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		<title>Life Management-36 जीवन का प्रबंधन-यत्न पूर्वक चेष्टा करें : मस्तिष्क का विज्ञान-भगवान महावीर की दृष्टि में </title>
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		<pubDate>Sat, 22 Mar 2025 02:30:18 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[डॉ. विनोद शर्मा अपनी पुस्तक मस्तिष्क विज्ञान और पढाई आसान में कहते है-‘हमारे दिमाग का सबसे महत्वपूर्ण काम है सूचनाओ को सही तरीके से एकत्रित करना और जरूरत पड़ने पर पुनः प्राप्त करना। जिसे हम री-कलेक्शन कहते है। इन्फॉर्मेशन को प्राप्त करना कहलाता है। याद करना यानी मेमोराइजेशन, दिमाग मे रखना कहलाता है-रिटेंशन और ‘पुनः [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>डॉ. विनोद शर्मा अपनी पुस्तक मस्तिष्क विज्ञान और पढाई आसान में कहते है-‘हमारे दिमाग का सबसे महत्वपूर्ण काम है सूचनाओ को सही तरीके से एकत्रित करना और जरूरत पड़ने पर पुनः प्राप्त करना। जिसे हम री-कलेक्शन कहते है। इन्फॉर्मेशन को प्राप्त करना कहलाता है। याद करना यानी मेमोराइजेशन, दिमाग मे रखना कहलाता है-रिटेंशन और ‘पुनः प्राप्त करना यानी याद आना कहलाता है री-कलेक्शन। याद तो हम सब कुछ करते है, लेकिन सब कुछ याद आता नही है। क्योकि याद आना निर्भर करता है की दिमाग मे सूचना कहाँ और किस तरह से रखी गयी है। सूचना को अच्छी तरह से सही जगह पर रखने के लिए हमे एसोसिएशन की जरूरत पड़ती है। मुनिश्री प्रणम्य सागरजी महाराज की पुस्तक खोजो मत पाओ व अन्य ग्रंथों के माध्यम से श्रीफल जैन न्यूज Life Management निरंतरता लिए हुए है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए इसके 36वें अर्थात अंतिम भाग में श्रीफल जैन न्यूज के रिपोर्टर संजय एम तराणेकर की विशेष रिपोर्ट….</span></strong></p>
<hr />
<p>मस्तिष्क का विज्ञान</p>
<p>मस्तिष्क का विज्ञान यह है कि वह चार भागों में बँटा है। प्रत्येक भाग अलग-अलग कार्य करने में नियुक्त है। पहले हिस्से से तर्क बुद्धि उत्पन्न होती है। किसी भी सुने हुए या पढ़े हुए विषय को यह हिस्सा तर्क के माध्यम से सुनकर उस पर विचार विमर्श करता है। इस हिस्से का यदि सही उपयोग एक ही दिशा में लगातार होता रहे तो व्यक्ति बहुत बुद्धिमान बन जाता है। एक ही विषय में अर्जित ज्ञान को तर्क के माध्यम से और अधिक चिन्तनपरख बनाना इसी हिस्से का काम है। मस्तिष्क का दूसरा हिस्सा योजना बनाता है। विद्यार्थी जब तक पढ़ता है उसके इस हिस्से का उपयोग कम होता है। इस हिस्से का उपयोग तब ही अधिक होता है जब व्यक्ति किसी व्यवसाय या नौकरी के काम में लग जाता है। तीसरे हिस्से का काम चंचल वृत्ति पैदा करना है। चंचलता बढ़ने से पहले और दूसरे हिस्से की कार्य प्रणाली भी प्रभावित होती है। मोबाइल, इंटरनेट पर बैठकर कई घण्टों तक मनोरंजन करने वाले युवा विद्यार्थियों या बच्चों के लिए यह चंचलता बहुत हानिकारक होती है। मस्तिष्क के इस तीसरे हिस्से का अधिक प्रयोग मनोरंजन के साधनों से ही होता है। ये साधन ही काम, वासना, इच्छा, अनैतिक चरित्र की वृत्तियाँ बढ़ाते हैं। अधिक बातचीत इस हिस्से पर बहुत प्रभाव डालती है, जिससे चंचलता और बढ़ती है। चंचलता मन को सुख देती है, ऐसा आदमी को महसूस होता है। इस कारण से वह चंचलवृत्ति को और अधिक बढ़ाता चला जाता है। मस्तिष्क के इस हिस्से के अधिक क्रियाशील होने पर व्यक्ति विवेकशून्य और जिम्मेदारियों के प्रति बे-परवाह हो जाता है। मस्तिष्क का चौथा हिस्सा अन्तर्ज्ञान से सम्बन्धित है। अन्तर्ज्ञान उसे आध्यात्मिक बना देता है। प्रज्ञा का जागरण अन्तर्ज्ञान से ही होता है। इस हिस्से की क्रियाशीलता से आध्यात्मिक झुकाव बढ़ने लगता है। सुख और शान्ति का संचार होने लगता है। व्यक्ति अपने में सन्तुष्ट होता है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>इसलिए भगवान् महावीर ने प्रयत्नपूर्वक बोलने पर जोर डाला है। यत्न शब्द बहुअर्थीय है। इस यत्न शब्द से ही यह अर्थ ध्वनित होता है कि बोलने में जब यत्न लगता है तो व्यक्ति को कष्ट महसूस होगा। बोलने में कष्ट हो, फिर भी बोलना पड़े तो वह सही बोलना है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>भगवान् वर्द्धमान महावीर के इन छह सूत्रों को अपने जीवन में अपनाने वाला निश्चित ही एक दिन महावीर बन सकता है। व्याख्यान का कोई अन्त नहीं होता है किन्तु बुद्धिमान के लिए संकेत मात्र ही पर्याप्त होता है। यह लघु कृति समस्त प्राणियों की जीवन शैली को अहिंसक बना देने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी, ऐसा मेरा विश्वास है।</p>
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		<title>Life Management-35 जीवन का प्रबंधन-यत्न पूर्वक चेष्टा करें : पहले तोलो, फिर बोलो-भगवान महावीर की दृष्टि में </title>
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		<pubDate>Fri, 21 Mar 2025 02:30:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[शब्दों का प्रयोग करने से पहले उसे मन के तराजू में तोल लेना चाहिए। यदि वह शब्द आपको अच्छे लगते हैं तभी वह दूसरों को प्रभावित कर पाएंगे, यदि आपको वह शब्द कड़वे लगते हैं तब वह शब्द दूसरों को भी उतने ही बुरे लगेंगे। ‘ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोये। औरन को शीतल [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>शब्दों का प्रयोग करने से पहले उसे मन के तराजू में तोल लेना चाहिए। यदि वह शब्द आपको अच्छे लगते हैं तभी वह दूसरों को प्रभावित कर पाएंगे, यदि आपको वह शब्द कड़वे लगते हैं तब वह शब्द दूसरों को भी उतने ही बुरे लगेंगे। ‘ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोये। औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।‘ संत कबीरदासजी का मत है कि यदि वाणी में शीतलता हो तब वह सुनने वाले को प्रभावित करती है यह न केवल स्वयं को सुख पहुंचाती है अपितु दूसरों को भी सुख प्रदान करती है। मुनिश्री प्रणम्य सागरजी महाराज की पुस्तक खोजो मत पाओ व अन्य ग्रंथों के माध्यम से श्रीफल जैन न्यूज Life Management निरंतरता लिए हुए है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए इसके 35वें भाग में श्रीफल जैन न्यूज के रिपोर्टर संजय एम तराणेकर की विशेष रिपोर्ट….</span></strong></p>
<hr />
<p>पहले तोलो, फिर बोलो</p>
<p>भगवान् महावीर बचपन से ही हित-मित-प्रिय वचनों को बोलते थे। केवल सच बोलना ही पर्याप्त नहीं है किन्तु सच के साथ वचनों में प्रियता भी हो। प्रियता से भी बढ़कर शर्त यह है कि वह हितकर हो। जिन वचनों में प्राणी का हित नहीं है वह वचन सच होकर भी झूठ हैं। हित से तात्पर्य उस प्राणी की रक्षा से है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>एक बार एक शिकारी गाय के पीछे दौड़ रहा था। एक चौराहे से वह गाय गुजरी। वहीं एक साधु खड़ा था। साधु के पास थोड़ी देर में वह शिकारी आया। साधु को गाय के जाने की दिशा ज्ञात थी। उन्होंने तत्काल अपना मुख मोड़ लिया और दिशा बदल ली। शिकारी ने पूछा क्या इस दिशा में गाय को जाते देखा है ? साधु ने कहा जब से मैं इस ओर खड़ा हूँ तब से अभी तक यहाँ से कोई नहीं गुजरा है। साधु की बात सुनकर शिकारी लौट गया। गाय की जान बच गई। जीव रक्षा हेतु साधु के ये वचन छल नहीं किन्तु उनका विवेक है। भगवान् महावीर ने कहा कि &#8211;</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>ऐसा सत्य भी मत बोलो जो किसी को विपत्ति में डाल दे। अहिंसा की रक्षा के लिए ही वचन प्रयोग करना चाहिए।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>इसी तरह एक शिकारी अपने हाथ में चिड़िया बन्द किये पूछता है कि बताओ मेरे हाथ में बंद चिड़िया मृत है या जीवित ? यदि आपने कहा कि जीवित है तो वह मारकर आपकी बात गलत सिद्ध कर देगा। ऐसी स्थिति में आपका कर्तव्य है कि आप कह दें कि वह चिड़िया मृत है, तो वह उसे उड़ा कर दिखा देगा, चिड़िया के प्राण बच जायेंगे। इसीलिए भगवान् महावीर ने कहा कि यत्न पूर्वक बोलो अर्थात् सोच समझकर बोलो। इसलिए कहा है कि-‘पहले तोलो फिर बोलो।‘</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>आज बोलने की प्रवृत्ति बहुत बढ़ गयी है। इसका मुख्य कारण मोबाइल जैसे उपकरणों का अति प्रयोग है। पहले जब फोन का प्रचलन प्रारम्भ हुआ था तो बात करने का बहुत पैसा लगता था। लोग पैसा खर्च होने के भय से सीमित और आवश्यक बात करते थे। आजकल प्राइवेट कंपनियों की प्रतिस्पर्धा में मोबाइल फोन पर बात करना बहुत सस्ता हो गया है। बच्चों से लेकर बड़ों तक यह प्रवृत्ति इतनी अधिक बढ़ गयी है कि घंटों तक दूर के संबंधियों से, मित्रों से, रिश्तेदारों से और परिजनों से लोग बातचीत करते रहते हैं। इस बातचीत से आदमी वाचाल हो जाता है। इसी कारण से अनचाहे सम्बन्ध बनते हैं और अपराधिक प्रवृत्तियाँ बढ़ती हैं। अनेक दुर्गुणों का प्रवेश इस मोबाइल फोन पर घण्टों बातचीत करने से हो रहा है। अधिक बोलने का एक आधुनिक दुष्परिणाम क्या हो सकता है। इस पर नजर डालें-‘आज जब युवक-युवती की शादी तय होती है तो मोबाइल की सस्ती दरें उनके बीच इतनी अधिक बात करने का जरिया बन जाती हैं कि वे एक दिन में चार-चार घंटे लुभावनी बातें करते हैं, शादी होने के बाद वो हकीकत साकार नहीं हो पाती। जैसी उन्होंने फोन पर घंटों डिसकस की थीं फलस्वरूप उनका वैवाहिक जीवन कलहपूर्ण बन जाता है।‘ विद्यार्थियों का दिमाग पढ़ने से डिस्टर्ब ऐसी ही बातचीत के कारण होता है। बोलना कम होगा तो विद्यार्थी को अपने कोर्स का पाठ याद रहेगा। जब अधिक बात करने से बहुत समय निःसार व्यतीत हो जाता है तो मस्तिष्क में स्मृति पर प्रभाव पड़ता है। विद्यार्थी के लिए स्मृति अप्रभावित होनी चाहिए। जो अपना विषय नहीं है उस विषयों में अधिक समय लगाने से मस्तिष्क में से मूल विषय विस्मृत हो जाता है। मस्तिष्क की कार्यक्षमता प्रभावित होती है।</p>
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		<title>Life Management-34 जीवन का प्रबंधन-यत्न पूर्वक चेष्टा करें : शब्द की ताकत शस्त्र से ज्यादा होती है-भगवान महावीर की दृष्टि में </title>
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		<pubDate>Thu, 20 Mar 2025 02:30:16 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[शब्द के बगैर मानव गूंगा ही है साथ ही बेकार और आधारहीन है। मुनि विनय कुमार आलोक कहते है-‘शब्दों की ताकत, तलवार और गोली की ताकत से भी अधिक होती है। शब्दों के प्रभाव की सीमा को परिभाषित करना मुश्किल है। वेद में तो शब्द को ब्रह्म कहा गया है। शब्दों का यदि समझदारी के [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>शब्द के बगैर मानव गूंगा ही है साथ ही बेकार और आधारहीन है। मुनि विनय कुमार आलोक कहते है-‘शब्दों की ताकत, तलवार और गोली की ताकत से भी अधिक होती है। शब्दों के प्रभाव की सीमा को परिभाषित करना मुश्किल है। वेद में तो शब्द को ब्रह्म कहा गया है। शब्दों का यदि समझदारी के साथ उचित उपयोग किया जाए, तो आधी सफलता पहले से ही तय हो जाती है। इसके उलट शब्दों के गलत इस्तेमाल से महाभारत जैसी स्थितियां निर्मित हो जाती हैं।‘ मुनिश्री प्रणम्य सागरजी महाराज की पुस्तक खोजो मत पाओ व अन्य ग्रंथों के माध्यम से श्रीफल जैन न्यूज Life Management निरंतरता लिए हुए है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए इसके 34वें भाग में श्रीफल जैन न्यूज के रिपोर्टर संजय एम तराणेकर की विशेष रिपोर्ट….</span></strong></p>
<hr />
<p>शब्द की ताकत शस्त्र से ज्यादा होती है</p>
<p>शब्दों में ताकत नहीं है किन्तु शब्दों से बढ़कर किसी शस्त्र में भी ताकत नहीं है। शब्दों में तेज होता है, शब्दों में प्रेम होता है, शब्दों में पराक्रम होता है और शब्दों में आग भी होती है। व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया में शब्दों का बहुत बड़ा योगदान है। आपने देखा होगा कि व्यक्ति के बारे में लोग वैसी धारणा बना लेते हैं, वैसा ही सोचते हैं जैसा वह बोलता है। कुल मिलाकर अच्छा या बुरा व्यक्ति वाणी से पहचाना जाता है और उसी रूप में जाना जाता है। अधिक बोलने वाला अपने आपको भले ही कहता है कि ‘मैं स्पष्ट वक्ता हूँ‘ परन्तु उसके स्पष्ट वचन सच होकर भी उसे बुरा बना देते हैं। इसका कारण यह नहीं कि लोग सच सुनना पसन्द नहीं करते हैं। लोग सच पसन्द करते हैं किन्तु बड़बोलापन पसन्द नहीं करते हैं। ऐसे लोगों के सच को भी लोग यह कहकर छोड़ देते हैं कि ‘वह तो मुँहफट है‘, ‘उसके मुँह पर कन्ट्रोल नहीं है‘ इत्यादि। इसलिए मौन रहना सरल है किन्तु सावधानी के साथ बोलना बहुत कष्ट साध्य है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>सब जानते हैं कि द्रोपदी के शब्दों ने महाभारत करा दिया था। द्रोपदी ने दुर्याेधन पर मजाक में व्यंग्य कसा था कि ‘अंधों के तो अंधे ही होते हैं।‘ मात्र इतने ही शब्दों ने विद्वेष की महाअग्नि प्रज्वलित कर दी थी। बाद में शब्दों के छल से ही द्रोणाचार्य को निष्क्रिय बनाया गया, जब उन्हें यह संदेश सुनाया कि अश्वत्थामा मारा गया है। हनुमान ने सीता को विश्वास दिलाया था कि वह राम के पास से आये हैं, आपका हित करने की हमारी इच्छा है। एक अपरिचित व्यक्ति होकर भी राक्षसों की लंका से बाहर निकालकर ले जाने का विश्वास सीता को हो गया था क्योंकि हनुमान के वचनों से सीता ने उनके निश्छल हृदय की पहचान कर ली थी। सीता को विश्वास दिलाने के लिए हनुमान ने राम के प्रति भक्ति भरे वचनों का प्रयोग किया। सीता को अपनी शक्ति का विश्वास कराने के लिए हनुमान ने पराक्रम, तेज से भरी वाणी बोली। वक्ता की कुशलता इसी में है कि वह परिस्थिति के अनुसार अपनी वाणी को परिवर्तित कर सके। वाणी का यह संतुलन मन के संयम से आता है। परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन छल नहीं है अपितु एक वाक् कौशल है। जब हम किसी की परिस्थिति का अपने स्वार्थ से कोई फायदा उठाना चाहते हैं तब वह छल कहलाता है।</p>
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		<title>Life Management-33 जीवन का प्रबंधन-यत्न पूर्वक चेष्टा करें : अधिक बोलना उथलापन है- भगवान महावीर की दृष्टि में </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 19 Mar 2025 02:30:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सभी व्यक्तियों का स्वभाव अलग-अलग होता है। हम किसी की तुलना किसी से नहीं कर सकते। परंतु बोलने के संदर्भ में हम यह अवश्य कह सकते हैं कि किसी को भी हम टका-सा जवाब न दें। हमारी वाणी किसी के मन को तीर की तरह न चुभे। सोच-संभलकर बोले। यदि हमारा उद्देश्य कम शब्दों में [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सभी व्यक्तियों का स्वभाव अलग-अलग होता है। हम किसी की तुलना किसी से नहीं कर सकते। परंतु बोलने के संदर्भ में हम यह अवश्य कह सकते हैं कि किसी को भी हम टका-सा जवाब न दें। हमारी वाणी किसी के मन को तीर की तरह न चुभे। सोच-संभलकर बोले। यदि हमारा उद्देश्य कम शब्दों में पूरा होता हो तो ज्यादा बेहतर संवाद कायम किया जा सकता हैं। बशर्ते उसमें बड़बोलेपन का भाव न हो। मुनिश्री प्रणम्य सागरजी महाराज की पुस्तक खोजो मत पाओ व अन्य ग्रंथों के माध्यम से श्रीफल जैन न्यूज Life Management निरंतरता लिए हुए है। </strong><span style="color: #ff0000"><strong>पढ़िए इसके 33वें भाग में श्रीफल जैन न्यूज के रिपोर्टर संजय एम तराणेकर की विशेष रिपोर्ट</strong>….</span></p>
<hr />
<p>अधिक बोलना उथलापन है</p>
<p>ज्यादा बोलना आदमी के उथलेपन को बताता है। अधिक बोलना भी एक बीमारी है। कुछ लोग इतना ज्यादा बोलते हैं कि एक बार शुरु हो जाने पर रुकने का नाम ही नहीं लेते हैं। ऐसे लोग चिपकू टाइप के होते हैं। अधिक बोलना भी उनकी पर्सनेलिटी में समाया रहता है। यह टाकेटिव नेचर (Talkative Nature) होता है। ऐसे लोग पहली मुलाकात में ही लोगों को प्रभावित कर लेते हैं। जब ऐसे लोगों से संबंध बन जाते हैं तो वह संबंधी भी उनसे कतराने लगते हैं। ऐसे लोग बहुत ही रोमांटिक और हरफनमौला होते हैं। जो लोग इनसे मिलते हैं, उन्हें लगता है कि यह आदमी बहुत ज्ञानी है। बहुत व्यवहार कुशल है और हमारे टेंशन को दूर कर देता है। सच यह है कि ऐसे लोग अपने इसी हुनर के कारण धीरे-धीरे परेशानी में पड़ते चले जाते हैं। अधिक बोलने की आदत के कारण लोग इनसे धीरे-धीरे बचने का प्रयास करने लगते हैं। अधिक बोलने वाला बहुत जल्द किसी की कही छोटी बात पर नाराज हो जाता है यह नाराजगी उसे लम्बे समय तक परेशान किये रहती है। गंभीरता का अभाव होने से कहीं भी कुछ भी बोल जाता है और अपने से बड़ों का भी अपमान कर देता है। इसीलिए महावीर ने कहा यत्नपूर्वक बोलो, आवश्यकता पड़ने पर ही बोलो। वास्तव में गंभीर व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति के वचनों में दूसरों को प्रभावित करने की एक अद्भुत शक्ति होती है। गंभीर व्यक्ति के निर्णय सटीक होते हैं। गंभीर व्यक्ति समुद्र की तरह शांत और गहरा होता है। किसी ने सच कहा है-</p>
<p>कह रहा है शोरे दरिया से समुन्दर का सकून, जिसका जितना जर्फ है, उतना ही वह खामोश है।</p>
<p>महावीर भगवान का यह सूत्र बहुत गहरा है। इस सूत्र में बहुत वजन है कि यत्न पूर्वक बोलो। बोलने में यत्न अर्थात् सावधानी रखो। बोलने के लिए निषेध नहीं है। किन्तु सावधानीपूर्वक बोलना ही एक नीति है, एक कला है। जब बोलने से पहले मन की सावधानी रहती है तो बोले हुए शब्दों का प्रभाव बढ़ जाता है। वाणी ही सबसे बड़ा धन है। मधुर वचन बोल पाना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। बोलने से पहले मानस बनाना और हृदय की पवित्रता से हितकर बोलने का भाव रखना बात को प्रभावकारी बना देता है।</p>
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		<title>Life Management-32 जीवन का प्रबंधन-यत्न पूर्वक चेष्टा करें: वचन संयम, मौन अभ्यास-भगवान महावीर की दृष्टि में </title>
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		<pubDate>Tue, 18 Mar 2025 02:30:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वर्तमान युग में हम सभी को कभी न कभी गुस्सा आता ही है और जब हमें गुस्सा आता है तो क्या होता है ? उस समय होता यह हैं कि हमारा स्वयं पर नियंत्रण नहीं रहता और हमें यह भी नहीं पता चलता कि हम क्या कर रहे है। जब हमें क्रोध आता है तो [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वर्तमान युग में हम सभी को कभी न कभी गुस्सा आता ही है और जब हमें गुस्सा आता है तो क्या होता है ? उस समय होता यह हैं कि हमारा स्वयं पर नियंत्रण नहीं रहता और हमें यह भी नहीं पता चलता कि हम क्या कर रहे है। जब हमें क्रोध आता है तो हमें सबसे बड़ी हानि यह होती है कि हम उस वक्त कुछ भी उल्टा-सीधा बोल देते है और बाद में पछताते है। मुनिश्री प्रणम्य सागरजी महाराज की पुस्तक खोजो मत पाओ व अन्य ग्रंथों के माध्यम से श्रीफल जैन न्यूज Life Management निरंतरता लिए हुए है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए इसके 32वें भाग में श्रीफल जैन न्यूज के रिपोर्टर संजय एम तराणेकर की विशेष रिपोर्ट….</span></strong></p>
<hr />
<p>छटवां सूत्र</p>
<p>कधं भासेज्ज &#8211; कैसे बोलेें ?</p>
<p>जदं भासेज्ज &#8211; यत्न पूर्वक बोलें।</p>
<p>अपनी जुबान से ऐसे शब्द बोलों कि कभी वापिस लेने पडे़ तो खुद को कड़वे न लगे।</p>
<p>किसी के लिए कुछ न कर पाओ तो कम से कम दो शब्द अच्छे जरूर बोल लेना क्योंकि विज्ञान कहता है कि जीभ पर लगी चोट सबसे जल्दी ठीक होती है और ज्ञान कहता है कि जीभ से लगी चोट कभी ठीक नहीं होती है।</p>
<p>ज्यादा बोलने की अपेक्षा अच्छा श्रोता बनें। जब आप दूसरों की बातों को ध्यान से सुनते हैं तो आप में सदा नवीन विचारों का प्रवाह बना रहेगा, अगर आप अपना महत्त्व बताना चाहते हैं तो भी दूसरों को प्रभावित करने की हरदम कोशिश न करें बल्कि स्वयं दूसरों से प्रभावित होना सीखें।</p>
<p>वचन संयम &#8211; मौन अभ्यास</p>
<p>महावीर ने कहा- अहिंसा का पालन करने के लिए सत्य बोलो।</p>
<p>व्यक्ति के शत्रु और मित्र उसके व्यवहार से बनते हैं और व्यवहार बनता है बोलचाल से।</p>
<p>सत्य में बकवास नहीं होती है। इसलिए हित-मित-प्रिय वचन ही सत्य होते हैं।</p>
<p>जिसमें किसी का अहित होता है, ऐसे सत्य वचन भी न बोलें।</p>
<p>क्रोध के साथ कभी बात न करें, भले ही हमारे प्रतिकूल कितनी ही विकट परिस्थिति हो।</p>
<p>अहंकार की भाषा पतन का कारण है।</p>
<p>आत्म प्रशंसा की भाषा बहुत बड़ा दुर्गुण है।</p>
<p>मजाक की भाषा भी दूसरों को परेशान कर सकती है।</p>
<p>व्यंग्य कसना एक अज्ञानता है।</p>
<p>प्रिय वचन बोल के आप कहीं भी अपने मित्र बना सकते हैं।</p>
<p>कोई आपका कितना ही बुरा करे, आपके प्रतिकूल चले, पर आक्रोश नहीं करना बहुत बड़ा संयम है।</p>
<p>मालिक-नौकर, गुरु-शिष्य, दो सहपाठी, दो सहधर्मी आपस में साथ भी रहते हैं और एक दूसरे पर दबाव बनाने की या अपनी बात मनवाने की कोशिश करते हैं और क्रोध करके अपनी बाट प्रस्तुत करते हैं। ऐसा करते समय एक पक्ष अपने अहंकार की पुष्टि करता है और सोचता है कि यही एक तरीका है दूसरे को वश में करने का। यह तरीका वह शॉर्टकट समझता है, किंतु बाद में उसे ज्ञात होता है कि यह गलत है और अगर यह सिलसिला लगातार चले तो आपसी प्रेम हमेशा के लिए नष्ट हो जाता है, इसीलिए कहा है ‘क्रोधात् प्रीतिविनाशः‘ अर्थात् क्रोध से प्रेम का नाश होता है।</p>
<p>यदि आप अपने वचनों का संयम रखना चाहते हैं तो मौन का अभ्यास भी करें।</p>
<p>दिन में अवश्य प्रतिदिन 5 मिनट से लेकर 2 घण्टे तक का मौन आपके संयम को बढ़ाकर जीवन में हर्ष ला सकता है।</p>
<p><strong>स्वयं पर नियंत्रण रखना आवश्यक</strong></p>
<p>असल में जीवन का सबसे पहला नियम ही यही है कि हमारा स्वयं पर नियंत्रण होना चाहिए। सफल व्यक्तियों की सबसे बड़ी विशेषता ही यही होती है कि उनका स्वयं पर नियंत्रण होता है और असफल व्यक्तियों का जीवन कोई और ही नियंत्रित करता रहता है। इसीलिए कहा गया हैं कि मीठे बोल होते है अनमोल। बोले हुए शब्द वापस नहीं आते। सोच-समझकर ही शब्दों का प्रयोग हमें अपने जीवन में करना चाहिए।</p>
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		<title>Life Management 31 जीवन का प्रबंधन-यत्न पूर्वक चेष्टा करें : शतपदगामी वामपार्श्वशायी &#8211; भगवान महावीर की दृष्टि में </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/after_eating_walk_at_least_100_steps_and_consume_digestive_substances/</link>
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		<pubDate>Mon, 17 Mar 2025 02:30:29 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[हमारी यानि विशेषकर शहरी लोगों की डाईट खराब होती जा रही है। क्योंकि डाईट में मैदा, प्रोसेस्ड फूड, फास्ट फूड और मसालेदार चीजों को खाने का चलन बहुत अधिक बढ़ता चला जा रहा है। जिसका सीधा असर हमारी पाचन क्रिया पर पड़ रहा है। अनहेल्दी फूड्स को खाने के बाद पेट फूलना, खट्टी डकारे और [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>हमारी यानि विशेषकर शहरी लोगों की डाईट खराब होती जा रही है। क्योंकि डाईट में मैदा, प्रोसेस्ड फूड, फास्ट फूड और मसालेदार चीजों को खाने का चलन बहुत अधिक बढ़ता चला जा रहा है। जिसका सीधा असर हमारी पाचन क्रिया पर पड़ रहा है। अनहेल्दी फूड्स को खाने के बाद पेट फूलना, खट्टी डकारे और अपच जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इस प्रकार का खाना आंतों में गंदगी को बढ़ाता है। मुनिश्री प्रणम्य सागरजी महाराज की पुस्तक खोजो मत पाओ व अन्य ग्रंथों के माध्यम से श्रीफल जैन न्यूज Life Management निरंतरता लिए हुए है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए इसके 31वें भाग में श्रीफल जैन न्यूज के रिपोर्टर संजय एम तराणेकर की विशेष रिपोर्ट….</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> शतपदगामी वामपार्श्वशायी</strong></p>
<p>भोजन करने के बाद कम से कम 100 कदम चलना चाहिए। हो सके तो कुछ मिनिट बायीं करवट लेटकर आराम करना चाहिए। ध्यान रहे मात्र लेटें, शयन न करें। भोजन के बाद कुछ पाचक पदार्थ का सेवन करें। जैसे सौंफ, गुड़, इलायची आदि।</p>
<p><strong>खाने के कितनी देर बाद वॉक करें </strong></p>
<p>खाने के कितनी देर बाद वॉक करना सही होता है और कितनी देर वॉक करनी चाहिए? एक स्टडी के अनुसार यह बताया गया हैं कि खाने के कम-से-कम 10-15 मिनट बाद और लगभग 10 मिनट तक वॉक करने से पाचन से जुड़ी दिक्कतें दूर होती है। आयुर्वेद के मुताबिक हर व्यक्ति को खाना खाने के बाद 20 मिनट की वॉक करना जरुरी है। इससे डायबिटीज नॉर्मल रहता है। टहलने से ब्लड प्रेशर को कम करने में भी मदद मिलती है। चहल-कदमी करने से पाचन क्रिया में सुधार होता है और पाचन से जुड़ी परेशानियां जैसे गैस, अपच और ब्लोटिंग की बीमारी दूर होती है।</p>
<p><strong>पाचन में इनकी सहायता लें </strong></p>
<p>पाचन के लिए खूब सारा तरल पदार्थ पिएं। पानी पीते रहना बहुत आवश्यक है। यह आपके पाचन तंत्र से अपशिष्ट को बाहर निकालने में मदद करता है और मल को नरम बनाने में मदद करता है। अन्यथा मल यदि कड़क (Hard) होगा तो व्यक्ति को मल त्याग (Bowel movement) करने या होने में शारीरिक तकलीफ अवश्य होगी। इस कारण वह राहत (Relief) महसूस नहीं कर पाएगा। फाइबर, स्पंज की तरह काम करता है, पानी को सोखता है। तरल पदार्थ के बिना, फाइबर अपना काम नहीं कर पाता जिससे कब्ज़ होने की आशंका रहती है। इसलिए पाचन को सामान्य रखने हेतू उपरोक्त का पालन करें।</p>
<p><strong>किचन की बहुउपयोगी चीजों का सेवन करें</strong></p>
<p>खाना खाने के उपरांत आपके किचन में मौजूद सौंफ, धनिया, जीरा, पुदीना, अदरक और अजवाइन जैसी चीजों का भी सेवन कर सकते हैं। ये आपके डाइजेशन को बेहतर बनाने में मदद करता है। इन मसालों में पाए जाने वाले पाचन एंजाइन भोजन को आसानी से पचाने में मदद करते हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>Life Management 30 जीवन का प्रबंधन-यत्न पूर्वक चेष्टा करें : शाकभुक् &#8211; शाकाहारी भोजन &#8211; भगवान महावीर की दृष्टि में </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/vegetarian_food_is_not_as_easily_digestible_and_suitable_for_the_human_body_as_non_vegetarian_food/</link>
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		<pubDate>Sun, 16 Mar 2025 02:30:02 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[शाकाहारी भोजन करने का अर्थ यह हैं कि शुद्ध और सात्विक भोजन किया जाना चाहिये। इसे हम यू भी समझ सकते हैं कि किसी भी जीव जिसमें जीवन का अंश हो उसे रंच मात्र भी छेडे़ बिना हम भोजन करते हो वह शाकाहारी की श्रेणी में आता है। शाकाहारी भोजन करना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>शाकाहारी भोजन करने का अर्थ यह हैं कि शुद्ध और सात्विक भोजन किया जाना चाहिये। इसे हम यू भी समझ सकते हैं कि किसी भी जीव जिसमें जीवन का अंश हो उसे रंच मात्र भी छेडे़ बिना हम भोजन करते हो वह शाकाहारी की श्रेणी में आता है। शाकाहारी भोजन करना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है। शाकाहारी भोजन मनुष्य के शरीर के अनुकूल होता है। जैसा कि कहा गया हैं माँसाहारी भोजन मानवीय नहीं अपितु राक्षसी भोजन है। जो जीव हत्या करने के बाद पाया जाता है। मुनिश्री प्रणम्य सागर जी महाराज की पुस्तक खोजो मत पाओ व अन्य ग्रंथों के माध्यम से श्रीफल जैन न्यूज Life Management निरंतरता लिए हुए है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए इसके 30वें भाग में श्रीफल जैन न्यूज के रिपोर्टर संजय एम तराणेकर की विशेष रिपोर्ट….</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>शाकभुक् &#8211; शाकाहारी भोजन:</strong></p>
<p>शाकाहारी भोजन करना ही स्वास्थ्यप्रद है। शाकाहारी भोजन जितना सुपाच्य और मनुष्य के शरीर के अनुकूल होता है उतना माँसाहारी भोजन नहीं होता है। माँसाहार मानवीय नहीं अपितु राक्षसी भोजन है।</p>
<p><strong>शाकाहार शब्द की उत्पत्ति</strong></p>
<p>‘शाक‘ शब्द संस्कृत की ‘शक्‘ धातु से बना है। जिसका अर्थ है-योग्य होना, समर्थ होना, शक्तिशाली होना, सहन करना। ‘शाक‘ शब्द का अर्थ ही अपने में बल और पराक्रम है। शक्ति शब्द भी इसी ‘शक्‘ धातु से बनता है। शाकाहार का शाब्दिक अर्थ होता है ऐसा आहार जो मनुष्य को बलवान, समर्थ और रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करे।</p>
<p><strong>‘वेजीटेरियन‘ (Vegetarian) शब्द लैटिन भाषा के</strong></p>
<p>‘वेजीटस‘ शब्द से बना है। जिसका अर्थ है-स्वस्थ, समर्थ, विश्वस्त, ठोस, समग्र, परिपूर्ण, ताजा, जीवन्त। फ्रांसीसी में ‘वेजीटेबिल (Vegetable) शब्द का अर्थ है-जीवन संचारक, जीवन से भरपूर।</p>
<p><strong>शाकाहार: अल्बर्ट आइन्सटाईन की परिभाषा</strong></p>
<p>महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्सटाईन (Albert Einstein) पूर्णतः शाकाहारी थे। उनका कहना था कि शाकाहार का हमारी प्रकृति पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि पूरी दुनिया शाकाहार को अपना ले तो मनुष्य का भाग्य पलट सकता है। माँसाहार करने वालों को सचेत करते हुए उन्होंने कहा कि-‘जब हम खुद मृत प्राणियों की जीती-जागती कब्रें हैं, तब फिर हम इस दुनिया में आदर्श स्थितियों की कल्पना कैसे कर सकते हैं।‘</p>
<p><strong>विश्व में अन्न की कमी नहीं है</strong></p>
<p>यह आरोप लगाना भी बेबुनियादी है कि विश्व में अन्न की कमी है। शाकाहार से खाद्य संकट उत्पन्न हो सकता है। वस्तुतः तथ्य यह है कि अमरीकी लोग पशुओं से माँस प्राप्त करने के लिए पशुओं को जितना अन्न, सोयाबीन खिलाते हैं, उतने अन्न से एक अरब तीन करोड़ लोगों का पेट भरा जा सकता है। इस बात को ध्यान में रखकर वाशिंगटन स्थित ‘वर्ल्डवाच इंस्टीट्यूट अमेरिका‘ ने चेतावनी दी है कि यदि माँसाहार नहीं घटाया गया तो विश्व को बहुत बड़े खाद्य संकट का सामना करना पड़ेगा।</p>
<p><strong>अण्डा शाकाहारी नहीं है</strong></p>
<p>टी.वी. के माध्यम से अण्डे को शाकाहारी बताया जा रहा है यह भी पूर्णतः असत्य है। 1971 में मिशीगन यूनीवर्सिटी ऑफ अमेरिका के वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि संसार का कोई अण्डा निर्जीव नहीं है फिर चाहे वह निषेचित (Fertilised) किया गया हो या अनिषेचित (Unfertilised)। इन अनिषेचित (अफलनशील) अण्डों को मृत नहीं कहा जा सकता है क्योंकि इन पर भी कुछ प्रक्रियाएँ करके चूजे बाहर लाये जा सकते हैं। इस प्रक्रिया (Process) को ‘पार्थेनोजीनेसिस (Parthenogenesis) कहते हैं। H.G. Welse ने इसका पूरा वर्णन &#8216;Science and life&#8217; नाम की किताब में किया है। बिना जीव के किसी भी अण्डे का रूप नहीं बन सकता है। जिस अण्डे में जीव नहीं होता वह सड़ जाएगा। वह अण्डा खाने योग्य ही नहीं रहेगा। अण्डे का विकास उसमें रहने वाले भ्रूण का विकास है। अण्डे में हवा जाने की नैसर्गिक व्यवस्था है। सफेद खोल के अन्दर बने सूक्ष्म छिद्रों में होकर ऑक्सीजन अन्दर जाती है और जर्दी भी (CO2) (कार्बन डाइ ऑक्साइड) को बाहर फेंकती है। इसी से अण्डे का भ्रूण जीवित रहकर विकास करता है।</p>
<p>जो डॉक्टर प्रोटीन की अधिकता से अण्डा खाने का सुझाव देते हैं वह भी अनुचित है। उन्हें इस तालिका पर ध्यान देना चाहिए।</p>
<p><strong>एक वैज्ञानिक खोज</strong></p>
<p>100 ग्राम खाद्य पदार्थ के तत्व की तालिका</p>
<p>पदार्थ प्रोटीन कार्बाेहाइड्रेट चर्बी क्षार ऊर्जा</p>
<p>गेहूँ 13.2 79.2 1.7 1.08 353</p>
<p>मूँग 24.00 56.6 1.3 3.06 332</p>
<p>सोयाबीन 43.02 22.9 19.5 4.06 432</p>
<p>अण्डा 3.03 &#8211; 13.3 1.00 173</p>
<p>इसके अलावा बाजार में सुलभता से मिलने वाले जंकफूड, फास्टफूड, भी शाकाहारी नहीं हैं, क्योंकि इनमें अनेक जानवरों की चर्बी, हड्डी, समुद्री जीव-जन्तुओं के सूखे पाउडर एवं अण्डा आदि का परिरक्षक (Preservative) के रूप में प्रयोग किया ही जाता है।</p>
<p>पीजा, बर्गर, मैगी, मसाला डोसा, नूडल्स, पावभाजी, सेंडविच, हॉटडॉग आदि बाजारू भोजन जंकफूड कहलाता है। जंक का अर्थ इंग्लिश डिक्शनरी में पुरानी, बेकार या कम उपयोग की वस्तुएँ कवाड़, कूड़ा करकट बताया है। ऑक्सफोर्ड (Oxford) डिक्शनरी में जंकफूड (Junk Food) का अर्थ लिखा है-&amp;&#8221;Food that is not very good for you but that is ready to eat or quick to prepare-&#8221; तुरन्त बनने या खाये जाना वाला खाद्य पदार्थ, जो यद्यपि स्वास्थ्यकर नहीं है। Oxford की ही इंग्लिश-इंग्लिश डिक्शनरी में जंक फूड का अर्थ है-&#8220;Food that is thought to be bad for your health.&#8221; अर्थात् वह भोजन जो आपके स्वास्थ्य के लिए बहुत बुरा समझा गया है, जंकफूड है। इतनी स्पष्ट चेतावनी के बाद भी यदि आप ऐसी चीजें खाते हैं तो इसका अर्थ है कि आप पढ़े-लिखे गँवार (Literate Barbarian) हैं।</p>
<p>केवल विदेशी भोजन को ही जंकफूड नहीं समझना चाहिए किन्तु समोसा, आलूबण्डा, आलू से बने पराठे, मसाला डोसा, अधिक मसालों में तला भुना चटपटा भोजन भी जंकफूड में आता है।</p>
<p><strong>जंक फूड का प्रचलन ज्यादा बढ़ा है</strong></p>
<p>आज की आधुनिक जीवन शैली में बच्चों, युवा विद्यार्थियों में, होटलों में और नौकरीपेशा वर्ग में इस फूड का प्रचलन जरूरत से ज्यादा बढ़ गया है। सबसे ज्यादा बच्चे साथ ही साथ बड़े भी इस जंकफूड से होने वाली बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। जैसे मोटापा बढ़ना, कब्ज बनी रहना, डायबिटीज टाइप-2, हाईपरटेंशन आदि के साथ-साथ ऐसी बीमारियाँ भी बढ़ रहीं हैं जो विटामिन्स, मिनरल्स एवं आयरन की कमी से होती हैं। समय की बचत के लिए महिलाएँ और नौकरीपेशा वर्ग ऐसे भोजन को उचित समझते हैं। जिसके कारण उन्हें भी इन्हीं शारीरिक बीमारियों का शिकार बनना पड़ रहा है। बच्चों या बड़ों में चिड़चिड़ापन आने की बहुत बड़ी वजह यह जंकफूड है। इस जंकफूड से आँतों में जंग लगती हैं। आँतें खराब होते ही पूरे शरीर का संचालन बिगड़ जाता है।</p>
<p><strong>जंक फूड हानिकारक है</strong></p>
<p>यदि अभिभावक स्वयं इस फूड से बचकर बच्चों को इस भोजन के नुकसान के बारे में प्यार से समझाएँ तो आने वाली पीढ़ी बेहतर ढंग से जीवन जी सकेगी। इसके साथ ही स्कूल, कॉलेज में अध्यापक विद्यार्थियों को इसकी जानकारी अवश्य दें ताकि बच्चों की शिक्षा मूल्यवान और गुणवान हो जाए।</p>
<p>डॉक्टरों की अब स्पष्ट घोषणा है कि यह जंक फूड हर उम्र के लोगों के लिए हानिकारक है। हृदयरोग, रक्तचाप, पैरालिसिस जैसी बीमारियों के लिए यही भोजन जिम्मेदार है। जंक फूड में पौष्टिकता नहीं रहती है। संतुलित आहार में 55 प्रतिशत कार्बाेहाइड्रेट, 15-20 प्रतिशत प्रोटीन, 25-30 प्रतिशत बसा एवं विटामिन, जिंक तथा आयरन भी होना चाहिए।</p>
<p><strong>जैन शब्द शुद्ध, शाकाहारी की पहचान </strong></p>
<p>बाजार में कुछ चीजें जैन के नाम से मिलती हैं जैसे-जैन समोसा, जैन आइस्क्रीम, जैन पावभाजी आदि। ये सभी खाने योग्य नहीं हैं। इसके आगे जैन इसलिए लिखा जाता है क्योंकि ‘जैन‘ शब्द शुद्ध, शाकाहारी की पहचान कराने वाला है। जैन लिखने से इसमें सीधे तरीके से मांस का प्रयोग नहीं होता है, बस इतना ही जानना। किन्तु पुरानी, बासी मैदा, खमण उठाने के लिए कच्ची छाछ आदि सड़ी गली सभी चीजों का प्रयोग तो किया ही जाता है। जैन होटल कहने भर से वह आपकी शुद्ध रसोईघर तो नहीं बन सकती है। उस होटल में बासी-सड़ी गली चीजों का भी उपयोग होता है। अनेक रोगों के कीटाणु होटल के ही प्लेट, ग्लास और चम्मच के माध्यम से शरीर में प्रवेश करते हैं, यह बात वैज्ञानिक भी मानते हैं।</p>
<p><strong>विदेशों में प्रतिबंधित और कीटनाशक हैं</strong></p>
<p>इसके अलावा पेप्सी, कोका-कोला, थम्सअप, फेंटा, स्लाइस, मिरिण्डा, माजा आदि पेय पदार्थ ऐसिड और एल्कोहल युक्त हैं। स्वीडन के स्कूलों में इन सभी खाद्य पदार्थ और पेय पदार्थों को बच्चों को नहीं खिलाया-पिलाया जाता है। इस पर रोक लगी है। फ्रांस, बेल्जियम में इन कोल्ड्रिंक्स को बेचना और पीना दोनों ही प्रतिबंधित है। आँध्रप्रदेश के किसान खेतों में कीटनाशक के लिए इन कोका-कोला आदि पेय पदार्थों का उपयोग तक कर लेते हैं क्योंकि ये कीटनाशक की अपेक्षा सस्ते पड़ते हैं। कोल्ड्रिंक्स पीने से हड्डियाँ गलती हैं, कैल्शियम की कमी होती है जिससे शरीर का विकास रुक जाता है, दाँत जल्दी गिरने लगते हैं। एक बार एक प्रतियोगिता में एक विद्यार्थी ने 8 बोतल पेप्सी पी ली जिससे कुछ ही घंटों बाद उसका मरण हो गया।</p>
<p><strong>अप्रत्यक्ष रूप से मांसाहार परोस रहे हैं</strong></p>
<p>आज बाजार में मिलने वाले सभी उत्पाद जो बच्चों का मन मोहते हैं, बच्चों को अप्रत्यक्ष रूप से मांसाहार परोस रहे हैं। बाजार में टॉफी, चॉकलेट, मैगी, कुरकुरे, नूडल्स, सभी तरीके के बिस्किट, आइस्क्रीम, केक जैसे पैकेट बंद या खुले आइटम आदि मछली के तेल से एवं समुद्री जीव जन्तुओं के मिक्चर से टेस्टी लग रहे हैं। ऊपर गिनाये गए इन आइटमों का कोई विश्वास नहीं है कि इनमें क्या है ? शाकाहार आन्दोलन करने वाली बड़ी-बड़ी संस्थाऐं भी खोज-बीन करने के बाद अंततः इसी निष्कर्ष पर पहुँची हैं कि &#8211; ‘आप यदि बाजार का एक बिस्किट अपने मुख में रखते हो तो उसके रंग, आकार और फ्लेवर के अलावा इसमें क्या हैं ? यह नहीं कहा जा सकता।‘ कारण यह है कि खोज-बीन में लगीं इन संस्थाओं को भी सही जानकारी देने से परहेज किया जाता है और जान बूझकर इनके पैकेटों पर सामग्री (Contents) का सीधा नाम न लिखकर E &amp; Numbers लिख दिये जाते हैं, जो कि प्रायः मछलियों और जानवरों से प्राप्त होते हैं। इसके बावजूद भी इनके पैकेटों पर शाकाहारी हरा चिन्ह (Green Symbol) लगा देते हैं। इंटरनेट पर इन नंबरों को डालकर आप इनके स्रोत के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।</p>
<p><strong>शाकाहारी विकल्प भी उपलब्ध हैं </strong></p>
<p>आज बाजार में कुछ पदार्थों के शाकाहारी विकल्प भी उपलब्ध हैं। साबुन, टूथ पेस्ट आदि शाकाहारी भी मिल रहे हैं। जरूरत है सचेत और सावधान होने की। प्रिया, एलोवेरा, वॉटरमिलन, चंद्रिका, नीम, मेडीमिक्स आदि साबून तथा दन्त कांति, स्माइल पेस्ट आदि भी उपयोगी हैं। आप स्वयं इस बारे में जानकारी एकत्रित कर पूर्ण शाकाहारी वस्तुओं का प्रयोग कर सकते हैं। जब आज बाजार में मिलने वाले दूध, घी, दही भी विश्वसनीय नहीं हैं तो फिर इन विदेशी फूड की क्या साख? दूध उत्पादक वर्षों से सिंथेटिक दूध बना रहे हैं। सिंथेटिक दूध-यूरिया, कॉस्टिक सोडा, रिफाइंड ऑयल, डिटर्जेन्ट, स्टार्च, ग्लूकोज और तालाब के पानी से बनाया जाता हैं। कुछ तरीके है जिनसे सिंथेटिक दूध की पहचान की जा सकती है।</p>
<p><strong>असली दूध का रंग नहीं बदलता, सिंथेटिक दूध पीला पड़ जाता है </strong></p>
<p>प्राकृतिक दूध का कोई खास स्वाद नहीं होता, यह बस जरा सा मीठा होता है। सिंथेटिक दूध कड़वा होता है। प्राकृतिक दूध में किसी तरह की गंध नहीं होती जबकि मिलावटी दूध में गंध आती है। उंगलियों में लेकर रगड़ने पर प्राकृतिक दूध साबुन जैसा नहीं होता, जबकि सिंथेटिक दूध साबुन जैसा हो जाता है। प्राकृतिक दूध उबालने पर सफेद ही बना रहता है जबकि सिंथेटिक दूध पीला हो जाता है। इसी तरह जमाने पर असली दूध का रंग नहीं बदलता जबकि सिंथेटिक दूध पीला पड़ जाता है। अगर मिलावटी दूध में यूरिया मिलाकर आप तक पहुँचाया जाता है, तो उसका रंग असली दूध से कहीं अधिक पीलापन लिए होता है। असली दूध अम्लीय (पी-एच स्तर 6.8) जबकि सिंथेटिक दूध क्षारीय (खारा) होता है। अगर ताजे दूध का लिटमस पेपर पर परीक्षण किया जाए तो नीला लिटमस लाल तथा लाल लिटमस नीला हो जावेगा। अगर दूध मिलावटी हो तो ऐसा नहीं होगा।</p>
<p>यह मिलावटी दूध कैंसर का कारण है। इसमें मिला यूरिया गुर्दों का नाश करता है। कॉस्टिक सोडा उच्च रक्तचाप और दिल की बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए धीमे जहर का काम करता है। यह गर्भस्थ शिशु को भी हानि पहुँचाता है।</p>
<p><strong>धर्म भ्रष्ट हो रहा व असमय बीमारियों का कारण भी </strong></p>
<p>गाय, बन्दर, गधा, कुत्ते, सुअर की चर्बी से नकली घी आदि बनाने वाले धन्धों की कमी नहीं है। कुल मिलाकर बड़े शहरों में रहने वाला पराधीन आदमी यह सब खाने-पीने के लिए मजबूर हैं। इस मजबूरी से आप कितना बच सकते हैं, आप सोचें। यह मजबूरी धर्म को भ्रष्ट तो कर ही रही है किंतु असमय में अनेक बीमारियों का कारण भी बन रही है। जिस समय आप सिगरेट हाथ में लेते हैं, उस समय आपके हाथ में एक छोटी बंदूक होती है। आपके हाथ की परछाई एक बंदूक की तरह दिखती है। यह सिगरेट आपको ही मारने का संकेत देती है। बंदूक की गोली से तो दूसरा मरता है किन्तु सिगरेट से आदमी स्वयं का घात करता है। सिगरेट के धुंए का प्रत्येक कश आत्महत्या का प्रयास है।</p>
<p>सिगरेट की परिभाषा प्रोफेसर गार्गिनर ने कुछ इस तरह दी है कि-‘सिगरेट एक श्वेत दंडिका होती है जिसके एक ओर से धुँआ निकलता है और दूसरी ओर से पीने वाला बेवकूफ आदमी होता है।‘</p>
<p>किसी ने कहा है-‘सिगरेट के बारे में कह गए मिस्टर गयूफ, एक सिरे पर आग इसके दूसरे पर बेवकूफ‘</p>
<p>आज आदमी मन का गुलाम हो गया है</p>
<p>मुझे तब और ज्यादा आश्चर्य होता है कि जब एक पढ़ा लिखा व्यक्ति यह जानते हुए भी कि गुटखा, सिगरेट, शराब, तम्बाखू आदि से नशा करना हमारे लिए घातक है, जहर है फिर भी वह उनसे पीछा नहीं छुड़ा पाता है। आज आदमी मन का कितना गुलाम हो गया है कि हृदय का उसके ऊपर कोई अधिकार ही नहीं रह गया है। जिन गुटखों में छिपकली की कटी पूँछ का जहर होता है। सरकार की तमाम चेतावनी-जैसे रेपर के ऊपर बिच्छु बनाना, स्पष्ट शब्दों में कैंसर का कारण लिखना, जहर लिखना इन सब के बावजूद आदमी मजबूर है। बेचारा ! मृत्यु के हाथों में सब कुछ छोड़ चुका है। यमदूत को धीरे-धीरे अपने पास बुला रहा है।</p>
<p>पेन किलर, नींद की गोली, गर्भ निरोधक दवाएँ आदि शरीर के लिए अत्यन्त घातक प्रभाव छोड़ते हैं इसके सेवन से जितना हो सके बचें।</p>
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		<title>Life Management 29 जीवन का प्रबंधन-यत्न पूर्वक चेष्टा करें : मितभुक् &#8211; परिमित भोजन- भगवान महावीर की दृष्टि में </title>
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		<pubDate>Sat, 15 Mar 2025 02:30:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[परिमित भोजन का अर्थ यह हैं कि उचित मात्रा में भोजन को ग्रहण करना है। वह भोजन जो गरिष्ठ न हो और हमें बीमारियों से बचाने वाला हो। जो स्मरण शक्ति को भी कमजोर न करें। एक नियंत्रित मात्रा में ही भोजन करें। जिस मात्रा में हमारा शरीर दिनचर्या के कार्य करने हेतु ऊर्जा प्राप्त [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>परिमित भोजन का अर्थ यह हैं कि उचित मात्रा में भोजन को ग्रहण करना है। वह भोजन जो गरिष्ठ न हो और हमें बीमारियों से बचाने वाला हो। जो स्मरण शक्ति को भी कमजोर न करें। एक नियंत्रित मात्रा में ही भोजन करें। जिस मात्रा में हमारा शरीर दिनचर्या के कार्य करने हेतु ऊर्जा प्राप्त करना चाहता है। उसी मात्रा में उसे करें। साथ ही हमारे शरीर के पाचनतंत्र का भी ध्यान रखें। मुनिश्री प्रणम्य सागरजी महाराज की पुस्तक खोजो मत पाओ व अन्य ग्रंथों के माध्यम से श्रीफल जैन न्यूज Life Management निरंतरता लिए हुए है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए इसके 29वें भाग में श्रीफल जैन न्यूज के रिपोर्टर संजय एम तराणेकर की विशेष रिपोर्ट….</span></strong></p>
<hr />
<p>मितभुक् &#8211; परिमित भोजन:</p>
<p>परिमित भोजन यानि भोजन उचित मात्रा में करना और कम बार करना। भोजन सीमित मात्रा में ही करें। ज्यादा भोजन करने से अनेक बीमारियाँ हो जाती हैं। ज्यादा खाने वाला व्यक्ति आलसी, बात न मानने वाला और स्मरण शक्ति से कमजोर हो जाता है। भोजन की मात्रा का नियन्त्रण करने से अनेक रोगों पर नियन्त्रण हो जाता है। हर समय कुछ न कुछ खाने की आदत शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी घटाती है। शरीर को आवश्यक प्राण ऊर्जा और पाचन तन्त्र को आराम तभी मिलता है जब भोजन की मात्रा सीमित हो।</p>
<p><strong>बार-बार भोजन करना भी एक रोग है </strong></p>
<p>बहुत बार भोजन करना भी एक रोग है। रोगी व्यक्ति को ही बार-बार भोजन करने की सलाह डॉक्टर देते हैं। आजकल लोगों को सबसे ज्यादा शिकायत वजन बढ़ने की है और डॉक्टर लोग सलाह देते हैं कि थोड़ा-थोड़ा खाएँ और कई बार खाएँ। यह सलाह अब गलत साबित होने लगी है। आखिरकार मानना वही पड़ता है जो प्राचीन ऋषि-मुनियों ने कहा है। साधु संत दिन में ही एक बार भोजन करते हैं और गृहस्थी में रहने वाला दिन में दो बार भोजन करे। यह नियम धर्म की मर्यादा में है। जब तक भूख अच्छी नहीं लगेगी, भोजन का पाचन भी अच्छा नहीं होगा। यह तभी हो सकता है जब आप समय पर भोजन करने की आदत डालें। एक बार, दो बार भोजन करें तो बार-बार भूख न लगने से बार-बार खाने की आदत से बच सकते हैं जिससे समय की बचत होगी और भोजन करने का लुफ्त उठाया जा सकेगा। इससे वजन नियंत्रित रहेगा और भोजन की पौष्टिकता का भी ख्याल रहेगा। जो लोग बार-बार भोजन करते हैं वे भोजन की पौष्टिकता को भूल जाते हैं क्योंकि उनका उद्देश्य मात्र पेट की पीड़ा को दूर करने का रह जाता है और वे जैसा-तैसा भोजन करके स्वास्थ्य बिगाड़ लेते हैं।</p>
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		<title>Life Management-28 जीवन का प्रबंधन-यत्न पूर्वक चेष्टा करें : हितभुक्-हितकारी भोजन &#8211; भगवान महावीर की दृष्टि में </title>
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		<pubDate>Fri, 14 Mar 2025 02:30:05 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[हितकारी आहार से आशय यह हैं कि कुछ भोजन ऐसे होते हैं जिनकी तासीर अथवा गुण आपस में मिलते है। इसका अर्थ यह हैं कि ये एक-दूसरे के अनुकूल होते है, जिन्हे हम हितकारी आहार कह सकते है। लगातार हितकारी आहार का सेवन करने से पाचन तंत्र के साथ-साथ शरीर के अन्य अंगों पर भी [&#8230;]]]></description>
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<p>हितकारी आहार से आशय यह हैं कि कुछ भोजन ऐसे होते हैं जिनकी तासीर अथवा गुण आपस में मिलते है। इसका अर्थ यह हैं कि ये एक-दूसरे के अनुकूल होते है, जिन्हे हम हितकारी आहार कह सकते है। लगातार हितकारी आहार का सेवन करने से पाचन तंत्र के साथ-साथ शरीर के अन्य अंगों पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। मुनिश्री प्रणम्य सागरजी महाराज की पुस्तक खोजो मत पाओ व अन्य ग्रंथों के माध्यम से श्रीफल जैन न्यूज Life Management निरंतरता लिए हुए है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए इसके 28वें भाग में श्रीफल जैन न्यूज के रिपोर्टर संजय एम तराणेकर की विशेष रिपोर्ट….</span></p>
<hr />
<p>हितभुक् &#8211; हितकारी भोजन:</p>
<p>भोजन शाकाहारी ही हो। मनुष्य का शरीर मांस भोजन के लिए प्रतिकूल है। मांसाहारी लोग जानवरों की बीमारी को अपने भीतर ग्रहण कर लेते हैं। फास्ट फूड और जंक फूड स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हानिकारक हैं। जिन वस्तुओं को बने हुए कितना समय हुआ है, यह ज्ञात नहीं हो तो ऐसी वस्तुएं नहीं खाना चाहिए। बाजार के पैकेट बंद खाद्य पदार्थों में अब मांसाहार और जैविक उत्पादों का प्रवेश बहुतायत हो गया है। नशा देने वाले पदार्थ जैसे-तम्बाखू, सिगरेट, गुटखा स्वास्थ्य के लिए बहुत घातक हैं और कैंसर जैसी भयावह बीमारी के मुख्य कारण हैं। भगवान महावीर ने बताया कि वर्षा में 3 दिन, गर्मी में 5 दिन और शीत में 7 दिन बाद पिसा हुआ आटा, उससे बनी हुई वस्तुएँ और पिसे हुए मसालों में उसी रंग के, उसी गंध के जीवों की उत्पत्ति अपने आप हो जाती है। कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं जिनका मुख की लार से संयोग होते ही जीवों की उत्पत्ति हो जाती है। यह आम व्यक्ति भी प्रयोग करके समझ सकता है। दाल के बेसन से बने पदार्थों का दही, छाछ के साथ लार का संयोग होने से जीवों की उत्पत्ति हो जाती है, इसे ही द्विदल का दोष कहते हैं।</p>
<p><strong>सबसे पहले तो अपवित्र आहार से बचें</strong></p>
<p>अधिक नमक-मिर्च वाला, तला हुआ, भुना हुआ या अशुद्ध आहार जैसे-बाजारू, बासी भोजन, चाय, कॉफी, ब्रेड, फास्ट फूड आदि तामसी आहार से भी बचना चाहिए। यह देखा गया हैं कि मैदे से बनी वस्तुओं के कारण भी सांस की तकलीफ होने लगती है।</p>
<p><strong>उपयोग से बचें </strong></p>
<p>अक्सर यह देखा गया हैं कि कई खाद्य पदार्थों के निर्माण व उनकी सुरक्षा हेतु रसायनों का उपयोग किया जाता है। जिसके कारण शरीर में व्याधियॉ उत्पन्न होती है। अतः सफेद चीनी, सफेद गुड़, वनस्पति घी, रिफाईंड तेल आदि से निर्मित भोजन तथा बाजार में मिलने वाले अधिकांशतः तैयार खाद्य पदार्थ जैसे-अचार, चटनियाँ, मुरब्बे, सॉस आदि का उपयोग स्वास्थ्यवर्धक नहीं है।</p>
<p><strong>भोजन कब व कितना करें ?</strong></p>
<p>सुबह की अपेक्षा शाम का भोजन हलका व कम मात्रा में करना चाहिए। रात में अन्न के पचन की क्रिया मंद होती है। अतः सोने से ढाई-तीन घंटे पहले भोजन कर लेना चाहिए। परंतु आजकल आमजन का सोने का समय ही लगभग रात्रि 11 बजे के बाद का हो गया है। बावजूद इसके सोने से कम-से-कम एक घंटा पूर्व तो भोजन ग्रहण कर ही लेना चाहिए। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए अधिक भोजन की आवश्यकता नहीं होती अपितु जो भोजन खाया जाता है उसका पूर्ण पाचन अधिक महत्त्वपूर्ण होता है।</p>
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		<title>Life Management 27 जीवन का प्रबंधन-यत्न पूर्वक चेष्टा करें : भोजन रात्रि में न करें &#8211; भगवान महावीर की दृष्टि में </title>
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		<pubDate>Thu, 13 Mar 2025 09:51:51 +0000</pubDate>
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<p><strong>सोने और जागने का सभी का समय अलग-अलग हो सकता है। परंतु एक निश्चित समय पर सोना और जागने के नियम का हम पालन करें तो इसके परिणाम सकारात्मक रुप में हमारे सामने आ सकते हैं। जिसका हमें लाभ ही होगा। निश्चित रुप से हानि तो कतई नहीं होगी। समय से कार्यों को करना तो एक जीवन जीने की कला के रुप में है। हमारी दिनचर्या का प्रारंभ ही सुबह उठने से होता है। जिसका शरीर पर सकारात्मक या नकारात्मक होता है। इससे आचार-विचार में भी अंतर पड़ता है। ऐसा माना जाता हैं कि व्यक्ति को स्वस्थ विचार सुबह के समय ही आते है। मुनिश्री प्रणम्य सागर जी महाराज की पुस्तक खोजो मत पाओ व अन्य ग्रंथों के माध्यम से श्रीफल जैन न्यूज Life Management निरंतरता लिए हुए है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए इसके *27वें भाग में श्रीफल जैन न्यूज* के रिपोर्टर *संजय एम तराणेकर* की विशेष रिपोर्ट</span>….</strong></p>
<hr />
<p>पाँचवा सूत्र:-</p>
<p>कधं भुंजेज्ज &#8211; कैसे भोजन करें ?</p>
<p>जदं भुंजेज्ज &#8211; यत्न पूर्वक भोजन करें।</p>
<p>भोजन रात्रि में न करें</p>
<p>महावीर ने कहा है कि भोजन विवेकपूर्वक सावधानी से करना चाहिए। भोजन रात्रि में न करें। रात्रि में भोजन करने से रात्रि में उत्पन्न होने वाले जीव उस भोजन में निर्मित हो जाते हैं। रात्रि में जीवों की उत्पत्ति वातावरण में सहज ही होती है। इसलिये रात्रि में बना भोजन दिन में करना यह भी पाप का कारण तो है ही वैज्ञानिक रूप से भी रोग का कारण है। गैसट्रिक, कब्ज आदि बीमारियों की उत्पत्ति का मूल कारण रात्रि भोजन ही है। रात्रि में, सूर्य प्रकाश से मिलने वाली अल्ट्रावॉयलेट किरणों का अभाव होने से भोजन का पाचन नहीं होता। भोजन पाचन में 5-6 घण्टे लगते हैं, इसलिएा सोने के 5-6 घण्टे पहले ही भोजन कर लेना चाहिए।</p>
<p>भोजन बैठकर ही करना चाहिए। यहीं पुरातन सभ्यता है जो स्वास्थ्य लाभ देती है। खडे़ होकर टहलते हुए भोजन करना पशुता का प्रतीक है।</p>
<p>भोजन के विषय में नीरोग रहने की एक प्राचीन उक्ति है &#8211;</p>
<p>‘हितभुक मितभुक् शाकभुक् शतपदगामी वामपार्श्वशायी‘।</p>
<p>अर्थात् भोजन हितकर हो, उचित मात्रा में हो, शाकयुक्त (हरी सब्जियों, सलाद आदि से भरपूर) हो। भोजन के बाद सौ कदम चलें और फिर थोड़ी देर के लिए बाँयी करवट लेटें।</p>
<p>नियमित समय पर परिमित (उचित मात्रा में) भोजन करना ही संयम है।</p>
<p>शोध से वैज्ञानिकों ने यह बताया हैं कि दुनिया में भूखे रहने से इतने लोग नहीं मरते, जितने कि अधिक भोजन करने से।</p>
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