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	<title>वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनंदी जी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनंदी जी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>भाव लब्धि बिना सम्यक्त्व नहीं होता : वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव: अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में गुरु-शिष्य संबंध, विनय धर्म और आत्मशुद्धि का बताया महत्व </title>
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		<pubDate>Tue, 09 Jun 2026 17:48:45 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भिलुडा के निकट शिवगौरी आश्रम से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने कहा कि भाव लब्धि के बिना सम्यक्त्व संभव नहीं है। उन्होंने विनय, गुरु भक्ति और आत्मशुद्धि के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। पढ़िए अजीत कोठिया की खबर  भिलुड़ा । भिलुडा के पास स्थित शिवगौरी आश्रम से आयोजित अंतरराष्ट्रीय [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भिलुडा के निकट शिवगौरी आश्रम से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने कहा कि भाव लब्धि के बिना सम्यक्त्व संभव नहीं है। उन्होंने विनय, गुरु भक्ति और आत्मशुद्धि के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। <span style="color: #ff0000">पढ़िए अजीत कोठिया की खबर </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>भिलुड़ा</strong> । भिलुडा के पास स्थित शिवगौरी आश्रम से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य श्री कनक नंदी जी गुरुदेव ने कहा कि भाव लब्धि के बिना सम्यक्त्व की प्राप्ति संभव नहीं है। उन्होंने बताया कि जो शिष्य के अनुग्रह में कुशल होता है, वही सच्चा धर्माचार्य कहलाता है।</p>
<p><strong>विनय से विकसित होते हैं गुरु के गुण</strong></p>
<p>गुरुदेव ने कहा कि विनय से ही आचार्य के गुण उत्पन्न होते हैं और विनय से ही प्रायश्चित का मार्ग खुलता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे खाली बर्तन को भरने के लिए उसे नीचे रखना पड़ता है, उसी प्रकार ज्ञान प्राप्त करने के लिए शिष्य को विनम्र भाव से गुरु के चरणों में जाना पड़ता है।</p>
<p><strong>आत्मशुद्धि का माध्यम है विनय</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि विनय आत्मा की शुद्धि का महत्वपूर्ण साधन है। विनय से कर्मों का क्षय होता है और व्यक्ति कलह, विवाद तथा मानसिक तनाव से मुक्त होता है। विनयवान व्यक्ति में मान, माया और अहंकार का अभाव हो जाता है तथा लघुता का गुण विकसित होता है।</p>
<p><strong>दिखावे से नहीं, सरलता से आता है विनय</strong></p>
<p>धर्माचार्य ने कहा कि केवल बाहरी क्रियाकांड और दिखावे से विनय गुण प्रकट नहीं होता। इसके लिए सरलता, नम्रता और निष्कपट भाव आवश्यक हैं। जो व्यक्ति वास्तव में विनीत होता है, उसमें लोभ, घमंड और तिरस्कार की भावना नहीं रहती।</p>
<p><strong>गुरु अज्ञान का अंधकार दूर करते हैं</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि अध्यात्म को समझना सबसे कठिन कार्य है। जो मोह रूपी अंधकार को दूर कर सही मार्ग दिखाए, वही गुरु कहलाता है। गुरु का सान्निध्य मन के तनाव और भ्रम को समाप्त कर जीवन में नई दिशा प्रदान करता है।</p>
<p><strong>आलस्य और प्रमाद से बचने का संदेश</strong></p>
<p>गुरुदेव ने आलस्य को महादोष बताते हुए कहा कि प्रमादी व्यक्ति कभी आदर्श शिष्य नहीं बन सकता। इंद्रियों और मन पर नियंत्रण रखने वाला ही ध्यान और साधना में सफलता प्राप्त कर सकता है।</p>
<p><strong>निंदा और क्रोध से दूर रहने की सीख</strong></p>
<p>वेबीनार में उन्होंने कहा कि दूसरों के दोषों का प्रचार करना निंदा है और यह आध्यात्मिक प्रगति में बाधक बनता है। सच्चा शिष्य क्षमाशील, नम्र और संयमी होता है। वह क्रोध के अवसर आने पर भी स्वयं को नियंत्रित रखता है और किसी का तिरस्कार नहीं करता।</p>
<p><strong>गुरु के प्रति सम्मान बनाए रखना चाहिए</strong></p>
<p>गुरुदेव ने कहा कि यदि कभी गुरु के मुख से कोई शब्द त्रुटिवश निकल जाए, तब भी उनकी निंदा नहीं करनी चाहिए। अच्छा शिष्य अपने गुरु और मित्रों के प्रति सम्मान बनाए रखता है तथा उनके गुणों का ही वर्णन करता है।</p>
<p><strong>मंगलाचरण से हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ</strong></p>
<p>कार्यक्रम की शुरुआत मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी गुरुदेव द्वारा आचार्य श्री रचित कविता—</p>
<p>&#8220;मने तो लड़ाई झगड़ा नहीं आवे,</p>
<p>मने तो समता, शांति, सत्य भावे&#8221;</p>
<p>के मंगलाचरण से हुई। इस अवसर पर उपस्थित श्रोताओं ने आध्यात्मिक संदेशों को आत्मसात करने का संकल्प लिया।</p>
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		<title>शिष्य का प्रथम महत्वपूर्ण गुण जो श्रवण करे : वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी जी ने बताए योग्य शिष्य के महत्वपूर्ण गुण </title>
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		<pubDate>Mon, 08 Jun 2026 16:23:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित किया। इसमें उन्होंने में योग्य शिष्य के गुणों का बखान किया। पढ़िए, बांसवाड़ा से अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230; बांसवाड़ा। वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित किया। इसमें उन्होंने में योग्य शिष्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित किया। इसमें उन्होंने में योग्य शिष्य के गुणों का बखान किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए, बांसवाड़ा से अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बांसवाड़ा।</strong> वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित किया। इसमें उन्होंने में योग्य शिष्य के गुणों का बखान किया। उन्होंने कहा कि एक योग्य शिष्य में क्या-क्या गुण होने चाहिए। उन्होंने कहा कि जो सदा से गुरुकुल में रहता है। गुरु आज्ञा का नित्य पालन करता है। समता में रहता है उपधान पूर्वक अर्थात नियम पूर्वक शास्त्र अध्ययन करता है, वह प्रिय भाषी होता है और शिक्षा को श्रवण करके ग्रहण करता है। शिष्य का पहला गुण सुश्रुषा अर्थात श्रवण करने वाला होना चाहिए। परम उपलब्धि की भावना से शिष्यत्व ग्रहण करने वाला सर्वश्रेष्ठ है। श्रोता सुख का अभिलाषी होना चाहिए क्योंकि, जो सुख चाहेगा वही शास्त्र श्रवण करेगा। श्रोता 8 गुणों से युक्त होता है। उसके पास सुव्यवस्थित ज्ञान होना चाहिए। अनेक भाषाओं के ज्ञान रखने वाले की स्मरण शक्ति अधिक होती है। उन्होंने कहा कि गुरुदेव जो बोलते हैंज़ उसे भावना पूर्वक एकाग्रचित होकर सुनना चाहिए। भगवान ने हमें पांच इंद्रियां दी हैं। स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, कर्ण। इनमें कर्ण इंद्री सबसे श्रेष्ठ है। जो सुन नहीं पाते हैंज़ वह बोल भी नहीं पाते हैं। प्राचीन काल में अनेक अंधे भी श्रेष्ठ कवि हुए हैं। जो अधिक सुनता है वह श्रेष्ठ वक्ता होता है। जो हितोपदेश नहीं सुनता है वह श्रेष्ठ वक्ता नहीं बन सकता।</p>
<p><strong> एकाग्रता बिना विषय को नहीं समझ सकते</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि योग्य शिष्य का दूसरा गुण प्रति प्रच्छना अर्थात पूछना जिज्ञासा करना परम तप है। तत्व जिज्ञासा करनी चाहिए परंतु, तत्व जिज्ञासा करने में अहंकार बाधक होता है। एकाग्रचित होकर सुनना यह श्रोता का तीसरा गुण है। आचार्य श्री हमेशा स्वाध्याय कराते हुए कहते हैं कि मुझे ही देखो मुझे ही सुनो मेरे सामने ही देखो। एकाग्रता बिना विषय को नहीं समझ सकते। शिष्य का चौथा गुण ग्रहण करना है। एक कान से सुनना दूसरे कान से निकाल देना। यह श्रेष्ठ श्रोता का लक्षण नहीं है। अयोग्य शिष्य कहता है मैं घर्म जानूंगा पर धर्म नहीं करूंगा। मैं अधर्म जानता हूं परंतु, अधर्म नहीं छोडूंगा।</p>
<p><strong>शब्द ज्ञान बिना भाषा ज्ञान नहीं होगा</strong></p>
<p>जो सुनता है, वह आचरण में लाने वाला श्रेष्ठ श्रोता है। बुरा ना सोचना यह सबसे श्रेष्ठ है। गांधी जी के तीन बंदर बुरा ना देखो, बुरा ना सुनो, बुरा ना बोलो इतना ही पूर्ण नहीं है उसके साथ-साथ बुरा ना सोचो जोड़ना चाहिए यह श्रेष्ठ विचार है। अच्छा भोजन करें परंतु पचे नहीं तो जहर बन जाता है। तत्व जिज्ञासु बने बिना सही विद्यार्थी नहीं बन सकते। उपाहोऊ अर्थात सोचना चाहिए विज्ञान में परिकल्पना को अधिक महत्व दिया गया है। परिकल्पना से बुद्धिमता अधिक बढ़ती है। लोक में प्रचलित मान्यता को सही मानना रूढ़िवादिता है, अंधविश्वास है। धारण करना स्मरण ज्ञान बिना जोड़ रूप ज्ञान नहीं होगा। शब्द ज्ञान बिना भाषा ज्ञान नहीं होगा। गुरु से प्राप्त ज्ञान को जीवन में उतारना चाहिए प्रयोग में लाना चाहिए। सुख-सुविधाओं से विद्यार्थी अधिक निकम्मे बन जाते हैं।</p>
<p>जो स्वर्ग मोक्ष ले जाए वह मोक्ष विनय है। विनय मोक्ष का द्वार है।</p>
<p><strong>जो विनयवंत है वही शिष्य हैं</strong></p>
<p>विनय से ही अनुशासन होता है। विनय ही अनुशासन है। अतः शिष्य को विनय से युक्त होना चाहिए। शिक्षा का फल विनय है। विनय का फल सर्व जीवो का कल्याण है। विनयवंत को ही गुरु अनुशासित करते हैं। स्वयं अनुशासित रहने वाला ही अपने शिष्यों को भक्तों को अनुशासित कर सकता है। विनय से संयम,विनय से तप, विनय से दान आदि होता है। विनयवंत पर ही अनुग्रह किया जाता है। विनयवान शिष्य पर ही गुरु अनुग्रह निग्रह करते हैं सभी पर नहीं। साधु पत्नी के पति नहीं त्रिलोक्य पति होते हैं। अविनीत शिष्य बनना संभव नहीं है, जिसको अनुशासित करके पढ़ा करके आगे बढ़ाया जा सके वह शिष्य है जो विनयवंत है वही शिष्य हैं।</p>
<p>मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी गुरुदेव ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता &#8216;छोटी तुच्छ घास हूं सबसे मैं नीचे हूं पैर के नीचे सबसे तुच्छ हूं। सर्दी गर्मी वर्षा सब सहन करु हूं।&#8217;</p>
<p>द्वारा मंगलाचरण किया। इस अवसर पर मुनि श्री अध्यात्मनंदी सौम्यनदी, सुवत्सलमति माताजी, क्षु भक्ति श्री, ब्रह्मचारी वर्ण भैया, शैलेंद्र भट्ट, सारिका भट्ट, विदुषी उर्वशी, प्रतिभा, प्रेमलता,ममता, राजकुमारी, चंद्रलेखा, चंद्रकांत, श्रीपाल, धनपाल आदि भीलुड़ा कोटा पुनर्वास कॉलोनी खोड्न आदि से अनेक श्रावक उपस्थित थे। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>मैं आनंद स्वरूप हूं, ऐसा अनुभव करना होगा : वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी ने दिए वेबिनार में स्वयं को पहचाने के सूत्र  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/one_must_experience_oneself_as_the_embodiment_of_bliss/</link>
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		<pubDate>Tue, 19 May 2026 11:38:39 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य कनक नंदीजी ने शिवगौरी आश्रम भिलुड़ा राजस्थान से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कहा कि स्वयं को जानना विश्व की सबसे बड़ी उपलब्धि है। मैं समस्त दुखों से संसार की प्रत्येक वस्तु से भिन्न हूं। मैं आनंद स्वरूप हूं। डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230; डडूका। आचार्य कनक नंदीजी ने शिवगौरी आश्रम भिलुड़ा राजस्थान [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य कनक नंदीजी ने शिवगौरी आश्रम भिलुड़ा राजस्थान से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कहा कि स्वयं को जानना विश्व की सबसे बड़ी उपलब्धि है। मैं समस्त दुखों से संसार की प्रत्येक वस्तु से भिन्न हूं। मैं आनंद स्वरूप हूं। <span style="color: #ff0000">डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>डडूका।</strong> आचार्य कनक नंदीजी ने शिवगौरी आश्रम भिलुड़ा राजस्थान से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कहा कि स्वयं को जानना विश्व की सबसे बड़ी उपलब्धि है। मैं समस्त दुखों से संसार की प्रत्येक वस्तु से भिन्न हूं। मैं आनंद स्वरूप हूं, ऐसा अनुभव करना पड़ेगा। चेतना ही परम आध्यात्मिक मैं हूं। उन्होंने कहा कि संकल्प विकल्प से आत्म शक्ति कुंठित हो जाती है। जिसका मन शांत हो गया है, उसके विकार शांत हो गए हैं। ऐसा योगी आत्म सुख प्राप्त करता है। ज्ञानानंद सच्चिदानंद आत्मा से जुड़ने वाले योगी प्राप्त करते हैं। आर्त ध्यान रौद्र ध्यान करते हुए प्रसन्नता आनंद शांति कभी प्राप्त नहीं हो सकती। कभी दुर्गुणों से युक्त होने पर प्रसन्नता खुशी नहीं प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि शारीरिक मलमूत्र के वेग को नहीं रोकना चाहिए परंतु, मानसिक रोग ईर्षा, द्वैष, घृणा, अहंकार आदि को रोकना चाहिए। जिस प्रकार बल्ब के ऊपर धूल मिट्टी लगी हुई है तो प्रकाश फैलता नहीं है। इसी प्रकार इन मानसिक रोगों से आत्मा का प्रकाश जागृत नहीं होता है। बॉडी माइंड सॉल का अंतर संबंध है, तीनों एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। ध्यान मन की पवित्रता योग मोक्ष लक्ष्मी को वश करने के लिए श्रेष्ठ उपाय है। मन से अधिक शक्तिशाली आत्मा है। जब तक मन शांत नहीं है तब तक बाह्य तप करना शरीर को दंडित करना है।</p>
<p><strong>मन शुद्धि से अविद्यमान गुण भी विद्यमान हो जाते हैं</strong></p>
<p>अधिकतर संसारी लोग शारीरिक सुख के लिए धर्म करते हैं। जिस प्रकार तुष अर्थात छिलके कूटने से केवल श्रम होता है परंतु चावल नहीं निकलते हैं वैसे ही आत्मज्ञान बिना अनंत भव में साधु बनने पर भी मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते। मन की शुद्धि ही एक मोक्ष मार्ग रुपी मार्ग में मार्ग प्रकाशक दीपिका है। इसको नहीं पाने से अनेक मोक्ष मार्गाे मोक्ष मार्ग से च्युत हो जाते हैं। मन शुद्धि से अविद्यमान गुण भी विद्यमान हो जाते हैं। जिनके पास गुण नहीं होते हैं परंतु मन शांत होने पर गुण प्रकट हो जाते हैं। मन शुद्ध से स्वयं ज्ञान प्रकट होता है। आनंद उत्पन्न होता है। मन की अशुद्धि से जो गुण होते हैं वह भी दुर्गुण बन जाते हैं। कब ये पापी मन पावन होगा। कब राग,द्वैष, मोह त्यागेगा। इस कविता द्वारा मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने मंगलाचरण किया। ये जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>दुनिया में सबसे मुख्य प्रदूषण भाव प्रदूषण है: वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी जी ने मनोविज्ञान, प्राणी विज्ञान और कर्म सिद्धान्त के बारे में बताया </title>
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		<pubDate>Fri, 01 May 2026 12:40:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भीलूड़ा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि हमारे प्राचीन आचार्यो ने मनोविज्ञान, प्राणी विज्ञान, कर्म सिद्धांत का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा है कि मुनि यह चित्त रूपी हाथी इतना प्रबल है कि उसका पराक्रम अनिवार्य है नहीं तो वह संयम रूपी घर को नष्ट कर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भीलूड़ा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि हमारे प्राचीन आचार्यो ने मनोविज्ञान, प्राणी विज्ञान, कर्म सिद्धांत का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा है कि मुनि यह चित्त रूपी हाथी इतना प्रबल है कि उसका पराक्रम अनिवार्य है नहीं तो वह संयम रूपी घर को नष्ट कर देगा। <span style="color: #ff0000">भीलूड़ा से पढ़िए, अजित कोठिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>भीलूड़ा।</strong> वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भीलूड़ा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि हमारे प्राचीन आचार्यो ने मनोविज्ञान, प्राणी विज्ञान, कर्म सिद्धांत का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा है कि मुनि यह चित्त रूपी हाथी इतना प्रबल है कि उसका पराक्रम अनिवार्य है नहीं तो वह संयम रूपी घर को नष्ट कर देगा। चित्त को हाथी की उपमा दी है। हाथी सामान्यतः बुद्धिमान शाकाहारी भद्र सामाजिक प्राणी है तथापि काम वेदना से वह उत्तेजित होकर क्रूर बन जाता है. अन्य क्रूर प्राणियों से भी साठ गुना अधिक क्रूर हो जाता है। हाथी के संभोग के समय हारमोंस स्राव होता है. जिससे मदमस्त हो जाता है उसके मद झरता है।</p>
<p>जिसका भाव उदार नहीं, शुभ नहीं वह समस्त पाप करता है। युद्ध, लड़ाई झगड़ा सब पहले भाव से होते हैं वास्तव में वह बाद में होते हैं। धर्म के नाम पर भी क्रुरता असंयम आदि से अधर्म हो रहा है। यह चंचल चित्त रूपी बंदर दौड़ता रहता है.। गलत चिंतन करता है दूसरों की निंदा चुगली करके पाप बंध करता है। मन की चंचलता से अधिक पाप बंध होता है। आचार्य श्री यहां पर डांट लगाते हुए कहते हैं जो मन को कंट्रोल नहीं करता वह मूर्ख है। वह धर्म की चर्चा करता हुआ लज्जित करता है। वह चित्त को तो जीत नहीं सका तथा ध्यान की चर्चा करता है धर्म की चर्चा करता है, पुण्य,त्याग तपस्या की चर्चा करता है तो वह मूर्ख, निर्लज्ज, ढीठ, पापी है। बाह्य त्याग अंतरंग त्याग के लिए है। सबसे मुख्य प्रदूषण भाव प्रदूषण है। जब मन शुद्ध होता है भाव प्रदूषण नहीं होता तो कषाय प्रदूषण लड़ाई झगड़ा युद्ध ग्लोबल वार्मिंग आदि कुछ भी संभव नहीं है। चित्त शुद्धि बिना हीलिंग भी संभव नहीं है। भाव शुद्धि बिना चित्त स्थिर नहीं होगा। जिसके भाव में ख्याति पूजा लाभ की चाह है चित्त शुद्ध नहीं है वह मूर्ख है। चित्त को जीत नहीं सकता तथा ध्यान की चर्चा करता है वह साधु घनाघन पाप करता है।</p>
<p><strong> सुरा, सुंदरी शिकार आदि के कारण संग्राम होते हैं।</strong></p>
<p>शिकारी प्राणी शेर चीता एनाकोंडा शिकार करने से पहले घंटो तक स्थिर रहते हैं शिकार आने पर पकड़ कर क्रुरता से मारते हैं वह ध्यान नहीं है। मांसाहारी जीव रोज खाते नहीं कुछ सप्ताह के बाद कुछ महीनो के बाद कुछ वर्षों के बाद खाते हैं तो वह उपवास नहीं। कर्म सिद्धांत का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह चित्त रूपी हाथी इतना प्रबल है कि उसका पराक्रम अनिवार्य है नहीं तो वह संयम रूपी घर को नष्ट कर देगा। चित्त को हाथी की उपमा दी है। हाथी सामान्यतः बुद्धिमान शाकाहारी भद्र सामाजिक प्राणी है तथापि काम वेदना से वह उत्तेजित होकर क्रूर बन जाता है. अन्य क्रूर प्राणियों से भी साठ गुना अधिक क्रूर हो जाता है। हाथी के संभोग के समय हारमोंस स्राव होता है. जिससे मदमस्त हो जाता है उसके मद झरता है। जिसका भाव उदार नहीं, शुभ नहीं वह समस्त पाप करता है। युद्ध, लड़ाई झगड़ा सब पहले भाव से होते हैं वास्तव में वह बाद में होते हैं। धर्म के नाम पर भी क्रुरता असंयम आदि से अधर्म हो रहा है। यह चंचल चित्त रूपी बंदर दौड़ता रहता है। गलत चिंतन करता है दूसरों की निंदा चुगली करके पाप बंध करता है। मन की चंचलता से अधिक पाप बंध होता है। आचार्य श्री यहां पर डाट लगाते हुए कहते हैं जो मन को कंट्रोल नहीं करता वह मूर्ख है वह धर्म की चर्चा करता हुआ लज्जित करता है। वह चित्त को तो जीत नहीं सका तथा ध्यान की चर्चा करता है धर्म की चर्चा करता है, पुण्य,त्याग तपस्या की चर्चा करता है तो वह मूर्ख, निर्लज्ज, ढीठ, पापी है।</p>
<p>बाह्य त्याग अंतरंग त्याग के लिए है। सबसे मुख्य प्रदूषण भाव प्रदूषण है। जब मन शुद्ध होता है भाव प्रदूषण नहीं होता तो कषाय प्रदूषण लड़ाई झगड़ा युद्ध ग्लोबल वार्मिंग आदि कुछ भी संभव नहीं है। चित्त शुद्धि बिना हीलिंग भी संभव नहीं है। भाव शुद्धि बिना चित्त स्थिर नहीं होगा। जिसके भाव में ख्याति पूजा लाभ की चाह है चित्त शुद्ध नहीं है वह मूर्ख है। चित्त को जीत नहीं सकता तथा ध्यान की चर्चा करता है वह साधु घनाघन पाप करता है। सुरा, सुंदरी शिकार आदि के कारण संग्राम होते हैं। शिकारी प्राणी शेर चीता एनाकोंडा शिकार करने से पहले घंटो तक स्थिर रहते हैं शिकार आने पर पकड़ कर क्रुरता से मारते हैं वह ध्यान नहीं है। मांसाहारी जीव रोज खाते नहीं कुछ सप्ताह के बाद कुछ महीनो के बाद कुछ वर्षों के बाद खाते हैं तो वह उपवास नहीं। यह जानकारी</p>
<p>विजय लक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>संसार के बहुभाग जीव आत्मा को नहीं जानते: वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनंदी जी ने समाधि तंत्र श्लोक नंबर 59 और 60 की व्याख्या की  </title>
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		<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 09:23:36 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में समाधि तंत्र श्लोक नंबर 59 और 60 की व्याख्या करते हुए बताया कि अनंतानंत जीव अनंत भवों में भी आत्म स्वरूप सत्य स्वरूप को समझ नहीं पाए। संसार के बहुभाग जीव आत्मा को नहीं जानते। डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया की [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में समाधि तंत्र श्लोक नंबर 59 और 60 की व्याख्या करते हुए बताया कि अनंतानंत जीव अनंत भवों में भी आत्म स्वरूप सत्य स्वरूप को समझ नहीं पाए। संसार के बहुभाग जीव आत्मा को नहीं जानते। <span style="color: #ff0000">डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>डडूका।</strong> वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में समाधि तंत्र श्लोक नंबर 59 और 60 की व्याख्या करते हुए बताया कि अनंतानंत जीव अनंत भवों में भी आत्म स्वरूप सत्य स्वरूप को समझ नहीं पाए। संसार के बहुभाग जीव आत्मा को नहीं जानते। मूढ़ व्यक्ति ज्ञानी को भी मूढ़ मानता है। रेत में तेल नहीं निकलता कंकर की खीर नहीं बनती और पानी मथने से घी नहीं निकलता है। वैसे ही मिथ्या दृष्टि को आत्मज्ञान नहीं रुचता। ऐसे मूढ़ात्मा को उपदेश करना वृथाश्रम है। बोलना आत्म स्वभाव नहीं सिद्ध भगवान एक शब्द भी नहीं बोलते हैं। उन्होंने कहा कि मेरा शरीर भी मुझे नहीं समझ सकता। निश्चय से मन भी कुछ नहीं जानता। यह यंत्र की तरह है। जब तक भाव मन रहता है तब तक केवल ज्ञान नहीं होता। तुम्हारा मन, तुम्हारा ब्रेन, तुम्हारी इंद्रियां भी तुम्हें नहीं जानती। आत्मा की शक्ति अनंत है। आत्मा के अनुसार चलो मन के अनुसार नहीं। तुम्हारा शरीर भी अनंतकाल तक तुम्हारे साथ नहीं रहेगा।</p>
<p><strong>राग द्वेष दिखावा आडंबर करता है </strong></p>
<p>जो आत्मा को नहीं जानता आत्मा का मनन चिंतन नहीं करता है वह मुढ़ात्मा है। बाह्य मैं ही आनंद मानते हैं वह सब मूढ़ात्मा है। मोह से आच्छादित आत्म ज्योति वाले बाह्य मैं ही संतोष मानते हैं। द्रव्य शुद्धि से भाव शुद्धि अधिक होनी चाहिए। वर्तमान में द्रव्य शुद्धि के कारण ही श्रावक आपस में लड झगड़कर आगे नहीं बढ़ पाते हैं। धर्म में अपशिष्ट गटर डालकर पवित्र धर्म को गंगा नदी की तरह अपवित्र बना दिया है। जो बाह्य मैं ही ममत्व, राग द्वेष दिखावा आडंबर करता है वह मिथ्या दृष्टि है। मोह से जिनकी अंतर्दृष्टि ढंक गई है, वह मिथ्या दृष्टि है।</p>
<p><strong> मोह के कारण स्वयं को नहीं जान पाता</strong></p>
<p>जिनको आध्यात्मिक आनंद आ रहा है, जो आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना चाहता है। अतः बाह्य से निवृत होता है, वह प्रबोधात्मा है। वह आत्मा में संतोष प्राप्त करता है। आचार्य श्री ने उदाहरण देते हुए बताया कि जिस प्रकार मध्यान्ह का सूर्य भी बादलों से आच्छादित होने पर प्रकाश नहीं दे सकता। वैसे ही ज्ञान सूर्य अनंत अक्षय ज्ञान का पिंड होते हुए भी मोह के कारण स्वयं को नहीं जान पाता। संताप संक्लेश का कारण तुम स्वयं हो। आत्मा में जितना ज्ञान जितना सुख जितना वैभव जितना बल है उतना किसी में नहीं। प्रबुद्ध प्रकृष्ट, समृद्ध आत्मा बाह्य से निवृत होकर आत्मा में संतोष होते हैं।</p>
<p><strong> भाषा ज्ञान बिना ग्रंथ को नहीं समझ सकते</strong></p>
<p>छोटा बड़ा राग द्वेष आदि का कारण सिंहासन होता है जिसे आचार्य श्री कनक नदी गुरुदेव ने त्याग दिया है। उनके कारण से सभी को सिंहासन त्यागना पड़ेगा इसलिए आचार्य श्री अपने शिष्यों के बुलाने पर भी बड़े-बड़े समारोह में नहीं जाते हैं क्योंकि, अधिकांश शिष्य आचार्य श्री से पढ़े हुए हैं। मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी गुरुदेव ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता जहां आत्मविश्वास, ज्ञान चारित्र की धारा वह जैन धर्म है मेरा वह आत्म धर्म है मेरा के माध्यम से मंगलाचरण किया।</p>
<p>यह जानकारियां विजयलक्ष्मी कमल कुमार गोदावत ने दी।</p>
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