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	<title>मुनि श्री संभवसागरजी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>बर्रो वाले बाबा के नए मंदिर पर शिखर एवं ध्वज स्थापना : प्रथम मस्तकाभिषेक में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब </title>
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		<pubDate>Tue, 17 Mar 2026 13:25:29 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के बाद मुनि श्री संभवसागरजी, मुनि श्री निस्सीम सागरजी एवं मुनि श्री संस्कार सागरजी के सानिध्य में बर्रो वाले बाबा भगवान आदिनाथ के नवनिर्मित मंदिर पर पांच शिखरों की स्थापना एवं मंदिर शिखर पर पीतल के ध्वज दंड की प्रतिष्ठा विधिवत हुई। विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230; विदिशा। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के बाद मुनि श्री संभवसागरजी, मुनि श्री निस्सीम सागरजी एवं मुनि श्री संस्कार सागरजी के सानिध्य में बर्रो वाले बाबा भगवान आदिनाथ के नवनिर्मित मंदिर पर पांच शिखरों की स्थापना एवं मंदिर शिखर पर पीतल के ध्वज दंड की प्रतिष्ठा विधिवत हुई। <span style="color: #ff0000">विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>विदिशा।</strong> पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के बाद मुनि श्री संभवसागरजी, मुनि श्री निस्सीम सागरजी एवं मुनि श्री संस्कार सागरजी के सानिध्य में बर्रो वाले बाबा भगवान आदिनाथ के नवनिर्मित मंदिर पर पांच शिखरों की स्थापना एवं मंदिर शिखर पर पीतल के ध्वज दंड की प्रतिष्ठा विधिवत हुई। इस पावन अवसर पर भगवान आदिनाथ स्वामी का प्रथम मस्तकाभिषेक किया गया तथा विश्व शांति की मंगलभावना से मुनि श्री के मुखारविंद से शांति धारा संपन्न हुई। प्रथम अभिषेक के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं और पूरे परिसर में भक्ति व उत्साह का वातावरण छाया रहा। प्रवक्ता अविनाश जैन (विद्यावाणी) ने बताया कि पंचकल्याणक महोत्सव के पश्चात प्रथम अभिषेक को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखा गया। मंदिर के ऊपर शिखर एवं ध्वजारोहण का दृश्य अत्यंत भावपूर्ण और श्रद्धामय रहा।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-medium wp-image-102237" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG-20260317-WA0030-242x300.jpg" alt="" width="242" height="300" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG-20260317-WA0030-242x300.jpg 242w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG-20260317-WA0030.jpg 720w" sizes="(max-width: 242px) 100vw, 242px" /></p>
<p><strong>आचार्य श्री का आशीर्वाद था, सब काम हो गए</strong></p>
<p>प्रथम दो कलश स्थापना अशोक सागर एवं अनिरुद्ध सराफ, अभय वैद्य,संतोष गिरनार, पंकज बड़ाघर ने स्थापित किये तथा ध्वजारोहण मोहन नमकीन ने किया इस अवसर पर जैन महाविद्यालय प्रबंधन समिति के अध्यक्ष एवं पंचकल्याणक समिति के स्वागताध्यक्ष संजय सेठ ने मुनिसंघ के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा कि विदिशा भद्दिलपुर भगवान शीतलनाथ स्वामी के चार कल्याणकों से पवित्र भूमि रही है, किन्तु गुरुदेव की कृपा से जैन महाविद्यालय की यह भूमि भी पंचकल्याणक से पावन हो गई है। अपने आशीर्वचन में मुनि श्री संभवसागर महाराज ने कहा कि इन सभी कार्यों के लिये आचार्य गुरुदेव ऊपर से ही हमें प्रेरणा दे रहे थे तथा आचार्य श्री का आशीर्वाद था सभी कार्य निर्विघ्न होते चले गए।</p>
<p><strong>ध्वज समाज की उन्नति एवं विजय के प्रतीक</strong></p>
<p>मुनिश्री ने कहा कि मंदिर कितना ही भव्य क्यों न हो, बिना शिखर के वह अधूरा माना जाता है। इसी प्रकार धर्म और साधना के बिना मनुष्य जीवन भी अधूरा है। उन्होंने कहा कि जैसे मंदिर का शिखर सबसे ऊँचा होता है, वैसे ही जीवन का लक्ष्य आत्मकल्याण और मोक्ष प्राप्ति होना चाहिए। मुनि श्री ने आगे कहा कि मंदिर का शिखर और ध्वज समाज की उन्नति एवं विजय के प्रतीक हैं। जैसे शिखर आकाश की ऊँचाइयों को स्पर्श करता है, वैसे ही हमें अपने विचार, आचरण और आत्मा को भी उच्चतम स्तर तक ले जाने का प्रयास करना चाहिए, कार्यक्रम में शिखर स्थापना एवं ध्वजारोहण करने वाले परिवारों सहित बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी बंधु उपस्थित रहे।</p>
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		<title>नीलांजना की आकस्मिक मृत्यु देख हुआ वैराग्य लिया दीक्षा का निर्णय : मुनि श्री संभवसागरजी महाराज ने सुनाई भगवान के वैराग्य की कथा </title>
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		<pubDate>Sat, 14 Mar 2026 12:35:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ नीलांजना का दृश्य देखा, उसकी आकस्मिक मृत्यु और संसार की असारता का भान हुआ, तब प्रभु ने दीक्षा लेकर वन की ओर गमन किया। ये उद्गार निर्यापक श्रमण मुनि श्री संभवसागर महाराज ने पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के अंतर्गत दीक्षा कल्याणक के अवसर पर व्यक्त किए। विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230; विदिशा। नीलांजना का दृश्य [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong> नीलांजना का दृश्य देखा, उसकी आकस्मिक मृत्यु और संसार की असारता का भान हुआ, तब प्रभु ने दीक्षा लेकर वन की ओर गमन किया। ये उद्गार निर्यापक श्रमण मुनि श्री संभवसागर महाराज ने पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के अंतर्गत दीक्षा कल्याणक के अवसर पर व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>विदिशा।</strong> नीलांजना का दृश्य देखा, उसकी आकस्मिक मृत्यु और संसार की असारता का भान हुआ, तब प्रभु ने दीक्षा लेकर वन की ओर गमन किया। ये उद्गार निर्यापक श्रमण मुनि श्री संभवसागर महाराज ने पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के अंतर्गत दीक्षा कल्याणक के अवसर पर व्यक्त किए।मुनि श्री ने बर्रो वाले बाबा के नए मंदिर में प्रवेश की घटना को कुंडलपुर के बड़े बाबा मंदिर की ऐतिहासिक घटना से जोड़ते हुए कहा कि जब बर्रो वाले बाबा को क्रेन के माध्यम से उठाने का प्रयास किया जा रहा था, तब दोपहर तीन बजे से लगातार प्रयास किए गए, लेकिन बाबा अपने स्थान से टस से मस नहीं हुए।समय लगभग पाँच बजे का हो रहा था, तभी एक अनजान व्यक्ति ने आकर उनके कान में कहा कि बर्रो वाले बाबा केवल आचार्य विद्यासागर जी की ही बात सुनते हैं, उन्हें स्मरण करो। मुनि श्री ने बताया कि जैसे ही उन्होंने आचार्य गुरुदेव का स्मरण किया, उसी क्षण बाबा अपने आसन से हिल गए और उनका गगन विहार प्रारंभ हो गया। यह दृश्य उसी प्रकार था जैसा कुंडलपुर में बड़े बाबा के गगन विहार के समय देखने को मिला था। इस अद्भुत दृश्य को केवल विदिशा के श्रद्धालुओं ने ही नहीं, बल्कि यूट्यूब चैनलों के माध्यम से हजारों लोगों ने भी देखा।</p>
<p><strong>बाबा की छवि कुछ अलग ही दिखाई दे रही थी</strong></p>
<p>जब सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था,उसी समय बर्रो वाले बाबा नए मंदिर में प्रवेश कर रहे थे। उस समय बाबा की छवि कुछ अलग ही दिखाई दे रही थी। मुनि श्री ने कहा कि पंचकल्याणक के प्रारंभिक दो दिनों गर्भ कल्याणक और जन्म कल्याणक में भक्ति का उतना सैलाब नहीं आता, लेकिन बर्रो वाले बाबा के गगन विहार के बाद श्रद्धालुओं की भक्ति का सागर उमड़ पड़ा। जिस दृश्य को देखने के लिए लोग वर्षों से उत्सुक थे, वह दृश्य सभी को देखने को मिला और उस भक्ति भाव को सभी ने अपने अंतर्मन में संजो लिया।</p>
<p><strong>अनगिनत अदृश्य भक्त भी वहां उपस्थित थे</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि इतने कम समय में सभी कार्य निरंतर और निर्विघ्न गुरुदेव के आशीर्वाद से आगे बढ़ रहे हैं। गुरुदेव हमेशा कहते थे कि अपना कर्तव्य करते रहो, यह मत सोचो कि हम ही कार्य करने वाले हैं। बड़े बाबा के भक्त केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि देव भी हैं, जो ऐसे आयोजनों को सफल बनाने में अदृश्य रूप से सहयोग करते हैं।मुनि श्री ने कहा कि बर्रो वाले बाबा के भक्त तो दिखाई दे रहे थे, लेकिन उनके अनगिनत अदृश्य भक्त भी वहां उपस्थित थे, जिन्होंने इस कार्य को सफलतापूर्वक संपन्न कराया।</p>
<p><strong>भगवान के दीक्षा कल्याणक की पूजा कराई</strong></p>
<p>मुनि श्री ने बताया कि जब सुबह नए मंदिर में जाकर बर्रो वाले बाबा के दर्शन किए, तो ऐसा लगा मानो बाबा मुस्करा रहे हों। नए मंदिर में उनकी मुस्कान कुछ अलग ही प्रतीत हो रही थी। अभी बाबा अकेले विराजमान हैं, लेकिन पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के बाद नव प्रतिष्ठित सभी भगवान भी उनके साथ समवसरण में विराजित होंगे।मुनि श्री ने कहा कि वे यहां केवल पंद्रह दिन के लिए समवसरण मंदिर की &#8216;चाबी&#8217; रखने आए थे लेकिन, गुरुदेव के आशीर्वाद से जो कार्य अधूरे थे, वे सभी पूर्णता की ओर बढ़ रहे हैं और बर्रो वाले बाबा का नए मंदिर में विराजमान होना उनके लिए अत्यंत सुखद अनुभूति है।इस अवसर पर मुनि श्री निस्सीम सागर जी महाराज एवं मुनि श्री संस्कार सागर जी महाराज मंचासीन थे।</p>
<p>प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी विनय भैया एवं तरुण भैया (इंदौर) ने भगवान के दीक्षा कल्याणक की पूजा कराई।</p>
<p><strong> मुनिसंघ के चरणों में श्रीफल अर्पित किया</strong></p>
<p>प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि दीक्षा कल्याणक के अवसर पर जबलपुर से श्राविका आश्रम की कई बहनें उपस्थित हुईं। उन्होंने मुनिसंघ के चरणों में श्रीफल अर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया। दोपहर में आदिकुमार की बारात, राजपाट, राज्य व्यवस्था और प्रजा पालन के दृश्य प्रस्तुत किए गए। इसी दौरान राजदरबार में स्वर्ग की अप्सरा नीलांजना का नृत्य चल रहा था। नृत्य करते-करते अचानक उसकी आयु पूर्ण हो जाती है। देवताओं ने रंग में भंग न हो इसलिए तुरंत दूसरी नर्तकी भेज दी लेकिन, आदिकुमार संसार की असारता समझकर वैराग्य को प्राप्त हो जाते हैं।</p>
<p>वन गमन के दृश्य के पश्चात विधीनायक प्रतिमा पर मुनि श्री द्वारा संस्कार संपन्न किए गए। पंच कल्याणक के पात्र, कलाकारों की टीम और संगीत के साथ इन दृश्यों की प्रस्तुति प्रतिष्ठाचार्य के निर्देशन में की गई, जिसे देखकर उपस्थित दर्शकों ने खूब सराहा।</p>
<p><strong>रविवार को केवल ज्ञान कल्याणक होगा</strong></p>
<p>प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि 15 मार्च (रविवार) को केवलज्ञान कल्याणक मनाया जाएगा। प्रातःकाल मुनि आदिकुमार की आहारचर्या संपन्न होगी तथा मध्याह्न में भगवान को केवलज्ञान की प्राप्ति के साथ समवसरण की रचना होगी। समवसरण में मुनिसंघ विराजमान होगा और भगवान की दिव्य वाणी सभी दिशाओं में प्रसारित होगी। पंचकल्याणक समिति के अध्यक्ष राजेश बोहरा, महामंत्री अनिरुद्ध सराफ, कोषाध्यक्ष अभय वैद्य, अनिल हजारी, स्वागताध्यक्ष संजय सेठ, दिगंबर जैन समाज के अध्यक्ष बड़ू चौधरी, शीतलधाम के अध्यक्ष सचिन वसंत जैन, वरिष्ठ उपाध्यक्ष संजय भंडारी एवं महामंत्री मोहन जैन ने विदिशा नगर के सभी श्रद्धालुओं से रविवार को केवल ज्ञान कल्याणक एवं सोमवार को अंतिम दिवस मोक्ष कल्याणक के अवसर पर अधिक से अधिक संख्या में पधारने की अपील की है।</p>
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		<title>सभी धर्म समान हैं तो व्यवस्था भी समान हों : मुनि श्री संभवसागरजी ने धर्म और अधिकारों को गहराई से समझाया </title>
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		<pubDate>Mon, 09 Mar 2026 16:09:25 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री संभवसागर जी महाराज ने कहा कि यदि सभी धर्म समान हैं और सभी के अधिकार समान हैं तो देश में सभी धर्मों के लिए व्यवस्थाएं भी समान होनी चाहिए। मुनि श्री ने पत्रकारों को संबोधित किया। विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230; विदिशा। आचार्य श्री विद्यासागर जी के शिष्य आचार्य श्री समयसागर महाराज के [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुनि श्री संभवसागर जी महाराज ने कहा कि यदि सभी धर्म समान हैं और सभी के अधिकार समान हैं तो देश में सभी धर्मों के लिए व्यवस्थाएं भी समान होनी चाहिए। मुनि श्री ने पत्रकारों को संबोधित किया। <span style="color: #ff0000">विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>विदिशा।</strong> आचार्य श्री विद्यासागर जी के शिष्य आचार्य श्री समयसागर महाराज के आज्ञानुवर्ती मुनि श्री संभवसागर जी महाराज ने कहा कि यदि सभी धर्म समान हैं और सभी के अधिकार समान हैं तो देश में सभी धर्मों के लिए व्यवस्थाएं भी समान होनी चाहिए। राष्ट्र एक है तो कानून भी सभी के लिए एक समान होना चाहिए। मुनि श्री सम्भव सागर जी महाराज पत्रकार वार्ता को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर मुनि श्री निस्सीमसागर जी महाराज एवं मुनि श्री संस्कारसागरजी महाराज भी उपस्थित थे। मुनि श्री ने बताया कि आचार्य गुरुदेव ने वर्ष 2014 के चातुर्मास में विदिशा नगर से “इंडिया नहीं भारत कहो” का नारा दिया था। उन्होंने कहा था कि भारत प्राचीन काल में विश्व का अग्रणी देश रहा है और विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी लगभग 27 प्रतिशत थी। इसलिए इसे सोने की चिड़िया कहा जाता था। यदि हम पुनः &#8216;इंडिया&#8217; से &#8216;भारत&#8217; की ओर लौटेंगे तो देश पुनः समृद्धि और विकास के मार्ग पर अग्रसर होगा।</p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि दो वर्ष पूर्व आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की समाधि डोंगरगढ़ स्थित चंद्रगिरी पर्वत पर हुई थी तथा उनके प्रथम पट्ट शिष्य मुनि श्री समयसागर जी महाराज को आचार्य पद प्रदान किया गया। उन्होंने बताया कि आज ही के दिन 46 वर्ष पूर्व द्रोणागिरी सिद्धक्षेत्र पर आचार्य गुरुदेव के करकमलों से मुनि श्री समयसागर जी महाराज की प्रथम मुनि दीक्षा हुई थी।</p>
<p><strong> पंचकल्याणक महोत्सव विश्व शांति का संदेश देने वाला</strong></p>
<p>इस अवसर पर मुनि श्री संभवसागरजी महाराज ने समस्त पत्रकारों को आशीर्वाद देते हुए कहा कि आज का दिन श्रमण संस्कृति को आगे बढ़ाने का विशेष अवसर है। उन्होंने कहा कि आज विश्व में अशांति के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे समय में विदिशा में पंचकल्याणक महा महोत्सव विश्व शांति का संदेश देने वाला है। उन्होंने कहा कि जब तक व्यक्ति के मन में शांति नहीं होगी तब तक दुनिया में शांति स्थापित नहीं हो सकती। कुछ देशों के राष्ट्राध्यक्षों का अहंकार विश्वयुद्ध जैसी स्थिति को जन्म दे रहा है, लेकिन भारत जैसे देश इस स्थिति को टालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, क्योंकि भारत सदैव शांति का दूत रहा है। यह भगवान महावीर और गौतम बुद्ध की भूमि है, जहाँ से अहिंसा और शांति का संदेश पूरी दुनिया में पहुँचा है।</p>
<p><strong>धर्म की राजनीति करना उचित नहीं</strong></p>
<p>राजनीति पर अपने विचार व्यक्त करते हुए मुनि श्री ने कहा कि राजनीति में धर्म का समावेश होना चाहिए, लेकिन धर्म की राजनीति करना उचित नहीं है। भारत में परंपरागत रूप से सभी धर्मों को समान सम्मान मिला है, किंतु आज की चुनावी व्यवस्थाओं में जाति और धर्म के आधार पर विवाद उत्पन्न किए जा रहे हैं। उन्होंने मुफ्त राशन जैसी व्यवस्थाओं पर भी प्रश्न उठाते हुए कहा कि इस प्रकार की योजनाएं दीर्घकालीन समाधान नहीं हैं।</p>
<p>समान नागरिक संहिता के विषय में उन्होंने कहा कि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज सदैव इस विचार का समर्थन करते रहे हैं। जब भी देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति अथवा अन्य उच्च पदस्थ व्यक्तियों से उनकी भेंट हुई, उन्होंने इस विषय में सकारात्मक सुझाव दिए।</p>
<p><strong>पत्रकारों का परिचय करवाया</strong></p>
<p>मुनि श्री ने यह भी बताया कि आचार्य गुरुदेव द्वारा नई शिक्षा नीति के संबंध में दिए गए। हिंदी भाषा को बढ़ावा देना और रोजगारोन्मुखी शिक्षा पर सरकार कार्य कर रही है। संचालन करते हुए प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने उपस्थित सभी पत्रकारों का परिचय गुरुदेव से कराया। इस अवसर पर नगर के विभिन्न दैनिक समाचार पत्रों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। श्री सकल दिगंबर जैन समाज समिति, श्री पंचकल्याणक समारोह समिति एवं शीतल विहार न्यास के पदाधिकारियों ने सभी पत्रकार बंधुओं का स्वागत किया।</p>
<p><strong>पत्रकारों को काव्य कृति भेंट की</strong></p>
<p>गुरुदेव ने आचार्य श्री की स्वलिखित काव्य कृति “डूबो मत लगाओ डुबकी” की प्रति आशीर्वाद स्वरूप भेंट की। अविनाश जैन ने बताया कि पंचकल्याणक महोत्सव की तैयारियाँ चरम सीमा पर हैं। प्रमुख पात्रों ने आयोजन को सफल बनाने के लिए घोषित दानराशि जमा कराने की शुरुआत कर दी है तथा विभिन्न समितियों का गठन भी किया गया है।</p>
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		<title>आचार्य श्री विद्यासागरजी की प्रतिकृति हुई विराजमान: गुरु उपकार भवन में आचार्य श्री ज्ञानसागरजी एवं आचार्य श्री विद्यासागरजी के चरण स्थापित </title>
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		<pubDate>Tue, 17 Feb 2026 13:35:44 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अरिहंत विहार दिगंबर जैन मंदिर परिसर के गुरु उपकार भवन में आचार्य श्री ज्ञानसागरजी एवं आचार्य श्री विद्यासागरजीके चरण स्थापित कर उनकी मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिष्ठा मुनि श्री संभवसागरजी, मुनि श्री निस्सीम सागरजी, मुनि श्री संस्कार सागरजी के सानिध्य में की गई। इसके बाद दोनों चरणों का प्रथम अभिषेक शुद्ध वस्त्रों के साथ किया गया। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अरिहंत विहार दिगंबर जैन मंदिर परिसर के गुरु उपकार भवन में आचार्य श्री ज्ञानसागरजी एवं आचार्य श्री विद्यासागरजीके चरण स्थापित कर उनकी मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिष्ठा मुनि श्री संभवसागरजी, मुनि श्री निस्सीम सागरजी, मुनि श्री संस्कार सागरजी के सानिध्य में की गई। इसके बाद दोनों चरणों का प्रथम अभिषेक शुद्ध वस्त्रों के साथ किया गया। <span style="color: #ff0000">विदिशा से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>विदिशा।</strong> अरिहंत विहार दिगंबर जैन मंदिर परिसर के गुरु उपकार भवन में आचार्य श्री ज्ञानसागरजी एवं आचार्य श्री विद्यासागरजीके चरण स्थापित कर उनकी मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिष्ठा मुनि श्री संभवसागरजी, मुनि श्री निस्सीम सागरजी, मुनि श्री संस्कार सागरजी के सानिध्य में की गई। इसके बाद दोनों चरणों का प्रथम अभिषेक शुद्ध वस्त्रों के साथ किया गया। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि इस बीच आचार्य श्री विद्यासागरजी की प्रतिकृति का आगमन जयजयकार के साथ हुआ तथा गुरु उपकार भवन में सिंहासन पर प्रतिकृति विराजमान की गई। इस अवसर पर मुनि श्री संभवसागरजी महाराज ने कहा कि नगर के प्रत्येक भक्त के हृदय में गुरुदेव विराजमान है और यहां पर जितने भी कार्यक्रम हुए हैं और चल रहे हैं। वह सभी अभूतपूर्व हुए तथा ऊंचाइयों को प्राप्त हो रहे हैं। यह सब गुरुदेव की वरदानी छांव का ही परिणाम है। उन्होंने कहा कि गुरुदेव ने अपने सभी शिष्यों को ऐसी घुट्टी पिलाई है कि उसके पास आशीर्वाद की कोई कमी नहीं रहेगी। उन्होंने गुरुदेव के हायकू को सुनाते हुए कहा कि ‘गुरु अंक में पले बड़े हम, अंक भी वही देंगे’ अर्थात उनकी गोद में रहकर हमने जो शिक्षा प्राप्त की उसका परिणाम भी उनके ही द्वारा हम सभी मुनिराजों को प्राप्त हो रहा है।</p>
<p><strong>मुनि श्री संभवसागरजी ने सुनाए अपने संस्मरण </strong></p>
<p>मुनि श्री ने 17 फरवरी 2024 को स्मरण करते हुए कहा कि आज के दिन पूरे देश की नजर चंद्रगिरी डोंगरगढ़ की ओर थी। भारत ही नहीं विश्व का प्रत्येक भक्त जाप, भक्तामर, शांतिविधान या णमोकार महामंत्र का पाठ कर रहा था कि आज कोई चमत्कार घटित हो जाए और पूज्य गुरुदेव उठकर बैठ जाएं लेकिन, कोई चमत्कार घटित न हो सका। सभी की आंख गीली थी। सभी के मुख से एक ही उच्चारण था। ‘सबकुछ दिया है तुमने हमको हम कुछ भी न दे पाए’ हमारे और गुरुदेव के बीच अभी भी पचास किमी का फासला था। प्रातःकाल से हम लोग संध्या काल तक चालीस किमी चले और मात्र 10 किमी की दूरी शेष रह गई थी लेकिन, आप लोग सभी पुण्यशाली हो कि हमारे बाजू में बैठे मुनिराज निस्सीम सागर जी पिछले एक हफ्ता से गुरुजी के पास सेवा में दिनरात तत्पर थे।</p>
<p><strong>गुरुदेव की स्मृतियां उभर रही: मुनिश्री </strong></p>
<p>गुरुदेव की शेष स्मृति को आप लोग उनके ही मुख से कल सुनेंगे। मुनि श्री ने कहा कि विदिशा वालों को जो कुछ भी गुरुदेव ने दिया। वह ‘भूतो न भविष्यति’। गुरु के उपकार को कभी भुलाया नहीं जा सकता। अरिहंत विहार का यह विशाल परिसर हो या शीतलधाम का विशाल समवशरण, गुरुदेव की स्मृतियां स्मृति पटल पर एक के बाद एक उभरकर सामने आ रही है।</p>
<p><strong>आचार्य श्री समयसागरजी 23 मुनि दीक्षा देंगे</strong></p>
<p>प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया 18 फरवरी को शाम 6 बजे नगर से मुक्तागिरी सिद्धक्षेत्र के लिए 6 बस तथा कई चार पहिया वाहनों से भक्तगण रवाना होंगे। ‘मुक्तागिरी’ मध्यप्रदेश एवं महाराष्ट्र की सीमा से लगा हुआ प्रकृति का अनुपम स्थान है। जहां से अनंतानंत मुनिराजों ने साधना की एवं मोक्ष को गए हैं। ऐसे स्थान पर पहली बार आचार्य श्री समयसागर महाराज 19 फरवरी को 23 जैनेश्वरी मुनि दीक्षा देंगे। जिसमें विदिशा नगर गौरव ऐलक कैवल्य सागर एवं ऐलक गरिष्ठ सागर महाराज, ऐलक गौरव सागर महाराज सहित अन्य मुनिसंघों के संघस्थ ऐलक एवं क्षुल्लक शामिल हैं तथा कई नए ब्रह्मचारी भी दीक्षित हो सकते हैं।</p>
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		<title>भोगों से जब विरक्ति हो जाती है तो धन संपत्ति और पद से मोह नहीं रहता: मुनि श्री संभवसागरजी ने जैनत्व का इतिहास बताया  </title>
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		<pubDate>Tue, 25 Nov 2025 12:56:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[संसार शरीर और भोगों से जब विरक्ति हो जाती है तो धन संपत्ति और पद से मोह समाप्त हो जाता है। यह उद्गार मुनि श्री संभवसागरजी ने जैनत्व का इतिहास बताते हुए व्यक्त किए। विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230; विदिशा। संसार शरीर और भोगों से जब विरक्ति हो जाती है तो धन संपत्ति और पद [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>संसार शरीर और भोगों से जब विरक्ति हो जाती है तो धन संपत्ति और पद से मोह समाप्त हो जाता है। यह उद्गार मुनि श्री संभवसागरजी ने जैनत्व का इतिहास बताते हुए व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>विदिशा।</strong> संसार शरीर और भोगों से जब विरक्ति हो जाती है तो धन संपत्ति और पद से मोह समाप्त हो जाता है। यह उद्गार मुनि श्री संभवसागरजी ने जैनत्व का इतिहास बताते हुए व्यक्त किए। उन्होंने भारत के सम्राट चंद्रगुप्त के वैराग्य का कथन करते हुए कहा कि जिनके अधीनस्थ कई राजा थे। जिनका वैभव संपूर्ण भारत पर था, जब उनको संसार, शरीर और भोगों के प्रति अरुचि हुई तो वे अंतरात्मा की यात्रा करने के लिए दक्षिण भारत के श्रवण बेलगोला पहुंचे और सर्वश्रेष्ठ आचार्य भद्रबाहु स्वामी के चरणों में समर्पण किया तथा दिगंबर मुनि के रूप में दीक्षा धारण की।</p>
<p><strong>इच्छाओं की पूर्ति कभी नहीं हो सकती </strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि संसार शरीर और भोगों से जब तक विरक्ति नहीं होगी तब तक आप अंतर्यात्रा नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को यह भावना तो धारण करना ही चाहिए। जिससे कर्मांे की गांठ कम से कम कुछ तो ढीली हो और यह अविनाशी पद प्राप्त हो जाए। मुनि श्री ने कहा कि आप कितनी भी इच्छाएं कर लो। इच्छाओं की पूर्ति कभी नहीं हो सकती लेकिन, उन इच्छाओं पर थोड़ा विराम तो लगाया जा सकता है। मुनि श्री ने कहा भले ही आप मुनि, आर्यिका बनो या न बनो लेकिन, भावना तो कर ही सकते हैं। आज भावना करोगे तो धीरे-धीरे इच्छाओं पर रोक लगेगी और कम से कम वृति श्रावक या श्राविका तो बन ही जाओगे।</p>
<p><strong>सही जबाब देने वालों को पुरस्कृत किया</strong></p>
<p>जब हम इस भव में वृति श्रावक बनेंगे तभी हम अगली पर्याय में मुनि या आर्यिका पद को धारण कर अपना उद्धार कर सकते हैं। उन्होंने एक सुक्ति कही कि जो कर्म में सूर है वही धर्म में सूर है। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि प्रातः प्रवचन के पूर्व जैन मिलन महिला मंडल की सदस्याओं ने आचार्य एवं मुनि श्री की अष्टदृव्यों से पूजन किया। प्रवचन के उपरांत मुनि श्री निस्सीम सागर महाराज ने प्रश्नमंच के माध्यम से प्रश्न पूछे। सही जबाब देने वालों को पुरस्कृत किया गया। इस अवसर पर, मंदिर टृस्ट अध्यक्ष संजय सेठ, महेंद्र बंट, शीतलधाम अध्यक्ष सचिन जैन, सकल दि. जैन समाज अध्यक्ष शैलेंद्र चौधरी, प्रवक्ता अविनाश जैन, अनिरुद्ध सराफ,अशोक अरिहंत उपस्थित थे। मुकेश जैन बड़ाघर ने संचालन किया।</p>
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		<title>मुनि श्री संभवसागरजी ने पूछा बच्चों आपको सपना हिंदी में आता है या अंग्रेजी में : स्कूली बच्चों से मुनिश्री ने किया संवाद, सुनाए संस्मरण  </title>
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		<pubDate>Sun, 23 Nov 2025 10:10:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री संभवसागर जी ने रविवार को बच्चों से संवाद किया। उन्हें आचार्य श्री विद्यासागर जी से जुडे़ संस्मरण सुनाए। उन्होंने हिन्दी को अपनाने और हिन्दी माध्यम में शिक्षा पर जोर दिया। विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230;  विदिशा। मुनिश्री संभवसागर जी ने कहा कि आचार्य श्री विद्यासागरजी बच्चों को बहुत चाहते थे। उसी से संबंधित एक [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री संभवसागर जी ने रविवार को बच्चों से संवाद किया। उन्हें आचार्य श्री विद्यासागर जी से जुडे़ संस्मरण सुनाए। उन्होंने हिन्दी को अपनाने और हिन्दी माध्यम में शिक्षा पर जोर दिया। <span style="color: #ff0000">विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> विदिशा।</strong> मुनिश्री संभवसागर जी ने कहा कि आचार्य श्री विद्यासागरजी बच्चों को बहुत चाहते थे। उसी से संबंधित एक संस्मरण सुनाते हुए मुनि श्री संभव सागरजी ने कहा कि घटना 2019 की है। ग्रीष्म कालीन प्रवास दयोदय गौशाला जबलपुर में चल रहा था। दोपहर के समय आचार्य श्री आंगन में बैठे हुए थे कि कक्षा चार में पढ़ने वाला एक बच्चा आया और उसने आचार्य श्री को नमोस्तु किया। आचार्य श्री स्वाध्याय में लीन थे। उसने अपनी ड्राइंग की कॉपी और पेंसिल निकाली तथा आचार्य श्री के ठीक सामने बैठकर वह ड्राइंग करने लगा। गर्मी के दिन थे। गरम हवा चलने लगी थी, उस समय हम आचार्य श्री के पास गए और निवेदन किया कि बाहर लू चल रही है। अंदर कमरे में चलें तो आचार्य श्री ने बच्चे की ओर इशारा करते हुए कहा कि देखो उस बच्चे को डिस्टर्ब हो जाएगा और गुरुदेव वहीं बैठे रहे। हम उस बच्चे के पास पहुंचे हमने देखा कि उसने आचार्य गुरुदेव का बहुत ही सुंदर रेखांकित चित्र बनाया था। आचार्य श्री ने उस चित्र को देखा और उसे बहूत-बहूत आशीर्वाद दिया तो देखो बच्चों आचार्य गुरुदेव एक छोटे से छोटे बच्चे का बहुत ध्यान रखते थे।</p>
<p><strong><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-95053" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0008.jpg" alt="" width="1600" height="749" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0008.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0008-300x140.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0008-1024x479.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0008-768x360.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0008-1536x719.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0008-990x463.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0008-1320x618.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" />बच्चे हिंदी लिखने तथा बोलने में कमजोर हो रहे हैं</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि आज विदिशा की सभी पाठशालाओं के बच्चे आए हैं तो बच्चों से प्रश्न करते हुए पूछा बताओ बच्चों भारत को भारत बोलना चाहिए या इंडिया? सभी बच्चों ने कहा कि ’भारत’ इस प्रकार मुनि श्री ने कहा कि आजकल के सभी माता-पिता अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में शिक्षा दिला रहे हैं। जिससे बच्चे अपनी मातृभाषा हिंदी को लिखने तथा बोलने में कमजोर हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत का नाम पहले भी भारत ही था लेकिन, अंग्रेजों ने इसका नाम इंडिया कर दिया लेकिन, अब भारत को स्वतंत्र हुए 78 वर्ष बीत गए फिर भी हम गुलामी का प्रतीक इंडिया को बोल रहे हैं। आचार्य गुरुदेव ने हमेशा हिंदी भाषा और भारत को भारत बोलने और लिखने के लिये प्रेरित किया।</p>
<p><strong>नई शिक्षा नीति में परिवर्तन का श्रेय गुरुदेव को</strong></p>
<p>जब आचार्य श्री के पास प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति दर्शन करने आए तो आचार्य श्री ने उनको मातृभाषा हिंदी को प्रोत्साहित करने तथा भारत को भारत बोलने के संदर्भ में बात कही। आचार्य श्री से प्रेरित होकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने नई शिक्षा नीति के संदर्भ में नीति के प्रमुख कस्तूरी रंजन को आचार्य श्री से संपर्क करने के लिए कहा गया तो आचार्य श्री ने उनको नई शिक्षा नीति में हिंदी भाषा को प्राथमिकता के साथ शामिल करने तथा प्राथमिक शाला तक के सभी बच्चों को हिंदी में शिक्षा देने की बात कही। जिससे बच्चे प्राथमिक स्तर पर अपनी भाषा में मजबूत हो सके जिसे भारत सरकार ने स्वीकार कर नई शिक्षा नीति में जो परिवर्तन किया, उसका श्रेय गुरुदेव को जाता है।</p>
<p><strong>अपनी मातृभाषा को मजबूत करें</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि हिंदी वर्णमाला में 52 अक्षर होते हैं जबकि, अंग्रेज़ी भाषा की वर्णमाला में 26 अक्षर होते हैं। उन्होंने कहा कि एक रिसर्च के अनुसार जो बच्चे अकेले अंग्रेजी भाषा का अध्यन करते हैं। उनके दिमाग का आधा हिस्सा ही काम करता है और जो बच्चे हिंदी भाषा के साथ अध्यन करते हैं उनका दिमाग पूरा काम करता है। एक बार आचार्य श्री ने बच्चों से पूछा- अच्छा बताओ, आपको सपना अंग्रेजी में आता है या हिंदी में? तो बच्चों ने कहा हिंदी में तो बच्चों भले ही आपके मम्मी-पापा अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिला रहे हैं, आप सभी अपनी मातृभाषा को मजबूत करने के लिए पाठशाला की दीदियों से धर्म की शिक्षा के साथ अपनी हिंदी वर्णमाला को भी मजबूत करें।</p>
<p><strong>सभी पाठशालाओं के बच्चों ने उत्साह से भाग लिया </strong></p>
<p>प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया रविवार का दिन होने से समग्र पाठशाला के सभी बच्चों तथा शिक्षा देने वाले सभी भैया एवं बहनों द्वारा आचार्य श्री विद्यासागरजी का संगीतमय पूजन किया। जिसे क्रमवार सभी पाठशालाओं के बच्चों ने उत्साह के साथ भाग लिया। प्रवचन उपरांत मुनि श्री निस्सीम सागरजी ने बच्चों से प्रवचन पर आधारित प्रश्न पूछ।े जिसका सही जबाब देने बाले बच्चों को पुरस्का देकर प्रोत्साहित किया एवं स्वल्पाहार कराया।</p>
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