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	<title>रावतभाटा चातुर्मास &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>रावतभाटा चातुर्मास &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>धर्मात्मा पाप से डरता है, पापी से नहींः मुनि श्री शुद्ध सागर जी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 01 Aug 2022 01:30:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[मुनि शुद्ध सागर]]></category>
		<category><![CDATA[रावतभाटा चातुर्मास]]></category>
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					<description><![CDATA[तीर्थंकर भगवान की देशना स्याद्वाद वाणी का उपदेश खुद को बदलना होगा, दूसरों को बदलने से हमें कुछ नहीं मिलेगा रावतभाटा (चितौड़गढ़)। मुनि श्री शुद्ध सागर जी महाराज का अमृतमय वर्षायोग धर्म नगरी रावतभाटा चितौड़गढ़ में चल रहा है। मुनि श्री संघ श्री 1008 पारसनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, नया बाज़ार, रावतभाटा में विराजमान हैं। प्रातःकाल [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li><strong>तीर्थंकर भगवान की देशना स्याद्वाद वाणी का उपदेश</strong></li>
<li><strong>खुद को बदलना होगा, दूसरों को बदलने से हमें कुछ नहीं मिलेगा</strong></li>
</ul>
<p><strong>रावतभाटा (चितौड़गढ़)।</strong> मुनि श्री शुद्ध सागर जी महाराज का अमृतमय वर्षायोग धर्म नगरी रावतभाटा चितौड़गढ़ में चल रहा है। मुनि श्री संघ श्री 1008 पारसनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, नया बाज़ार, रावतभाटा में विराजमान हैं। प्रातःकाल उन्होंने श्रावकों को तीर्थंकर भगवान की देशना स्याद्वाद वाणी का उपदेश देते हुए कहा कि धर्म करने के लिए हमें स्वयं को बदलना होगा। हमारे अंदर धर्म की जो राय बनी है, उसे टटोलना होगा। मुनिश्री कहते हैं कि जब बिना बदले रोटी नहीं बन पाती है तो हम &#8220;धर्मात्मा&#8221; केसे बन सकते हैं। आत्मा में कोई बदलाव नहीं आता है, वह नरक, तिर्यंच, निगोद संसार सभी जगह समान है। संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं- कुछ पापात्मा व कुछ पुण्यात्मा। दोनों की आत्मा वहीं होती है उसमें कोई बदलाव नहीं आता है। मात्र अंतर इतना होता है कि धर्मात्मा जो होता है, उसे बदलना पड़ता है।</p>
<p>मुनि श्री ने अपने प्रवचन में आगे कहा कि मात्र मंदिर जाने से, अभिषेक, पूजन करने से हम धर्मात्मा नहीं बनते हैं। हमें अपने आचार, विचार सब बदलना होगा तभी हम धर्मात्मा बन सकते हैं। मुनि श्री ने श्रोताओं से कहा कि धर्मात्मा जो होता है, वह पाप से डरता है। पाप करने से डरता है परन्तु वह &#8220;पापी&#8221; से नहीं डरता है। हमें यह विचारने की जरूरत है कि हम पाप से डरते हैं या पापी से? यदि हम पाप से डरते हैं तो हम धर्मात्मा हो सकते है लेकिन जो पापी से डरता है वह तीन काल में भी धर्मात्मा होने वाला है नहीं।</p>
<p><strong>पापी से घृणा करना ही पाप</strong></p>
<p>मुनि श्री कहते हैं कि पापी से घृणा करना ही पाप है। पाप से घृणा करने वाला, पापी से घृणा कर ही नहीं सकता है।</p>
<p>अपने आप से राग करना तथा दूसरों से घृणा करना यही पाप होता है। मुनि श्री कहते हैं कि बिना बदले संसार में कोई कार्य संभव नहीं होता है । कार्य की परिभाषा देते हुए मुनि श्री कहते है कि वस्तु का बदल जाना ही कार्य है।<br />
मुनिश्री कहते हैं हे जीव, तू सोचता है कि मैं धर्म करूं और तू बदलना भी नहीं चाहता है तो तेरा धर्म केसे होगा? जितना जितना हम खुद को बदलेंगे, उतना हमारा धर्म अग्रसर होगा। संसारी जीव की यही धारणा होती है कि मैं दूसरों को बदलूं, वह यह कभी नहीं सोचता कि में स्वयं को बदलूं। दूसरों को बदलने से हमें कुछ नहीं मिलेगा। हे जीव, यदि तू स्वयं को बदलेगा तो तेरा कल्याण होगा और तू उतना ही धर्मात्मा होगा।<br />
मुनि श्री ने अंत में श्रावकों से कहा कि हे जीव, यदि तुझे संसार में ही रहना है तो तू धर्म कर ही क्यूं रहा है। बाहर से तो तू धर्मात्मा कहला रहा है और अंदर से तेरे धर्म के भाव ही नहीं है तो उससे भी तू मात्र पाप का ही बंध कर रहा है। धर्म और विवेक का सहवर्तीपना संबंध है। जहां विवेक होगा, वहां धर्म होगा और जहां विवेक नहीं होगा, वहां धर्म किंचित मात्र भी नहीं हो सकता है। मुनि श्री ने बताया, सुख-दुख दोनों हमारे कर्म का निमित होता है।</p>
<p>प्रवचन में रावतभाटा के पुरुष, महिला, बालक , बालिकाएं व गुरु भक्त उपस्थित थे।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>ऐसे विचार, जो जिनवाणी से मेल नहीं रखते, उससे कल्याण नहीं</title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/aise-vichaar-jo-jinavaanee-se-mel-nahin-rakhate-usase-kalyaan-nahin/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Jul 2022 15:34:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[shreephal news]]></category>
		<category><![CDATA[मुनि शुद्ध सागर]]></category>
		<category><![CDATA[रावतभाटा चातुर्मास]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल न्यूज]]></category>
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					<description><![CDATA[श्रमण मुनि श्री शुद्धसागर जी महाराज के उद्गार अमृतचंद स्वामी द्वारा रचित पुरुषार्थ सिद्धि उपाय ग्रंथ का स्वाध्याय जारी न्यूज़ सौजन्य- इशिता जैन रावतभाटा (चितौड़गढ़)। श्रमण मुनि श्री शुद्धसागर जी महाराज जी संसघ का मंगलमय चातुर्मास रावतभाटा, चितौड़गढ़ में चल रहा है। मुनि श्री संघ श्री 1008 पारसनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, नया बाजार रावतभाटा में [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li style="text-align: left;"><strong>श्रमण मुनि श्री शुद्धसागर जी महाराज के उद्गार</strong></li>
<li style="text-align: left;"><strong>अमृतचंद स्वामी द्वारा रचित पुरुषार्थ सिद्धि उपाय ग्रंथ का स्वाध्याय जारी</strong></li>
</ul>
<p><span style="color: #ff0000;">न्यूज़ सौजन्य- इशिता जैन</span></p>
<p><strong>रावतभाटा (चितौड़गढ़)।</strong> श्रमण मुनि श्री शुद्धसागर जी महाराज जी संसघ का मंगलमय चातुर्मास रावतभाटा, चितौड़गढ़ में चल रहा है। मुनि श्री संघ श्री 1008 पारसनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, नया बाजार रावतभाटा में विराजमान हैं। मुनि श्री द्वारा आचार्य अमृतचंद स्वामी द्वारा रचित पुरुषार्थ सिद्धि उपाय ग्रंथ की स्वाध्याय करवाया जा रहा है।</p>
<p>मुनि श्री शुद्धसागर जी महाराज ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि हे जीव हमारी सोच, विचार, मान्यता सभी समिचित हैं जिसे हमने दूसरों से उधार लिया है और वही हम कर रहे हैं। मनुष्य की ऐसी कई धारणाएं हैं जो तीर्थंकर की देशना अर्थात जिनवाणी से बिल्कुल अलग होती हैं। ऐसे विचार, जो जिनवाणी से बिल्कुल ही नहीं मिलते हों, उससे हमारा कल्याण बिल्कुल ही संभव नहीं है। मुनि श्री ने श्रोताओं को समझाते हुए कहा कि जिस प्रकार कुएं का पानी शुद्ध होता है, उसमें अनेक गुण होते हैं परन्तु यदि उसमें थोड़ा सा विष डाल दिया जाए तो उस पानी के सारे गुण समाप्त हो जाते हैं। उसी प्रकार जीव धर्म को जानता नहीं है फिर भी वह तन- मन &#8211; धन से धर्म के प्रति समर्पित है तो वह धर्म को जाने बिना अपनी अहिंसा से धर्म के विपरीत ही कार्य करता है। धर्म सभा को संबोधित करते हुए गुरुवर ने कहा कि जहां धर्म होता है, वहां अहिंसा का पालन होता है और जहां जहां अधर्म होता है वहां हिंसा का पालन होता है।</p>
<p>जैनियों के लक्षण बताते हुए मुनि श्री ने कहा कि जैनी कभी भी बिना छना जल नहीं पीता है क्योंकि ग्रन्थों और वैज्ञानिक दोनों तरीके से यह प्रमाणित हो चुका है कि पानी की एक बूंद में असंख्यात जीव होते हैं।</p>
<p>उन्होंने कहा कि यदि हम दूसरों को देखकर धर्म करते हैं तो ना तो हमारा धर्म बचता है ना ही धर्म करने वाला। इस प्रकार मुनि श्री कहते हैं कि हमें अपने भावों को शुद्ध रखना चाहिए तथा तीर्थंकर की देशना अर्थात जिनवाणी सुनकर दूसरों का नहीं, बल्कि निज का कल्याण करना चाहिए। मुनि श्री ने बताया कि महावीर की अहिंसा अत्यंत सूक्ष्म है। उसका इतनी आसानी से पालन नहीं किया जा सकता है।</p>
<p>धर्मसभा में रावतभाटा श्री समाज के पुरुष वर्ग,महिला वर्ग, बालक- बालिकाएं उपस्थित थे।</p>
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