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	<title>शताब्दी महोत्सव &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>शताब्दी महोत्सव &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>आचार्य शांति सागर आचार्य पदारोहण शताब्दी महोत्सव में उमड़े समाजजन : नए आजीवन नियम व्रत लेने वालों का किया सम्मान </title>
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		<pubDate>Fri, 14 Nov 2025 13:36:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[उस समय समवशरण की रचना का वर्णन आता है जिससे तीर्थंकर भगवान धर्म देशना देते हैं। वर्तमान में समवशरण नहीं है, अब जिनालय का निर्माण किया जाता है। यह मंगल देशना आचार्य शांति सागर के आचार्य पदारोहण शताब्दी महोत्सव अंतर्गत आचार्य श्री की प्रतिमा स्थापना के अवसर पर धर्मसभा में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी [&#8230;]]]></description>
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<p>उस समय समवशरण की रचना का वर्णन आता है जिससे तीर्थंकर <strong>भगवान धर्म देशना देते हैं। वर्तमान में समवशरण नहीं है, अब जिनालय का निर्माण किया जाता है। यह मंगल देशना आचार्य शांति सागर के आचार्य पदारोहण शताब्दी महोत्सव अंतर्गत आचार्य श्री की प्रतिमा स्थापना के अवसर पर धर्मसभा में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रकट की। <span style="color: #ff0000">टोंक से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>टोंक।</strong> पहले तीर्थंकर भगवान धर्म तीर्थ का प्रवर्तन करते थे। उस समय समवशरण की रचना का वर्णन आता है जिससे तीर्थंकर भगवान धर्म देशना देते हैं। वर्तमान में समवशरण नहीं है, अब जिनालय का निर्माण किया जाता है। यह मंगल देशना आचार्य शांति सागर आचार्य पदारोहण शताब्दी महोत्सव अंतर्गत आचार्य श्री शांति सागर जी की प्रतिमा स्थापना के अवसर पर धर्मसभा में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रकट की। उन्होंने कहा कि जिनालय भी निर्माण भी समवशरण के बराबर ही है। प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज के समाज पर अनंत उपकार है ,आचार्य श्री शांतिसागर जी नहीं होते तो हम भी नहीं होते। वर्तमान श्रमण परंपरा नहीं होती।समाज द्वारा साधुओं की समाधि स्थल के लिए कार्य योजना बनाई गई किंतु विघ्न आने से पुण्यदाता परिवार द्वारा गुरु मंदिर निर्माण का संकल्प लिया गया।</p>
<p>गुरु मंदिर का निर्माण उससे अधिक पुण्य का कार्य है। महान पुरुषों के दर्शन करने से पुण्य में वृद्धि होती है। गुरु मंदिर निर्माण से सभी को दर्शन का लाभ मिलेगा उनके गुणों का स्मरण करने से पुण्य अर्जित करेंगे। कलई परिवार ने द्रव्य का उपयोग कर गुरु मंदिर बनाया है। गुरु के दर्शन भी भगवान के दर्शन के बराबर है क्योंकि, णमोकार मंत्र में आचार्य साधु परमेष्ठी का वर्णन है सभी को पुण्य अर्जित कर धर्म से लगाव होना चाहिए। धर्म के प्रति लगाव से सुख शांति और समृद्धि होकर पुण्य में वृद्धि होती है। कमल सराफ के अनुसार आचार्य श्री ने आगे बताया कि प्रतिदिन सभी को भगवान के दर्शन अभिषेक पूजन के साथ आचार्य श्री शांति सागर जी के दर्शन पूजन करना चाहिए।</p>
<p>चातुर्मास वर्षा योग समिति द्वारा दोपहर को अभिनंदन समारोह आयोजित किया गया। जिसमें आचार्य श्री वर्तमान सागर जी का पूजन नगर के अनेक सांस्कृतिक संगठनों द्वारा महिला मंडल द्वारा संगीत में पूजन की गई। आचार्य श्री के पूजन के बाद अचार्य संघ में लगातार चौक आहार विहार में सहयोग करने वाले बाल ब्रह्मचारी गज्जू भैया, तारा दादी, परमीत, छोटू भैया समर कंठाली, सनत जैन इंदौर, निर्मला दीदी, प्रेमलता पाटनी आदि का स्वागत सम्मान किया गया। जिन लोगों ने नए आजीवन नियम व्रत लिए उनका सम्मान किया।</p>
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		<title>आचार्य श्री शांति सागर जी का आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव : दो दिवसीय कार्यक्रम में हुए विविध विधि-विधान और धार्मिक क्रियाएं  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 06 Oct 2025 12:02:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज का आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव का दो दिवसीय कार्यक्रम अनेक भव्य कार्यक्रमों के साथ सानंद हुआ। सन 1872 में जन्मे श्री सातगोंडा ने श्री देवेंद्रकीर्ति स्वामी से सन 1915 में क्षुल्लक एवं सन 1920 में मुनि दीक्षा ली। आपका नाम मुनि श्री शांति सागर जी किया गया। टोंक [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज का आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव का दो दिवसीय कार्यक्रम अनेक भव्य कार्यक्रमों के साथ सानंद हुआ। सन 1872 में जन्मे श्री सातगोंडा ने श्री देवेंद्रकीर्ति स्वामी से सन 1915 में क्षुल्लक एवं सन 1920 में मुनि दीक्षा ली। आपका नाम मुनि श्री शांति सागर जी किया गया। <span style="color: #ff0000">टोंक से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>टोंक।</strong> प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की अक्षुण्ण मूलबाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधी आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज अतिशय क्षेत्र टोंकनगर में 57वां वर्षायोग कर रहे हैं। प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज का आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव का दो दिवसीय कार्यक्रम अनेक भव्य कार्यक्रमों के साथ सानंद हुआ। सन 1872 में जन्मे श्री सातगोंडा ने श्री देवेंद्रकीर्ति स्वामी से सन 1915 में क्षुल्लक एवं सन 1920 में मुनि दीक्षा ली। आपका नाम मुनि श्री शांति सागर जी किया गया। संयमी जीवन में, सर्प , सिंह, चींटी, मकोड़े,मानवजन्य के अनेक उपसर्गों को नाम के अनुरूप समता भाव धारण कर सहन किया। सन 1924 आश्विन शुक्ल ग्यारस को आपको आचार्य पद दिया गया। उस दिन 4 दीक्षा दीं। जिनवाणी जिनालयों और धर्म संस्कृति की रक्षा की। जीवन में 9938 उपवास किए। 88 भव्य आत्माओं की दीक्षा दी।</p>
<p><strong>मुनि दीक्षा शताब्दी महोत्सव पारसोला से प्रारंभ हुआ </strong></p>
<p>राजस्थान सरकार के राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के संघ सानिध्य में 3 ओर 4 अक्टूबर 2025 आश्विन शुक्ल 11 एवं 12 से विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों से साथ राष्ट्रीय स्तर पर प्रारंभ हुआ। श्रीजी के पंचामृत अभिषेक मानव चलित श्रीजी की रथयात्रा, ध्वजारोहण भूमिशुद्धि, आचार्य श्री के प्रवचन ,प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर विधान शाम को श्रीजी की आरती ,भजन संध्या का आयोजन हुआ। आचार्य श्री ने प्रवचन में बताया कि हम सभी का सौभाग्यशाली हैं कि 20 वीं सदी के सर्वप्रथम दिगम्बर प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी का आचार्य पद का शताब्दी तथा मुनि श्री वीरसागर जी और मुनि श्री नेमिसागर जी का मुनि दीक्षा शताब्दी महोत्सव पारसोला से प्रारंभ हुआ है और महोत्सव निरंतर आगे भी चलेगा क्योंकि, गुरु का गुणानुवाद समय का मोहताज नहीं है। हर दिन हर समय किया जाता है। आपने आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज के संयम उपकरण पिच्छी कमंडल शास्त्र और सिंहासन का अवलोकन किया। आश्विन शुक्ल एकादशी सन 1924 को 4 दीक्षा देने कारण श्री शांतिसागर जी को आचार्य पद इसी दिन दिया गया। संलेखना के समय प्रथम मुनि शिष्य श्री वीरसागर जी को उन्होंने समाधि के पूर्व आचार्य पद देकर यही आदेश दिया कि परंपरा का निर्दाेष पालन करना और अपने समाधि के पूर्व अपने योग्य शिष्य को आचार्य पद देना। आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा तब से निरंतर निर्दाेष रूप से गुरु परंपरा अनुसार चल रही है।</p>
<p><strong>श्रीजी की विशाल यात्रा महावीर जिनालय अहिंसा सर्किल से प्रारंभ हुई</strong></p>
<p>आचार्य पद से धर्म प्रभावना होती है। आचार्य श्री शांतिसागर जी ने चरित्र के सभी छह अंगों का पालन कर जीवन को प्रयोगशाला बनाया। मृत्यु श्रावक की होती है और संलेखना श्रमण साधु की होती है। यह मंगल देशना प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज के आचार्य पदप्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव के दो दिवसीय कार्यक्रम में पंचम पट्टाधीशआचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रकट की। गुरुभक्त राजेश पंचोलिया के अनुसार आओ शांति मार्ग पर चले के दिव्य संदेश के आह्वान पर आचार्य श्री वर्धमान सागरजी संघ सानिध्य में श्रीजी की विशाल यात्रा महावीर जिनालय अहिंसा सर्किल से प्रारंभ हुई। जिसमें भारतवर्ष के विभिन्न राज्यों के वेशभूषा परिधानों का विशेष आकर्षण रहा। बुलेट गाड़ियों, घोड़े और ऊँट, जिनध्वजा युवा लहराते हुए शोभायमान दृष्टिगत हुए। ढोल-नगाड़ों, बैंड की मधुर ध्वनियों से आच्छादित लहरियों पर युवक-युवतियां थिरक कर भक्ति प्रदर्शित कर रहे थे।</p>
<p><strong>3 किमी की शोभा यात्रा 4 घंटे में पहुंची </strong></p>
<p>पाँच गज (हाथी) पर चयनित कल्पना सुशील कार्वा उदयपुर मुंबई सौंधर्म इंद्र, चक्रवर्ती अलका सुनील जवेरी संघपति परिवार मुंबई,कुबेर, यज्ञ नायक पूर्वा समर कंठाली इंदौर तथा कुबेर इंद्र पुष्पा मोहनलाल छामुनिया तथा श्रुतदेवी जिनवाणी माता को लेकर कन्हैयालाल बारवास परिवार हाथियों पर सवार होकर धर्म प्रभावना कर रहे। अनेक बग्घियों पर इंद्र तथा विशिष्ट गणमान्य अतिथि गृहस्थ अवस्था भोज के परिजन, बारामती के चंदू काका परिवार,श्री अरविंद दोषी परिवार विराजित हुए। शोभा यात्रा में श्री जी आचार्य संघ की आरती की। पुष्प वृष्टि से स्वागत नगर के सभी राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक संगठनों ने कर सामाजिक सदभावना का परिचय दिया। लगभग 3 किमी की शोभा यात्रा 4 घंटे में प्रमुख मार्गाे से होते हुए आर एन फार्म हाउस पहुंची। नगर में सैकड़ों बैनर लगाए गए। प्रशासन द्वारा भी जुलूस की समुचित व्यवस्था की तथा 100 से अधिक नगरों के समाज जान यहां उपस्थित हुए।</p>
<p><strong> पंजाब बैंड की प्रस्तुति आकर्षण का केंद्र </strong></p>
<p>कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु ,मध्यप्रदेश, राजस्थान दिल्ली, गुजरात ,छत्तीसगढ़,बिहार, असम पश्चिम बंगाल आदि अनेक राज्यों से गुरु भक्त कार्यक्रम में सम्मिलित हुए। लाखों भक्तों ने जिनवाणी और वात्सल्य वारिधी यू-ट्यूब से लाइव प्रसारण देखा। कार्यक्रम में आचार्य शांति सागर जी के गृहस्थ अवस्था कर्नाटक के तीसरी पीढ़ी के परिजन विशेष रूप से उपस्थित हुए। जुलूस में श्रावक श्राविकाएं बगैर जूते चप्पल के चल रहे थे। सभी मंडल डीजे, बैंड पार्टी की सुमधुर भजनों पर अनेक भक्त भक्ति नृत्य से प्रस्तुत कर रहे थे। पंजाब बैंड की प्रस्तुति आकर्षण का केंद्र बन गई। मंगल कार्यक्रम के पूर्व दिवस वर्षा कर इंद्र देवता ने नगर एवं भूमि की शुद्धता की। घटयात्रा कलश के पवित्र जल से भूमिशुद्धि की। ध्वज वंदन मंगल कलश स्थापना आदि समस्त मांगलिक क्रियाएं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में प्रतिष्ठाचार्य पंडित हंसमुख जी शास्त्री धरियावद के निर्देशन में हुई।</p>
<p><strong>आचार्य श्री शांतिसागर जी की डॉक्यूमेंट्री दिखाई </strong></p>
<p>ध्वजारोहण श्री अजीत मिंडा मुंबई ,मंडप उद्घाटन सुनील अग्रवाल जयपुर, दीप प्रवज्जलन अनिल सेठी बैंगलोर ,सुरेश सबलावत जयपुर ,राकेश सेठी कोलकाता धर्मचंद जैन टोंक ने किया। कलश स्थापना 6 प्रतिमा धारी सुशीला अशोक पाटनी किशनगढ़ आर के मार्बल ग्रुप ने किया। चरण प्रक्षालन का सौभाग्य अजीत मिंडा, राजकुमार सेठी जयपुर ,शास्त्र भेंट अंकेश जोबनेर ,निर्मल ,शांति, सुबोध सुमति छाबड़ा रायपुर दुर्ग ने तथा आचार्य शांतिसागर जी के सिंहासन, संयम उपकरण पिच्छी, कमंडल शास्त्र का अनावरण राजेश गुणमाला जवेरी मुंबई परिवार ने किया। प्रवचन के बाद आचार्य श्री शांतिसागर जी की डॉक्यूमेंट्री दिखाई गई। आचार्य ससंघ की आहार चर्या इसके बाद दोपहर को इंद्र प्रतिष्ठा सकलीकरण क्रिया हुई। जिसमें 125 प्रमुख और प्रति इंद्रों द्वारा आचार्य श्री शांति सागर मंडल विधान की पूजन की गई।</p>
<p><strong>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का पूजन कर द्रव्य अर्पित किए</strong></p>
<p>इस विधान के लिए यज्ञनायक स्पर्श समर कँठाली इंदौर द्वारा पूजन के सभी द्रव्यों के 100 थाल स्थापना, जल ,कलश, चंदन कलश अक्षत थाल प्रकार के देश-विदेश के पुष्प प्रकार के नैवेद्य में मिठाई नमकीन दीप थाल धूप प्रकार के विभिन्न फल सूखे मेवे अर्ध्य सभी द्रव्य सभी इंद्र परिवार द्वारा आचार्य श्री शांति सागर जी एवं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का पूजन कर द्रव्य अर्पित किए। मुनि श्री हितेंद्र सागर जी एवं आर्यिका श्री महायश मति जी ने विधान की पूजन कराई। पूजन के दौरान चढ़ाए जाने वाले द्रव्यों अर्ध्य में आचार्य श्री के गुणों बाबद भी बताया। दोपहर को मुनि श्री दर्शित सागर जी के केशलोचन हुए। दोपहर को आचार्य श्री वर्धमान सागर जी द्वारा प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी की नूतन प्रतिमा की विधि विधान मंत्रोच्चार से प्राणप्रतिष्ठा की गई। कार्यक्रम का सुंदर संचालन बसंत वेद ने किया। किशनगढ़ समाज ने आचार्य संघ को किशनगढ़ में आगमन शताब्दी महोत्सव एवं वर्ष 2026 का चातुर्मास करने हेतु श्रीफल अर्पित किया।</p>
<p><strong>आचार्य श्री की प्रेरणा से ही मूलाचार ग्रंथ का प्रकाशन </strong></p>
<p>रात्रि को श्री जी ओर आचार्य श्री की 2500 दीपक आरती की गई आमंत्रित कलाकारों ने मन मोहक भजनों की प्रस्तुति दी। दूसरे दिन4 अक्टूबर को उपदेश में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया कि आचार्य पद शताब्दी महोत्सव मनाना बहुत ही पुण्य का कार्य है। चार अक्टूबर को अनेक कार्यक्रम हो रहे हैं। दीक्षित मुनि अपने योग्यता गुणों के आधार पर आचार्य बनते हैं। आज आचार्य श्री शांति सागर जी की विशेषता ,उनके गुणों को वाणी से प्रकट करना कठिन है। चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ में उनकी अनेक विशेषता बतलाई है उन्होंने बाहर शरीर से अंतर्मुखी होकर आत्मा के ज्ञान को प्रकट किया और आत्मा में देखने चिंतन करने की प्रवृत्ति को जागृत रखा। देव शास्त्र गुरु हमें मार्ग दिखलाते हैं जिस मार्ग पर वह चले उसको उन्होंने स्वयं निर्मित किया। बने बनाए मार्ग पर चलने से ज्यादा कठिन नया मार्ग बनाकर उस पर चलना महत्वपूर्ण है। गुरु भक्त राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने आगे प्रवचन में बताया कि जीवन में धर्म को धारण कर दीक्षा से जीवन का उत्थान किया जाता है दीक्षा के साथ अहिंसा महाव्रत धारण किया जाता है। यह महाव्रत मन, वचन, काय शरीर से पालन किया जाता है। वाणी में कटुता होना भी हिंसा का सूचक है। 20वीं सदी के आचार्य श्री की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी वर्तमान में भी देखने को मिल रही है। साधु जीवन में मन ,वचन , काय से पवित्र होते हैं। साधु शूरवीर होते हैं वह अपनी आत्मा की वीरता से कर्म रूपी शत्रु से लड़ते हैं। आचार्य श्री शांति सागर जी के जीवन में सरलता, सत्य व्यवहार, धर्म के प्रति अनुराग ,और सब परिस्थितियों में समता भाव त्याग, तप आदि गुण थे। आचार्य श्री ने बताया कि हमें ऐसा लगता है कि हम पूर्व जन्म में भी जैन मुनि रहे हैं। इसी कारण उसे आगम चर्या का हम वर्तमान जीवन में पालन कर रहे हैं। जैन साधु के लिए मूलाचार ग्रंथ तब प्रकाशित नहीं था। आचार्य श्री की प्रेरणा से ही मूलाचार ग्रंथ का अब प्रकाशन हुआ है।</p>
<p><strong>संपूर्ण समाज के लिए मंगल आशीर्वाद दिया</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने सम्यक दर्शन ,सम्यक ज्ञान सम्यक चारित्र जिनागम को जीवन में धारण किया। समाधि के समय भी धर्म से वह परिपूर्ण रहे। और सिद्ध क्षेत्र कुंथल गिरी में 36 दिन की सल्लेखना धारण की। साधु मृत्यु पर विजय प्राप्त करते हैं। इस अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने संघपति जवेरी परिवार मुंबई ,गृहस्थ अवस्था के परिजनों ,चंदू काका बारामती परिवार, डॉ. कल्याण अग्रवाल ,अरविंद दोषी सहित पंडित हंसमुख शास्त्री, भागचंद जी एवं टोंक नगर की संपूर्ण समाज के लिए मंगल आशीर्वाद दिया। आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व अनेक विद्वानों ने , पंडित श्री हंसमुख जी धरियावद, ने भावांजलि प्रस्तुत की।आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व आर्यिका श्री महायश मति जी ने प्रथमाचार्य श्री ओर 9 के अंक का संयोग बताया जन्म दिनांक 27 ,जन्म वर्ष 1872, कमल की 1008 पंखुड़ी ,108 कमल , 18 वर्ष की उम्र, 36 मूलगुण, 36 दिन की सल्लेखना, 18 करोड़ जाप, समाधि दिनांक 18,समाधि माह सितंबर,,108 गुण आदि से भावांजलि प्रस्तुत की।मुनि श्री हितेंद्र सागर जी महाराज ने गुणानुवादमें बताया कि प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज बाल ब्रह्मचारी थे उनकी परंपरा में आचार्य वीर सागर जी, आचार्य श्री शिव सागर जी, आचार्य श्री धर्म सागर जी, आचार्य श्री अजीत सागर जी और वर्तमान पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी सभी बाल ब्रह्मचारी आचार्य हैं। अनेक उपसर्ग सहन किएबाहर से आमंत्रित भक्तों ने चित्र अनावरण कर दीप प्रवज्जलन कर चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भंेट की।</p>
<p><strong>कई आयोजन और सम्मेलन हुए </strong></p>
<p>टोंक नगर में भूगर्भ से प्रतिमाएं निकलने कारण आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने इसे अतिशय क्षेत्र घोषित किया है। प्रथमाचार्य श्री शांति सागर आचार्य पद शताब्दी प्रतिष्ठापना महोत्सव में पूर्व में पत्रकार संगोष्ठी, विद्वत संगोष्ठी, चार्टर्ड एवं एडवोकेट सम्मेलन, शिक्षक सम्मेलन, नारी, युवा सम्मेलन हो चुके है। भागचंद, धर्म चंद, कमल सराफ ,बीना छामुनिया ने बताया कि टोंक समाज द्वारा अनेक प्रकल्पों राष्ट्र सेवा, श्रुत जिनवाणी सेवा, श्रमण साधु सेवा माता-पिता की सहमति से जैन समाज में शादी करना आदि प्रकल्पों के लिए सांकेतिक 100 सदस्यों को देव शास्त्र एवं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के समक्ष संकल्पित कराया। इस अवसर पर गृहस्थ अवस्था की जन्म नगरी भोज से तीसरी पीढ़ी की पद्मश्री पाटिल, चौथी के किरण ,सुरेखा, कुमारी प्रणिता सहित उपस्थित हुए। बारामती के प्रसिद्ध संघपति चंदू काका के परिजन, अरविंद दोषी मुंबई के परिजन, संघ पति प्रतापगढ़ मुंबई के सुनील, अलका जवेरी ने भी सहभागिता की।</p>
<p><strong>यह समाजजन भी मौजूद रहे</strong></p>
<p>आचार्य श्री शांति सागर फाउंडेशन के अनिल सेठी बंगलौर, संजय पापड़ीवाल किशनगढ़, राकेश सेठी कोलकाता, सुरेश सबलावत जयपुर, सुनील अग्रवाल जयपुर राजकुमार सेठी जयपुर, अजीत मिंडा मुंबई, सुनील जवेरी मुंबई, डॉ. कल्याण गंगवाल, भरत जीरभार, समर कँठाली इंदौर, जय, शरद कार्वा उदयपुर, राजेश जवेरी मुम्बई सहित अनेक भक्त उपस्थित हुए। सभी के तन-मन-धन त्याग हेतु तिलक, माला, शॉल, श्रीफल से स्वागत कर स्मृति चिन्ह भेंट किया।</p>
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		<title>टोंक में आचार्य वर्धमान सागर जी के सानिध्य में हुआ इंद्र ध्वज महामंडल विधान का शुभारंभ: दशलक्षण महापर्व के अंतर्गत घट यात्रा, ध्वजारोहण और मंगल कलश स्थापना के साथ आयोजन </title>
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		<pubDate>Wed, 27 Aug 2025 13:51:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[प्रथमाचार्य आचार्य श्री शांति सागर महाराज आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव और दशलक्षण महापर्व के अंतर्गत टोंक नशियां में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में इंद्र ध्वज महामंडल विधान का आयोजन हुआ। इस अवसर पर घट यात्रा, ध्वजारोहण और मंगल कलश स्थापना हुई। आचार्य श्री ने उपदेश में समयदान को द्रव्य दान से [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>प्रथमाचार्य आचार्य श्री शांति सागर महाराज आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव और दशलक्षण महापर्व के अंतर्गत टोंक नशियां में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में इंद्र ध्वज महामंडल विधान का आयोजन हुआ। इस अवसर पर घट यात्रा, ध्वजारोहण और मंगल कलश स्थापना हुई। आचार्य श्री ने उपदेश में समयदान को द्रव्य दान से अधिक महत्वपूर्ण बताया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजेश पंचोलिया की पूरी रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>टोंक के श्री दिगंबर जैन नशियां में प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर महाराज की आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव अंतर्गत पर्युषण पर्व और दशलक्षण महापर्व के अवसर पर वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज संसंघ के सानिध्य में इंद्र ध्वज महामंडल विधान का भव्य आयोजन हुआ।</p>
<p>प्रातःकाल घट यात्रा, ध्वजारोहण, पंडाल उद्घाटन, मंगल कलश स्थापना और अंकुरारोपण सहित धार्मिक क्रियाएं विधानाचार्य पंडित कीर्तिय पारसोला के निर्देशन में आचार्य श्री के मंगल मंत्रोच्चार के साथ सम्पन्न हुईं।</p>
<p>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने उपदेश में कहा कि मध्य लोक के 458 अकृत्रिम जिनालयों की पूजन देवता करते हैं और ये जिन मंदिर 500 धनुष ऊँचाई के होते हैं। यह महामंडल विधान का अवसर अत्यंत पुण्यदायी है। उन्होंने बताया कि आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी ने अपने पुरुषार्थ से इंद्र ध्वज मंडल विधान की रचना की है।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-88719" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/08/IMG-20250827-WA0015.jpg" alt="" width="1600" height="963" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/08/IMG-20250827-WA0015.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/08/IMG-20250827-WA0015-300x181.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/08/IMG-20250827-WA0015-1024x616.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/08/IMG-20250827-WA0015-768x462.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/08/IMG-20250827-WA0015-1536x924.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/08/IMG-20250827-WA0015-990x596.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/08/IMG-20250827-WA0015-1320x794.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" />दस अंगों की चर्चा और तत्वार्थ सूत्र का वाचन </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि कोई भी कार्य तन, मन और धन के पुरुषार्थ से ही पूर्ण होता है। धार्मिक क्रियाओं में द्रव्य दान से अधिक समयदान महत्वपूर्ण है। प्राकृतिक आपदाएँ पुण्य अर्जन से टल जाती हैं। प्रतिदिन जिनालयों की अभिषेक-पूजन और भक्ति भाव से आराधना करनी चाहिए। दशलक्षण पर्व में धर्म के दस अंगों की चर्चा और तत्वार्थ सूत्र का वाचन भी किया जाएगा। इंद्र ध्वज महामंडल विधान आत्मा को परमात्मा बनाने का माध्यम है। इसके पूर्व घट यात्रा नगर के प्रमुख मार्गों से होकर श्री आदिनाथ मंदिर, अमीरगंज नशियां में पहुँची जहाँ ध्वजारोहण मोहनलाल पदमचंद ज्ञानचंद मनोज छामुनिया परिवार द्वारा और मंगल कलश स्थापना सौधर्म इंद्र दिनेश-बिना जैन छामुनिया परिवार द्वारा की गई। 28 अगस्त से दशलक्षण पर्व के अंतर्गत विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाएगा।</p>
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		<title>शिक्षक सम्मेलन में आचार्य श्री ने दिया स्वाध्याय और संस्कारों पर विशेष संदेश : चारित्र, संस्कार, संयम और आगम ज्ञान से ही होता है जीवन का निर्माण : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी </title>
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		<pubDate>Mon, 18 Aug 2025 07:08:36 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[टोक नगर में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने शिक्षक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन का निर्माण चारित्र, संस्कार, संयम और आगम ज्ञान से ही संभव है। माता-पिता और शिक्षकों को स्वयं संस्कारित होकर बच्चों को सही दिशा देनी चाहिए। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… टोक नगर में प्रथमाचार्य चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>टोक नगर में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने शिक्षक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन का निर्माण चारित्र, संस्कार, संयम और आगम ज्ञान से ही संभव है। माता-पिता और शिक्षकों को स्वयं संस्कारित होकर बच्चों को सही दिशा देनी चाहिए। <span style="color: #ff0000">पढ़िए पूरी रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>टोक नगर में प्रथमाचार्य चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की आचार्य पद शताब्दी प्रतिष्ठापना महोत्सव के अंतर्गत विगत माह से विभिन्न कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है। पत्रकार गोष्ठी, एडवोकेट एवं चार्टर्ड अकाउंटेंट सम्मेलन के पश्चात हाल ही में शिक्षक सम्मेलन का आयोजन हुआ।</p>
<p>इस अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने कहा कि चारित्र, संस्कार, संयम और आगम ज्ञान के बिना जीवन का निर्माण और निर्वाण संभव नहीं है। स्वाध्याय से ही सच्चे संस्कार प्राप्त होते हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों को संस्कारित करने का दायित्व केवल शिक्षकों का ही नहीं बल्कि माता-पिता का भी है। यदि माता-पिता और शिक्षक स्वयं संस्कारित होंगे तभी वे अगली पीढ़ी को सही मार्गदर्शन दे पाएंगे।</p>
<p>आचार्य श्री ने आगे कहा कि श्रावकों के समूह से ही समाज का निर्माण होता है और यह संस्कार देव, शास्त्र, गुरु एवं स्वाध्याय से ही प्राप्त होते हैं। उन्होंने शिक्षक वर्ग से आग्रह किया कि शिक्षा केवल रोजगार का साधन न बने बल्कि जीवन मूल्य और आत्मिक शांति का भी मार्ग प्रशस्त करे।</p>
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		<title>आचार्य साधु परमेष्ठी चलते-फिरते तीर्थ : 22 वर्षों के बाद पदार्पण पर हुई धर्मसभा </title>
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		<pubDate>Sun, 23 Feb 2025 10:14:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्यश्री वर्धमानसागर जी महाराज अपने 9 मुनिराजों, 22 आर्यिकाओं तथा 2 क्षुल्लकों कुल 34 साधुओं का 22 वर्षों के बाद धरियावाद प्रवेश हुआ। कर जिनवाणी भेंट की। आचार्यश्री ने धर्म सभा को संबोधित किया। धरियावद से पढ़िए राजेश पंचोलिया की खबर&#8230; धरियावद। धैर्य, धीरज का फल मीठा होता है। आप काफी वर्षों से प्रतीक्षा कर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्यश्री वर्धमानसागर जी महाराज अपने 9 मुनिराजों, 22 आर्यिकाओं तथा 2 क्षुल्लकों कुल 34 साधुओं का 22 वर्षों के बाद धरियावाद प्रवेश हुआ। कर जिनवाणी भेंट की। आचार्यश्री ने धर्म सभा को संबोधित किया। <span style="color: #ff0000">धरियावद से पढ़िए राजेश पंचोलिया की खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>धरियावद।</strong> धैर्य, धीरज का फल मीठा होता है। आप काफी वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे हैं। तीर्थंकरों की वाणी साक्षात में सुनने को नहीं मिलती है किंतु, उनके द्वारा प्रतिपादित उपदेश जिनवाणी ओर गुरुओं के माध्यम से मिलता है। मनुष्य जन्म बहुत ही दुर्लभता से मिला है। मनुष्य जीवन में देव ,शास्त्र गुरुओं के प्रति श्रद्धा,भक्ति विनय से भगवान भी झुक जाते हैं। वश में हो जाते हैं। नगर में काफी भौतिक प्रगति हो रही है। लगभग 21 वर्षों पूर्व नगर में आए थे। श्री चंद्रप्रभु जिनालय और यहां के मैदान में परिवर्तन हो गया है। भगवान का जिनालय अब नवीन जिनालय हो गया है। समय के साथ प्रगति हुई है। प्रगति निरंतर बनी रहना चाहिए देव अर्थात आचार्य साधु परमेष्ठी चलते-फिरते तीर्थ हैं। उनके प्रति श्रद्धा भक्ति और विनय रखना चाहिए। यह धर्म देशना आचार्यश्री वर्धमान सागर जी महाराज ने नगर में 22 वर्षों के बाद पदार्पण के अवसर पर आयोजित धर्मसभा में प्रकट की।</p>
<p><strong><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-75216" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250223-WA0012-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1920" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250223-WA0012-scaled.jpg 2560w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250223-WA0012-300x225.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250223-WA0012-1024x768.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250223-WA0012-768x576.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250223-WA0012-1536x1152.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250223-WA0012-2048x1536.jpg 2048w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250223-WA0012-74x55.jpg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250223-WA0012-111x83.jpg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250223-WA0012-215x161.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250223-WA0012-990x743.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250223-WA0012-1320x990.jpg 1320w" sizes="(max-width: 2560px) 100vw, 2560px" />धर्म के माध्यम से रत्नत्रय को धारण करें</strong></p>
<p>ब्रह्मचारी गज्जू भैया ने बताया कि आचार्यश्री ने आगे उपदेश में कहा कि अरिहंत भगवान से जो धर्म प्राप्त हुआ है। उस धर्म से जीवन को उन्नत बनाने का पुरुषार्थ करना चाहिए क्योंकि, विनय श्रद्धा और भक्ति मोक्ष के द्वार की चाबी है। इस धर्म रूपी चाबी को भूलना या खोना नहीं चाहिए। इसे संभाल कर रखें तथा धर्म के माध्यम से रत्नत्रय को धारण करें। इसी में मनुष्य जीवन की सार्थकता है। आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व पंडित हंसमुख शास्त्री ने आचार्य वर्धमान सागर जी महाराज से वर्ष 2025 का चातुर्मास एवं प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज आचार्य पदारोहण शताब्दी महोत्सव का समापन धरियावद में संघ सहित करने का निवेदन किया</p>
<p>मुनिश्री पुण्य सागर जी ने अपने उद्बोधन में समाज को बताया कि जो सोता है वह खोता है। इसलिए आचार्य श्री के पदार्पण से होली के साथ दीपावली पर्व भी प्रारंभ हो गया है।,अब बारिश के समाप्त होने पर धर्म की बारिश होगी। उसमें भीगने से लाभ होगा। सूखे रहोगे तो कोरे रह जाओगे क्योंकि, आचार्य श्री वर्धमान सागर जी में आचार्य शांति सागर जी से लेकर दीक्षा गुरु आचार्य श्री अजीत सागर जी के गुण समाहित है।</p>
<p><strong>सभी 53 साधुओं ने जिनालयों के दर्शन किए</strong></p>
<p>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी की अंतराष्ट्रीय स्तर पर धर्म प्रभावना की है। दशा हमड़ सेठ करणमल, दशा नरसिंहपुरा सेठ दिनेश जेकनावत तथा बीसा नरसिंहपुरा, सेठ गुणवंत डुगावत ने बताया कि आचार्यश्री वर्धमानसागर जी महाराज अपने 9 मुनिराजों, 22 आर्यिकाओं तथा 2 क्षुल्लकों कुल 34 साधुओं का 22 वर्षों के बाद धरियावाद प्रवेश पर धरियावाद में विराजित मुनिश्री पुण्यसागर जी महाराज ने अपने 18 साधुओं सहित परिक्रमा और चरणवंदना की। पंडित हंसमुख, ब्रह्मचारिणी वीणा दीदी, सम्पूर्ण समाज ने 75 वर्षीय आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की 23 फरवरी को आगवानी की। सभी 53 साधुओं ने जिनालयों के दर्शन किए। घरों के सामने रंगोली बनाई गई।</p>
<p><strong>चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेंट की</strong></p>
<p>नगर के पुरुष महिलाएं धार्मिक मंडल निर्धारित वेषभूषा में अगवानी भक्ति नृत्य पूर्वक जयकारों के साथ की। संपूर्ण नगर के हम भक्तों की हैं अभिलाषा धरियावद में हो चौमासा, देखो देखो कौन पधारे भक्तों के भगवान पधारे, भगवान महावीर और आचार्य श्री वर्धमान सागर के जय जयकार से गूंज रहा था। धर्म सभा में प्रवचन के पूर्व मंगलाचरण हुआ। प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी एवं पूर्वाचार्यों के चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन आमंत्रित अतिथियों तथा स्थानीय समाज के पदाधिकारी द्वारा किया गया। सौभाग्यशाली परिवार ने आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेंट की। सभा का संचालन पंडित विशाल ने किया।</p>
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		<title>आचार्य श्री वर्धमान सागरजी की प्रेरणा से जैन धार्मिक पाठशाला पुनः प्रारंभः स्थापना 70 के दशक में कुन्थु सागरजी महाराज द्वारा की गई थी </title>
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		<pubDate>Fri, 17 Jan 2025 10:09:35 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[प्रथमाचार्य श्री शांति सागरजी आचार्य पद शताब्दी महोत्सव अंतर्गत आचार्यश्री वर्धमान सागरजी की प्रेरणा से जैन धार्मिक पाठशाला पुन प्रारंभ की गई है। शताब्दी महोत्सव को स्थाई बनाने के लिए आचार्यश्री शांति सागरजी के शिष्य आचार्य कुन्थू सागरजी के नाम से सन 1970 से नगर में धार्मिक पाठशाला प्रारंभ की गई थी। वर्ष 2023 में [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>प्रथमाचार्य श्री शांति सागरजी आचार्य पद शताब्दी महोत्सव अंतर्गत आचार्यश्री वर्धमान सागरजी की प्रेरणा से जैन धार्मिक पाठशाला पुन प्रारंभ की गई है। शताब्दी महोत्सव को स्थाई बनाने के लिए आचार्यश्री शांति सागरजी के शिष्य आचार्य कुन्थू सागरजी के नाम से सन 1970 से नगर में धार्मिक पाठशाला प्रारंभ की गई थी। वर्ष 2023 में कोरोना महामारी के बाद से पाठशाला का संचालन स्थगित हो गया था। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजेश पंचोलिया द्वारा पारसोला की यह पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>पारसोला।</strong> वात्सल्य वारिधी पंचम पट्टाधीश आचार्यश्री वर्धमान सागरजी 30 साधुओं सहित पारसोला नगर में विराजित है। प्रथमाचार्य श्री शांतिसागरजी महाराज आचार्य पद शताब्दी महोत्सव के अंतर्गत कार्यक्रम का शुभारंभ पारसोला से ही हुआ है, जो अक्टूबर 2025 तक निरंतर चलेगा। शताब्दी महोत्सव को स्थाई बनाने के लिए आचार्यश्री शांति सागरजी के शिष्य आचार्य कुन्थू सागरजी के नाम से सन 1970 से नगर में धार्मिक पाठशाला प्रारंभ की गई थी। वर्ष 2023 में कोरोना महामारी के बाद से पाठशाला का संचालन स्थगित हो गया था। विगत दिनों नगर में जैन संस्कार के लिए आध्यात्मिक शिविर का आयोजन आचार्यश्री संघ सानिध्य में किया गया। जिसमें आचार्य श्री वर्धमान सागरजी ने अपने प्रवचन में नगर के बच्चों को धार्मिक संस्कार हेतु पाठशाला प्रारंभ करने का उपदेश और महत्वपूर्ण प्रेरणा दी।</p>
<p><strong>जैन पाठशाला को पुनः प्रारंभ हुई</strong></p>
<p>आचार्य श्री वर्धमान सागर ससंघ की प्रेरणा एवं सानिध्य में स्थानीय जैन समाज ने आचार्य पद शताब्दी महोत्सव अंतर्गत आचार्यश्री कुन्थुसागर जैन पाठशाला को पुनः शुरू करने का मानस बनाया है। आचार्यश्री के मंगल आशीर्वाद से पंडित कीर्तिश वगेरिया व पंडित अशोक जैन के निर्देशन में पाठशाला के शिक्षकगण को मनोनीत किया गया। गज्जू भैया एवं राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्यश्री ने बताया कि नगर में पूर्व में जैन पाठशाला चलती थी।</p>
<p><strong>बच्चों में धर्म के संस्कारों का बीजारोपण </strong></p>
<p>जैन पाठशाला से बच्चों में बचपन से धर्म के संस्कारों का बीजारोपण होता है। बचपन में सीखे धर्म के संस्कार जीवन को उन्नति के मार्ग पर ले जाते है। धर्म के संस्कार से जीवन का निर्माण ही नहीं निर्वाण को भी प्राप्त कर सकते हैं। सभी समाजजनों की जिम्मेदारी है कि वो जैन पाठशाला को नियमित रूप चलाये और समय-समय स्वयं पाठशाला का अवलोकन करते हुए बालकों में आध्यात्मिक ज्ञान की वृद्धि करने का पुरुषार्थ करें।</p>
<p><strong>नियमित अध्ययन हेतु कृतसंकल्पित</strong></p>
<p>जयंतीलाल कोठारी अध्यक्ष जैन समाज, ऋषभ पचौरी अध्यक्ष वर्षायोग समिति, वीरेंद्र सेठ ने बताया कि जैन पाठशाला में बाल बोध प्रथम द्वितीय, द्रव्य संग्रह, श्रावकाचार, छहढाला, तत्वार्थ सूत्र, स्वाध्याय आदि का नियमित अध्ययन वीणा घाटलिया, माला घाटलिया, ममता पचौरी, अंकिता पचौरी, सुनीता पचौरी, चेतना घाटलिया, बिंदु वगेरिया, पूजा घाटलिया, चेतना पचौरी व पुष्पा देवी द्वारा बालक-बालिका युवाओं को धर्मशिक्षा देने के लिए ससंघ के सानिध्य में पूज्य मुनिश्री हितेंद्र सागर ने संकल्प दिलाया।</p>
<p><strong>महिला मंडल का प्रयास व संचालन हेतु राशि दान की गई</strong></p>
<p>पाठशाला संचालन के लिए संघस्थ गज्जू भाई ने 11 हज़ार व तारा सेठी दादी ने पांच हजार रुपये की राशि भेंट की तथा नगर के अनेक साधर्मियों ने रूपये 500 के अनुसार दान राशि की घोषणा की। सभी शिक्षकगणों का स्थानीय जैन समाज ने सम्मान किया। पारसोला में आचार्यश्री कुन्थु सागर जैन पाठशाला की स्थापना 70 के दशक में प्रथमाचार्य श्री शांति सागरजी के शिष्य एनापुर वाले आचार्यश्री कुन्थु सागरजी महाराज द्वारा की गई थी। हाल ही में कोरोना काल के कारण वर्ष 2021 से पाठशाला बंद हो गई थी। जिसे महिला मंडल के द्वारा पुनः पाठशाला शुरू करने का संकल्प लिया है।</p>
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		<title>शांति सागरजी आचार्य पद प्रतिस्थापना शताब्दी महोत्सवः आध्यात्मिक संस्कार शिविर का आयोजन </title>
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		<pubDate>Mon, 06 Jan 2025 09:29:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्यश्री शांति सागरजी आचार्य पद प्रतिस्थापना शताब्दी महोत्सव अंतर्गत आध्यात्मिक संस्कार शिविर का आयोजन दिगंबर जैन समाज एवं वर्षा योग समिति द्वारा किया गया। आचार्यश्री वर्धमान सागरजी ने कहा कि देव, जिन दर्शन ,अभिषेक ,पूजन दान ,व्रत ,नियम से मनुष्य जीवन सार्थक करें। पढ़िए राजेश पंचोलिया द्वारा पारसोला की पूरी खबर&#8230; पारसोला। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्यश्री शांति सागरजी आचार्य पद प्रतिस्थापना शताब्दी महोत्सव अंतर्गत आध्यात्मिक संस्कार शिविर का आयोजन दिगंबर जैन समाज एवं वर्षा योग समिति द्वारा किया गया। आचार्यश्री वर्धमान सागरजी ने कहा कि देव, जिन दर्शन ,अभिषेक ,पूजन दान ,व्रत ,नियम से मनुष्य जीवन सार्थक करें। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजेश पंचोलिया द्वारा पारसोला की पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>पारसोला।</strong> आचार्य शिरोमणी श्री वर्धमान सागरजी सन्मति भवन में विराजित हैं। जयंतीलाल कोठारी ऋषभ पचौरी व वीरेन सेठ ने बताया कि प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्यश्री शांति सागरजी आचार्य पद प्रतिस्थापना शताब्दी महोत्सव अंतर्गत आध्यात्मिक संस्कार शिविर का आयोजन 28 दिसंबर से 3 जनवरी तक दिगंबर जैन समाज एवं वर्षायोग समिति द्वारा किया गया। आध्यात्मिक शिक्षण शिविर में आचार्यश्री एवं उनके मुनि शिष्यों आर्यिका माताजी द्वारा सभी को धार्मिक शिक्षण प्रदान किया गया।</p>
<p><strong>हवा से भी ज्यादा धर्म जरूरी </strong></p>
<p>संजय पापड़ीवाल, किशनगढ़ दीपक पाटनी, कोलकाता एवं माया अग्रवाल उदयपुर द्वारा सफल प्रतिभागियों को पुरस्कृत किया गया। इस अवसर पर आचार्यश्री ने स्थानीय समाज एवम शिविरार्थियों को उपदेश में बताया कि जीने के लिए भोजन जरुरी है, भोजन से ज्यादा जल जरूरी है ,जल से ज्यादा हवा जरूरी है और हवा से भी ज्यादा धर्म जरूरी है। धर्म दो प्रकार के होते हैं श्रावक धर्म और साधु धर्म साधु का कार्य समाज को उपदेश देना होता है, वही श्रावक का कर्तव्य दान और पूजा होना चाहिए। यह प्रवचन पारसोला में आचार्यश्री वर्धमान सागरजी ने धर्म सभा में प्रकट किये।</p>
<p><strong>श्रावक के भी तीन भेद हैं </strong></p>
<p>राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्यश्री ने आगे बताया कि श्रावक के भी तीन भेद हैं उत्तम श्रावक वह होता है जो पहले आहार दान देता है उसके बाद भोजन करता है, मध्यम श्रावक वह होता है जो आहार देखता है आहार देखने के बाद भोजन करता है। जघन्य श्रावक वह होता है जो आहार भी नहीं देता और भोजन आहार होने के बाद करता है वह जघन्य श्रावक है। किंतु ऐसे व्यक्ति जो मुनियों के आहार के पहले ही भोजन कर लेते हैं वह अघम श्रावक की श्रेणी में आते हैं। इसलिए श्रावक को श्रद्धावान, विवेकवान और क्रियावान होकर कार्य करना चाहिए।</p>
<p><strong>दर्शन, अभिषेक व पूजन निस्वार्थ करें</strong></p>
<p>मंदिर में पूजन स्वयं के उत्तम द्रव्यों से भावपूर्वक करना चाहिए। जिस प्रकार आप डॉक्टर पर श्रद्धा करते हैं कि वह हमारा इलाज करेगा हम स्वस्थ हो जाएंगे इस प्रकार आपको भगवान पर भी विश्वास होना चाहिए भगवान के दर्शन अभिषेक पूजन बिना स्वार्थ के करना चाहिए। खेती में जिस प्रकार एक बीज भविष्य में बड़ा वृक्ष बनाकर फल देता है उसी प्रकार श्रावक के जीवन में अच्छे कार्य, नियम, व्रत देवदर्शन, अभिषेक, पूजन, स्वाध्याय तप, संयम आदि भावपूर्वक करने से उसका फल पुण्य भी बहुत अधिक मिलता है।</p>
<p><strong><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-72071" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/01/IMG-20250106-WA0012-scaled.jpg" alt="" width="1920" height="2560" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/01/IMG-20250106-WA0012-scaled.jpg 1920w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/01/IMG-20250106-WA0012-225x300.jpg 225w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/01/IMG-20250106-WA0012-768x1024.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/01/IMG-20250106-WA0012-1152x1536.jpg 1152w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/01/IMG-20250106-WA0012-1536x2048.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/01/IMG-20250106-WA0012-990x1320.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/01/IMG-20250106-WA0012-1320x1760.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1920px) 100vw, 1920px" />समाज की रिपोर्टिंग हेतु सम्मानित किया</strong></p>
<p>आचार्यश्री के आगमन पश्चात आयोजित पंचकल्याणक प्रतिष्ठा, आचार्य पद शताब्दी महोत्सव, चातुर्मास, आचार्यश्री वर्धमान सागर की हीरक जयंती कार्यक्रम आदि में जैन समाज की रिपोर्टिंग के लिए विनोद जैन का स्वागत व सम्मान जैन समाज द्वारा श्रीफल, माला पगड़ी स्मृति चिन्ह द्वारा किया गया।</p>
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		<title>चरित्र चक्रवर्ती आचार्य शांतिसागर का आचार्य पद प्रतिष्ठापन शताब्दी महोत्सव संपूर्ण देश में मनाया जाएगा: वर्ष 2024-2025 में होंगे भव्य आयोजन </title>
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		<pubDate>Tue, 30 May 2023 12:35:12 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
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					<description><![CDATA[बीसवीं सदी में दिगम्बर जैन श्रमण संस्कृति के प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती 108 आचार्यश्री शांतिसागरजी महाराज के आचार्य पद प्रतिष्ठान का 100वां वर्ष 2024 में प्रारंभ होगा। वर्ष 2024-2025 में भव्य आयोजन होंगे। आचार्य वर्धमानसागर के सान्निध्य में देशभर के श्रावक श्रेष्ठीयों की राष्ट्रीय सभा हुई। पढ़िए राजेन्द्र जैन महावीर की रिपोर्ट&#8230; उदयपुर। बीसवीं सदी में [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong> बीसवीं सदी में दिगम्बर जैन श्रमण संस्कृति के प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती 108 आचार्यश्री शांतिसागरजी महाराज के आचार्य पद प्रतिष्ठान का 100वां वर्ष 2024 में प्रारंभ होगा। वर्ष 2024-2025 में भव्य आयोजन होंगे। आचार्य वर्धमानसागर के सान्निध्य में देशभर के श्रावक श्रेष्ठीयों की राष्ट्रीय सभा हुई। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेन्द्र जैन महावीर की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>उदयपुर।</strong> बीसवीं सदी में दिगम्बर जैन श्रमण संस्कृति के प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती 108 आचार्यश्री शांतिसागरजी महाराज के आचार्य पद प्रतिष्ठान का 100वां वर्ष 2024 में प्रारंभ होगा। आचार्य पद प्रतिष्ठापन के 100वें वर्ष को आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव के रूप में सन् 2024-25 में भव्य विशाल स्तर पर वैचारिक आयामों के साथ संस्कृति संवर्धन, सामाजिक सरोकार के बहुउद्देशीय पंचसूत्री कार्यक्रमों के साथ मनाया जाएगा। महोत्सव के आयोजन के लिए विस्तृत रूपरेखा व कमेटी गठन के लिए परम्परा के पंचम पट्टाधीश राष्ट्रगौरव, वात्सल्यवारिधि आचार्य 108 श्री वर्धमानसागरजी महाराज ससंघ के सान्निध्य में देश के समस्त श्रावक श्रेष्ठियों की राष्ट्रीय सभा उदयपुर के नागेन्द्र भवन में शनिवार को हुई थी।</p>
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<p><strong>संस्कार ही संस्कृति को जीवित रखते है &#8211; आचार्य श्री वर्धमानसागर</strong><br />
विशाल राष्ट्रीय सभा को संबोधित करते हुए आचार्यश्री वर्धमानसागर महाराज ने कहा कि आचार्य शांतिसागरजी महाराज ने सन 1934 का चातुर्मास उदयपुर में किया था। उन्हीं के संस्कार उनकी संस्कृति रक्षण की भावना के संस्कार संपूर्ण देश में व्याप्त होकर जनत्व व भ्रमण दिगम्वरत्व को जीवित रखे हुए हैं। संस्कृति को जीवित रखने में संस्कारों का बड़ा महत्व है। आज हम सब आचार्य श्री शांतिसागरजी महाराज के संस्कार व उपकारों से प्रभावित है। उनका गुणगान करने उनके कार्यों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए आचार्य पद प्रतिष्ठापन शताब्दी महोत्सव संस्कृति संरक्षण व सामाजिक सरोकार का माध्यम बनेगा।</p>
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<p><strong>बीसवीं सदी का सूर्य जिसने मिथ्यात्व मिटाया </strong><br />
मुनिश्री हितेन्द्रसागर महाराज ने आचार्यश्री के जीवन परिचय से अवगत कराते हुए कहा कि वे दक्षिण भारत से निकले ऐसे सूर्य थे जिन्होंने मिध्यात्व की अवधारणा से मुक्ति दिलाने का कार्य किया । गर्व से कहेंगे कि हम जैन है वह सूत्र हमें आचार्य शांतिसागरजी ने दिया। देशभर से आए श्रेष्ठी व उदयपुर के समाजजनों की राष्ट्रीय सभा में मंगलाचरण सीमा गोवा ने किया। चित्र अनावरण व आचार्यश्री वर्धमानसागर का पाद प्रचालन अशोक पाटनी आर. के. मार्बल, अनिल सेठी, राजेन्द्र कटारिया, संजय पापड़ीवाल आदि ने किया। स्वागत भाषण शांतिलाल बेलायत उदयपुर ने दिया।</p>
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<p><strong>पंचसूत्रों से बदलेंगे सामाजिक परिदृश्य &#8211; प्रतिष्ठाचार्य हंसमुख जैन</strong></p>
<p>आचार्य पद प्रतिष्ठापन शताब्दी महोत्सव की प्रस्तावना रखते हुए प्रतिष्ठाचार्य पंडित हंसमुख जैन धरियावद ने कहा कि दुनिया को सल्लेखना का जीवन पाठ पढ़ाने वाले आचार्य शांतिसागर का उपकार हम भूल नहीं सकते। शताब्दी वर्ष में पंच सूत्री कार्यक्रम में आचार्य शांतिसागर महाराज का जीवन चरित्र जन-जन तक पहुंचाना, उनकी कीर्ति स्थापना के लिए कीर्ति फलक स्तूप निर्माण, सेवा संकूल के रूप में पाठशालाओं का निर्माण व उन्नयन, व्यायामशालाओं का निर्माण, राष्ट्रीय जनगणना में जैन लिखवाने की अनिवार्यता हेतु जागरुकता कार्यक्रम स्वावलंबन योजना के माध्यम से आर्थिक विपन्न समाजजनों का स्वरोजगार आदि प्रकल्पों के लिए सहायता देना। उच्च शिक्षा में आर्थिक बाधाओं को दूर करना आदि अनेकों आयोजन होंगे। यह वर्ष 2024 से 2025 के बीच वृहत स्तर पर मनाया जाएगा। आचार्य शांतिसागर के जीवन पर आधारित पंचसूत्रीय आयोजन की संक्षिप्त जानकारी से युक्त आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव 2024-25 के आकर्षक फोल्डर का विमोचन अतिथियों ने किया।</p>
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