<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>वीतरागी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
	<atom:link href="https://www.shreephaljainnews.com/tag/%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A5%80/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://www.shreephaljainnews.com</link>
	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
	<lastBuildDate>Wed, 20 Aug 2025 12:00:18 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=6.9.4</generator>

<image>
	<url>https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/09/cropped-shri-32x32.png</url>
	<title>वीतरागी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
	<link>https://www.shreephaljainnews.com</link>
	<width>32</width>
	<height>32</height>
</image> 
	<item>
		<title>आचार्यश्री के वचन-साधु समाधि साधना से मरण को सुमरण बनाते हैं: आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने भक्ति और साधना का महात्म्य बताया  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/acharyashrees_words_sadhus_make_death_a_remembrance_by_doing_samadhi_sadhana/</link>
					<comments>https://www.shreephaljainnews.com/acharyashrees_words_sadhus_make_death_a_remembrance_by_doing_samadhi_sadhana/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 20 Aug 2025 11:57:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Acharyashri Vardhaman Sagar Ji Maharaj]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Jain]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Sadhu]]></category>
		<category><![CDATA[Hitopadeshi]]></category>
		<category><![CDATA[jain community]]></category>
		<category><![CDATA[Jain muni]]></category>
		<category><![CDATA[jain news]]></category>
		<category><![CDATA[jain sadhvi]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Society]]></category>
		<category><![CDATA[Jin Dharma]]></category>
		<category><![CDATA[Kevalgyan]]></category>
		<category><![CDATA[Munishree Darshit Sagar Ji]]></category>
		<category><![CDATA[Ratnakaran]]></category>
		<category><![CDATA[Sarvajna]]></category>
		<category><![CDATA[Shravakachar]]></category>
		<category><![CDATA[Shreefal Jain News]]></category>
		<category><![CDATA[Vitraagi]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्यश्री वर्धमानसागर जी महाराज]]></category>
		<category><![CDATA[केवलज्ञान]]></category>
		<category><![CDATA[जिन धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन मुनि]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समुदाय]]></category>
		<category><![CDATA[जैन साध्वी]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर जैन]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर साधु]]></category>
		<category><![CDATA[मुनिश्री दर्शित सागर जी]]></category>
		<category><![CDATA[रत्नाकरण]]></category>
		<category><![CDATA[वीतरागी]]></category>
		<category><![CDATA[श्रावकाचार]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[सर्वज्ञ]]></category>
		<category><![CDATA[हितोपदेशी]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=88052</guid>

					<description><![CDATA[वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी भगवान द्वारा प्रतिपादित जिन धर्म केवलज्ञान रूपी लक्ष्मीयुक्त है। जो धर्मधारण पालन करने से मिलती है। धर्म का संग्रह और धन के संग्रह में अंतर होता है। धर्म संग्रह से पुण्य की वृद्धि होती हैं क्योंकि, धर्म मोक्ष का पथ प्रदर्शक है। यह उद्बोधन आचार्यश्री वर्धमानसागर जी महाराज ने बुधवार को [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी भगवान द्वारा प्रतिपादित जिन धर्म केवलज्ञान रूपी लक्ष्मीयुक्त है। जो धर्मधारण पालन करने से मिलती है। धर्म का संग्रह और धन के संग्रह में अंतर होता है। धर्म संग्रह से पुण्य की वृद्धि होती हैं क्योंकि, धर्म मोक्ष का पथ प्रदर्शक है। यह उद्बोधन आचार्यश्री वर्धमानसागर जी महाराज ने बुधवार को धर्मसभा में दिए। <span style="color: #ff0000">टोंक से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>टोंक।</strong> वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी भगवान द्वारा प्रतिपादित जिन धर्म केवलज्ञान रूपी लक्ष्मीयुक्त है। जो धर्मधारण पालन करने से मिलती है। धर्म का संग्रह और धन के संग्रह में अंतर होता है। धर्म संग्रह से पुण्य की वृद्धि होती हैं क्योंकि, धर्म मोक्ष का पथ प्रदर्शक है। धार्मिक मंडल विधान की प्रभावना से पुण्य मिलता है। आत्मा की प्रभावना संयम दीक्षा से होती है। साधु समाधि के परम लक्ष्य को लेकर संयम धारण करते हैं। समतापूर्वक साधना को समाधि कहते हैं। इससे मरण भी सुमरण हो जाता हैं। यह मंगल देशना सोलह कारण भावना पर्व पर राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने धर्मसभा में प्रकट की। आचार्य श्री ने आगे कहा कि आप लोग जन्मदिन मनाते हैं। वास्तव में साधु की दीक्षा लेते ही उसका नया जन्म प्रारंभ होता है। जितने वर्ष का जन्मदिन आप मनाते हो वास्तव में उतनी आयु आपकी कम होती जाती है। आयु हर पल हर क्षण कम होती है। जिंदगी भर आपका कार्य कैसा रहा है? इसकी परीक्षा मृत्यु अथवा संल्लेखना समाधि के समय होती है।</p>
<p><strong>साधु परमेष्ठि धर्मतीर्थ होते हैं</strong></p>
<p>प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज गृहस्थ और साधु जीवन में शांति के सागर रहे। उन्होंने जीवन भर समता धारण कर अनेक उपवास कर उपसर्ग, परिषह को समता से सहन किया। साधु के 10 प्रकार की विवेचना में आचार्य श्री ने बताया कि साधु की सेवा वैयावृत्ति करते समय उनके गुण ग्रहण अर्थात उनके समान वैराग्य धारण करने के भाव परिणाम रखना चाहिए। साधु की सेवा स्वाध्याय के समय आहार, विहार, निहार के समय श्रद्धा, प्रसन्नता, भक्ति, वात्सल्य एवं बिना ग्लानि के करना चाहिए क्योंकि, साधु परमेष्ठि धर्मतीर्थ होते हैं।</p>
<p><strong>मुनिश्री दर्शित सागर जी के उपदेश भी हुए</strong></p>
<p>सभी को रत्नाकरण श्रावकाचार और प्रथमानुयोग के ग्रंथों का स्वाध्याय कर मनन चिंतन करना चाहिए। इससे धर्म में वृद्धि होती हैं। आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व मुनि श्री दर्शित सागर जी के उपदेश हुए। बुधवार को प्रातः मुनि श्री हितेंद्र सागर जी के केशलोचन हुए। आचार्य श्री शांति सागर जी आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव के अंतर्गत आगामी 22 और 23 अगस्त को विद्वत संगोष्ठी का आयोजन किया गया है। इसके लिए राज्य के मुख्यमंत्री, टोंक के विधायक सहित अनेक राजनीतिक सामाजिक पदाधिकारियों के शुभकामना संदेश भी प्राप्त हो रहे हैं।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.shreephaljainnews.com/acharyashrees_words_sadhus_make_death_a_remembrance_by_doing_samadhi_sadhana/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>भगवान राग और द्वेष से रहित वीतरागी हितोपदेशी होते हैं : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्मसभा में दी देशना </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/god_is_free_from_attachment_and_hatred_and_is_a_benevolent_preacher/</link>
					<comments>https://www.shreephaljainnews.com/god_is_free_from_attachment_and_hatred_and_is_a_benevolent_preacher/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 19 Jul 2025 13:00:47 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Vardhman Sagar JI]]></category>
		<category><![CDATA[Ascetic]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Jain]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Sadhu]]></category>
		<category><![CDATA[Hitopadeshi]]></category>
		<category><![CDATA[jain community]]></category>
		<category><![CDATA[Jain muni]]></category>
		<category><![CDATA[jain news]]></category>
		<category><![CDATA[jain sadhvi]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Society]]></category>
		<category><![CDATA[Religious Sermon]]></category>
		<category><![CDATA[Samavasaran]]></category>
		<category><![CDATA[Shriphal Jain News]]></category>
		<category><![CDATA[Tonk]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन मुनि]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समुदाय]]></category>
		<category><![CDATA[जैन साध्वी]]></category>
		<category><![CDATA[टोंक]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर जैन]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर साधु]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म देशना]]></category>
		<category><![CDATA[वीतरागी]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[समवशरण]]></category>
		<category><![CDATA[हितोपदेशी]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=85460</guid>

					<description><![CDATA[रत्न स्वर्ण के समवशरण में विराजित भगवान के पुण्य प्रताप से पाषाण के मान स्तंभ को देखकर मान-अभिमान गलित नष्ट हो जाता है। यह धर्म देशना संघ सहित विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रगट की। टोंक से पढ़िए, यह खबर&#8230; टोंक। समवशरण में विराजित भगवान वीतरागी सर्वज्ञ और हितोपदेसी हैं। उन्हें राग द्वेष [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>रत्न स्वर्ण के समवशरण में विराजित भगवान के पुण्य प्रताप से पाषाण के मान स्तंभ को देखकर मान-अभिमान गलित नष्ट हो जाता है। यह धर्म देशना संघ सहित विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रगट की। <span style="color: #ff0000">टोंक से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>टोंक।</strong> समवशरण में विराजित भगवान वीतरागी सर्वज्ञ और हितोपदेसी हैं। उन्हें राग द्वेष नहीं होता है। उनकी दिव्य देशना को तीन गति के जीव 12 कक्ष में बैठकर दिव्य देशना का श्रवण करते हैं। रत्न स्वर्ण के समवशरण में विराजित भगवान के पुण्य प्रताप से पाषाण के मान स्तंभ को देखकर मान-अभिमान गलित नष्ट हो जाता है। यह धर्म देशना संघ सहित विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रगट की।</p>
<p>राजेश पंचोलिया ने बताया कि आचार्य श्री ने कहा कि संसारी प्राणी राग द्वेष में डूबे हैं। संसार रूपी भव समुद्र से जिनालय में विराजित भगवान सद राह दिखाते हैं क्योंकि, पंच कल्याणक में धार्मिक क्रियाओं सूरी मंत्रों से प्रतिमाओं में भगवान के गुणों का आरोपण कर उन्हे पूज्य बनाया जाता हैं। ज्येष्ठा और श्रेष्ठता मानने से नहीं गुणों से होती है।</p>
<p><strong>मुनिचर्या का आदर्श प्रस्तुत किया</strong></p>
<p>20 वीं सदी में नवरत्न के रूप में प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी हुए जिन्होंने जिनालय में भी विजातीय प्रवेश के विरोध में 1105 दिनों तक अन्न आहार का त्याग कर अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी। महापुरुष हमेशा उपकार करते हैं। आचार्य श्री शांति सागर जी ने मुनिचर्या का निर्दोष पालन कर आदर्श प्रस्तुत किया।आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने सभी को छोटे-छोटे नियम व्रत त्याग से जीवन को उत्कृष्ट और मंगलमय बनाने का आशीर्वाद दिया।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-85462" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035.jpg" alt="" width="1600" height="1064" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035-300x200.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035-1024x681.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035-768x511.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035-1536x1021.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035-414x276.jpg 414w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035-470x313.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035-640x426.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035-130x86.jpg 130w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035-187x124.jpg 187w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035-990x658.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035-1320x878.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" />भक्ति की शक्ति से मुक्ति मिलती है</strong></p>
<p>आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व मुनि श्री मुमुक्षु सागर जी ने उपदेश में परमात्मा के गुण बताकर कहा कि भक्ति की शक्ति से मुक्ति मिलती है। रमेश काला एवं समाज प्रवक्ता पवन एवं विकास जागीरदार ने बताया कि शनिवार को दीप प्रवज्लन के बाद आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन ओर जिनवाणी भेंट के बाद आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की विशेष अष्ट मंगल द्रव्य से पूजन करने का सौभाग्य श्री वर्धमान महिला मंडल काफला बाजार टोंक के समस्त श्रावक श्राविकाओं को प्राप्त हुआ।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.shreephaljainnews.com/god_is_free_from_attachment_and_hatred_and_is_a_benevolent_preacher/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>गुरु पूर्णिमा पर जानें गुरु की महिमा के बारे में : मानव जगत के लिए उपकारी हैं सच्चे गुरु </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/true_guru_is_beneficial_to_the_human_world/</link>
					<comments>https://www.shreephaljainnews.com/true_guru_is_beneficial_to_the_human_world/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 03 Jul 2023 07:30:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Alekh]]></category>
		<category><![CDATA[Digambara Sadhu]]></category>
		<category><![CDATA[Digamber Jain]]></category>
		<category><![CDATA[Guru Poornima]]></category>
		<category><![CDATA[jain dharm]]></category>
		<category><![CDATA[Jain muni]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Muniraj]]></category>
		<category><![CDATA[jain news]]></category>
		<category><![CDATA[jain religion]]></category>
		<category><![CDATA[jain sadhu]]></category>
		<category><![CDATA[jain saint]]></category>
		<category><![CDATA[jain samaj]]></category>
		<category><![CDATA[Jainism]]></category>
		<category><![CDATA[jaipur]]></category>
		<category><![CDATA[shreephal jain news]]></category>
		<category><![CDATA[Udaybhan Jain]]></category>
		<category><![CDATA[Vitaragi श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[उदयभान जैन]]></category>
		<category><![CDATA[गुरु पूर्णिमा]]></category>
		<category><![CDATA[जयपुर]]></category>
		<category><![CDATA[जैन धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन मुनि]]></category>
		<category><![CDATA[जैन मुनिराज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समुदाय]]></category>
		<category><![CDATA[जैन साधु]]></category>
		<category><![CDATA[जैन साध्वी]]></category>
		<category><![CDATA[जैन सोसायटी]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर साधु]]></category>
		<category><![CDATA[वीतरागी]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=47506</guid>

					<description><![CDATA[बिना गुरु के आत्मोन्‍नति भी सम्भव नहीं है। गुरु का स्थान देवताओं से भी ऊपर माना गया है। यदि हमारे जीवन में गुरु नहीं हैं तो हमारा जीवन भी शुरू नहीं हो सकता। गुरु पूर्णिया के अवसर पर पढ़िए उदयभान जैन का विशेष आलेख जैन धर्म अनादिनिधन धर्म है। जैन धर्म का मुख्य उद्देश्य सच्चे [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>बिना गुरु के आत्मोन्&#x200d;नति भी सम्भव नहीं है। गुरु का स्थान देवताओं से भी ऊपर माना गया है। यदि हमारे जीवन में गुरु नहीं हैं तो हमारा जीवन भी शुरू नहीं हो सकता।<span style="color: #ff0000;"> गुरु पूर्णिया के अवसर पर पढ़िए उदयभान जैन का विशेष आलेख</span></strong></p>
<hr />
<p>जैन धर्म अनादिनिधन धर्म है। जैन धर्म का मुख्य उद्देश्य सच्चे देव-शास्त्र-गुरु के प्रति अकाट्य श्रद्वा। हम दिन प्रतिदिन देखते हैं कि मानव जीवन में जैन कुल सच्चे देव-शास्त्र व गुरु के प्रति निष्ठा। जैन सिद्वान्त गुणवादी है व्यक्&#x200d;तिवादी नहीं। सच्चे देव को हम जानते हैं कि हमारे आराध्य देव भगवन्त वीतरागी, हमारे तीर्थंकर सिद्धपरमेष्ठी, अरिहन्त परमेष्ठी आदि। सच्चे शास्त्र यानि आगम वाणी, तीर्थंकरों केवलियों व अरिहन्तों की वाणी जो आज हमें शास्त्रों, जिनवाणी के रूप मेें प्राप्त हैं, ऐसे शास्त्र हमारे सच्चे शास्त्र है, दिन प्रतिदिन उनका स्मरण करते हैं, पूजते हैं। अब सच्चे गुरु यानि वीतरागी सच्चे निर्ग्रंथ गुरु के बारे में हम जानना चाहते हैं। मानव जीवन के लिए कैसे उपकारी हैं सच्चे गुरु।<br />
हम यहां यह भी स्पष्ट करना उचित समझते हैं कि बिना गुरु के आत्मोन्&#x200d;नति भी सम्भव नहीं है। वन्दे गुरूणां, गुण लब्धये। जिस गुरु में सच्चे गुण हैं, वैसा ही बनने के लिए मैं नमस्कार करता हूं।</p>
<p><strong>मोक्ष मार्ग पर करते हैं अग्रसर</strong></p>
<p>गुरु हमारे पूज्य है। गुरुओं ने ही आज मानव जगत के लिए इतने उपकार किये हैं जिनका ॠण हम चुका नहीं सकते हैं। गुरुओं ने ही हमको हमारे देव व शास्त्रों के बारे में बताया, गुरुओं ने ही हमको संस्कारों के साथ मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर किया। यदि हमारे जीवन में गुरु नहीं हैं तो हमारा जीवन भी शुरू नहीं हो सकता। सच्चे गुरु के बारे में जानना अति आवश्यक है। गुरु सभी बन्धनों से मुक्&#x200d;त होता है। गुरु वह है जो जीवन से विकार की अज्ञानता को दूर करता है और आनन्दमय जीवन कैसे जिया जाता है यह सिखाता है। गुरु वे होते हैं जो वीतरागी व शान्ता हों। जिन्हें गर्मी, सर्दीए, डांस, मच्छर, कुत्ते, सिंह आदि क्रूर से क्रूर जन्तुओं का, भूख-प्यास आदि का अन्य किसी भी प्रकार का भय नहींं हो, जिन्हें किसी भी प्रकार का शोक, खेद, चिन्ता न हो, जिन्हें लज्जा व ग्लानि का भाव नहीं आते हों, जिन्हें अपने तप का और ज्ञान का अथवा प्रतिष्ठा का अभिमान नहीं हो। मैं इतना बडा ज्ञानी हूं, तपस्वी हूं, लोगों को मेरी विनय करना चाहिए। ऐसे भाव जिन्हें न आते हों, अपनी प्रतिष्ठा, प्रसिद्वि, शिष्य मंडली की वृृद्धि के लिए मायाचारी के भाव नहीं आते हों। इस प्रकार चारों कषायों का परास्त कर दिया हो वीतरागी सच्चे गुरुहैं।</p>
<p><strong>कषायों और इंद्रियों के विजेता</strong></p>
<p>कुल मिलाकर यह है कि वीतरागी, सच्चे गुरु वे हैं जो शान्ति के प्रतीक हैं, कषायों व पांचों इन्द्रियों के विजेता हों, अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य व अपरिग्रह इन पांंचों महाव्रतों से सुशोभित हों। ईर्या, भाषा, एषणा, आदान-निक्षेपण व प्रतिष्ठापन (उत्सर्ग) इन पांंच समिति रूपी कवच को धारण करने वाले हों। कायोत्सर्ग ये छह आवश्यक जिनके रक्षक हों, अन्तरंग जीवन हों, केशलोंचन, अदन्तधोवन, स्नान रहित हों, एक बार 24 घन्टे में भोजन खडे-खडे कर (हाथ में) भोजन तथा भू शयन इन सात बाह्य गुणों के धारक हों। 28 मूल गुणों सहित जो उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य-संयम, तप, त्याग, आंकिन्च्य व बह्मचर्य आदि 10 धर्मों का धारण करने वाले हों।</p>
<p><strong>पतित-पावती गंगा हैं गुरु</strong></p>
<p>ऐसे वीर- विजेता तथा स्वतन्त्र वैभवशाली ही सच्चे गुरु हैं। इन्हीं गुणों से युक्त गुरु सच्चे गुरु हैं, जिनमें शान्त-प्रशान्त आत्मा ही सद्गुरु है, गुरु पतित-पावती गंगा हैं। जैसे गंगा एक-दूसरे प्रदेश में बहती है, सब कुछ देती है, कोई भी लेखा-जोखा नहीं रखती है उसी प्रकार संत भी अपने जीवन यात्रा में बह रहा है। किसी को अहिंसा, किसी को दया, किसी को प्रेम-स्नेह एवं परोपकारी अमृृत पिला रहे हैंं। गुरु के उपकारों व महिमा का कोई छोर नहीं है। यह सही है कि मानव जीवन के लिए गुरु परम उपकारी हैं। आज भी इस देश में सच्चे गुरुओं की कमी नहीं है। उनमें से मैं उनका नाम लेना और नमन करना चाहूंगा- परम पूज्य शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज, देश की सर्वोच्च साध्वी आर्यिका शिरोमणि गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी, आचार्य श्री वर्धमान सागरजी महाराज, आचार्य श्री वसुनन्दी जी महाराज, गणाचार्य श्री कुन्थु सागरजी महाराज, आचार्य श्री विरागसागर जी महाराज, आचार्य श्री विशद सागरजी महाराज, आचार्य श्री पुष्पदन्त सागर जी महाराज, आचार्य श्री प्रसन्&#x200d;नसागर जी महाराज, आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज, आचार्य श्री पुलकसागर जी महाराज, आचार्य श्री सौरभ सागर जी महाराज, आचार्य श्री प्रज्ञा सागर जी महाराज, आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी महाराज, आचार्य श्री देवनन्दी जी महाराज, मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज, मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज, मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज, मुनि श्री अमित सागर जी महाराज, मुनि श्री विशाल सागर जी महाराज, आर्यिका श्री सृष्टि भूषण जी माताजी, आर्यिका श्री स्वाति भूषण माताजी, आर्यिका श्री पूर्णमती माताजी, आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी आदि देश के सभी गुरुओं और आर्यिकाओं को शत-शत नमन करता हूं।</p>
<p><strong>गुरु का स्थान देवताओं से ऊपर</strong></p>
<p>गुरु पूर्णिमा के अवसर पर मैं कहना चाहता हूं कि भारतीय संस्कृति में गुरुओं का स्थान देवताओं से भी ऊपर माना गया है। संत कबीर जी का दोहे जग प्रसिद्ध है-.<br />
गुरु गोविन्द दोनों खडे़, काके लागू पाय।<br />
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताये।<br />
ईश्&#x200d;वर की महिमा भी गुरु के माध्यम से जानी जाती है। गुरु भक्&#x200d;ति तीव्र और निश्छल भावों से करनी चाहिए। गुरु भक्&#x200d;ति के रूप में गुरुओं की वाणी, वचनों को घर-घर पहुंचाकर उनके बताये निर्देश व शिक्षा की पालना, जितने लोग करेंगे हमारी गुरु के प्रति सच्ची भक्&#x200d;ति होगी।<br />
बन्धुओं हम सबको, यानि सभी संस्थाओं को भी गुरुओं के आहार-विहार में जितना बन सके, उससे अधिक करना चाहिये। गुरु की वैयावृत्&#x200d;ति सच्चे मन से करनी चाहिए।<br />
सच्चे गुरू की सच्ची भक्&#x200d;ती करेंगे तो हमारे कर्मों का क्षय होगाए हम गलत रास्ते पर नहीं जाकरए सहीए सच्चे रास्ते पर व मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होंगे।<br />
अब गुरूओं का चातुर्मास प्रारम्भ हो रहा है आप और हम सभी गुरू शरण में जाकर अच्छे संस्कार ग्रहण करें और मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर हों। बुराइयों को त्यागें। पुनः एक बार परमपूज्य चारित्र चक्रवर्ती प्रथमाचार्य श्री शान्तिसागरजी महाराजए परमपूज्य आचार्य श्री आदि सागर महाराज अंकलीकरए परम पूज्य आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज छाणी परम्परा के सभी आचार्योंए उपाध्यायोंए मुनियों व आर्यिकाओं को विनयमान सेए सच्चे मन से नमन करता हूँ।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.shreephaljainnews.com/true_guru_is_beneficial_to_the_human_world/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
	</channel>
</rss>
