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	<title>वर्द्धमानपुर बदनावर &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>वर्द्धमानपुर बदनावर &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>मां के मातृत्व के बारे विश्व मातृ दिवस पर विशेष आलेख : मां के मातृत्व का ऐतिहासिक शिल्पांकन वर्द्धमानपुर बदनावर के भूगर्भ से प्राप्त मूर्तियों में पाया  </title>
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		<pubDate>Sun, 10 May 2026 05:20:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[शीला फलक पर कुछ लिखावट थी जिसे काफ़ी श्रम के साथ पढ़ा गया तब आश्चर्यजनक तथ्य सामने आए जिससे ज्ञात हुआ की यह तीर्थंकर भगवान की माताओं को समर्पित है। जिसमें एक दो नहीं बल्कि पूरे चौबीस तीर्थंकर बालक अपनी माताओं की गोद में बैठ हुए हैं। इंदौर से पढ़िए, मातृ दिवस पर यह विशेष [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>शीला फलक पर कुछ लिखावट थी जिसे काफ़ी श्रम के साथ पढ़ा गया तब आश्चर्यजनक तथ्य सामने आए जिससे ज्ञात हुआ की यह तीर्थंकर भगवान की माताओं को समर्पित है। जिसमें एक दो नहीं बल्कि पूरे चौबीस तीर्थंकर बालक अपनी माताओं की गोद में बैठ हुए हैं। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, मातृ दिवस पर यह विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> मालवांचल की ऐतिहासिक नगरी वर्द्धमानपुर बदनावर, जो कि इंदौर के निकट स्थित होकर धार जिले का तहसील मुख्यालय है, यूं तो यह नगर कई मामलों में अपनी छाप छोड़ता है। उसी तारतम्य में देखें तो यहां से प्राप्त हजार वर्ष प्राचीन तीर्थंकर प्रतिमाएं जो अपने कला सौंदर्य और सौम्य वीतरागी छवि की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इन्हीं प्रतिमाओं के साथ पुरातत्व में रूचि रखने वाले समाज जनों को एक शीला फलक दो तीन टुकड़ों में प्राप्त हुआ था। उन्होंने उसे भी इन प्रतिमाओं के साथ संग्रहित कर लिया था। यह था तीर्थंकरों की माताओं का अद्भुत शीला फलक। निर्ग्रन्थ सेंटर आफ आर्कियोलॉजी इंदौर के पुरातत्व संयोजक एवं वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि इस शीला फलक पर कुछ लिखावट थी जिसे काफ़ी श्रम के साथ पढ़ा गया तब आश्चर्यजनक तथ्य सामने आए जिससे ज्ञात हुआ की यह तीर्थंकर भगवान की माताओं को समर्पित है। जिसमें एक दो नहीं बल्कि पूरे चौबीस तीर्थंकर बालक अपनी माताओं की गोद में बैठ हुए हैं। ऐसा संयुक्त शिल्पांकन अब तक ओर कहीं देखने में नहीं आया अतः मातृत्व प्रेम को प्रदर्शित करता यह एक अद्वितीय शिल्पांकन है जिसने वर्द्धमानपुर बदनावर नगर का गौरव बढ़ाया है।</p>
<p><strong>चार माताएं ललितासन में शिल्पांकित</strong></p>
<p>पाटोदी ने बताया कि वर्तमान में ये शीला फलक का एक हिस्सा जो जयसिंहपुरा उज्जैन के जैन संग्रहालय में सरल क्रमांक 75 पर प्रदर्शित है। यह प्रस्तर खंड 36x43x20 से.मी. बेसाल्ट पत्थर, 12-13वीं शती का होकर यह वास्तुखण्ड अपने दुर्लभ विषय के कारण संग्रहालय की अत्यंत महत्वपूर्ण उपलब्धि है। एक शिल्पखंड में चार लघु में बाल लिए हुए चार माताएं ललितासन में शिल्पांकित हैं। प्रत्येक माता के नीचे क्रमशः तीर्थकरों की माताओं सिरिदेवी, वीरमाणी, उमादेवी, त्रिशला देवी नामों का उल्लेख है। इनमें त्रिशला देवी भगवान महावीर की माता का नाम है। जैन कला में तीर्थंकरों की माताओं का बालकों के साथ अंकन, यह दुर्लभ शिल्पांकनों में से एक है। तीन हिस्से जो अलग रखें हुए हैं इन सभी को मिलकर यह चौबीस तीर्थंकर बालक प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से लेकर चौबीसवें तीर्थंकर भगवान श्री महावीर स्वामी को बाल अवस्था में अपनी माताओं के साथ बैठा हुआ पूर्णता को प्राप्त होता है। विश्व मातृ दिवस पर मातृत्व प्रेम को प्रदर्शित करता ये प्रस्तर खंड देश की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उपलब्धि है जिसके प्राप्त होने का गौरव मालवांचल के प्राचीन वर्द्धमानपुर (वर्तमान बदनावर) को जाता है।</p>
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		<title>भगवान अनन्तनाथ स्वामी के मोक्ष कल्याणक दिवस पर विशेष : वर्द्धमानपुर (बदनावर) से प्राप्त प्राचीन जैन प्रतिमाओं का महत्व </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 18 Mar 2026 14:03:13 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[चैत्र कृष्ण चतुर्दशी 18 मार्च को जैन धर्म के 14वें तीर्थंकर भगवान अनन्तनाथ स्वामी का ज्ञान कल्याणक एवं मोक्ष कल्याणक दिवस तथा 18वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ स्वामी का मोक्ष कल्याणक दिवस श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा। बदनावर/वर्द्धमानपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230; बदनावर/वर्द्धमानपुर। चैत्र कृष्ण चतुर्दशी 18 मार्च को जैन धर्म के 14वें तीर्थंकर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>चैत्र कृष्ण चतुर्दशी 18 मार्च को जैन धर्म के 14वें तीर्थंकर भगवान अनन्तनाथ स्वामी का ज्ञान कल्याणक एवं मोक्ष कल्याणक दिवस तथा 18वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ स्वामी का मोक्ष कल्याणक दिवस श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा। <span style="color: #ff0000">बदनावर/वर्द्धमानपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बदनावर/वर्द्धमानपुर।</strong> चैत्र कृष्ण चतुर्दशी 18 मार्च को जैन धर्म के 14वें तीर्थंकर भगवान अनन्तनाथ स्वामी का ज्ञान कल्याणक एवं मोक्ष कल्याणक दिवस तथा 18वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ स्वामी का मोक्ष कल्याणक दिवस श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा। इसके अगले दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (19 मार्च) को 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ स्वामी का गर्भ कल्याणक दिवस भी मनाया जाएगा। इन तीनों तीर्थंकरों की प्राचीन प्रतिमाएं ऐतिहासिक नगरी वर्द्धमानपुर (वर्तमान बदनावर) के भू-गर्भ से प्राप्त हुई हैं, जो इस क्षेत्र के प्राचीन धार्मिक और पुरातात्विक महत्व को दर्शाती हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>यह जानकारी देते हुए वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि देश में अनेक ऐसे तीर्थ क्षेत्र हैं। जहां भू-गर्भ से केवल एक प्रतिमा प्राप्त होने पर ही वह स्थान अतिशय क्षेत्र के रूप में विख्यात हो जाता है। किंतु बदनावर-वर्द्धमानपुर एक ऐसा अद्भुत क्षेत्र है जहां से केवल एक-दो नहीं, बल्कि चौबीसों तीर्थंकरों की प्रतिमाएं भूगर्भ से प्राप्त हुई हैं। यह घटना अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण और अतिशयकारी मानी जाती है।</p>
<p>उन्होंने बताया कि यह क्षेत्र प्राचीन काल में जैन धर्म का समृद्ध केंद्र रहा होगा। दुर्भाग्यवश स्थानीय जनमानस और जनप्रतिनिधियों का अपेक्षित ध्यान इस ऐतिहासिक धरोहर की ओर नहीं गया, जिसके कारण इतना महत्वपूर्ण पुरातात्विक क्षेत्र अब तक व्यापक पहचान प्राप्त नहीं कर सका। हालांकि अब क्षेत्र के बुद्धिजीवी, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और समाजजन इस ऐतिहासिक महत्व को सामने लाने के लिए सक्रिय हो रहे हैं, जो एक सकारात्मक संकेत है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>पाटोदी के अनुसार लगभग 75 वर्ष पूर्व वर्द्धमानपुर क्षेत्र के भूगर्भ से भगवान अनन्तनाथ स्वामी, अरहनाथ स्वामी और मल्लिनाथ स्वामी की प्राचीन प्रतिमाएं प्राप्त हुई थीं। इन प्रतिमाओं के संबंध में अभी तक आम जनमानस को पर्याप्त जानकारी नहीं थी। उनके कल्याणक दिवस के अवसर पर वर्द्धमानपुर शोध संस्थान द्वारा यह ऐतिहासिक जानकारी सार्वजनिक की जा रही है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>भगवान अनन्तनाथ स्वामी की प्रतिमा के पादपीठ पर तीन पंक्तियों का एक महत्वपूर्ण अभिलेख अंकित है, जिससे ज्ञात होता है कि यह प्रतिमा विक्रम संवत 1506 (ईस्वी सन् 1449) में प्राचीन वर्द्धमानपुर के किसी जिनालय में प्रतिष्ठित की गई थी। यह प्रतिमा हरे बेसाल्ट पत्थर से निर्मित है। वहीं भगवान मल्लिनाथ स्वामी की प्रतिमा काले बलुआ पत्थर से बनी हुई है। इस प्रतिमा पर कोई अभिलेख नहीं है, किंतु शैली और शिल्प के आधार पर इसे अनन्तनाथ स्वामी की प्रतिमा से भी अधिक प्राचीन माना जाता है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>इतिहासकारों के अनुसार यदि इस क्षेत्र की पुरातात्विक और धार्मिक धरोहरों पर व्यवस्थित शोध और संरक्षण का कार्य किया जाए, तो वर्द्धमानपुर (बदनावर) देश के महत्वपूर्ण जैन तीर्थ और ऐतिहासिक स्थलों में अपना विशिष्ट स्थान प्राप्त कर सकता है।</p>
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		<title>ऋषभदेव जी जन्म कल्याणक महोत्सव पर विशेष : मालवा के ऐतिहासिक नगर वर्द्धमानपुर बदनावर के भूगर्भ से प्राप्त श्री आदिनाथ स्वामी का मूर्ति शिल्प </title>
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		<pubDate>Wed, 11 Mar 2026 10:55:32 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बदनावर (वर्द्धमानपुर) नगर के भू-गर्भ से सैकड़ो जिन प्रतिमाएं पिछले 75 वर्षों में समय-समय पर प्राप्त हुई है। जिसमें भगवान आदिनाथ से लेकर महावीर स्वामी तक के लगभग सभी तीर्थंकरों की प्रतिमाएं प्राप्त हुई है। इंदौर से पढ़िए, ओम पाटोदी का विशेष आलेख&#8230; इंदौर। मध्यकाल में भारतीय संस्कृति विरासत एवं मंदिरों का जो विध्वंसकारी मंज़र [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>बदनावर (वर्द्धमानपुर) नगर के भू-गर्भ से सैकड़ो जिन प्रतिमाएं पिछले 75 वर्षों में समय-समय पर प्राप्त हुई है। जिसमें भगवान आदिनाथ से लेकर महावीर स्वामी तक के लगभग सभी तीर्थंकरों की प्रतिमाएं प्राप्त हुई है। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, ओम पाटोदी का विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर</strong>। मध्यकाल में भारतीय संस्कृति विरासत एवं मंदिरों का जो विध्वंसकारी मंज़र हमें इतिहास में पढ़ने को मिलता है, जिसमें भारत के कई विशिष्ट ऐतिहासिक नगर जमींदोज हो गए और उनका नाम स्मरण तक नहीं रहा। उन्हीं नगरों में एक मालवा का एक प्राचीन धर्म क्षेत्र वर्द्धमानपुर है, जिसका वर्तमान नाम बदनावर है। यह स्थान गुप्त काल से लेकर मध्य काल तक धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप में अत्यंत समृद्ध रहा। जिसका उल्लेख आठवीं शताब्दी में महाकवि प्रबुद्धाचार्य श्री जिनसेण स्वामी ने अपने हरिवंश पुराण की प्रशस्ति में इस नगर के नाम के उल्लेख करते हुए किया, जो महत्वपूर्ण है। वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि बदनावर (वर्द्धमानपुर) नगर के भू-गर्भ से सैकड़ो जिन प्रतिमाएं पिछले 75 वर्षों में समय-समय पर प्राप्त हुई है। जिसमें भगवान आदिनाथ से लेकर महावीर स्वामी तक के लगभग सभी तीर्थंकरों की प्रतिमाएं प्राप्त हुई है। उसमें प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ स्वामी की प्रतिमाएं बहुलता से प्राप्त हुई है। यहां का भोयरावाला मंदिर अति प्राचीन होकर भगवान आदिनाथ स्वामी को ही समर्पित है। जवाहर मार्ग स्थित श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में भी अन्य तीर्थंकर प्रतिमाओं के साथ भगवान श्री आदिनाथ स्वामी की यही भू-गर्भ से प्राप्त प्रतिमा विराजमान हैं। इसी प्रकार धार के जैन मंदिर में भी बदनावर (वर्द्धमानपुर) भू-गर्भ से प्राप्त प्रतिमा विराजमान हैं। उज्जैन संग्रहालय में आदिनाथ स्वामी की लगभग 5-6 प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं। बदनावर वर्द्धमानपुर से प्राप्त प्रतिमाएं अपने आप में कई विशेषताएं लिए हुए है।</p>
<p><strong>प्राचीन नाम का भी स्पष्ट उल्लेख</strong></p>
<p>यहां भगवान के यक्ष यक्षिकाएं (रक्षक देवी देवता) की प्रतिमा भी प्रचूर मात्रा में प्राप्त हुई हैं। जिसमें भगवान आदिनाथ स्वामी की यक्षिका चक्रेश्वरी देवी की सुंदर लेख युक्त प्रतिमा भी प्राप्त हुई है, जो वर्तमान में निकट ही आमला ग्राम के श्वेतांबर जैन मंदिर में विराजमान है। यह प्रतिमा की नक्काशी की दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही साथ ही इसके पादपीठ पर जो लेख अंकित है। उसमें बदनावर के प्राचीन नाम का भी स्पष्ट उल्लेख मिलता है।</p>
<p><strong>अभिषेक पूजन आदि विशेष धार्मिक आयोजन किए जाएंगे</strong></p>
<p>यह इतिहास और पुरातत्व की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण प्रतिमा है क्योंकि, इसमें प्रतिमा के प्रतिष्ठा का संवत् 1224 के साथ ही जैन संत पंडिताचार्य श्री धर्म कीर्ति और उनके शिष्य ललित कीर्ति के नाम के साथ श्रावक-श्राविकाओं के नाम का महत्वपूर्ण उल्लेख है। ये सभी प्रतिमाएं लगभग 8वीं और 9वीं शताब्दी से लेकर 13वीं और्व14वीं शताब्दी की है। चैत्र कृष्ण नवमी 12 मार्च गुरूवार को भगवान श्री आदिनाथ जन्म कल्याणक दिवस पर सभी मंदिरों में इन भू-गर्भ से प्राप्त तीर्थंकर प्रतिमाओं के अभिषेक पूजन आदि विशेष धार्मिक आयोजन किए जाएंगे।</p>
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