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	<title>वैशाख कृष्ण द्वितीया &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>भगवान पार्श्वनाथ का गर्भ कल्याणक महोत्सव: वैशाख कृष्ण द्वितीया तिथि के अनुसार इस बार यह 15 अप्रैल को </title>
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		<pubDate>Tue, 15 Apr 2025 02:41:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के तेइसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी का गर्भ कल्याणक वैशाख कृष्ण द्वितीया को धार्मिक उल्लास के साथ मनाया जाएगा। दिगंबर जैन मंदिरों में अभिषेक, शांतिधारा, विधान आदि के कार्यक्रम पांरपरिक रूप से आयोजित किए जाएंगे। इस बार यह गर्भ कल्याण 15 अप्रैल को मनाया जाएगा। भगवान पार्श्वनाथ के गर्भ कल्याण से जुड़ी जानकारी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के तेइसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी का गर्भ कल्याणक वैशाख कृष्ण द्वितीया को धार्मिक उल्लास के साथ मनाया जाएगा। दिगंबर जैन मंदिरों में अभिषेक, शांतिधारा, विधान आदि के कार्यक्रम पांरपरिक रूप से आयोजित किए जाएंगे। इस बार यह गर्भ कल्याण 15 अप्रैल को मनाया जाएगा। <span style="color: #ff0000">भगवान पार्श्वनाथ के गर्भ कल्याण से जुड़ी जानकारी श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रंखला में उपसंपादक प्रीतम लखवाल के संयोजन में पढ़िए&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> तेइसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का गर्भ कल्याण इस बार 15 अप्रैल को है। इस दिन वैशाख कृष्ण द्वितीया है। इसी दिन भगवान ने अपनी माता के गर्भ में अवतरण लिया था। इस दिवस को पूरे भारत वर्ष में भगवान पारसनाथ जी के मंदिरों में धूमधाम से बनाया जाएगा। दिगंबर जैन मंदिरों में अभिषेक, शांतिधारा सहित विविध आयोजन कर जैन समाज के श्रावक-श्राविकाएं पुण्यलाभ अर्जित करेंगे। इस दिन दिनभर भगवान की भक्ति आराधना की जाएगी। जैन धर्म ग्रंथों के अनुसार काशी में 83 दिन की कठोर साधना और तप के बाद 84 वें दिन उन्हें केवल ज्ञान मिला था। पुंड़्र, ताम्रलिप्त आदि अनेक देशों में उन्होंने भ्रमण किया। ताम्रलिप्त में उनके शिष्य हुए। पार्श्वनाथ ने चतुर्विध संघ की स्थापना की। इसमें श्रमण, श्रमणी, श्रावक, श्राविका होते हैं और आज भी जैन समाज इसी स्वरूप में है। प्रत्येक गण एक गणधर के तहत कार्य करता था। सभी अनुयायियों, स्त्री हों या पुरुष सभी को समान माना जाता था। तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने जैन धर्म के चार मुख्य व्रत सत्य, अहिंसा, अस्तेय और अपरिग्रह की शिक्षा दी थी।</p>
<p><strong>वामादेवी ने गर्भकाल में एक बार स्वप्न में सर्प देखा था</strong></p>
<p>जैन ग्रंथों के अनुसार वर्तमान में काल चक्र का अवरोही भाग, अवसर्पिणी गतिशील है और इसके चौथे युग में 24 तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। भगवान् पार्श्वनाथ का जन्म वाराणसी के भेलूपुर में हुआ था। तीर्थंकर पार्श्वनाथ का जन्म लगभग 2 हजार 9 सौ वर्ष पूर्व वाराणसी में हुआ था। वाराणसी में अश्वसेन नाम के इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रिय राजा थे। उनकी रानी वामा ने पौष कृष्ण एकादशी के दिन महा तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। जिसके शरीर पर सर्प चिन्ह था। वामादेवी ने गर्भकाल में एक बार स्वप्न में सर्प देखा था। इसलिए पुत्र का नाम ‘पार्श्व’ रखा गया। उनका प्रारंभिक जीवन राजकुमार के रूप में बीता। एक दिन पार्श्व ने महल से देखा कि पुरवासी पूजा की सामग्री लिए एक ओर जा रहे हैं। उन्होंने देखा कि एक तपस्वी, जहां पंचाग्नि जला रहा है और अग्नि में एक सर्प का जोड़ा मर रहा है। तब पार्श्वनाथ ने कहा:-‘दयाहीन धर्म किसी काम का नहीं।’ यह देख उनको वैराग्य हुआ और पार्श्वनाथ ने 30 वर्ष की उम्र में घर त्याग दिया और दीक्षा ली। अपना निर्वाणकाल समीप जानकर श्री सम्मेद शिखरजी पहुंचे। जहां श्रावण शुक्ल सप्तमी को उन्हे मोक्ष मिला।</p>
<p>भगवान पार्श्वनाथ की लोक व्यापकता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि आज भी सभी तीर्थंकरों की मूर्तियों और चिन्हों में पार्श्वनाथ का चिन्ह सबसे ज्यादा है। आज भी पार्श्वनाथ की कई चमत्कारिक मूर्तियां देशभर में विराजित हैं। जिनकी गाथा आज भी पुराने लोग सुनाते हैं। जैन ग्रंथों में तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के नौ पूर्व जन्मों का वर्णन है। पहले जन्म में ब्राह्मण, दूसरे में हाथी, तीसरे में स्वर्ग के देवता, चौथे में राजा, पांचवें में देव, छठवें जन्म में चक्रवर्ती सम्राट और सातवें जन्म में देवता, आठ में राजा और नौवें जन्म में राजा इंद्र (स्वर्ग) के बाद 10वें जन्म में उन्हें तीर्थंकर बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पूर्व जन्मों के संचित पुण्यों और 10वें जन्म के तप के फलस्वरूप तीर्थंकर बनें।</p>
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		<title>आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी के वैराग्यपथ पर संयम के 73 वर्ष : कठोर साधना से जैन समाज को अमूल्य सृजन किया प्रदान </title>
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		<pubDate>Sat, 15 Mar 2025 10:07:44 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी के वैराग्य पथ पर संयम धारण करने के 73 साल पूरे हो गए हैं। आर्यिका श्री ने अपने ज्ञान प्रकाश से जैन समाज को अद्भुत प्रभावना से अलंकृत किया है। आचार्यश्री देशभूषण जी महाराज और आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज से दीक्षित आर्यिका इन दिनों अयोध्या में विराजित हैं। अयोध्या से अभिषेक [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी के वैराग्य पथ पर संयम धारण करने के 73 साल पूरे हो गए हैं। आर्यिका श्री ने अपने ज्ञान प्रकाश से जैन समाज को अद्भुत प्रभावना से अलंकृत किया है। आचार्यश्री देशभूषण जी महाराज और आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज से दीक्षित आर्यिका इन दिनों अयोध्या में विराजित हैं। <span style="color: #ff0000">अयोध्या से अभिषेक पाटील की यह विशेष प्रस्तुति पढ़िए&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अयोध्या(उप्र)।</strong> गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ अयोध्या (उप्र) में विराजमान हैं। सन् 1934 की शरद पूर्णिमा के शुभ दिन जब चंद्रमा की शुभ्र छटा संपूर्ण धरा को अपने आवेश में समेटे थे। तब उप्र के बाराबंकी जनपद के टिकेत नगर में बाबू छोटेलाल जैन के घर एक कन्या का जन्म हुआ। कौन जानता था कि मां मोहिनी की यह कन्या एक दिन जगत माता बनकर अपने ज्ञान के प्रकाश से सम्पूर्ण विश्व को आलोकित करेगी। पद्मनंदि पंच विंशतिका के स्वाध्याय के कारण बचपन से ही विकसित वैराग्य के बीज 1952 में शरद पूर्णिमा के दिन ही प्रस्फुटित हुए, जब बाराबंकी में आपने आचार्य श्री देशभूषण जी महाराज से सप्तम प्रतिमा (ब्रह्मचर्य) के व्रत अंगीकार किए। 1953 में चैत्र कृष्णा एकम् को श्री महावीर जी में आचार्य श्री देशभूषण जी से क्षुल्लिका दीक्षा ग्रहण कर ‘वीरमति’ नाम प्राप्त किया।</p>
<p>व्रत एवं नियमों का कठोरता से पालन करते हुए आप अपनी संज्ञा ‘वीरमति’ को तो सार्थक कर ही रही थीं, किन्तु आपको मात्र क्षुल्लिका के व्रतों से संतोष कहां। 19 वर्ष की यौवनावस्था में क्षुल्लिका के व्रतों का कठोरता से पालन करने के साथ ही आप निरंतर वैराग्य के भावों को विकसित करती रहीं एवं आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज की आज्ञा से उनके ही शिष्य आचार्यश्री वीरसागर जी से वैशाख कृष्ण द्वितीया को 1956 में माधोराजपुरा में आर्यिका के व्रतों को अंगीकार कर ‘ज्ञानमति’ की सार्थक संज्ञा प्राप्त की। धन्य हैं वे आचार्य श्री वीरसागर जी, जिन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से इनकी प्रतिभा का आंकलन कर इन्हें ‘ज्ञानमति’ नाम दिया।</p>
<p><strong>आचार्य श्री के तीन बार दर्शन करने वाली आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी </strong></p>
<p>आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी दैदीप्यमान सूर्य की भांति अपने प्रकाश-रश्मियों से जैन समाज को आलोकित कर रहीं हैं। श्री ज्ञानमति माताजी, जिन्होंने आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी के तीन बार दर्शन किए। नीरा (महाराष्ट्र) में सन् 1954 में, बारामती (महा.) में सन् 1955 में तथा कुंथलगिरि सिद्धक्षेत्र (महा.) में सन् 1955 में सल्लेखना के समय। सन् 1955 में आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी ने कुंथलगिरि में देशभूषण-कुलभूषण जी की प्रतिमा के समक्ष 12 वर्ष की सल्लेखना ली थी। ज्ञानमति माताजी उस समय क्षुल्लिका अवस्था में वीरमति माताजी थीं। कुंथलगिरि में एक माह आचार्यश्री के श्रीचरणों में रहीं। क्षुल्लिकावस्था में आचार्य श्री की प्रत्यक्ष सल्लेखना तो देखी ही। साथ ही उनके श्रीमुख से अनेक अनुभव वाक्य भी प्राप्त किए।</p>
<p><strong>विराट साहित्य की श्रृंखला का किया सृजन </strong></p>
<p>ज्ञानमति माताजी (क्षुल्लिका वीरमति) ने आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी से आर्यिका दीक्षा की याचना की थी लेकिन, आचार्य श्री ने कहा था कि मैंने सल्लेखना ले ली है और अब दीक्षा देने का त्याग कर दिया है। तुम मेरे शिष्य वीरसागर से आर्यिका दीक्षा लेना। अतः आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के आदेशानुसार उन्होंने 1956 की वैशाख कृष्ण दूज को माधोराजपुरा (जयपुर-राजस्थान) में आचार्य श्री शांतिसागर जी के शिष्य आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज से आर्यिका दीक्षा (महिलाओं के लिए दीक्षा की सर्वाेच्च अवस्था) ली और आर्यिका ज्ञानमति बन गईं। नाम के अनुसार सारे विश्व में एक विराट साहित्य की श्रृंखला का सृजन किया।</p>
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