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	<title>मुनि &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>मुनि &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>मुक्तागिरी में 22 मुनियों की निर्ग्रंथ जैनेश्वरी दीक्षा दी: बड़ी संख्या में श्रद्धालु मुनि दीक्षा देखने पहुंचे मुक्तागिरी  </title>
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		<pubDate>Thu, 19 Feb 2026 10:53:13 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बैतूल जिले के मुक्तागिरी में आचार्यश्री समयसागरजी महाराज द्वारा आचार्य बनने के बाद पहली बार 22 मुनियों को निर्ग्रंथ जैनेश्वरी दीक्षा प्रदान की गई। संपूर्ण भारत से ब्रह्मचारी तथा सैकड़ों की संख्या में गुरु भक्त श्रद्धालु यहां से 6 बस तथा 14 से अधिक चार पहिया वाहनों से मुक्तागिरी पहुंचे। विदिशा से पढ़िए, राजीव सिंघई [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>बैतूल जिले के मुक्तागिरी में आचार्यश्री समयसागरजी महाराज द्वारा आचार्य बनने के बाद पहली बार 22 मुनियों को निर्ग्रंथ जैनेश्वरी दीक्षा प्रदान की गई। संपूर्ण भारत से ब्रह्मचारी तथा सैकड़ों की संख्या में गुरु भक्त श्रद्धालु यहां से 6 बस तथा 14 से अधिक चार पहिया वाहनों से मुक्तागिरी पहुंचे। <span style="color: #ff0000">विदिशा से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>विदिशा।</strong> बैतूल जिले के मुक्तागिरी में आचार्यश्री समयसागरजी महाराज द्वारा आचार्य बनने के बाद पहली बार 22 मुनियों को निर्ग्रंथ जैनेश्वरी दीक्षा प्रदान की गई। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया पूर्व में इस स्थान से 8 फरवरी 1998 को समाधिस्थ आचार्य श्री विद्यासागरजी द्वारा मुनि दीक्षा प्रदान की गई थी। 28 साल बाद पुनः मुक्तागिरी में यह मौका विद्या शिरोमणि आचार्यश्री समयसागर जी महाराज के गुरुवार को मुनि दीक्षा देने के रूप में आया। इस निर्ग्रन्थ मुनि दीक्षा समारोह में विदिशा नगर गौरव ऐलक कैवल्य सागर जी, ऐलक गरिष्ठ सागर जी महाराज सहित अन्य ऐलक तथा क्षुल्लक शामिल हैं। संपूर्ण भारत से ब्रह्मचारी तथा सैकड़ों की संख्या में गुरु भक्त श्रद्धालु यहां से 6 बस तथा 14 से अधिक चार पहिया वाहनों से मुक्तागिरी पहुंचे और उन्होंने दीक्षा समारोह के साथ साथ तीर्थ वंदना का भी लाभ लिया तथा संघस्थ मुनिराजों के दर्शन किए। अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया यह सिद्धक्षेत्र बैतूल जिले के महाराष्ट्र सीमा से लगा हुआ यह जैन सिद्धक्षेत्र मुक्तागिरी है। जहां से साढे़ तीन करोड़ मुनि तपस्या करके मोक्ष को गये हैं। ऐसे तीर्थ क्षेत्र पर आचार्य गुरुदेव के जाने के दो वर्ष बाद नवाचार्य समयसागर महाराज ने ऐलक एवं क्षुल्लकों सहित 22 मुनिराजों को जैनेश्वरी दीक्षा प्रदान की। इस अवसर पर समस्त भारत से लाखों की संख्या में श्रावक एवं श्राविका उपस्थित थे। इस अवसर पर इंदौर जबलपुर आश्रम से ब्रह्मचारी एवं बहनें तथा भक्त उपस्थित थे। दीक्षा विधि का संचालन मुनि श्री प्रशस्त सागर महाराज ने किया तथा संचालन बाल ब्रह्मचारी विनय भैया बंडा ने किया।</p>
<p><strong>मुनि श्री संभवसागरजी ने अपने दीक्षा के अनुभव साझा किए</strong></p>
<p>इधर, विदिशा में प्रातःकाल मुनि श्री संभवसागर महाराज ने अपने दीक्षा के अनुभव को सुनाते हुए कहा कि संघ में तो मेरा प्रवेश 1996 सिद्धक्षेत्र गिरनार जी में हो गया था लेकिन, जैनेश्वरी दीक्षा 22 अप्रैल 1998 को 23 दीक्षाओं के साथ हुई। उन्होंने उस समय के परिणामों को साझा करते हुए कहा कि आचार्य गुरुदेव ने मंच से कहा कि यह मोक्ष मार्ग बहुत कठिन है। अभी भी आप लोग विचार कर सकते हैं। एक बार इस मार्ग पर आने के बाद घर, परिवार अथवा माता-पिता की याद नहीं आना चाहिए कि घर पर तो मेरी मां रोज गरम-गरम रोटी सेककर खिलाती थी। यहां ठंडा मिलेगा और मिलेगा कि नहीं मिलेगा कुछ भी निश्चित नहीं। अभी भी समय है आप लोगों ने जो निवेदन किया है, एक बार और विचार कर लीजिए सभी दीक्षार्थियों ने एक स्वर में कहा कि गुरुदेव हमने आपकी पाठशाला में प्रवेश किया है। अब कभी पीछे मुढ़कर नहीं देखेंगे। आप हमें जैनेश्वरी दीक्षा प्रदान कीजिए। समाज की तथा सभी के माता-पिता की स्वीकृति के बाद गुरुदेव उठे और प्रत्येक दीक्षार्थी के पास प्रत्यक्ष में जाकर उनके मस्तिष्क पर मंत्रोच्चारण के साथ दीक्षा की संपूर्ण विधि को संपादित किया।</p>
<p><strong>गुरुदेव की पाठशाला में प्रवेश के लिए परीक्षा कठिन </strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि जब गुरुदेव मेरे सामने आकर खड़े हुए तो ऐसा लगा कि संसार की सबसे कीमती वस्तु मुझे मिल गई है। मैं बहुत ही अभिभूत था और जब गुरुदेव ने मेरे सिर पर दीक्षा की क्रियाएं संपन्न की तो मुझे ऐसा लगा कि संसार की सबसे अनमोल चीज मिल गई हो। मुनि श्री ने कहा कि प्रत्येक दीक्षार्थी के सिर पर ओम तथा स्वास्तिक बनाकर पांच महाव्रतों के साथ 28 मूलगुण का केसर तथा लौंग आदि के माध्यम से आरोहण किया जाता है। मुनि श्री ने कहा कि आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज इस युग के महान संत थे। जिन्होंने पचास वर्ष से अधिक संयम के पूर्ण किए ऐसे महान गुरु के पाद मूल में बैठकर उनके शिष्य बनने का दुर्लभ सौभाग्य मिला। मुनि श्री ने कहा कि यूपीएससी का एग्जाम करना तो सरल है, लेकिन गुरुदेव की पाठशाला में प्रवेश पाना बहुत कठिन है। उन्होंने कहा कि गुरुदेव की पाठशाला में प्रवेश के लिए कितनी बार परीक्षा देना होती है। कई लोगों को तो वर्षों तक प्रतीक्षा करना होती है।</p>
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		<title>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के ससंघ में 3 नवंबर को पीछी परिवर्तन : 7 से 12 नवंबर तक टोंक में होगा पंच कल्याणक महोत्सव </title>
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		<pubDate>Thu, 16 Oct 2025 11:26:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[टोंक में 3 नवंबर को आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के ससंघ के सानिध्य में पीछी परिवर्तन समारोह आयोजित होगा। इसके बाद 7 से 12 नवंबर तक पंच कल्याणक महोत्सव संपन्न होगा। आचार्य श्री धर्म सागर जी महाराज द्वारा दीक्षा प्राप्त साधु-आर्यिका एवं समाज की सहभागिता से यह आयोजन होगा। पढ़िए राजेश पंचोलिया की [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>टोंक में 3 नवंबर को आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के ससंघ के सानिध्य में पीछी परिवर्तन समारोह आयोजित होगा। इसके बाद 7 से 12 नवंबर तक पंच कल्याणक महोत्सव संपन्न होगा। आचार्य श्री धर्म सागर जी महाराज द्वारा दीक्षा प्राप्त साधु-आर्यिका एवं समाज की सहभागिता से यह आयोजन होगा। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>आत्मा पर कर्मों के आश्रव से संसार में परिभ्रमण होता है, और संयम तथा दीक्षा अपनाना ही सही मार्ग है। आचार्य श्री धर्म सागर जी महाराज ने बताया कि मुनि अवस्था में उन्हें श्री महावीर स्वामी के दर्शन प्राप्त हुए। द्वितीय पट्टाधीश आचार्य श्री शिव सागर जी की अनायास समाधि के बाद, आचार्य श्री धर्म सागर जी तृतीय पट्टाधीश नियुक्त हुए और 24 फरवरी 1969 को 11 व्यक्तियों को दिगंबर दीक्षा दी गई।</p>
<p>आचार्य श्री धर्म सागर जी ने अनेक नगरों में दीक्षाएं दी और सन 1987 में सीकर में अघोषित संलेखना के दौरान साधु जीवन का उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने सदैव जैन समाज के हितों की रक्षा की और समाधि स्थल के नवीनीकरण की प्रेरणा दी।</p>
<p>टोंक नगर में 7 से 12 नवंबर तक पंच कल्याणक प्रतिष्ठा का आयोजन किया जाएगा। आज आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के ससंघ के सानिध्य में श्रेष्ठी श्री मोहनलालजी जैन पुना छामुनिया को “वात्सल्यभक्त” की उपाधि से सम्मानित किया गया।</p>
<p>पंचकल्याणक समिति के पदाधिकारियों ने सम्पूर्ण जैन समाज को कार्यक्रम में सादर आमंत्रित किया। 3 नवंबर को श्री आदिनाथ नसिया में 34 साधुओं के साथ आचार्य श्री वर्धमान सागर जी द्वारा पीछी परिवर्तन किया जाएगा।</p>
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		<title>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सिद्ध हस्त कर कमलों से 2 अक्टूबर 2025 को अतिशय क्षेत्र टोंक में होगी जैनेश्वरी दीक्षा : 1 अक्टूबर को होगा मंडल विधान पूजन, आचार्य श्री का चमत्कारिक आशीर्वाद </title>
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		<pubDate>Tue, 30 Sep 2025 05:34:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अतिशय क्षेत्र टोंक में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सान्निध्य में 2 अक्टूबर 2025 को जैनेश्वरी दीक्षा संपन्न होगी। 1 अक्टूबर को मंडल विधान पूजन और पंचामृत अभिषेक होगा। आचार्य श्री ने बीमार एवं वृद्धजनों को भी आशीर्वाद प्रदान कर वात्सल्य और सेवा का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया। पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट… अतिशय [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अतिशय क्षेत्र टोंक में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सान्निध्य में 2 अक्टूबर 2025 को जैनेश्वरी दीक्षा संपन्न होगी। 1 अक्टूबर को मंडल विधान पूजन और पंचामृत अभिषेक होगा। आचार्य श्री ने बीमार एवं वृद्धजनों को भी आशीर्वाद प्रदान कर वात्सल्य और सेवा का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अतिशय क्षेत्र टोंक।</strong> आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सहित विराजित होने के बाद प्रतिदिन अनेक धार्मिक महोत्सव आयोजित हो रहे हैं, जिनसे समाजजन लाभांवित हो रहे हैं। इसी क्रम में टोंक नगर में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी अपने सिद्धहस्त करकमलों से दूसरी बार दीक्षा देने जा रहे हैं।</p>
<p>अहमदाबाद जिले के कलोल नगर के 69 वर्षीय श्री अवनीश भाई ने दीक्षा हेतु निवेदन किया। उनकी दीक्षा 2 अक्टूबर 2025 को श्री आदिनाथ जिनालय नसिया परिसर में होगी। 1 अक्टूबर को दीक्षार्थी पंचामृत अभिषेक करेंगे, आचार्य संघ की आहारचर्या के बाद कर पात्र में भोजन करेंगे और दोपहर में गणधर वलय विधान की पूजन संघ सान्निध्य में होगी। दीक्षार्थी के परिजन और समाजजन मेहंदी-हल्दी, श्रीफल, सूखे मेवे, फल एवं मिश्री आदि से दीक्षा भाव की अनुमोदना करेंगे।</p>
<p>उल्लेखनीय है कि अवनीश भाई के साले सा समाधिस्थ मुनि श्री पदमकीर्ति सागर और उनकी पत्नी भी आचार्य श्री वर्धमान सागर जी से ही दीक्षा लेकर संघस्थ हुए हैं।</p>
<p><strong>सिद्धहस्त करकमलों और वात्सल्य से अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया</strong></p>
<p>इस अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बीमार एवं वृद्धजनों को भी अपने आशीर्वाद से लाभान्वित किया। टोंक नगर की 98 वर्षीय गुलाब देवी, जो गंभीर रूप से अस्वस्थ थीं, को आचार्य श्री ने आदर्श नगर स्थित निवास पर जाकर संबोधित किया। उनके शिष्य मुनि श्री हितेंद्र सागर जी भी उपस्थित रहे। परिजनों ने आचार्य श्री के वात्सल्य और विनय से प्रेरित होकर सीमित परिग्रह त्याग किया। शास्त्रों में उल्लेखित है कि जब योग्य गुरु का संबोधन किसी भव्य जीव को प्राप्त होता है, तो उसका भाव एवं परिणाम विशुद्धि प्राप्त करता है। इस अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने अपने सिद्धहस्त करकमलों और वात्सल्य से इस बात का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया।</p>
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		<title>धूमधाम से मनाया गया अक्षय तृतीया पर्व ओम शब्द से होती मोक्ष की प्राप्ति– मुनि श्री चंद्रप्रभसागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Fri, 10 May 2024 16:51:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में संत शिरोमणि आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के चतुर्विध संघ के सानिध्य में अक्षय तृतीया पर्व धूमधाम से मनाया गया ।इस अवसर पर प्रातः भक्तांमर महामंडल विधान, पूज्य बड़े बाबा का अभिषेक, शांति धारा ,पूजन, विधान हुआ। पढि़ए राजीव [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में संत शिरोमणि आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के चतुर्विध संघ के सानिध्य में अक्षय तृतीया पर्व धूमधाम से मनाया गया ।इस अवसर पर प्रातः भक्तांमर महामंडल विधान, पूज्य बड़े बाबा का अभिषेक, शांति धारा ,पूजन, विधान हुआ। <span style="color: #ff0000">पढि़ए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट ……</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुंडलपुर।</strong> सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में संत शिरोमणि आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के चतुर्विध संघ के सानिध्य में अक्षय तृतीया पर्व धूमधाम से मनाया गया ।इस अवसर पर प्रातः भक्तांमर महामंडल विधान, पूज्य बड़े बाबा का अभिषेक, शांति धारा ,पूजन, विधान हुआ। ज्ञान साधना केंद्र परिसर के सामने पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज एवं आचार्य श्री समय सागर जी महाराज की पूजन हुई। मुनि संघ एवं आर्यिका संघ की आहार चर्या संपन्न हुई ।</p>
<p><strong>जैसे विचार मन में रहते है कार्य होता वैसा </strong></p>
<p>मुनिश्री चंद्रप्रभसागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि हमारा देश धर्म प्रधान देश है ।इसमें अनेक प्रकार के संप्रदाय ,मजहब , पंथ और संस्कृति है ।सभी परंपराओं में चार पुरुषार्थ बताए गए हैं, धर्म ,अर्थ ,काम, मोक्ष। जैसे दिशाएं चार हैं, गति चार हैं उसी प्रकार यह पुरुषार्थ भी चार हैं। चारों पुरुषार्थों में धर्म पुरुषार्थ को प्रधानता दी गई है ।मंगलाचरण में आप बोलते ओमकार ,आचार्य श्री को जो बहुत प्रिय था वह मंगलाचरण बार-बार बोलते थे ।ओंकार बिंदु संयुक्तम आचार्य महाराज बार-बार बोलते थे ।बड़े-बड़े योगी भी ओमकार का ध्यान करते हैं ।अंत समय उंकार निकले तो वह काम में आता है। आचार्य श्री उंकारा नमो नमः बोलते थे। वह हमेशा बोलते थे। ओम शब्द के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति होती ।उसके माध्यम से अंतरंग भाव प्रकट होता। आचार्य श्री बोलते है एक अक्षर बोलो सब कार्य हो जाएगा वह है ओम अक्षर। धर्म से लेकर मोक्ष तक चार पुरुषार्थ है। दो पुरुषार्थ अर्थ और काम ,संसार में भटका देते ।जैसे-जैसे मन में विचार होता है, वैसा-वैसा आचार होता चला जाता ।अंतरंग में शुभ परिणाम रखो, हमेशा अच्छा सोचो ,सोच अच्छी रखो, विचार के माध्यम से प्रचार- प्रसार होता रहता है । जैसे विचार मन में रहते, वैसा कार्य होता। मुनि श्री ने एक लकड़हारा का प्रसंग सुनाते हुए अपने प्रवचन को पूर्ण किया।मुनि श्री निराकुल सागर जी महाराज ने रामचरितमानस के प्रसंग को सुनाते हुए प्रवचन दिया।</p>
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		<title>आचार्य विशुद्ध सागर महाराज और उनके शिष्यों का पावन वर्षायोग : समूचे भारत वर्ष में करेंगे जैन धर्म की प्रभावना </title>
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		<pubDate>Thu, 22 Jun 2023 15:18:48 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य विशुद्ध सागर महाराज और उनके शिष्यों का पावन वर्षायोग देश के अलग-अलग राज्यों में होगा। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट&#8230; इंदौर। आचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज, उनके संघस्थ मुन और उनके प्रभावक शिष्य देश भर में अलग-अलग स्थानों पर चातुर्मास करेंगे। आचार्य विशुद्ध सागर महाराज संघस्थ मुनियों श्रमण मुनि श्री सुव्रतसागर जी,. श्रमण [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य विशुद्ध सागर महाराज और उनके शिष्यों का पावन वर्षायोग देश के अलग-अलग राज्यों में होगा। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> आचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज, उनके संघस्थ मुन और उनके प्रभावक शिष्य देश भर में अलग-अलग स्थानों पर चातुर्मास करेंगे। आचार्य विशुद्ध सागर महाराज संघस्थ मुनियों श्रमण मुनि श्री सुव्रतसागर जी,. श्रमण मुनि श्री अनुत्तरसागर जी, श्रमण मुनि श्री प्रणेय सागर जी, श्रमण मुनि श्री प्रणव सागर जी, श्रमण मुनि श्री सर्वार्थसागर जी, श्रमण मुनि श्री साम्यसागर जी, श्रमण मुनि श्री सौम्य सागरजी, श्रमण मुनि श्री सारस्वत सागर जी, श्रमण मुनि श्री संजयंत सागर जी, श्रमण मुनि श्री यशोधर सागर जी, श्रमण मुनि श्री यतीन्द्र सागर जी, श्रमण मुनि श्री निर्ग्रन्थ सागर जी, श्रमण मुनि श्री निसंग सागर जी, श्रमण मुनि श्री निर्विकल्प सागर जी, श्रमण मुनि श्री जयन्द्र सागर जी, श्रमण मुनि श्री जितेन्द्र सागर जी, श्रमण मुनि श्री जयन्त सागर जी, श्रमण मुनि श्री सुभगसागर जी के साथ, बड़ौत, बागपत (उत्तरप्रदेश)में चातुर्मास करेंगे। वहीं उनके शिष्य श्रमण मुनि श्री मनोज्ञसागर जी, श्रमण मुनि श्री विश्वलोक सागर जी, मधुवन सम्मेद शिखर जी (झारखण्ड) में, श्रमण मुनि श्री प्रशमसागर जी, श्रमण मुनि श्री साध्य सागर जी, श्रमण मुनि श्री संयत सागर जी मध्यप्रदेश के बड़नगर जिला उज्जैन में, श्रमण मुनि श्री सुप्रभ सागरजी, श्रमण मुनि श्री प्रणत सागर जी फ्रीगंज, उज्जैन (म.प्र.), श्रमणमुनि श्री सुयशसागर जी, क्षुल्लक श्री श्रुत सागर जी, क्षुल्लक श्री सोहं सागर जी झुमरी तिलैया, कोडरमा (झारखण्ड) में, श्रमण मुनि श्री अनुपमसागर जी, श्रमण मुनि श्री समत्व सागर जी सारंगपुर (उ.प्र.) में, श्रमण मुनि श्री अरिजित सागर जी नलवाड़ी (असम) में, श्रमण मुनि श्री आदित्य सागर जी, श्रमण मुनि श्री अप्रमितसागर जी, श्रमण मुनि श्री सहज सागर जी वस्त्रों की नगरी भीलवाड़ा (राजस्थान) में, श्रमण मुनिश्री आस्तिक्य सागर जी, श्रमण मुनि श्री सुकुल सागर जी कटनी (म.प्र.) में, श्रमण मुनि श्री आराध्य सागर जी, श्रमण मुनि श्री सुहित सागर जी पंचशील नगर, भोपाल में, श्रमण मुनि श्री प्रणीत सागर जी,</p>
<p>श्रमण मुनि श्री निर्मोह सागर जी गोंदिया, (महाराष्ट्र) में, श्रमण मुनि श्री प्रणुत सागर जी, श्रमण मुनि श्री यत्न सागर जी बड़ौदरा (गुजरात) में, श्रमण मुनि श्री संकल्प सागर जी, श्रमण मुनि श्री सद्‌भाव सागर जी अजमेर (राजस्थान) में और श्रमण मुनि श्री साक्ष्य सागर जी, श्रमण मुनि श्री योग्य सागर जी, श्रमण मुनि श्री निवृत सागर जी छीपीटोला, आगरा (उ.प्र.) में गुरुआज्ञा से चातुर्मास करेंगे।</p>
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		<title>एक पल में आदेश्वर पचौरी बन गए मुनि मुमुक्षु सागर... :  कपड़े और आभूषणों को छोड़ थाम लिया पिच्छी और कमंडल </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 13 Feb 2023 10:11:27 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[एक तरफ वात्सल्य वारिधि बिराजे और दूसरी और मोक्ष मार्ग पर चलने की इच्छा लिए बैठे आदेश्वर पचौरी&#8230;आज दीक्षा का पावन दिन था, जैन संस्कार से जुड़े रीति-रिवाज हुए और आदेश्वर पंचौरी बन गए मुनि मुमुक्षु सागर । पढ़िए कैसे धरियावद के आदेश्वर, अपने भरे-पूरे सांसारिक जीवन को त्याग एक पल में बन गए तपस्वी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>एक तरफ वात्सल्य वारिधि बिराजे और दूसरी और मोक्ष मार्ग पर चलने की इच्छा लिए बैठे आदेश्वर पचौरी&#8230;आज दीक्षा का पावन दिन था, जैन संस्कार से जुड़े रीति-रिवाज हुए और आदेश्वर पंचौरी बन गए मुनि मुमुक्षु सागर । पढ़िए कैसे धरियावद के आदेश्वर, अपने भरे-पूरे सांसारिक जीवन को त्याग एक पल में बन गए तपस्वी संत</strong></p>
<hr />
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-37885" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0026.jpg" alt="" width="991" height="558" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0026.jpg 991w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0026-300x168.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0026-768x432.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0026-990x556.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0026-470x264.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0026-640x360.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0026-215x120.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0026-414x232.jpg 414w" sizes="(max-width: 991px) 100vw, 991px" /></p>
<p>वो दृश्य, जिसने देखा वो शायद ही ताउम्र उसे भूल सकेगा । किशनगढ़ का सूरज देवी पाटनी सभागृह, जहां एक ओर आदेश्वर जी पचौरी दीक्षा की अभिलाषा मन में सजाए बैठे थे और दूसरी और विराट व्यक्तित्व के धनी वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी &#8230;।</p>
<p>पिछले दिनों किशनगढ़ में हुए पंचकल्याणक महोत्सव में धरियावद निवासी आदेश्वर जी, आचार्य वर्धमान सागर जी से ऐसे प्रभावित हुए थे कि मौके पर ही खड़े होकर अपनी दीक्षा का निवेदन कर दिया। आचार्य श्री ने वहीं पर उनकी भावनाओं को देख कह दिया कि यहीं किशनगढ़ में ही दीक्षा दी जाएगी । उस दिन से ही मानों आदेश्वर जी, मन ही मन सांसारिक जीवन से खुद को अलग कर संतत्व को प्राप्त हो गए थे । वे अपने सांसारिक जीवन में रहते हुए संत समागमों से अपने मन को पवित्र करते रहे। तरह-तरह की स्व-परीक्षाओं में स्वयं को सिद्ध करते रहे। लेकिन संत होने का मार्ग तो आखिरकार गुरू ही बताते हैं । आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मानों मन ही मन ,उनके जीवन में सबसे बड़े बदलाव का क्षण पहले से निर्धारित कर रखा था।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-37882" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0024.jpg" alt="" width="1201" height="1359" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0024.jpg 1201w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0024-265x300.jpg 265w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0024-905x1024.jpg 905w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0024-768x869.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0024-990x1120.jpg 990w" sizes="(max-width: 1201px) 100vw, 1201px" /></p>
<p>आज किशनगढ़ में उनके जीवन में वही परम कल्याण का क्षण आया । आदेश्वर पचौरी का दीक्षा महोत्सव कार्यक्रम तीन दिन से चल रहा है । लेकिन आज का दिन हमेशा के लिए लोगों की स्मृतियों में बस गया । क्योंकि आज उन्हें दीक्षा के बाद नया नाम मिला । <strong>आदिश्वर अब बन गए हैं मुनि श्री मुमुक्षु सागर&#8230;</strong></p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-37879" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0021.jpg" alt="" width="991" height="558" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0021.jpg 991w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0021-300x168.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0021-768x432.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0021-990x556.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0021-470x264.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0021-640x360.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0021-215x120.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0021-414x232.jpg 414w" sizes="(max-width: 991px) 100vw, 991px" /></p>
<p><strong>ऐसे सम्पन्न हुई मुमुक्षु सागर जी दीक्षा</strong></p>
<p><b><br />
</b>किशनगढ़ में हुए विविध कार्यक्रमों में पहले उन्हें 28 मूलगुणों का संस्कार कर दीक्षा प्रदान की गई । इसमें दीक्षार्थी की गोद भराई, हल्दी,मेहंदी, विधि-विधान, आहार चर्या आदि कार्यक्रम हुए । लगभग साढ़े दस बजे चौक पूरण की विधि पूरी की गई और दीक्षार्थी द्वारा आचार्य श्री को दीक्षा का निवेदन किया । 12.13 मिनट पर दीक्षार्थी की मूल क्रियाओं में सिद्ध आदि भक्ति बोलते हुए, दीक्षा की क्रियाएं प्रारंभ की गई । जिसमें गंधोदक से सिर का शुद्धिकरण किया गया और पंच मुठ्ठी केश लोचन आचार्य श्री द्वारा किया गया । दोपहर 12.35 मिनट पर दीक्षा के मूल संस्कारों का कार्यक्रम शुरु हुआ । उसके पहले चावल से पांच महिलाओं द्वारा चौक पूरण किया गया । उस चौक पूरण पर, दीक्षार्थी आदेश जी को बिठाया गया और केश लोचन आदि क्रियाएं की गई । 12.53 मिनट पर अपने कपड़े व गहनों का उन्होने त्याग किया । आचार्य श्री ने 12.54 मिनट पर आदेश जी के सिर पर स्वास्तिक बनाया और मूल संस्कारों का गहरा लोंग 12.55 मिनट पर रखा । एक बजकर एक मिनट पर, दीक्षार्थी की अंजुलि बनाकर उसमें स्वास्तिक बनाकर चावल,हल्दी, सुपारी,श्रीफल आचार्य श्री ने मंत्रोत्चार के साथ रखा । उसके बाद नामकरण संस्कार दोपहर 1.45 बजे आदेश्वर का नामकरण मुनि मुमुक्षु सागर रखा गया । वहीं मुनि श्री को उदयपुर डागरिया परिवार के विजय,संदीप,हितेश डागरिया ने कमंडल भेंट किया । दीक्षार्थी के माता-पिता बनने का सौभाग्य उनके ज्येष्ठ पुत्र नीलेश-उषा जैन को मिला । मुनि श्री को पिच्छी भेंट हेमन्त पचौरी ने की । वहीं आर.के.पाटनी परिवार ने उन्हें शास्त्र भेंट किया ।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-37880" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0022.jpg" alt="" width="991" height="558" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0022.jpg 991w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0022-300x168.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0022-768x432.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0022-990x556.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0022-470x264.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0022-640x360.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0022-215x120.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0022-414x232.jpg 414w" sizes="auto, (max-width: 991px) 100vw, 991px" /></p>
<p><strong>जब पुत्र ने पिता बनकर दीक्षा संपूर्ण करवाई</strong></p>
<p>रोचक और भावुक क्षण उस वक्त आया जब जिस पुत्र को बड़ा किया, उसी पुत्र और उनकी पत्नी ने माता-पिता बनकर, मुनि श्री मुमुक्षु सागर जी की दीक्षा करवाई ।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-37881" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0023.jpg" alt="" width="991" height="558" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0023.jpg 991w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0023-300x168.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0023-768x432.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0023-990x556.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0023-470x264.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0023-640x360.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0023-215x120.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/02/IMG-20230213-WA0023-414x232.jpg 414w" sizes="auto, (max-width: 991px) 100vw, 991px" /></p>
<p><strong>72 वर्ष के वात्सल्य वारिधि, 54 वर्ष दीक्षा काल, अब तक 101 दीक्षाएं</strong></p>
<p><b><br />
</b>किशनगढ़ में बिराजे वात्सल्य वारिधि जी की उम्र 72 वर्ष है जिसमें 54 वर्ष दीक्षा काल है। परम संतत्व को प्राप्त आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज से दीक्षित संतों की संख्या अब 101 हो गई है । इस काल में आचार्य श्री ने 35 मुनि-35, 40 आर्यिकाएं, एक ऐलक, 13 क्षुल्लक और 12 क्षुल्लिकाओं को दीक्षा दी है ।</p>
<p><iframe loading="lazy" title="किशनगढ़ में आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज में दी आदेश्वर पचौरी को दीक्षा बने मुनि मुमुक्षु सागर" width="1320" height="743" src="https://www.youtube.com/embed/QtdjGuxz-X0?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" allowfullscreen></iframe></p>
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		<item>
		<title>क्रोध हमेशा दुख और बर्बादी का कारणः मुनि श्री  विशल्य सागर जी महाराज</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 19 Jul 2022 16:05:17 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[shree phal news]]></category>
		<category><![CDATA[चातुर्मास]]></category>
		<category><![CDATA[मुनि]]></category>
		<category><![CDATA[विशल्य सागर]]></category>
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					<description><![CDATA[न्यूज सौजन्य- राजकुमार अजमेरा  झुमरी तिलैया (कोडरमा-झारखंड)। पानी की टंकी रोड स्थित नया जैन मंदिर के प्रवचन हाल में जैन संत गुरुदेव 108 विशल्य सागर जी की अमृतवाणी सुनने के लिए मंगलवार को मारवाड़ी युवा मंच और कई सेवा संस्था समूह के सदस्य, युवा महिलाएं पहुंचे। सर्वप्रथम दीप प्रज्जवलन मारवाड़ी युवा मंच के अध्यक्ष आयुष [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000">न्यूज सौजन्य- राजकुमार अजमेरा </span></p>
<p><strong>झुमरी तिलैया (कोडरमा-झारखंड)।</strong> पानी की टंकी रोड स्थित नया जैन मंदिर के प्रवचन हाल में जैन संत गुरुदेव 108 विशल्य सागर जी की अमृतवाणी सुनने के लिए मंगलवार को मारवाड़ी युवा मंच और कई सेवा संस्था समूह के सदस्य, युवा महिलाएं पहुंचे। सर्वप्रथम दीप प्रज्जवलन मारवाड़ी युवा मंच के अध्यक्ष आयुष पोद्दार, पूर्व अध्यक्ष, संयोजक रितेश दुग्गड़, अर्जुन शंघई और सदस्यों ने किया। गुरुदेव के चरण धोने और शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य भी मारवाड़ी युवा मंच के साथी और निवर्तमान पार्षद पिंकी जैन को मिला। सभी अतिथियों का माला पहनाकर और दुपट्टा पहनाकर स्वागत किया गया। जैन संत ने सभी भक्तों को आशीर्वाद स्वरूप धार्मिक पुस्तक और पेन भेंट किया।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter wp-image-25484" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/07/IMG-20220719-WA0135-300x135.jpg" alt="" width="408" height="184" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/07/IMG-20220719-WA0135-300x135.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/07/IMG-20220719-WA0135-1024x461.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/07/IMG-20220719-WA0135.jpg 1280w" sizes="auto, (max-width: 408px) 100vw, 408px" /><br />
धर्मसभा में युवाओं को संबोधित करते हुए जैन संत परम तपस्वी मुनि श्री 108 विशल्य सागर जी ने कहा कि युवा रास्ता नहीं, जीवन को बदलने का काम करें। अपने अंदर की खराब आदतों और बुराइयों को बदलो, स्वभाव शीतल होना चाहिए, क्रोध से जीवन का सही समाधान नहीं हो सकता यह हमेशा दुख और बर्बादी का कारण है। परिवार और मित्रों से संबंध विच्छेद न करें। युवाओं को विवेकशील होना जरूरी है। आज के युवाओं को अपने आक्रोश पर संयम रखने की आवश्यकता है। मनुष्य पर्याय श्रेष्ठ पर्याय है। शांति और सुख में बाधक तत्व चंचलता को रोकना आवश्यक है, यही जीवन का पहला पुरुषार्थ है। विशल्य सागर जी ने आगे कहा कि स्वभाव होता है कि हमें अच्छाई नजर नहीं आती है परंतु किसी की भी बुराई तुरंत नजर आ जाती है। बुराई नरक का द्वार है और अच्छाई भगवान का द्वार है। जीवन पूजा के लिए नहीं, पूज्य बनने के लिए मिला है। दृष्टि की पहचान आवश्यक है। रूप की सुंदरता को नहीं, मनुष्य के अंदर की सुंदरता को देखना है।<br />
चातुर्मास कार्यक्रम के संयोजक सुरेंद्र जैन काला, उप मंत्री नरेंद्र झाझंरी ने कहा कि आप सभी युवा और शहरवासी गुरुदेव की अमृतवाणी को सुनकर अपने जीवन को सफल बनाएं। गुरु ज्ञान की गंगा हैं और इसी में डुबकी लगाकर ही संसार के दुखों से मुक्ति मिल सकती है। इस मौके पर जैन समाज के पदाधिकारी, जैन महिला समाज की पदाधिकारी, जैन युवक समिति के पदाधिकारी एवं सदस्य, मैत्री समूह के सदस्य, सैकड़ों भक्तजन, मीडिया प्रभारी नवीन जैन, राजकुमार अजमेरा आदि मौजूद थे।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter wp-image-25485" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/07/IMG-20220719-WA0136-300x135.jpg" alt="" width="408" height="184" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/07/IMG-20220719-WA0136-300x135.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/07/IMG-20220719-WA0136-1024x461.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/07/IMG-20220719-WA0136.jpg 1280w" sizes="auto, (max-width: 408px) 100vw, 408px" /></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>पुण्य की भी चमक व्यक्ति के व्यक्तित्व व चेहरे पर दिखाई देती है</title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/puny-kee-bhee-chamak-vyakti-ke-vyaktitv-va-chehare-par-dikhaee-detee-hai/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 May 2022 12:59:09 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[jain news]]></category>
		<category><![CDATA[shreephal news]]></category>
		<category><![CDATA[न्यूज़ जैन]]></category>
		<category><![CDATA[भीलूड़ा]]></category>
		<category><![CDATA[मुनि]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल न्यूज]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160; भीलूड़ा । श्री दिगंबर जैन मंदिर भीलूड़ा में हुई धर्म सभा मे मुनि श्री प्रशमानंद महाराज ने कहा कि पाप और पुण्य छुपाएं नही छुपता है। पुण्य की चमक और पाप का भय तो व्यक्ति के चेहरे पर ही झलकता है। मुनि श्री शिवानंद व मुनि श्री प्रशमानंद ने मंदिर में शांति धारा पंचामृत [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<p><strong>भीलूड़ा</strong> । श्री दिगंबर जैन मंदिर भीलूड़ा में हुई धर्म सभा मे मुनि श्री प्रशमानंद महाराज ने कहा कि पाप और पुण्य छुपाएं नही छुपता है। पुण्य की चमक और पाप का भय तो व्यक्ति के चेहरे पर ही झलकता है।<br />
मुनि श्री शिवानंद व मुनि श्री प्रशमानंद ने मंदिर में शांति धारा पंचामृत अभिषेक के बाद धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए मुनि श्री प्रशमानंद महाराज ने कहा कि जैसे पुष्प की सुंदरता व कोमलता बाहरी स्वरूप देखकर ही झलकती है इसी तरह पुण्य की भी चमक व्यक्ति के व्यक्तित्व व चेहरे पर दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि धर्म एक अनुभूति है दिखावा नहीं है और धर्म का फल हमेशा मीठा होता है जो धर्म प्रधान व्यक्ति ही अनुभव कर<br />
सकता है। मुनि श्री शिवानंद महाराज ने कहा कि लोभ वृति व लालच व्यक्ति को कंजूस व अधर्मी बना देते है और पुण्य कर्म व धर्म से दूर करते है। इसके बाद आयोजित आनंद यात्रा में मंगलाचरण अनिता जैन ने प्रस्तुत किया। प्रश्नोत्तर दे वाली बालिकाओं को हितेश शाह ने पुरस्कृत किया।</p>
<p>इस अवसर पर जैन समाज अध्यक्ष अरविंद शाह, रमण लाल दुकावत, अशोक टूकावत, अजीत जैन, पलाश जैन, जिम्मी जैन, अमित टूकवत, अमित भरड़ा, ओमप्रकाश भरड़ा, हितेश भरड़ा, जयप्रकाश भरड़ा, भूपेंद्र जैन, श्रीपाल जैन, भरत जैन व प्रियंक जैन सहित जैन समाज के लोग मौजूद थे। संचालन धर्मेंद्र जैन ने</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>मुनि के  28 मूलगुण</title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/muni-ke-28-mulagun/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Dec 2021 15:25:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कथा सागर]]></category>
		<category><![CDATA[28]]></category>
		<category><![CDATA[मुनि]]></category>
		<category><![CDATA[मूलगुण]]></category>
		<category><![CDATA[साधु]]></category>
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					<description><![CDATA[स्वाध्याय-11 पांच महाव्रत, पांच समिति, पञ्चेन्द्रिय निरोध, छ: (षट्) आवश्यक, शेष सात गुण  28 मूलगुणों है । इन नियमों का पालन मुनि दीक्षा और आर्यिका दीक्षा लेने वाले दोनों पालन करते हैं। आर्यिका माताजी बैठे-बैठे आहार ग्रहण करती हैं,अतिआवश्यक होने पर स्नान करती है और एक साड़ी का उपयोग करती हैं। बाकी सभी उन्हीं नियमों [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><strong>स्वाध्याय-11</strong></p>
<p dir="ltr">पांच महाव्रत, पांच समिति, पञ्चेन्द्रिय निरोध, छ: (षट्) आवश्यक, शेष सात गुण  28 मूलगुणों है । इन नियमों का पालन मुनि दीक्षा और आर्यिका दीक्षा लेने वाले दोनों पालन करते हैं। आर्यिका माताजी बैठे-बैठे आहार ग्रहण करती हैं,अतिआवश्यक होने पर स्नान करती है और एक साड़ी का उपयोग करती हैं। बाकी सभी उन्हीं नियमों का पालन करती हैं, जो एक मुनि को पालन करना होता है।</p>
<p dir="ltr"><strong>महाव्रत</strong></p>
<p dir="ltr">हिंसादि पांचों पापों का मन, वचन, काय एवं कृत, कारित, अनुमोदना से त्याग करना महापुरुषों ने महाव्रत कहा है।</p>
<p dir="ltr">1. अहिंसा महाव्रत</p>
<p dir="ltr">छ: काय के जीवों को मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदना से पीड़ा नहीं पहुंचाना, सभी जीवों पर दया करना, अहिंसा महाव्रत है।</p>
<p dir="ltr">2. सत्य महाव्रत</p>
<p dir="ltr">क्रोध, लोभ, भय, हास्य के कारण असत्य वचन तथा दूसरों को संताप देने वाले सत्य वचन का भी त्याग करना, सत्य महाव्रत है।</p>
<p dir="ltr">3. अचौर्य महाव्रत</p>
<p dir="ltr">वस्तु के स्वामी की आज्ञा बिना वस्तु को ग्रहण नहीं करना, अचौर्य महाव्रत है।</p>
<p dir="ltr">4. ब्रह्मचर्य महाव्रत</p>
<p dir="ltr">जो मन, वचन, काय एवं कृत, कारित, अनुमोदना से वृद्धा, बाला, यौवन वाली स्त्री को देखकर अथवा उनकी फोटो को देखकर उनको माता, पुत्री, बहिन समझ स्त्री सम्बन्धी अनुराग को छोड़ता है, वह तीनों लोकों में पूज्य ब्रह्मचर्य महाव्रत है।</p>
<p dir="ltr">5. परिग्रह त्याग महाव्रत</p>
<p dir="ltr">अंतरंग चौदह एवं बाहरी दस प्रकार के परिग्रहों का त्याग करना तथा संयम, ज्ञान और शौच के उपकरणों में भी ममत्व नहीं रखना, परिग्रह त्याग महाव्रत है।</p>
<p dir="ltr"><strong>पांच समिति</strong></p>
<p dir="ltr">‘सम्’ अर्थात् सम्यक् ‘इति‘ अर्थात् गति या प्रवृत्ति को समिति कहते हैं। चलने-फिरने में, बोलने-चलने में, आहार ग्रहण करने में, वस्तुओं को उठाने-रखने में और मल-मूत्र का निक्षेपण करने में यत्न पूर्वक सम्यक् प्रकार से प्रवृत्ति करते हुए जीवों की रक्षा करना, समिति है। यह पांच हैं ।</p>
<p dir="ltr">1.     ईर्या  : प्रासुक मार्ग से दिन में चार हाथ (छ: फुट) प्रमाण भूमि देखकर चलना, यह ईयर्र समिति है। भूमि देखकर चलने का अर्थ भूमि पर चलने वाले जीवों को बचाकर चलना।</p>
<p dir="ltr">2.     भाषा : चुगली, निंदा, आत्म प्रशंसा आदि का परित्याग करके हित, मित और प्रिय वचन बोलना, भाषा समिति है। जैसे-कपड़ा मीटर से नापते हैं और धान्य आदि बाँट से तौलते हैं, वैसे ही नाप-तौल कर बोलना चाहिए अर्थात् हमारे वाक्य ज्यादा लम्बे न हों फिर भी अर्थ ठोस निकले।</p>
<p dir="ltr">3.     एषणा समिति : 46 दोष एवं 32 अंतराय टालकर सदाचारी उच्चकुलीन श्रावक के यहाँ विधि पूर्वक निर्दाेष आहार ग्रहण करना, एषणा समिति है।</p>
<p dir="ltr">4.     आदान निक्षेपण समिति : शास्त्र, कमण्डलु, पिच्छी आदि उपकरणों को देखकर-शोधकर रखना और उठाना, आदान निक्षेपण समिति है।</p>
<p dir="ltr">5.     उत्सर्ग समिति : जीव रहित स्थान में मल-मूत्र आदि का त्याग करना, उत्सर्ग समिति है।</p>
<p dir="ltr"><strong>पंचेन्द्रिय निरोध</strong></p>
<p dir="ltr">स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र इन पांच इन्द्रियों के मनोज्ञ-अमनोज्ञ विषयों में राग-द्वेष का परित्याग करना पंचेन्द्रिय निरोध है।</p>
<p dir="ltr">1.     स्पर्शन इन्द्रिय निरोध : शीत-उष्ण, कोमल-कठोर, हल्का-भारी और स्निग्ध-रूक्ष इन स्पर्शन इन्द्रिय के विषयों में राग-द्वेष नहीं करना, स्पर्शनेन्द्रिय निरोध है।</p>
<p dir="ltr">2.     रसना इन्द्रिय निरोध : खट्टा, मीठा, कड़वा, कषायला और चरपरा इन रसना इन्द्रिय के विषयों में राग-द्वेष नहीं करना, रसना इन्द्रिय निरोध है।</p>
<p dir="ltr">3.     घ्राण इन्द्रिय निरोध : सुगंध और दुर्गंध इन घ्राण इन्द्रिय के विषयों में राग-द्वेष नहीं करना, घ्राण इन्द्रिय निरोध है।</p>
<p dir="ltr">4.     चक्षु इन्द्रिय निरोध : काला, पीला, नीला, लाल और सफेद इन चक्षु इन्द्रिय के विषयों में राग &#8211; द्वेष नहीं करना, चक्षु इन्द्रिय निरोध है।</p>
<p dir="ltr">5.     श्रोत्र इन्द्रिय निरोध : मधुर स्वर, गान, वीणा आदि को सुनकर राग नहीं करना एवं कठोर निंद्य, गाली आदि के शब्द सुनकर द्वेष नहीं करना, श्रोत्र इन्द्रिय निरोध है।</p>
<p dir="ltr"><strong>आवश्यक</strong></p>
<p dir="ltr">अवश्य करने योग्य क्रियाएं आवश्यक कहलाती हैं। साधु (मुनि) के  लिए जो कियाएँ  नित्य करना आवश्यक होती है उसे आवश्यक  क्रिया कहते हैं ।मुनि को  छ: क्रियाएँ करनी आवश्यक होती हैं, उन्हें ही छ: (षट्) आवश्यक कहते हैं।</p>
<p dir="ltr">जो कषाय, राग-द्वेष आदि के वशीभूत न हो वह अवश है। उस अवश का जो आचरण होता है, वह आवश्यक है, आवश्यक छ: ,होते हैं।</p>
<p dir="ltr">1.     समता या सामायिक : राग-द्वेष आदि समस्त विकार भावों का तथा हिंसा आरम्भ आदि समस्त बहिरंग पाप कर्मो का त्याग करके जीवन-मरण, हानि-लाभ, सुख-दुःख आदि में साम्यभाव रखना समता या सामायिक है।</p>
<p dir="ltr">2.     स्तुति : 24 तीर्थंकरो के गुणों का स्तवन करना स्तुति है।</p>
<p dir="ltr">3.     वन्दना : चैबीस तीर्थंकरो में से किसी एक की एवं पंच परमेष्ठियों में से किसी एक की मुख्य रूप से स्तुति करना वंदना है। यह दिन में तीन बार करते हैं।</p>
<p dir="ltr">4.     प्रतिक्रमण : व्रतों में लगे दोषों की आलोचना करना प्रतिक्रमण है। अथवा ‘मेरा दोष मिथ्या हो‘ ऐसा कहना प्रतिक्रमण है। ‘तस्स मिच्छा में दुक्कड‘। प्रतिक्रमण भी दिन में तीन बार करते हैं। प्रतिक्रमण सात प्रकार के होते हैं।</p>
<p dir="ltr">दैवसिक, रात्रिक, ईर्यापथिक, पाक्षिक, चातुर्मासिक, संवत्सरिक (वार्षिक), उत्थार्मिक औतमार्थिक प्रतिक्रमण जो संल्लेखना के समय होता है।</p>
<p dir="ltr">5.     प्रत्याख्यान : आगामी काल में दोष न करने की प्रतिज्ञा करना प्रत्याख्यान है। अथवा सीमित काल के लिए आहारादि का त्याग करना प्रत्याख्यान है।</p>
<p dir="ltr">6.     कायोत्सर्ग : परिमित काल के लिए शरीर से ममत्व का त्याग करना कायोत्सर्ग है। कायोत्सर्ग का अर्थ होता है। शिथिलीकरण अर्थात रिलेक्सेशन। इससे शरीर की शक्ति शिथिल हो जाएगी एवं आत्मा की शक्ति सक्रिय हो जाएगी।</p>
<p dir="ltr"><strong>शेष सात गुण</strong></p>
<p dir="ltr">1.     अस्नान व्रत &#8211; स्नान करने का त्याग, साधु का शरीर धूल, पसीने से लिप्त रहता है, उसमें अनेक सूक्ष्म जीव रहते हैं, उनका घात न हो इसलिए स्नान नहीं करते हैं।</p>
<p dir="ltr">2.     भूमि शयन &#8211; थकान दूर करने के लिए शयन आवश्यक है। रात्रि में एक करवट से थोड़ा शयन करने के लिए भूमि, शिला, लकड़ी के पाटे, तृण अर्थात् सूखी घास या चटाई का उपयोग करते हैं। और किसी का नहीं।</p>
<p dir="ltr">3.     अचेलकत्व &#8211; वस्त्र, चर्म और पत्ते आदि से शरीर को नहीं ढकना अर्थात् नग्न रहना। दिशाएं ही जिनके अम्बर अर्थात् वस्त्र हैं, वे दिगम्बर हैं।</p>
<p dir="ltr">4.     केशलोंच &#8211; दो माह से चार माह के बीच में प्रतिक्रमण सहित दिन में उपवास के साथ अपने हाथों से सिर, दाढ़ी एवं मूंछों के केशों को उखाड़ना केशलोंच है। दो माह में करना उत्कृष्ट है, चार माह में करना जघन्य है एवं दोनों के बीच में करना मध्यम है।</p>
<p dir="ltr">5.     एक भुति &#8211; चैबीस घंटों में मात्र एक बार आहार करना। सूर्याेदय के 3 घड़ी के बाद (72 मिनट) एवं सूर्यास्त से 3 घड़ी पहले। सामायिक का काल छोड़कर शेष काल में 3 मुहूर्त (2 घंटे 24 मिनट) तक आहार ले सकते हैं। (मू.प्र., <a href="tel:500502">500-502</a>)</p>
<p dir="ltr">6.     अदंतधावन &#8211; अडुली, नख, दातुन, छाल, मंजन, बु्रश, पेस्ट आदि से दांतों के मल का शोधन नहीं करना, इन्द्रिय संयम की रक्षा करने वाला अदंतधावन मूलगुण है।</p>
<p dir="ltr">7.     स्थिति भोजन &#8211; दीवार आदि का सहारा लिए बिना खड़े होकर आहार करना। खड़े होते समय दोनों पैर के बीच 4 अर्जुल का अंतर या पीछे 4 अर्जुल एवं आगे 4 से 12 अर्जुल तक का अंतर रह सकता है। (आ.पु., 18/3)</p>
<p dir="ltr">मुनियों के 34 उत्तर गुण होते हैं। 12 तप और 22 परीषहजय।</p>
<p dir="ltr"><strong>सौजन्य</strong>&#8211; <strong>अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज</strong></p>
<p dir="ltr">
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