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	<title>मोक्षकल्याणक &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>भगवान सुमतिनाथ का जन्मकल्याणक, तपकल्याणक एवं मोक्षकल्याणक महोत्सव : बड़े भक्ति भाव से हुआ आयोजन </title>
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		<pubDate>Sat, 28 Mar 2026 12:01:27 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[शहर स्थित श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर, गौरी किनारा में आज श्री 1008 सुमतिनाथ भगवान का जन्मकल्याणक, तपकल्याणक एवं मोक्षकल्याणक महोत्सव अत्यंत श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनाया गया। पढ़िए सोनल जैन की रिपोर्ट&#8230; भिंड। शहर स्थित श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर, गौरी किनारा में आज श्री 1008 सुमतिनाथ भगवान का जन्मकल्याणक, [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>शहर स्थित श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर, गौरी किनारा में आज श्री 1008 सुमतिनाथ भगवान का जन्मकल्याणक, तपकल्याणक एवं मोक्षकल्याणक महोत्सव अत्यंत श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनाया गया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सोनल जैन की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>भिंड।</strong> शहर स्थित श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर, गौरी किनारा में आज श्री 1008 सुमतिनाथ भगवान का जन्मकल्याणक, तपकल्याणक एवं मोक्षकल्याणक महोत्सव अत्यंत श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनाया गया। प्रातः 7 बजे भगवान श्री सुमतिनाथ के अभिषेक के अंतर्गत प्रथम कलश करने का सौभाग्य श्री महेंद्र शैलू समर्थ जैन (LIC) को प्राप्त हुआ। वहीं शांतिधारा करने का सौभाग्य श्री अनीश जैन एवं अक्षत जैन को प्राप्त हुआ। महाआरती का पुण्य लाभ श्री विराग विशुद्ध बहु मंडल, किला गेट एवं चंद्रप्रभु महिला मंडल को प्राप्त हुआ। इस अवसर पर सभी भक्तों ने भक्ति भाव से पूजा-अर्चना की तथा श्रद्धापूर्वक निर्वाण लाडू अर्पित किए। कार्यक्रम के संयोजक शैलू जैन (LIC) ने जानकारी देते हुए बताया कि श्री 1008 सुमतिनाथ भगवान का जन्म चैत्र शुक्ल एकादशी को अयोध्या जी में हुआ था। इसी तिथि को भगवान ने केवलज्ञान प्राप्त किया तथा तीर्थराज सम्मेदशिखर के अविचल कूट से मोक्ष प्राप्त किया। निर्वाण लाडू चढ़ाने का प्रथम सौभाग्य श्री चंद्रप्रभु युवा समिति, गौरी किनारा भिंड को प्राप्त हुआ।</p>
<p>द्वितीय लाडू चढ़ाने का सौभाग्य चंद्रप्रभु बालिका मंडल को तथा तृतीय लाडू चढ़ाने का सौभाग्य चंद्रप्रभु महिला मंडल को प्राप्त हुआ। इस अवसर पर आशु, सौरभ, राहुल, कृष्णा, राजेश, गोपाल, दीपक, दीपू, शैलेन्द्र, अशोक जैन, रूबी, पुष्पा, सरोज, सीमा, अनीता, बिटिया सृष्टि, वाणी, लवी सहित अनेक श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से निर्वाण लाडू अर्पित किए। पूरे कार्यक्रम के दौरान मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण बना रहा और श्रद्धालुओं ने भगवान की आराधना कर धर्मलाभ प्राप्त किया।</p>
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		<title>भगवान मल्लिनाथ जी का मोक्षकल्याणक 22 फरवरी को: तिथि फाल्गुन शुक्ल पंचमी को आता है </title>
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		<pubDate>Sun, 22 Feb 2026 08:48:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक (निर्वाण) आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने सम्मेद शिखर जी (झारखंड) के पावन पर्वत से मोक्ष प्राप्त किया था। सम्मेद शिखर जी के जिस कूट (पहाड़ी की चोटी) से उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया, उसे निर्वाण कूट या मल्लिनाथ कूट भी कहा जाता है। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक (निर्वाण) आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने सम्मेद शिखर जी (झारखंड) के पावन पर्वत से मोक्ष प्राप्त किया था। सम्मेद शिखर जी के जिस कूट (पहाड़ी की चोटी) से उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया, उसे निर्वाण कूट या मल्लिनाथ कूट भी कहा जाता है। उनका मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 22 फरवरी को आ रहा है और फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक (निर्वाण) आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे इक्ष्वाकु वंश के राजा कुंभ और माता प्रभावती के पुत्र थे। उन्होंने सम्मेद शिखर जी (झारखंड) के पावन पर्वत से मोक्ष प्राप्त किया था। सम्मेद शिखर जी के जिस कूट (पहाड़ी की चोटी) से उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया, उसे निर्वाण कूट या मल्लिनाथ कूट भी कहा जाता है। उनका मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 22 फरवरी को आ रहा है और फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। भगवान मल्लिनाथ ने संसार की नश्वरता को जानकर दीक्षा ग्रहण की थी। उन्होंने कठोर तपस्या और आत्म-चिंतन के माध्यम से पहले केवलज्ञान (परम ज्ञान) प्राप्त किया और फिर सम्मेद शिखर जी पर एक माह का योग निरोध (उपवास) कर निर्वाण पद प्राप्त किया। श्वेतांबर और दिगंबर परंपराओं में भगवान मल्लिनाथ जी के स्वरूप को लेकर भिन्नता है। श्वेतांबर परंपरा उन्हें स्त्री तीर्थंकर के रूप में मानती है जबकि, दिगंबर परंपरा के अनुसार वे पुरुष तीर्थंकर थे। हालांकि, उनके द्वारा दी गई अहिंसा और अपरिग्रह की शिक्षाएं दोनों ही परंपराओं में समान रूप से पूजनीय हैं।</p>
<p><strong>भगवान के जीवन के रोचक प्रसंग </strong></p>
<p>भगवान मल्लिनाथ जी का जीवन चरित्र जैन पुराणों में अत्यंत प्रेरक और रोचक है। उनके जीवन की सबसे खास बात उनके पूर्व जन्म के मित्र और उनके द्वारा किया गया मायाचार (छल) है। जिसके कारण उन्हें तीर्थंकर प्रकृति के साथ ’स्त्री’ (श्वेतांबर मान्यता अनुसार) या विशिष्ट शारीरिक संरचना प्राप्त हुई। भगवान मल्लिनाथ अपने पूर्व जन्म में महाबल नाम के राजा थे। उनके छह बहुत ही घनिष्ठ मित्र थे। उन सातों मित्रों ने एक साथ वैराग्य धारण किया और कठिन तपस्या करने का संकल्प लिया। सातों मित्रों ने तय किया कि वे जो भी तप या उपवास करेंगे, बिल्कुल एक समान करेंगे ताकि सबको समान फल मिले। महाबल (मल्लिनाथ का जीव) अन्य मित्रों से अधिक आत्मिक शक्ति चाहते थे। उन्होंने अपने मित्रों को बताए बिना, बीमारी या अन्य बहानों से अपने उपवास की अवधि बढ़ा दी।</p>
<p>इस छल (मायाचार) के कारण उन्होंने ‘स्त्री वेद’ का बंध किया, लेकिन अपनी कठिन तपस्या के कारण ‘तीर्थंकर नाम कर्म’ का भी अर्जन कर लिया। राजा महाबल का जीव स्वर्ग से च्युत होकर मिथिला नगरी के राजा कुंभ और माता प्रभावती के यहाँ अवतरित हुआ। उनके जन्म के समय माता को ‘मल्ल’ (फूलों की माला) धारण करने का स्वप्न आया और वे बचपन से ही अत्यंत सुंदर थे, इसलिए उनका नाम मल्लिनाथ रखा गया।</p>
<p><strong>वैराग्य की अनूठी घटना</strong></p>
<p>मल्लिनाथ जी की सुंदरता की चर्चा चारों ओर थी। उनके पूर्व जन्म के वही छह मित्र (जो अब अलग-अलग राज्यों के राजा थे) उनसे विवाह करना चाहते थे या उन्हें पाना चाहते थे। इस स्थिति को देखकर मल्लिनाथ जी ने उन्हें सत्य समझाने के लिए एक युक्ति अपनाई। उन्होंने अपनी एक हूबहू दिखने वाली स्वर्ण प्रतिमा बनवाई, जो अंदर से खोखली थी। वे रोज अपने भोजन का एक ग्रास उस प्रतिमा के अंदर डाल देते और उसे ढंक देते। कुछ समय बाद जब उन छह राजाओं को बुलाया गया और उस प्रतिमा का ढक्कन खोला गया तो उसमें से भयंकर दुर्गंध आई। मल्लिनाथ जी ने समझाया कि ‘जब इस सुंदर दिखने वाली प्रतिमा की यह स्थिति है तो हाड़-मांस के इस शरीर पर कैसा मोह? यह शरीर भीतर से अशुद्धियों से भरा है। यह देख उन छह राजाओं को जाति स्मरण (पिछले जन्म का ज्ञान) हो गया और मल्लिनाथ जी ने दीक्षा लेने का निर्णय लिया। उन्होंने सहेतुक वन में जाकर दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा लेने के मात्र 2 दिन बाद ही उन्हें केवलज्ञान (परम ज्ञान) प्राप्त हो गया। यह किसी भी तीर्थंकर के लिए सबसे कम समय की साधना मानी जाती है। उन्होंने सत्य और अहिंसा का उपदेश दिया और अंत में सम्मेद शिखर जी से निर्वाण प्राप्त किया। भगवान मल्लिनाथ का जीवन सिखाता है कि धर्म में भी दिखावा या छल (मायाचार) करना कर्मों के बंधन का कारण बनता है। जहां सरलता होती है, वहीं परमात्मा का वास होता है।</p>
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		<title>भगवान मल्लिनाथ जी का मोक्षकल्याणक 22 फरवरी को: तिथि फाल्गुन शुक्ल पंचमी को आता है </title>
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		<pubDate>Sun, 22 Feb 2026 07:33:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक (निर्वाण) आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने सम्मेद शिखर जी (झारखंड) के पावन पर्वत से मोक्ष प्राप्त किया था। सम्मेद शिखर जी के जिस कूट (पहाड़ी की चोटी) से उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया, उसे निर्वाण कूट या मल्लिनाथ कूट भी कहा जाता है। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक (निर्वाण) आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने सम्मेद शिखर जी (झारखंड) के पावन पर्वत से मोक्ष प्राप्त किया था। सम्मेद शिखर जी के जिस कूट (पहाड़ी की चोटी) से उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया, उसे निर्वाण कूट या मल्लिनाथ कूट भी कहा जाता है। उनका मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 22 फरवरी को आ रहा है और फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक (निर्वाण) आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे इक्ष्वाकु वंश के राजा कुंभ और माता प्रभावती के पुत्र थे। उन्होंने सम्मेद शिखर जी (झारखंड) के पावन पर्वत से मोक्ष प्राप्त किया था। सम्मेद शिखर जी के जिस कूट (पहाड़ी की चोटी) से उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया, उसे निर्वाण कूट या मल्लिनाथ कूट भी कहा जाता है। उनका मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 22 फरवरी को आ रहा है और फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। भगवान मल्लिनाथ ने संसार की नश्वरता को जानकर दीक्षा ग्रहण की थी। उन्होंने कठोर तपस्या और आत्म-चिंतन के माध्यम से पहले केवलज्ञान (परम ज्ञान) प्राप्त किया और फिर सम्मेद शिखर जी पर एक माह का योग निरोध (उपवास) कर निर्वाण पद प्राप्त किया। श्वेतांबर और दिगंबर परंपराओं में भगवान मल्लिनाथ जी के स्वरूप को लेकर भिन्नता है। श्वेतांबर परंपरा उन्हें स्त्री तीर्थंकर के रूप में मानती है जबकि, दिगंबर परंपरा के अनुसार वे पुरुष तीर्थंकर थे। हालांकि, उनके द्वारा दी गई अहिंसा और अपरिग्रह की शिक्षाएं दोनों ही परंपराओं में समान रूप से पूजनीय हैं।</p>
<p><strong>भगवान के जीवन के रोचक प्रसंग </strong></p>
<p>भगवान मल्लिनाथ जी का जीवन चरित्र जैन पुराणों में अत्यंत प्रेरक और रोचक है। उनके जीवन की सबसे खास बात उनके पूर्व जन्म के मित्र और उनके द्वारा किया गया मायाचार (छल) है। जिसके कारण उन्हें तीर्थंकर प्रकृति के साथ ’स्त्री’ (श्वेतांबर मान्यता अनुसार) या विशिष्ट शारीरिक संरचना प्राप्त हुई। भगवान मल्लिनाथ अपने पूर्व जन्म में महाबल नाम के राजा थे। उनके छह बहुत ही घनिष्ठ मित्र थे। उन सातों मित्रों ने एक साथ वैराग्य धारण किया और कठिन तपस्या करने का संकल्प लिया। सातों मित्रों ने तय किया कि वे जो भी तप या उपवास करेंगे, बिल्कुल एक समान करेंगे ताकि सबको समान फल मिले। महाबल (मल्लिनाथ का जीव) अन्य मित्रों से अधिक आत्मिक शक्ति चाहते थे। उन्होंने अपने मित्रों को बताए बिना, बीमारी या अन्य बहानों से अपने उपवास की अवधि बढ़ा दी।</p>
<p>इस छल (मायाचार) के कारण उन्होंने ‘स्त्री वेद’ का बंध किया, लेकिन अपनी कठिन तपस्या के कारण ‘तीर्थंकर नाम कर्म’ का भी अर्जन कर लिया। राजा महाबल का जीव स्वर्ग से च्युत होकर मिथिला नगरी के राजा कुंभ और माता प्रभावती के यहाँ अवतरित हुआ। उनके जन्म के समय माता को ‘मल्ल’ (फूलों की माला) धारण करने का स्वप्न आया और वे बचपन से ही अत्यंत सुंदर थे, इसलिए उनका नाम मल्लिनाथ रखा गया।</p>
<p><strong>वैराग्य की अनूठी घटना</strong></p>
<p>मल्लिनाथ जी की सुंदरता की चर्चा चारों ओर थी। उनके पूर्व जन्म के वही छह मित्र (जो अब अलग-अलग राज्यों के राजा थे) उनसे विवाह करना चाहते थे या उन्हें पाना चाहते थे। इस स्थिति को देखकर मल्लिनाथ जी ने उन्हें सत्य समझाने के लिए एक युक्ति अपनाई। उन्होंने अपनी एक हूबहू दिखने वाली स्वर्ण प्रतिमा बनवाई, जो अंदर से खोखली थी। वे रोज अपने भोजन का एक ग्रास उस प्रतिमा के अंदर डाल देते और उसे ढंक देते। कुछ समय बाद जब उन छह राजाओं को बुलाया गया और उस प्रतिमा का ढक्कन खोला गया तो उसमें से भयंकर दुर्गंध आई। मल्लिनाथ जी ने समझाया कि ‘जब इस सुंदर दिखने वाली प्रतिमा की यह स्थिति है तो हाड़-मांस के इस शरीर पर कैसा मोह? यह शरीर भीतर से अशुद्धियों से भरा है। यह देख उन छह राजाओं को जाति स्मरण (पिछले जन्म का ज्ञान) हो गया और मल्लिनाथ जी ने दीक्षा लेने का निर्णय लिया। उन्होंने सहेतुक वन में जाकर दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा लेने के मात्र 2 दिन बाद ही उन्हें केवलज्ञान (परम ज्ञान) प्राप्त हो गया। यह किसी भी तीर्थंकर के लिए सबसे कम समय की साधना मानी जाती है। उन्होंने सत्य और अहिंसा का उपदेश दिया और अंत में सम्मेद शिखर जी से निर्वाण प्राप्त किया। भगवान मल्लिनाथ का जीवन सिखाता है कि धर्म में भी दिखावा या छल (मायाचार) करना कर्मों के बंधन का कारण बनता है। जहां सरलता होती है, वहीं परमात्मा का वास होता है।</p>
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		<title>भगवान सुपार्श्वनाथ जी का मोक्षकल्याणक 8 फरवरी को : तिथि के अनुसार फाल्गुन कृष्ण सप्तमी को आता है </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 07 Feb 2026 12:39:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दिगंबर जैन धर्म के सातवें तीर्थंकर भगवान श्री सुपार्श्वनाथ जी का मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 8 फरवरी को है। तिथि के अनुसार भगवान का मोक्ष कल्याणक फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन मनाया जाता है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला के तहत आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति&#8230; इंदौर। दिगंबर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दिगंबर जैन धर्म के सातवें तीर्थंकर भगवान श्री सुपार्श्वनाथ जी का मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 8 फरवरी को है। तिथि के अनुसार भगवान का मोक्ष कल्याणक फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन मनाया जाता है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला के तहत आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> दिगंबर जैन धर्म के सातवें तीर्थंकर भगवान श्री सुपार्श्वनाथ जी का मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 8 फरवरी को है। तिथि के अनुसार भगवान का मोक्ष कल्याणक फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन मनाया जाता है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में संपूर्ण भक्ति भाव से भगवान सुपार्श्वनाथ जी के मोक्ष कल्याणक अवसर पर अभिषेक, शांतिधारा, अर्घ्य समर्पण और निर्वाण लाडु आदि चढ़ाने के धार्मिक विधान किए जाते हैं। मंदिरों में</p>
<p>जैन धर्म के सातवें तीर्थंकर भगवान सुपार्श्वनाथ जी का मोक्ष कल्याणक अत्यंत भक्ति भाव से मनाया जाता है। इनका मोक्ष कल्याणक प्रतिवर्ष फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को आता है। वर्ष 2026 में यह तिथि 8 फरवरी को है। भगवान ने सम्मेद शिखरजी (झारखंड) पर्वत के प्रभास कूट से निर्वाण प्राप्त किया था। मान्यता है कि भगवान सुपार्श्वनाथ जी के साथ 1 हजार मुनिराजों ने भी मोक्ष प्राप्त किया था। इस दिन दिगंबर जैन समाज के श्रद्धालु और भक्तजन मोक्ष सप्तमी मनाएगा। इस दिन जैन मंदिरों में भगवान की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और निर्वाण लाडू चढ़ाया जाता है। ग्रंथों में वर्णित जानकारी के अनुसार भगवान सुपार्श्वनाथ जी का निर्वाण शिखरजी में प्रभास कूट पर हुआ था। आज के ही दिन सूर्याेदय के समय विशाखा नक्षत्र में 1 हजार मुनिराजों के साथ मोक्ष पद को प्राप्त किया था। इस कूट से 49 कोड़ा-कोड़ी 84 करोड़ 72 लाख 7 हजार 742 मुनि सिद्ध हुए।</p>
<p><strong>इनके चरणों में स्वस्तिक चिह्न था</strong></p>
<p>सातवें तीर्थंकर भगवान इस अवसर्पिणी काल के दुरूषमा-सुषमा चौथे काल में उत्पन्न हुए थे। जंबूदीप के भरतक्षेत्र में काशी देश की वाराणसी नगरी के राजा सुप्रतिष्ठ की रानी पृथ्वीसेना के गर्भ में ये भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन विशाखा नक्षत्र में स्वर्ग से अवतरित हुए थे। इनका जन्म ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशी के दिन अग्निमित्र नामक शुभ योग में हुआ था। इनका यह नाम जन्माभिषेक करने के पश्चात् इंद्र ने रखा था। इनके चरणों में स्वस्तिक चिह्न था। इनकी आयु बीस लाख पूर्व वर्ष की थी। शरीर दो सौ धनुष ऊँचा था। इन्होंने कुमारकाल के पांच लाख वर्ष बीत जाने पर धन का त्याग (दान) करने के लिए साम्राज्य स्वीकार किया था। इनके निरूस्वेदत्व आदि आठ अतिशय तथा पद्मपुराण और हरिवंशपुराण के अनुसार दश अतिशय प्रकट हुए थे।</p>
<p><strong>सोमखेट नगर के राजा महेंद्रदत्त ने इन्हें आहार दिया</strong></p>
<p>इनकी आयु अनपवर्त्य थी। वर्ण प्रियंगु पुष्प के समान था। बीस पूर्वांग कम एक लाख पूर्व की आयु शेष रहने पर इन्हें वैराग्य हुआ। ये मनोगति नामक शिविका पर आरूढ़ होकर सहेतुक वन गए तथा वहां इन्होंने ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी के दिन सायं बेला में 1 हजार राजाओं के साथ संयम धारण किया। संयमी होते ही इन्हें मनरूपर्ययज्ञान हुआ। सोमखेट नगर के राजा महेंद्रदत्त ने इन्हें आहार दिया था। ये छद्मस्थ अवस्था में नौ वर्ष तक मौन रहे। सहेतुक वन में शिरीष वृक्ष के नीचे फाल्गुन कृष्ण षष्ठी के दिन सायंकाल के समय इन्हें केवलज्ञान हुआ था। इनके चतुर्विध संघ में 95 गणधर, 2 हजार 30 पूर्वधारी, 2 लाख 44 हजार 920 शिक्षक, 9 हजार अवधिज्ञानी, 11 हजार केवलज्ञानी, 15 हजार 300 विक्रिया ऋद्धिधारी, 9 हजार 150 मनरूपर्ययज्ञानी, 8हजार 600 वादी। इस प्रकार कुल 3 लाख मुनि, 3 लाख 30 हजार आर्यिकाएं, 3 लाख श्रावक, 5 लाख श्राविकाएं असंख्य देव-देवियां और संख्यात तिर्यंच थे।</p>
<p><strong>आयु का एक मास शेष रहने पर ये सम्मेदशिखर पहुंचे </strong></p>
<p>विहार करते हुए आयु का एक मास शेष रहने पर ये सम्मेदशिखर पहुंचे और यहां एक हजार मुनियों के साथ इन्होंने प्रतिमायोग धारण कर फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन विशाखा नक्षत्र में सूर्याेदय के समय मोक्ष प्राप्त किया था। दूसरे पूर्वभव में ये धातकीखंड के पूर्व विदेहक्षेत्र में सुकच्छ देश के क्षेमपुर नगर के नंदिषेण नामक नृप थे। प्रथम पूर्वभव में मध्यम ग्रैवेयक के सुभद्र नामक मध्यम विमान में अहमिंद्र रहे।</p>
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		<title>प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ जी का मोक्षकल्याणक 17 जनवरी को: तिथि के अनुसार माघ कृष्ण चतुर्दशी को है  </title>
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		<pubDate>Fri, 16 Jan 2026 12:05:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[शहर सहित देशभर के दिगंबर जैन मंदिरों में 17 जनवरी को जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ जी का मोक्षकल्याणक संपूर्ण श्रद्धा-भक्ति से मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार माघ कृष्ण चतुर्दशी को इस कल्याणक को मनाए जाने का विधान है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>शहर सहित देशभर के दिगंबर जैन मंदिरों में 17 जनवरी को जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ जी का मोक्षकल्याणक संपूर्ण श्रद्धा-भक्ति से मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार माघ कृष्ण चतुर्दशी को इस कल्याणक को मनाए जाने का विधान है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह खास संकलित और संपादित रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> शहर सहित देशभर के दिगंबर जैन मंदिरों में 17 जनवरी को जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ जी का मोक्षकल्याणक संपूर्ण श्रद्धा-भक्ति से मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार माघ कृष्ण चतुर्दशी को इस कल्याणक को मनाए जाने का विधान है। जैन धर्म के ग्रंथों में वर्णित जानकारी के अनुसार भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) का मोक्ष कल्याणक जैन धर्म के पांच प्रमुख कल्याणकों में से अंतिम हैं, जो माघ कृष्ण चतुर्दशी (हिंदू कैलेंडर के अनुसार) को मनाया जाता है। जहां वे कैलाश पर्वत (अष्टापद) पर शरीर और कर्मों से मुक्त होकर सिद्ध (मोक्ष) हुए थे। जिससे उनकी आत्मा जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो गई। यह दिन जैन धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि, यह संसार से मुक्ति और शाश्वत शांति का प्रतीक है। जहां भगवान ने हजारों वर्षों तक तपस्या के बाद यह परम पद प्राप्त किया था। जैन धर्म आगमों के अनुसार मोक्ष कल्याणक में तीर्थंकर शरीर, कर्म आदि से मुक्त होकर सिद्ध हो जाते हैं और उनका पुनः संसार में आवागमन नहीं होता है। मनुष्य जीवन के लिए संसार से मुक्ति सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि होती है। मोक्ष कल्याणक के माध्यम से भगवान आदिनाथ ने हजारों वर्ष पूर्व आज ही के दिन मोक्ष पद प्राप्त किया था। इस दिन को दिगंबर जैन मंदिर में अभिषेक, परिमार्जन व शांतिधारा के कार्यक्रम किए जाते हैं। साथ ही निर्वाण लाडु चढ़ाकर दिव्य आराधना कर भगवान आदिनाथ की भक्ति की जाती है। जैन समाज में भगवान आदिनाथ जी का यह कल्याणक विशेष तौर पर बहुत अहम है।</p>
<p><strong>मोक्ष कल्याण के बारे में प्रमुख बातें</strong></p>
<p>तिथि- माघ कृष्ण चतुर्दशी (माघ मास के कृष्ण पक्ष की चौदहवीं तिथि)।</p>
<p>स्थान- कैलाश पर्वत, जिसे अष्टापद के नाम से भी जाना जाता है, भगवान आदिनाथ की मोक्ष भूमि है।</p>
<p>महत्व- इस दिन, भगवान आदिनाथ ने सभी कर्मों (अघाति-कर्म) का नाश कर दिया और आत्मा को अनंत जन्म-मरण के बंधन से मुक्त किया, जिससे वे सिद्धलोक में विराजमान हो गए।</p>
<p>परंपरा- इस अवसर पर जैन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, निर्वाण लड्डू चढ़ाए जाते हैं और सत्संग व शोभायात्राएं निकाली जाती हैं, जो इस महान उपलब्धि का उत्सव मनाते हैं।</p>
<p>विशेष- प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ ने मानव सभ्यता को कृषि, व्यापार, कला, लेखन और राजनीति जैसे ज्ञान देकर समाज को दिशा दी और फिर तपस्या के मार्ग पर चलकर मोक्ष प्राप्त किया, जो सभी के लिए प्रेरणादायक है।</p>
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		<title>पंचकल्याणक महोत्सव आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में सम्पन्न : मोक्षकल्याणक, पिच्छिका परिवर्तन और वात्सल्यमना उपाधि से गूंजा रामगंजमंडी </title>
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		<pubDate>Wed, 12 Nov 2025 15:14:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[रामगंजमंडी में आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में पंचकल्याणक महोत्सव अत्यंत भव्यता से सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर मोक्षकल्याणक महोत्सव, पिच्छिका परिवर्तन और आचार्य श्री को वात्सल्यमना उपाधि से सुशोभित करने का आयोजन हुआ। पढ़िए अभिषेक जैन लुहाड़िया की रिपोर्ट… रामगंजमंडी। नगर के इतिहास का तीसरा पंचकल्याणक महोत्सव आयोजित हुआ। यह आयोजन आचार्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>रामगंजमंडी में आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में पंचकल्याणक महोत्सव अत्यंत भव्यता से सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर मोक्षकल्याणक महोत्सव, पिच्छिका परिवर्तन और आचार्य श्री को वात्सल्यमना उपाधि से सुशोभित करने का आयोजन हुआ। <span style="color: #ff0000">पढ़िए अभिषेक जैन लुहाड़िया की रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> नगर के इतिहास का तीसरा पंचकल्याणक महोत्सव आयोजित हुआ। यह आयोजन आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज संघ सानिध्य एवं प्रतिष्ठाचार्य श्री नमन भैया, पंडित जयकुमार जैन, पंडित सुलभ जैन शास्त्री और आकाश जैन के निर्देशन में सम्पन्न हुआ। श्रद्धालुओं ने पाषाण से भगवान बनने की अद्भुत क्रिया को प्रत्यक्ष देखा और इस क्षण को जीवन का सर्वोत्तम पुण्यफल बताया।</p>
<p><strong>युवाओं ने निभाई प्रमुख भूमिकाएं, धर्म जागृति का बना प्रतीक</strong></p>
<p>इस महोत्सव की विशेषता यह रही कि प्रमुख पात्र युवा वर्ग से थे। इससे समाज में नई ऊर्जा और धर्म की अलख जागृत हुई। आचार्य श्री ने कहा कि धर्म की रक्षा और संयम का पालन युवाओं की सहभागिता से ही संभव है।</p>
<p><strong>प्रातः बेला में सम्पन्न हुआ मोक्षकल्याणक महोत्सव</strong></p>
<p>अंतिम दिन प्रभात बेला में मोक्षकल्याणक महोत्सव का आयोजन हुआ। आचार्य श्री ने प्रवचन देते हुए कहा — “जैनत्व के बिना कर्म क्षय का मार्ग नहीं खुलता। जब हृदय में लोभ-लालसा का क्षय होता है, तभी आत्मा शुद्धि का द्वार खुलता है।” उन्होंने समझाया कि आदि प्रभु ने कैलाश पर्वत पर योग निरोध धारण कर कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया।</p>
<p><strong>दोपहर में सम्पन्न हुआ पिच्छिका परिवर्तन समारोह</strong></p>
<p>दोपहर की बेला में परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज संघ का पिच्छिका परिवर्तन सम्पन्न हुआ। श्रद्धालुओं ने भक्ति भावना से सुसज्जित थालों से अष्टद्रव्य पूजन किया। इस अवसर पर आरवी सबदरा ने नृत्य प्रस्तुति दी, और सुरलाया, रुचि टोंग्या ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन मुनि श्री 108 प्रांजल सागर महाराज ने किया।</p>
<p><strong>इनको मिला पुरानी पिच्छिका का सौभाग्य</strong></p>
<p>आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज की पुरानी पिच्छिका श्रीमान नितिन-कल्पना सबदरा को प्राप्त हुई। मुनि श्री 108 प्रांजल सागर महाराज की पिच्छिका प्रदीप-संगीता विनायका को मिली। मुनि श्री प्रत्यक्ष सागर महाराज की पिच्छिका देवेंद्र-मीनाक्षी टोंग्या को प्राप्त हुई, जबकि प्रमेश सागर महाराज की पिच्छिका प्रदीप कुमार-चंदना लुहाड़िया रामगंजमंडी को प्राप्त हुई। सकल दिगंबर जैन समाज रामगंजमंडी की ओर से आचार्य श्री को “वात्सल्यमना” उपाधि से सम्मानित किया गया। यह उपाधि समाज संरक्षक अजीत सेठी, अध्यक्ष दिलीप विनायका, उपाध्यक्ष चेतन बागड़िया, कमल लुहाड़िया, मंत्री राजीव बाकलीवाल और महावीर मंदिर अध्यक्ष महेंद्र ठोरा सहित अन्य गणमान्यजनों ने संयुक्त रूप से प्रदान की।</p>
<p><strong>आचार्य श्री ने बताया — “पिच्छिका संयम का प्रतीक”</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि “पिच्छिका निर्ग्रंथ का स्वरूप है। इसके बिना साधु निर्ग्रंथ नहीं हो सकता। यह संयम का प्रमुख उपकरण है और दिगंबर मुद्रा का आधार भी।” उन्होंने कहा कि जैन दर्शन का मूल लक्ष्य जीवों का संरक्षण और आत्मशुद्धि है। मयूर पिच्छिका जीवदया का प्रतीक है, क्योंकि मयूर अपने त्यागे हुए पंख से पिच्छिका बनाता है।</p>
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		<title>झुमरीतिलैया में अनंत चतुर्दशी पर धूमधाम से निकली शोभायात्रा : वासुपूज्य भगवान के मोक्ष कल्याणक पर चढ़ाया गया निर्वाण लाडू </title>
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		<pubDate>Sun, 07 Sep 2025 08:32:16 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[झुमरीतिलैया में दसलक्षण पर्यूषण के अंतिम दिन अनंत चतुर्दशी का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया गया। शोभायात्रा में बैंड बाजा, डांडिया नृत्य और जयकारों से पूरा नगर गूंज उठा। भगवान वासुपूज्य के मोक्ष कल्याणक पर निर्वाण लाडू चढ़ाया गया। पढ़िए राजकुमार जैन अजमेरा और नवीन जैन की खास रिपोर्ट… झुमरीतिलैया में शनिवार को जैन धर्म [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>झुमरीतिलैया में दसलक्षण पर्यूषण के अंतिम दिन अनंत चतुर्दशी का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया गया। शोभायात्रा में बैंड बाजा, डांडिया नृत्य और जयकारों से पूरा नगर गूंज उठा। भगवान वासुपूज्य के मोक्ष कल्याणक पर निर्वाण लाडू चढ़ाया गया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजकुमार जैन अजमेरा और नवीन जैन की खास रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>झुमरीतिलैया में शनिवार को जैन धर्म का सर्वोच्च पर्व दसलक्षण पर्यूषण का अंतिम दिन, अनंत चतुर्दशी का पर्व, भव्य शोभायात्रा के साथ मनाया गया। इस शोभायात्रा में बैंड बाजा, डांडिया नृत्य और भगवान के जयकारों से वातावरण गुंजायमान हो गया। वासुपूज्य भगवान को पालकी में बैठाकर नगर भ्रमण कराया गया, जिसमें महिलाएं, पुरुष और बच्चे केसरिया एवं श्वेत वस्त्रों में शामिल हुए। शोभायात्रा बड़ा मंदिर डॉक्टर गली से प्रारंभ होकर पानी टंकी रोड जैन मंदिर तक पहुंची। रास्ते में तोरणद्वार सजाए गए और भक्तों ने भगवान की आरती उतारी। इस अवसर पर भजन सम्राट सुबोध जैन गंगवाल, संजय लट्टू जैन छाबड़ा, मुकेश जैन अजमेरा और अनिल जैन पांडया ने अपने भजनों से श्रद्धालुओं को आनंदित किया।</p>
<p>प्रातःकाल पंडित अभिषेक शास्त्री एवं डॉ. निर्मला दीदी के सान्निध्य में उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म व्रत की पूजा हुई और भगवान वासुपूज्य का मोक्ष कल्याणक निर्वाण लाडू चढ़ाकर मनाया गया। निर्मला दीदी ने अपने प्रवचन में कहा कि आत्मा में लीन हो जाना ही ब्रह्मचर्य धर्म है और जैन दर्शन में इसका सर्वोच्च स्थान है।</p>
<p><strong>उपवास करने वाले तपस्वियों की अनुमोदना </strong></p>
<p>नगर के विभिन्न मंदिरों में अभिषेक, शांतिधारा और निर्वाण लाडू चढ़ाने का सौभाग्य अनेक परिवारों को प्राप्त हुआ। बड़ा मंदिर स्टेशन रोड, नया मंदिर पानी टंकी रोड और पदुक शीला मंदिर में क्रमवार धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। समाज के उपमंत्री राज छाबड़ा, कोषाध्यक्ष सुरेंद्र काला, पूर्व अध्यक्ष ललित जैन सहित कई पदाधिकारियों ने उपवास करने वाले तपस्वियों की अनुमोदना की। रात्रि को बड़ा मंदिर में विश्व शांति के लिए भक्तामर पाठ 48 दीपक और मंत्रोच्चार के साथ आयोजित होगा। इस अवसर पर समाज के विभिन्न परिवारों ने भक्ति भाव से भागीदारी निभाई। यह भव्य आयोजन जैन समाज की अध्यात्म, भक्ति और संस्कृति का अनुपम उदाहरण रहा।</p>
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		<title>भगवान मुनिसुव्रतनाथ का मोक्ष कल्याण 25 फरवरी को: तिथि से मोक्ष कल्याणक फाल्गुन कृष्ण द्वादशी को आता है </title>
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		<pubDate>Tue, 25 Feb 2025 03:25:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर भगवान मुनिसुव्रत नाथ का 25 फरवरी मंगलवार यानि फाल्गुन कृष्ण द्वादशी के दिन मोक्ष कल्याणक है। इस दिन दिगंबर जैन जिनालयों में भक्ति भाव से आराधना, अभिषेक, शांतिधारा सहित विधान किए जाएंगे। भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी ने जैन धर्म के पूर्व तीर्थंकरों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए भरत क्षेत्र में [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर भगवान मुनिसुव्रत नाथ का 25 फरवरी मंगलवार यानि फाल्गुन कृष्ण द्वादशी के दिन मोक्ष कल्याणक है। इस दिन दिगंबर जैन जिनालयों में भक्ति भाव से आराधना, अभिषेक, शांतिधारा सहित विधान किए जाएंगे। भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी ने जैन धर्म के पूर्व तीर्थंकरों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए भरत क्षेत्र में विहार कर धर्म प्रभावना कर जैन समाज को धर्म, संयम, नियम आदि के मार्ग पर चलकर मोक्ष का संदेश दिया। इस अवसर पर श्रीफल जैन न्यूज की श्रंखला के तहत <span style="color: #ff0000">यह विशेष प्रस्तुति उप संपादक प्रीतम लखवाल के संकलन और संयोजन में पढ़िए&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर</strong>। भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी जैन धर्म के 20वें तीर्थकर थे। उन्होंने जैन धर्म की प्रभावना को भारत वर्ष ही नहीं समूचे विश्व के जैन समाज में पहुंचाई। उनका मोक्ष कल्याणक फाल्गुन कृष्ण द्वादशी के दिन रात के पिछले भाग में शरीर से रहित अशरीरी सिद्ध हो गए। भगवान एक मास की आयु अवशेष रहने पर विहार बंद करके सम्मेद शिख पर पहुंचे तथा  एक हजार मुनियों के साथ प्रतिमा योग में तीन हो गए। जैन धर्म ग्रंथों के अनुसार प्रभु  के छद्मस्थ अवस्था के 11 महीने बीत जाने के बाद वे उसी नीलवन में पहुंचे और बेला नियम सहित ध्यानारूढ़ हो गए। वैशाख शुक्ल दशमी के दिन श्रवण नक्षत्र में शाम के समय प्रभु को केवल ज्ञान प्रकट हुआ। भगवान के समवसरण में मल्लि को आदि लेकर 10 गणधर थे। 30 हजार  मुनिराज, पुष्पदंता को आदि लेकर 50 हजार आर्यिकाएं, एक लाख श्रावक तथा 3 लाख श्राविकाएं थीं।</p>
<p><strong>भगवान मुनिश्री सुव्रतनाथ का परिचय</strong></p>
<p>भरत क्षेत्र के अंग देश के चंपापुर नगर में हरिवर्मा नाम के राजा थे। किसी दिन वहां के उद्यान में अनंतवीर्य नाम के निग्ररंथ मुनिराज पधारे। उनकी वंदना करके राजा ने धर्मोपदेश सुना। तत्क्षण विरक्त होकर अपने बड़े पुत्र को राज्य देकर अनेक राजाओं के साथ संयम धारण किया। उन्होंने गुरु के समागम से 11 अंगों का अध्ययन किया और दर्शनविशुद्धि आदि सोलह कारण भावनाओं का चिंतवन तीर्थंकर गोत्र का बंध किया। चिरकाल तक तपश्चरण करते हुए अंत में समाधिपूर्वक मरण करके प्राणत स्वर्ग में इंद्र हो गए। वहां 20 सागर की आयु थी और  उनका साढे तीन हाथ उंचा शरीर था।</p>
<p><strong>गर्भ और जन्म </strong></p>
<p>मगध देश में राजगृह नाम का नगर है। उसमें हरिवंश शिरोमणि, काश्यपगोत्रीय, सुमित्र महाराज राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम सोमा था। श्रावण कृष्ण द्वितीया के दिन श्रवण नक्षत्र में रानी ने प्राणत इंद्र को गर्भ में धारण किया। अनुक्रम से नौ मास के बाद रानी ने पुत्र रत्न को जन्म दिया। देवों ने भगवान का जन्मोत्सव मनाकरमुनिसुव्रत नाम प्रकट किया। मल्लिनाथ के बाद 54 लाख वर्ष बीत जाने पर इनका जन्म हुआ। इनकी आयु 30 हजार वर्ष थी।</p>
<p><strong>भगवान मुनिसुव्रतनाथ का तप</strong></p>
<p>कुमारकाल के 7 हजार 500 साल बीज जाने पर भगवान का राज्याभिषेक हुआ। राज अवस्था में प्रभु के 15 हजार वर्ष बीत जाने पर किसी दिन गरजती हुई घनघटा के समय उनके याग हस्ती ने वन का स्मरण कर खाना-पीना बंद कर दिया। उस समय महाराज मुनिसुव्रतनाथ अपने अवधि ज्ञान सेउस हाथी के मन की सारी बातें जान गए। वे कौतुहल से भरे मनुष्यों के सामने हाथी का पूर्व भव कहने लगे कि यह हाथी पूर्व भव में तालपुर नगर का नरपति राजा था। अपने उच्चकुल के अभियान सहित इसने अश्ुभलेश्याओं से सहित मिथ्या ज्ञानी, पात्र-अपात्र की परीक्षा से रहित किमिच्छिक दान दिया था। उसके फलस्वरूप यह हाथी हुआ है। इस समय भी यह अपने अज्ञान आदि का स्मरण न करता हुआ वन का स्मरण कर रहा है। इतना सुनते ही उस हाथी को अपने पूर्व भव का स्मरण हो गया। उसने प्रभु से संयामासंयम ग्रहण कर लिया। इसी निमित्त से प्रभु को वैराग्य हो गया और लौकांतिक देवों द्वारा पूजा को प्राप्त भगवान अपराजित नामक पालकी पर बैठकर नीलवन पहुंचे। वहां बेला के उपवास का नियम लेकर वैशाख कृष्ण दशमी के दिनएक हजार राजाओं के साथ दीक्षित हो गए। उनकी प्रथम पारणा का लाभ राजगृह नगर के राजा वृषभसेन को प्राप्त हुआ था।</p>
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		<title>रक्षाबंधन पर्व मनाया : समाज जनों ने बांधे माताजी की पिच्छी को राखियां व रक्षा सूत्र </title>
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		<pubDate>Tue, 20 Aug 2024 03:53:55 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में विराजमान गणिनी आर्यिका सरस्वती माताजी के ससंघ सानिध्य में रक्षाबंधन पर्व एवं श्रेयांस नाथ भगवान का मोक्ष कल्याणक मनाया गया। नगर में विराजमान आर्यिका सरस्वती माताजी के सानिध्य में बड़ा मंदिर जी में प्रातः सर्वप्रथम श्रीजी का पंचामृत अभिषेक शांति धारा कर सामूहिक पूजन किया गया, साथ ही ग्यारहवें [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में विराजमान गणिनी आर्यिका सरस्वती माताजी के ससंघ सानिध्य में रक्षाबंधन पर्व एवं श्रेयांस नाथ भगवान का मोक्ष कल्याणक मनाया गया। नगर में विराजमान आर्यिका सरस्वती माताजी के सानिध्य में बड़ा मंदिर जी में प्रातः सर्वप्रथम श्रीजी का पंचामृत अभिषेक शांति धारा कर सामूहिक पूजन किया गया, साथ ही ग्यारहवें तीर्थंकर श्रेयांस नाथ भगवान के मोक्ष कल्याणक पर लाड़ू चढ़ाया गया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सनावद।</strong> श्री दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में विराजमान गणिनी आर्यिका सरस्वती माताजी के ससंघ सानिध्य में रक्षाबंधन पर्व एवं श्रेयांस नाथ भगवान का मोक्ष कल्याणक मनाया गया। नगर में विराजमान आर्यिका सरस्वती माताजी के सानिध्य में बड़ा मंदिर जी में प्रातः सर्वप्रथम श्रीजी का पंचामृत अभिषेक शांति धारा कर सामूहिक पूजन किया गया, साथ ही ग्यारहवें तीर्थंकर श्रेयांस नाथ भगवान के मोक्ष कल्याणक पर लाड़ू चढ़ाया गया। इस अवसर पर शांति धारा करने का सौभाग्य पवन कुमार, हर्षित जैन परिवार एवं राजकुमारी मूलचंद जैन परिवार को प्राप्त हुआ। श्रेयांस नाथ भगवान को मोक्ष कल्याणक का लाडू चढ़ाने का सौभाग्य सभी समाजजनों को प्राप्त हुआ।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-64843" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/08/IMG-20240820-WA0007.jpg" alt="" width="1280" height="576" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/08/IMG-20240820-WA0007.jpg 1280w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/08/IMG-20240820-WA0007-300x135.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/08/IMG-20240820-WA0007-1024x461.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/08/IMG-20240820-WA0007-768x346.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/08/IMG-20240820-WA0007-990x446.jpg 990w" sizes="(max-width: 1280px) 100vw, 1280px" />सुनाई रक्षाबंधन की कथा</strong></p>
<p>सन्मति जैन काका ने बताया कि इस पावन अवसर पर माताजी ने रक्षाबंधन की कथा सुनाते हुए कहा कि जैन पौराणिक ग्रंथों के अनुसार उज्जयिनी में श्री धर्म नाम के राजा के चार मंत्री थे बलि, बृहस्पति, नमुचि और प्रह्लाद। ये चारों मंत्री जैन धर्म के घोर विरोधी थे। इन मंत्रियों ने शास्त्रार्थ में पराजित होने के कारण जैन संत श्रुतसागर मुनिराज पर तलवार से प्रहार का प्रयास किया तो राजा ने उन्हें देश से निकाल दिया। चारों मंत्री अपमानित होकर हस्तिनापुर के राजा पद्म की शरण में आए। कुछ समय बाद मुनि अकंपनाचार्य 700 मुनि शिष्यों के संग हस्तिनापुर पहुंचे। बलि को अपने अपमान का बदला लेने का विचार आया। उसने राजा से वरदान के रूप में सात दिन के लिए राज्य मांग लिया।</p>
<p>राज्य पाते ही बलि ने मुनि तथा आचार्य के साधना स्थल के चारों तरफ आग लगवा दी। धुएं और ताप से ध्यानस्थ मुनियों को अपार कष्ट होने लगाए पर मुनियों ने अपना धैर्य नहीं तोड़ा। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि जब तक यह कष्ट दूर नहीं होगा, तब तक वे अन्ना-जल का त्याग रखेंगे। वह दिन श्रावण शुक्ल पूर्णिमा का दिन था। मुनियों पर संकट जानकर मुनिराज विष्णु कुमार ने वामन का वेश धारण किया और बलि के यज्ञ में भिक्षा मांगने पहुंच गए। उन्होंने बलि से तीन पग धरती मांगी। बलि ने दान की हामी भर दी तो विष्णु कुमार ने योग बल से शरीर को बहुत अधिक बढ़ा लिया। उन्होंने अपना एक पग सुमेरु पर्वत पर दूसरा पग मानुषोत्तर पर्वत पर रखा और अगला पग स्थान न होने से आकाश में डोलने लगा।</p>
<p>सर्वत्र हाहाकार मच गया। बलि के क्षमायाचना करने पर उन्होंने मुनिराज अपने स्वरूप में आए। इस तरह सात सौ मुनियों की रक्षा हुई। विघ्न दूर होते ही प्रजा ने खुशियां मनाई, श्री मुनि संघ को स्वास्थ्य के अनुकूल आहार दिया, वैयावृत्ति की, तभी से जैन परंपरा में रक्षाबंधन मनाया जाता है। रक्षाबंधन के दिन जैन मंदिरों में श्रावक-श्राविकाएं जाकर धर्म और संस्कृति की रक्षा के संकल्प पूर्वक रक्षासूत्र बांधते हैं और रक्षाबंधन पूजन करते हैं।</p>
<p>इस अवसर पर माताजी द्वारा अभिमंत्रित रक्षा सूत्र वितरित किये गए। समाज जनों के द्वारा माताजी की पिच्छी को राखियां व रक्षा सूत्र बांधे गये। इस अवसर पर सभी जिनमंदिरों के साथ पोदनपुरम नमोकार धाम सहित मोटक्का में भी लाडू समर्पित कर भगवान का मोक्ष कल्याणक मनाया गया। इस शुभ अवसर पर सभी समाजजन उपस्थित थे।</p>
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		<title>होगी संगीतमय महाआरती : भगवान नेमीनाथ के जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव 10 अगस्त को कुंडलपुर में </title>
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		<pubDate>Fri, 09 Aug 2024 17:08:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में जैन धर्म के 22 वें तीर्थंकर भगवान श्री नेमिनाथ का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव 10 अगस्त को धूमधाम से मनाया जाएगा। पढ़िए यह रिपोर्ट&#8230; कुंडलपुर (दमोह)। सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में जैन धर्म के 22 वें तीर्थंकर भगवान श्री नेमिनाथ का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव 10 अगस्त को [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में जैन धर्म के 22 वें तीर्थंकर भगवान श्री नेमिनाथ का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव 10 अगस्त को धूमधाम से मनाया जाएगा। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुंडलपुर (दमोह)।</strong> सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में जैन धर्म के 22 वें तीर्थंकर भगवान श्री नेमिनाथ का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव 10 अगस्त को धूमधाम से मनाया जाएगा। इस अवसर पर प्रातः भक्तामर महामंडल विधान ,पूज्य बड़े बाबा का अभिषेक, शांति धारा, पूजन विधान होगा। श्रीजी का पालना झुलाया जाएगा। सायंकाल भक्तामर दीप अर्चना एवं पूज्य बड़े बाबा की संगीतमय महा आरती होगी।</p>
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