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	<title>रावतभाटा &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>रावतभाटा &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज का विहार : राजस्थान सरकार ने किया राजकीय अतिथि घोषित  </title>
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		<pubDate>Sat, 03 Feb 2024 05:32:20 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य विशुद्ध सागर महाराज संसघ का विहार लगातार रावतभाटा के लिए चल रहा है। 4 फरवरी को संघ का कोटा में मंगल प्रवेश का अनुमान है । वहीं राजस्थान सरकार ने आचार्य श्री को राजकीय अतिथि घोषित किया है। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट।   आचार्य विशुद्ध सागर महाराज संसघ का विहार लगातार रावतभाटा के [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्य विशुद्ध सागर महाराज संसघ का विहार लगातार रावतभाटा के लिए चल रहा है। 4 फरवरी को संघ का कोटा में मंगल प्रवेश का अनुमान है । वहीं राजस्थान सरकार ने आचार्य श्री को राजकीय अतिथि घोषित किया है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट।  </span></strong></p>
<hr />
<p>आचार्य विशुद्ध सागर महाराज संसघ का विहार लगातार रावतभाटा के लिए चल रहा है। रावतभाटा में 6 फरवरी से आचार्य श्री के सानिध्य में जिन बिम्ब भव्य पंच कल्याणक महोत्सव होना है। आचार्य श्री अभी रावतभाटा से 90 किलोमीटर दूर हैं 3 फरवरी की आहारचर्या कापरेन ( केशवराय पाटन 10 km ) सम्भावित है, 4 फरवरी को संघ का कोटा में मंगल प्रवेश होने की संभावना है। राजेश जैन दद्दू ने बताया कि ऐसे में ख़ुशी की बात ये है की राजस्थान सरकार ने आचार्य श्री को राजकीय अतिथि घोषित किया है। उनके प्रोटोकोल में वरिष्ठ अधिकारियों को निर्देशित किया गया है ।</p>
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		<title>मनुष्य भव चौरासी लाख योनियों में सबसे उत्कृष्टः मुनि श्री शुद्धसागर जी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 02 Aug 2022 01:30:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
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					<description><![CDATA[हमारी क्या कामना है नोटों की गड्डी या धर्म? रावतभाटा (चितौड़गढ़)। श्रमण मुनि श्री शुद्धसागर जी महाराज व क्षुल्लक श्री अकंप सागर जी महाराज का भव्य मंगल चातुर्मास धर्मनगरी रावतभाटा चितौड़गढ़ में चल रहा है। मुनि श्री ने सभा को संबोधित करते हुए कहा है कि हमारा मनुष्य भव चौरासी लाख योनियों में सबसे उत्कृष्ट [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>हमारी क्या कामना है नोटों की गड्डी या धर्म?</strong></p>
<p><strong>रावतभाटा (चितौड़गढ़)।</strong> श्रमण मुनि श्री शुद्धसागर जी महाराज व क्षुल्लक श्री अकंप सागर जी महाराज का भव्य मंगल चातुर्मास धर्मनगरी रावतभाटा चितौड़गढ़ में चल रहा है। मुनि श्री ने सभा को संबोधित करते हुए कहा है कि हमारा मनुष्य भव चौरासी लाख योनियों में सबसे उत्कृष्ट है, लेकिन इसकी आयु बहुत ही अल्प है। इस अल्प समय में जो समझ जाए वह अपने भवों का नाश कर सकता है। हमने अनेक भवो में जो दुख, कष्ट, वेदना सही है, यदि वो हमारे सामने आ जाए तो हम कभी पाप नहीं करे। इस मनुष्य भव में आकर हम फूल गए हैं और फूलकर भूल रहे हैं।<br />
मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य भव ही एक ऐसा भव होता है जिसमें हम यदि अपना लक्ष्य बना लें तो मोक्ष या ऊर्ध्व गति को प्राप्त कर सकते हैं। यदि मनुष्य भव छूट जाए तो फ़िर ऐसा कोई भव नहीं है जिसमें हम अपना कल्याण कर सकें। अर्थात हमें अपने आप को पहचानने की जरूरत ह । जब हम संसार में आए थे, तब भी कुछ नहीं लाए थे और जब इस संसार से जाएंगे तब भी कुछ नहीं ले जाएंगे। फिर भी हमारे मोहनीय कर्म का उदय ऐसा है कि हम इसे स्वीकारने को तैयार नहीं हैं।<br />
मुनि श्री ने श्रोताओं से कहा कि वस्तु व्यवस्था को स्वीकार करने से ही सम्यक दर्शन संभव होगा। हम यह जानते हैं कि हम साथ ना कुछ लाए थे, ना ले जाएंगे फिर भी हमारा कर्म का उदय इतना हावी हो रहा है कि हम दूसरों को देखकर हर कार्य को कर रहे हैं। मुनि श्री कहते हैं कि अपना कल्याण करने के लिए हमें अपनी परिणीती, स्थान व सोच को बदलना होगा। इसे बदले बिना तीन काल में भी कल्याण संभव नहीं है। हम भगवान की मूर्ति के आगे हाथ जोड़कर कहते हैं कि हे भगवान ,मेरा कल्याण हो जाए तो उससे कल्याण होना वाला नहीं है। लेकिन हम निज भगवन से यदि कहें तो हमारा कल्याण अवश्य ही हो जाएगा। मनुष्य संसार से मात्र अपने कर्मों को ही लेकर जाता है। फिर भी विचारा नोटों की गड्डी के पीछे लगा है और इसके लिए अशुभ कर्म करता है।<br />
मुनि श्री ने अंत में कहा कि मनुष्य भव कमाई की दुकान है। जैसा इस भव में कमाया जा सकता है, अन्य किसी भव में नहीं कमाया जा सकता है। हम यह हमारा निर्णय है कि हमारी क्या कामना है नोटों की गड्डी या धर्म? जो कर्म हम कर रहे हैं उसे भोगना ही पड़ेगा। हम लोगों से तो झूठ बोल सकते हैं मगर कर्म से नहीं बोल सकते हैं।</p>
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		<title>वंदन करते समय कुटिल भाव न रहेंः मुनि श्री शुद्ध सागर जी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 27 Jul 2022 12:53:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[shreephal news]]></category>
		<category><![CDATA[मुनि शुद्ध सागर]]></category>
		<category><![CDATA[रावतभाटा]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल न्यूज]]></category>
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					<description><![CDATA[आगम को जानना आसान, पर स्वीकारना कठिन धर्मसभा को जिनवाणी का ज्ञान करवाया श्रमण मुनि ने रावतभाटा। मुनि श्री शुद्ध सागर जी महाराज का अमृतमय वर्षायोग धर्म नगरी रावतभाटा, चितौड़गढ़ में हो रहा है। प्रातःकाल प्रवचन की बेला में श्रमण मुनि श्री शुद्ध सागर जी महाराज ने धर्मसभा को जिनवाणी का ज्ञान करवाते हुए बताया [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li><strong>आगम को जानना आसान, पर स्वीकारना कठिन</strong></li>
<li><strong>धर्मसभा को जिनवाणी का ज्ञान करवाया श्रमण मुनि ने</strong></li>
</ul>
<p><strong>रावतभाटा।</strong> मुनि श्री शुद्ध सागर जी महाराज का अमृतमय वर्षायोग धर्म नगरी रावतभाटा, चितौड़गढ़ में हो रहा है। प्रातःकाल प्रवचन की बेला में श्रमण मुनि श्री शुद्ध सागर जी महाराज ने धर्मसभा को जिनवाणी का ज्ञान करवाते हुए बताया कि जीव संसार में रहते हुए भी बंध से डरता है तथा वह इस बंध को छोड़कर निर्बंध होना चाहता है। बंध को छोड़ने के लिए वह वंदन करने जाता है परन्तु वह वहां भी बंध करके आता है।</p>
<p>महाराज श्री ने बताया कि व्यक्ति के भावों में ऐसी कुटिलता होती है कि जब वह वंदन भी करता है तो उन्हीं कुटिल (मान- माया) भाव के साथ ही करता है। व्यक्ति चाहता है कि सबकुछ उसके मन का हो। जबतक उसके मन का होता है, तब उसके लिए भगवन सब कुछ होता है परन्तु जबसे उसके मन का नहीं होता, उसके लिए भगवन भी झूठा हो जाता है। परन्तु &#8220;हे जीव, संसार में सबसे बड़ा झूठा व्यक्ति स्वयं है।&#8221; व्यक्ति को अपने परिनमन को सुधारने की आवश्कता है, इसमें भगवन को दोषी ठहराना उचित नहीं है।<br />
मुनि श्री आगे कहते हैं कि जहां हमारे मन की होगी, वहां कल्याण नहीं होगा। जहां मन की नहीं होगी, वहीं हमारा कल्याण संभव है।</p>
<p>धर्मसभा में श्रोताओं को जन्म &#8211; मरण के बारे में समझाते हुए मुनि श्री कहते हैं कि जिस प्रकार विष्ठा के एक कीड़े को भी अपना जीवन प्रिय होता है, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन से स्नेह होता है परन्तु संसार में व्यक्ति का स्वयं का कुछ नहीं होता है, वह तो केवल उसके नाममात्र का होता है। संसार का सबसे बड़ा झूठ यह है कि घर मेरा है, व्यक्ति अपने घर में कई परेशानियों को झेलता है फिर भी वह इससे दूर होना नहीं चाहता है, यह उसके बंध का कारण होता है।</p>
<p>सम्यकदृष्टि व मिथ्यादृष्टि जीव का लक्षण बताते हुए मुनि श्री कहते हैं कि मात्र भगवन का अभिषेक करने या महाराज जी को आहार देने से सम्यक दर्शन नहीं होता है। वस्तु को वस्तुतत्व नहीं स्वीकारोगे तब तक सम्यक दर्शन संभव नहीं है। घर में दुख है, बंधन है, यह बात समझे बिना सम्यक दर्शन संभव नहीं होता है।<br />
मुनि श्री ने सभा में श्रोताओं से कहा कि आगम को जानना आसान है परन्तु उसे मानना/स्वीकारना कठिन होता है।</p>
<p>कुतर्क करने वालों की संसार में कमी नहीं<br />
मुनि श्री ने कहा कि कुतर्क करने वालों की संसार में कमी नहीं है। व्यक्ति अपने जीवन में निज घर को भूल कर, पर घर में घुस रहा है यह उसके मिथ्या उदय का कारण है। मनुष्य का स्वभाव ज्ञान दर्शन होता है। स्वभाव को स्वीकारना होता है, उसमे तर्क नहीं लगाना होता है। मुनि श्री ने बताया कि मिथ्यादृष्टि जीव की बुद्धि मिथ्या मार्ग पर ही चलती है। उसकी बुद्धि तीनों काल में भी सम्यक मार्ग पर नहीं चलने वाली है। प्रत्येक व्यक्ति अपने भाग्य से ही सब पाता है और खोता है। यदि उसके भाग्य में होगा तो उसे प्राप्त होगा और यदि उसके भाग्य में नहीं होगा तो आया हुआ चला जाएगा। पर की और जाना व निज को भूलना यही मिथ्या ज्ञान होता है। कुतर्क लगाने वाला व्यक्ति कभी नहीं सुधरेगा इसलिए हमें खराब वस्तु को त्यागकर अच्छे को स्वीकारना प्रारम्भ करना होगा यही हमारे लिए कल्याण का मार्ग है।</p>
<p>इस धर्मसभा में रावतभाटा समाज के पुरुष, महिला, बालक,बालिकाएं व गुरुभक्त उपस्थित थे।</p>
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<p>&nbsp;</p>
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