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	<title>लखनऊ &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>लखनऊ &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन लखनऊ में सम्मानित : उपाध्याय विहसंत सागर जी महाराज के सान्निध्य में सम्पन्न हुआ भव्य ज्योतिष सम्मेलन </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 22 Jul 2026 16:22:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[लखनऊ के महावीर दिगंबर जैन मंदिर, आशियाना में आयोजित तंत्र, मंत्र, यंत्र एवं ज्योतिष सम्मेलन में ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुविद डॉ. हुकुमचंद जैन का सम्मान किया गया। सम्मेलन में भारतीय ज्ञान परंपरा, ज्योतिष और आध्यात्मिक साधना पर मंथन हुआ। पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक की यह रिपोर्ट। मुरैना/लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित महावीर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>लखनऊ के महावीर दिगंबर जैन मंदिर, आशियाना में आयोजित तंत्र, मंत्र, यंत्र एवं ज्योतिष सम्मेलन में ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुविद डॉ. हुकुमचंद जैन का सम्मान किया गया। सम्मेलन में भारतीय ज्ञान परंपरा, ज्योतिष और आध्यात्मिक साधना पर मंथन हुआ। <span style="color: #ff0000">पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक की यह रिपोर्ट।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना/लखनऊ।</strong> उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित महावीर दिगंबर जैन मंदिर, आशियाना में परम पूज्य मेडिटेशन गुरु उपाध्याय 108 श्री विहसंत सागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में तंत्र, मंत्र, यंत्र एवं ज्योतिष सम्मेलन भव्य एवं गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ। सम्मेलन में देशभर से आए ज्योतिषाचार्यों, वास्तु विशेषज्ञों एवं विद्वानों ने भारतीय ज्योतिष की उपयोगिता, वैज्ञानिक आधार एवं सामाजिक भूमिका पर अपने विचार व्यक्त किए।</p>
<p><strong>डॉ. हुकुमचंद जैन का हुआ सम्मान</strong></p>
<p>सम्मेलन के प्रमुख आकर्षण के रूप में प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुविद डॉ. हुकुमचंद जैन (ग्वालियर) को जैन मंदिर आशियाना समिति द्वारा तिलक, माल्यार्पण, दुपट्टा एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया। उपस्थित विद्वानों एवं श्रद्धालुओं ने इसे भारतीय ज्योतिष परंपरा के प्रति समर्पित विद्वानों के योगदान का सम्मान बताया।</p>
<p><strong>भारतीय ज्ञान परंपरा पर हुआ मंथन</strong></p>
<p>सम्मेलन में तंत्र, मंत्र, यंत्र, ज्योतिष, ध्यान, आध्यात्मिक साधना एवं जीवन प्रबंधन जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई। वक्ताओं ने भारतीय संस्कृति की उन प्राचीन परंपराओं पर प्रकाश डाला, जो व्यक्ति के मानसिक, आध्यात्मिक एवं सामाजिक विकास का मार्ग प्रशस्त करती हैं।</p>
<p><strong>उपाध्याय विहसंत सागर जी महाराज का प्रेरक संदेश</strong></p>
<p>उपाध्याय 108 श्री विहसंत सागर जी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि आत्मचिंतन, संयम, सकारात्मक सोच और आध्यात्मिक साधना जीवन को सफल एवं संतुलित बनाती है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्योतिष केवल भविष्य जानने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन को अनुशासित और उद्देश्यपूर्ण बनाने का मार्गदर्शक भी है।</p>
<p><strong>“ज्योतिष जीवन को दिशा देने वाली टॉर्च है”</strong></p>
<p>अपने संबोधन में डॉ. हुकुमचंद जैन ने कहा कि “ज्योतिष व्यक्ति का भाग्य बदलने का दावा नहीं करता, बल्कि उसे सही दिशा दिखाने का कार्य करता है। जिस प्रकार अंधेरे में टॉर्च सुरक्षित मार्ग दिखाती है, उसी प्रकार ज्योतिष जीवन की संभावित परिस्थितियों का पूर्व संकेत देकर सही निर्णय लेने में सहायता करता है।”</p>
<p><strong>अनेक विद्वानों की रही सहभागिता</strong></p>
<p>सम्मेलन में जैन ज्योतिषाचार्य परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष रवि जैन गुरुजी (दिल्ली), महामंत्री डॉ. हुकुमचंद जैन (ग्वालियर), राजीव जैन, सुशील जैन, अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त युवा विद्वान एवं कवि विकर्ष शास्त्री सहित अनेक विद्वान, समाजसेवी, धर्मप्रेमी एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे।</p>
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		<title>राज्यपाल आनंदी बेन ने किया प्राचार्य प्रो. एसके सिंह की पुस्तक का लोकार्पण : मानव-पर्यावरण संबंधों और सतत विकास के प्रति जागरूकता को बढ़ावा देने का है मकसद  </title>
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		<pubDate>Fri, 10 Jul 2026 10:53:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा यूनिवर्सिटी, लखनऊ के 11वें दीक्षांत समारोह से तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी की भी मधुर स्मृतियां जुड़ गई हैं। यूपी की राज्यपाल आनंदी बेन ने बतौर मुख्य अतिथि एक दर्जन शैक्षणिक पुस्तकों का विमोचन किया। मुरादाबाद से पढ़िए, श्रीफल साथी प्रो.श्यामसुंदर भाटिया की यह खबर&#8230; मुरादाबाद। ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा यूनिवर्सिटी, लखनऊ के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा यूनिवर्सिटी, लखनऊ के 11वें दीक्षांत समारोह से तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी की भी मधुर स्मृतियां जुड़ गई हैं। यूपी की राज्यपाल आनंदी बेन ने बतौर मुख्य अतिथि एक दर्जन शैक्षणिक पुस्तकों का विमोचन किया। <span style="color: #ff0000">मुरादाबाद से पढ़िए, श्रीफल साथी प्रो.श्यामसुंदर भाटिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरादाबाद।</strong> ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा यूनिवर्सिटी, लखनऊ के 11वें दीक्षांत समारोह से तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी की भी मधुर स्मृतियां जुड़ गई हैं। यूपी की राज्यपाल आनंदी बेन ने बतौर मुख्य अतिथि एक दर्जन शैक्षणिक पुस्तकों का विमोचन किया। जिसमें तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के कॉलेज ऑफ लॉ एंड लीगल स्टडीज़ के प्राचार्य प्रो. सुशीलकुमार सिंह की संपादित पुस्तक ह्यूमन एनवायरनमेंट एंड सस्टेनेबल डवलपमेंट भी शामिल है। इस पुस्तक की भूमिका असम के राज्यपाल के सलाहकार एवं तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के विधि संकाय के डीन प्रो. हरबंश दीक्षित ने लिखी है। उल्लेखनीय है, प्रो. एसके सिंह की यह 9वीं पुस्तक है। पुस्तक ह्यूमन एनवायरनमेंट एंड सस्टेनेबल डवलपमेंट में डॉ. प्रशांतकुमार वरुण और तान्या सागर ने बतौर सह-संपादक जिम्मेदारी का निर्वाह किया है।</p>
<p><strong>पर्यावरण जागरूकता के उद्देश्य से तैयार की पुस्तक </strong></p>
<p>पुस्तक विमोचन के बाद प्रो. सिंह बोले- यह गौरवपूर्ण पल उनके शैक्षणिक सफर का एक अविस्मरणीय पड़ाव है। अंग्रेजी में लिखित पुस्तक ह्यूमन एनवायरनमेंट एंड सस्टेनेबल डवलपमेंट पर्यावरण संरक्षण, मानव-पर्यावरण संबंधों और सतत विकास के प्रति जागरूकता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से तैयार की गई है। प्रो. सिंह ने उम्मीद जताई है कि यह पुस्तक स्टूडेंट्स, रिसर्चर्स, शिक्षाविदों, लॉ एक्सपर्ट्स और नीति-निर्माताओं के लिए एक उपयोगी संदर्भ ग्रंथ सिद्ध होगी।</p>
<p><strong>पुस्तक में इनका सहयोग रहा सराहनीय</strong></p>
<p>पुस्तक की भूमिका लिखने के लिए उन्होंने अपने डीन प्रो. हरबंश दीक्षित के साथ अपने सह-संपादकों डॉ. प्रशांतकुमार वरुण और तान्या सागर के समर्पण, उत्कृष्ट सहयोग एवं विद्वत्तापूर्ण योगदान के लिए हृदय से आभार व्यक्त किया। डॉ. प्रशांतकुमार वरुण और तान्या सागर ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा यूनिवर्सिटी के फैकल्टी ऑफ लॉ में अध्यापनरत हैं।</p>
<p><strong>8 पुस्तक लिख चुके हैं इससे पहले सिंह </strong></p>
<p>कॉलेज ऑफ लॉ एंड लीगल स्टडीज़ के प्राचार्य प्रो. सुशीलकुमार सिंह की झोली उपलब्धियों से लबरेज है। ह्यूमन एनवायरनमेंट एंड सस्टेनेबल डवलपमेंट के अलावा प्रो. सिंह आठ बुक्स लॉ एंड मीडिया, इंटरनेशनल इंटेलेक्चुअल प्रोपर्टी लॉज़, एडमिनिस्ट्रिेटिव लॉ, प्रिंसिपल्स ऑफ क्रिमिनोलॉजी, कंप्रिहेंसिव गाइड टु सिविल प्रोसीजर कोड-1908, कंप्रिहेंसिव गाइड टू सीपीसीः थ्योरी विद मल्टीपल च्वाइस क्वेश्चसं फोर लॉ स्टूडेंट्स एंड लॉ एस्प्रिेंट्स, द डॉरी पैराडॉक्स-कल्चर, सोसायटी एंड लॉ, मीडिया, प्राइवेसी एंड लॉः बेलेंसिंग फ्रीडम एंड रेगुलेशंस, कंटम्प्रेरी इश्यू इन कॉन्टिट्यूशनल मैर्ट्स लिख चुके हैं।</p>
<p><strong>20 शोध पत्र का किया है प्रस्तुतिकरण</strong></p>
<p>ये पुस्तकें दिल्ली के पब्लिशर के साथ यूपी के पब्लिशिंग हाउसों से प्रकाशित हैं। इन पुस्तकों के अलावा प्रो. सिंह के नाम चार पेटेंट भी हैं। 20 नेशनल और इंटरनेशनल रिसर्च पेपर्स भी प्रजेंट कर चुके हैं। प्रो. सिंह कॉलेज ऑफ लॉ एंड लीगल स्टडीज़ में प्राचार्य के अतिरिक्त यूनिवर्सिटी में चीफ प्रॉक्टर के पद पर भी आसीन है।</p>
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		<title>मेडिटेशन गुरु उपाध्याय श्री विहसंत सागर मुनिराज का लखनऊ में होगा चातुर्मास : 16 जुलाई को मंगल प्रवेश, 19 जुलाई को वर्षायोग कलश स्थापना </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 06 Jul 2026 08:59:54 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन संत गणाचार्य विरागसागरजी महाराज के परम प्रभावक आज्ञानुवर्ती शिष्य उपाध्याय श्री विहसंत सागर मुनिराज का वर्षायोग उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में होगा। 16 जुलाई को मंगल प्रवेश एवं 19 जुलाई को कलश स्थापना का आयोजन किया जाएगा। पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक की यह रिपोर्ट। मुरैना/लखनऊ। जैन संत गणाचार्य विरागसागरजी महाराज के [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>जैन संत गणाचार्य विरागसागरजी महाराज के परम प्रभावक आज्ञानुवर्ती शिष्य उपाध्याय श्री विहसंत सागर मुनिराज का वर्षायोग उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में होगा। 16 जुलाई को मंगल प्रवेश एवं 19 जुलाई को कलश स्थापना का आयोजन किया जाएगा। <span style="color: #ff0000">पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक की यह रिपोर्ट।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना/लखनऊ।</strong> जैन संत गणाचार्य विरागसागरजी महाराज के परम प्रभावक आज्ञानुवर्ती शिष्य उपाध्याय श्री विहसंत सागर मुनिराज (ससंघ) का वर्षायोग इस वर्ष उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के आशियाना स्थित श्री महावीर दिगंबर जैन मंदिर में संपन्न होगा। 16 जुलाई को भव्य मंगल प्रवेश तथा 19 जुलाई को वर्षायोग कलश स्थापना समारोह आयोजित किया जाएगा।</p>
<p><strong>16 जुलाई को भव्य नगर प्रवेश</strong></p>
<p>वर्षायोग को लेकर लखनऊ जैन समाज में उत्साह का वातावरण है। 16 जुलाई को पूज्य मुनिराज का भव्य नगर प्रवेश होगा, जबकि 19 जुलाई को धार्मिक विधि-विधान के साथ वर्षायोग कलश स्थापना संपन्न होगी। इस दौरान चार माह तक विविध धार्मिक, आध्यात्मिक एवं ध्यान संबंधी कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।</p>
<p><strong>चातुर्मास का धार्मिक महत्व</strong></p>
<p>जैन धर्म में वर्षा ऋतु के चार महीनों को चातुर्मास अथवा वर्षायोग कहा जाता है। इस अवधि में साधु-संत विहार नहीं करते और एक ही स्थान पर रहकर तप, स्वाध्याय, ध्यान एवं धर्म प्रभावना करते हैं। वर्षा ऋतु में सूक्ष्म जीवों की अधिक उत्पत्ति होने के कारण अहिंसा के पालन हेतु संत स्थिर निवास करते हैं तथा श्रद्धालुओं को धर्मोपदेश प्रदान करते हैं।</p>
<p><strong>साधना और सेवा का अनूठा संगम</strong></p>
<p>उपाध्याय श्री विहसंत सागर मुनिराज को मेडिटेशन गुरु के रूप में विशेष पहचान प्राप्त है। उन्होंने अब तक उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली, छत्तीसगढ़ एवं हरियाणा सहित अनेक राज्यों में वर्षायोग कर हजारों श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक मार्गदर्शन दिया है। उनके सान्निध्य में ध्यान, भक्ति एवं आत्मचिंतन के माध्यम से लोगों को सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।</p>
<p><strong>उल्लेखनीय उपलब्धियां</strong></p>
<p>गुरुश्री के मार्गदर्शन में अब तक 80 मंदिरों का जीर्णोद्धार, 47 नवीन जिनालयों का निर्माण, 55 पंचकल्याणक महोत्सव, 380 वेदी प्रतिष्ठाएं, 95 शिखर निर्माण, 780 शिखर कलशारोहण, 13 चौबीसी मानस्तंभ एवं कीर्ति स्तंभ, 187 संत भवन, 59 श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान, 6 अस्पताल, 7 जैन विद्यालय तथा 3 भोजनशालाओं का संचालन कराया जा चुका है।</p>
<p><strong>संयममय जीवन का प्रेरक उदाहरण</strong></p>
<p>पिछले 26 वर्षों में गुरुश्री लगभग 90 हजार किलोमीटर की पदयात्रा कर चुके हैं। उन्होंने आजीवन 80 प्रकार के खाद्य पदार्थों का त्याग किया है, जिनमें दही, तेल एवं मीठे पदार्थ प्रमुख हैं। मंदिर जीर्णोद्धार के प्रत्येक संकल्प के साथ वे एक नए पदार्थ का आजीवन त्याग भी करते हैं। गुरुश्री ने जीवनभर औषधियों का भी त्याग कर कठोर संयम का पालन किया है।</p>
<p><strong>श्रद्धालुओं में उत्साह</strong></p>
<p>लखनऊ में आयोजित होने वाले वर्षायोग को लेकर जैन समाज में व्यापक उत्साह है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि उपाध्याय श्री विहसंत सागर मुनिराज के सान्निध्य में चार माह तक चलने वाले धार्मिक अनुष्ठान, प्रवचन, ध्यान एवं स्वाध्याय कार्यक्रम समाज के लिए आध्यात्मिक जागरण का माध्यम बनेंगे।</p>
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		<title>विश्व धरोहर सूची में जैन धरोहरों को भी स्थान मिले : अद्वितीय और बेशकीमती हैं जैन पुरा संपदा </title>
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		<pubDate>Sat, 18 Apr 2026 11:00:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[विश्व धरोहर दिवस, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्मारक एवं स्थल दिवस कहा जाता है। प्रत्येक वर्ष 18 अप्रैल को मनाया जाता है। इसकी शुरुआत इंटरनेशनल काउंसिल ऑन मान्यूमेंट एंड साइट्स की ओर से 1982 में की गई और बाद में यूनेस्को ने इसे वैश्विक मान्यता दी। इस दिवस का उद्देश्य मानव सभ्यता की सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहरों [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>विश्व धरोहर दिवस, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्मारक एवं स्थल दिवस कहा जाता है। प्रत्येक वर्ष 18 अप्रैल को मनाया जाता है। इसकी शुरुआत इंटरनेशनल काउंसिल ऑन मान्यूमेंट एंड साइट्स की ओर से 1982 में की गई और बाद में यूनेस्को ने इसे वैश्विक मान्यता दी। इस दिवस का उद्देश्य मानव सभ्यता की सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। विश्व धरोहर दिवस पर पढ़िए, निर्ग्रंथ सेंटर आफ आर्कियोलॉजी, लखनऊ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ.यतीश जैन, जबलपुर का यह आलेख। <span style="color: #ff0000">इसकी प्रस्तुति की राजेश जैन रागी ने। </span></strong></p>
<hr />
<p>विश्व धरोहर दिवस, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्मारक एवं स्थल दिवस कहा जाता है। प्रत्येक वर्ष 18 अप्रैल को मनाया जाता है। इसकी शुरुआत इंटरनेशनल काउंसिल ऑन मान्यूमेंट एंड साइट्स की ओर से 1982 में की गई और बाद में यूनेस्को ने इसे वैश्विक मान्यता दी। इस दिवस का उद्देश्य मानव सभ्यता की सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। विश्व में लगभग 1200 के आसपास धरोहर स्थल सूचीबद्ध हैं, जबकि भारत में वर्तमान में 42 विश्व धरोहर स्थल हैं, जो हमारे देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं। भारत की धरोहरों में जैन परंपरा का विशेष स्थान है। जैन धर्म अत्यंत प्राचीन है और इसके सिद्धांत अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और आत्मसंयम, न केवल धार्मिक जीवन को बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को भी दिशा देते हैं। जैन धरोहर स्थल केवल पूजा के स्थान नहीं हैं, बल्कि वे तप, त्याग, ज्ञान और कला के केंद्र हैं। इन स्थलों की विशेषता यह है कि यहां आध्यात्मिकता और स्थापत्य कला का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। संपूर्ण देश में प्रत्येक राज्य में अति प्राचीन जैन तीर्थ स्थल एवं जैन धरोहर है, जिन्हें विश्व धरोहर सूची में शामिल किया जा सकता है। इसके लिए सार्थक प्रयास किया जाना आवश्यक है। उदाहरण स्वरूप कुछ ही स्थलों के बारे में जानकारी दे रहा हूं जिन्हें आसानी से यूनेस्को के मापदंड में लिया जा सकता है। कर्नाटक में स्थित श्रवणबेलगोला जैन धरोहरों में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहां भगवान बाहुबली की 57 फीट ऊंची एकाश्म प्रतिमा स्थित है, जिसका निर्माण 981 ईस्वी में हुआ था। यह प्रतिमा पूरी तरह एक ही पत्थर से बनी है और यह त्याग, वैराग्य और आत्मविजय का प्रतीक है। हर 12 वर्ष में यहां महामस्तकाभिषेक का भव्य आयोजन होता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं। राजस्थान के दिलवाड़ा जैन मंदिर जैन स्थापत्य कला के सर्वाेत्तम उदाहरणों में से एक हैं। 11वीं से 13वीं शताब्दी के बीच निर्मित इन मंदिरों की संगमरमर की नक्काशी इतनी सूक्ष्म और सुंदर है कि पत्थर भी जीवंत प्रतीत होता है। गुजरात का शत्रुंजय पहाड़ी (पालिताना) जैन धर्म का अत्यंत पवित्र स्थल है। यहां लगभग 863 से अधिक मंदिर एक ही पर्वत पर स्थित हैं। यह विश्व का सबसे बड़ा जैन मंदिर समूह माना जाता है। इन मंदिरों का निर्माण विभिन्न कालों में हुआ, विशेष रूप से 11वीं से 19वीं शताब्दी के बीच। यहां तक पहुंचने के लिए लगभग 3800 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, जो एक प्रकार की साधना का अनुभव कराती हैं। यह स्थल यह दर्शाता है कि जैन धर्म में तप और श्रम का कितना महत्व है। रणकपुर जैन मंदिर में 1444 स्तंभ हैं, और प्रत्येक स्तंभ की बनावट अलग-अलग है। यह स्थापत्य विज्ञान और कला का अद्भुत संगम है। गुजरात का गिरनार पर्वत जैन तीर्थ अत्यंत प्राचीन और पवित्र स्थल है, जहां 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ का संबंध माना जाता है। यहां लगभग 9999 सीढ़ियाँ हैं, जो साधना और आत्मअनुशासन का प्रतीक हैं।</p>
<p><strong>कंकाली टीला जैन कला और मूर्तिकला के प्रारंभिक विकास का साक्षी </strong></p>
<p>देशभर में जैन धर्म की प्राचीन ऐतिहासिक धरोहरों की बात करें तो मथुरा का कंकाली टीला का विशेष महत्व है। यहां से प्राप्त अवशेष पहली शताब्दी ईसा पूर्व से गुप्तकाल तक के हैं। यहां से जैन स्तूप, आयागपट्ट, मूर्तियां और अभिलेख प्राप्त हुए हैं, जो यह प्रमाणित करते हैं कि मथुरा प्राचीन काल में जैन धर्म का प्रमुख केंद्र था। कंकाली टीला जैन कला और मूर्तिकला के प्रारंभिक विकास का साक्षी है। उड़ीसा में स्थित उदयगिरि खंडगिरि गुफाएँ जैन मुनियों की तपस्थली रही हैं। ये गुफाएँ दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में राजा खारवेल के समय निर्मित हुई थीं। इन गुफाओं में साधना और ध्यान के लिए विशेष व्यवस्था की गई थी। हाथीगुम्फा अभिलेख यहां का प्रमुख आकर्षण है, जो उस समय के इतिहास को स्पष्ट करता है। यह स्थल दर्शाता है कि जैन धर्म का विस्तार पूर्वी भारत तक व्यापक रूप से था। मध्यप्रदेश के ग्वालियर में स्थित गोपाचल पर्वत पर जैन प्रतिमाएं जैन शिल्पकला का अत्यंत भव्य उदाहरण हैं। यहां चट्टानों को काटकर 7वीं से 15वीं शताब्दी के बीच विशाल तीर्थंकर प्रतिमाएं बनाई गई हैं। कुछ प्रतिमाएं 50 फीट से भी अधिक ऊँची हैं। ये प्रतिमाएं न केवल कला का अद्भुत उदाहरण हैं, बल्कि वे जैन धर्म के प्रभाव और विस्तार को भी दर्शाती हैं।</p>
<p><strong>भारतीय संदर्भ में जैन धरोहरों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक</strong></p>
<p>मध्यप्रदेश का सोनागिरि जैन तीर्थ भी जैन सिद्ध क्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध है, जहाँ लगभग 100 से अधिक मंदिर स्थित हैं। यह स्थान मोक्षभूमि के रूप में जाना जाता है। इन सभी जैन धरोहरों का यदि समग्र रूप से अध्ययन किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि वे न्छम्ैब्व् के विश्व धरोहर मानकों के अनुरूप हैं। इनमें ऐतिहासिकता, स्थापत्य उत्कृष्टता, सांस्कृतिक निरंतरता और आध्यात्मिक महत्व जैसे सभी गुण मौजूद हैं। ये धरोहरें हजारों वर्षों से जीवित परंपरा का हिस्सा हैं, जहाँ आज भी लाखों लोग आस्था और श्रद्धा के साथ आते हैं। भारतीय संदर्भ में जैन धरोहरों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि ये केवल धार्मिक स्थल नहीं हैं, बल्कि वे मानवता के लिए नैतिक और आध्यात्मिक संदेश भी देती हैं। अहिंसा और संयम जैसे सिद्धांत आज के वैश्विक समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं। यदि इन धरोहरों को उचित संरक्षण और वैश्विक पहचान मिले, तो यह न केवल जैन धर्म बल्कि सम्पूर्ण मानव सभ्यता के लिए लाभकारी होगा। विश्व धरोहर दिवस हमें यह प्रेरणा देता है कि हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझें, उसका सम्मान करें और उसे सुरक्षित रखने का संकल्प लें। जैन धरोहरों के माध्यम से हमें यह सीख मिलती है कि सच्ची प्रगति केवल भौतिक विकास में नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक उन्नति में भी निहित है। यदि हम इन धरोहरों को सहेजकर रखेंगे, तो हम अपने अतीत का सम्मान करते हुए भविष्य को सशक्त बना सकेंगे। यही इस दिवस का वास्तविक संदेश है।</p>
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		<title>भगवान महावीर जन्म जयंती पर उपमुख्यमंत्री ने किया शिलान्यासः भगवान महावीर की मूर्ति की स्थापना के शिलान्यास के साथ आगाज हुआ  </title>
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		<pubDate>Fri, 04 Apr 2025 07:37:32 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर जिनका जन्म कुंडलपुर नगरी जिला नालंदा बिहार प्रदेश में हुआ था। प्रदेश सरकार ने जैन समाज की मांग को देखते हुए सन 2002 में भगवान महावीर की जन्म जयंती के उपलक्ष पर डालीगंज मुख्य मार्ग पर स्थित हाथी पार्क को “भगवान महावीर पार्क” करने का निर्णय लिया था। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर जिनका जन्म कुंडलपुर नगरी जिला नालंदा बिहार प्रदेश में हुआ था। प्रदेश सरकार ने जैन समाज की मांग को देखते हुए सन 2002 में भगवान महावीर की जन्म जयंती के उपलक्ष पर डालीगंज मुख्य मार्ग पर स्थित हाथी पार्क को “भगवान महावीर पार्क” करने का निर्णय लिया था। <span style="color: #ff0000">पढ़िए लखनऊ से दीपक प्रधान की विशेष रिपोर्ट</span></strong></p>
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<p><strong>लखनऊ।</strong> भगवान महावीर जिन्होंने जन-जन को दिया जियो और जीने दो का उपदेश। जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर जिनका जन्म कुंडलपुर नगरी जिला नालंदा बिहार प्रदेश में हुआ था। प्रदेश सरकार ने जैन समाज की मांग को देखते हुए सन 2002 में भगवान महावीर की जन्म जयंती के उपलक्ष पर डालीगंज मुख्य मार्ग पर स्थित हाथी पार्क को “भगवान महावीर पार्क” करने का निर्णय लिया था। तत्पश्चात उसमें लाल रंग के पत्थर की मूर्ति पद्मासन रूप में रखी गई थी जिसको 2012 में कुछ उपद्रवियों ने जगह-जगह तोड़ दिया था।</p>
<p><strong>उपमुख्यमंत्री ने शिलान्यास किया</strong></p>
<p>जैन समाज ने अपने प्रयास से उस टूटी मूर्ति की जगह नई मूर्ति रखवाई। लेकिन पुरानी मूर्ति का ठीक से रखरखाव न होने की वजह से लोग अक्सर उस पर अनर्गल तरीके से फोटो खिंचवाते थे। यह संदर्भ को संज्ञान में लेते हुए अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन युवा परिषद-उत्तर प्रदेश प्रांत ने अपने प्रयासों से उस मूर्ति को राजस्थान से कारीगरों को बुलाकर के मरम्मत करवाई एवं आज 2 अप्रैल को प्रदेश के उपमुख्यमंत्री माननीय श्री बृजेश पाठक जी, राज्य मंत्री श्री जसवंत सिंह सैनी, विधायक श्रीमान नीरज बोरा के तत्वाधान में उसी मेन मार्ग के मध्य रोड पर मूर्ति रखने के लिए शिलान्यास एवं पूजन कार्यक्रम रखा गया, जिसमें माननीय अतिथियों द्वारा पूजा विधि करने के उपरांत शिलान्यास किया गया। साथ में ही अवध जैन समाज की गौरव पूज्य गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी का भी कीर्ति स्तंभ यहाँ लगाया जाएगा क्योंकि पूज्य ज्ञानमती माता जी की कीर्ति पताका पूरे विश्व में उनके कार्यकलापों की वजह से फैली हुई है।</p>
<p><strong>गणमान्यजनों की उपस्थिति रही</strong></p>
<p>कार्यक्रम का शुभारंभ तनिषा जैन भक्ति नृत्य करके , स्वागत गीत सहादतगंज जैन महिला मंडल एवं याहियागंज जैन महिला मंडल की तरफ से सुंदर भजन का वाचन किया गया। गरिमामयी उपस्थित के रूप में अयोध्या से पीठाधीश स्वामी रविंद्रकीर्ति जी महाराज, युवा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीवन प्रकाश जैन जी, चौक क्षेत्र के सभासद श्री अनु मिश्रा जी भी मौजूद रहे।</p>
<p><strong>सभी समाज को सर उठाकर के जीने का अधिकार </strong></p>
<p>माननीय उपमुख्यमंत्री ने अपने उद्बोधन में कहा कि वह समय चला गया जब कुछ लोग अपनी खराब मानसिकता के कारण दूसरे समाज का अहित करते थे आज योगी युग में सभी समाज को सर उठाकर के जीने का अधिकार है। उद्बोधन के मध्य ही माननीय उपमुख्यमंत्री जी ने नीरज बोरा जी विधायक को निर्देश दिया कि तत्काल रूप से पार्क की कटी हुई लाइट एवं जो भी अवस्थाएं पार्क में चल नहीं उसको निश्चित रूप से ठीक करवाने का आग्रह किया।</p>
<p><strong>पद्मासन मूर्ति स्थापित होगी </strong></p>
<p>मूर्ति के शिलान्यास के उपरांत दोनों सड़क के बीच में 10 फीट का स्टैंड सीमेंट एवं सरिया का बनवाया जाएगा जिस पर 8 फिट पद्मासन मूर्ति को स्थापित किया जाएगा। यह कार्य युवा परिषद के सदस्य श्री विशाल जैन आर्किटेक्ट के कुशल निर्देशन में संपन्न होगा। कार्यक्रम में मुख्य रूप से आदीश जैन, कैलाशचंद्र जैन, अमरचंद जैन, रितेश जैन, बंटी जैन, बच्चू जैन ,नीतिश जैन, वीर कुमार जैन, शुभचंद जैन, श्री जैन धर्म प्रवर्धिनी सभा के अध्यक्ष विनय जैन, निधेश जैन, परमेन्द्र जैन, अंकुर जैन, तेजकुमार जैन, महावीर जैन गंगवाल, पारस , राजेश, शैंकी, प्रभात, अंकित जैन आदि लोग उपस्थित रहे। प्रोफेसर अभय कुमार जैन ने भी अपने उद्बोधन में शिक्षाप्रद बातें कहीं। मंच का संचालन सिद्धार्थ जैन ने किया।</p>
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		<title>भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित पुस्तक-भारतनामा पर केंद्रित चर्चा हुईः अजनाभवर्ष से भारतवर्ष होने के प्रमाण शिलालेख पर उल्लेखित </title>
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		<pubDate>Fri, 07 Mar 2025 12:10:57 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भारत नाम कब? क्यों? और कैसे? पड़ा इस विषय पर डॉ. प्रभाकिरण जैन द्वारा संपादित एवं भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित पुस्तक-भारतनामा पर केंद्रित एक चर्चा आज लखनऊ के पुस्तक मेला रविंद्रालय आयोजित हुई। विद्वानों ने अपने वक्तव्य में बताया कि कैसे हमारे देश का नाम अजनाभवर्ष से भारतवर्ष हुआ। पढ़िए लखनऊ की यह पूरी खबर&#8230; [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भारत नाम कब? क्यों? और कैसे? पड़ा इस विषय पर डॉ. प्रभाकिरण जैन द्वारा संपादित एवं भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित पुस्तक-भारतनामा पर केंद्रित एक चर्चा आज लखनऊ के पुस्तक मेला रविंद्रालय आयोजित हुई। विद्वानों ने अपने वक्तव्य में बताया कि कैसे हमारे देश का नाम अजनाभवर्ष से भारतवर्ष हुआ। <span style="color: #ff0000">पढ़िए लखनऊ की यह पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>लखनऊ।</strong> अपने देश का नाम ‘भारत‘ कब? क्यों? और कैसे? पड़ा इस विषय पर डॉक्टर प्रभाकिरण जैन द्वारा संपादित एवं भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित पुस्तक-भारतनामा पर केंद्रित एक चर्चा आज लखनऊ पुस्तक मेला, रविंद्रालय, चारबाग, लखनऊ में आयोजित हुई। जिसकी अध्यक्षता जाने-माने इतिहासकार डॉ. रवि भट्ट ने की। इस विषय पर डॉ रिजवाना जमाल, श्री आईपी पांडे, श्री नवलकांत सिन्हा आदि ने विचार रखें।</p>
<p><strong>अजनाभवर्ष से भारतवर्ष हुआ </strong></p>
<p>आप लोगों ने अपने वक्तव्य में बताया कि कैसे हमारे देश का नाम अजनाभवर्ष से भारतवर्ष हुआ। जिसके साहित्यिक एवं पुरातात्विक प्रमाण, पुराण और हाथी गुफा शिलालेख जो 2000 वर्ष प्राचीन में उल्लेखित है। हमें पढ़ाया जाता है कि अपने देश का नाम दुष्यंत एवं शकुंतला पुत्र भरत के नाम से भारतवर्ष पड़ा, जबकि साहित्य परंपरा एवं पुरातात्विक प्रमाण इस विषय को स्पष्ट नहीं कर पाते।</p>
<p><strong>भारतवर्ष के प्रमाण पुरातत्व में उपलब्ध </strong></p>
<p>भगवान ऋषभदेव के पुत्र चक्रवर्ती भरत के नाम पर भारतवर्ष होने के अनेक प्रमाण प्राचीन साहित्य पुरातत्व में उपलब्ध होते हैं। जैसा कि श्रीमद् भागवत (5/7/3) मे उल्लेखित है कि अंतिम मनु नाभिराय के नाम से विख्यात यह देश अजनाभ वर्ष कहलाता था। जो आगे चलकर उनके पौत्र प्रथम चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम पर भारतवर्ष होना प्रमाणित होता है। इसी प्रकार अन्य पुराणों मे इसका समर्थन होता है।</p>
<p><strong>पुस्तक मेले के आयोजकों ने आभार माना</strong></p>
<p>पुस्तक मेले के आयोजक श्री मनोज चंदेल के संयोजन में अलका प्रमोद ने संचालन किया और संयोजक शैलेंद्र जैन ने आए हुए सभी अतिथि और श्रोताओं का आभार व्यक्त किया।</p>
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		<title>आदि तीर्थंकर ऋषभदेव के तप एवं ज्ञान कल्याणक भूमि तीर्थ ‘प्रयागराज : साहित्य परंपरा और पुरातात्विक दृष्टिकोण  </title>
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		<pubDate>Fri, 14 Feb 2025 09:10:01 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान ऋषभदेव की तप और ज्ञान कल्याणक भूमि प्रयागराज के बारे में पौराणिक और ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर अनछुए पहलुओं का जिक्र किया गया है। भगवान के वैराग्य से लेकर तप और फिर ज्ञान प्राप्त करने के बारे में विस्तार से विभिन्न संदर्भों से प्रस्तुत आलेख में ज्ञानार्जन किया गया है। लखनऊ से पढ़िए [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भगवान ऋषभदेव की तप और ज्ञान कल्याणक भूमि प्रयागराज के बारे में पौराणिक और ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर अनछुए पहलुओं का जिक्र किया गया है। भगवान के वैराग्य से लेकर तप और फिर ज्ञान प्राप्त करने के बारे में विस्तार से विभिन्न संदर्भों से प्रस्तुत आलेख में ज्ञानार्जन किया गया है। <span style="color: #ff0000">लखनऊ से पढ़िए शैलेंद्रकुमार जैन की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>लखनऊ।</strong> भगवान ऋषभदेव ने जिन 52 महाजन पदों की रचना की थी। उनमें कौशल जनपद के अंतर्गत पुरिमतालपुर नगर का राज्य अपने पुत्र वृषभ सेन को दिया। नीलांजना अप्सरा का नृत्य करते समय हुई मृत्यु को देखते हुए भगवान को वैराग्य हो गया। उसी क्षण भगवान ने सारा राजपाट त्याग कर सुदर्शन नामक पालकी पर सवार होकर दीक्षा लेने अयोध्या से चल दिए। भगवान पुरिमतालपुर के सिद्धार्थ वन में पहुंचकर पालकी से उतर गए।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-74545" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0015.jpg" alt="" width="959" height="1280" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0015.jpg 959w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0015-225x300.jpg 225w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0015-767x1024.jpg 767w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0015-768x1025.jpg 768w" sizes="(max-width: 959px) 100vw, 959px" />सभी प्रकार के परिग्रह का त्यागकर एक वटवृक्ष के नीचे पूर्वाभिमुख होकर चैत्र कृष्ण नवमी के दिन शाम को उत्तरासाढ़ नक्षत्र में दीक्षा ली और छः मास का योग लेकर वटवृक्ष के नीचे आसीन हो गए। उनके साथ भरत के पुत्र मारीच सहित चार हजार राजाओं ने दीक्षा ली। देवों और इंद्रों ने उसी स्थान पर पूजाकर दीक्षा कल्याणक मनाया और वह स्थान प्रयाग इस नाम से प्रसिद्ध हो गया।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-74546" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0013.jpg" alt="" width="897" height="1280" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0013.jpg 897w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0013-210x300.jpg 210w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0013-718x1024.jpg 718w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0013-768x1096.jpg 768w" sizes="(max-width: 897px) 100vw, 897px" />आचार्य जिनशेन ने हरिवंश पुराण नवम सर्ग (95/97)/ एवमुक्त्वा प्रजा यत्र प्रजापतिमपूज्यतः! प्रदेशः स प्रजागाख्यो यतः पूजार्थयोगतः/एवं आचार्य रविषेण ने पद्म पुराण तृतीय पर्व (280/81/82)/ प्रजाग इति देशोअ्सौ प्रजाभ्योअस्मिन् गतो यतः! प्रकृष्टो वा कृतस्त्यागः प्रयागस्तेन कीर्तितः/में इस विषय का उल्लेख कर स्पष्ट किया है कि भगवान प्रजा से दूर हो उस स्थान पर पहुंचे, इसलिए उसे जगह का नाम प्रयाग प्रसिद्ध हो गया। जहां दो नदी का संगम होता है। उत्तरांचल में उसे प्रयाग कहा जाता है। जैसे देवप्रयाग, कर्ण प्रयाग, रुद्रप्रयाग आदि यहां तीन नदियों का संगम है अतः इसे प्रयागराज कहा जाता है।</p>
<p><strong><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-74547" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0014.jpg" alt="" width="937" height="1280" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0014.jpg 937w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0014-220x300.jpg 220w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0014-750x1024.jpg 750w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0014-768x1049.jpg 768w" sizes="(max-width: 937px) 100vw, 937px" />फागुन कृष्ण एकादशी को भगवान को केवल ज्ञान हुआ</strong></p>
<p>दीक्षा लेने के बाद भगवान वहां केवल 6 माह तक रहे। इसके बाद विभिन्न देश-प्रदेशों में विहार कर धर्म प्रचार किया। हजार वर्ष बाद भगवान फिर उसी नगर पुरिमतालपुर पहुंचे और शकट नामक वन में वटवृक्ष के नीचे एक शिला पर पर्यंकासन से विराजमान हो गए और फागुन कृष्ण एकादशी को भगवान को केवल ज्ञान हुआ। संपूर्ण देवों और इंद्र ने आकर भगवान की पूजाकर ज्ञान कल्याण मनाया एवं समवशरण की रचना की।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-74548" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0012.jpg" alt="" width="824" height="1280" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0012.jpg 824w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0012-193x300.jpg 193w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0012-659x1024.jpg 659w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0012-768x1193.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 824px) 100vw, 824px" />भागवत पुराण के नवम् सर्ग में उनके हस्तिनापुर एवं अयोध्या के निकट पुरिमतालपुर के समवशरण का उल्लेख आता है। मान्यता यह भी अति प्रसिद्ध है कि समुद्र मंथन से मिले अमृत की कुछ बूंदे प्रयागराज मे भी गिरी थीं। अतः हर बारह साल में कुंभ एवं छः साल मे अर्ध कुंभ का विशाल मेला लगता है।</p>
<p><strong><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-74549" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0011.jpg" alt="" width="951" height="1280" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0011.jpg 951w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0011-223x300.jpg 223w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0011-761x1024.jpg 761w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0011-768x1034.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 951px) 100vw, 951px" />तीर्थ वंदना नामक रचना में प्रयाग का उल्लेख</strong></p>
<p>यह तिथि माघ कृष्ण अमावस्या है जो ऋषभदेव के मोक्ष कल्याणक (माघ कृष्ण चतुर्दशी )के दूसरे दिन पड़ती है। जिसे मौनी अमावस भी कहा जाता है। जिस वटवृक्ष के नीचे भगवान को केवल ज्ञान रूपी अक्षय ज्ञान की प्राप्ति हुई। उसे अक्षयवट कहा जाने लगा। नंदि संघ की गुर्रावली में कहा है कि सम्मेद शिखर, चंपापुरी, उजयंतगिरि, अक्षयवृट आदिश्वर दीक्षा सर्वसिद्धि क्षेत्र कृत यात्राणं, इसमें अक्षयवट तीर्थ का उल्लेख दृष्टव्य है। इसी प्रकार काष्टासंघ नंदी तट गच्छ के भट्टारक श्री भूषण के शिष्य नयनसागर ने 16-17 वीं सदी की अपनी तीर्थ वंदना नामक रचना में प्रयाग का उल्लेख इस प्रकार किया है।</p>
<p>गंगा जमुना मध्य नगर प्रयाग प्रसिद्धह, जिनवार वृषभदयाल धृत संयम मन सुद्धह,</p>
<p>वट प्रयाग तल जैन योग धर्माे सद्भाहस, प्रगटवो तीर्थ प्रसिद्ध पूरत भविमण आसह,</p>
<p>प्रयाग वाट दीखे थके पाप सकलन परिहरे, व्रहत ज्ञान सागर वदति के प्रयाग तीर्थ बहुसुख करें,</p>
<p><strong><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-74550" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0010.jpg" alt="" width="917" height="1280" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0010.jpg 917w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0010-215x300.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0010-734x1024.jpg 734w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0010-768x1072.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 917px) 100vw, 917px" />अकबर ने यहां किला बनाया था</strong></p>
<p>प्राचीन तीर्थ माला संग्रह भाग 1 पृष्ठ 10-11 के अनुसार प्राचीन समय में यहां भगवान ऋषभदेव के चरण विराजमान थे किंतु 16वीं सदी में राय कल्याण नामक सूबेदार ने चरण हटाकर शिवलिंग स्थापित कर दिया। विविध तीर्थ कल्प के अनुसार आचार्य अवंतिका पुत्र के केवली स्थल के रुप में यहीं पर ऋषभदेव की माता मरुदेवी को केवल ज्ञान प्राप्ति हुई थीजो पुरिमतालपुर के नाम से प्रसिद्ध है श्वेतांबर परंपरा में। रामायण काल में भगवान राम ने भी प्रयागराज मंे इस वटवृक्ष की नीचे पूजा की थी ऐसी मान्यता है। अकबर ने यहां किला बनाया था और इलाही से अल्लाह का ही आश्रय है और आदिदेव की तप ज्ञान भूमि होने पर अल्लाह अर्थात ईश्वर जहां आबाद है उसे इलाहबाद नाम दिया। मान्यता है उसी किले में एक प्राचीन पाषाण स्तंभ जो मौर्य सम्राट संप्रति ने भगवान ऋषभदेव की कल्याणक भूमि होने की स्मृति में निर्माण कराया था (उस स्तंभ को भूल से अशोक स्तंभ कहने लगे) इसके ऊपर प्रियदर्शी ( संप्रति की उपाधि ) उसकी रानी, सम्राट समुद्रगुप्त, बीरबल और जहांगीर के लेख भी खुदे हैं।</p>
<p><strong><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-74552" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0008.jpg" alt="" width="701" height="490" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0008.jpg 701w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0008-300x210.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 701px) 100vw, 701px" />&#8230;तभी से यह प्रतिमाएं जैन समाज को सुपुर्द कर दी गईं</strong></p>
<p>अंग्रेजों के समय किले मंे किसी कार्यवश खुदाई कराई जाने पर एक कुएं से अनेक जैन खंडित-अखंडित मूर्तियां निकलीं। जिसे अनेक संप्रदाय के लोग मांगने लगे लेकिन, तात्कालिक अधिकारी ने यह कहा कि इसमें सबसे वजनदार मूर्ति को जो उठाकर किले से बाहर ले जाएगा। उसी को यह दी जाएगी किंवदंती है कि छज्जोमल नामक श्रावक ने प्रातः भगवान पारसनाथ की सबसे बड़ी मूर्ति, जो सबसे अधिक वजन की थी। उसे उठाकर किले के बाहर रख दिया और तभी से यह प्रतिमाएं जैन समाज को सुपुर्द कर दी गई। आज भी वह प्राचीन प्रतिमाएं जीरो रोड पर पंचायती दिगंबर जैन बड़े मंदिर जी एवं छोटे मंदिर जी की अनेक वेदियो में विराजमान हैं। बताया जाता है कि अक्षय वट के निकट जहां से मूर्तियां प्राप्त हुई थीं। वहां पर प्राचीन समय में जरूर कोई जैन मंदिर रहा होगा।</p>
<p><strong><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-74553" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0007.jpg" alt="" width="720" height="591" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0007.jpg 720w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250214-WA0007-300x246.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 720px) 100vw, 720px" />सार्वभौमिक जीवन मूल्यों पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला</strong></p>
<p>किले में एक पातालपुरी नामक विख्यात मंदिर में विविध वेदी में दुर्गा, शिव, भैरव, भवानी आदि की वैष्णव मूर्तियों सहित एक आले में जैन मूर्ति का एक खंड जिसमें दो अरिहंत प्रतिमाएं हैं। जिसे पंडे आरस-पारस नाम से बताते हैं। किसी जिन मूर्ति का खंड प्रतीत होती है। इसी मंदिर में एक नागदेव की भी विलक्षण पाषाण प्रतिमा विराजित है। मां श्री कौशल जी ने अपनी पुस्तक ‘भगवान ऋषभदेव का भारत में कुंभ’ के विषय में प्रकाश डाला है तथा उसी पुस्तक के प्राक्कथन में योजना भवन के सदस्य सोमपाल ने और प्रस्तावना में पूर्व राज्यपाल उप्र मोतीलाल बोरा एवं मानव संसाधन मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने कुंभ की प्रचलित मान्यताओं और भगवान ऋषभदेव द्वारा दिए गए जन कल्याण के सार्वभौमिक जीवन मूल्यों पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला है। जो आज भी अधिक प्रासंगिक हैं।</p>
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		<title>लखनऊ में हुआ आयोजन : गणाचार्य श्री विरागसागर के व्यक्तित्व-कृतित्व पर राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी सम्पन्न </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/national_seminar_on_the_personality_and_achievements_of_ganacharya_shri_viragsagar/</link>
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		<pubDate>Fri, 27 Sep 2024 07:56:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[परम पूज्य आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज के आशीर्वाद से और मुनि श्री सुप्रभसागर जी महाराज एवं मुनि श्री प्रणतसागर जी महाराज के सान्निध्य में 21 और 22 सितंबर 2024 को श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, सआदतगंज, लखनऊ में गणाचार्य श्री विरागसागर व्यक्तित्व-कृतित्व राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी का आयोजन सफलतापूर्वक किया गया। पढ़िए डॉ सुनील जैन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>परम पूज्य आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज के आशीर्वाद से और मुनि श्री सुप्रभसागर जी महाराज एवं मुनि श्री प्रणतसागर जी महाराज के सान्निध्य में 21 और 22 सितंबर 2024 को श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, सआदतगंज, लखनऊ में गणाचार्य श्री विरागसागर व्यक्तित्व-कृतित्व राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी का आयोजन सफलतापूर्वक किया गया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए डॉ सुनील जैन संचय की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>लखनऊ।</strong> परम पूज्य आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज के आशीर्वाद से और मुनि श्री सुप्रभसागर जी महाराज एवं मुनि श्री प्रणतसागर जी महाराज के सान्निध्य में 21 और 22 सितंबर 2024 को श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, सआदतगंज, लखनऊ में गणाचार्य श्री विरागसागर व्यक्तित्व-कृतित्व राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी का आयोजन सफलतापूर्वक किया गया। इस संगोष्ठी में देश के मूर्धन्य विद्वानों ने गणाचार्य श्री विरागसागर जी महाराज के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आलेख प्रस्तुत किए।</p>
<p><strong>संगोष्ठी का उद्घाटन</strong></p>
<p>21 सितंबर को प्रातः 8 बजे संगोष्ठी का उद्घाटन सत्र शुरू हुआ। मंगलाचरण पंडित अनिल शास्त्री सागर ने किया, इसके बाद विद्वानों ने आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज के चित्र का अनावरण और दीप प्रज्ज्वलन किया। संचालन का कार्य डॉ. सुनील जैन संचय, ललितपुर ने किया और सत्र की अध्यक्षता डॉ. श्रेयांस कुमार जैन बड़ौत ने की। सारस्वत अतिथि के रूप में प्रोफेसर विजय कुमार जैन, दिल्ली उपस्थित रहे।</p>
<p><strong>प्रवचन और आलेख</strong></p>
<p>इस सत्र में डॉ. शीतल चंद्र जैन (जयपुर), डॉ. ज्योति जैन (खतौली) और डॉ. सनत जैन (जयपुर) ने अपने आलेख प्रस्तुत किए। मुनि श्री सुप्रभसागर जी महाराज ने समीक्षात्मक प्रवचन देते हुए गणाचार्य विरागसागर जी महाराज को श्रमण संस्कृति का दैदीप्यमान नक्षत्र बताया। दोपहर 2 बजे से आरंभ हुए सत्र की अध्यक्षता डॉ. शीतल चंद्र जैन (जयपुर) ने की, जिसमें डॉ. नरेंद्र जैन (टीकमगढ़), प्रोफेसर विजय कुमार जैन (लखनऊ), डॉ. आशीष जैन (दमोह), पंडित अनिल जैन शास्त्री सागर, और पंडित अखिलेश शास्त्री रामगढ़ा ने अपने आलेख प्रस्तुत किए। संगोष्ठी में विद्वानों का सम्मान अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासभा (तीर्थ संरक्षिणी) की ओर से शाल, श्रीफल और साहित्य भेंटकर किया गया।</p>
<p><strong>विशेषांक का विमोचन</strong></p>
<p>22 सितंबर को तृतीय सत्र की अध्यक्षता डॉ. नरेंद्र जैन (टीकमगढ़) ने की। इस सत्र में जैन गजट द्वारा प्रकाशित गणाचार्य श्री विरागसागर विनयांजलि विशेषांक का विमोचन भव्य तरीके से किया गया। मुनि श्री सुप्रभसागर जी महाराज ने संगोष्ठी के समापन पर गणाचार्य श्री विरागसागर जी महाराज के व्यक्तित्व और कृतित्व को स्तुत्य बताया और उनकी समाधि को सभी संतों, विद्वानों और समाज द्वारा उत्कृष्ट बताया। मुनि श्री की बात का सभी विद्वानों ने करतल ध्वनि से समर्थन किया।</p>
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		<title>तीर्थ स्थल में विराजमान हैं मुनि श्री सुधासागर महाराज : भाग्योदय तीर्थ हॉस्पिटल के मेडिकल स्टोर में भीषण आग </title>
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		<pubDate>Tue, 24 Sep 2024 13:24:11 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भाग्योदय तीर्थ क्षेत्र में सोमवार शाम अचानक अफरातफरी का माहौल बन गया। लोग इधर से उधर भागने लगे, क्योंकि अस्पताल के मेडिकल में आग लग गई। देखते ही देखते 15 से 20 फीट ऊपर तक आग की लपटें उठने लगी। धुएं का गुबार पूरे परिसर में छा गया। वहां पर मौजूद लोगों ने आसपास खड़े [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भाग्योदय तीर्थ क्षेत्र में सोमवार शाम अचानक अफरातफरी का माहौल बन गया। लोग इधर से उधर भागने लगे, क्योंकि अस्पताल के मेडिकल में आग लग गई। देखते ही देखते 15 से 20 फीट ऊपर तक आग की लपटें उठने लगी। धुएं का गुबार पूरे परिसर में छा गया। वहां पर मौजूद लोगों ने आसपास खड़े लोगों को हटाया, इसके बाद तत्काल ही पुलिस को सूचना दी गई। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> भाग्योदय तीर्थ क्षेत्र में सोमवार शाम अचानक अफरातफरी का माहौल बन गया। लोग इधर से उधर भागने लगे, क्योंकि अस्पताल के मेडिकल में आग लग गई। देखते ही देखते 15 से 20 फीट ऊपर तक आग की लपटें उठने लगी। धुएं का गुबार पूरे परिसर में छा गया। वहां पर मौजूद लोगों ने आसपास खड़े लोगों को हटाया, इसके बाद तत्काल ही पुलिस को सूचना दी गई। जिसके बाद मोती नगर पुलिस फायर ब्रिगेड मौके पर पहुंची। तत्काल ही वहां पर आग को बुझाने की कवायद शुरू की गई। पुलिस कर्मियों ने वीडियो बनाने के लिए पास जा रहे लोगों को वहां से हटाया, ताकि कोई और भी घटना ना हो जाए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार यहां पर रह रहकर छोटे-छोटे धमाके टाइप के भी कुछ उठ रहे थे, जिससे बड़ा हादसा होने का खतरा था। हालांकि भाग्योदय क्षेत्र की मेडिकल में यह आग कैसे लगी है? इसका पता नहीं चल पाया है, लेकिन भाग्योदय के वॉलंटियर, फायर ब्रिगेड की टीम और पुलिस के द्वारा आज को बुझाने की प्रयास किए गए करीब आधा घंटे की मेहनत के बाद आग पर काबू पा लिया गया है।</p>
<p><strong>हजारों की संख्यामें आ रहे लोग</strong></p>
<p>दरअसल, भाग्योदय क्षेत्र में इस समय हजारों लोगों का आना जाना हो रहा है। यहां पर मुनि श्री सुधासागर जी महाराज विराजमान हैं, उनके द्वारा शाम के समय जिज्ञासा समाधान किया जाता है, जिसमें सैकड़ों लोग पहुंचते हैं। अस्पताल में भी हर तरह के मरीज और उनके परिजन यहां पर आते हैं। यह घटना भाग्योदय परिसर में जहां पर नए मंदिर का निर्माण किया जा रहा है।</p>
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		<title>लखनऊ में पहलीबार आयोजित हुआ शिविर : क्षमावाणी के साथ हुआ समयसारोपासक साधना संस्कार शिविर का समापन </title>
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		<pubDate>Tue, 24 Sep 2024 07:52:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ पर्वराज पर्युषण महापर्व के सुअवसर पर चर्या शिरोमणि आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज के मंगलशुभाशीष से परम पूज्य मुनि श्री सुप्रभसागरजी महाराज, मुनि श्री प्रणतसागर जी महाराज के सान्निध्य में 08 सितम्बर से 17 सितम्बर 2024 तक उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में भव्य समयसारोपासक साधना संस्कार शिविर का आयोजन पह‌ली बार सम्पन्न हुआ। जिसमें लगभग [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> पर्वराज पर्युषण महापर्व के सुअवसर पर चर्या शिरोमणि आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज के मंगलशुभाशीष से परम पूज्य मुनि श्री सुप्रभसागरजी महाराज, मुनि श्री प्रणतसागर जी महाराज के सान्निध्य में 08 सितम्बर से 17 सितम्बर 2024 तक उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में भव्य समयसारोपासक साधना संस्कार शिविर का आयोजन पह‌ली बार सम्पन्न हुआ। जिसमें लगभग 250-300 महिला-पुरुष शिविरार्थियों ने संयम, तप, त्याग की साधना दसलक्षण पर्व के इन दस दिनों में पूर्ण की। <span style="color: #ff0000">पढ़िए डॉ सुनील जैन संचय की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>लखनऊ।</strong> पर्वराज पर्युषण महापर्व के सुअवसर पर चर्या शिरोमणि आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज के मंगलशुभाशीष से परम पूज्य मुनि श्री सुप्रभसागरजी महाराज, मुनि श्री प्रणतसागर जी महाराज के सान्निध्य में 08 सितम्बर से 17 सितम्बर 2024 तक उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में भव्य समयसारोपासक साधना संस्कार शिविर का आयोजन पह‌ली बार सम्पन्न हुआ।</p>
<p>जिसमें लगभग 250-300 महिला-पुरुष शिविरार्थियों ने संयम, तप, त्याग की साधना दसलक्षण पर्व के इन दस दिनों में पूर्ण की। शिविर में प्रातः काल 4.30 बजे से ही जहां शारीरिक स्वास्थ्य के लिये योगाचार्य राजेश जैन, नाशिक (महा.) ने योगविधा प्रदान की तो वहीं मुनि श्री ने मानसिक एवं आत्मिक स्वास्थ्य के लिए ध्यान के माध्यम से जीवन जीने की विधि सिखाई। प्रभू भक्ति, पर्व, प्रवचन आदि के द्वारा पूज्य मुनि श्री ने जीवन की उत्कृष्टता के अनेक आयाम श्रावकों को दिये । तत्वार्थसूत्र विवेचन, जैनिस्टक साइंस (वीतरागविज्ञान) से जैन-आगम गूढ़ रहस्य उद्‌घाटित किये।</p>
<p>पर्वराज दसलक्षण का विवेचन करते हुए मुनि श्री सुप्रभसागरजी ने कहा कि जो आत्मा को आत्मा से जुड़‌ने का मार्ग प्रदान करे, वह पर्व है और पर्वों में भी श्रेष्ठ पर्व, जो आत्मा को चारों ओर से तप, साधना की उष्णता प्रदान करते हुए जो आत्मा की कर्मों के से मुक्ति का मार्ग दिखाये, वही पर्वराज पर्युषण है। धर्म के जो दसलक्षण आचार्यों ने कहे हैं, वह वास्तव में उत्कृष्टता से दिगम्बर मुनि के ही होता है।</p>
<p><strong><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-67133" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240924-WA0009.jpg" alt="" width="1280" height="852" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240924-WA0009.jpg 1280w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240924-WA0009-300x200.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240924-WA0009-1024x682.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240924-WA0009-768x511.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240924-WA0009-414x276.jpg 414w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240924-WA0009-470x313.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240924-WA0009-640x426.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240924-WA0009-130x86.jpg 130w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240924-WA0009-187x124.jpg 187w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240924-WA0009-990x659.jpg 990w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" />निकाली शोभायात्रा</strong></p>
<p>अन्तिम दिवस उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म के दिन श्रीजी की भव्य शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें श्री जिनेन्द्र भगवान के साथ मुनिश्री के सानिध्य में समस्त शिविरार्थी पंक्तिबद्ध होकर इस शोभायात्रा में शामिल हुए। श्री गणेश प्रसाद वर्णी गुरुकुल सिद्धक्षेत्र अहारजी टीकमगढ़ (म.प्र.) के विद्यार्थियों ने अपनी कुशल प्रतिभा का प्रदर्शन किया।</p>
<p><strong><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-67134" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240924-WA0007.jpg" alt="" width="1280" height="852" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240924-WA0007.jpg 1280w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240924-WA0007-300x200.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240924-WA0007-1024x682.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240924-WA0007-768x511.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240924-WA0007-414x276.jpg 414w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240924-WA0007-470x313.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240924-WA0007-640x426.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240924-WA0007-130x86.jpg 130w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240924-WA0007-187x124.jpg 187w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240924-WA0007-990x659.jpg 990w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" />सामूहिक क्षमावाणी हुई</strong></p>
<p>शिविर में महिला शिविरार्थी के रूप में प्रथम स्थान डॉ. किमी जैन मड़ावरा, द्वितीय ज्योति जैन-विदिशा, तृतीय सुधाजैन- सागर एवं सर्वोत्कृष्ट पुरस्कार प्राची जैन सुपुत्री संजीव जैम-लखनऊ ने प्राप्त किया किया तो पुरुष शिविरार्थियों में प्रथमस्थान अयन जैन- सागर, द्वितीय स्थान दिलीप जैन-कुंभराज, तृतीय स्थान जिनेन्द्र जैन उज्जैन एवं मोहित जैन,‌ सागर एवं प्रथमेश जैन-वाशिय (महा.) ने प्राप्त किया। क्षमावाणी के साथ ही समयसारीपासक साधना संस्कार शिष्य शिविर का समापन हुआ और समस्त दिगम्बर- श्वेताम्बर श्रावक- श्राविकाओं की उपस्थिति में सामूहिक क्षमावाणी सम्पन्न हुई जिसमें मुनिश्री ने कहा कि व्यवहारिक मात्र क्षमावाणी नहीं है क्योंकि हम व्यवहारिकता में शब्दों की क्षमा तो मांग लेते हैं लेकिन जिनके प्रति हमने अपराध किया, जिनका हृदय दुःखाया उनसे क्षमा नहीं मांग पाते इसलिए क्षमावाणी व्यवहारिकता की नहीं अपितु आत्मीयता के साथ होनी चाहिये। इस अवसर पर अमृतोद्भव पावसयोग समिति के अध्यक्ष हंसराज जैन एवं कार्याध्यक्ष जागेश जैन एवं संयोजक संजीव जैन ने भी सभी से क्षमायाचना की। शिविर श्री पार्श्वनाथ धाम ट्रस्ट, काकोरी, अमेठिया लखनऊ में सम्पन्न हुआ।</p>
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