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	<title>वर्षाकाल &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>वर्षाकाल &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>चातुर्मास आत्म शुद्धि और तपस्या का विशेष अवसर : साधना से आत्मा को प्रकाशित करते हैं जैन साधु-संत  </title>
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		<pubDate>Sat, 21 Jun 2025 16:15:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म में चातुर्मास का महत्व काफी बताया गया है। दिगंबर जैन समाज के धर्मावलंबी चातुर्मास के लिए कितने उत्साहित रहते हैं। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जाता है कि मुनियों, आचार्यों और साधुओं के नगर आगमन पर उनसे अपने शहर, गांव और कस्बे में वर्षायोग करने के लिए विशेष तौर अनुनय-विनय किया जाता [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म में चातुर्मास का महत्व काफी बताया गया है। दिगंबर जैन समाज के धर्मावलंबी चातुर्मास के लिए कितने उत्साहित रहते हैं। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जाता है कि मुनियों, आचार्यों और साधुओं के नगर आगमन पर उनसे अपने शहर, गांव और कस्बे में वर्षायोग करने के लिए विशेष तौर अनुनय-विनय किया जाता है। चातुर्मास आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तक चार महीने की अवधि होती है। यह अवधि आमतौर पर जुलाई या अगस्त से अक्टूबर या नवंबर तक होती है, जब मानसून का मौसम होता है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष प्रस्तुति में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर</strong>। जैन धर्म में चातुर्मास का महत्व काफी बताया गया है। दिगंबर जैन समाज के धर्मावलंबी चातुर्मास के लिए कितने उत्साहित रहते हैं। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जाता है कि मुनियों, आचार्यों और साधुओं के नगर आगमन पर उनसे अपने शहर, गांव और कस्बे में वर्षायोग करने के लिए विशेष तौर अनुनय-विनय किया जाता है। आखिर ऐसा क्या है, चातुर्मास में। इन्हीं प्रश्नों का जबाव जानने की कोशिश करते हैं। चातुर्मास आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तक चार महीने की अवधि होती है। यह अवधि आमतौर पर जुलाई या अगस्त से अक्टूबर या नवंबर तक होती है, जब मानसून का मौसम होता है। जैन धर्म ग्रंथों में चातुर्मास का महत्व इस प्रकार बताया गया है। तपस्या और आत्म शुद्धि के लिए जैन समाज के लोग सहित मुनिराज भी तत्पर रहते हैं। चातुर्मास के दौरान साधु और श्रावक तपस्या और आत्मशुद्धि के लिए विशेष प्रयास करते हैं। वे अपने आध्यात्मिक विकास के लिए कठोर तपस्या करते हैं और अपने जीवन को अधिक पवित्र बनाने का प्रयास भी करते हैं। चातुर्मास के दौरान जैन समुदाय में विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। इनमें पूजा, पाठ, और अन्य धार्मिक गतिविधियां शामिल होती हैं। इससे जहां भगवान भक्ति, साधुओं के प्रति कृतज्ञता और उनसे आशीष पाने की आकांक्षा भी रहती है। चातुर्मास केवल श्रावक-श्राविकाओं के लिए विशिष्ट अवसर लेकर नहीं आता बल्कि इसमें साधुओं के लिए महत्व है। वे चातुर्मास के दौरान एक ही स्थान पर रहते हैं। जिससे वे अपने आध्यात्मिक विकास पर ध्यान केंद्रित कर सकें। इस दौरान वे अपने अनुयायियों को धार्मिक शिक्षा प्रदान करते हैं और उनके साथ धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। दूसरी ओर यह भी विशेषतौर पर जानना बेहद जरूरी है कि वर्षाकाल में तेज बारिश से मार्ग दुर्गम हो जाते हैं। बाढ़, कीचड़ और गंदगी चारों ओर फैलती है। इससे साधुओं, मुनियों को पद विहार में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। वर्षाकाल में कई जीवों की उत्पत्ति भी होती है, जो बारिश के पानी में धरती पर विचरण करते हैं। इसलिए जीवदया की दृष्टि से भी पद विहार संभव नहीं हो पाता।</p>
<p><strong>चातुर्मास के दौरान विशेष कार्यक्रम जो अनिवार्यतः होते हैं</strong></p>
<p>चातुर्मास के दौरान जैन समुदाय में विभिन्न विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनमें पूजा और पाठ तो होते ही हैं। चातुर्मास के दौरान जैन मंदिरों में पूजा और पाठ के साथ धर्मसभाओं के माध्यम से दैविक ज्ञान का प्रसार भी होता है। साधु और विद्वान धार्मिक प्रवचन देते हैं, जिसमें वे जैन धर्म के सिद्धांतों और मूल्यों पर चर्चा करते हैं। चातुर्मास में जैन श्रावक तपस्या और उपवास भी करते हैं। जिससे वे अपने आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा दे सकें। इसी तरह जैन समुदाय सामूहिक अनुष्ठानों में भाग लेता है, जैसे कि सामूहिक पूजा और पाठ, अभिषेक, शांतिधारा, विधान आदि।</p>
<p><strong>निष्कर्ष यह है कि </strong></p>
<p>चातुर्मास जैन धर्म में एक महत्वपूर्ण कालखंड होता है। जिसमें साधु और श्रावक विशेष धार्मिक अनुष्ठानों और तपस्याओं में संलग्न रहते हैं। इस दौरान वे अपने आध्यात्मिक विकास के लिए कठोर तप, आराधना करते हैं और अपने जीवन को अधिक पवित्र बनाने का प्रयास करते हैं। हां, जैन धर्म ग्रंथों में चातुर्मास के लिए विशेष संदेश है। जैन धर्म ग्रंथों में चातुर्मास को एक महत्वपूर्ण समय माना जाता है, जिसमें साधु और श्रावक अपने आध्यात्मिक विकास को परम गहराई तक ले जाने के लिए चार महीने तक लीन रहते हैं।</p>
<p><strong>जैन धर्म ग्रंथों में चातुर्मास का महत्व </strong></p>
<p>जैन धर्म ग्रंथों में चातुर्मास के बारे में कई उल्लेख मिलता है। आचार्य कुंदकुंद के ग्रंथ में आचार्य कुंदकुंद ने चातुर्मास के महत्व पर प्रकाश डाला है। उन्होंने कहा है कि चातुर्मास के दौरान साधुओं को अपने आध्यात्मिक विकास के लिए विशेष प्रयास करना चाहिए। वहीं आचारांग सूत्र में चातुर्मास के नियमों और अनुष्ठानों का वर्णन है। इसमें कहा गया है कि चातुर्मास के दौरान साधुओं को एक ही स्थान पर रहना चाहिए और अपने आध्यात्मिक विकास के लिए कठोर तपस्या करनी चाहिए।</p>
<p><strong>चातुर्मास के लिए विशेष संदेश</strong></p>
<p>जैन धर्म ग्रंथों में चातुर्मास के लिए विशेष संदेश भी परिलक्षित होता है। जिसमें साधुओं और श्रावकों को अपने आध्यात्मिक विकास के लिए विशेष प्रयास करना चाहिए। चातुर्मास के दौरान, साधुओं और श्रावकों को तपस्या और आत्म-शुद्धि के लिए कठोर प्रयत्न कर जीवन में संयम, तप और साधना के मार्ग को अपनाना चाहिए। जैन समुदाय विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान आयोजित कर पूजा, पाठ, और अन्य धार्मिक गतिविधियों के माध्यम से भगवान की जितनी अधिक आराधना कर सकें जरूर करें। धर्म प्रभावना के लिए यह बेहद जरूरी है।</p>
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		<title>मुनिपुंगव श्रीसुधासागर महाराज को श्रीफल भेंट कर किया चातुर्मास का निवेदन: उपकारी का उपकार तो सभी को मानना चाहिए &#8211; मुनिपुगंवश्री सुधा सागर महाराज </title>
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		<pubDate>Wed, 31 May 2023 08:28:57 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[उपकारी का उपकार तो सभी को मानना चाहिए। राजा ऋषभदेव ने कहा था कि छत्रि वनो धर्म और धर्मात्माओं की रक्षा करो वास्तविक क्षत्रिय तो वहीं कहलाते हैं जो निर्बल असहाय की सहायता करते हैं। पढ़िए राजीव सिंघाई की रिपोर्ट&#8230; झांसी । उपकारी का उपकार तो सभी को मानना चाहिए। राजा ऋषभदेव ने कहा था [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>उपकारी का उपकार तो सभी को मानना चाहिए। राजा ऋषभदेव ने कहा था कि छत्रि वनो धर्म और धर्मात्माओं की रक्षा करो वास्तविक क्षत्रिय तो वहीं कहलाते हैं जो निर्बल असहाय की सहायता करते हैं। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजीव सिंघाई की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>झांसी ।</strong> उपकारी का उपकार तो सभी को मानना चाहिए। राजा ऋषभदेव ने कहा था कि छत्रि वनो धर्म और धर्मात्माओं की रक्षा करो वास्तविक क्षत्रिय तो वहीं कहलाते हैं जो निर्बल असहाय की सहायता करते हैं। पहले राजतंत्र था तो राजा के अनुसार राज चलता था। आज प्रजातंत्र है हम अपनी योग्यता को बढ़ाकर ही राष्ट्र सेवा कर सकते हैं। नदी के दो किनारे होते हैं वह कभी मिलते नहीं है। न ही कभी किसी का विरोध करते बल्कि वह नदी को बहने में सहयोगी होते हैं। नदी दो तटों के मध्य बहती चली जाती है। वह रास्ते में आने वाले राहगीरों की प्यास बुझती चली जाती है वह आप से कोई अपेक्षा नहीं रखती ऐसे ही उपकारी को किसी से अपेक्षा नहीं रखना चाहिए। यह कहना है मुनिपुगंवश्री सुधासागर‌ महाराज का। उन्होंने पार्श्वनाथ तीर्थ क्षेत्र झांसी में जिज्ञासा समाधान को सम्बोधित करते हुए व्यक्त किए</p>
<p><strong>जैन समाज ने श्रीफल कर चातुर्मास का निवेदन किया</strong></p>
<p>इसके पहले अशोक नगर जैन समाज एवं दर्शनोदय तीर्थ थूवोनजी कमेटी ने करगुआ तीर्थ झांसी में विराजमान आध्यात्मिक संत निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव श्रीसुधासागरजी महाराज को अशोक नगर थूवोनजी में चातुर्मास के लिए श्रीफल भेंट किया। इस दौरान जैन समाज के अध्यक्ष राकेश कासंल, महामंत्री राकेश अमरोद, कोषाध्यक्ष सुनील अखाई, समाज के वरिष्ठ राधेलाल धुर्रा, राज कुमार कासंल, थूवोनजी कमेटी के महामंत्री विपिन सिंघाई, कोषाध्यक्ष सौरव वाझल, मध्यप्रदेश महासभा संयोजक विजय धुर्रा, गंज मन्दिर संयोजक उमेश सिघई, शैलेन्द्र श्रागर, प्रदीप तारई, राजेन्द्र, अमन मेडिकल टिंकल, एन के गार्मेंट्स मुनेश विजयपुरा, महेश घंमडी, सन्तोष अखाई, शैलेन्द्र दददा, जे की अखाई, सचिन एनएस, विक्की मनेशिया सहित सभी भक्तों ने श्रीफल भेंट कर चातुर्मास का निवेदन किया। समाज के अध्यक्ष राकेश कासंल महामंत्री राकेश अमरोद ने कहा कि हम सभी अभी डोंगरगढ़ तीर्थ में विराजमान संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के पास गए थे और चातुर्मास के लिए निवेदन किया। आचार्य श्री से आशीर्वाद लेकर हम लोग यहां आपके श्री चरणों में श्रीफल भेंट कर रहे हैं।</p>
<p><strong>भक्तों की प्रबल भावना है कि आपकी सेवा का मौका मिले</strong></p>
<p>मध्यप्रदेश महासभा संयोजक विजय धुर्रा ने कहा कि इस वर्ष योग ऐसा बना है कि दर्शनोदय तीर्थ थूवोनजी अशोक नगर पंचायत कमेटी गौशाला सभी कमेटियां एक मत से कार्य कर रही है हम लोग वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे हैं। गत वर्ष भी आचार्य श्री ने थूवोनजी के लिए आशीर्वाद दिया था लेकिन परिस्थितियां अनुकूल नहीं बनी। हमारा ही पुण्य कम रह गया इस वार हमें सेवा का मौका मिले ऐसे सभी भक्तों की प्रबल भावना है। इस दौरान मुनि पुगंव श्रीसुधासागरजी महाराज ने कहा कि हमें तो जो संकेत मिल जाएंगे। हम चल देंगे आपको आचार्य श्री के पास ही जाना होगा। उन्होंने कहा कि दुनिया के भगवान का अवतार वह होता है जहां पापी जीव बढ़ जाते हैं पाप का नाश करने भगवान अवतार लेते है। वहीं जैन दर्शन की विशेषता है कि पुण्य आत्मा का उद्धार करने हमारे भगवान आते हैं। पुण्यवन के भाग्य से ही तीर्थ कर प्रभु का जन्म होता है जैन दर्शन के भगवान वहीं जन्म लेते हैं जहां पुण्यात्मा होते है।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-45259" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/05/WhatsApp-Image-2023-05-31-at-1.52.31-PM.jpeg" alt="" width="929" height="1280" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/05/WhatsApp-Image-2023-05-31-at-1.52.31-PM.jpeg 929w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/05/WhatsApp-Image-2023-05-31-at-1.52.31-PM-218x300.jpeg 218w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/05/WhatsApp-Image-2023-05-31-at-1.52.31-PM-743x1024.jpeg 743w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/05/WhatsApp-Image-2023-05-31-at-1.52.31-PM-768x1058.jpeg 768w" sizes="(max-width: 929px) 100vw, 929px" /></p>
<p><strong>अवधि ज्ञान का प्रयोग नहीं करते </strong><br />
उन्होंने कहा कि अपराधी का पता होने पर भी साधु नहीं बता सकता। अवधि ज्ञानी मुनि महाराज सब जानते हैं फिर भी वे ऐसा नहीं करते राज व्यवस्था से साधु दूर रहते हैं। महापुराण के अंदर आया राजा ऋषभदेव अवधिज्ञानी होते हुए भी कोतवाल की स्थापना करते हैं जिसके पैसे पहले लिए थे तो वह ले गया और यदि उसने अपने आपके राज व्यवस्था के संचालक<br />
हाथ भी जोड़ने पर चक्रवर्ती की तरह पुण्य लग सकता है। शक्ति को नहीं छिपाना शक्ति है और फिर भी नहीं कर पा रहे धर्म और कर्म साझे का मत करना, धर्म अपने ही हिसाब से करना, जो व्यक्ति दान में दूसरे को सम्मिलित उसे व्यापार भी सम्मिलित करके ही करना पड़ेगा।</p>
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