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	<title>रानी नंदा &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>भगवान शीतलनाथ जी का ज्ञान कल्याणक 18 दिसंबर को : पौष मास की कृष्ण चतुर्दशी को है ज्ञान कल्याणक  </title>
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		<pubDate>Wed, 17 Dec 2025 07:38:20 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 10वें तीर्थंकर भगवान शीतलनाथ जी का ज्ञान कल्याणक इस बार 18 दिसंबर को आ रहा है। पौष मास की कृष्ण चतुर्दशी के दिन भगवान ने केवलज्ञान प्राप्त किया था और अपनी देशना दी थी। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भक्तिपूर्वक धर्म आराधना की जाती है। श्रीफल न्यूज की विशेष श्रृंखला के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 10वें तीर्थंकर भगवान शीतलनाथ जी का ज्ञान कल्याणक इस बार 18 दिसंबर को आ रहा है। पौष मास की कृष्ण चतुर्दशी के दिन भगवान ने केवलज्ञान प्राप्त किया था और अपनी देशना दी थी। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भक्तिपूर्वक धर्म आराधना की जाती है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल न्यूज की विशेष श्रृंखला के तहत आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की संकलित और संपादित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर</strong>। जैन धर्म के 10वें तीर्थंकर भगवान शीतलनाथ जी का ज्ञान कल्याणक इस बार 18 दिसंबर को आ रहा है। पौष मास की कृष्ण चतुर्दशी के दिन भगवान ने केवलज्ञान प्राप्त किया था और अपनी देशना दी थी। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भक्तिपूर्वक धर्म आराधना की जाती है। अभिषेक और शांतिधारा के अलावा अन्य विधान पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार किए जाते हैं। जैन मान्यताओं के अनुसार वे एक सिद्ध एक मुक्त आत्मा बन गए, जिसने अपने सभी कर्मों का नाश कर दिया था। जैन मानते हैं कि शीतलनाथ का जन्म इक्ष्वाकु वंश में भद्दिलपुर में राजा द्रध्रथ और रानी नंदा के यहां हुआ था। भगवान शीतलनाथ ने भद्रिकापुर में माघ कृष्ण पक्ष की द्वादशी को दीक्षा प्राप्ति की थी। दीक्षा प्राप्ति के पश्चात् तीन महीने तक कठिन तप करने के बाद भद्रिकापुर में ही ‘प्लक्ष’ वृक्ष के नीचे पौष कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को ’कैवल्य ज्ञान’ की प्राप्ति इन्हें हुई। कालांतर में भगवान शीतलनाथ का विवाह हुआ। इसके बाद ही उन्होंने दीक्षा ली और शीघ्र ही केवलज्ञान प्राप्त कर लिया। केवल ज्ञान प्राप्त होने पर भगवान ने देशना देना प्रारंभ किया। उनकी देशना सुनकर अनेक लोगों ने उनसे दीक्षा ली। देश और काल के अनुसार तीर्थंकर भगवान की देशना होती है। भगवान शीतलनाथ जी के बारे में यह भी लिखित साक्ष्य है कि दसवें स्वर्ग में आयु पूर्ण करने के पश्चात श्री शीतलनाथ भगवान का जन्म भारत देश के भरत क्षेत्र में स्थित भद्दिलपुर नगरी में राजा दृढरथ एवं रानी नंदा के यहां हुआ।</p>
<p>भगवान शीतलनाथ जब अपनी माता के गर्भ में थे, तब एक बार उनके पिता, राजा दृढरथ को तीव्र ज्वर हो गया। ज्वर लगभग प्राणघातक था। ज्वर के कारण उन्हें भयंकर पीड़ा हो रही थी। उनके पूरे शरीर आँखों में, माथे, पेट, हर जगह में तीव्र जलन हो रही थी। तभी रानी नंदा, जिनके गर्भ में तीर्थंकर भगवान विराजमान थे ने अपने हाथों से राजा दृढरथ का स्पर्श किया और उस स्पर्श से उनके शरीर की सारी जलन दूर हो गई। उनका पूरा शरीर शीतल और सुखदायक हो गया। इसी घटना के कारण, जब भगवान का जन्म हुआ, तो उनका नाम ‘शीतलनाथ’ रखा गया।</p>
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		<title>भगवान श्रेयांसनाथ जी का गर्भ कल्याणक 18 मई को: तिथि के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी के दिन आता है गर्भ कल्याणक  </title>
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		<pubDate>Sat, 17 May 2025 14:01:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याणक इस वर्ष 18 मई को आ रहा है। इस दिन भगवान के मंदिरों में विशेष पूजन, अभिषेक तथा शांतिधारा आदि के कार्यक्रम किए जाएंगे। भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याण तिथि के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी के दिन आता है। इस दिन को लेकर जैन समाज [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याणक इस वर्ष 18 मई को आ रहा है। इस दिन भगवान के मंदिरों में विशेष पूजन, अभिषेक तथा शांतिधारा आदि के कार्यक्रम किए जाएंगे। भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याण तिथि के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी के दिन आता है। इस दिन को लेकर जैन समाज में उत्साह का माहौल है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला के तहत आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याणक इस वर्ष 18 मई को आ रहा है। इस दिन भगवान के मंदिरों में विशेष पूजन, अभिषेक तथा शांतिधारा आदि के कार्यक्रम किए जाएंगे। पुराणों के अनुसार ग्यारहवें तीर्थंकर जंबूद्वीप के भरत क्षेत्र में सिंहपुर नगर के इक्ष्वाकुवंशी राजा विष्णु और रानी नंदा के पुत्र थे। ये ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी श्रवण नक्षत्र में प्रातःकाल रानी नंदा के गर्भ में आए। इस अवसर पर सकल संसार में सुखद अनुभूति हुई। गर्भ में आने के बाद फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन विष्णुयोग में इनका जन्म हुआ। जन्म के समय रोगी निरोग हो गए थे। चारों निकाय के देवों ने आकर इनका जन्माभिषेक किया था। सौधर्मेंद्र ने जन्माभिषेक के बाद आभूषण आदि पहनाकर इनका श्रेयांस नाम रखा था। इनका जन्म शीतलनाथ के मोक्ष जाने के बाद सौ सागर, छियासठ लाख और छब्बीस हजार वर्ष कम एक करोड़ सागर प्रमाण अंतराल बीत जाने पर हुआ था। इनकी आयु चौरासी लाख वर्ष की थी। शरीर सोने की कांति के समान था।</p>
<p>ऊंचाई अस्सी धनुष थी। कुमारावस्था के इक्कीस लाख वर्ष बीत जाने पर इन्हें राज्य मिला था। इन्होंने 42 वर्ष तक राज्य किया। वसंत के परिवर्तन को देखकर इन्हें वैराग्य जागा। लौकांतिक देवों ने आकर इनकी स्तुति की। इन्होंने राज्य श्रेयस्कर पुत्र को दिया तथा विमलप्रभा पालकी में बैठकर ये मनोहर नामक वन में पहुंच गए। वहां इन्होंने दो दिन के आहार का त्याग कर फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन प्रातः बेला और श्रवण नक्षत्र में एक हजार राजाओं के साथ संयम धारण किया। इसी समय इन्हें मनरूपर्ययज्ञान हुआ। इन्हें सिद्धार्थ नगर में राजा नंद ने आहार देकर पंचाश्चर्य प्राप्त किए थे। छदमस्थ अवस्था के दो वर्ष बाद ही मनोहर उद्यान में तुंबुर वृक्ष के नीचे माघ कृष्ण अमावस्या के दिन श्रवण नक्षत्र में इन्हें केवलज्ञान हुआ। इनके संघ में कुंथु आदि 77 गणधर 13 सौ पूर्वधारी, 48 हजार 200 शिक्षक, 6 हजार अवधिज्ञानी, 6 हजार 500 केवलज्ञानी, 11 हजार विकियाऋद्धिधारी, 6 हजार मनरूपर्ययज्ञानी और 5 हजार वादी मुनि तथा एक लाख बीस हजार धारणा आदि आर्यिकाएं थीं। सम्मेदशिखर पर इन्होंने एक हजार मुनियों के साथ प्रतिमायोग धारण किया था। श्रावण शुक्ल पौर्णमासी के दिन सायंकाल के समय घनिष्ठा नक्षत्र में शेष कर्मों का क्षय करके येकृ‘अ इ उ ऋ लृ’ इन 5 लघु अक्षरों के उच्चारण में जितना समय लगता है। उतने समय में मुक्त हुए।</p>
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