौका मिले पुण्य कमाते रहना। पुण्य के फल से आपके जीवन में सभी अनुकूलताएं बनी रहती हैं। मुनि श्री ने कहा कि पुण्य की क्रिआओं में लगे रहोगे तो पाप करने से बचोगे। मुनि श्री ने कहा कि अभी तक आप लोग करते क्या हो? सुबह उठने से लेकर रात्री में सोने तक सिर्फ षठकाय जीवों की हिंसा ही तो करते हो। प्रातः घर की साफ सफाई से लेकर स्नानादि नित्यक्रिया तक उसके पश्चात भोजन बनाने तथा वाहन आदि चलाने, व्यापार तथा नौकरी करने में षठकाय जीवों की हिंसा ही होती है और उस हिंसा से पाप ही हांसिल होता है। अब बताओ आपकी बेलेंस सीट किधर है।</p>
<p><strong>दुःख के समय में भगवान को याद करना अच्छी बात</strong></p>
<p>मुनि श्री ने पुण्य की कमाई के साधन बताते हुए कहा कि जिनमंदिर के दर्शन, णमोकार महामंत्र का जाप, व्रत, उपवास, पूजा पाठ गुरु के उपदेश सुनने सो थोड़ा सा पुण्य एकत्रित हो जाता है, लेकिन कितने लोग हैं, जो ब्रहम मुहूर्त में उठकर सुबह भगवान का नाम लेते हैं? हां जब थोड़ी बहुत प्रतिकूलता या मुसीबत आई तो आपके मुख से भगवान का नाम निकलने लगता है और आप लोग भजन भी गाते हो। दुःख के दिनों में वह मेरे काम आते हैं या भगवान पारसनाथ से गुहार लगाते हो मेटो मेटो जी संकट हमारा। मुनि श्री ने कहा कि दुःख के समय में भगवान को याद करना अच्छी बात है, करना भी चाहिए लेकिन, इस आशा से प्रभु की भक्ति करो कि हे प्रभु मेरे दुःख भले ही कम न हो लेकिन, इन दुःखों से में घबऱाऊ नहीं मेरे अंदर इतनी समता प्रदान कर देना। जिससे मैं उन कष्टों को सह सकूं। मुनि श्री ने कहा कि पुण्य करते समय पुण्य के फल की चाह मिट गई। उसी दिन से तुम्हारा जीवन पुण्यमयी हो जाएगा। भगवान पारसनाथ पर संकट आया तो उन्होंने उस उपसर्ग को समता पूर्वक सहा और वह पुण्यमयी हो गए।</p>
<p><strong>पुण्य की क्रिया उपादेय है</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि दुःख के दिनों में तुम भगवान को याद करते हो और सुख के दिनों में भूल जाते हो जो सुख के दिनों में भगवान को याद रखता है। वह कभी दुःखी नहीं होता। मुनि श्री ने कहा कि जब भी पुण्य का निमित्त आए तो सबसे पहले मैं और जब पाप का निमित्त मिले तो अपने आपको सबके पीछे कर लेना संत कहते है कि पुण्य का फल हेय है। पुण्य की क्रिया उपादेय है। पुण्य को चाहो अच्छी बात है लेकिन, पुण्य के फल को नहीं चाहना। पुण्य के फल में कभी बुद्धि उल्टी भी चल सकती है और वह उस पुण्य को भोगों में लगाकर दुर्गति का पात्र बन सकता है, इसलिये पुण्य के फल की चाह मत करो। पुण्य के फल को हेय मानोगे और पुण्य की क्रिया को उपादेय मानोगे तो आप सच्चे सम्यक् दृष्टि बनकर अपने जीवन पुण्यमयी बनालोगे।</p>
<p><strong>श्रीसिद्धचक्र महामंडल विधान 4 अक्टूबर से</strong></p>
<p>आगामी 4 अक्टूबर से 12 अक्टूबर तक मुनिसंघ के सान्निध्य में श्रीसिद्धचक्र महामंडल विधान जो कि संस्कृत में मुनि श्री के मुखारविंद से होगा यह पुण्य कमाने का श्रेष्ठ अवसर है। जिसको भी इसमें भाग लेना है। वह अपने परिवार के साथ एक मंडल की बुकिंग करा सकता है। स्थान सीमित है, पहले आओ पहले पाओ के आधार पर इस चातुर्मास में पुण्य कमाने का यह अंतिम अवसर सभी के सामने है। रविवार को मुनिसंघ के सानिध्य में दोपहर1.30 बजे से भोपाल जैन समाज द्वारा श्री विद्याप्रमाण गुरुकुलम् में वृहद क्षमावाणी पर्व का आयोजन है। कार्यक्रम उपरांत सभी की भोजन व्यवस्था की गई है। कार्यक्रम में सभी जैन समाज बंधुओं को सादर आमंत्रित किया गया है।</p>
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