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	<title>शंका समाधान &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>शंका समाधान &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>मुनि श्री प्रमाणसागरजी ससंघ की सुनार नदी पुल पर की ऐतिहासिक अगवानी: मुनि संघों का मिलन देखकर भक्ति से भाव विभोर हुए श्रद्धालुगण  </title>
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		<pubDate>Thu, 25 Dec 2025 13:36:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सूर्याेदय के साथ ही दिसंबर की शीतलहर के साथ कोहरा छाया हुआ था और उस कोहरे में जबलपुर हाईवे पर गुरुभक्ति का जन सैलाब उमड़ पड़ा। अवसर था आचार्य श्री विद्यासागरजी शिष्य मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज, मुनि श्री संधान सागरजी महाराज ससंघ की मंगल अगवानी का। गौरझामर से पढ़िए, यह खबर&#8230; गोरझामर। सूर्याेदय के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सूर्याेदय के साथ ही दिसंबर की शीतलहर के साथ कोहरा छाया हुआ था और उस कोहरे में जबलपुर हाईवे पर गुरुभक्ति का जन सैलाब उमड़ पड़ा। अवसर था आचार्य श्री विद्यासागरजी शिष्य मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज, मुनि श्री संधान सागरजी महाराज ससंघ की मंगल अगवानी का। <span style="color: #ff0000">गौरझामर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>गोरझामर।</strong> सूर्याेदय के साथ ही दिसंबर की शीतलहर के साथ कोहरा छाया हुआ था और उस कोहरे में जबलपुर हाईवे पर गुरुभक्ति का जन सैलाब उमड़ पड़ा। अवसर था आचार्य श्री विद्यासागरजी शिष्य मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज, मुनि श्री संधान सागरजी महाराज ससंघ की मंगल अगवानी का। उनकी मंगल अगवानी आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी महाराज के शिष्य मुनि श्री प्रशमसागर जी, मुनि श्री प्रणेयसागरजी, मुनि श्री योग्यसागर जी सहित सकल दि. जैन समाज गौरझामर ने की। मुनिसंघों के मंगल मिलन को देखकर अपार समूह श्रद्धा और भक्ति से भाव विभोर हो गया। मुनिसंघ के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि संपूर्ण गौरझामर को पचरंगी ध्वजाओं तथा तोरणद्वार से सजाया गया था। लगभग 32 वर्ष बाद मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज का यहां पर आगमन हुआ है। हालांकि इसके पूर्व मुनि श्री क्षुल्लक अवस्था में यहां आ चुके थे। दोपहर में शंका समाधान का कार्यक्रम हुआ। इसके बाद मध्यान्ह में विहार हाईवे पर काछी पिपरिया की ओर हुआ।</p>
<p><strong>आपके चेहरे की खुशी बता रही कि प्यास बहुत गहरी थी </strong></p>
<p>इस अवसर पर मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि बहुत श्रम के बाद जब बहुत प्यास लगती है और बहुत गहराई से पानी को अपने हाथों से खींचकर निकाला जाता है और जब बाल्टी सामने आती है तो उसे अपूर्व आनंद की अनूभूति होती है। कुछ ऐसी ही अनुभूति आप लोगों के चेहरों को देखकर जो भावना दिख रही है। वह बता रही है कि प्यास बहुत गहरी थी। उन्होंने कहा कि गौरझामर का इस अंचल में नाम और पहचान है। हम भले ही आपके यहां 1986 तथा 1988 में जबलपुर चातुर्मास के लिए जाते समय तथा 1993 में केसली जाते समय गुरुजी के साथ आए थे। उसके बाद आज यहां आना हुआ है। हालांकि समय-समय पर गौरझामर के समाज और यहां का दिव्यघोष हमारे पास आते रहे हैं।</p>
<p><strong>जीवन लता को आसमान की ऊंचाई तक पहुंचा सकते हैं</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि आप लोगों के प्रबल पुण्य से ही यह गाड़ी जो भले ही निकल गई वह पूरी परिक्रमा लगाकर गौरझामर आ गई। उन्होंने सार संक्षेप में कहा कि मन में एक बात धारण कर के रखो कि जैसे किसी लता का विकास आलंबन के बिना नहीं होता और उस आलंबन से नन्हीं सी लता भी आसमान की ऊंचाई को छूने लगती है। वैसे ही धर्म का आलंबन पाकर हम अपनी जीवन लता को आसमान की ऊंचाई तक पहुंचा सकते हैं। मुनि श्री ने कहा कि धर्म ही हमारे जीवन की शरण है तथा धर्म में ही हमारी गति है। यह मति हमेशा बनी रहे तभी हमारे जीवन का पथ प्रशस्त होगा। उन्होंने गौरझामर की जैन समाज की तारीफ करते हुए कहा कि यहां के समाज में देव गुरु और धर्म के प्रति भक्ति कूट-कूट कर भरी है तथा आचार्य गुरुदेव की विशेष कृपा रही है।</p>
<p><strong>जैनदर्शन के अनुसार सभी की शंकाओं का समाधान किया</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि यहां पर महाराज से भी मिलने का सुयोग्य बना। उन्होंने कहा कि साधु से जब साधु मिलते है तो सभी को अपार आनंद की अनुभूति होती है। उन्होंने सार संक्षेप उदबोधन के साथ दो पक्तियों के साथ कहा कि मात्र भावना कम रहे, टूटे कर्म संयोग देव शास्त्र गुरुदेव का सदा मिले शुभ योग। उन्होंने कहा कि फोर लेन पर आप लोगों को गुरुओं का सानिध्य मिलता ही रहता है। आप लोगों पर गुरुजी की विशेष कृपा रही है। यह संपूर्ण अंचल बीना वारह के भगवान शांतिनाथ का ही क्षेत्र है। आप लोगों की लगन इसी प्रकार बनी रहे। दोपहर में शंका समाधान का संचालन मुनि श्री संधान सागर जी महाराज ने किया तथा मुनि श्री ने जैनदर्शन के अनुसार सभी की शंकाओं का समाधान किया।</p>
<p><strong>मंगल विहार काछी पिपरिया की ओर </strong></p>
<p>इस अवसर पर रहली, पटनागंज, जबलपुर, सागर तेंदूखेड़ा, तड़ा, केसली, दमोह, कुंडलपुर क्षेत्र से श्रद्धालु पधारे और मुनिसंघ को श्रीफल समर्पित किए। मध्यान्ह में मुनिसंघ का मंगल विहार काछी पिपरिया की ओर हुआ।</p>
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		<title>मुनि श्री प्रमाणसागरजी का राहतगढ़ में मंगल प्रवेश: समाज बंधुओं ने की भव्य मंगल अगवानी लगाए जयकारे  </title>
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		<pubDate>Sun, 23 Nov 2025 14:06:46 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नगर में 27 नवंवर से 2 दिसंबर तक पाषाण से परमात्मा बनाने का विशेष आयोजन श्री 1008जिनबिंब पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महा महोत्सव के लिए शंका समाधान प्रणेता मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज एवं मुनि श्री संधानसागरजी महाराज ससंघ के सानिध्य में मंगल प्रवेश प्रातःकालीन बेला में हुआ। राहतगढ़ से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>नगर में 27 नवंवर से 2 दिसंबर तक पाषाण से परमात्मा बनाने का विशेष आयोजन श्री 1008जिनबिंब पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महा महोत्सव के लिए शंका समाधान प्रणेता मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज एवं मुनि श्री संधानसागरजी महाराज ससंघ के सानिध्य में मंगल प्रवेश प्रातःकालीन बेला में हुआ। <span style="color: #ff0000">राहतगढ़ से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>राहतगढ़ (सागर)।</strong> नगर में 27 नवंवर से 2 दिसंबर तक पाषाण से परमात्मा बनाने का विशेष आयोजन श्री 1008जिनबिंब पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महा महोत्सव के लिए शंका समाधान प्रणेता मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज एवं मुनि श्री संधानसागरजी महाराज ससंघ के सानिध्य में मंगल प्रवेश प्रातःकालीन बेला में हुआ। मुनि संघ के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया मुनि संघ की मंगल अगवानी के अवसर पर सकल दिगंबर जैन समाज राहतगढ़ एवं मंगल विहार करा रहे भोपाल, विदिशा तथा आसपास के नगरों से सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालुओं ने मुनिसंघ की मंगल अगवानी की। इस अवसर पर मुनि श्री ने कहा कि हमारे जीवन में छोटी-छोटी बातों का बहूत गहरा प्रभाव पड़ता है। हम जिस वातावरण और जिन लोगों के साथ रहते हैं, जिनके साथ हमारा रोज का उठना बैठना है तो हमारा व्यवहार भी ठीक वैसा ही बन जाता है।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-95098" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023.jpg" alt="" width="1600" height="1066" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023-300x200.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023-1024x682.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023-768x512.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023-1536x1023.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023-414x276.jpg 414w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023-470x313.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023-640x426.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023-130x86.jpg 130w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023-187x124.jpg 187w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023-990x660.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023-1320x879.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" />मुनिश्री ने अच्छी संगति में रहने की प्रेरणा दी</strong></p>
<p>मुनि श्री ने एक पुरानी युक्ति सुनाते हुए कहा कि जैसी संगत वैसी रंगत। कुरल काव्य में लिखा है कि पानी का गुण बदल जाता है तथा जैसी मिट्टी में रहता है वैसा रंग हो जाता है। उसी प्रकार मनुष्य के स्वभाव में संगति का व्यापक प्रभाव होता है। इसलिए हमारी संस्कृति ने हमेशा अच्छी संगति में रहने की प्रेरणा देते हुए कहा कि अच्छे लोगों की संगति में रहोगे तो तुम्हारा जीवन भी अच्छा बनेगा। मुनि श्री ने संगति के प्रभाव पर चर्चा करते हुए कहा कि जैसे गुलाब की क्यारी में रहने वाली मिट्टी में भी सुगंध आ जाती है तो नाली के किनारे रहने वाली मिट्टी में दुर्गंध आती है।</p>
<p><strong>दुःसंगति से बचो सुःसंगति में रहो न रहो</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि हम जैसे माहौल में रहते हैं। हमारा व्यवहार भी उस पर निर्भर करता है। इसीलिए हमेशा अच्छी संगति में रहने की प्रेरणा दी जाती है। आचार्य गुरुदेव एक नया दृष्टिकोण प्रकट कर कह रहे हैं कि दुःसंगति से बचो सुःसंगति में रहो न रहो। मुनि श्री ने कहा कि तुम अच्छो की संगति न कर पाओ तो कोई बात नहीं है लेकिन, बुरे की संगति से बचो क्योंकि, उससे तुम्हारा जीवन निश्चय ही बुरा बनेगा। उन्होंने कहा कि सत्संगति रखने वाला व्यक्ति अपने जीवन का उत्कर्ष कर सकता है, लेकिन दुःसंगति में फंसे व्यक्ति का पतन अवश्यंभावी है। प्रायः व्यक्ति अपनी संगति को अच्छी ही मानता है लेकिन, आपके मानने से संगति अच्छी नहीं हो सकती तो ऐसी कौन सी संगती है जो सुसंगति कहलाती है?</p>
<p><strong>बुद्धिमान की संगति में रहोगे तो तुम्हारा ज्ञान भी विकसित होगा</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि जिससे हमें अच्छी प्रेरणा, अच्छी बातें सीखने को मिले। जिससे हमारी आदतें तथा हमारा चरित्र अच्छा बने और हम आगे बढ़ सकें, ऐसी संगति सुसंगति है। इसके विपरीत जो हमारे आचार विचार को भ्रष्ट करें हमारे चरित्र का पतन कराए वह दुःसंगति है। गुरुदेव कहते है कि ऐसी दुःसंगति से बचो। चुनाव हमेशा अच्छे की करो। मुनि श्री ने कहा कि लोग तर्क देते है कि हम ठीक हैं तो दुनिया हमारा क्या बिगाड़ लेगी तो मुनि कहते हैं कि काजल की कोठरी में जाओगे तो कहीं न कहीं दाग लग ही जाएगा। आत्मा का निमित्त और नैमित्तिक संबंध है जो आंतरिक रूप से मजबूत है उनको बचाव की आवशकता नहीं है लेकिन, जो आंतरिक रुप से कमजोर होते हैं उनका मन बहूत चंचल होता है तथा वह छोटे छोटे निमित्तों से प्रभावित हो जाते है। ऐसी स्थिति में बचाव करने की जरुरत है। मुनि श्री ने कहा कि शास्त्रों में हम मुनियों को भी अच्छी संगति में रहने की प्रेरणा दी गई है। हमेशा अपने से अधिक बुद्धिमान की संगति में रहोगे तो तुम्हारा ज्ञान भी विकसित होगा।</p>
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		<title>संस्कार ही भविष्य की दिशा तय करते हैं : मुनि श्री प्रमाण सागर जी ने बच्चों को प्रारंभ से ही धार्मिक संस्कार देने पर दिया जोर </title>
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		<pubDate>Wed, 19 Nov 2025 12:14:54 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[हिरनई गांव में आयोजित धर्मसभा में मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति इसलिए हावी हो रही है, क्योंकि हम बच्चों को संस्कार देना तो चाहते हैं लेकिन, स्वयं वैसा आदर्श प्रस्तुत नहीं कर पाते। हिरनई से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;   हिरनई। हिरनई गांव में [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>हिरनई गांव में आयोजित धर्मसभा में मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति इसलिए हावी हो रही है, क्योंकि हम बच्चों को संस्कार देना तो चाहते हैं लेकिन, स्वयं वैसा आदर्श प्रस्तुत नहीं कर पाते। <span style="color: #ff0000">हिरनई से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>  हिरनई</strong>। हिरनई गांव में आयोजित धर्मसभा में मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति इसलिए हावी हो रही है, क्योंकि हम बच्चों को संस्कार देना तो चाहते हैं लेकिन, स्वयं वैसा आदर्श प्रस्तुत नहीं कर पाते। उन्होंने कहा कि यदि बच्चों के हृदय में प्रारंभ से ही धर्म के संस्कार दिए जाएं तो उनके भटकाव की संभावनाएं अत्यंत कम हो जाती है।</p>
<p>मुनि श्री ने समझाया कि छोटे बच्चों का मन धर्म और पूजा-पाठ में स्वाभाविक रूप से लगता है, लेकिन जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं। पढ़ाई, करियर और प्रतिस्पर्धा की ओर ध्यान बढ़ जाता है। ऐसे में प्रारंभिक दिनों में दिए गए अच्छे संस्कार ही दिशा-सूचक दीपक बनते हैं। उन्होंने कहा कि यदि कभी बच्चे भटक भी जाएं तो संस्कार उन्हें वापस सही मार्ग पर ले आते हैं। इसलिए पाठशालाओं और अन्य माध्यमों से संस्कार देना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि, धार्मिक संस्कार जीवन का मूल तत्व हैं। मुनि श्री ने बच्चों के लिए सरल संदेश दिया और कहा कि धर्म भले कम करो, लेकिन अधर्म से अवश्य बचो। यदि पीढ़ी अधर्म से बचेगी तो वही सबसे बड़ा धर्म कहलाएगा। बच्चों को जीवन की मर्यादा समझाना और सही–गलत का विवेक देना ही माता-पिता का सच्चा धर्म है।</p>
<p><strong>मंदिर तो सुंदर बन गया, मन को मंदिर कैसे बनाएं? </strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि जैसे आस्था ने भगवान का सुंदर मंदिर बनाया है उसी आस्था को भीतर जगाएं तो मन भी मंदिर बन जाएगा। धर्मसभा में मुनि श्री संधानसागर जी महाराज ने शंका-समाधान कार्यक्रम का संचालन किया। उपस्थित श्रावकों ने अपने व्यावहारिक जीवन, धर्म और आस्था से जुड़े प्रश्न रखे। जिनका समाधान मुनि श्री ने अत्यंत सहजता और स्पष्टता से किया।</p>
<p><strong>मंगल विहार अटारी खैजड़ा गांव की ओर हुआ</strong></p>
<p>प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि प्रातःकालीन बेला में लाल पाषाण से निर्मित दिव्य जिनालय में मुनि श्री के मुखारबिंद से शांतिधारा हुई इसके बाद विश्वविख्यात शंका-समाधान कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। वातावरण ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो भगवान के समवशरण में इंद्रभूति गौतम अपने प्रश्न रख रहे हों और समाधान मिल रहा हो। इस अवसर पर विदिशा, गंजबासोदा, भोपाल, सागर और राहतगढ़ से आए श्रावकों ने भी अपने प्रश्न रखकर समाधान पाया। दोपहर बाद मुनि श्री का मंगल विहार अटारी खैजड़ा गांव की ओर हुआ।</p>
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		<title>गुरु भाइओं का मंगल मिलन शीतलधाम में : मुनि श्री प्रमाण सागरजी ससंघ का मंगल प्रवेश दोपहर तीन बजे    </title>
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		<pubDate>Sun, 16 Nov 2025 11:55:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[शंका समाधान एवं गुणायतन प्रणेता मुनि श्री प्रमाण सागरजी ससंघ का मंगल विहार विदिशा की ओर चल रहा है। मुनिसंघ की आहार चर्या ज्ञानोदय तीर्थ दीवान गंज में संपन्न हुई। विदिशा से पढ़िए, अविनाश जैन की यह खबर&#8230;  विदिशा। शंका समाधान एवं गुणायतन प्रणेता मुनि श्री प्रमाण सागरजी ससंघ का मंगल विहार विदिशा की ओर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>शंका समाधान एवं गुणायतन प्रणेता मुनि श्री प्रमाण सागरजी ससंघ का मंगल विहार विदिशा की ओर चल रहा है। मुनिसंघ की आहार चर्या ज्ञानोदय तीर्थ दीवान गंज में संपन्न हुई। <span style="color: #ff0000">विदिशा से पढ़िए, अविनाश जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> विदिशा।</strong> शंका समाधान एवं गुणायतन प्रणेता मुनि श्री प्रमाण सागरजी ससंघ का मंगल विहार विदिशा की ओर चल रहा है। मुनिसंघ की आहार चर्या ज्ञानोदय तीर्थ दीवान गंज में संपन्न हुई एवं शंका समाधान तथा रात्रि विश्राम पारस गार्डन सलामतपुर में होकर रविवार को प्रातः प्रवचन सांची दिगंबर जैन मंदिर में प्रातः8:30 बजे हुए। आहार चर्या उपरांत दोपहर एक बजे सांची से मंगल विहार होकर तीन बजे ईदगाह चौराहे से सकल दिगंबर जैन समाज द्वारा मंगल अगवानी की जाएगी। मुनिसंघ शीतलधाम पर पहुंचेंगे एवं विदिशा नगर में विराजमान</p>
<p>मुनि श्री सम्भवसागर महाराज ससंघ के साथ गुरु भाईओं का मंगल मिलन होगा। सांयकालीन विश्वप्रसिद्ध शंकासमाधान 6:20 से 7.15 बजे तक शीतलधाम पर होगा।</p>
<p><strong>हमें अपने आत्मस्वरूप का ज्ञान और बोध ही नहीं</strong></p>
<p>इधर, ज्ञानोदय तीर्थ दीवानगंज में मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने धर्मसभा में कहा कि जीवन उन्हीं का ऊंचा उठता है,जो अपने आपको आगे बढ़ाने के लिये संघर्ष करते हैं। उन्होंने कहा कि अपने आपसे प्रश्न करो मैं कौन हूं, मेरा क्या है? मैं क्या कर रहा हूं? और मुझे क्या करना चाहिये? उन्होंने कहा कि हमें अपने आत्मस्वरूप का ज्ञान और बोध ही नहीं है। इसलिये जो मैं हूं इसे जानते नहीं, बहुत थोड़े से लोग है, जो अपने जीवन और जीवन के मर्म को पहचानते हैं।</p>
<p><strong>यह शरीर एक चोले के समान है</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि आचार्य कुंद-कुंद स्वामी कहते है कि मैं एक शुद्ध चेतन आत्मा हूं, यह शरीर एक चोले के समान है। यह जो परिचय दिया जा रहा है, वह मैं नहीं वह संसार को भटकाने वाला है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे व्यक्ति नशे की हालत में होता है तो उसे कोई सुधबुध नहीं रहती। उससे भी खराब नशा मोह का होता है, जिसमें मनुष्य अपनी सुधबुध भूल जाता है।</p>
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		<title>मुनि श्री प्रमाणसागर जी का विदिशा में मंगल प्रवेश 16 नवंबर को : रविवार को आहारचर्या सांची दिगंबर जैन मंदिर में होगी </title>
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		<pubDate>Sat, 15 Nov 2025 05:49:42 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विद्यासागरजी के शिष्य विद्या प्रमाण गुरुकुलम के जनक गुणायतन शंका समाधान के प्रणेता मुनि श्री प्रमाण सागर जी ने राजधानी भोपाल में 8 माह तक लगातार प्रवास कर तथा भोपाल को एक नई सौगात विद्या प्रमाण गुरुकुलम् के रूप में देकर विदिशा की ओर मंगल विहार किया। विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230; विदिशा। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विद्यासागरजी के शिष्य विद्या प्रमाण गुरुकुलम के जनक गुणायतन शंका समाधान के प्रणेता मुनि श्री प्रमाण सागर जी ने राजधानी भोपाल में 8 माह तक लगातार प्रवास कर तथा भोपाल को एक नई सौगात विद्या प्रमाण गुरुकुलम् के रूप में देकर विदिशा की ओर मंगल विहार किया। <span style="color: #ff0000">विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>विदिशा।</strong> आचार्य श्री विद्यासागरजी के शिष्य विद्या प्रमाण गुरुकुलम के जनक गुणायतन शंका समाधान के प्रणेता मुनि श्री प्रमाण सागर जी ने राजधानी भोपाल में 8 माह तक लगातार प्रवास कर तथा भोपाल को एक नई सौगात विद्या प्रमाण गुरुकुलम् के रूप में देकर विदिशा की ओर मंगल विहार किया। सकल दिगंबर जैन समाज के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया मुनि श्री का संघ सहित रात्रि विश्राम सूखी सिंवनिया में होगा एवं 15 नवंबर शनिवार की आहार चर्या ज्ञानोदय तीर्थ दीवानगंज में होगी तथा 16 नवंबर को आहारचर्या सांची दिगंबर जैन मंदिर में होकर दोपहर पश्चात विदिशा नगर में मंगल प्रवेश होगा।</p>
<p><strong>यह इस धरती का ही कोई सुयोग्य था&#8230;</strong></p>
<p>प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया भोपाल के लोग गुरु विछोह की वेदना को महसूस कर रहे हैं। वहीं विदिशा नगर वासियों में अपार उत्साह है अपने गुरुदेव की मंगल अगवानी का। श्री दिगंबर जैन शीतलविहार न्यास श्री सकल दिगंबर जैन समाज एवं मुनि सेवक संघ के सभी सदस्यों में उत्साह का वातावरण है। इधर, जब विद्यासागर विज्ञान संस्थान एवं विद्याप्रमाण गुरुकुलम् के पदाधिकारियों एवं स्कूल के नन्हे मुन्ने बालकों ने सजल नेत्रों से भावभीनी विदाई दी। तब मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि यह इस धरती का ही कोई सुयोग्य था कि 1995 के बाद जब यहां आना हुआ तो इसका अभयोदय काल आ गया और हम निमित्त बन गए।</p>
<p><strong>अंकुरण के उपरांत अब जिम्मेदारी और ज्यादा है</strong></p>
<p>मुनि श्री ने अपने गुरु आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज को याद करते हुए कहा कि उन्हीं की प्रेरणा से गुरुकुलम् का यह स्वरूप निखर कर आया है। मुनि श्री ने सभी पदाधिकारियों को आशीर्वाद देते कहा कि भावना से ऊपर उठकर कर्तव्य बोध के साथ कार्य करना चाहिए। अब आप लोगों के ऊपर यह एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी और बढ़ गई है। खेत में बीज बोया गया उसका अंकुरण हो गया है। अंकुरण के उपरांत अब जिम्मेदारी और ज्यादा है, खरपतवार से उस अंकुरण को बचाने की तथा समय-समय पर खाद-पानी देकर इसे पुष्ट करने की। उन्होंने कहा कि विगत दिनों आप लोगों ने जो कुछ सीखा और समझा और ग्रहण किया। अब उन सबके प्रयोग करने का समय आ गया है। उसमें सभी को मिल जुलकर के फलवान बनाना है।</p>
<p><strong>निश्चित शुरुआत में कठनाइयां ज्यादा आती हैं</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि मुझे इस बात की बेहद प्रसन्नता है कि गुरुकुलम् हमारी कल्पना के अनुरूप आकार ले रहा है तथा आने वाले दिनों में एक वृहद स्वरूप प्राप्त करेगा तथा ये नन्हे मुन्ने बच्चों के भविष्य को संवरेगा। उन्होंने कहा कि यह इन बच्चों का पहला साल है और निश्चित शुरुआत में कठनाइयां ज्यादा आती हैं। गुरुदेव ने मूक माटी लिखा है कि कितना भी कुशल पाक शास्त्री हो उसकी पहली रोटी कच्ची हो ही जाती है। उन्होंने कहा कि यह भले ही यह पहली रोटी है लेकिन, तवा गरम है और अब दनादन रोटियां सिकेंगी और सभी रोटियां फूली-फूली होगी, जो सभी के हृदय को और और आल्हादित करेगी।</p>
<p><strong>आपसी तालमेल को बनाए रखें</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि हम जो छोड़कर जा रहे हैं। उसे आप सभी लोग मिलकर और बड़ा कीजिए। उन्होंने भोपाल गुरुकुलम् की पूरी टीम को आशीर्वाद देते हुए कहा कि आप लोगों की आपस की एकता सदभाव और समन्वय बना रहना चाहिए। आपसी तालमेल को बनाए रखें तथा गुरुकुलम के नाम पर सभी अपना ईगो को गुरु चरणों में रखकर इस कार्य को आगे बढ़ाएंगे। उन्होंने कहा कि आप सभी का एक ही संकल्प रखें कि हमें अपने इस मिशन को आगे बढ़ाना है।</p>
<p><strong> जितना सानिध्य मिला है, उसमें संतोष करो</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि हमें आप सभी लोगों की भावना और भक्ति में कोई संशय नहीं है। आप लोगों को जितना सानिध्य मिला है, उसमें संतोष करो अब और रुकना संभव नहीं है। आप सभी जानते है कि जैन मुनियों का जीवन शास्त्रों से बंधा हुआ होता है तथा शास्त्रों की आज्ञानुसार ही जीवन आगे बढ़ता है। उन्होंने कहा कि दूरी मन की होती है,बाहर की नहीं, आप सभी लोग तो मन से इतने निकट आ चुके हो कि हमें अपने से कहीं दूर जाने ही नहीं दोगे इस अवसर पर महामंत्री अनुभव सराफ ने कहा कि आपने आशीर्वाद दिया और हम लोग इकट्ठे हुए और उसे गुरुकुलम् परिवार का रूप मिला। गुरुदेव अभी तक तो आप थे लेकिन, अब वह समय आ गया है कि हमें आपके बिना इसे आगे बढ़ाना होगा।</p>
<p><strong>टीम भावना के साथ काम करने की भावना व्यक्त की</strong></p>
<p>8 माह का समय कब निकल गया पता ही नहीं चला। उन्होंने गुरुकुलम् परिवार की भावना को सजल नेत्रों से व्यक्त करते हुए कहा कि आप हम सभी को ऐसा आशीर्वाद प्रदान करें कि हम सभी आपकी भावना में खरे उतरें। इस अवसर पर सुरेश जैन आइएएस, राजेश जैन, विनीत गोधा, सैज के प्रशांत जैन, नरेन्द्र जैन टोंग्या, रचना पारख आदि सभी टीम सदस्यों ने टीम भावना के साथ काम करने की भावना व्यक्त की तथा कहा कि हम आपकी भावनाओं पर खरे उतरेंगे।</p>
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		<title>सांसारिक प्राणिओं में शुभ और अशुभ परिणाम निरंतर होते रहते हैं: 1 नवंबर को भगवान का मस्तकाभिषेक होगा  </title>
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		<pubDate>Thu, 30 Oct 2025 12:11:44 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जिन सिद्ध परमात्मा की हम लोग आज आराधना कर रहे हैं। वह भी कभी संसार चक्र में ही फंसे हुए थे। उन्होंने इस संसार चक्र को भेदा और सिद्धचक्र में अपना स्थान बना लिया। यह उदगार मुनि श्री प्रमाणसागरजी ने अष्टान्हिका महापर्व के तहत व्यक्त किए। भोपाल से पढ़िए, यह खबर&#8230; भोपाल। जिन सिद्ध परमात्मा [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जिन सिद्ध परमात्मा की हम लोग आज आराधना कर रहे हैं। वह भी कभी संसार चक्र में ही फंसे हुए थे। उन्होंने इस संसार चक्र को भेदा और सिद्धचक्र में अपना स्थान बना लिया। यह उदगार मुनि श्री प्रमाणसागरजी ने अष्टान्हिका महापर्व के तहत व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">भोपाल से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>भोपाल।</strong> जिन सिद्ध परमात्मा की हम लोग आज आराधना कर रहे हैं। वह भी कभी संसार चक्र में ही फंसे हुए थे। उन्होंने इस संसार चक्र को भेदा और सिद्धचक्र में अपना स्थान बना लिया। यह उदगार मुनि श्री प्रमाणसागरजी महाराज ने अष्टान्हिका महापर्व के तहत व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि सांसारिक प्राणिओं में शुभ और अशुभ परिणाम निरंतर होते रहते हैं। उन परिणामों से ही कर्मबंध होकर नए-नए शरीर की प्राप्ति होती रहती है तथा मन विषयों में रमकर राग द्वेष की उत्पत्ति करता है। जिससे जन्म मरण का यह चक्र निरंतर चलता रहता है। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि 31 अक्टूबर को दोपहर 1.30 बजे से एमए सिटी (मेनिट) महाविधालय में युवा शक्ति को आत्म जाग्रति की ओर दिशा बोध कराते हुए संबोधन होगा।</p>
<p>जिससे वह अपने भविष्य को तय कर सकें तथा मुनिश्री का 3 बजे मंगल विहार श्री नेमीनाथ दिगंबर जैन झिरनो मंदिर की ओर होगा तथा सांयकालीन शंका समाधान एवं रात्रि विश्राम होकर 1 नवंबर शनिवार को भगवान का मस्तकाभिषेक एवं शांतिधारा तथा श्री गणधर वलय विधान होगा एवं आहार चर्या होगी।</p>
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		<title>अहंकार प्रभु का नहीं होने देता : मुनिश्री प्रमाणसागर जी ने बाबड़ीकला में दी अहंकार छोड़ने की सीख </title>
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		<pubDate>Sat, 20 Sep 2025 07:22:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बाबड़िया कला दिगंबर जैन मंदिर में धर्मसभा में मुनिश्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि अहंकार प्रभु चरणों में झुकने के बाद भी प्रभु का नहीं होने देता। भोपाल से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की खबर&#8230; भोपाल। बाबड़िया कला दिगंबर जैन मंदिर में धर्मसभा में मुनिश्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि अहंकार प्रभु चरणों में झुकने [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>बाबड़िया कला दिगंबर जैन मंदिर में धर्मसभा में मुनिश्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि अहंकार प्रभु चरणों में झुकने के बाद भी प्रभु का नहीं होने देता। <span style="color: #ff0000">भोपाल से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>भोपाल।</strong> बाबड़िया कला दिगंबर जैन मंदिर में धर्मसभा में मुनिश्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि अहंकार प्रभु चरणों में झुकने के बाद भी प्रभु का नहीं होने देता। &#8216;मैं कुछ हूं, यह मंदिर मेरा है, यह मेरे भगवान हैं, मैं पदाधिकारी हूं कि ऐसी अकड़ श्रद्धा को कमजोर करती है। मुनिश्री ने कहा कि विनम्र व्यक्ति श्रद्धाशील होता है। झुकने में उपलब्धि है जबकि, झुकाने में पीड़ा। जो झुकना जानता है, सृष्टि उसके चरणों में न्योछावर हो जाती है, और जो दूसरों को झुकाना चाहता है, सृष्टि उसे उखाड़कर फेंक देती है। पति-पत्नी के प्रसंग से उदाहरण देते हुए मुनिश्री ने बताया कि यदि मन नहीं झुका तो जीवन में संघर्ष और कटुता बनी रहती है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि काल्पनिक छवि को अपनी मान लेना अज्ञानता है। &#8216;मैं क्यों झुकूं यही जीवन की विडंबना है जबकि, झुकने की कला से जीवन कभी रुकता नहीं। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि मुनिसंघ का मंगल विहार ‘संस्कार उपवन प्राइड’ की ओर हुआ है। यहां तीन दिवसीय विशेष कार्यक्रम में प्रातः प्रवचन 8:30 बजे और सायं शंका-समाधान 6:20 बजे होंगे।</p>
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		<title>संस्कारों से ही संस्कृति रहेगी सुरक्षित : आचार्य श्री निर्भयसागरजी ने कहा &#8211; संत के साथ जुड़ा व्यक्ति कभी अधर्म नहीं कर सकता </title>
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		<pubDate>Thu, 07 Aug 2025 12:05:03 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ललितपुर के पार्श्वनाथ जैन अटामंदिर में विराजमान वैज्ञानिक संत आचार्य निर्भयसागर जी महाराज ससंघ ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि संस्कृति का संरक्षण संस्कारों के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने श्रावकों को चार प्रमुख सुखों का अनुसरण करने का संदेश भी दिया। पढ़िए अक्षय अलय की पूरी रिपोर्ट… ललितपुर स्थित पार्श्वनाथ दिगंबर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>ललितपुर के पार्श्वनाथ जैन अटामंदिर में विराजमान वैज्ञानिक संत आचार्य निर्भयसागर जी महाराज ससंघ ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि संस्कृति का संरक्षण संस्कारों के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने श्रावकों को चार प्रमुख सुखों का अनुसरण करने का संदेश भी दिया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए अक्षय अलय की पूरी रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>ललितपुर स्थित पार्श्वनाथ दिगंबर जैन अटा मंदिर में विराजमान वैज्ञानिक संत आचार्य श्री 108 निर्भयसागर जी महाराज ससंघ द्वारा आयोजित भव्य धर्मसभा में श्रद्धालु बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि किसी भी देश की संस्कृति तभी तक जीवित रह सकती है, जब तक वहाँ के नागरिकों में संस्कार जीवित रहते हैं। उन्होंने कहा कि संस्कारों के संवाहक संत होते हैं और भक्तों को संत ही भगवंत का मार्ग दिखाते हैं।</p>
<p>आचार्य श्री ने मानव शरीर की तुलना एक वास्तु से की, जिसमें आत्मा रूपी परमात्मा निवास करता है। उन्होंने श्रावकों को चार मुख्य सुखों का अनुसरण करने की प्रेरणा दी — पहला सुख निरोगी काया, दूसरा सुख घर में माया, तीसरा सुख कुलवती नारी और चौथा सुख आज्ञाकारी पुत्र।</p>
<p>धर्मसभा का शुभारंभ अनीता मोदी और पद्मा धनगौल द्वारा मंगलाचरण से हुआ। पादप्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट का सौभाग्य राजेन्द्र जैन, रवीन्द्र दिवाकर, अक्षय अलया, अनंत सराफ, अजय जैन, अजय बरया, मनोज जैन, हितेन्द्र वडघरिया, अभिषेक अनौरा, शैलेश जैन, रवि जैन, नवीन थनवारा एवं मनीष पवैया को प्राप्त हुआ।</p>
<p><strong>पुरुष्याजकों को सम्मानित किया </strong></p>
<p>इस अवसर पर जैन पंचायत अध्यक्ष डॉ. अक्षय टडैया, महामंत्री आकाश जैन, कैप्टन राजकुमार जैन, सनत खजुरिया, प्रबंधक अजय जैन गंगचारी, मनोज जैन बबीना, राजेन्द्र जैन थनवारा और आनंद जैन मावनगर द्वारा पुरुष्याजकों को सम्मानित किया गया।गौरतलब है कि अटा मंदिर में वर्तमान में आचार्य निर्भयसागर जी महाराज ससंघ विराजमान हैं। उनके सान्निध्य में मुनि शिवदत्त सागर, मुनि सुदत्त सागर, मुनि भूदत्त सागर, मुनि पद्मदत्त सागर, मुनि वृषभदत्त सागर, क्षुल्लक चन्ददत्त सागर एवं श्रीदत्त सागर महाराज श्रावकों को नियमित रूप से धार्मिक शिक्षण प्रदान कर रहे हैं। सायंकालीन शंका समाधान कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त कर रहे हैं।</p>
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		<title>श्रेष्ठ को नकारे नहीं उसे तुरंत करे हासिल : फूलों के माध्यम से संत ने समझाया चयन का मापदंड  </title>
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		<pubDate>Tue, 05 Aug 2025 07:25:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जीवन में चयन का क्या महत्व होता है। चयन का मापदंड भी कितना सहज और सरल हो सकता है। अच्छे और अच्छे के मोह में बंधे युवा श्रेष्ठ को भी नकारते चले जाते हैं। इसी बात को दिगंबर जैन संत ने शंका समाधान में कितने सहजता से युवा पीढ़ी के लिए संदेश दिया। इसका उत्तम [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जीवन में चयन का क्या महत्व होता है। चयन का मापदंड भी कितना सहज और सरल हो सकता है। अच्छे और अच्छे के मोह में बंधे युवा श्रेष्ठ को भी नकारते चले जाते हैं। इसी बात को दिगंबर जैन संत ने शंका समाधान में कितने सहजता से युवा पीढ़ी के लिए संदेश दिया। इसका उत्तम उदाहरण है यह प्रस्तुत लघुकथा। वैसे यह लघुकथा साभार है, लेकिन इसका संदेश सकल समाज के लिए होने से यहां प्रस्तुत है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह लघुकथा&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>(लघु् कथा)-सबसे सुंदर फूल-‘शादी‘</p>
<p><strong>इंदौर</strong>। जैन संत का चातुर्मास चल रहा था। हर दिन प्रवचन के बाद एक प्रश्न-उत्तर सत्र रखा जाता, जिसमें कोई भी श्रद्धालु अपनी जिज्ञासा, जीवन की उलझन या व्यवहारिक समस्या रख सकता था। संत बड़ी सहजता, तर्क और करुणा के साथ उनका समाधान करते थे-जैसे किसी पिता का मन बोल रहा हो। एक दिन एक वृद्ध दंपति भावुक होकर बोले,‘महाराज जी! हमारे बच्चे अब 30 की उम्र के हो चले हैं। अच्छे रिश्ते आते हैं, पर वो हर बार मना कर देते हैं। उन्हें कोई भी पसंद नहीं आता। हम बहुत चिंतित हैं, क्या करें? ’महाराज मुस्कुराए- आपका प्रश्न आज के समय की सच्ची पीड़ा है लेकिन, इसका उत्तर युवाओं को ही देना होगा-एक कार्य करें, एक विशेष दिन केवल परिपक्व अविवाहित युवक-युवतियों का सत्र रखिए। मैं उनसे बात करना चाहूंगा&#8230;’ आयोजकों ने घोषणा की- इस ‘रविवार दोपहर 3 बजे केवल युवाओं के लिए विशेष संवाद-सत्र होगा, और सभी को अपने घऱ के युवा को लाना होगा।’</p>
<p>रविवार का दिन था। सभा हाल युवाओं से खचाखच भरा था-कहीं आँखों में उलझन थी, कहीं मन में अपने निर्णय को सही साबित करने की जिद और कहीं बस चुप्पी’</p>
<p>संत ने माइक संभाला। कोई उपदेश नहीं दिया, बस धीमे स्वर में बोले-क्या तुम सभी जीवन में कुछ करना चाहते हो? सफल होना? सुखी होना?</p>
<p>सभी सिर हिलाते हैं। फिर बोले-तो जानो- जीवन में सफल वही होते हैं, जो निर्णय लेना जानते हैं, जो समझौते को कमजोरी नहीं, परिपक्वता मानते हैं और जो रिश्तों को ‘खोजना’ नहीं, बल्कि ‘बुनना’ जानते हैं।’ सब सुन रहे थे। भावनाएं भीतर तक उतर रही थीं। अचानक संत ने कहा- अब हम एक छोटी-सी गतिविधि करेंगे। चलो, आज जीवन का उत्तर फूलों से पूछते हैं&#8230;। सभागार के पीछे एक बड़ा फूलों का बगीचा था-रंग-बिरंगे फूल, सुगंधित पत्तियाँ, हवाओं में महक। संत ने कहा-</p>
<p>ष्इस बगीचे में से हर व्यक्ति को ‘सबसे सुंदर फूल’ चुनकर लाना है। पर एक शर्त है- अगर तुम किसी फूल को पीछे छोड़ दोगे, तो फिर लौटकर उसे नहीं ले सकते।</p>
<p>‘क्या सब तैयार हैं?’ ‘हाँ!’ -एक साथ आवाजें उठीं। और फिर सब निकल पड़े&#8230;</p>
<p>रास्ते में एक से बढ़कर एक फूल दिखे- गुलाब, मोगरा, सूर्यमुखी, चमेली, चम्पा&#8230;</p>
<p>पर सबने सोचा-“अभी और आगे चलें, शायद सबसे सुंदर आगे मिलें&#8230;.”</p>
<p>फिर आगे&#8230; और आगे&#8230; पर अचानक वे बगीचे के अंत तक पहुंच गए। अब कोई ढंग का फूल नहीं था लेकिन, अब पीछे लौटने की अनुमति नहीं थी&#8230; हाँ!काफी युवक-युवतियां हाथ में फूल लेकर लौटे- उन्होंने जल्दी निर्णय लिया था। पर 10-12 युवा ऐसे थे, जो खाली हाथ लौटे। सभा में सभी खड़े हुए। संत ने पूछा</p>
<p>‘कितनों के पास फूल हैं?’</p>
<p>कुछ हाथ उठे। फिर आवाज़ गुंजी..</p>
<p>‘कितने खाली हाथ लौटे?’</p>
<p>12 सिर झुकाये खडे हो गए&#8230; संत ने गहरी सांस ली और बोले-तुम्हारे जैसे ही वे युवा हैं, जो आज रिश्तों से भागते हैं, विवाह को टालते हैं- सोचते हैं कि और सुंदर रिश्ता, और परिपकव आगे होगा लेकिन, बच्चो, ये ‘सबसे सुंदर’ नाम की कोई चीज़ होती ही नही है, सुंदरता वह नहीं जो दिखे, सुंदरता वह है जो तुम्हारे निर्णय से सजे। ‘रिश्ता वही श्रेष्ठ है, जिसे तुम समझदारी से अपनाओ, उसे प्यार दो, उसकी कद्र करो।</p>
<p>प्यार खोजने की चीज़ नहीं, देने की प्रक्रिया है।रिश्ता पूर्ण तभी बनता है जब तुम अधूरेपन में भी अपनापन देख सको&#8230;’</p>
<p>सभा शांत थी।</p>
<p>शब्द नहीं, भाव बोल रहे थे।</p>
<p>‘याद रखना-जो जल्दी निर्णय ले लेता है, वह जीवन के बगीचे में मुस्कुराता है और जो देर करता है, वह अक्सर खाली हाथ लौटता है- पछतावे और अकेलेपन के साथ।</p>
<p>तय करो- तुम फूल लोगे, या प्रतीक्षा करते रहोगे? उस दिन कई युवाओं की सोच बदली। किसी ने पहली बार रिश्ते को आदर्श नहीं, संवेदनशील समझौता मानकर देखा और कईयों ने उसी शाम यह संकल्प लिया- अगला प्रस्ताव आए तो मैं सकारात्मक ढंग से देखूंगा क्योंकि, सबसे सुंदर फूल वहीं होता है&#8230;जहां तुम थोड़ा झुकते हो, थोड़ा समझते हो, और सबसे ज्यादा-प्यार करते हो।</p>
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		<title>आचार्य निर्भय सागर का कथन अहंकारी नहीं भक्त बनो : आचार्यश्री ने समाज के विभिन्न रूपों से करवाया परिचय                   </title>
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		<pubDate>Fri, 27 Jun 2025 14:31:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[संत आचार्यश्री निर्भय सागरजी संघ का सहित बडे़ मंदिर महरौनी में 10 दिवसीय प्रवास रहा। प्रतिदिन प्रातः आचार्यश्री के मंगल प्रवचन एवं शाम को शंका समाधान का कार्यक्रम संयोजित किया गया। शुक्रवार को भी यहां धर्म सभा हुई। इसमें बड़ी संख्या में समाजजनों ने उनकी देशना सुन धर्मलाभ अर्जित किया। महरौनी से राजीव सिंघई की [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>संत आचार्यश्री निर्भय सागरजी संघ का सहित बडे़ मंदिर महरौनी में 10 दिवसीय प्रवास रहा। प्रतिदिन प्रातः आचार्यश्री के मंगल प्रवचन एवं शाम को शंका समाधान का कार्यक्रम संयोजित किया गया। शुक्रवार को भी यहां धर्म सभा हुई। इसमें बड़ी संख्या में समाजजनों ने उनकी देशना सुन धर्मलाभ अर्जित किया। <span style="color: #ff0000">महरौनी से राजीव सिंघई की पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>महरौनी।</strong> आचार्यश्री निर्भय सागरजी संघ का सहित बडे़ मंदिर महरौनी में 10 दिवसीय प्रवास रहा। प्रतिदिन प्रातः आचार्यश्री के मंगल प्रवचन एवं शाम को शंका समाधान का कार्यक्रम संयोजित किया गया। शुक्रवार को भी यहां धर्म सभा हुई। इसमें बड़ी संख्या में समाजजनों ने उनकी देशना सुन धर्मलाभ अर्जित किया। आचार्यश्री निर्भयसागरजी ने धर्मसभा में उपदेश देते हुए कहा कि समाज अनेक प्रकार के होते हैं। जैसे स्वार्थी समाज, परमार्थी समाज, स्वस्थ समाज, धार्मिक समाज, भक्त समाज, व्यसनी सम, हिंसक समाज, अहिंसक समाज और उपकारी समाज। हमें उपकारी, अहिंसक, स्वस्थ समाज का निर्माण करना है। यही जैन धर्म का मूल उद्देश्य है। जैन समाज स्वयं परमार्थी, उपकारी, धार्मिक और अहिंसक समाज है। परस्पर उपकार करने वाला समाज स्वस्थ समाज कहलाता है। परस्परता के सूत्र में बंध जाने पर परोपकार की भावना पैदा होती है और संघर्ष समाप्त हो जाता है। जो समाज भगवान की भक्ति करता है, परिवार और समाज की सेवा में लीन रहता है। वह भक्त समाज कहलाता है।</p>
<p><strong>विनय को मोक्ष का द्वार कहा है</strong></p>
<p>आचार्यश्री ने धर्मसभा में कहा कि भक्ति रूपी चाबी से मुक्ति महल में लगा ताला खुल जाता है। विनय करने से मोक्ष महल में लगा हुआ दरवाजा खुलता है, इसलिए विनय को मोक्ष का द्वार कहा है। भक्त और भगवान के बीच संबंध जोड़ने में भक्ति सेतु का काम करती है, भक्ति आत्म उत्थान का सूत्र है। परोपकार समाज उत्थान का सूत्र है। सेवा परिवार के उत्थान का सूत्र है। आचार्य श्री ने कहा कि जिस व्यक्ति के अंदर भक्ति की हवा भरी होती है। वह वालीबाल के समान होता है। उसे लोग गिरने नहीं देते बल्कि हाथों हाथों में लिए रहते हैं, लेकिन जिसके अंदर अहंकार की हवा भरी होती है। वह फुटबाल के समान होता है उसे कोई हाथ नहीं लगाता है। फुटबाल के समान अहंकारी व्यक्ति का स्थान पैरों के नीचे होता है। वह संसार की ठोकर खाता रहता है।</p>
<p><strong>ललितपुर तब तक ना छोड़िए जब तक ना हो उद्धार</strong></p>
<p>अपने जीवन को फुटबाल नहीं वालीबाल बनाना चाहिए। तभी समाज में इज्जत होगी और स्वर्ग की ओर आत्मा की गति होगी। संसारी प्रत्येक मानव को जन्म जरा मृत्यु रोग अनादि काल से लगे हुए है। प्रत्येक संसारी प्राणी आहार, भय, मैथुन और अपरिग्रह संज्ञा से पीड़ित है। इस पीड़ा को धर्म रूप औषधि से दूर किया जा सकता है। आचार्य श्री ने बुंदेलखंड में चलने वाली कहावत के अनुसार कहा कि झांसी गले की फांसी, दतिया गले का हार, ललितपुर तब तक ना छोड़िए जब तक ना हो उद्धार। पूजा, भक्ति एवं आरती की परंपरा अनादि कालीन है। प्रातः काल देवकी पूजा करना चाहिए। दोपहर में गुरु को आहार दान रूपी भक्ति करना चाहिए और शाम को संध्याकाल में धर्मशास्त्र की आरती करना चाहिए। यही त्रिकाल वंदना है। भक्ति है और पूजा है। इसको करने वाला तीन लोक का नाथ बन जाता है। प्रवचन के बाद आचार्य संघ की आहार चर्या हुई। सामायिक करने के बाद आचार्य संघ का ललितपुर की ओर चातुर्मास के लिए मंगल विहार हुआ।</p>
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