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	<title>विद्याप्रमाण गुरुकुलम &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>कर्म अच्छे हो या बुरे उसका फल भोगना जरूर होता है: मुनिश्री प्रमाणसागर जी महाराज ने कर्म फल की व्याख्या की  </title>
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		<pubDate>Mon, 27 Oct 2025 10:19:05 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बुरा कर्म हमेशा बुरा ही रहेगा, उसे वह कितना भी अच्छा कहे खूब दान करे लेकिन, उसे कोई अच्छा नहीं कह सकता है। यह उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज ने विद्याप्रमाण गुरुकुलम में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए। भोपाल अवधपुरी से पढ़िए, यह खबर&#8230; भोपाल अवधपुरी। बुरा कर्म हमेशा बुरा ही रहेगा, उसे [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>बुरा कर्म हमेशा बुरा ही रहेगा, उसे वह कितना भी अच्छा कहे खूब दान करे लेकिन, उसे कोई अच्छा नहीं कह सकता है। यह उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज ने विद्याप्रमाण गुरुकुलम में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">भोपाल अवधपुरी से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>भोपाल अवधपुरी।</strong> बुरा कर्म हमेशा बुरा ही रहेगा, उसे वह कितना भी अच्छा कहे खूब दान करे लेकिन, उसे कोई अच्छा नहीं कह सकता है। यह उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने विद्याप्रमाण गुरुकुलम में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए। मुनि श्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि पहले के डकैत डकैती डालने जाते थे और मन्नत मानते थे कि यदि अच्छी डकैती हाथ लगी तो मंदिर में घंटा चढ़ाएंगे। मुनि श्री ने कहा कि बताइए अपने बुरे काम में भगवान को भी शामिल कर लिया? ऐसे ही आजकल कोई व्यक्ति गलत कार्य करके धन को कमाता है और खूब दान देता है तो क्या आप लोग इसे अच्छा कर्म कहेंगे? मुनि श्री ने कहा कि भले ही आप लोग दान मत दो चलेगा लेकिन, किसी के घर डाका डालकर किसी का दिल मत दुखाओ। जैसी करनी बैसी भरनी यह कहावत तो आप लोगों ने सुनी होगी।</p>
<p><strong>जैसा तुम करोगे वैसा तुम भरोगे</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि एक आदमी मरा तो उसका लेखा जोखा देखा गया तो उसके सब काले कारनामे थे तो उससे पूछा गया कि तुमने अपनी जिंदगी में कोई अच्छा कार्य किया हो तो बताइये? उस आधार पर स्वर्ग भेजा जा सकता है। उसने बहूत याद किया लेकिन, उसने कोई अच्छा कार्य किया ही नहीं था तो बताए क्या? उसे याद आया बचपन में एक बार चवन्नी का दान किया था। वह भी एक की अठन्नी चुराकर तो चित्रगुप्त ने कहा कि चोरी का माल दान करके स्वर्ग में कोई जगह नहीं है। हर व्यक्ति चाहता है, उसके जीवन में कोई बुरा प्रसंग न घटे, सब कुछ अच्छा अच्छा हो लेकिन, कर्म सिद्धांत कहता है कि जैसा तुम करोगे वैसा तुम भरोगे। घर आंगन में यदि बबूल का पेड़ लगाया है तो उसमें बबूल की कांटेदार फलियां ही आएंगी। उसमें मीठे-मीठे फल नहीं लग सकते।</p>
<p><strong>सभी अनुकूलताएं मिली उसे आत्महित में लगाएं</strong></p>
<p>उसी प्रकार जीवन में कुछ अच्छा पाना चाहते हो तो अपने द्वारा किए जा रहे कार्यों की खुद समीक्षा करो। अपनी आत्मा का विश्लेषण करके देखो और निर्णय करो कि मैंने अभी तक जो भी कार्य किए हैं। उनमें से कितने कार्य अच्छे किए हैं? मुनि श्री ने कहा कि अनुकूलताएं पाने के बाद भी जो अपनी आत्मा का अहित कर रहा है। क्या आप उसे अच्छा कहोगे? लोग दूसरों के प्रति बुरा कम करते है। खुद के प्रति बुरा ज्यादा करते हैं और विडंबना यह है कि उसे बुरा मानते ही नहीं। ऐसे लोग कभी भी अपनी आत्मा का हित नहीं कर सकते, जो अपनी आत्मा का हित नहीं कर सकता। वह दूसरे की आत्मा का हित भी नहीं कर सकता। मुनि श्री ने कहा कि कर्म के संयोग से अच्छा शरीर पाया और सभी अनुकूलताएं मिली उसे आत्महित में लगाएं। आत्महित का ध्यान रखने वाला ही परहित का कार्य कर सकता है। अपने आपको त्याग संयम और भगवान की आराधना से जोड़ें। यह जानकारी प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने दी।</p>
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		<title>पुण्य की जब तक प्रबलता है कुछ अच्छे कार्य कर लें : मुनि श्री प्रमाणसागर जी ने प्रवचन में पुण्य को बड़ा फलदायी बताया  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 11 Sep 2025 11:11:52 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[यदि पुण्य को पाप में लगाओगे तो यह पुण्य क्षीण होता चला जाएगा और जो दिख रहा है, वह भी सब हाथ से निकल जाएगा। जिस निगोद नरक से यह यात्रा प्रारंभ हुई थी फिर वहीं चले जाओगे। यह उद्गार मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने विद्याप्रमाण गुरुकुलम में व्यक्त किए। भोपाल से पढ़िए, अविनाश [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>यदि पुण्य को पाप में लगाओगे तो यह पुण्य क्षीण होता चला जाएगा और जो दिख रहा है, वह भी सब हाथ से निकल जाएगा। जिस निगोद नरक से यह यात्रा प्रारंभ हुई थी फिर वहीं चले जाओगे। यह उद्गार मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने विद्याप्रमाण गुरुकुलम में व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">भोपाल से पढ़िए, अविनाश जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>भोपाल।</strong> पुण्य से ही मनुष्य भव की अच्छी पर्याय, अच्छी बुद्धि, सुख-सुविधाएं घर परिवार तथा धन संपत्ति किसलिए मिलीं। पाप में लगाने विषयों में लीन होने तथा मजा मौज मस्ती करने के लिए? यदि पुण्य को पाप में लगाओगे तो यह पुण्य क्षीण होता चला जाएगा और जो दिख रहा है, वह भी सब हाथ से निकल जाएगा। जिस निगोद नरक से यह यात्रा प्रारंभ हुई थी फिर वहीं चले जाओगे। यह उद्गार मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने विद्याप्रमाण गुरुकुलम में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि मोह के बंधन में फंसा मनुष्य जीवन की सच्चाई को नहीं समझता। जब अंत समय निकट आता है और वह अपनी सांसों को जाता हुआ देखता है तो उसे पश्चाताप होता है। जिस धन संपत्ति के पीछे मैंने बहुमूल्य समय बिताया। वह मेरे कोई काम नहीं आई और अंत में उसके प्राण निकल जाते हैं। चीजें सब यहीं धरी की धरी रह जाती हैं। संत कहते है कि पुण्य के योग से जो मिला। उसे पुण्य और धर्म में लगाओ जिससे तुम अपनी आत्मा का उद्धार कर सको। यदि पुण्य की कमाई को पाप में लगाओगे तो फिर जिस नरक निगोद से निकर कर आए हो वहीं चले जाओगे।</p>
<p><strong>पंचतंत्र की कहानी से शिक्षा </strong></p>
<p>उन्होंने पंचतंत्र की प्रेरणादायक कहानी सुनाते हुए कहा कि एक चूहा संत के चरणों में पहुंचा। गुरुदेव से बिल्ली से परेशान होने की बात बताई। संत पहुंचे हुए थे। उनको वाक सिद्धि थी। उनको चूहे पर दया आई और उन्होंने उसे बिल्ली बना दिया लेकिन, बिल्ली को भी संतुष्टि नहीं मिली। वह फिर संत की शरण में आई और उसने कहा कि मैं कुत्ते से बहुत परेशान हूं। संत को फिर दया आई और उसे कुत्ता बना दिया। कुत्त्ते को भी अपना जीवन पसंद नहीं आया तो उसे हिरण बना दिया। हिरण ने कहा कि मुझे शेर से डर लगता है तो संत ने उसे शेर बना दिया और वह शेर बनकर जंगल में राज्य कर निर्भय हो विचरण करने लगा। अब उसके मन में लालच जागा कि कहीं यह संत मुझे फिर से चूहा न बना दे तो उसने संत को ही खत्म करने की योजना बनाई और आक्रमण करने उनके सामने पहुंचा, संत उसकी कुटिल भावना को समझ गए और वह हमला कर पाता कि उसे पुनः मूसकः भव कह दिया।</p>
<p><strong>पुण्य को यदि भोग में लगाओगे तो वापस नरक निगोद मिलेगा </strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि यह चूहा और कोई नहीं हम सब की यही कहानी है। जिस पुण्य के योग से यह मनुष्य भव मिला। उस पुण्य को यदि पाप में लगाओगे तो नरक निगोद में ही जाओगे। उन्होंने सभी को आंखें बंद कर एक प्रयोग कराया। महसूस करें कि मेरी काया जर्जर होने को है, पूरा परिवार सामने है। उन्होंने सारे प्रयास कर लिए उनकी आंखों में बेबसी और लाचारी है और मेरी आंखों के सामने मुझे मौत नजर आ रही है। सब कुछ यहीं छूटता नजर आ रहा है। मेरी एक-एक सांस बड़ी कठिनाई से चल रही है। मैं चीजों को देख और समझ रहा हूं। मेरे सामने मेरा पूरा जीवन चलचित्र के समान दिखाई दे रहा है। मुनि श्री ने कहा जिस पुण्य के योग से तुम आज यहां तक पहुंचे हो उसी पुण्य को यदि भोग में लगाओगे तो वापस नरक निगोद के पात्र तो बनना ही पड़ेगा। चलो नरक निगोद नहीं पहुंचे और मनुष्य ही बने लेकिन, भिखारी के रूप में जन्म लिया तो क्या आपको अच्छा लगेगा? नहीं न!</p>
<p><strong>मौका हाथ से निकले इसके पहले संभल जाओ </strong></p>
<p>यदि भिखारी नहीं सम्राट बनना चाहते हो तो सम्राट जैसे काम करो। निर्णय करो कि मैं अपने जीवन में प्राप्त संसाधनों का उपभोग मजा मौज मस्ती में नहीं, पुण्य, धर्म तथा आत्मा के उद्धार में लगाऊंगा। इसे अपने जीवन का मूलमंत्र बना लो मुनि श्री ने कहा कि जीवन का कोई ठिकाना नहीं कब टपक जाओ। आजकल तो जो घटनाएं सामने आ रही है। उसमें जवान-जवान ही जाने लगे हैं, कब किसकी बारी आ जाए पता नहीं? अपने लेखा-जोखा याद करो सभी कि बैलेंस सीट तैयार है। वही भोगोगे जो तुमने अपने जीवन में किया है और वही पाओगे। जैसा जीवन तुमने जिआ है। सभी को इसका हिसाब चुकाना पड़ेगा। इस सच्चाई को समझिये जो जीवन मिला है। वह दोबारा कब मिले इसका कोई ठिकाना नहीं। मौका हाथ से निकल जाए इसके पहले संभल जाओ।</p>
<p><strong>यह प्रेरणा आपके जीवन में सच्चा धर्मानुराग जगाए</strong></p>
<p>कहावत है कि फिर पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत? पल-पल यह उम्र रूपी चिड़िया जीवन को चुग रही है। जीवन समाप्त हो उसके पहले इस चेतना को जगा लो, जब जागो तभी सबेरा, आगे बढ़ो। कुछ लिख कर सो गए। कुछ पढ़कर सो गए। जिस जगह से जागो सबेरे उस जगह से बढ़कर सोओ और एक सीढ़ी चढ़कर सोओ। तभी आपके जीवन का पथ प्रशस्त होगा। उन्होंने सभी को आशीर्वाद देते हुए कहा कि आज की यह प्रेरणा आपके जीवन में सच्चा धर्मानुराग जगाए। आप सभी संयमी बने इसी में आपके जीवन की सार्थकता है और अब ज्यादा समय नहीं बचा है। उल्टी गिनती प्रारंभ हो चुकी है। कब दिपावली आ जाएगी और चातुर्मास निष्ठापन हो जाएगा। पता ही नहीं लगेगा। इसके पूर्व पुण्य अर्जन करने का एक और मौका श्री सिद्धचक्र महामहामंडल विधान, जो कि संस्कृत के बीजाक्षरों से मंडित है। आपके सामने आने वाला है। उसका लाभ पूरे भोपाल वासी उठाएं।</p>
<p><strong>क्षमावाणी समारोह 14 सितंबर को </strong></p>
<p>प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि 14 सितंबर रविवार को दोपहर 1.30 बजे से क्षमावाणी का कार्यक्रम केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान एवं सांसद आलोक शर्मा के मुख्य आतिथ्य में होगा। इसमें भोपाल शहर में विराजमान सभी साधु-साध्वियों को भी आमंत्रित किया गया है। विद्याप्रमाण गुरुकुलम् तथा सकल जैन समाज भोपाल ने सभी समाज बंधुओं तथा सभी विशिष्ट नागरिकों से तथा आसपास के जिलों के समाज बंधुओं से इस कार्यक्रम में पधारने की अपील की है। सभी के सांयकालीन भोजन की व्यवस्था कार्यक्रम स्थल पर की गई है।</p>
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		<title>क्षमा करने के लिए सबसे अधिक साहस जरूरी: 14 सितंबर को भोपाल जैन समाज का क्षमावाणी महोत्सव  </title>
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		<pubDate>Wed, 10 Sep 2025 09:59:02 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आज का युग ‘रिएक्शन’ का युग है, छोटी सी बात पर रिश्ते टूट जाते हैं, पोस्ट पर कमेंट्स से भावनाएं आहत हो जाती हैं। अहंकार इतनी ऊंचाई पर बैठा है कि ‘मैं गलत नहीं हो सकता’ का भ्रम हमें अंदर से खोखला कर देता है यह उद्गार मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने व्यक्त किए। [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आज का युग ‘रिएक्शन’ का युग है, छोटी सी बात पर रिश्ते टूट जाते हैं, पोस्ट पर कमेंट्स से भावनाएं आहत हो जाती हैं। अहंकार इतनी ऊंचाई पर बैठा है कि ‘मैं गलत नहीं हो सकता’ का भ्रम हमें अंदर से खोखला कर देता है यह उद्गार मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">भोपाल से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> भोपाल (अवधपुरी)</strong>। आज का युग ‘रिएक्शन’ का युग है, छोटी सी बात पर रिश्ते टूट जाते हैं, पोस्ट पर कमेंट्स से भावनाएं आहत हो जाती हैं। अहंकार इतनी ऊंचाई पर बैठा है कि ‘मैं गलत नहीं हो सकता’ का भ्रम हमें अंदर से खोखला कर देता है यह उद्गार मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने व्यक्त किए। क्षमावाणी पर्व आंतरिक सफाई का पर्व है जैसे दीपावली पर हम घर की सफाई करते हैं, वैसे ही क्षमावाणी पर्व आत्मा की सफाई का पर्व है। मुनि श्री ने कहा कि क्षमा मांगने को लोग कमजोरी मानते हैं,पर सच्चाई यह है कि क्षमा करने के लिए सबसे अधिक साहस चाहिए। “क्षमा वीरस्य भूषणम।” या“मिच्छामी दुक्कड़म” सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि यह हमारा संकल्प बने “मिच्छामी दुक्कड़म”का अर्थ है “ ’यदि मुझसे जाने-अनजाने कोई अपराध, कोई कटुता, कोई चुभन हुई हो, तो मैं हृदय से क्षमा चाहता हूँ।”’ मुनि श्री ने कहा कि बाहर से हम कितने ही पूजा पाठ, व्रत उपवास कर लें,यदि हमारे अंदर काम, क्रोध, लोभ,और मोह की दुवृत्तियां पनप रही है तो हमारा क्षमावाणी मनाना सार्थक नहीं हो सकता।</p>
<p><strong>विकृतियों को ‘भावनायोग’ के अभ्यास से हटाया जा सकता है</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि क्षमा करने और क्षमा मांगने में मन वाणी और व्यवहार में पवित्रता होंना जरुरी है। तन की अपवित्रता तो बाहर के जल से साफ हो सकती है, लेकिन मन की पवित्रता के लिए विद्वेष, वासना, लोभ, ईष्या, वैमनस्यता,छल, कपट से रिक्त होना जरूरी है। इन विकृतियों को ‘भावनायोग’ के अभ्यास से हटाया जा सकता है। मुनि श्री ने कहा ’भावनायोग करने से जैसा हम चाहेंगे वैसा हमारा जीवन बनेगा। मनोविज्ञान भी कहता है कि जैसा हम देखते है, जैसा हम सुनते है तथा जैसा हम महसूस करते हैं। वह सभी घटनाएं और संस्कार हमारे अवचेतन मन में अंकित हो जाते है और यहीं से हमारा अवचेतन मन हमारे चेतन मन को प्रभावित करता है, इसलिए मन को अपवित्र करने वाले संसर्ग से बचिए।</p>
<p><strong>क्षमावाणी पर्व आत्म शुद्धि का पर्व है</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा धर्म पवित्र हृदय में ही बसता है, और मन की मलिनता धर्म की तेजस्विता को मंद कर देती है। जिसका मन अपवित्र होता है, वह लोभ और लालसा से भरा एवं सदैव असंतुष्ट रहता है, जो खुद बुरा सोचता है। वह दूसरों को भी बैसा ही मानता है और वह कभी किसी को सम्मान नहीं दे सकता, क्षमावाणी पर्व आत्म शुद्धि का पर्व है आत्मशुद्धि लिए बोध वाक्यों को बार-बार दोहराइए। मैं शुद्ध आत्मा हूं। मैं पवित्र आत्मा हुं पवित्रता मेरा स्वभाव है। पवित्रता मेरा धर्म है, जब हम बार -बार इन वाक्यों को दोहराएंगे तो यह हमारे भावों को शुद्ध करने में निमित्त बनेगा। मुनिसंघ के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया आगामी 14 सितंबर रविवार को संपूर्ण भोपाल के जैन समाज का मुनिसंघ के सानिध्य में क्षमावाणी पर्व दोपहर1.30 बजे से आयोजित है। चातुर्मास चक्रवर्ती तथा सभी नवरत्न एवं विद्याप्रमाण गुरुकुलम तथा गुणायतन की पूरी टीम आपका स्वागत करने के लिए आतुर हैं।</p>
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