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	<title>वाराणसी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>कल्याण और आत्मिक शांति का मार्ग: भगवान श्रेयांसनाथ गर्भ कल्याणक महोत्सव 8 मई को  </title>
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		<pubDate>Thu, 07 May 2026 07:59:01 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याणक ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी को मनाया जाता है। इस बार यह पावन दिन 8 मई को आ रहा है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला के तहत आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति&#8230; इंदौर। जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याणक ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी को मनाया जाता है। इस बार यह पावन दिन 8 मई को आ रहा है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला के तहत आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याणक ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी को मनाया जाता है। इस बार यह पावन दिन 8 मई को आ रहा है। यह हमें याद दिलाता है कि एक महान आत्मा का आगमन केवल एक भौतिक घटना नहीं, बल्कि संपूर्ण जगत के कल्याण (श्रेय) का सूचक है। इंदौर सहित देश भर के दिगंबर जैन मंदिरों में इस अवसर पर भगवान का अभिषेक, शांतिधारा और विशेष पूजन जैसे अनुष्ठान श्रद्धापूर्वक किए जाते हैं।</p>
<p><strong>गर्भ कल्याणक की कथा</strong></p>
<p>जैन ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रेयांसनाथ का जीव अपने पूर्व जन्म में पुष्करवर द्वीप के पूर्व विदेह क्षेत्र में राजा नलिनगुल्म था। वहां कठिन तपस्या और आत्म-साधना के माध्यम से उन्होंने ‘तीर्थंकर नाम कर्म’ का संचय किया। इसके पश्चात वे अच्युत स्वर्ग में इंद्र बने। ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी के दिन उस महान आत्मा ने वाराणसी के निकट सिंहपुरी नगरी (वर्तमान सारनाथ) के राजा विष्णुराज और रानी सुनंदा (विष्णुदेवी) के घर गर्भ में प्रवेश किया। उनके गर्भ में आने से 6 माह पूर्व से ही देवराज इंद्र की आज्ञा से कुबेर ने सिंहपुरी में रत्नों की वर्षा शुरू कर दी थी। रानी ने गर्भ धारण करते समय 16 शुभ स्वप्न देखे जो एक तीर्थंकर के अवतरण का संकेत थे।</p>
<p><strong>नामकरण और ‘श्रेय’ का संदेश</strong></p>
<p>भगवान के जन्म के बाद राजा विष्णु का राज्य और प्रजा अत्यंत समृद्ध और सुखी हो गई। चारों ओर ‘श्रेय’ (कल्याण) का वातावरण निर्मित होने के कारण इंद्र ने उनका नाम ‘श्रेयांसनाथ’ रखा। उनका प्रतीक चिह्न ‘गैंडा’ है, जो शक्ति और अडिगता का परिचायक है।</p>
<p><strong>भगवान श्रेयांसनाथ के मुख्य संदेश और उपदेश</strong></p>
<p>भगवान श्रेयांसनाथ का संपूर्ण जीवन और उनकी दिव्य देशना हमें आत्म-उत्थान के कई सूत्र देती है।</p>
<p>-कल्याण का मार्ग: भगवान का नाम ही ‘श्रेय’ (कल्याण) से जुड़ा है। उन्होंने सिखाया कि वास्तविक कल्याण बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि अपनी आत्मा के शुद्धिकरण में है।</p>
<p>-अहिंसा और करुणा: उन्होंने समस्त जीवमात्र के प्रति दया भाव रखने और मन-वचन-काय से किसी को कष्ट न पहुंचाने का उपदेश दिया।</p>
<p>-सांसारिक क्षणभंगुरता: राजसी सुखों के बीच रहने के बावजूद उन्होंने ऋतु परिवर्तन को देखकर वैराग्य धारण किया। यह संदेश देता है कि संसार के सभी भोग अनित्य हैं और केवल धर्म ही शाश्वत साथी है।</p>
<p>-इंद्रिय संयम और अपरिग्रह: उन्होंने अनावश्यक संग्रह (अपरिग्रह) को छोड़ने और अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने पर बल दिया।</p>
<p><strong>वर्तमान प्रासंगिकता</strong></p>
<p>भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याणक हमें यह सिखाता है कि हम अपने जीवन में ‘श्रेय’ (जो हितकारी हो) को चुनें, न कि केवल ‘प्रेय’ (जो केवल देखने में प्रिय हो) को। आज के भौतिकवादी युग में उनकी शिक्षाएं हमें आंतरिक शांति और संतोष का मार्ग दिखाती हैं। श्रद्धालुओं द्वारा किया जाने वाला पाठ और विधान केवल परंपरा नहीं, बल्कि उनके गुणों को अपने भीतर उतारने का संकल्प है।</p>
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		<title>भगवान पार्श्वनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक 15 दिसंबर को: पौष मास के कृष्ण एकादशी का पुण्य दिवस को मनाया जाता है  </title>
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		<pubDate>Sun, 14 Dec 2025 13:56:09 +0000</pubDate>
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<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी का जन्म एवं कल्याणक 15 दिसंबर को पौष कृष्ण एकादशी को मनाया जाएगा। भगवान पार्श्वनाथ जी का जन्म वाराणसी के भेलूपुर में हुआ था। जैन ग्रंथों के अनुसार वर्तमान में काल चक्र का अवरोही भाग, अवसर्पिणी गतिशील है और इसके चौथे युग में 24 तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का जन्म आज से लगभग 2 हजार 9 सौ वर्ष पूर्व वाराणासी में अश्वसेन नाम के इक्ष्वाकुवंशीय क्षत्रिय राजा और उनकी रानी वामा के यहां पौष कृष्&#x200d;ण एकादशी के दिन महा तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ। इनके शरीर पर सर्पचिह्म था। वामा देवी ने गर्भकाल में एक बार स्वप्न में एक सर्प देखा था, इसलिए पुत्र का नाम पार्श्व रखा गया। उनका प्रारंभिक जीवन राजकुमार के रूप में व्यतीत हुआ। एक दिन पार्श्व ने अपने महल से देखा कि पुरवासी पूजा की सामग्री लिए एक ओर जा रहे हैं। वहां जाकर उन्होंने देखा कि एक तपस्वी जहां पंचाग्नि जला रहा है और अग्नि में एक सर्प का जोड़ा मर रहा है, तब पार्श्व ने कहा कि ‘दयाहीन धर्म किसी काम का नहीं’। तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने 30 वर्ष की आयु में घर त्याग दिया था और जैन दीक्षा ली। काशी में 83 दिन की कठोर तपस्या करने के बाद 84वें दिन उन्हें केवल ज्ञान प्राप्त हुआ था। पुंड़्र, ताम्रलिप्त आदि अनेक देशों में उन्होंने भ्रमण किया। ताम्रलिप्त में उनके शिष्य हुए। पार्श्वनाथ ने चतुर्विध संघ की स्थापना की।</p>
<p>इसमें श्रमण, श्रमणी, श्रावक, श्राविका होते हैं और आज भी जैन समाज इसी स्वरुप में है। प्रत्येक गण एक गणधर के तहत कार्य करता था। सभी अनुयायियों, स्त्री हो या पुरुष सभी को समान माना जाता था। सारनाथ जैन-आगम ग्रंथों में सिंहपुर के नाम से प्रसिद्ध है। यहीं पर जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ जी ने जन्म लिया था और अपने अहिंसा धर्म का प्रचार-प्रसार किया था। केवल ज्ञान के बाद तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने जैन धर्म के चार मुख्य व्रत सत्य, अहिंसा, अस्तेय और अपरिग्रह की शिक्षा दी थी।</p>
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		<title>शांतिनाथ सेवा संघ करायेगा अयोध्या बनारस की तीर्थ वंदना: अतिथियों संघ के पदाधिकारियों ने तीर्थयात्रा पोस्टर का किया विमोचन </title>
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		<pubDate>Mon, 26 May 2025 13:35:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री दिगंबर जैसवाल जैन समाज की सेवाभावी संस्था श्री शांतिनाथ सेवा संघ दिल्ली ने अग्रवाल धर्मशाला शकरपुर दिल्ली में आयोजित समारोह में आगामी तीर्थ वंदना की घोषणा की। श्री शांतिनाथ सेवा संघ के अध्यक्ष हरिश्चंद जैन एवं महामंत्री दिनेश जैन टीटू ने बताया कि समारोह के मुख्य अतिथि सजल जैन (महक ग्रुप) दिल्ली व राजेंद्र [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री दिगंबर जैसवाल जैन समाज की सेवाभावी संस्था श्री शांतिनाथ सेवा संघ दिल्ली ने अग्रवाल धर्मशाला शकरपुर दिल्ली में आयोजित समारोह में आगामी तीर्थ वंदना की घोषणा की। श्री शांतिनाथ सेवा संघ के अध्यक्ष हरिश्चंद जैन एवं महामंत्री दिनेश जैन टीटू ने बताया कि समारोह के मुख्य अतिथि सजल जैन (महक ग्रुप) दिल्ली व राजेंद्र भंडारी (अध्यक्ष अतिशय क्षेत्र टिकटोली) मुरैना, बाहर से आए हुए अतिथियों एवं संघ के पदाधिकारियों ने तीर्थयात्रा पोस्टर का विमोचन किया। <span style="color: #ff0000">नईदिल्ली से पढ़िए मनोज जैन नायक की यह खबर..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>नई दिल्ली।</strong> श्री दिगंबर जैसवाल जैन समाज की सेवाभावी संस्था श्री शांतिनाथ सेवा संघ दिल्ली ने अग्रवाल धर्मशाला शकरपुर दिल्ली में आयोजित समारोह में आगामी तीर्थ वंदना की घोषणा की। श्री शांतिनाथ सेवा संघ के अध्यक्ष हरिश्चंद जैन एवं महामंत्री दिनेश जैन टीटू ने बताया कि समारोह के मुख्य अतिथि सजल जैन (महक ग्रुप) दिल्ली व राजेंद्र भंडारी (अध्यक्ष अतिशय क्षेत्र टिकटोली) मुरैना, बाहर से आए हुए अतिथियों एवं संघ के पदाधिकारियों ने तीर्थयात्रा पोस्टर का विमोचन कर सभी साधर्मी बंधुओं को इस वर्ष अयोध्याजी वाराणसी सहित निकटतम तीर्थ क्षेत्र की वंदना कराने की घोषणा की। महानगर दिल्ली एनसीआर में निवासरत दिगम्बर जैसवाल जैन समाज की सेवाभावी संस्था श्री शांतिनाथ सेवा संघ दिल्ली विगत वर्षों से सजातीय बंधुओं को पावन तीर्थ क्षेत्रों की वंदना कराने का पुण्यशाली कार्य करता आ रहा है। श्री शांतिनाथ सेवा संघ द्वारा रविवार को अग्रवाल धर्मशाला (मधुवन पार्क के सामने) निर्माण विहार दिल्ली में समारोह का आयोजन किया गया है। सकल जैसवाल जैन समाज दिल्ली एनसीआर द्वारा आयोजित समारोह में श्री शांतिनाथ सेवा संघ दिल्ली द्वारा तीर्थ यात्रा की घोषणा के साथ में चित्रकला प्रतियोगिता, लकी ड्रॉ, बुजुर्ग बंधुओं, पुजारियों, कुंडलपुर यात्रा के सहयोगियों का सम्मान भी किया गया।</p>
<p><strong>समारोह में सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए</strong></p>
<p>समारोह के मध्य सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए। समारोह के शुभारंभ में चित्र अनावरण दिलीपकुमार मनीष जैन (आगरा वाले), राकेश जैन (मुरार वाले), सुनीलकुमार पवन जैन (बरबाई वाले), पं. रमेशचंद जैन मंडावली, दीप प्रज्वलन दीपक, अनिल, ऋषभ, श्रेयांस जैन, जिनवाणी स्थापना अशोककुमार रोमी जैन शकरपुर, वीरेंद्रकुमार संदेश जैन शकरपुर, कपूरचंद गगन जैन इंद्रपुरम, मनोजकुमार अभय जैन नोएडा द्वारा की गई। समारोह के दौरान गिरीशचंद मयंक जैन शकरपुर ने मंच उद्घाटन किया। आयोजित लकी ड्रॉ में विमलकुमार अनिलकुमार पुणारावत परिवार (ओम ओवरसीज) दिल्ली की ओर से पुरस्कार वितरित किए गए। कार्यक्रम में उपस्थित सभी बंधुओं के लिए स्वल्पाहार एवं सामूहिक वात्सल्य भोज की समुचित व्यवस्था की गई थी। मंच संचालन का उत्तरदायित्व सुनील जैन (समोने वाले) शकरपुर ने निभाया। संघ के कोषाध्यक्ष अजय जैन अजिया ने बताया कि समस्त सजातीय बंधुओं को इस वर्ष शाश्वत तीर्थ क्षेत्र अयोध्याजी, श्रावस्ती, धर्मपुरी, काशी विश्वनाथ, वाराणसी आदि जैन तीर्थों की बंदना कराई जाएगी। तीर्थ यात्रा से संबंधित तिथि सहित सभी आवश्यक जानकारियों से अति शीघ्र सभी को अवगत कराया जाएगा।</p>
<p><strong>अतिशय क्षेत्र टिकटोली के विकास पर हुई विशेष चर्चा</strong></p>
<p>श्री शांतिनाथ सेवा संघ, शकरपुर दिल्ली द्वारा आयोजित वार्षिक यात्रा की घोषणा के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में मध्यप्रदेश के मुरैना जिले में जिला मुख्यालय से मात्र 47 कि.मी. की दूरी पर स्थित 1000 बर्ष से भी अधिक प्राचीन श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र टिकटोली के विकास को लेकर विशेष चर्चा हुई। इस चर्चा का केंद्र बिंदु रहा। कैसे युवाओं की भागीदारी से टिकटोली को सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से सशक्त बनाया जा सकता है। मुख्य अतिथि राजेंद्र भंडारी (अध्यक्ष अतिशय क्षेत्र टिकटोली) ने क्षेत्र में चल रहे विकास कार्यों और भविष्य की योजनाओं की रूपरेखा प्रस्तुत की। इस चर्चा में महक ग्रुप के डायरेक्टर युवा उद्यमी सजल जैन दिल्ली, युवाजन अध्यक्ष नवीन जैन, महामंत्री अजय जैन बॉबी, मुख्य यात्रा संयोजक मोहित जैन चीकू मुख्य रूप से उपस्थित थे। युवाजन सदस्यों ने मिलकर टिकटोली में जनसुविधाओं के विस्तार, धार्मिक स्थलों के सौंदर्यीकरण, तथा नवयुवकों को संगठित कर सेवा कार्यों में जुटाने जैसे बिंदुओं पर विशेष चर्चा की। कार्यक्रम में यह स्पष्ट संदेश गया कि आने वाले समय में टिकटोली न केवल धार्मिक रूप से बल्कि सामाजिक विकास की दृष्टि से भी एक प्रेरणादायक उदाहरण बनेगा।</p>
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		<title>भगवान पार्श्वनाथ का गर्भ कल्याणक महोत्सव: वैशाख कृष्ण द्वितीया तिथि के अनुसार इस बार यह 15 अप्रैल को </title>
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		<pubDate>Tue, 15 Apr 2025 02:41:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के तेइसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी का गर्भ कल्याणक वैशाख कृष्ण द्वितीया को धार्मिक उल्लास के साथ मनाया जाएगा। दिगंबर जैन मंदिरों में अभिषेक, शांतिधारा, विधान आदि के कार्यक्रम पांरपरिक रूप से आयोजित किए जाएंगे। इस बार यह गर्भ कल्याण 15 अप्रैल को मनाया जाएगा। भगवान पार्श्वनाथ के गर्भ कल्याण से जुड़ी जानकारी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के तेइसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी का गर्भ कल्याणक वैशाख कृष्ण द्वितीया को धार्मिक उल्लास के साथ मनाया जाएगा। दिगंबर जैन मंदिरों में अभिषेक, शांतिधारा, विधान आदि के कार्यक्रम पांरपरिक रूप से आयोजित किए जाएंगे। इस बार यह गर्भ कल्याण 15 अप्रैल को मनाया जाएगा। <span style="color: #ff0000">भगवान पार्श्वनाथ के गर्भ कल्याण से जुड़ी जानकारी श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रंखला में उपसंपादक प्रीतम लखवाल के संयोजन में पढ़िए&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> तेइसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का गर्भ कल्याण इस बार 15 अप्रैल को है। इस दिन वैशाख कृष्ण द्वितीया है। इसी दिन भगवान ने अपनी माता के गर्भ में अवतरण लिया था। इस दिवस को पूरे भारत वर्ष में भगवान पारसनाथ जी के मंदिरों में धूमधाम से बनाया जाएगा। दिगंबर जैन मंदिरों में अभिषेक, शांतिधारा सहित विविध आयोजन कर जैन समाज के श्रावक-श्राविकाएं पुण्यलाभ अर्जित करेंगे। इस दिन दिनभर भगवान की भक्ति आराधना की जाएगी। जैन धर्म ग्रंथों के अनुसार काशी में 83 दिन की कठोर साधना और तप के बाद 84 वें दिन उन्हें केवल ज्ञान मिला था। पुंड़्र, ताम्रलिप्त आदि अनेक देशों में उन्होंने भ्रमण किया। ताम्रलिप्त में उनके शिष्य हुए। पार्श्वनाथ ने चतुर्विध संघ की स्थापना की। इसमें श्रमण, श्रमणी, श्रावक, श्राविका होते हैं और आज भी जैन समाज इसी स्वरूप में है। प्रत्येक गण एक गणधर के तहत कार्य करता था। सभी अनुयायियों, स्त्री हों या पुरुष सभी को समान माना जाता था। तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने जैन धर्म के चार मुख्य व्रत सत्य, अहिंसा, अस्तेय और अपरिग्रह की शिक्षा दी थी।</p>
<p><strong>वामादेवी ने गर्भकाल में एक बार स्वप्न में सर्प देखा था</strong></p>
<p>जैन ग्रंथों के अनुसार वर्तमान में काल चक्र का अवरोही भाग, अवसर्पिणी गतिशील है और इसके चौथे युग में 24 तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। भगवान् पार्श्वनाथ का जन्म वाराणसी के भेलूपुर में हुआ था। तीर्थंकर पार्श्वनाथ का जन्म लगभग 2 हजार 9 सौ वर्ष पूर्व वाराणसी में हुआ था। वाराणसी में अश्वसेन नाम के इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रिय राजा थे। उनकी रानी वामा ने पौष कृष्ण एकादशी के दिन महा तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। जिसके शरीर पर सर्प चिन्ह था। वामादेवी ने गर्भकाल में एक बार स्वप्न में सर्प देखा था। इसलिए पुत्र का नाम ‘पार्श्व’ रखा गया। उनका प्रारंभिक जीवन राजकुमार के रूप में बीता। एक दिन पार्श्व ने महल से देखा कि पुरवासी पूजा की सामग्री लिए एक ओर जा रहे हैं। उन्होंने देखा कि एक तपस्वी, जहां पंचाग्नि जला रहा है और अग्नि में एक सर्प का जोड़ा मर रहा है। तब पार्श्वनाथ ने कहा:-‘दयाहीन धर्म किसी काम का नहीं।’ यह देख उनको वैराग्य हुआ और पार्श्वनाथ ने 30 वर्ष की उम्र में घर त्याग दिया और दीक्षा ली। अपना निर्वाणकाल समीप जानकर श्री सम्मेद शिखरजी पहुंचे। जहां श्रावण शुक्ल सप्तमी को उन्हे मोक्ष मिला।</p>
<p>भगवान पार्श्वनाथ की लोक व्यापकता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि आज भी सभी तीर्थंकरों की मूर्तियों और चिन्हों में पार्श्वनाथ का चिन्ह सबसे ज्यादा है। आज भी पार्श्वनाथ की कई चमत्कारिक मूर्तियां देशभर में विराजित हैं। जिनकी गाथा आज भी पुराने लोग सुनाते हैं। जैन ग्रंथों में तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के नौ पूर्व जन्मों का वर्णन है। पहले जन्म में ब्राह्मण, दूसरे में हाथी, तीसरे में स्वर्ग के देवता, चौथे में राजा, पांचवें में देव, छठवें जन्म में चक्रवर्ती सम्राट और सातवें जन्म में देवता, आठ में राजा और नौवें जन्म में राजा इंद्र (स्वर्ग) के बाद 10वें जन्म में उन्हें तीर्थंकर बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पूर्व जन्मों के संचित पुण्यों और 10वें जन्म के तप के फलस्वरूप तीर्थंकर बनें।</p>
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		<title>भगवान पार्श्वनाथ का ज्ञान कल्याणक चैत्र कृष्ण चतुर्थी के दिन: तिथि के अनुसार इस बार यह 18 मार्च को मनाया जाएगा </title>
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		<pubDate>Mon, 17 Mar 2025 10:23:25 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[तेइसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी का ज्ञान कल्याणक चैत्र कृष्ण चतुर्थी के दिन हुआ था। इस दिन उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इस दिन को पूरे देश में पूरी श्रद्धा भक्ति और आनंद के साथ उनका ज्ञान कल्याणक मनाया जाता है। इस मंदिरों में अभिषेक, शांतिधारा, विधान आदि के कार्यक्रम कर पुण्य अर्जित [&#8230;]]]></description>
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<p>तेइसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी का ज्ञान कल्याणक चैत्र कृष्ण चतुर्थी के दिन हुआ था। इस दिन उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इस दिन को पूरे देश में पूरी श्रद्धा भक्ति और आनंद के साथ उनका ज्ञान कल्याणक मनाया जाता है। इस मंदिरों में अभिषेक, शांतिधारा, विधान आदि के कार्यक्रम कर पुण्य अर्जित किया जाता है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रंखला में यह उपसंपादक प्रीतम लखवाल के संयोजन में पढ़िए&#8230;</span></p>
<hr />
<p>भगवान पार्श्वनाथ जैन धर्म के तेइसवें तीर्थंकर हैं। भगवान पार्श्वनाथ जी का ज्ञान कल्याणक चैत्र कृष्ण चतुर्थी के दिन हुआ था। इस दिन उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। यह घटना उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ थी, जिसने उन्हें जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर के रूप में स्थापित किया। काशी में 83 दिन की कठोर तपस्या करने के बाद 84 वें दिन उन्हें केवल ज्ञान प्राप्त हुआ था। पुंड़्र, ताम्रलिप्त आदि अनेक देशों में उन्होंने भ्रमण किया। ताम्रलिप्त में उनके शिष्य हुए। पार्श्वनाथ ने चतुर्विध संघ की स्थापना की। इसमें श्रमण, श्रमणी, श्रावक, श्राविका होते हैं और आज भी जैन समाज इसी स्वरूप में है। प्रत्येक गण एक गणधर के तहत कार्य करता था। सभी अनुयायियों, स्त्री हो या पुरुष सभी को समान माना जाता था। सारनाथ जैन-आगम ग्रंथों में सिंहपुर के नाम से प्रसिद्ध है। यहीं पर जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ जी ने जन्म लिया था और अपने अहिंसा धर्म का प्रचार-प्रसार किया था। केवल ज्ञान के बाद तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने जैन धर्म के चार मुख्य व्रत सत्य, अहिंसा, अस्तेय और अपरिग्रह की शिक्षा दी थी।</p>
<p><strong>भगवान पार्श्वनाथ ने कहाः-‘दयाहीन धर्म किसी काम का नहीं।’</strong></p>
<p>जैन ग्रंथों के अनुसार वर्तमान में काल चक्र का अवरोही भाग, अवसर्पिणी गतिशील है और इसके चौथे युग में 24 तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। भगवान् पार्श्वनाथ का जन्म वाराणसी के भेलूपुर में हुआ था। तीर्थंकर पार्श्वनाथ का जन्म आज से लगभग 2 हजार 9 सौ वर्ष पूर्व वाराणसी में हुआ था। वाराणसी में अश्वसेन नाम के इक्ष्वाकुवंशीय क्षत्रिय राजा थे। उनकी रानी वामा ने पौष कृष्ण एकादशी के दिन महा तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। जिसके शरीर पर सर्प चिन्ह था। वामादेवी ने गर्भकाल में एक बार स्वप्न में एक सर्प देखा था। इसलिए पुत्र का नाम ‘पार्श्व’ रखा गया। उनका प्रारंभिक जीवन राजकुमार के रूप में व्यतीत हुआ। एक दिन पार्श्व ने अपने महल से देखा कि पुरवासी पूजा की सामग्री लिए एक ओर जा रहे हैं। वहां जाकर उन्होंने देखा कि एक तपस्वी जहां पंचाग्नि जला रहा है और अग्नि में एक सर्प का जोड़ा मर रहा है तब पार्श्व ने कहाः-‘दयाहीन धर्म किसी काम का नहीं।’ तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने तीस वर्ष की आयु में घर त्याग दिया था और जैन दीक्षा ली।</p>
<p><strong> सम्मेद शिखरजी पर हुआ निर्वाण</strong></p>
<p>अपना निर्वाणकाल समीप जानकर श्री सम्मेद शिखरजी (पारसनाथ की पहाड़ी जो झारखंड में है) पर चले गए। जहां श्रावण शुक्ल सप्तमी को उन्हे मोक्ष की प्राप्ति हुई। भगवान पार्श्वनाथ की लोक व्यापकता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि आज भी सभी तीर्थंकरों की मूर्तियों और चिन्हों में पार्श्वनाथ का चिन्ह सबसे ज्यादा है। आज भी पार्श्वनाथ की कई चमत्कारिक मूर्तियां देशभर में विराजित हैं। जिनकी गाथा आज भी पुराने लोग सुनाते हैं।</p>
<p><strong>भगवान पार्श्वनाथ का पूर्वजन्म</strong></p>
<p>जैन ग्रंथों में तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के नौ पूर्व जन्मों का वर्णन है। पहले जन्म में ब्राह्मण, दूसरे में हाथी, तीसरे में स्वर्ग के देवता, चौथे में राजा, पांचवें में देव, छठवें जन्म में चक्रवर्ती सम्राट और सातवें जन्म में देवता, आठ में राजा और नौवें जन्म में राजा इंद्र (स्वर्ग) के बाद दसवें जन्म में उन्हें तीर्थंकर बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पूर्व जन्मों के संचित पुण्यों और दसवें जन्म के तप के फलस्वरूप तीर्थंकर बनें।</p>
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		<title>समाज जन ने दी बधाई : डॉ. इन्दु जैन राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में विशेषज्ञ सलाहकार सदस्य के रूप में मनोनीत </title>
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		<pubDate>Mon, 16 Sep 2024 08:56:57 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[प्राकृत भाषा एवं साहित्य में विद्यावारिधि की उपाधि से विभूषित,विभिन्न उपाधियों एवं अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित विदुषी रत्न डॉ. इन्दु जैन राष्ट्र गौरव को भारत सरकार द्वारा अल्पसंख्यक आयोग के पैनल में विशेषज्ञ सलाहकार सदस्य के रूप में मनोनीत किया गया है। पढ़िए यह रिपोर्ट&#8230; वाराणसी। प्राकृत भाषा एवं साहित्य में विद्यावारिधि की उपाधि [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>प्राकृत भाषा एवं साहित्य में विद्यावारिधि की उपाधि से विभूषित,विभिन्न उपाधियों एवं अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित विदुषी रत्न डॉ. इन्दु जैन राष्ट्र गौरव को भारत सरकार द्वारा अल्पसंख्यक आयोग के पैनल में विशेषज्ञ सलाहकार सदस्य के रूप में मनोनीत किया गया है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>वाराणसी</strong>। प्राकृत भाषा एवं साहित्य में विद्यावारिधि की उपाधि से विभूषित,विभिन्न उपाधियों एवं अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित विदुषी रत्न डॉ. इन्दु जैन राष्ट्र गौरव को भारत सरकार द्वारा अल्पसंख्यक आयोग के पैनल में विशेषज्ञ सलाहकार सदस्य के रूप में मनोनीत किया गया है। आप राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित जैनदर्शन,प्राकृत भाषा के प्रसिद्ध विद्वान,सम्पूर्णानंद सं.वि.वि. में जैनदर्शन के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. फूलचंद जैन &#8216;प्रेमी&#8217; एवं आदर्श महिला के सम्मान से सम्मानित प्रसिद्ध जैन विदुषी डॉ. मुन्नीपुष्पा जैन (वाराणसी) की सुपुत्री एवं समाजसेवी श्री राकेश जैन (दिल्ली) की जीवनसंगिनी हैं।</p>
<p>प्रधानमंत्री के सानिध्य में &#8220;नवीन संसद भवन&#8221; के ऐतिहासिक भूमिपूजन एवं उद्घाटन समारोह में आयोजित &#8220;सर्वधर्म प्रार्थना सभा&#8221; में आप &#8220;जैन समाज&#8221; का गौरवपूर्ण प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। भारत देश के माननीय राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति,प्रधानमंत्री,मुख्यमंत्री,प्रतिष्ठित धर्म गुरुओं आदि कई विशिष्ट व्यक्तियों के सानिध्य में आयोजित सर्वधर्म प्रार्थना सभाओं,विचार संगोष्ठियों,सेमिनार में एवं आकाशवाणी-दूरदर्शन सहित अन्य कई विशेष कार्यक्रमों में मंचसंचालन एवं जैन प्रार्थना के साथ ही भारतीय संस्कृति,जैन संस्कृति,नैतिक मूल्य, अहिंसा,शाकाहार आदि अनेक विषयों पर आपने प्रेरक वक्तव्य दिए हैं और निरंतर सामाजिक,धार्मिक क्षेत्रों में अपना समर्पित योगदान दे रही हैं। डॉ. इन्दु जैन को अल्पसंख्यक आयोग के पैनल में विशेषज्ञ सलाहकार सदस्य के रूप में मनोनीत होने पर समस्त श्रेष्ठजनों ने बधाई दी है।</p>
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		<title>जन्मदिवस पर विशेष : श्रमण संस्कृति के सजग प्रहरी हैं प्रो.डॉ. फूलचन्द्र जैन प्रेमी  </title>
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		<pubDate>Fri, 12 Jul 2024 08:26:33 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[विद्या एवं जैन जगत् के वरिष्ठ मनीषी श्रुत सेवी आदरणीय प्रो.डॉ. फूलचन्द्र जैन प्रेमी जी श्रुत साधना की एक अनुकरणीय मिसाल हैं, जिनका पूरा जीवन मात्र और मात्र भारतीय प्राचीन विद्याओं,भाषाओं,धर्मों,दर्शनों और संस्कृतियों को संरक्षित और संवर्धित करने में गुजरा है । काशी में रहते हुए आज वे अपने जीवन के 76 वर्ष और विवाह [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>विद्या एवं जैन जगत् के वरिष्ठ मनीषी श्रुत सेवी आदरणीय प्रो.डॉ. फूलचन्द्र जैन प्रेमी जी श्रुत साधना की एक अनुकरणीय मिसाल हैं, जिनका पूरा जीवन मात्र और मात्र भारतीय प्राचीन विद्याओं,भाषाओं,धर्मों,दर्शनों और संस्कृतियों को संरक्षित और संवर्धित करने में गुजरा है । काशी में रहते हुए आज वे अपने जीवन के 76 वर्ष और विवाह के इक्यावन वर्ष पूरे कर रहे हैं और उम्र के इस पड़ाव में भी युवाओं से भी ज्यादा जोश ,लगन और पूरे तन -मन -धन से अपने इसी मिशन में निरंतर लगे हुए हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p>विद्या एवं जैन जगत् के वरिष्ठ मनीषी श्रुत सेवी आदरणीय प्रो.डॉ. फूलचन्द्र जैन प्रेमी जी श्रुत साधना की एक अनुकरणीय मिसाल हैं, जिनका पूरा जीवन मात्र और मात्र भारतीय प्राचीन विद्याओं,भाषाओं,धर्मों,दर्शनों और संस्कृतियों को संरक्षित और संवर्धित करने में गुजरा है । काशी में रहते हुए आज वे अपने जीवन के 76 वर्ष और विवाह के इक्यावन वर्ष पूरे कर रहे हैं और उम्र के इस पड़ाव में भी युवाओं से भी ज्यादा जोश ,लगन और पूरे तन -मन -धन से अपने इसी मिशन में निरंतर लगे हुए हैं । आपने लेखन के क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य किए हैं और आपकी लेखनी से ही श्रमण संस्कृति वैदिक व्रात्य एक ऐसी पुस्तक की रचना हुई है , जो भारतीय जनमानस के मध्य श्रमण जैन संस्कृति की गौरवशाली परम्परा एवं प्राचीनता को सप्रमाण सिद्ध कर रही है ।</p>
<p>प्राचीन काल से ही काशी में विद्वानों की एक समृद्ध परंपरा रही है ,अनेक विधाओं के विद्वान् इसी भूमि पर अपनी साधना करते हुए भारतीय भाषाओँ और विद्याओं का डंका पूरे विश्व में बजाते आ रहे हैं ।</p>
<p>संस्कृत–प्राकृत भाषाओं ,भारतीय दर्शन और श्रमण संस्कृति की विधा में पिछले पचास वर्षों से निष्काम साधना करने वाले और अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य को तथा अनेक शिष्यों को इन्हीं विद्याओं में परंपरागत रूप से लगा कर एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करने वाले प्रो. प्रेमी काशी की पाण्डित्य परंपरा के ऐसे महनीय व्यक्तित्व के धनी मनीषी हैं, जो अपने सौम्य स्वभाव ,मधुर वाणी ,सदा प्रसन्न मुद्रा , विनम्रता, निरभिमानता,निष्कपटता के कारण,एक आम नागरिक और विद्यार्थी से लेकर बड़े-बड़े विद्वानों, श्रेष्ठियों, उद्योगपतियों, मंत्रियों,साधु -संतों और साधकों के तक के ह्रदय में सदा गहरे आत्मीय भाव से विद्यमान रहते हैं ।कभी इनसे पांच मिनट भी मिलने वाला मनुष्य जीवन भर इन्हें भुला नहीं पाता है ।</p>
<p>प्राच्य भारतीय संस्कृति, इतिहास, जैनधर्म-दर्शन, प्राकृत, संस्कृत, अपभ्रंश भाषा एवं साहित्य क्षेत्र में आपने अप्रतिम कार्य किये हैं । इनकी सेवाओं को देखते हुए महामहिम राष्ट्रपति जी ने आपको राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया है तथा उ.प्र.के महामहिम राज्यपाल महोदय और माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने आपको विशिष्ट पुरस्कार तथा जैन विश्व भारती, लाडनूं ने आगम मनीषा सम्मान से सम्मानित किया है ।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-63294" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240712-WA0005.jpg" alt="" width="637" height="967" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240712-WA0005.jpg 637w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/07/IMG-20240712-WA0005-198x300.jpg 198w" sizes="(max-width: 637px) 100vw, 637px" />जीवन संदेश –</strong></p>
<p>आपका जीवन एक खुली पुस्तक की तरह रहा है । स्वयं अपने बारे में बताते हुए वे अक्सर कहते हैं कि मैं अपने अध्ययनकाल में कभी बहुत अधिक प्रतिभाशाली विद्यार्थी नहीं रहा । परीक्षाओं में बहुत उच्च अंक नहीं आते थे ,लेकिन मैंने कभी हार नहीं मानी और मार्ग में आयीं अनेक कठिनाइयों ,निराशाओं आदि का साहस के साथ सामना करते हुए आगे बढ़ता रहा । मुझे बड़े बड़े लेखकों साहित्यकारों के निबंध और पुस्तकें पढ़ना और डायरी लेखन बचपन से पसंद रहा है । इन्हीं से मैं साहस प्राप्त करता था और प्रोत्साहित होता रहा और खुद को हर मुश्किल और संघर्ष में संभालता था । किसी भी कीमत पर मुझे श्रुत की रक्षा करनी है &#8211; यह संकल्प मेरे दिल और दिमाग में हमेशा चलता रहा और मैं ईमानदारी और निष्ठा से विद्याभ्यास करता रहा । मैंने कभी कोई दूसरे हानिकारक ऐब नहीं पाले क्यों कि अध्ययन अध्यापन लेखन ,दर्शन-पूजन का स्वभाव मुझे हमेशा अपने इन्हीं सब कार्यों में डुबो कर रखता था ।</p>
<p>&#8216;चुपचाप अपनी कर्त्तव्य साधना ईमानदारी से करते रहो क्यों कि सफलता तुम्हारे शुद्ध लक्ष्य और भाव पर भी आधारित होती है, सिर्फ टैलेंट पर नहीं ।जीवन को सार्थक बनाओ ,सफलता खुद ब खुद पैर चूमती है ।&#8217; &#8211; यही प्रेमी जी के जीवन का आज के सभी युवाओं और विद्यार्थियों के लिए संदेश भी है ।</p>
<p><strong>शिक्षा एवं कार्य क्षेत्र का चुनाव &#8211;</strong></p>
<p>कक्षा 5 तक की शिक्षा तो आपने अपने गाँव के सरकारी विद्यालय में प्राप्त की फिर कटनी (म. प्र.) के श्री शान्ति निकेतन जैन संस्कृत विद्यालय में रहकर पूर्व मध्यमा कक्षा तक, बाद में वर्णी जी द्वारा स्थापित काशी के सुप्रसिद्ध श्री स्याद्वाद महाविद्यालय में रहते हुए आपने शास्त्री,आचार्य(जैन दर्शन और प्राकृत ), काशी हिंदू विश्वविद्यालय से संस्कृत में जैन एवं बौद्ध विद्या वर्ग से एम. ए. और यहीं के दर्शन विभाग से ‘मूलाचार का समीक्षात्मक अध्ययन’ विषय पर पीएच.डी.की उपाधि प्राप्त की l तदनंतर पारमार्थिक शिक्षण संस्था ,जैन विश्व भारती ,लाडनूं,(राज.) में जैन विद्या एवं प्राकृत विभाग में चार वर्ष तक अध्यापन कार्य किया lअनंतर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में बत्तीस वर्ष तक जैनदर्शन विभागाध्यक्ष एवं आचार्य पद को सुशोभित करते हुए आपने अनेक प्राकृत एवं संस्कृत के प्राचीन मूल ग्रंथों का न सिर्फ अध्यापन कार्य किया बल्कि लेखन ,संपादन और प्रकाशन भी किया । इसके पश्चात् आपने दिल्ली स्थित भोगीलाल लहेरचन्द इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडोलॉजी के निदेशक पद को सुशोभित करते हुए बहुमूल्य सेवाएं दी हैं ।</p>
<p>आप अखिल भारतवर्षीय दि. जैन विद्वत् परिषद् के अध्यक्ष,शास्त्री परिषद् कार्यकारिणी सदस्य एवं जैन विश्वभारती संस्थान,(मानद विश्वविद्यालय) लाडनूं में एमेरिटस प्रोफेसर भी रह चुके हैं । आप अनेक शोधार्थियों को शोध कार्य करवा चुके हैं तथा देश विदेश के अनेक विद्यार्थी आपसे मार्ग दर्शन लेने अलग से काशी आते रहते हैं ।</p>
<p>वर्तमान में आप स्याद्वाद महाविद्यालय, वाराणसी के अधिष्ठाता तथा तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय,मुरादाबाद के एमरेटस प्रोफेसर के रूप में अनेक वर्षों से सेवा दे रहे हैं । काशी में नरिया स्थित श्री गणेशवर्णी शोध संस्थान के उपाध्यक्ष,पार्श्वनाथ विद्यापीठ शोध संस्थान की विद्या परिषद् के सदस्य होने के साथ साथ अनेक विश्वविद्यालयों एवं अकादमिक और सामाजिक संस्थानों की अनेक समितियों में आपकी सक्रिय भूमिका रहती है । आप मानव संसाधन विकास मंत्रालय की संस्कृत परिषद् के सदस्य रह चुके हैं तथा मथुरा से प्रकाशित प्राचीन पाक्षिक पत्रिका ‘जैन सन्देश’ के मानद सम्पादक भी हैं । राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ ,विश्व हिन्दू परिषद् ,संस्कृत भारती ,क्रिश्चियन सोसाइटी,बुद्ध सोसाइटी,जैन सोसाइटी आदि अनेक सामाजिक संगठनों द्वारा आयोजित सर्वधर्म समन्वय एवं अन्य कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका निभाई है ।</p>
<p>जैन इतिहास ,कला एवं पुरातत्व में गहरी रूचि होने से आपने अनेक निबंध और पुस्तक इस विषय पर लिखे और कई पुराने तीर्थ और पुरातात्त्विक प्रमाणों की खोज भी की ।</p>
<p>अकादमिक कार्यों के साथ साथ आप समाज में ज्ञान की अलख जगाने के लिए शास्त्रीय प्रवचनकार भी हैं तथा देश में अनेक स्थानों पर पारंपरिक शास्त्रपीठों पर आपके सैकड़ों प्रवचन हुए हैं ,जिसके कारण समाज के आम जन आपको ससम्मान ‘पण्डित जी’ कहकर पुकारते हैं और मित्र बंधुओं में आप ‘प्रेमी जी’ संबोधन से विख्यात हैं । शिष्यगण &#8216;गुरु जी&#8217; कह कर संबोधित करते ही हैं ।</p>
<p>काशी स्थित तीर्थंकर पार्श्वनाथ की जन्मस्थली भेलूपुर दिगंबर जैन मंदिर में नियमित शास्त्र सभा प्रारंभ करने का श्रेय आपको जाता है । यहाँ अनवरत आपने आम जन को प्राकृत ग्रन्थ समयसार,द्रव्यसंग्रह आदि तथा संस्कृत ग्रन्थ तत्त्वार्थसूत्र आदि का स्वाध्याय करवाया है ।आपने यहाँ प्राकृत भाषा का डिप्लोमा कार्यक्रम भी चलाया । परिणाम स्वरुप अनेक महिला पुरुष आगम और प्राकृत भाषा बोलने और लिखने में दक्ष हो गए ।आपने स्याद्वाद महाविद्यालय में सर्वप्रथम प्राकृत संभाषण की कार्यशाला का प्रारंभ किया ।विश्व व्यापी महामारी करोना के समय भी आपकी अध्यापन श्रृंखला रुकी नहीं ,नई तकनीक सीखकर आपने अपना स्वाध्याय ऑनलाइन माध्यम से भी जारी रखा । जैन फाउंडेशन ,मुंबई के तत्त्वावधान में छः माह तक देश विदेश के लगभग ३०० लोगों को प्राकृत भाषा का नियमित अभ्यास करवाया और डिप्लोमा की परीक्षा भी ली ।</p>
<p><strong>पारिवारिक पृष्ठभूमि भी है अनोखी-</strong></p>
<p>आप का जन्म दिगंबर जैन परवार जाति के बैसाखिया कुल के गोइल्ल गोत्र में दिनाँक 12 जुलाई 1948 को दलपतपुर (जिला सागर), म.प्र. में अत्यंत संभ्रांत और उच्च कुलीन खानदान के धर्मात्मा माता-पिता सिंघई नेमीचंद जैन-श्रीमती उद्यैती देवी जी के यहाँ हुआ ।</p>
<p>बुंदेलखंड की धरा पर जन्म लेने से अपने देश ,धर्म और संस्कृति के प्रति स्वाभिमान आपके रग-रग में भरा था । परिवार में पारंपरिक रूप से कृषि कार्य होने से प्राकृतिक जीवन और सीमित संसाधनों में रह कर कार्य करना आज भी इनकी जीवन चर्या का अंग है । ‘सादा जीवन उच्च विचार’आपके जीवन का आधार और ध्येय रहा है । परिवार में सबसे बड़ी दो बहनों के बाद पांच भाइयों में आप चौथे नंबर के भाई हैं और बचपन से ही गाँव के जैन मंदिर में चलने वाली शास्त्र सभा और पाठशाला में जाने से और अपने माता पिता की प्रेरणा से आपने संस्कृत शिक्षा को अर्जित करने के लिए कक्षा 6 से ही कटनी स्थित जैन संस्कृत विद्यालय और गुरुकुल में पूर्वमध्यमा तक पढ़कर उच्च शिक्षा हेतु काशी आ गए ।</p>
<p>आपका विवाह दमोह म.प्र.में दिगंबर जैन परवार जाति के उच्चकुलीन परिवार में धर्मात्मा श्री हुकमचंद जैन एवं श्रीमती जैन की बड़ी पुत्री मुन्नी जैन के साथ संपन्न हुआ ।आपकी धर्म पत्नी विवाह के समय मात्र ग्यारहवीं परीक्षा उत्तीर्ण थीं । अपने पति की श्रुत सेवा में कदम से कदम मिलाते हुए आपने विवाहोपरांत बी.ए.,एम.ए.,जैनदर्शनाचार्य,प्राकृताचार्य आदि की पारंपरिक उपाधियाँ प्राप्त करने के अनंतर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से ‘जैन मनीषी पंडित सदासुखदास जी का हिंदी गद्य के विकास में योगदान’ विषय पर गहन शोधकार्य करते हुए पी एच डी की उपाधि प्राप्त की । सभी पारिवारिक दायित्यों को निभाते हुए भी आपने प्रेमी जी के साथ और स्वतंत्र रूप से अनेक पांडुलिपियों का संपादन और प्रकाशन किया है ।आप प्राचीन ब्राह्मी लिपि की विशेषज्ञा हैं ,इसी लिपि के प्रशिक्षण की आप द्वारा बड़े बड़े शहरों में अनेक कार्यशालाएं आयोजित की जा चुकीं हैं ।आपको अनेक विशेष पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हो चुके हैं ।</p>
<p><strong>गुरु परंपरा-</strong></p>
<p>प्रो प्रेमी जी विद्वत् जगत् के सूर्य माने जाने वाले पंडित कैलाशचंद जी सिद्धांतशास्त्री जी ,पंडित फूलचंद सिद्धांतशास्त्री जी, पंडित जगन्मोहनलाल जी सिद्धांतशास्त्री,पंडित दरबारीलाल जी कोठिया न्यायाचार्य ,पंडित उदयचंद जी जैन सर्वदर्शनाचार्य, पं. भोलानाथ जी पांडेय, पं. दिवाकर जोशी शास्त्री, पं. गोविंद नरहरि बैजापुरकर,पंडित सूर्यनारायण उपाध्याय आदि श्रेष्ठ गुरुजनों के साक्षात् शिष्य रहे हैं ।इसके अलावा डॉ.सम्पूर्णानन्द जी, पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी ,पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी जी ,पंडित सीताराम शास्त्री ,पंडित वासुदेव द्विवेदी, ,पंडित अमृतलाल जैन, पंडित दलसुखभाई मालवड़िया, प्रो. नथमल जी टाटिया, डॉ. जगदीशचंद्र जी जैन,प्रो. सागरमल जैन,प्रो रेवाप्रसाद द्विवेदी जी आदि अनेक श्रेष्ठ विद्वानों का निरंतर सानिध्य प्राप्त किया एवं डॉ.मोहनलाल मेहता जी के कुशल निर्देशन में पार्श्वनाथ विद्यापीठ में रहकर शोध कार्य किया ।</p>
<p><strong>अद्भुत शिष्य परंपरा &#8211;  </strong></p>
<p>सामान्यतः प्रत्येक अध्यापक के हजारों शिष्य होते हैं जिन्हें वे जीवन भर पढ़ाते रहे हैं ,प्रो प्रेमी जी की इसके अलावा भी एक अद्भुत शिष्य परंपरा है । श्रवणबेलगोला के स्वामी चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी जी ने अनेक ब्रह्मचारी और भट्टारकों को इनके सान्निध्य में अध्ययन हेतु काशी भेजा ,आपने बहुत प्रेम से उन्हें पढ़ाया और अन्य अनेक सहयोग दिए । वे आज दक्षिण के बड़े बड़े मठों के स्वामी जी हैं । आपसे शिक्षा प्राप्त अनेक ब्रह्मचारी और छात्र आज अनेक मुनि संघों में ऐलक,क्षुल्लक और मुनि-आर्यिका के रूप में मोक्ष मार्ग की साधना कर रहे हैं । आपसे पढ़े हुए अनेक श्वेताम्बर मुनि,साध्वियां तथा समणियां हैं, जो विभिन्न संघों में अध्ययन अध्यापन एवं साधना कर रही हैं ।इसके अलावा विदेशों से अनेकों शोधार्थी भी आपसे मार्गदर्शन हेतु सदा से आते रहे हैं । घर पर पधारे सभी विद्यार्थियों को उनकी गुरुमाता डॉ. मुन्नी जी प्रेमपूर्वक वात्सल्य भाव से आहार करातीं और गुरु जी ज्ञान कराते –इस तरह ज्ञानदान और आहारदान की श्रृंखला आरम्भ से ही आज तक चल रही है और इनकी पूरी शिष्य परंपरा इस बात की भी गवाह है कि गुरु जी ने कभी किसी शिष्य से गुरुदक्षिणा स्वीकार नहीं की ।</p>
<p><strong>योग्य शिष्यवत् सुपुत्र और सुपुत्री भी &#8211;  </strong></p>
<p>प्रायः विद्वानों में यह भी पीड़ा रहा करती है कि हम दुनिया को समझाते हैं और प्रेरणा देते हैं किन्तु अपने ही घर वाले उनकी नहीं सुनते ।प्रो.प्रेमी जी अक्सर ब्राह्मण परंपरा की प्रशंसा करते हुए नहीं थकते कि वे पीढ़ी दर पीढ़ी वेद शास्त्रादि का संरक्षण और संवर्धन करते हैं तभी वेद और संस्कृत भाषा आज भी जीवंत है ।काशी के संगीत ,तबला,शहनाई आदि कला के क्षेत्र के घरानों को देखकर भी आप इस बात के लिए प्रेरित हुए कि अपने परिवार के बच्चों को श्रुत आगम शास्त्र और उसकी मूल भाषा प्राकृत के संरक्षण और संवर्धन हेतु समर्पित करें और परंपरागत रूप से जैनविद्या को आगे बढ़ायें । ह्रदय से सरल और महान लोगों की कल्याणपरक सहज मनोभावनाएँ कभी निष्फल नहीं जाती हैं ,प्रकृति स्वयमेव उसी ओर परिणमन करने लगती है । यही प्रेमी जी के परिवार में हुआ उनकी धर्मपत्नी डॉ.मुन्नी पुष्पा जैन तो उनके शाश्वत मार्ग में लगी ही थीं ,दोनों ने मिलकर अपने दोनों पुत्रों और पुत्री को भी बाल्यकाल से ही इसी मार्ग पर समर्पित कर दिया और आरम्भ से ही संस्कृत-प्राकृत आदि भाषाओँ का शिक्षण देना प्रारंभ कर दिया । इतना ही नहीं, पुण्योदय से इनके परिवार से जुड़ने वाले इनके एक दामाद और दो बहुयें भी अत्यंत धर्मात्मा खोजीं और कालांतर में प्रेम से उन्हें भी इसी अभियान में जोड़ लिया ।भौतिक युग में प्राच्य विद्या के क्षेत्र में अपेक्षाकृत कम विद्यार्थी होने से प्रो.प्रेमी जी ने घर पर ही श्रुत सेवियों की एक फ़ौज खड़ी कर डाली ।</p>
<p>आपके बड़े सुपुत्र युवा राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित प्रो डॉ.अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली स्थित श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रिय संस्कृत विश्वविद्यालय में जैन दर्शन विभाग के आचार्य हैं तथा अनेक शोध पत्रों ,लेखों एवं पुस्तकों के प्रकाशन के साथ आप प्राकृत भाषा में निरंतर प्रकाशित होने वाले प्रथम समाचार पत्र ’पागद-भासा’ के संस्थापक संपादक हैं और अपने शास्त्रीय प्रवचनों और व्याख्यानों के लिए देश विदेश में जाने जाते हैं । आपकी पुत्र वधु डॉ.रूचि जैन ने जैन योग पर शोधकार्य करके पी.एच.डी की उपाधि प्राप्त की है।सुपौत्र सुनय जैन एवं सुपौत्री अनुप्रेक्षा जैन भी इसी पथ पर अग्रसर हैं ।</p>
<p>आपकी सुपुत्री डॉ. इन्दु जैन राष्ट्र गौरव ने भी शौरसेनी प्राकृत साहित्य पर शोध उपाधि प्राप्त की है । आप उद्घोषिका, लेखिका, मोटिवेशनल स्पीकर एवं राष्ट्रीय -अंतर्राष्ट्रीय जैन प्रतिनिधि के रूप में जैन धर्म दर्शन की प्रभावना कर रहीं हैं । आपने नवीन संसद भवन के शिलान्यास और उद्घाटन में जैन धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए प्राकृत ,संस्कृत और अपभ्रंश भाषाओँ में मंगलाचरण प्रस्तुत कर एक ऐतिहासिक कार्य किया है जिसे सम्पूर्ण विश्व में सराहा गया । दामाद श्रीमान् राकेश जैन जी समर्पित समाजसेवी हैं और जैन धर्म की प्रभावना में संलग्न रहते हैं ।</p>
<p>आपके सबसे छोटे पुत्र डॉ.अरिहन्त कुमार जैन मुंबई में सोमैया विद्या विहार विश्वविद्यालय में जैन विद्या विभाग में सहायक आचार्य हैं । आपने प्राच्य विद्या में दो पी.एच.डी प्राप्त की हैं । कला और साहित्य के क्षेत्र में कार्य करते हुए आपने प्राकृत भाषा पर एक डॉक्यूमेंटरी फिल्म बनाई जिसकी ख्याति अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुई । आप एक इंटरनेशनल न्यूज़ लैटर ‘प्राकृत टाइम्स’ का अंग्रेजी में निरंतर संपादन कार्य कर रहे हैं ।आपके कई लेख अंग्रेजी हिंदी में प्रकाशित हैं | बहू श्रीमती नेहा जैन धर्म दर्शन की प्रभावना में संलग्न हैं और जैनयोग पर कार्य कर रही हैं।</p>
<p>इस प्रकार आपकी अनेक पुस्तकों और लेखों के अलावा ये तीन जीवंत कृतियाँ भी हैं जो श्रुत आराधना और सेवा में निरंतर संलग्न हैं ।</p>
<p>इतना ही नहीं आपने अपने अन्य भाइयों के सुपुत्रों अर्थात् अपने भतीजों को भी गाँव से बाहर अध्ययन हेतु संस्कृत महाविद्यालयों में भेजा l जिसके सुपरिणाम स्वरूप आपके तीन भतीजे पंडित कमल कुमार शास्त्री ,कोलकाता,डॉ.आनंद शास्त्री कोलकाता एवं डॉ.कमलेश शास्त्री वाराणसी देश के प्रसिद्ध विधानाचार्य एवं प्रतिष्ठाचार्य के रूप में समाज में अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं ।इनमें डॉ. आनंद एवं डॉ.कमलेश को आपने अपने निर्देशन में ही पी-एच. डी. उपाधि हेतु शोधकार्य करवाया है ।</p>
<p><strong>अनेक आचार्यों-संतों और विद्वानों के प्रिय प्रेमी जी &#8211;</strong></p>
<p>जैन परंपरा में चाहे दिगंबर परंपरा हो या श्वेताम्बर ,शायद ही ऐसे कोई आचार्य ,साधु और विद्वान होंगें जो प्रो. प्रेमी जी की श्रुत साधना की प्रशंसा न करते हों । उनके गंभीर ज्ञान और सरल स्वभाव के सभी मुरीद हैं ।</p>
<p>परमपूज्य संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी से आपकी तभी से विशेष निकटता रही है, जब आप लगभग 50 वर्ष पूर्व बी. एच. यू. से मूलाचार पर पी-एच. डी. कर रहे थे l आपसे इस शोध कार्य में अनेक विषयों में उचित मार्गदर्शन और अनेक जटिल समाधान भी प्राप्त किये थे l इसीलिए विनम्र और विशेष अनुरोध करने पर लगभग चार दशक पूर्व ललितपुर में मूलाचार पर आधारित आपके इस शोधप्रबंध की संघस्थ कुछ मुनियों के साथ पूज्यश्री ने वाचना की थी l ताकि कोई आचारगत और सैद्धांतिक कोई चूक न रह जाए l इसके बाद ही इसे पार्श्वनाथ विद्यापीठ शोध संस्थान, वाराणसी से प्रकाशित कराया था l आपके इस शोध प्रबंध पर प्राकृत साहित्य के विश्व विश्रुत विद्वान् डॉ. जगदीश चंद्र जैन ने प्रस्तावना लिखी है l अभी आपकी कृति ‘श्रमण संस्कृति और वैदिक व्रात्य’ प्राप्त करते ही आचार्यश्री ने आद्योपांत पढ़कर बहुत प्रशंसा की ।आपके प्रस्ताव पर पूज्य आचार्य विद्यानंद मुनिराज ने श्रुत पंचमी को प्राकृत दिवस घोषित किया ।</p>
<p>सन् 1999 में तपस्वी सम्राटत आचार्य श्री सन्मति सागर जी का जब ससंघ चातुर्मास वाराणसी में हुआ तब उनकी इच्छा और आदेशानुसार आपने पूरे संघ और समाज के मध्य आचार्य कुंदकुंद रचित अष्टपाहुड की निरंतर 45 दिन तक वाचना -विवेचना की l इसके बाद लगभग एक माह तक वसुनंदि श्रावकाचार ग्रंथ की लगातार वाचना की। पूज्य आचार्य श्री ने इसे काशी चतुर्मास की एक बड़ी उपलब्धि माना था l इसके फल स्वरूप वर्तमान में बड़े संघ के प्रभावक आचार्य सुनीलसागर जी जो उस समय अपने गुरु के संघ में मुनि अवस्था में अध्ययन एवं साधना में निरंतर दत्तचित्त रहते थे,वाचना के आधार पर आपने वसुनंदि श्रावकाचार नामक एक ग्रंथ संपादित करके प्रकाशित कराया था । परम पूज्य आचार्यश्री विमल सागर जी,आचार्य भरतसागर जी,आचार्य वर्धमान सागर जी,आचार्य ज्ञानसागर जी,आचार्य विरागसागरजी,आचार्य विशुद्धसागर जी,आचार्य श्रुतसागर जी,आचार्य प्रज्ञसागर जी,आचार्य वसुनंदी जी ,आचार्य प्रसन्नसागर जी आदि अनेक पूज्य आचार्य एवं संघ के मुनि आपसे विविध विषयों और समस्याओं पर निरंतर चर्चाएं करते रहते हैं । परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी के भी प्रमुख आत्मीय शुभाषीश प्राप्त विद्वानों में प्रो प्रेमी जी हैं और उन्हें यह सौभाग्य लम्बे समय से प्राप्त है। आचार्य तुलसी जी,आचार्य महाप्रज्ञ जी,आचार्य शिवमुनि जी,मुनि श्री महेंद्र कुमार जी आदि अनेक श्वेताम्बर परंपरा के आचार्यों एवं मुनियों के साथ आपका बहुत ही आत्मीय भाव रहा तथा अनेक कार्यों एवं योजनाओं पर वे प्रेमी जी से चर्चाएं करते रहे हैं । परम पूज्य गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमति माता जी,आर्यिका श्री सुपार्श्वमति माता जी , श्री स्याद्वादमति जी आदि अनेक आर्यिकाओं का वात्सल्य भाव प्रेमी जी के प्रति हमेशा से रहा है ।</p>
<p>अपने शिष्यों को उनकी गलती पर स्वतः टोकना प्रेमी जी का हमेशा से स्वभाव रहा है,भले ही उन्हें अच्छा लगे या बुरा ,किन्तु आश्चर्य यह भी है कि प्रेमी जी साधुओं और आचार्यों को भी कल्याण के पावन उद्देश्य से व्यक्तिगत तौर पर उन्हें उनकी कमियां बता देते हैं और स्वपर कल्याण में सच्चे मन से लगे साधक उन्हें सुनने को आतुर रहते हैं और सुधार भी करते हैं ।प्रेमी जी का सदा से यह आदर्श रहा है कि व्यर्थ के विवाद में हमेशा मौन रहो और जब सत्य का हनन हो रहा हो तो ‘अपृष्टैरपि वक्तव्यम्’ – कोई बोलने को न कहे ,न पूछे तब भी जरूर बोलना चाहिए ।श्रवणबेलगोला के परम प्रभावक भट्टारक चारुकीर्ति स्वामी जी के लम्बे समय से अति निकट स्नेहपात्र रहे हैं l आपके निर्देशनानुसार सन् 2006 के महामस्तकाभिषेक महामहोत्सव में विशाल अखिल भारतीय जैन विद्वत्सम्मेलन के मुख्य संयोजकत्व का सफल दायित्व एवं सन् 2018 में इसी अवसर पर अखिल भारतीय संस्कृत विद्वत्सम्मेलन का इन्होंने अपार सफलता के साथ संयोजन कार्य भी किया ।अनेक वैदिक तथा अन्य परंपराओं के साधु और वरिष्ठ विद्वान् आपसे सलाह परामर्श लेते रहते हैं ।पंडित जगन्नाथ उपाध्याय जी , पंडित बलदेव उपाध्याय जी ,पद्मश्री पंडित बागीश शास्त्री जी,काशी ,पंडित नीरज जैन ,सतना,प्राचार्य नरेंद्र प्रकाश जैन ,फिरोजाबाद,डॉ हुकुमचंद भारिल्ल एवं पंडित रतनचंद जी भारिल्ल जयपुर , प्रो. गोकुलचंदजी,प्रो सागरमल जैन जी,प्रो.वाचस्पति उपाध्याय जी,प्रो.रमाकांत शुक्ल जी , पंडित रतनलाल बैनाडा आदि अनेक दिग्गज विद्वान् उम्र में बड़े होकर भी इनके स्नेहपात्र के रूप में हमेशा आपसे मित्रवत् व्यवहार ही रखते थे । संस्कृत जगत् के विश्व विश्रुत् मनीषी पंडित बलदेव उपाध्याय जी लेखन के समय अनेक बार प्रेमी जी से जैन ग्रंथ मंगाते थे और परामर्श लेकर निर्णय करके ही लिखते थे । इसी प्रकार समणसुत्तं तथा जैनेंद्र सिद्धांत कोश जैसे उत्कृष्ट सुप्रसिद्ध ग्रंथों के रचयिता पूज्य क्षुल्लक जिनेंद्र वर्णी जी से भी आपका लम्बे समय तक सानिध्य रहा और आपके लेखन कार्य में भी आप अनेक समसामयिक सुझाव दिया और लिया करते थे l आदरणीय प्रो. कमलचंदजी सौगानी, प्रो. राजारामजी जैन,प्रो दयानंद भार्गव,प्रो.वशिष्ट त्रिपाठी जी प्रो प्रेमसुमन जी जैन ,प्रो रमेशचंद जैन जैसे अनेक वरिष्ठ विद्वानों से आपको सदा आत्मीय मार्गदर्शन प्राप्त होता रहता है l अनेक वर्तमान उच्च कोटि के सभी जैन-अजैन देश एवं विदेश के विद्वानों में भी आप सभी के प्रिय और आदरणीय हैं ।</p>
<p><strong>व्यक्तिगत जीवन दर्शन &#8211;</strong></p>
<p>‘खुद कभी किसी के दबाव में न रहना और न ही किसी अन्य को अपने दबाव में रखना’- ये Show जीवन जीने का सदा से अंदाज रहा है ।जीवन में सात्विकता , ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठता आपका आधार रहा है ।जीवन में और लेखन-संपादन में ,दोनों में ही आपको प्रामाणिकता हमेशा से पसंद रही है ।शोधकार्य में सन्दर्भों आदि का मिलान जब तक मूल ग्रंथों से न कर लें तब तक आगे नहीं बढ़ते ह</p>
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		<title>डॉ. मुन्नी पुष्पा जैन ने अपने जन्मदिवस को ब्राह्मी लिपि संरक्षण दिवस के रूप में मनाया : जैन दंपती ने गंगा तट पर नई पीढ़ी को विश्व की सर्वप्राचीन ब्राह्मी लिपि एवं सर्वप्राचीन प्राकृत भाषा सिखाई </title>
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		<pubDate>Tue, 25 Jun 2024 12:49:31 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, जैनदर्शन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष, भारतीय संस्कृति-भाषा एवं लिपि का संरक्षण-संवर्धन करने वाले , राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित प्रो. फूलचंद जैन प्रेमी जी, ब्राह्मी लिपि विशेषज्ञा, आदर्श महिला सम्मान से सम्मानित विदुषी डॉ. मुन्नी पुष्पा जैन एवं नवीन संसद भवन में काशी का प्रतिनिधित्व करने वाली, जैनधर्म की राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधि विदुषी डॉ. [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, जैनदर्शन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष, भारतीय संस्कृति-भाषा एवं लिपि का संरक्षण-संवर्धन करने वाले , राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित प्रो. फूलचंद जैन प्रेमी जी, ब्राह्मी लिपि विशेषज्ञा, आदर्श महिला सम्मान से सम्मानित विदुषी डॉ. मुन्नी पुष्पा जैन एवं नवीन संसद भवन में काशी का प्रतिनिधित्व करने वाली, जैनधर्म की राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधि विदुषी डॉ. इन्दु जैन राष्ट्र गौरव (दिल्ली) ने भारतीय भाषा एवं लिपि की मूल भावना से जन-जन को जोड़ने के लिए प्राकृत भाषा, ब्राह्मी लिपि की सफल कार्यशाला का आयोजन किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बनारस।</strong> वाराणसी सर्वविद्या की राजधानी है और काशी के गंगा नदी के सुप्रसिद्ध घाट अस्सी में आये दिन देश की संस्कृति, ज्ञान विज्ञान से संबंधित भव्य आयोजन होते रहते हैं। जैनधर्म के चार तीर्थंकरों की जन्मभूमि एवं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में ब्रह्मी लिपि सिखाने की मूल भावना सफल हुई और नेपाल, बंगाल, गुजरात , विहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, दक्षिण, मध्यप्रदेश आदि से आए पर्यटकों एवं बनारस के विभिन्न विद्यालय एवं विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थियों ने भारतीय संस्कृति, शिलालेखों को समझने के लिए विश्व की सबसे प्राचीन लिपि एवं सभी लिपियों की जननी ब्राह्मी लिपि एवं सर्वप्राचीन प्राकृत भाषा को मां गंगा के सानिध्य में अस्सी घाट पर उत्सुकता के साथ सीखा। पर्यटकों एवं विद्यार्थियों ने भारतीय संस्कृति-भाषा-लिपि को सहज-सरल तरीके सी सिखाने के लिए और कार्यशाला के आयोजन की अत्यधिक प्रशंसा की।</p>
<p><strong><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-62639" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/06/IMG-20240627-WA0006.jpg" alt="" width="860" height="1100" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/06/IMG-20240627-WA0006.jpg 860w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/06/IMG-20240627-WA0006-235x300.jpg 235w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/06/IMG-20240627-WA0006-801x1024.jpg 801w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/06/IMG-20240627-WA0006-768x982.jpg 768w" sizes="(max-width: 860px) 100vw, 860px" />कार्यशाला का आयोजन</strong></p>
<p>सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, जैनदर्शन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष, भारतीय संस्कृति-भाषा एवं लिपि का संरक्षण-संवर्धन करने वाले , राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित प्रो. फूलचंद जैन प्रेमी जी, ब्राह्मी लिपि विशेषज्ञा, आदर्श महिला सम्मान से सम्मानित विदुषी डॉ. मुन्नी पुष्पा जैन एवं नवीन संसद भवन में काशी का प्रतिनिधित्व करने वाली, जैनधर्म की राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधि विदुषी डॉ. इन्दु जैन राष्ट्र गौरव (दिल्ली) ने भारतीय भाषा एवं लिपि की मूल भावना से जन-जन को जोड़ने के लिए प्राकृत भाषा, ब्राह्मी लिपि की सफल कार्यशाला का आयोजन किया। डॉ. मुन्नी पुष्पा जैन ने अपने जन्मदिवस को तीन दिवसीय कार्यशाला के माध्यम से ब्राह्मी लिपि संरक्षण दिवस के रूप में मनाया।</p>
<p><strong>पुत्रियों को शिक्षित किया</strong></p>
<p>डॉ. जैन ने बताया कि जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ ने राजा ऋषभदेव के रूप में प्रागैतिहासिक काल में सर्वप्रथम अयोध्या पर राज्य किया था और उन्होंने ही सर्वप्रथम सभी प्रजा जन को असि-मसि-कृषि-विद्या-वाणिज्य-शिल्प आदि छह कलाएं सिखाकर जीवन जीने की एवं निर्वहन करने की कला सिखाई थी और राजा ऋषभदेव ने सर्वप्रथम स्त्री शिक्षा का उद्घोष करते हुए अपनी पुत्री ब्राह्मी को लिपि विद्या एवं पुत्री सुंदरी को अंक (गणित) विद्या सिखाई थी । अंक विद्या का विकास आज गणित के रूप में है और अक्षर विद्या ब्राह्मी लिपि के नाम से प्रसिद्ध हुई और इसी लिपि से देवनागरी आदि सभी लिपियों का जन्म और विकास हुआ है । सर्वप्राचीन प्राकृत भाषा का महत्त्व एवं इससे कैसे भाषाओं का विकास हुआ, कैसे भारत का नाम राजा ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम पर पड़ा और कैसे प्राचीन हाथीगुंफा शिलालेख में प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में लिखा हुआ भारत नाम प्राचीन विद्या सीखकर विद्यार्थी पढ़ सकते हैं ये सभी तथ्य सहज-सरल ढ़ंग से समझाएं गए । सभी विद्यार्थी ब्राह्मी लिपि में अपना नाम लिखकर एवं प्राकृत भाषा के विषय में समझकर प्रसन्न हुए।</p>
<p><strong>जारी रहेगी मुहिम</strong></p>
<p>नई पीढ़ी ने विश्व की सर्वप्राचीन प्राकृत भाषा एवं सर्वप्राचीन ब्राह्मी लिपि को सीखकर अपने आपको गौरवान्वित महसूस किया और कहा कि वो अब प्राचीन शिलालेख को पढ़कर अपना इतिहास समझ सकते हैं। युवाओं ने ब्राह्मी लिपि को रोज अभ्यास करने एवं इसका प्रचार-प्रसार करने का संकल्प लिया। सुबह श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में नैतिक शिक्षण शिविर के समापन समारोह में भी डॉ. मुन्नी पुष्पा जैन ने ब्राह्मी लिपि अनेक बच्चों को ब्राम्ही लिपि सिखाई एवं गंगा तट,अस्सी घाट पर प्राकृत भाषा एवं ब्राह्मी लिपि की तीन दिवसीय सफल कार्यशाला फिलहाल सम्पन्न हुई किन्तु जैन दंपती का संकल्प मजबूत है और वे प्राचीन भाषा-लिपि को जन-जन तक पहुंचाने के लिए समय-समय पर यह कार्यशाला लगाकर,इस मुहिम का क्रम जारी रखेंगे और नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति -भाषा-लिपि से रूबरू करवाते रहेंगे।देश-विदेश में जो भी प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि सीखना चाहता है वो बनारस के जैन दंपति से सीख सकता है और प्राचीन भाषा-लिपि के प्रचार-प्रसार की मुहिम से जुड़ सकता है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़े</strong></p>
<blockquote class="wp-embedded-content" data-secret="TJvxo0pLso"><p><a href="https://www.shreephaljainnews.com/new_generation_learns_ancient_brahmi_script_at_assi_ghat/">मां गंगा के तट पर बनारस के अस्सी घाट में नई पीढ़ी ने सीखी सर्वप्राचीन ब्राह्मी लिपि</a></p></blockquote>
<p><iframe class="wp-embedded-content" sandbox="allow-scripts" security="restricted"  title="&#8220;मां गंगा के तट पर बनारस के अस्सी घाट में नई पीढ़ी ने सीखी सर्वप्राचीन ब्राह्मी लिपि&#8221; &#8212; श्रीफल जैन न्यूज़" src="https://www.shreephaljainnews.com/new_generation_learns_ancient_brahmi_script_at_assi_ghat/embed/#?secret=IEtqWrrLnU#?secret=TJvxo0pLso" data-secret="TJvxo0pLso" width="600" height="338" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no"></iframe></p>
<blockquote class="wp-embedded-content" data-secret="Iw21qxZw1H"><p><a href="https://www.shreephaljainnews.com/new_generation_learns_ancient_brahmi_script_on_picturesque_banks_ganga/">गंगा के सुरम्य तट पर नई पीढ़ी ने सीखी सर्वप्राचीन ब्राह्मी लिपि </a></p></blockquote>
<p><iframe loading="lazy" class="wp-embedded-content" sandbox="allow-scripts" security="restricted"  title="&#8220;गंगा के सुरम्य तट पर नई पीढ़ी ने सीखी सर्वप्राचीन ब्राह्मी लिपि &#8221; &#8212; श्रीफल जैन न्यूज़" src="https://www.shreephaljainnews.com/new_generation_learns_ancient_brahmi_script_on_picturesque_banks_ganga/embed/#?secret=QdLQdgvmiB#?secret=Iw21qxZw1H" data-secret="Iw21qxZw1H" width="600" height="338" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no"></iframe></p>
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		<title>ब्राह्मी कार्यशाला का दूसरा दिन : गंगा के सुरम्य तट पर नई पीढ़ी ने सीखी सर्वप्राचीन ब्राह्मी लिपि  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 24 Jun 2024 06:43:55 +0000</pubDate>
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<p><strong>काशी की ब्राह्मी लिपि विशेषज्ञा विदुषी डॉ. मुन्नी पुष्पा जैन एवं दिल्ली की डॉ. इन्दु जैन राष्ट्र गौरव (दिल्ली) ने नई पीढ़ी को सभी लिपियों की जननी, विश्व की सबसे प्राचीन ब्राह्मी लिपि को सिखाने के उद्देश्य से मां गंगा के अस्सी घाट पर सांयकाल सर्वप्राचीन ब्राह्मी लिपि की कार्यशाला का आयोजन किया। दूसरे दिन की कार्यशाला भी सफलता पूर्वक सम्पन्न हुई। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>वाराणसी।</strong> प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी, काशी के गंगा नदी के सुप्रसिद्ध घाट अस्सी में आये दिन देश की संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान से संबंधित भव्य आयोजन होते रहते हैं। उसी श्रृंखला में काशी की ब्राह्मी लिपि विशेषज्ञा विदुषी डॉ. मुन्नी पुष्पा जैन एवं दिल्ली की डॉ. इन्दु जैन राष्ट्र गौरव (दिल्ली) ने नई पीढ़ी को सभी लिपियों की जननी, विश्व की सबसे प्राचीन ब्राह्मी लिपि को सिखाने के उद्देश्य से मां गंगा के अस्सी घाट पर सांयकाल सर्वप्राचीन ब्राह्मी लिपि की कार्यशाला का आयोजन किया। दूसरे दिन की कार्यशाला भी सफलता पूर्वक सम्पन्न हुई।</p>
<p><strong>पुत्रियों की दी शिक्षा</strong></p>
<p>ज्ञातव्य है कि जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ ने राजा ऋषभदेव के रूप में प्रागैतिहासिक काल में सर्वप्रथम अयोध्या पर राज्य किया था। उन्होंने ही सर्वप्रथम सभी प्रजा जन को असि-मसि-कृषि-विद्या-वाणिज्य-शिल्प आदि छह कलाएं सिखाकर जीवन जीने की एवं निर्वहन करने की कला सिखाई थी और राजा ऋषभदेव ने सर्वप्रथम स्त्री शिक्षा का उद्घोष करते हुए अपनी पुत्री ब्राह्मी को लिपि विद्या एवं पुत्री सुंदरी को अंक (गणित) विद्या सिखाई थी ।</p>
<p><strong>इसी लिपि से हुआ अन्य का जन्म</strong></p>
<p>अंक विद्या का विकास आज गणित के रूप में है और अक्षर विद्या ब्राह्मी लिपि के नाम से प्रसिद्ध हुई और इसी लिपि से देवनागरी आदि सभी लिपियों का जन्म और विकास हुआ है । इस तरह उन्होंने छात्रों-छात्राओं को लिपि के इतिहास एवं विकास की परम्परा को समझाया । उन्होंने बताया कि भारत का नाम भी राजा ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम पर पड़ा था। बीएचयू, काशी विद्यापीठ, हरिश्चन्द्र महाविद्यालय आदि के विद्यार्थियों एवं पूना , मुम्बई, बलिया, राजस्थान आदि बाहर से आए पर्यटकों ने बेहद उत्सुकता के साथ ब्राह्मी लिपि सीखी और सभी ब्राह्मी लिपि में अपना नाम लिखकर प्रसन्न हुए।</p>
<p><strong>रोज अभ्यास का संकल्प </strong></p>
<p>नई पीढ़ी ने ब्राह्मी लिपि को सीखकर अपने आपको गौरवान्वित महसूस किया और कहा कि वो अब प्राचीन शिलालेख को पढ़ सकते हैं। युवाओं ने ब्राह्मी लिपि को रोज अभ्यास करने एवं इसका प्रचार-प्रसार करने का संकल्प लिया। सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, जैनदर्शन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. फूलचंद जैन &#8216;प्रेमी&#8217; की प्रेरणा एवं मार्गदर्शन में इस कार्यशाला का आयोजन किया गया। ज्ञातव्य है कि जैन दंपति भारतीय संस्कृति-भाषा एवं लिपि का संरक्षण-संवर्धन के लिए ही समर्पित हैं। उन्होंने बताया कि गंगा तट पर समय-समय पर ब्राह्मी लिपि की ऐसी ही कार्यशाला का आयोजन ता रहेगा एवं नई पीढ़ी को सिखाने का यह क्रम जारी रहेगा। इस कार्यशाला के लिए निशांत, विनय, सत्यम, सपना आदि सभी विद्यार्थियों ने अपनी सकारात्मक प्रतिक्रियाएं भी दीं।</p>
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		<title>लगती रहेगी ऐसी कार्यशाला :  मां गंगा के तट पर बनारस के अस्सी घाट में नई पीढ़ी ने सीखी सर्वप्राचीन ब्राह्मी लिपि </title>
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		<pubDate>Sun, 23 Jun 2024 08:47:52 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ब्राह्मी लिपि विशेषज्ञा विदुषी डॉ. मुन्नी पुष्पा जैन एवं डॉ. इन्दु जैन राष्ट्र गौरव (दिल्ली) ने नई पीढ़ी को सभी लिपियों की जननी, विश्व की सबसे प्राचीन ब्राह्मी लिपि को सिखाने के उद्देश्य से मां गंगा के अस्सी घाट पर सांयकाल सर्वप्राचीन ब्राह्मी लिपि की कार्यशाला का आयोजन किया। जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ ने [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>ब्राह्मी लिपि विशेषज्ञा विदुषी डॉ. मुन्नी पुष्पा जैन एवं डॉ. इन्दु जैन राष्ट्र गौरव (दिल्ली) ने नई पीढ़ी को सभी लिपियों की जननी, विश्व की सबसे प्राचीन ब्राह्मी लिपि को सिखाने के उद्देश्य से मां गंगा के अस्सी घाट पर सांयकाल सर्वप्राचीन ब्राह्मी लिपि की कार्यशाला का आयोजन किया। जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ ने राजा ऋषभदेव के रूप में सर्वोत्तम राज्य किया था। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>वाराणसी।</strong> ब्राह्मी लिपि विशेषज्ञा विदुषी डॉ. मुन्नी पुष्पा जैन एवं डॉ. इन्दु जैन राष्ट्र गौरव (दिल्ली) ने नई पीढ़ी को सभी लिपियों की जननी, विश्व की सबसे प्राचीन ब्राह्मी लिपि को सिखाने के उद्देश्य से मां गंगा के अस्सी घाट पर सांयकाल सर्वप्राचीन ब्राह्मी लिपि की कार्यशाला का आयोजन किया। जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ ने राजा ऋषभदेव के रूप में सर्वोत्तम राज्य किया था। उन्होंने समस्त प्रजा जन को असि-मसि-कृषि-विद्या-वाणिज्य-शिल्प आदि छह कलाएं सिखाकर जीवन जीने की एवं निर्वहन करने की कला सिखाई थी और राजा ऋषभदेव ने सर्वप्रथम बालिका शिक्षा का उद्घोष करते हुए अपनी पुत्री ब्राह्मी को लिपि विद्या एवं पुत्री सुंदरी को अंक (गणित) विद्या सिखाई थी।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-62473" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/06/WhatsApp-Image-2024-06-23-at-2.02.27-PM.jpeg" alt="" width="1136" height="974" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/06/WhatsApp-Image-2024-06-23-at-2.02.27-PM.jpeg 1136w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/06/WhatsApp-Image-2024-06-23-at-2.02.27-PM-300x257.jpeg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/06/WhatsApp-Image-2024-06-23-at-2.02.27-PM-1024x878.jpeg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/06/WhatsApp-Image-2024-06-23-at-2.02.27-PM-768x658.jpeg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/06/WhatsApp-Image-2024-06-23-at-2.02.27-PM-990x849.jpeg 990w" sizes="auto, (max-width: 1136px) 100vw, 1136px" />अंक विद्या का विकास आज गणित के रूप में है और ब्राह्मी लिपि के नाम से प्रसिद्ध हुई और इसी लिपि से सभी लिपियों का जन्म और विकास हुआ है। इस तरह उन्होंने छात्रों-छात्राओं को लिपि के इतिहास एवं विकास की परम्परा को समझाया। उन्होंने बताया कि भारत का नाम भी राजा ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम पर पड़ा । BHU, विद्यापीठ, हरिश्चन्द्र आदि के विद्यार्थियों एवं बाहर से आए पर्यटकों ने बेहद उत्सुकता के साथ ब्राह्मी लिपि सीखी एवं सफलता के साथ परीक्षा भी दी ।</p>
<p>नई पीढ़ी ने ब्राह्मी लिपि को सीखकर अपने आपको गौरवान्वित महसूस किया और कहा कि वो अब प्राचीन शिलालेख को पढ़ सकते हैं। युवाओं ने ब्राह्मी लिपि को रोज अभ्यास करने एवं इसका प्रचार-प्रसार करने का संकल्प लिया। सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, जैनदर्शन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष, भारतीय संस्कृति-भाषा एवं लिपि का संरक्षण-संवर्धन करने वाले प्रो. फूलचंद जैन &#8216;प्रेमी&#8217; जी की प्रेरणा एवं मार्गदर्शन में इस कार्यशाला का आयोजन किया गया। उन्होंने बताया कि गंगा तट पर समय-समय पर ब्राह्मी लिपि की ऐसी ही कार्यशाला का आयोजन होता रहेगा एवं नई पीढ़ी को सिखाने का यह क्रम जारी रहेगा।</p>
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