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	<title>श्रीराम &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>श्रीराम &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>श्रीराम और तीर्थंकर महावीर के बीच वंश परंपरा का मधुर संबंध : मन पर नियंत्रण बनाना होगा। मन हमेशा दुख देता है -महावीर </title>
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		<pubDate>Wed, 25 Mar 2026 14:06:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[चैत्र महीने का सीधा संबंध महापुरुषों के जन्मों के साथ जुड़ा हुआ है। चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की नवमी को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जन्मोत्सव आता है तो जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म कल्याणक (जन्म जयंती) भी चैत्र महीने में ही शुक्ल की त्रयोदशी को मनाया जाता है। महावीर जयंती [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>चैत्र महीने का सीधा संबंध महापुरुषों के जन्मों के साथ जुड़ा हुआ है। चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की नवमी को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जन्मोत्सव आता है तो जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म कल्याणक (जन्म जयंती) भी चैत्र महीने में ही शुक्ल की त्रयोदशी को मनाया जाता है। <span style="color: #ff0000">महावीर जयंती पर पढ़िए,-श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र का यह आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>चैत्र महीने का सीधा संबंध महापुरुषों के जन्मों के साथ जुड़ा हुआ है। चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की नवमी को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जन्मोत्सव आता है तो जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म कल्याणक (जन्म जयंती) भी चैत्र महीने में ही शुक्ल की त्रयोदशी को मनाया जाता है।</p>
<p>इन दो महान व्यक्तित्वों का जन्म चैत्र माह में ही सिर्फ 4 तिथियों के अंतर पर हुआ। हालांकि दोनों के जन्म में हजारों वर्षों का अंतर है। फिर भी दोनों के बीच एक मधुर, गहरा और अद्भुत संबंध है।</p>
<p>भगवान महावीर जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर हैं। इस महान परंपरा की तीर्थंकर परंपरा के प्रथमेश असि, मसि कृषि व अंक शब्दों के जनक प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव) से हुआ, जो कि पहले तीर्थंकर थे। भगवान आदिनाथ अयोध्या के राजा नाभि के पुत्र के रूप में जन्मे। यानी अयोध्या न केवल श्रीराम की जन्मभूमि रही है, बल्कि जैन परंपरा में भी अत्यंत पवित्र स्थान है, क्योंकि यहां चार अन्य तीर्थंकरों का जन्म भी हुआ अजितनाथ (दूसरे), अभिनंदननाथ (चौथे), सुमतिनाथ (पांचवें) और अनंतनाथ (14वें)।</p>
<p>संयोग से, भगवान आदिनाथ का जन्म भी चैत्र मास में ही हुआ था। हालांकि वह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि थी। उन्होंने सूर्यवंश की इक्ष्वाकु परंपरा की स्थापना की, वही वंश जिसमें कई पीढ़ियों बाद भगवान श्रीराम का जन्म हुआ। इस सदी के चौबीस तीर्थंकरो में से तीन तीर्थंकरों, वासु पूज्य स्वामी, मुनि सुव्रतनाथ व नेमिनाथ तीर्थंकर को छोड़कर बाक़ी इक्कीस तीर्थंकर इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न हुए। इस प्रकार, भगवान महावीर की जैन परंपरा और भगवान श्रीराम की वंशावली दोनों की जड़ें भगवान आदिनाथ से जुड़ती हैं।</p>
<p>त्रिशष्टिशलाका पुरुषचरियं, पउम चरियं, पद्मपुराण साहित्यक ग्रंथों में मर्यादा पुरुषोत्तम राम का उल्लेख सम्मिलित है। चौथे आरे के बीसवें तीर्थंकर मुनि सुव्रत स्वामी के समय में श्रीराम का उल्लेख मिलता है। जैन साहित्य अनुसार श्रीराम को बलदेव माना गया है जो कि 63श्लाघ्य पुरुष में आते हैं, तो एक दार्शनिक परंपरा है, दूसरी जैविक। यह संबंध केवल भूगोल, वंश और नामों तक सीमित नहीं है। यह गहराई तक विचार और मूल्य व्यवस्था में रचा-बसा है। चाहे तीर्थंकर हों या श्रीराम, सभी ने धर्म की भावना को जीवन का मूल बनाया। इक्ष्वाकु वंश का नाम ही &#8216;इक्षु&#8217; अर्थात गन्ने से लिया गया है। सरयू नदी के तट पर बसे अयोध्यावासी गन्ने की खेती करते थे थे और उसका रस निकालना जानते थे। यह बात तब और स्पष्ट हो जाती है जब हम पाते हैं कि भगवान ऋषभदेव ने अपने पौत्र श्रेयांस कुमार के हाथों हस्तिनापुर शहर में अपने 400 दिवसीय उपवास को अक्षय तृतीया के दिन गन्ने के रस को स्वीकर कर उस कठिन तपस्या का पारणा संपन्न किया।</p>
<p>विस्तृत गहराई से अगर अध्ययन किया जाए तो दोनों महापुरुषों ने सत्य, धर्म व सात्विक जीवन शैली तथा पर पीड़ा नहीं पहुँचाने का प्रयास ही नहीं किया अपितु जनमानस को संदेश भी दिया।</p>
<p>अनेक प्रकार से देखा और समझा जा सकता है कि मूलतः धर्म की आत्मा हमें यह सिखाती है कि मानव जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा है। चाहे वो तीर्थंकर हों या मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम। धर्म वह स्वभाव है जो हर मानव के भीतर प्राकृतिक रूप से निहित है।</p>
<p>तीर्थंकर वर्द्धमान महावीर ने वर्तमान समय में व्यथित व कुंठित जनमानस को संदेश देते हुए कहा कि सर्व प्रथम मन पर नियंत्रण बनाना होगा। मन हमेशा दुख देता है। मन की इच्छाएँ अनंत हैं, वह कभी भी पूर्ण नहीं होता है। अगर एक इच्छा पूरी होगी तो उसके साथ सौ नई इच्छाएँ शुरू हो जाएँगी। ऐसे में सभी इच्छाएँ पूरी होंगी, इसकी कल्पना भी संभव नहीं है। जैसे ही इच्छा अपूर्ण हुई, मन विचलित होगा और दुख देगा। यही दुख और दूसरी इच्छाओं के अपूर्ण होने पर बढ़ता जाएगा। एक समय यह आएगा कि अनंत इच्छाओं की अपूर्णता लिए मन दुखों का अंबार उडेल देगा और पूरा जीवन दुखों के भंवर में उलझ जाएगा। बेहतर यही है कि मन पर नियंत्रण बनाओ और उसके साथ जीवन की इच्छाओं पर भी। अगर हम यह करने में सफल रहे तो गृहस्थ में रहकर भी मुक्ति का मार्ग पकड़ लेंगे। हम अनंत इच्छाओं के समुद्र में रहकर भी शांत और सुखी रहेंगे। सुख कोई वस्तु नहीं है, यह केवल मन की अवस्था है। दुख कोई वस्तु नहीं है, यह भी अवस्था है। अगर मन पर नियंत्रण होगा तो सुख और दुख की अवस्था पर भी नियंत्रण होगा। अगर मन नियंत्रित होगा तो इच्छाओं पर नियंत्रण होगा और जब इच्छाएँ नियंत्रण में आ जाएँगी, जीवन प्रसन्नता से भर जाएगा और जीव आनंद की अनुभूति करेगा। जीवन में मुक्ति क्या है&#8230; आनंद ही तो है। जब आनंद की अवस्था मिल गई तो समझ लो जीवन से मुक्ति मिल गई। उस अवस्था को पाने का प्रयास ही मुक्ति का मार्ग है।</p>
<p>यही मुक्ति का मार्ग तीर्थंकर वर्द्धमान ने व मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने स्वीकार किया तभी वर्षों उपंरात भी उनके कथन सदैव जीवन में नया संदेश देते है।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन :  श्रीराम आदर्श और मर्यादा पुरुष थे &#8211; मुनि अपूर्व सागर </title>
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		<pubDate>Thu, 18 Apr 2024 07:38:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पंचम पट्टाधीश आचार्य वर्धमान सागर जी के शिष्य मुनि अपूर्व सागर मुनि अर्पित सागर धरियावद विराजित हैं। रामनवमी के अवसर पर धर्म सभा में उपदेश में मुनि अपूर्व सागर ने बताया कि रघुकुल रीति सदा चली आई प्राण जाए पर वचन नहीं जावे। इस बात को जीवन में श्रीराम ने चरितार्थ कर आदर्श एवं मर्यादा [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>पंचम पट्टाधीश आचार्य वर्धमान सागर जी के शिष्य मुनि अपूर्व सागर मुनि अर्पित सागर धरियावद विराजित हैं। रामनवमी के अवसर पर धर्म सभा में उपदेश में मुनि अपूर्व सागर ने बताया कि रघुकुल रीति सदा चली आई प्राण जाए पर वचन नहीं जावे। इस बात को जीवन में श्रीराम ने चरितार्थ कर आदर्श एवं मर्यादा पुरुष के रूप में विश्व में विख्यात हुए रघुकुल कौशल्या के श्री राम का आज जन्म जयंती दिवस है, हमने दशरथ का नाम नहीं लिया कौशल्या का राम कहा क्योंकि वह ऐसी मां थी जिसने राम को संस्कारित किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>धरियावद।</strong> पंचम पट्टाधीश आचार्य वर्धमान सागर जी के शिष्य मुनि अपूर्व सागर मुनि अर्पित सागर धरियावद विराजित हैं। रामनवमी के अवसर पर धर्म सभा में उपदेश में मुनि अपूर्व सागर ने बताया कि रघुकुल रीति सदा चली आई प्राण जाए पर वचन नहीं जावे। इस बात को जीवन में श्रीराम ने चरितार्थ कर आदर्श एवं मर्यादा पुरुष के रूप में विश्व में विख्यात हुए रघुकुल कौशल्या के श्री राम का आज जन्म जयंती दिवस है, हमने दशरथ का नाम नहीं लिया कौशल्या का राम कहा क्योंकि वह ऐसी मां थी जिसने राम को संस्कारित किया। उसके लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। राम को आदर्श एवं मर्यादा पुरुष के रूप में विश्व जानता है। जिन पुरुषों का जीवन अनुकरणीय होता है, वे आदर्श पुरुष कहलाते हैं। मर्यादा पुरुष श्री राम में गुणों का भंडार था। संपूर्ण जीवन में अनेक गुण देखे गए हैं। भगवान का गुणानुवाद कठिन है। श्री राम न्यायवान, नीति वान, सदाचारी, संतोषी, मृदु भाषी, निस्पृही, सकारात्मक सोच रखने वाले आत्मज्ञानी, सज्जन, धैर्यवान आदर्श पुरुष थे। आज भारत के हर देश गांव में श्री राम का नारा लिखा है। मैं आज वीतरागी श्री राम की बात कर रहा हूं। धनुष बाण धारी श्री राम की बात नहीं कर रहा हूं। पवित्र न्यायवान मोक्ष गामी श्री राम का जन्म 1008 मुनि सुव्रतनाथ भगवान के समय हुआ है। वह मांगीतुंगी महाराष्ट्र से मोक्ष गए। मर्यादा पुरुष श्री राम के गुण ग्राही हैं। हमारे पास भी अनंत गुण शक्ति है। हम उनका उपयोग नहीं करते इस कारण हम अपने मंजिल तक नहीं पहुंच पाए।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-59073" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-18-at-12.47.28-PM-scaled.jpeg" alt="" width="2560" height="1920" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-18-at-12.47.28-PM-scaled.jpeg 2560w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-18-at-12.47.28-PM-300x225.jpeg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-18-at-12.47.28-PM-1024x768.jpeg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-18-at-12.47.28-PM-768x576.jpeg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-18-at-12.47.28-PM-1536x1152.jpeg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-18-at-12.47.28-PM-2048x1536.jpeg 2048w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-18-at-12.47.28-PM-74x55.jpeg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-18-at-12.47.28-PM-111x83.jpeg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-18-at-12.47.28-PM-215x161.jpeg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-18-at-12.47.28-PM-990x743.jpeg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/04/WhatsApp-Image-2024-04-18-at-12.47.28-PM-1320x990.jpeg 1320w" sizes="(max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /><br />
<strong>खोने का दुख न करें</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि श्री राम ने पिता की आज्ञा का, वचन की मर्यादा रख पालन किया, 14 वर्ष वनवास गए। राज्य सिंहासन पर केकई का भारत के प्रति राग होने से वह वन गए। गुणानुवाद इसलिए किया जाता है कि आप हम अपनी शक्ति पहचानें। अशुभ पाप कर्मों के उदय से पुण्य क्षीण कमजोर हो जाता है। इसलिए श्री राम को राज्य नहीं मिला और जिसका पुण्य प्रबल होता है उसे दूर की वस्तु भी मिल जाती है। हमारे साथ जो घटित हो रहा है, वह हमारे कर्मों के उदय के कारण हो रहा है। इष्ट, अनिष्ट में हमारा पुण्य- पाप काम करते हैं। अशोक जेठावत और नमन भैया अनुसार मुनि श्री ने बताया कि सकारात्मक सोच श्री राम में थी।</p>
<p>समय से पूर्व और भाग्य से ज्यादा किसी को मिलता नहीं है। श्री राम का चिंतन विचार मनन करने की जरूरत है। श्री राम जानते थे राज गद्दी स्थाई नहीं है। पूर्व जन्मों में भी हमने राज पाठ किया है। श्री राम घर में बैरागी थे। मुनि श्री ने सूत्र दिया कि किसी को भी गुस्से में निर्णय नहीं लेना चाहिए और खुशी में वादा नहीं करना चाहिए। दशरथ का खुशी में वादा केकई को जो किया था उस कारण श्री राम को राजपाठ का त्याग करना पड़ा। व्यक्ति को नियति हालात पर सब कुछ छोड़ देना चाहिए क्योंकि हमारे अशुभ भावों से हालात उत्पन्न होते हैं। जिनेन्द्र भगवान के धर्म को समझना चाहिए। हम कुछ भी लेकर नहीं आए थे, इस कारण उसके खोने का दुख नहीं करना चाहिए। खाली हाथ आए थे खाली हाथ जाना है।</p>
<p>राज पाठ या पद किसी और का था , आज हमारे पास है, बाद में किसी और का होगा, यह चिंतन हृदय में शांति देता है। श्री राम प्रभु ने पुरुषार्थ और पुण्य के साथ वनवास खाली हाथ गए। यहां चिंतन की बात यह है कि कैकई ने राजा दशरथ से सिर्फ भरत का राज्य सिंहासन मांगा था। उन्होंने श्री राम के वनवास की बात नहीं कही थी। किंतु भाई का भाई के प्रति प्रेम था श्री राम का भरत के प्रति प्रेम था। वह जानते थे कि अगर मैं अयोध्या में रहूंगा तो भरत भी राज्य स्वीकार नहीं करेंगे और जनता भी भरत को राजा स्वीकार नहीं करेगी। इस कारण वह वन में गए। लक्ष्मण का अपने भाई के प्रति प्रेम था कि उसने भी अपने भाई को अकेले वन में नहीं जाने दिया।</p>
<p>पत्नी सीता का भी पति के प्रति प्रेम था कि वह भी जंगल गई। जब श्री राम ने उन्हें मना किया कि आप यहीं रहो तो सीता का कहना था कि मैं आपके आगे आगे चलकर कंकर और कांटों को दूर करूंगी ताकि आपको दुख नहीं हो। आज की सीता क्या करती आज वह तलाक ले लेती। वन में श्री राम और सीता लक्ष्मण का पुण्य था कि उन्होंने वहां पर मुनि राज को आहार भी दिया और आज के श्रावक आहार नहीं देते हैं क्योंकि उन्हें अशुद्ध खानपान का त्याग करना होता है। लक्ष्मण के चरित्र की चर्चा करते हुए मुनिराज ने बताया कि लक्ष्मण ने कभी भी सीता का चेहरा नही देखा केवल चरणों को ही देखा। यह आदर्श प्रेम अपने जीवन में परिवर्तन लेने का संदेश देते हैं तभी महापुरुषों की जयंती मनाना सार्थक होगी</p>
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		<title>प्राण प्रतिष्ठा का भव्य कार्यक्रम :  रामलला के शिखर पर सूर्य है, जैन चिह्न नहीं </title>
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		<pubDate>Mon, 22 Jan 2024 08:18:11 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[कुछ लोग व्हाट्स अप शिखर पर सूर्य को जैन चिह्न बता रहे हैं, जो कि गलत है। श्रीफल जैन न्यूज की अपील है, ऐसी भ्रामक पोस्ट को किसी भी ग्रुप में फॉरवर्ड न करें। पढ़िए यह रिपोर्ट&#8230; इंदौर। अयोध्या में प्रभु श्रीराम की अति सुंदर प्रतिमा को स्थापित किया गया। यह मूर्ति काले रंग की [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>कुछ लोग व्हाट्स अप शिखर पर सूर्य को जैन चिह्न बता रहे हैं, जो कि गलत है। श्रीफल जैन न्यूज की अपील है, ऐसी भ्रामक पोस्ट को किसी भी ग्रुप में फॉरवर्ड न करें।<span style="color: #ff0000"> पढ़िए यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>इंदौर।</strong> अयोध्या में प्रभु श्रीराम की अति सुंदर प्रतिमा को स्थापित किया गया। यह मूर्ति काले रंग की शालिग्राम पत्थर से बनाई गई है जिसे कर्नाटक के मूर्तिकार अरुण योगराज ने तैयार किया है। रामलला की प्रतिमा को इस तरह से निर्मित किया गया है कि इसमें कई और प्रतिमाएं भी दिखाई दे रही है।</p>
<p>राम लला की श्यामल प्रतिमा में भगवान विष्णु के सभी दशावतारों की प्रतिमाएं उकेरी गई हैं। मस्तक की ओर स्वस्तिक, सूर्य, चक्र, गदा, ॐ उकेरा गया है। प्रतिमा में विष्णु जी के वाहन गरुड़ देव को भी उकेरा गया है। प्रतिमा में राम भक्त हनुमान जी की मूर्ति भी उकेरी गई है। कुछ लोग व्हाट्स अप शिखर पर सूर्य को जैन चिह्न बता रहे हैं, जो कि गलत है। श्रीफल जैन न्यूज की अपील है, ऐसी भ्रामक पोस्ट को किसी भी ग्रुप में फॉरवर्ड न करें।</p>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग सत्र : बिना मन को मारे राम नहीं बना जा सकता &#8211; मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 30 Mar 2023 13:41:07 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
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					<description><![CDATA[इंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि निरंजन सागर महाराज ने कहा कि आज हम उन्हें याद करेंगे, जो हम सभी के अन्तरंग मे रमा है, जिसे राम कहते हैं। पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा/संजय जैन हटा की विशेष रिपोर्ट&#8230; हटा। साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि निरंजन सागर महाराज ने कहा कि आज हम [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>इंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि निरंजन सागर महाराज ने कहा कि आज हम उन्हें याद करेंगे, जो हम सभी के अन्तरंग मे रमा है, जिसे राम कहते हैं। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा/संजय जैन हटा की विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>हटा।</strong> साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि निरंजन सागर महाराज ने कहा कि आज हम उन्हें याद करेंगे, जो हम सभी के अन्तरंग मे रमा है, जिसे राम कहते हैं। श्री रामजी का जीवन, राजभवन से वन और वन से राजभवन एवं पुनः राजभवन से वन की यात्रा का एक ऐसा जीवन्त अनोखा उदाहरण है, जिसने सम्पूर्ण विश्व को एक आदर्श मार्ग दिखा दिया।</p>
<p>सम्पूर्ण विश्व के इतिहास में ऐसे दो महापुरुष हुये है, जो सर्वाधिक प्रसिद्धि को प्राप्त हुये हैं। एक हैं भगवान आदि ब्रह्मा आदिनाथ, जिन्हें ऋषभनाथ, वृषभनाथ भी कहते हैं। जिनके पुत्र सम्राट भरत चक्रवर्ती के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा। दूसरे हैं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी। दोनों महापुरुषों में कई समानताएं है।</p>
<p>जैसे दोनों का जन्म नवमी के दिन ही हुआ। दोनों का जन्म चैत्र मास में ही हुआ। दोनों उसी भव से मोक्ष को प्राप्त हुये। दोनों के पुत्र परम पराक्रमी थे। दोनों शलाका अर्थात् प्रसिद्ध पुरुष थे। दोनों उत्तम लक्षणों से युक्त शरीर के धारी थे। दोनों देवताओं की तरह ही रूप लावण्य धारी थे अर्थात् दोनों के दाढी-मूंछ आदी नहीं थे।</p>
<p><strong>विश्वव्यापी हैं राम</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि राम विश्वव्यापी व्यक्तित्व हैं। जैनाचार्यों ने भी श्री रामजी के जीवन को विश्व के सामने रखा है। आचार्य रविषेण जी महाराज द्वारा लिखित ग्रन्थराज पद्मपुराण, जो की पद्म अर्थात् राम के जीवन के जानने का सशक्त माध्यम है एवं आचार्य गुणभद्र कृत उत्तर पुराण में भी रामजी का जीवन वृतान्त अंकित है। पूरे विश्व मे लगभग हजार प्रकार से राम का जीवन पढ़ने को प्राप्त होता है।</p>
<p>जब भी राम जी के जीवन के चक्र पर चिन्तन करते हैं हर बार एक नया राम सामने आता है। एक ऐसा महापुरुष, जिसने अपने लिये नहीं बल्कि दूसरों के लिये ही जीवन जिया है। पहले पिता के वचनों का मान रखा, फिर पत्नी के सम्मान के लिए युद्ध किया और फिर एक न्यायप्रिय राजा होने के नाते सीता सती की परीक्षा तक के डाली।</p>
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		<title>आचार्यश्री विद्यासागर महाराज जी के प्रवचन गत वर्ष:  राम को जानना स्वयं का कायाकल्प करना है </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/to_know_rama_is_to_rejuvenate_oneself/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 30 Mar 2023 10:06:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Vidyasagar Maharaj]]></category>
		<category><![CDATA[Discourse श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
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		<category><![CDATA[Shri Ram]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य विद्यासागर महाराज]]></category>
		<category><![CDATA[इंदौर]]></category>
		<category><![CDATA[जैन धर्म]]></category>
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		<category><![CDATA[प्रवचन]]></category>
		<category><![CDATA[भगवान राम]]></category>
		<category><![CDATA[रामनवमी]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीराम]]></category>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के अनुसार राम को जानना और रामायण को जानना अलग-अलग है। राम को जानना स्वयं की कायाकल्प करना है, तन-मन और आत्मा का परिवर्तन भिन्न होता है। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट&#8230; इंदौर। आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के अनुसार राम को जानना और रामायण को जानना अलग-अलग है। राम को [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के अनुसार राम को जानना और रामायण को जानना अलग-अलग है। राम को जानना स्वयं की कायाकल्प करना है, तन-मन और आत्मा का परिवर्तन भिन्न होता है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>इंदौर।</strong> आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के अनुसार राम को जानना और रामायण को जानना अलग-अलग है। राम को जानना स्वयं की कायाकल्प करना है, तन-मन और आत्मा का परिवर्तन भिन्न होता है। सधर्मी के लिए सहोदर भी उस उदर को छोड़ने तैयार हो जाता है, जिसमें धर्म की रक्षा ना होती हो। विभीषण के लिए राम बैरी (दुश्मन), रावण बंधु सहोदर फिर भी विभीषण आधी रात लंका छोड़कर राम के दल में पहुंचाता है, जहां पूरा राम दल मंत्रणा कर रहा था।</p>
<p>दुश्मन के मिलने आने पर आगबबूला हुए लक्ष्मण और दिन में आने की बात कहते हैं पर राम लक्ष्मण को शांति का आदेश देकर विभीषण को बुला लेते हैं क्योंकि विभीषण ने अभय के साथ मिलने का समय मांगा था। राम की यही शांति की धारा आज विश्व की जरूरत है। आज सारा संसार चारों ओर शत्रुता युद्ध और भय के वातावरण में है।</p>
<p>संसार के सारे देश चुप और संदेह में कब क्या हो जाए, कहां विस्फोट हो जाए। पर भारत ने युद्ध विराम के लिए बोलना शुरू कर दिया तो सारे देश भारत के विचारों का समर्थन करने लगे। यही राम का काम और नाम भारत में रामनवमी का यही तो महत्व है पर याद रखो, हम राम को मानते हैं और राम की बात को भी मानते हैं। तभी भारत महान बनेगा।</p>
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