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	<title>राजस्थान के जैन संत &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>राजस्थान के जैन संत &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 14 ब्रह्म श्री जयसागर जी ने गुरु वंदना को साहित्य का आधार बनाया: राजस्थान के जैन संतों में है अनुपम स्थान </title>
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		<pubDate>Tue, 11 Mar 2025 00:30:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[राजस्थान के जैन संतों की श्रंखला में अनेकोनेक संत हुए, लेकिन अपने गुरु के प्रति निष्ठावान शिष्य बिरले ही नजर आए। जिन्होंने जन साधारण के लिए साहित्य तो रचा,लेकिन अपने गुरु की वंदना के पदों को अधिक महत्ता प्रदान की। ऐसे ही जैन संत जिन्होंने राजस्थान में साहित्य के क्षेत्र में कीर्ति स्तंभ स्थापित किया [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>राजस्थान के जैन संतों की श्रंखला में अनेकोनेक संत हुए, लेकिन अपने गुरु के प्रति निष्ठावान शिष्य बिरले ही नजर आए। जिन्होंने जन साधारण के लिए साहित्य तो रचा,लेकिन अपने गुरु की वंदना के पदों को अधिक महत्ता प्रदान की। ऐसे ही जैन संत जिन्होंने राजस्थान में साहित्य के क्षेत्र में कीर्ति स्तंभ स्थापित किया है। वह हैं ब्रह्मचारी श्री जयसागर जी। <span style="color: #ff0000">जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 14वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का ब्रह्मचारी श्री जयसागर जी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जयसागर भट्टारक रत्नकीर्ति के प्रमुख शिष्यों में से थे। ये ब्रह्मचारी थे और जीवन भर इसी पद पर रहते हुए अपना आत्म विकास करते रहे थे। भट्टारक रत्नकीर्ति जिनका परिचय पूर्व में दिया जा चुका है। साहित्य के अनन्य उपासक थे। इसलिए जयसागर भी अपने गुरु के सामन ही साहित्य आराधना में लग गए। उस समय हिन्दी का विकास हो रहा था। विद्वानों और जन साधारण की रुचि हिन्दी ग्रंथों को पढ़ने में अधिक हो रही थी। इसलिए जय सागर जी ने अपना क्षेत्र हिन्दी रचनाओं तक ही सीमित रखा। जयसागर जी ने अपनी सभी रचनाओं में भट्टारक रत्नकीर्ति का उल्लेख किया है।</p>
<p><strong>गीतों में कवि ने रत्नकीर्ति के जीवन की प्रमुख घटनाओं को छंदोबद्ध</strong></p>
<p>रत्नकीर्ति के बाद होने वाले भट्टारक कुमुदचंद्र का कहीं भी नामोल्लेख नहीं किया है। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इनका भट्टारक रत्नकीर्ति के काल में ही समाधिमरण हो गया था। रत्नकीर्ति संवत 1656 तक भट्टारक रहे। इसलिए ब्रह्मचारी श्री जयसागर का समय संवत 1580 से 1655 तक का माना जा सकता है। घोघा नगर इनका प्रमुख साहित्यिक केंद्र था। ब्रह्मचारी श्री जय सागर की अब तक जितनी रचनाओं की खोज हो सकी है। उनमें नेमिनाथ गीत, जसोधर गीत, चुनड़ी गीत, पंचकल्याणक गीत, संकट हर पार्श्वजिन गीत, भट्टारक रत्नकीर्ति पूजा गीत, क्षेत्रपाल गीत, संघपति मल्लिदास नी गीत, विभिन्न पद एवं गीत तथा शीतलनाथ नी विनती शामिल हैं। जयसागर जी लघु कृतियां लिखने में विशेष रुचि रखते थे। इनके गुरु रत्नकीर्ति भी रघु रचनाओं को ही अधिक पसंद करते थे। इसलिए इन्होंने भी उसी मार्ग का अनुसरण किया। ब्रह्म श्री जयसागर रत्नकीर्ति के कट्टर समर्थक थे। उनके प्रिय शिष्य तो थे ही, लेकिन एक रूप में उनके प्रचारक भी थे। इन्होंने रत्नकीर्ति के जीवन के बारे में कई गीत लिखे और उनका जनता में प्रचार किया। रत्नकीर्ति जहां भी कहीं जाते उनके अनुयायी जयसागर द्वारा लिखे गीतों को गाते। इसके अलावा इन गीतों में कवि ने रत्नकीर्ति के जीवन की प्रमुख घटनाओं को छंदोबद्ध कर दिया है। यह सभी गीत सरल भाषा में लिखे हुए हैं, जो गुजराती से बहुत दूर एवचं राजस्थानी के अधिक निकट हैं। इस प्रकार जय सागर जी ने जीवन पर्यन्त साहित्य के विकास में जो अपना अपूर्व योगदान दिया है। वह हमेशा याद रखा जाएगा।</p>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 13 भट्टारक श्री अभयचंद्र आध्यात्मिक जादूगर बन गए:  काव्य वैभव और सौष्ठव प्रयुक्त होने की अपेक्षा प्रचार का लक्ष्य अधिक था </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Mar 2025 00:30:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[राजस्थान के जैन संतों ने जहां अपनी साधुता से जन-जन में आध्यात्मिक चेतना से जनजागरण किया। वहीं उनकी साहित्य साधना ने हिन्दी साहित्य को उस समय खूब समृद्ध किया। संतों का साहित्य के प्रति समर्पण के कारण जैन धर्म को आगे बढ़ाने में सफलता मिली। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>राजस्थान के जैन संतों ने जहां अपनी साधुता से जन-जन में आध्यात्मिक चेतना से जनजागरण किया। वहीं उनकी साहित्य साधना ने हिन्दी साहित्य को उस समय खूब समृद्ध किया। संतों का साहित्य के प्रति समर्पण के कारण जैन धर्म को आगे बढ़ाने में सफलता मिली।<span style="color: #ff0000"> जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 13वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का भट्टारक श्री अभयचंद्रजी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> अभयचंद्र नाम के दो भट्टारक हुए हैं। ‘प्रथम अभयचंद्र’ भट्टारक श्री लक्ष्मीचंद्र के शिष्य थे, जिन्होंने एक स्वतंत्र भट्टारक संस्था को जन्म दिया। उनका समय विक्रम की 16वीं शताब्दी का द्वितीय चरण था। दूसरे अभयचंद्र इन्हीं की परंपरा में होने वाले भट्टारक कुमुदचंद्र के शिष्य थे। यहां इन्हीं दूसरे अभयचंद्र जी का परिचय दिया जा रहा है। अभयचंद्र भट्टारक थे और कुमुदचंद्र की समाधि के बाद भट्टारक गादी पर बैठे थे। यद्यपि अभयचंद्र का गुजरात से काफी निकट का संबंध था, लेकिन राजस्थान में भी इनका बराबर विहार होता था और ये गांव-गांव एवं नगर-नगर में भ्रमण करके जनता से सीधा संपर्क बनाए रखते थे। अभयचंद्र अपने गुरु के योग्यतम शिष्य थे। उन्होंने भट्टारक श्री रत्नकीर्ति एवं भट्टारक श्री कुमुदचंद्र जी का काल देखा था। उनकी साहित्य साधना भी देखी थी। इसलिए जब ये प्रमुख संत बने तो इन्होंने भी उसी परंपरा को बनाए रखा। संवत 1685 की फाल्गुन सुदी 11 सोमवार के दिन बारडोली नगर में इनका पट्टाभिषेक हुआ। इस पद पर संवत 1721 तक रहे।</p>
<p><strong>संस्कृत और प्राकृत ग्रंथों का उच्च अध्ययन किया</strong></p>
<p>अभयचंद्र का जन्म संवत 1640 के लगभग हूंबड वंश में हुआ था। इनके पिता का नाम श्रीपाल और माता का नाम कोडमदे था। बचपन से ही बालक अभयचंद्र को साधुओं की मंडली में रहने का अवसर मिला। हेम जी कुंअर जी इनके भाई थे। ये संपन्न घराने के थे। युवावस्था के पहले ही इन्होंने पांचों महाव्रतों का पालन प्रारंभ कर दिया था। इसी के साथ इन्होंने संस्कृत और प्राकृत ग्रंथों का उच्चाध्ययन किया। न्यायशास्त्र में पारंगतता प्राप्त की। अलंकार शास्त्र एवं नाटकों का गहरा अध्ययन किया। अच्छे वक्ता तो ये प्रारंभ से ही थे। विद्वता होने से सोने पर सुहागा सा समन्वय हो गया। जब उन्होंने युवावस्था में पदार्पण किया तो त्याग एवं तपस्या के प्रभाव से इनकी मुखाकृति स्वयंमेव आकर्षक बन गई। जनता के लिए ये आध्यात्मिक जादूगर बन गए। इनके सैकड़ों शिष्य थे। जो स्थान-स्थान पर ज्ञान दान किया करते थे।</p>
<p><strong>अभयचंद्र जी के प्रमुख शिष्य</strong></p>
<p>इनके प्रमुख शिष्यों में गणेश, दामोदर, धर्मसागर, देवजी व रामदेव के नाम प्रमुख हैं। जितनी अधिक प्रशंसा शिष्यों ने इनकी की है। अन्य भट्टारकों की उतनी प्रशंसा देखने में नहीं आती है। एक बार भट्टारक अभयचंद्र का सूरत नगर में आगमन हुआ। वह संवत 1706 का समय था। सूरत नगर निवासियों ने उस समय इनका भारी स्वागत किया। घर-घर उत्सव किया। कुंकुम छिड़का गया। अंग पूजा का आयोजन किया गया।</p>
<p><strong>भट्टारक श्री अभयचंद प्रचारक के साथ-साथ साहित्य निर्माता भी</strong></p>
<p>भट्टारक श्री अभयचंद प्रचारक के साथ-साथ साहित्य निर्माता भी थे। यद्यपि अभी तक उनकी अधिक रचनाएं उपलब्ध नहीं हो सकी हैं, लेकिन फिर भी उन प्राप्त रचनाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि उनकी कोई बड़ी रचना भी मिलनी चाहिए। कवि ने लघु गीत अधिक लिखे हैं। इसका प्रमुख कारण तत्कालीन साहित्यिक वातावरण ही था।</p>
<p><strong>इन कृतियों के माध्यम से फैली कीर्ति</strong></p>
<p>अब तक इनकी ये कृतियां उपलब्ध हो चुकी हैं। वासुपूज्यनी धमाल, चंदागीत, सूखड़ी, चतुर्विशति तीर्थंकर लक्षण गीत, पद्मावती गीत, नेमिश्वरस्तु ज्ञान कल्याणक गीत, आदिश्वरनाथनु पंच कल्याणक गीत, बलभद्र गीत आदि हैं। ये सभी रचनाएं लघु कृतियां हैं। यद्यपि काव्यतत्व, शैली एवं भाषा की दृष्टि से ये उच्चस्तरीय रचनाएं नहीं हैं, लेकिन तत्कालीन समय जनता की मांग पर ये रचनाएं लिखी गईं थी। इसलिए इनमें कवि का काव्य वैभव और सौष्ठव प्रयुक्त होने की अपेक्षा प्रचार का लक्ष्य अधिक था। भाषा की दृष्टि से भी इनका अध्ययन आवश्यक है। राजस्थानी भाषा की ये रचनाएं हैं तथा उसका प्रयोग कवि ने अत्यधिक सावधानी से किया है। गुजराती भाषा का प्रयोग तो स्वभावतः ही हो गया है। इस प्रकार कविवर अभयचंद्र ने अपनी लघु रचनाओं के माध्यम से हिन्दी साहित्य की जो महती सेवा की थी। वह सदा स्मरणीय रहेगी ।</p>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 12 बारडोली के संत श्री कुमुदचंद्र जी का साहित्य को अमूल्य योगदान: उनकी गुजरात और राजस्थान में अच्छी प्रतिष्ठा थी </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 09 Mar 2025 00:30:32 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[राजस्थान को जैन संतों की भूमि के रूप में ख्याति अर्जित है। प्राचीन काल में भी यहां कई दिव्य संतों का जन्म और भ्रमण हुआ है। संत श्री कुमुदचंद्र जी ऐसे ही संत थे। वे संवत 1656 तक भट्टारक रहे। इतने लंबे समय में इन्होंने देश के अनेक स्थानों पर विहार किया। जन साधारण को [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>राजस्थान को जैन संतों की भूमि के रूप में ख्याति अर्जित है। प्राचीन काल में भी यहां कई दिव्य संतों का जन्म और भ्रमण हुआ है। संत श्री कुमुदचंद्र जी ऐसे ही संत थे। वे संवत 1656 तक भट्टारक रहे। इतने लंबे समय में इन्होंने देश के अनेक स्थानों पर विहार किया। जन साधारण को धर्म आध्यात्म का पाठ पढ़ाया। वे अपने समय के असाधारण संत थे। उनकी गुजरात और राजस्थान में अच्छी प्रतिष्ठा थी। जैन साहित्य एवं सिद्धांत का उन्हें अप्रतिम ज्ञान था। <span style="color: #ff0000">जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 12वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का संत श्री कुमुदचंद्रजी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> बारडोली गुजरात का प्राचीन नगर है। वर्ष 1921में यहां सरदार वल्लभ भाई पटेल ने स्वतंत्रता के लिए सत्याग्रह का बिगुल बजाया था। बाद में वहीं की जनता ने उन्हें सरदार की उपाधि दी थी। 350 वर्ष पूर्व भी यह नगर आध्यात्म का केंद्र था। यहां पर ही संत श्री कुमुदचंद्र को उनके गुरु भट्टारक श्री रत्न कीर्ति जी एवं जनता ने भट्टारक पद पर आरूढ़ किया थ्ज्ञा। इन्होंने यहां के निवासियों में धार्मिक चेतना जाग्रत की। उन्हें सद्चरित्रता, संयम एवं त्यागमय जीवन अपनाने पर बल दिया। इन्होंने गुजरात एवं राजस्थान में साहित्य, आध्यात्म एवं धर्म की त्रिवेणी बहायी। संतश्री कुमुदचंद्रजी वाणी से मधुर, शरीर से सुंदर तथा मन से स्वच्छ थे। जहां भी उनका विहार होता जनता उनके पीछे हो जाती।</p>
<p><strong>संतश्री कुमुदचंद्रजी का जन्म गोपुर गांव में हुआ था</strong></p>
<p>शिष्यों ने अपने गुरु की प्रशंसा में विभिन्न पद लिखे। संयमसागर ने उनके शरीर को 32 लक्षणों से सुशोभित, गंभीर बुद्धि के धारक तथा वादियों के पहाड़ को तोड़ने के लिए व्रज समान कहा है। उनके दर्शन मात्र से ही प्रसन्नता होती थी। वे पांच महाव्रत तेरह प्रकार के चारित्र को धारण करने वाले और 22 परिषह को सहने वाले थे। एक दूसरे शिष्य धर्मसागर ने उनकी पात्र केशरी, जंबुकुमार, भद्रबाहु एवं गौतम गणधर से तुलना की है। उनके विहार के समय कुंकुम छिड़कने तथा मोतियों का चौक पूरने तथा बधावा गाने के लिए भी कहा जाता था। जीवों की दया करने के कारण लोग उन्हें दया का वृक्ष कहते थे। विद्याबल से उन्होंने अनेक विद्वानों को अपने वश में कर लिया था। संतश्री कुमुदचंद्रजी का जन्म गोपुर गांव में हुआ था। पिता का नाम सदाफल एवं माता का नाम पद्माबाई था। इन्होंने मोढ़ वंश में जन्म लिया था। वे जन्म से ही होनहार थे। युवावस्था से पूर्व ही उन्होंने संयम धारण कर लिया था। अध्ययन की ओर विशेष ध्यान था।</p>
<p><strong>कुमुदचंद्र जी बारडोली के संत कहलाने लगे</strong></p>
<p>ये रात-दिन व्याकरण, नाटक, न्याय आगम एवं छंद अलंकार शास्त्र आदि का अध्ययन करते थे। गोम्मट खार आदि ग्रंथों का इन्होंने विशेष अध्ययन किया था। विद्यार्थी अवस्था में ही ये भट्टारक रत्नकीर्तिजी के शिष्य बन गए थे। बारडोली में श्री रत्नकीर्ति जी ने इनको अपना पट्ट स्थापित किया था और संवत 1656 वैशाख मास में इनका जैेनों के प्रमुख संत भट्टारक के पद पर अभिषेक कर दिया। यह सारा कार्य संघपति कान्हजी, संघ बहन जीवादे, सहस्त्रकरण और उनकी धर्मपत्नी तेजलदे, भाई मल्लदास, बहन मोहनदे, गोपाल आदि की उपस्थिति में हुआ। तभी से कुमुदचंद्र जी बारडोली के संत कहलाने लगे थे।</p>
<p><strong>सभी रचनाएं राजस्थानी भाषा में हैं</strong></p>
<p>कुमुदचंद्रजी आध्यात्मिक एवं धार्मिक संत होने के साथ ही साहित्य के परम आराधक थे। अब तक इनकी छोटी-बड़ी 28 रचनाएं और 30 से अधिक पद प्राप्त हो चुके हैं। ये सभी रचनाएं राजस्थानी भाषा में हैं। जिन पर गुजराती का भी प्रभाव है। ऐसा माना जाता है कि ये चिंतन,मनन और धर्मोपदेश के अतिरिक्त अपना सारा समय साहित्य सृजन में लगाते थे। नेमिनाथ के तारणद्वार पर आकर वैराग्य धारण करने की अद्भुत घटन से ये अपने गुरु रत्नकीर्ति जी के सामन बहुत प्रभावित थे। इसलिए इन्होंने नेमिनाथ और राजुल पर कई रचनाएं लिखी हैं। उनमें नेमिनाथ बारहमासा,नेमिश्वर गीत, नेमिजिन गीत आदि उल्लेखनीय है।</p>
<p><strong>संतश्री कुमुदचंद जी का शिष्य परिवार</strong></p>
<p>संत श्री कुमुदचंद्र जी संवत 1656 तक भट्टारक रहे। इतने लंबे समय में इन्होंने देश के अनेक स्थानों पर विहार किया। जन साधारण को धर्म आध्यात्म का पाठ पढ़ाया। वे अपने समय के असाधारण संत थे। उनकी गुजरात और राजस्थान में अच्छी प्रतिष्ठा थी। जैन साहित्य एवं सिद्धांत का उन्हें अप्रतिम ज्ञान था। वैसे तो भट्टारकों के बहुत से शिष्य हुआ करते थे। इनमें आचार्य, मुनि, ब्रह्मचारी, आर्यिका आदि होते थे। अभी जो रचनाएं उपलब्ध हैं। उनमें अभयचंद, ब्रह्मसागर, धर्मसागर,संयमसागर, जयसागर, गणेशसागर आदि के नाम प्रमुख है। ये सभी शिष्य हिन्दी ओर संस्कृत के अच्छे विद्वान थे।</p>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 11 आध्यात्म और भक्तिपरक पदों के रचियता भट्टारक श्री रत्नकीर्ति जी:  रचनाएं भाषा, भाव और शैली सभी दृष्टियों से श्रेष्ठ </title>
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		<pubDate>Sat, 08 Mar 2025 00:30:05 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[राजस्थान के जैन संतों ने जहां अपनी साधना से जनमानस को धर्म और आध्यात्म की ओर प्रेरित किया। वहीं मुनियों, साधुओं ने हिन्दी साहित्य में काव्य और भक्ति पदों के जरिये भी धर्म प्रभावना की अलख जगाई। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 11वीं कड़ी में श्रीफल जैन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>राजस्थान के जैन संतों ने जहां अपनी साधना से जनमानस को धर्म और आध्यात्म की ओर प्रेरित किया। वहीं मुनियों, साधुओं ने हिन्दी साहित्य में काव्य और भक्ति पदों के जरिये भी धर्म प्रभावना की अलख जगाई। <span style="color: #ff0000">जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 11वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का भट्टारक श्री रत्नकीर्ति जी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> भट्टारक श्री रत्नकीर्ति दिगंबर जैन कवियों में प्रथम कवि हैं। जिन्होंने इतनी अधिक संख्या में हिन्दी पद लिखे हैं। ऐसा मालूम होता है कि उस समय कबीरदास, सूरदास और मीरा के पदों का देश में पर्याप्त प्रचार हो गया था और उन्हें अत्यधिक चाव से गाया जाता था। इन पदों के कारण देश में भगवत भक्ति की ओर लोगों का स्वतः ही झुकाव हो रहा था। ऐसे समय में जैन साहित्य में इस कमी को पूरी करने के लिए भट्टारक श्री रत्नकीर्तिजी ने इस दिशा में प्रयास किया। आध्यात्म और भक्तिपरक पदों के साथ-साथ विरहात्मक पद भी लिखे और पाठकों के समक्ष राजुल के जीवन को एक नए रूप में प्रस्तुत किया। ऐसा लगता है कि कवि राजुल एवं नेमिनाथ की भक्ति में अधिक रुचि रखते हैं। इसलिए उन्होंने अपनी कृतियां इन्हीं दो पर आधारित करके लिखीं।</p>
<p>नेमिनाथ गीत और नेमिनाथ बारहमासा के अतिरिक्त अपने हिन्दी पदों में राजुल नेमि के संबंध को अत्यधिक भावपूर्ण भाषा में प्रस्तुत किया। सर्वप्रथम राजुल को इन्होंने नारी के रूप में प्रस्तुत किया। विवाह होने के पूर्व की नारी की दशा और तोरणद्वार से लौट जाने पर नारी ह्दय को खोलकर अपने पदों में रख दिया। भट्टारक श्री रत्नकीर्ति जी की सभी रचनाएं भाषा, भाव और शैली सभी दृष्टियों से श्रेष्ठ हैं। कवि हिन्दी के जबरदस्त प्रचारक थे। संस्कृत के उत्कृष्ट विद्वान होने पर भी उन्होंने हिन्दी को अधिक प्रश्रय दिया। उन्होंने राजस्थान के अलावा गुजरात में भी हिन्दी रचनाएं लिखीं। भट्टारकश्री रत्नकीर्ति के सभी शिष्य और प्रशिष्यों ने इस भाषा में लेखन जारी रखा। हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाने में योगदान दिया।</p>
<p><strong>भट्टारक श्री रत्नकीर्ति जी का जन्म और उनके कार्य</strong></p>
<p>14वीं शताब्दी में जब भट्टारक बांगड़ प्रदेश में धर्म और साहित्य प्रचार कर रहे थे। उस समय वह लहर चरम पर थी। नए-नए मंदिरों का निर्माण और प्रतिष्ठा विधानों की भरमार थी। भट्टारकों, मुनियों, साधुओं, ब्रह्मचारियों और स्त्री साधुओं का विहार होता रहता था। उनके संदेश और उपदेश जन-जन को पावन किया करते थे। वे जहां भी जाते वहां की जनता पलक-पावड़े बिछा देती। उसी समय घोघानगर में हूंबड जाति के श्रेष्ठी देवीदास के यहां बालक का जन्म हुआ। माता सहजलदे विविध कलाओं से युक्त बालक को पाकर बहुत खुश हो गई। जन्मोत्सव में नगर में कई प्रकार के उत्सव किए गए।</p>
<p>बड़े होने पर वह विद्याध्ययन करने लगा। उसने बहुत कम समय में प्राकृत और संस्कृत ग्रंथों का गहरा अध्ययन कर लिया। एक दिन अचानक भट्टारकश्री अभयनंदी से साक्षात्कार हो गया। वे उसे देखते ही प्रसन्न हुए और उसकी विद्धत्ता और वाक चातुर्यता से प्रभावित होकर उसे अपना शिष्य बना लिया। अभयनंदी ने पहले उसे सिद्धांत, काव्य, व्याकरण, ज्योतिष एवं आयुर्वेद आदि विषयों के ग्रंथों का अध्ययन करवाया। वह व्युत्पन्नमति था इसलिए शीघ्र ही उसने उन पर अधिकार पा लिया। अध्ययन समाप्त होने के बाद अभयनंदी ने उसे अपना पट्ट शिष्य घोषित कर दिया। 32 लक्षण और 72 कलाओं से संपन्न विद्वान युवक को कौन अपना शिष्य बनाना नहीं चाहेगा। संवत 1643 में एक विशेष समारोह में उसका महाभिषेक कर दिया गया और उसका नाम रत्नकीर्ति रखा गया। इस पद पर वे संवत 1656 तक रहे।</p>
<p><strong>भट्टारक श्री रत्नकीर्ति जी का शिष्य परिवार</strong></p>
<p>भट्टारक श्री रत्नकीर्ति के कितने ही शिष्य थे। वे सभी विद्वान और साहित्य प्र्रेमी थे। इनके शिष्यों की कितनी ही कविताएं हैं। इसमें कुमुदचंद, गणेश, जय सागर, राघव के नाम उल्लेखनीय है।</p>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 10  संतश्री सुमतिकीर्ति जी ने केवल साहित्य साधना से ही जैन समाज को किया जाग्रतः हिन्दी, संस्कृत, प्राकृत और राजस्थानी के थे प्रकांड विद्वान </title>
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		<pubDate>Fri, 07 Mar 2025 00:30:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म में राजस्थान में संतों और साधुओं ने जहां अपनी तप और साधना के बल पर जन जागृति का अलख जगाया तो कुछ संत ऐसे भी हैं जिन्होंने केवल अपने साहित्य साधना से ही धर्म, संयम और उपासना के साथ आराधना के महत्व को प्रतिपादित किया। ऐसे संतों में एक नाम संत श्री सुमति [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म में राजस्थान में संतों और साधुओं ने जहां अपनी तप और साधना के बल पर जन जागृति का अलख जगाया तो कुछ संत ऐसे भी हैं जिन्होंने केवल अपने साहित्य साधना से ही धर्म, संयम और उपासना के साथ आराधना के महत्व को प्रतिपादित किया। ऐसे संतों में एक नाम संत श्री सुमति कीर्ति का नाम आता है। इन्होंने कई रचनाओं के माध्यम से जन जागरण किया। <span style="color: #ff0000">जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 10वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का संतश्री सुमतिकीर्ति जी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p>एक ही काल में दो संत एक ही नाम के</p>
<p>सुमति कीर्ति नाम वाले अब तक विभिन्न संतों का नामों का उल्लेख मिलता है। इनमें दो सुमति कीर्ति एक ही समय हुए और दोनों ही अपने समय के अच्छे विद्वान माने जाते रहे। इन दोनों में एक का भट्टारक ज्ञानभूषण के शिष्य के रूप में और दूसरे का भट्टारक श्री शुभचंद जी के शिष्य के रूप में उल्लेख मिलता है। आचार्य श्री सकल भूषण ने श्री सुमति कीर्ति का भट्टारक श्री शुभचंदजी के शिष्य के रूप में अपनी उपदेश रत्न माला में उल्लेख किया है। दूसरे सुमति कीर्ति का उल्लेख भट्टारक श्री ज्ञानभूषण के शिष्य के रूप में जानकारी मिलती है।</p>
<p><strong>धर्म परीक्षा रास सबसे बड़ी कृति</strong></p>
<p>सुमतिकीर्ति 16-17 शताब्दी के विद्वान थे। गुजरात और राजस्थान दोनों ही प्रदेश इनके पद चिन्हों से पावन हुए थे। साहित्य सृजन और आत्म साधना ही इनके जीवन का मुख्य लक्ष्य था, लेकिन इससे बढ़कर था, इनका गांव-गांव जाकर जन-जाग्रति फैलाना। लोग अशिक्षित थे और मूढ़ताओं के चक्कर में फंसे हुए थे। वास्तविक धर्म की ओर इनका ध्यान कम हो गया था और मिथ्या आडंबरों की ओर प्रवृति होने लगी थी। यही कारण है कि इन्होंने ‘धर्म परीक्षा रास’ की सबसे पहले रचना की। यह इनकी सबसे बड़ी कृति भी है। जिससे ‘अमितिगति आचार्य’ द्वारा निबद्ध &#8216;धर्म परीक्षा&#8217; का सार रूप में वर्णन है। कवि की अन्य रचनाएं लघु होते हुए भी काव्यत्व शक्ति से परिपूर्ण हैं। गीत, पद और संवाद के रूप में इन्होंने जो रचनाएं प्रस्तुत की हैं, वे पाठक की रुचि को जाग्रत करने वाली हैं।</p>
<p><strong>भट्टारक श्रीवीरचंद के शिष्य थे श्री सुमति</strong></p>
<p>श्री सुमति कीर्ति मूलसंध में स्थित नंदी संघ बलात्कारगण एवं सरस्वती गच्छ के भट्टारक श्रीवीरचंद के शिष्य थे। इनके पूर्व भट्टारक श्री लक्ष्मीभूषण, श्री मल्लिभूषण और श्री विद्यानंदी हो चुके थे। संतश्री सुमतिकीर्ति जी ने &#8216;प्राकृत पंच संग्रह टीका&#8217; को संवत 1620 में भाद्रपद शुक्ल दशमी के दिन ईडर के ऋषभदेव मंदिर में पूर्ण की थी। इस टीका का संशोधन भी भट्टारक श्री ज्ञानभूषण ने किया था।</p>
<p><strong> साहित्य साधना को दी प्रमुखता</strong></p>
<p>सुमतिकीर्ति संत थे और भट्टारक पद की उपेक्षा करके साहित्य साधना में अपनी विषेष रुचि रखते थे। एक भट्टारक विरदावली में ज्ञानभूषण की प्रशंसा करते समय उनके शिष्यों के नाम गिनाए तो संत श्री सुमतिकीर्ति को सिद्धांतवेदी एवं र्निग्रंथाचार्य दो विशेषण से अलंकृत किया गया। वे संस्कृत, प्राकृत हिन्दी और राजस्थानी के अच्छे विद्वान थे। साधु बनने के बाद इन्होंने अपना अधिकांश जीवन साहित्य साधना में लगाया और साहित्य जगत को कितनी ही रचनाएं भेंट की।</p>
<p><strong>सुमतिकीर्ति जी की प्रमुख और प्रेरणादायी रचनाएं</strong></p>
<p>इनकी प्रसिद्ध रचनाओं में कर्मकांड टीका, पंचसंग्रह टीका, धर्म परीक्षा रास, जिनवर स्वामी विनती, जिह्वा दंत विवाद, वसंत विद्या विलास, पद (काल अने तो जीव बहुं परिभ्रमतां) और शांतिनाथ गीत आदि ने खूब ख्याति अर्जित की है। ‘धर्म परीक्षा रास’ का रचना काल 1625 का बताया गया है।</p>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 9 साधु जीवन को पूरी तरह निभाते और गृहस्थों को संयमित जीवन का उपदेश देते - भट्टारक श्रीवीरचंदः राजस्थान, गुजरात सहित कई प्रांतों में फैली थी कीर्ति </title>
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		<pubDate>Thu, 06 Mar 2025 00:30:39 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन दर्शन, धर्म और संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाने और इस संप्रदाय की नींव को मजबूत बनाने के लिए राजस्थान की धरती पर जैन संतों ने जन्म लेकर राजस्थान ही नहीं गुजरात, बिहार, पंजाब और मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र आदि प्रांतों में धर्म ध्वजा को फहराया। ऐसे संतों में से एक संत हैं श्रीवीरचंद जी। जैन धर्म [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>जैन दर्शन, धर्म और संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाने और इस संप्रदाय की नींव को मजबूत बनाने के लिए राजस्थान की धरती पर जैन संतों ने जन्म लेकर राजस्थान ही नहीं गुजरात, बिहार, पंजाब और मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र आदि प्रांतों में धर्म ध्वजा को फहराया। ऐसे संतों में से एक संत हैं श्रीवीरचंद जी। <span style="color: #ff0000">जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 9वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का भट्टारक श्रीवीरचंदजी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p>श्रीवीरचंद जी की विद्वत्ता के सभी थे कायल</p>
<p>संत शिरोमणि श्री वीरचंद भट्टारक श्री लक्ष्मीचंद के शिष्य थे। इन्ही के स्वर्गवास के बाद भट्टारक बने थे। यद्यपि इनका सूरत गादी से संबंध था, लेकिन यह राजस्थान के अधिक समीप थे और इस प्रदेश में खूब विहार किया करते थे। संत श्री वीरचंद प्रतिभा संपन्न विद्वान थे। व्याकरण और न्याय शास्त्र के प्रकांड वेत्ता थे। छंद, अलंकार, संगीत शास्त्र के ममर्ज्ञ थे। वे जहां जाते अपने भक्तों की संख्या बढ़ा लेते। विरोधियों का सफाया कर देते। वाद-विवाद में उनसे जीतना बढ़े-बढ़े महारथियों के लिए सहज नहीं था। वे अपने साधु जीवन को पूरी तरह निभाते और गृहस्थों को संयमित जीवन रखने का उपदेश देते। संत शिरोमणि श्री वीरचंद जी ने नवसारी के शासक अर्जुन जीवराज से खूब सम्मान पाया तथा 16 वर्ष तक नीरस आहार ग्रहण किया। श्री वीरचंद जी की विद्वत्ता का इनके बाद होने वाले कितने ही विद्वानों ने उल्लेख किया है।</p>
<p><strong>कई भाषाओं के ज्ञाता थे संत श्री वीरचंद जी</strong></p>
<p>संतश्री वीरचंद जी महाराज जबरदस्त साहित्य सेवी थे। वे संस्कृत, प्राकृत, हिन्दी एवं गुजराती के पारंगत विद्वान थे। यद्यपि अब तक उनकी केवल 8 रचनाएं ही उपलब्ध हो सकी थी, लेकिन और उनकी विद्वत्ता का परिचय देने के लिए पर्याप्त हैं।</p>
<p><strong>ये हैं इनकी प्रमुख रचना</strong></p>
<p>इनकी रचनाओं में वीर विलास फाग, जंबूस्वामी वेलि, जिन आंतरा, सीमंधर स्वामी गीत, संबोध सत्ताणु, नेमिनाथ रास, चित्तनिरोध कथा, बाहुबलि वेली शामिल थे। इनकी रचनाओं का काल और फाग के रचनाकाल का कहीं भी उल्लेख नहीं किया है।</p>
<p><strong>रचनाएं संवत 1600 से पहले की</strong></p>
<p>यह रचना संवत 1600 के पहले की मालूम होती है। इस प्रकार भट्टारक श्री वीरचंद की अब तक जो कृतियां उपलब्ध हुई हैं। वे इनके साहित्य प्रेम का परिचय प्राप्त करने के लिए पर्याप्त हैं। राजस्थान एवं गुजरात के शास्त्र भंडारों की पूर्ण खोज होने पर इनकी अभी और भी रचनाएं प्रकाश में आने की उम्मीद है।</p>
<p><strong>संतश्री वीरचंद जी ने राजस्थान में खूब विहार किया</strong></p>
<p>भट्टारकीय बलात्कारगण शाखा के संस्थापक भट्टारक श्री देवेंद्रकीति थे, जो संत शिरोमणि भट्टारक पद्मनंदी के शिष्यों में से थे। जब देवेंद्रकीर्ति ने सूरत में भट्टारक गादी की स्थापना की थी, तब भट्टारक श्रीसकल कीर्ति का राजस्थान एवं गुजरात में जबरदस्त प्रभाव था और संभवतः इसी प्रभाव को कम करने के लिए श्री देवेंद्रकीर्ति जी ने एक और नई भट्टारक संस्था को जन्म दिया।</p>
<p><strong>श्री लक्ष्मीचंद जी के शिष्य थे श्री वीरचंद जी</strong></p>
<p>भट्टारक श्री देवेंद्रकीर्ति के पीछे और श्रीवीरचंदजी के पहले तीन और भट्टारक हुए। इनके नाम श्री विद्यानंदी संवत(1499-1537),श्री मल्लिभूषण(1544-1555) और श्रीलक्ष्मीचंदजी(1556-1582)। श्री वीरचंदजी श्री लक्ष्मीचंद के शिष्य थे और इन्हीं के स्वर्गवास के बाद श्रीवीरचंद जी भट्टारक बने थे। यद्यपि इनका सूरत गादी से संबंध थ, लेकिन ये राजस्थान के अधिक समीप थे और इस प्रदेश में खूब विहार करते थे।</p>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 8 जैन श्रावकों को सत्य, अहिंसा के साथ सधार्मिक होने का अवसर किया प्रदान - भट्टारक श्री शुभचंद : अपनी प्रतिष्ठा एवं पद का खूब अच्छी तरह से किया सदुपयोग </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/provided_an_opportunity_to_jain_disciples_to_be_religious_with_truth_and_non_violence/</link>
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		<pubDate>Wed, 05 Mar 2025 00:30:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[राजस्थान में जन्मे संत, साधु और मुनियों में से अधिकांश साहित्य प्रेमी, धर्म प्रचारक और शास्त्रों के प्रखर ज्ञाता रहे हैं। इसी के चलते यहां की पुण्य धरती ने संतों की वाणी से जैन धर्म को भी प्रखरता प्रदान की है। सेवा, विद्वता और सांस्कृतिक जागरूकता से ओतप्रोत संतवाणी ने जगत का कल्याण तो किया [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>राजस्थान में जन्मे संत, साधु और मुनियों में से अधिकांश साहित्य प्रेमी, धर्म प्रचारक और शास्त्रों के प्रखर ज्ञाता रहे हैं। इसी के चलते यहां की पुण्य धरती ने संतों की वाणी से जैन धर्म को भी प्रखरता प्रदान की है। सेवा, विद्वता और सांस्कृतिक जागरूकता से ओतप्रोत संतवाणी ने जगत का कल्याण तो किया ही जैन श्रावकों को भी सत्य, अहिंसा के साथ सधार्मिक होने का अवसर प्रदान किया। <span style="color: #ff0000">जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में आठवीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का भट्टारक श्री शुभचंदजी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
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<p>श्री शुभचंद जी श्री विजयकीर्ति जी के थे शिष्य</p>
<p>श्री शुभचंद जी भट्टारक श्री विजयकीर्ति जी के शिष्य थे। वे अपने समय के प्रसिद्ध भट्टारक, साहित्य सेवी, धर्म के प्रचारक और कई शास्त्रों के विद्वान थे। जब श्री शुभचंद जी भट्टारक बने तब भट्टारक श्री सकलकीर्ति और उनके शिष्य और पट्ट शिष्य, प्रशिष्य श्री भुवनकीर्ति जी, श्री ज्ञानभूषण जी और श्री विजयकीर्ति जी ने अपनी सेवा, विद्वता, सांस्कृतिक चेतना से सकारात्मक माहौल बना लिया था। जिससे इन संतों के प्रति जैन समाज में ही नहीं अपितु जैनेतर समाज में भी अगाध श्रद्धा ने जगह बना ली थी। श्री शुभचंद जी ने भट्टारक श्री ज्ञानभूषण जी, श्री विजयकीर्ति जी का काल देखा था। वे श्री विजयकीर्ति जी के लाड़ले शिष्य तो थे ही वे उनके सभी शिष्यों में सबसे अधिक प्रतिभावान संत भी थे। इसीलिए भट्टारक श्री विजयकीर्ति के स्वर्गवास के बाद इन्हें उस समय के सबसे प्रतिष्ठित, सम्मानित और आकर्षक पद पर प्रतिष्ठापित किया गया।</p>
<p><strong>40 वर्षों तक साहित्य और समाज की सेवा की</strong></p>
<p>भट्टारक श्री शुभचंद जी का जन्म संवत 1530-1540 के बीच माना जाता है। ये जब बालक थे, तभी से इनका संपर्क भट्टारकों से हो गया था। प्रारंभ में इन्होंने अपना समय संस्कृत और प्राकृत भाषा के ग्रंथों को अध्ययन करने में लगाया। इतना ही नहीं व्याकरण और छंद शास्त्र में निपुणता प्राप्त की। इसके बाद ये भट्टारक श्री ज्ञानभूषण एवं श्री विजयकीर्ति के सानिध्य में रहने लगे। वे संवत 1573 में भट्टारक बने और संवत 1613 तक रहे। इन्होंने अपनी प्रतिष्ठा एवं पद का खूब अच्छी तरह से सदुपयोग किया और 40 वर्षों में राजस्थान, पंजाब, गुजरात, उत्तरप्रदेश में साहित्य एवं संस्कृति का उल्लेखनीय वातावरण निर्मित किया।</p>
<p><strong>गुजरात से लेकर उ.प्र. तक से आने लगे निमंत्रण</strong></p>
<p>भट्टारक श्री शुभचंद ने शुरू में खूब अध्ययन किया। भाषण देने और शास्त्रार्थ करने की कला सीखी। भट्टारक बनने के बाद इनकी कीर्ति सभी दिशाओं में फैलने लगी। राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तरप्रदेश के कई गांवों और नगरों से निमंत्रण मिलने लगे। जनता इनके धर्मोपदेश सुनने के लिए अधीर रहने लगी। ये जहां भी जाते भक्त जनों के पलक-पावड़े बिछ जाते। इनकी वाणी में अद्भुत आकर्षण था। इसलिए एक बार के संपर्क में वे किसी भी अच्छे व्यक्ति को अपना भक्त बनाने में समर्थ हो जाते। संवत 1590 में ईडर नंबर के हूंबड़ जातीय श्रावकों ने ब्रह्मचारी श्री तेजपाल जी से पुण्यास्रव कथा कोश की प्रति लिखवाकर इन्हें भेंट की थी।</p>
<p><strong>संवत 1617 में पूरा हुआ पांडव पुराण</strong></p>
<p>संवत 1599 में डूंगरपुर के आदिनाथ चैत्यालय में इन्हीं के उपदेश से अंग प्रज्ञप्ति की प्रतिलिपि करवाकर विराजमान की गई थी। चंदना चरित को इन्होंने वाग्वर बागड़ में लिखा। कार्क्तिकेयानुप्रेक्षा टीका को संवत 1613 में सागवाड़ा में समाप्त की। संवत 1617 में पांडव पुराण को हिसार में पूरा किया गया।</p>
<p><strong>श्री शुभचंद जी की शिष्य परंपरा</strong></p>
<p>यूं तो भट्टारकों के संघ में कितने ही मुनि, ब्रह्मचारी, साध्वियां तथा विद्वानगण रहते हैं। इसलिए इनके संघ में भी कितने ही साधु थे, लेकिन कुछ प्रमुख शिष्य थे। इनमें श्री सकलभूशण, ब्रह्मचारी तेजपाल, वर्णी क्षेमचंद, सुमतिकीर्ति, श्री भूषण आदि के नाम प्रमुख है।</p>
<p><strong>प्रतिष्ठा समारोहों का संचालन</strong></p>
<p>भट्टारक श्री शुभचंद ने भी कितने ही प्रतिष्ठा समारोह में भाग लिया। वहां होने वाले विधानों को पूरा कराने में अपना पूर्ण योगदान दिया। इनके द्वारा प्रतिष्ठित कितनी ही मूर्तियां आज भी उदयपुर, सागवाड़ा, डूंगरपुर, जयपुर आदि मंदिरों में विराजमान है। पंचायतों की ओर से प्रतिश्ठा समारोहों में सम्मिलित होने के लिए इन्हें विधिवत निमंत्रण पत्र मिलते थे। संवत 1607 में इन्हीं के उपदेश से पंचपरमेष्ठी की मूर्ति की स्थापना की गई थी।</p>
<p><strong>इनकी हिन्दी और संस्कृत रचनाएं</strong></p>
<p>भट्टारक श्री शुभचंद जी की हिन्दी और संस्कृत रचनाओं ने खूब जग और जन जागरण किया। इनकी संस्कृत रचनाओं में चंद्रप्रभ चरित्र, करकंडु चरित्र, कार्त्तिकेयानुप्रेक्षा टीका, चंदना चरित्र, जीवंधर चरित्र, पांडव पुराण, श्रेणिक चरित्र सहित 24 रचनाएं हैं। वहीं हिन्दी रचनाओं में महावीर छंद, विजयकीर्ति छंद, गुरु छंद, नेमिनाथ छंद, तत्वसार दूहा, दान छंद, अष्टाहिन्का गीत, क्षेत्रपाल गीत एवं पद आदि प्रसिद्ध रही हैं।</p>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 7 महाव्रती संतश्री यशोधरजी ने पांच व्रतों को जीवन में उतार दिया : भगवान नेमिनाथ का गीतों में किया गान, राजस्थान की धरती को बनाया महान </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 04 Mar 2025 00:30:01 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जगत के कल्याण के लिए, जैन धर्म की प्रभावना को जन-जन तक पहुंचाने के लिए राजस्थान के जैन संतों ने अपने प्रवचनों से तो जन जागरण किया ही अपनी प्रखर लेखनी से भी लोगों को अमूल्य निधि भेंट की है। कई संतों ने विविध रसों और छंदों में अपनी बात कही है। कहीं चौपाइयों के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जगत के कल्याण के लिए, जैन धर्म की प्रभावना को जन-जन तक पहुंचाने के लिए राजस्थान के जैन संतों ने अपने प्रवचनों से तो जन जागरण किया ही अपनी प्रखर लेखनी से भी लोगों को अमूल्य निधि भेंट की है। कई संतों ने विविध रसों और छंदों में अपनी बात कही है। कहीं चौपाइयों के माध्यम से तो कहीं गीतों के जरिए। इसी का परिणाम रहा कि जैन धर्म की धर्म ध्वजा आज सगर्व फहरा रही है। <span style="color: #ff0000">जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में सातवीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का संतश्री यशोधरजी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p>हिन्दी एवं राजस्थानी भाषा के ऐसे सैकड़ों साहित्य सेवी हैं, जिनकी सेवाओं का उल्लेख न तो भाषा साहित्य के इतिहास में हो पाया और न अन्य किसी रूप में उनके जीवन एवं कृतियों पर प्रकाश डाला जा सका। राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, गुजरात एवं दिल्ली के समीपवर्ती पंजाबी प्रदेश में यदि विस्तृत साहित्यिक सर्वेक्षण किया जाए तो आज भी हमें सैकड़ों ही नहीं अपितु हजारों कवियों केबारे में जानकारी उपलब्ध हो सकेगी। जिन्होंने जीवन पर्यन्त साहित्य सेवा की थी, लेकिन कालांतर में उन्हें भुला दिया गया। संत श्री यशोधर ऐसे ही कवि हैं। जिनके स्वर्गवास के बाद भी जनसाधारण एवं विद्वानों की नजर से ओझल रहे। वे दृढ़निष्ठ साहित्य सेवी थे।</p>
<p><strong>काष्ठा संघ में जैन संत के शिष्य थे संत श्री यशोधर</strong></p>
<p>संतश्री यशोधर काष्ठा संघ में होने वाले जैन संत श्री सोमकीर्ति के प्रशिष्य एवं विजयसेन के शिष्य थे। अपने बाल्य काल में ही वे अपने गुरु की वाणी पर मुगध हो गए थे। संसार को असार जानकर उससे उदासीन रहने लगे थे। युवा होते-होते इन्होंने घर छोड़ दिया और संतों की सेवा में लीन रहने लगे थे। ये आजन्म ब्रह्मचारी रहे। संत श्री सकलकीर्ति की परंपरा में होने वाले भट्टारक श्रीविजय कीर्ति की सेवा में रहने का भी इन्हें सौभाग्य मिला और इसलिए उनकी प्रशंसा में लिखा एक पद मिलता है।</p>
<p><strong>संतश्री ने बुराइयों से बचने का संदेश</strong></p>
<p>संतश्री यशोधर जी महाव्रती थे। अहिंसा, सत्य, अचौर्य ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह इन पांच व्रतों को पूर्ण रूप से अपने जीवन में उतार लिया था। साधु अवस्था में इन्होंने गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र एवं उत्तर प्रदेश आदि प्रांतों में विहार किया। इन प्रांतों में विहार कर उन्होंने जनता को बुराइयों से बचने का उपदेश दिया। वे संभवतः स्वयं गायक भी थे और अपने पदों को गाकर सुनाया करते थे।</p>
<p><strong>न जन्म का पता न आयु का</strong></p>
<p>संत श्री ब्रह्म यशोधर का जन्म कब और कहां हुआ। कितनी आयु के बाद उनका स्वर्गवास हुआ। इस संबंध में अभी तक कोई प्रमाणिक जानकारी नहीं मिली। संतश्री सोमकीर्ति का भट्टारक काल संवत 1526 से 1540 तक माना जाता है। यदि यह सही है तो इन्हें संत श्री सोमकीर्ति के चरणों में रहने का अवसर मिला था तो इनका जन्म संवत 1520 के आसपास होना चाहिए। अभी तक जितनी रचनाएं मिली हैं, उनमें से केवल दो रचनाओं में इनका रचना काल दिया हुआ है। जो संवत 1581 (सन 1524) तथा संवत 1585( सन 1528) है।</p>
<p><strong>इनकी प्रमुख रचनाएं</strong></p>
<p>नेमिनाथ गीत के तीन अलग-अलग गुटके, मल्लिनाथ गीत, बलिभद्र चौपाई आदि की रचनाओं में इन्होंने अपनी विद्वता को प्रतिपादित किया है। संतश्री यशोधर की अब तक की जितनी कृतियां उपलब्ध हुईं हैं। उनमें स्पष्ट है कि वे हिन्दी के उत्कृष्ट विद्वान थे। उनकी काव्य शैली परिमार्जित थी। वे किसी विषय को छंदों में प्रस्तुत करते थे। उन्होंने नेमिनाथ के जीवन पर कितने ही गीत लिखे। सभी गीतों में अपनी-अपनी विशेषताएं हैं। उन्होंने राजुल और नेमिनाथ को लेकर कुछ श्रृंखार रस प्रधान पद एवं गीत लिखे।</p>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 6 शील, सदाचार, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र, वैराग्य और तप की बताई महत्ता - आचार्य श्री ब्रहम बूचराज जी नेः साहित्य और काव्य के माध्यम से तप, साधना और संयम का दिया संदेश </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/message_of_penance_and_restraint_given_through_literature_and_poetry/</link>
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		<pubDate>Mon, 03 Mar 2025 00:30:27 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[राजस्थान की धरती पर संतों ने जन्म लेकर केवल इसी धरती पर नहीं वरन कई-कई प्रांतों में विहार कर आध्यात्मिक चेतना, जीव और भगवान के बीच के संबंध को जानने का धर्म मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने स्पष्ट किया है कि अनादिकाल से यह जीव जड़ को अपना हितैषी समझता आ रहा है। इस कारण ही [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>राजस्थान की धरती पर संतों ने जन्म लेकर केवल इसी धरती पर नहीं वरन कई-कई प्रांतों में विहार कर आध्यात्मिक चेतना, जीव और भगवान के बीच के संबंध को जानने का धर्म मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने स्पष्ट किया है कि अनादिकाल से यह जीव जड़ को अपना हितैषी समझता आ रहा है। इस कारण ही जगत के चक्कर में पड़ता है। आचार्यश्री बूचराज जी जैन दर्शन के पुद्गल एवं चेतन के संबंध से परिचित थे। जीव और जड़ के इस संबंध की पोल चेतन पुद्गल धमाल में कवि ने खोल कर रख दी है। <span style="color: #ff0000">जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में छठवीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का आचार्य श्री बूचराज के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> रूपक काव्यों के निर्माता ब्रह्म बूचराज हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित कवि हैं। इनकी एक रचना मयण जुज्झ (मदन युद्ध )इतनी अधिक लोकप्रिय रही कि राजस्थान के कितने ही भंडारों में उसकी प्रतिलिपियां उपलब्ध है। इनकी सभी कृतियां उच्च स्तर की हैं। आचार्य श्री बूचराज भट्टारक विजयकीर्ति के शिष्य थे। इसलिए उनकी प्रशंसा में उन्होंने विजयकीर्ति गीत लिखा। श्री बूचराज राजस्थानी विद्वान थे।</p>
<p><strong>जन्म और परिवार परिचय उपलब्ध नहीं</strong></p>
<p>आचार्यश्री बूचराज ने अपनी किसी भी कृति में अपने जन्म, स्थान और माता-पिता आदि का परिचय नहीं दिया है। इन रचनाओं की भाशा के आधार पर भट्टारक श्री विजयकीर्ति जी के शिष्य होने के चलते इन्हें राजस्थानी विद्वान माना गया। वैसे ये संत थे। ब्रह्मचारी पद इन्होंने धारण कर लिया था। इसलिए धर्म प्रचार, साहित्य प्रचार की दृष्टि से ये उत्तरी भारत में विहार करते थे। राजस्थान, पंजाब, दिल्ली, गुजरात इनके मुख्य प्रदेश थे। संवत 1591 में ये हिसार में थे और उस वर्ष वहीं चातुर्मास किया था। इसलिए 1591 की भादवा शुक्ल पंचमी के दिन इन्होंने संतोष जय तिलक को पूर्ण किया था। संवत 1582 में वे चंपावती (चाटसू) में और इस वर्ष फाल्गुन सुदी 14 के दिन इन्हें सम्यकत्व कौमुदी की प्रतिलिपि भेंट स्वरूप प्रदान की गई थी। इन्होंने अपनी कृतियों में बूचराज के अतिरिक्त बूचा, वल्ह, वील्ह अथवा वल्हव नामों का उपयोग किया।</p>
<p><strong>समय के बारे में अनिश्चय</strong></p>
<p>कविवर के समय के बारे में निश्चित नहीं है, लेकिन इनकी रचनाओं के आधार पर इनका समय संवत 1530 से 1600 तक माना जा सकता है। इस तरह उन्होंने अपने जीवन काल में भट्टारक श्री भुवनकीर्ति, भट्टारक श्री ज्ञानभूषण एवं विजयकीर्ति का समय देखा होगा। इनके सानिध्य में रहकर बहुत कुछ सीखने का अवसर भी प्राप्त किया होगा। वे गृहस्थावस्था के बाद संवत 1575 के आसपास ब्रह्मचारी बने होंगे तथा उसके बाद इनका ध्यान साहित्य रचना की ओर गया होगा। मयण जुज्झ इनकी प्रथम रचना है। जिसमें उन्होंने भगवान आदिनाथ द्वारा कामदेव पर विजय प्राप्त करने के रूप में संभवतः स्वयं के जीवन का भी उदाहरण प्रस्तुत किया है।</p>
<p><strong>श्री बूचराज की प्रमुख कृतियां</strong></p>
<p>मयण जुज्झ (मदन युद्ध), संतोष तिलक, चेतन पुदगल धमाल, टंडाणा गीत, नेमिनाथ वसंतु, नेमीश्वर का बाहरमासा, विभिन्न रागों में लिखे हुए आठ पद, विजयकीर्ति गीत।</p>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 5 कठोर साधना से पूरे राष्ट्र में श्री विजयकीर्ति की आध्यात्मिक पताका फहराई : सांस्कृतिक कार्यक्रमों के संपादन में भी इनकी भूमिका रही उल्लेखनीय </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 02 Mar 2025 00:30:29 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दिगंबर जैन संतों के दिव्य वचन जैन समाज की आध्यात्मिक चेतना को प्रकाशमान करते हैं। जैन धर्म को सुदृढ़ता के साथ अपनी तपोपासना के माध्यम से दिव्य मार्ग भी बताते हैं। इनके आहार, विहार, विचार को देखकर और सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र महत्ता प्रतिष्ठपित होती है। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दिगंबर जैन संतों के दिव्य वचन जैन समाज की आध्यात्मिक चेतना को प्रकाशमान करते हैं। जैन धर्म को सुदृढ़ता के साथ अपनी तपोपासना के माध्यम से दिव्य मार्ग भी बताते हैं। इनके आहार, विहार, विचार को देखकर और सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र महत्ता प्रतिष्ठपित होती है। <span style="color: #ff0000">जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में पांचवीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का भट्टारक श्री विजयकीर्तिजी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> 15वीं शताब्दी में भट्टारक श्री सकलकीर्ति ने गुजरात और राजस्थान में अपने त्यागमय एवं विद्वत्तापूर्ण जीवन से भट्टारक संस्था के प्रति जनता की गहरी आस्था प्राप्त करने में सफलता हासिल की थी। उनके बाद इनके दो सुयोग्य शिष्य प्रशिष्यों भट्टारक श्री भुवनकीर्ति और भट्टारक श्री ज्ञानभूषण ने उसकी नींव को और सुदृढ़ करने में अपना योगदान दिया। जनता ने साधुओं का हार्दिक स्वागत किया और उन्हें अपने मार्गदर्शक एवं धर्मगुरु के रूप स्वीकार किया। समाज में होने वाले प्रत्येक धार्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक समारोहों में इनका परामर्श लिया जाने लगा तथा यात्रा संघों एवं बिम्ब प्रतिष्ठाओं में इनका नेतृत्व स्वतः ही अनिवार्य मान लिया गया। इन्होंने अपने संपूर्ण जीवन को समाज एवं संस्कृति की सेवा में लगाया और अध्ययन, अध्यापन तथा प्रवचनों से देश में नया उत्साह प्रद वातावरण पैदा करते थे। श्री विजयकीर्ति ऐसे ही भट्टारक थे। जिनके बारे में बहुत कम लिखा गया है। ये भट्टारक श्री ज्ञानभूषण जी के शिष्य थे। वे भट्टारक श्री सकलकीर्ति द्वारा प्रतिष्ठापित भट्टारक गादी पर बैठे थे। इनके समकालीन एवं बाद में होने वाले कितने ही विद्वानों ने अपनी ग्रंथ प्रशस्तियों में इनका आदर भाव से स्मरण किया है। इनके प्रमुख शिष्य भट्टारक श्री शुभचंद जी ने इनकी अत्यधिक प्रशंसा की है और इनके संबंध में कुछ स्वतंत्र गीत भी लिखे हैं। श्री विजयकीर्ति अपने समय के समर्थ भट्टारक थे।</p>
<p><strong>प्रारंभिक जीवन की जानकारी अप्राप्य</strong></p>
<p>श्री विजयकीर्ति के प्रारंभिक जीवन के बारे में अभी कोई निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है। भट्टारक शुभचंद ने गीतों के आधार पर कहा है कि शरीर से ये कामदेव के समान सुंदर थे। इनके पिता का नाम साह गंगा और माता का नाम कुंअरि था। बचपन में अधिक अध्ययन नहीं हो पाया। भट्टारक श्री ज्ञानभूषण के संपर्क में आने के बाद इन्होंने सिद्धांत ग्रंथों का गहरा अध्ययन किया। गोमट्टसार लब्धिसार, त्रिलोकसार आदि सैद्धांतिक ग्रंथों के अलावा न्याय, काव्य, व्याकरण आदि के ग्रंथों का भी अच्छा अध्ययन किया।</p>
<p><strong>पूर्ण यौवन में धारण किया साधु जीवन</strong></p>
<p>इन्होंने जब साधु जीवन में प्रवेश किया तब वे अपनी युवावस्था के उत्कर्ष पर थे। सुंदर तो पहले से ही थे किन्तु यौवन नेउन्हें और भी निखार दिया था। इन्होंने साधु बनते ही अपने जीवन को पूर्णतः संयमित कर लिया और कामनाओं एवं षटरस व्यंजनों से दूर हटकर ये कठोर साधना में लग गए। ये अपनी साधना में इतने लीन हो गए कि देशभर में इनके चरित्र की प्रशंसा होने लगी।</p>
<p><strong>18 वर्षों में कई मूर्ति प्रतिष्ठा करवाई</strong></p>
<p>भट्टारक श्री विजयकीर्ति का समाज पर जबरदस्त प्रभाव होने के कारण समाज की गतिविधियों में उनका प्रमुख योगदान रहता था। इनके भट्टारक काल में कितनी ही प्रतिष्ठाएं हुईं। मंदिरों का निर्माण एवं जीर्णोद्धार किया गया। इसके अतिरिक्त सांस्कृतिक कार्यक्रमों के संपादन में भी इनकी भूमिका उल्लेखनीय रही। सर्व प्रथम इन्होंने संवत 1557, 1560, 1561, 1564, 1568, 1570 आदि वर्षों में संपन्न होने वाली प्रतिष्ठाओं में भाग लिया। इन संवतों में प्रतिष्ठित मूर्तियां डूंगरपुर, उदयपुर आदि नगरों के मंदिरों में मिलती हैं। संवत 1561 में इन्होंने सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र की महत्ता को प्रतिष्ठापित करने के लिए रत्नत्रय की मूर्ति को प्रतिष्ठापित किया।</p>
<p><strong>इनका स्वर्णकाल 18 वर्ष तक रहा</strong></p>
<p>भट्टारक श्री विजयकीर्ति के जीवन का स्वर्णकाल संवत 1552 से 1570 तक माना जाता है। इन 18 वर्षों में इन्होंने देश को एक नई सांस्कृतिक चेतना से भर दिया। अपने त्याग ओर तपस्वी जीवन से देश को आगे बढ़ाया।</p>
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