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	<title>मुनि श्री संभवसागरजी महाराज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>मुनि श्री संभवसागरजी महाराज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>प्रत्येक जीव में आत्मा का वास, राग-द्वेष से बंधते हैं कर्म : मुनि श्री संभवसागरजी महाराज ने माधवगंज में दी धर्म देशना में बताई कर्मों की गति </title>
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		<pubDate>Fri, 06 Mar 2026 09:58:18 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वनस्पति, जल, अग्नि, वायु और पृथ्वी—इन सभी में असंख्य जीव विद्यमान हैं। ये उद्गार मुनि श्री संभवसागर जी महाराज ने श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, माधवगंज में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। विदिशा से राजीव सिंघई की पढ़िए यह खबर&#8230; विदिशा। इस संसार में केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव में [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वनस्पति, जल, अग्नि, वायु और पृथ्वी—इन सभी में असंख्य जीव विद्यमान हैं। ये उद्गार मुनि श्री संभवसागर जी महाराज ने श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, माधवगंज में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">विदिशा से राजीव सिंघई की पढ़िए यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>विदिशा।</strong> इस संसार में केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव में आत्मा का वास होता है। वनस्पति, जल, अग्नि, वायु और पृथ्वी—इन सभी में असंख्य जीव विद्यमान हैं। ये उद्गार मुनि श्री संभवसागर जी महाराज ने श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, माधवगंज में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। मुनि श्री ने एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय जीवों की व्याख्या करते हुए कहा कि एक पत्ती में भी अनगिनत जीव होते हैं और जल की एक बूंद में भी असंख्य जीव निवास करते हैं। उन्होंने संसार चक्र की व्याख्या करते हुए बताया कि संसारी जीवों की अवस्था निरंतर बदलती रहती है। अधिकांश जीव एकेन्द्रिय होते हैं, इसलिए उनकी क्रियाएँ सीमित रहती हैं।मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य पंचेन्द्रिय प्राणी है। वह आँखों से देखता है,कानों से सुनता है,नाक से सूंघता है,जीभ से स्वाद लेता है और त्वचा से स्पर्श करता है। इन पाँच इन्द्रियों के माध्यम से ही मनुष्य के भीतर राग और द्वेष उत्पन्न होते हैं। जब कोई अच्छी वस्तु दिखाई देती है तो राग उत्पन्न होता है और अप्रिय बात सुनने पर द्वेष पैदा हो जाता है। उन्होंने इसे एक सुंदर उदाहरण से समझाते हुए कहा कि आज के समय में लोग बिना दुकान पर गए ऑनलाइन सामान मंगा लेते हैं। घर बैठे ऑर्डर किया और होम डिलीवरी हो गई। उसी प्रकार हमारे राग-द्वेष ही कर्मों का &#8216;ऑनलाइन ऑर्डर&#8217; है। जहाँ भी हम हैं और जैसे भी भाव करते हैं, उसी क्षण कर्म आकर आत्मा से चिपक जाते हैं।</p>
<p><strong>जीव जैसा कर्म करता है,वैसा ही अगला भव निश्चित होता है</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि जैनाचार्यों ने इसलिए सावधानीपूर्वक जीवन जीने की शिक्षा दी है, क्योंकि प्रत्येक क्षण हमारे भाव बन रहे हैं और उन्हीं भावों से कर्मों का बंध हो रहा है। जब तक जीव कर्मों का बंध करता रहता है, तब तक कर्मों की आवक निरंतर चलती रहती है। यदि जीव अपने भावों को शुद्ध कर लें और कर्मों के बंधन को रोक दे तो कर्मों की यह आवक भी रुक सकती है। यही अवस्था ‘संवर’ कहलाती है। उन्होंने कहा कि संसार में सभी जीव अपने-अपने कर्मों के अनुसार चार गतियों में जन्म लेते हैं—नरक गति, तिर्यंच गति (पशु-पक्षी, कीट आदि), मनुष्य गति और देव गति। जीव जैसा कर्म करता है,वैसा ही उसका अगला भव निश्चित हो जाता है।</p>
<p><strong>कर्मों का यह नियम अपने आप कार्य करता है</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि जब यह शरीर छूटता है, उससे पहले ही जीव अपने अगले भव की “टिकट” काट चुका होता है। संसार की यह व्यवस्था पूर्णतः न्यायपूर्ण और ईमानदार है। यहाँ ऐसा नहीं होता कि किसी ने कहीं और का टिकट लिया हो और कहीं और पहुँच जाए। यदि किसी जीव ने नरक गति के कर्म बाँध लिए हैं, तो उसे नियम से नरक में ही जाना पड़ेगा। कर्मों का यह नियम अपने आप कार्य करता है।</p>
<p><strong>मोक्षमार्ग अपनाएँ या सद्गृहस्थ बनें</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन में हमें अत्यंत सावधानीपूर्वक ऐसे कर्म करने चाहिए,जिससे हमारा अगला भव उत्तम बने और हम मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर हो सकें। मुनि श्री ने आचार्य श्री के हाइकु—&#8217;धर्म प्रभाव, प्रभावित हुआ क्या? &#8220;बिना विवाह&#8217;</p>
<p>का उल्लेख करते हुए गृहस्थों को उपदेश दिया कि दो ही मार्ग हैं—या तो मोक्षमार्ग अपनाएँ या सद्गृहस्थ बनें। गृहस्थ की जिम्मेदारी है कि वह संतानोत्पत्ति कर अपने कुल को आगे बढ़ाए, जिससे कुल की मर्यादा और समाज की वृद्धि हो सके।उन्होंने बताया कि पंचकल्याणक महामहोत्सव में सभी पात्रों के लिए समिति द्वारा हथकरघा के वस्त्रों की व्यवस्था की गई है। इन वस्त्रों में आचार्य गुरुदेव का आशीर्वाद और &#8216;अपनापन&#8217; है। ये वस्त्र अहिंसक धागों से दिल्ली की तिहाड़ जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहे कैदियों द्वारा तैयार किए गए हैं।</p>
<p><strong>भगवान आदिनाथ की पाती सभी को भेजी गई है</strong></p>
<p>मुनि श्री ने हथकरघा के वस्त्रों के उपयोग की सलाह देते हुए कहा कि ये वस्त्र इको-फ्रेंडली हैं,जो शरीर और पर्यावरण दोनों के लिए लाभकारी हैं। इससे स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है। उन्होंने कहा कि बर्रो वाले भगवान आदिनाथ की पाती सभी को भेजी गई है। विदिशा नगर का कोई भी परिवार इस महाअनुष्ठान से वंचित नहीं रहना चाहिए, समय कम है लेकिन आश्चर्य की बात है कि सभी कार्य अपने-आप बनते चले जा रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो बर्रो वाले भगवान आदिनाथ की कृपा और गुरुदेव के आशीर्वाद से सभी व्यवस्थाएँ स्वतः पूर्ण हो रही हैं। पंचकल्याणक महा महोत्सव के प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि जैन महाविद्यालय के विशाल प्रांगण में यह आयोजन अत्यंत भव्य रूप से आयोजित किया जाएगा। यहाँ देश और प्रदेश का सबसे सुंदर पंडाल बनाया जा रहा है, जिसमें बैठकर हजारों श्रद्धालु भगवान की अर्चना करेंगे।</p>
<p><strong>घर-घर पंचरंगा ध्वज </strong></p>
<p>समिति द्वारा सभी प्रमुख पात्रों के साथ-साथ सामान्य इंद्र एवं इंद्राणियों के लिए भी “अपनापन”हथकरघा वस्त्र और शुद्ध भोजन की व्यवस्था की गई है। बुकिंग हेतु महिलामंडल एवं कार्यकर्ता गण बर्रो वाले भगवान श्री आदिनाथ की पाती लेकर एवं जैन मिलन के कार्यकर्ता पचरंगा ध्वज लगाने के लिये घर-घर पहुंच रहे हैं, आप उनका स्वागत करें।</p>
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		<title>अरिहंत विहार मंदिर में गुरु उपकार भवन का लोकार्पण : मुक्तागिरी सिद्धक्षेत्र में होने जा रहा तीन दिवसीय निर्ग्रंथ मुनि दीक्षा महोत्सव  </title>
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		<pubDate>Mon, 16 Feb 2026 13:57:05 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अरिहंत विहार वह स्थल है, जिसके मूलनायक श्री पारसनाथ भगवान की प्राण प्रतिष्ठा आचार्य विद्यासागरजी महाराज ने की थी। यह उद्गार मुनि श्री संभवसागरजी महाराज ने अरिहंत विहार दिगंबर जैन मंदिर में गुरु उपकार भवन के लोकार्पण समारोह में व्यक्त किए। विदिशा से पढ़िए, यह राजीव सिंघई की खबर&#8230;  विदिशा। अरिहंत विहार वह स्थल है, [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अरिहंत विहार वह स्थल है, जिसके मूलनायक श्री पारसनाथ भगवान की प्राण प्रतिष्ठा आचार्य विद्यासागरजी महाराज ने की थी। यह उद्गार मुनि श्री संभवसागरजी महाराज ने अरिहंत विहार दिगंबर जैन मंदिर में गुरु उपकार भवन के लोकार्पण समारोह में व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">विदिशा से पढ़िए, यह राजीव सिंघई की खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> विदिशा।</strong> अरिहंत विहार वह स्थल है, जिसके मूलनायक श्री पारसनाथ भगवान की प्राण प्रतिष्ठा आचार्य विद्यासागरजी महाराज ने की थी। यह उद्गार मुनि श्री संभवसागरजी महाराज ने अरिहंत विहार दिगंबर जैन मंदिर में गुरु उपकार भवन के लोकार्पण समारोह में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि स्वयं आचार्य श्री ने इस मंदिर की नींव रखी तथा वेदी प्रतिष्ठा कलश के आरोहण में वह स्वयं पधारे और संपूर्ण अरिहंत विहार को गुरुदेव ने अपनी परम रज से पवित्र किया। मुनि श्री ने कहा कि आज आप लोगों ने गुरु उपकार भवन का लोकार्पण किया और हम सभी उसके साक्षी बने। मुनि श्री ने कहा कि यह कार्य आचार्य श्री के द्वितीय समाधि दिवस पर ही संपादित होना था, उसी अनुसार उसका निमित्त बना। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया आचार्य श्री विद्यासागरजी का द्वितीय समाधि दिवस के अवसर पर 17 से 18 फरवरी की मध्यरात्रि में छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ पहाड़ी के चंद्रगिरि पर आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागर जी महामुनिराज ने अपनी अंतिम सांस ली थी।</p>
<p><strong>मंगलवार को आचार्य गुरुदेव की प्रतिमा का पदार्पण</strong></p>
<p>गुरुदेव के उन उपकारों को याद करते हुए तीन दिवसीय गुरु अर्चना महोत्सव 16 से 18 फरवरी तक अरिहंत विहार मंदिर परिसर में रखा गया है, जिसके प्रथम दिवस भगवान जिनेंद्र देव का अभिषेक एवं नित्य नियम पूजन उपरांत आचार्य गुरुदेव की संगीतमय पूजन किया गया। गुरुदेव के उपकारों को याद किया गया। गुरु उपकार भवन का लोकार्पण एवं वेदी शुद्धि का कार्यक्रम मंत्रोच्चारण के साथ मुनिसंध के सानिध्य में किया गया। कार्यक्रम के दूसरे दिवस मंगलवार को आचार्य गुरुदेव की प्रतिमा का पदार्पण होगा तथा उनके चरण कमल को विराजमान कर शुद्धि की जाएगी एवं मुनिसंघ की देशना होगी। इसी क्रम में 18 फरवरी को गुरुदेव की प्रतिमा को मूल वेदी पर विराजमान कर साथ में उपकरण एवं चरण कमल की स्थापना कर संगीतमय पूजन तथा मुनिसंघ की देशना होगी।</p>
<p><strong>पहली बार बीस से अधिक निर्ग्रंथ मुनि दीक्षा </strong></p>
<p>प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया श्री सकल दिगंबी जैन समाज की ओर से 19 फरवरी को सिद्धक्षेत्र ‘मुक्तागिरी में आचार्य गुरुदेव श्री समयसागर महाराज आचार्य बनने के बाद पहली बार बीस से अधिक निर्ग्रंथ मुनि दीक्षा प्रदान कर रहे हैं। इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिये बड़ी संख्या में धर्म श्रद्धालु 18 फरवरी को बस एवं चार पहिया गाड़ियों के माध्यम से बैतूल जिले में स्थापित मुक्तागिरी सिद्धक्षेत्र पर पहुंचेंगे तथा क्षेत्र और गुरुदेव के दर्शन और उनका आशीर्वाद प्राप्त करेंगे।</p>
<p><strong>नाम पंजीकरण करा लें</strong></p>
<p>उल्लेखनीय है कि निर्ग्रंथ मुनि दीक्षा में विदिशा नगर के गौरव ऐलक श्री कैवल्य सागरजी महाराज तथा ऐलक श्री गरिष्ठ सागर जी महाराज का तथा संभवसागरजी महाराज, संघस्थ ऐलक गौरव सागरजी महाराज सहित कई अन्य मुनि, ऐलक एवं क्षुल्लक दीक्षा होंगी। विदिशा नगर से जो भी महानुभाव इस कार्यक्रम में भाग लेना चाहते हैं, वह अपने नाम सकल दिगंबर जैन समाज समिति के पदाधिकारियों से संपर्क कर रजिस्टर करा लें।</p>
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		<title>आचार्य श्री विद्यासागर जी का ख्याति प्रकाश विदेशों तक था : मुनि श्री संभवसागरजी महाराज ने खजुराहो के संस्मरण सुनाए </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 30 Nov 2025 09:29:51 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विद्यासागर जी से जैन समाज तो प्रभावित था ही जैनेतर समाज और विदेशी नागरिक भी प्रभावित थे। मुनि श्री संभवसागर महाराज ने खजुराहो चातुर्मास का संस्मरण सुनाया। विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230; विदिशा। आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागर जी महाराज से जैन समाज तो प्रभावित था ही जैनेतर समाज और विदेशी नागरिक भी प्रभावित [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्य श्री विद्यासागर जी से जैन समाज तो प्रभावित था ही जैनेतर समाज और विदेशी नागरिक भी प्रभावित थे। मुनि श्री संभवसागर महाराज ने खजुराहो चातुर्मास का संस्मरण सुनाया। <span style="color: #ff0000">विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>विदिशा।</strong> आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागर जी महाराज से जैन समाज तो प्रभावित था ही जैनेतर समाज और विदेशी नागरिक भी प्रभावित थे। मुनि श्री संभवसागर महाराज ने 2008 खजुराहो चातुर्मास का संस्मरण सुनाते हुए कहा कि उधर, विदेशी पर्यटकों का बहुत आगमन हुआ, उसमें स्पेन और फ्रांसीसी थे। उन सभी के पास एक-दो कैमरा अवश्य रहते थे, वह कला पारखी थे। उन्होंने चारों दिशाओं के मंदिरों के समूह को देखा और उसकी बारीकियों को देखा और उसके फोटो भी लिए और गुरुदेव के दर्शन किए। उन्होंने शास्त्रों का अध्ययन तो नहीं किया था लेकिन, उन्होंने जब गुरुदेव को देखा तो वह देखते रह गए और वह आश्चर्य चकित थे।</p>
<p>उन्होंने पत्थर की मुद्रा तो बहुत देखी थी लेकिन, साक्षात वीतरागता की मुद्रा को देखा और दो-दो घंटे तक इस मुद्रा को देखते रहते थे। कभी आहार के समय तो कभी आचार्य श्री की सामायिक मुद्रा को देखा तो देखते रह गए। ठंड का मौसम था आचार्य श्री धूप में बैठे थे तो वह सैनानी आते और हाथ जोड़ते और टकटकी लगाए देखते रहते। यह जानकारी प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने दी।</p>
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		<title>अष्टदृव्यों से संगीतमय पूजन की जारी : आचार्य भक्ति एवं प्रश्नमंच का कार्यक्रम संपन्न </title>
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		<pubDate>Mon, 24 Nov 2025 14:20:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री संभवसागरजी महाराज की शीतकालीन बांचना श्री शांतिनाथ जिनालय स्टेशन जैन मंदिर में चल रही है। प्रतिदिन प्रातः 8:45 से आचार्य श्री की अष्टदृव्यों से संगीतमय पूजन की जा रही है। आज शीतल महिला मंडल शीतलधाम द्वारा गुरुदेव तथा मुनिसंघ की पूजन अष्टदृव्यों से की गई। विदिशा से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनि श्री संभवसागरजी महाराज की शीतकालीन बांचना श्री शांतिनाथ जिनालय स्टेशन जैन मंदिर में चल रही है। प्रतिदिन प्रातः 8:45 से आचार्य श्री की अष्टदृव्यों से संगीतमय पूजन की जा रही है। आज शीतल महिला मंडल शीतलधाम द्वारा गुरुदेव तथा मुनिसंघ की पूजन अष्टदृव्यों से की गई। <span style="color: #ff0000">विदिशा से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>विदिशा।</strong> मुनि श्री संभवसागरजी महाराज की शीतकालीन बांचना श्री शांतिनाथ जिनालय स्टेशन जैन मंदिर में चल रही है। प्रतिदिन प्रातः 8:45 से आचार्य श्री की अष्टदृव्यों से संगीतमय पूजन की जा रही है। आज शीतल महिला मंडल शीतलधाम द्वारा गुरुदेव तथा मुनिसंघ की पूजन अष्टदृव्यों से की गयी एवं दौपहर में तीन बजे से स्वाध्याय हुआ। सायंकाल 5:30 बजे आचार्य भक्ति एवं प्रश्नमंच का कार्यक्रम संपन्न हुआ।</p>
<p>इस अवसर पर मुनि श्री संभवसागर महाराज ने कहा कि कभी भगवान शीतलनाथ का समवशरण यहां आया होगा। वर्तमान में आचार्य गुरुदेव की आपकी विदिशा नगरी पर ऐसी कृपा हुई कि आपके नगर में ऐसा साक्षात न सही लेकिन, कृत्रिम समवशरण पूर्णता की ओर है और उसमें शीशम का कार्य किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक परिवार का कुछ न कुछ दृव्य शीतलधाम के इस विशाल समवशरण में लगना चाहिये। उन्होंने तीन प्रकार की संल्लेखना का वर्णन करते हुये कहा कि वर्तमान में कायोत्सर्ग मरण तथा इंगनि मरण तो नहीं होता लेकिन, भक्त प्रत्याख्यान मरण किया जाता है, जिसमें क्षपकराज धीरे-धीरे क्रमशः चारों प्रकार के आहार का त्याग करते हुये अंत में प्राणों का त्याग करता है।</p>
<p><strong>वह तो अपने लिये स्वयं निर्यापक थे</strong></p>
<p>प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया मुनि श्री ने चंद्रगिरी पर आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज की समाधि सल्लेखना को उत्कृष्ट समाधि बताते हुए कहा कि उन्होंने भक्त प्रत्याख्यान समाधि सल्लेखना धारण कर स्वयं ही अपने आपको संघ से सीमित कर लिया था। डोंगरगढ़ के चंद्रगिरी पर जब वह समाधि सल्लेखना की ओर आगे बढ़ रहे थे तो मात्र तीन मुनिराज ही उन्होंने अपने पास रखे। वह तो अपने लिये स्वयं निर्यापक थे। उन्होंने धीरे-धीरे अपने शरीर को कृश करते हुये शरीर को छोड़ा तथा पूर्णतया सावधान थे।</p>
<p>उनके अंतिम समय में निर्यापक श्रमण श्री प्रसाद सागर जी तो थे ही वरिष्ठ निर्यापक श्रमण श्री योगसागर जी, निर्यापक श्रमण समतासागर जी सहित छह मुनिराज और पहुंच गये थे। इस प्रकार अंतिम समय में नौ मुनिराजों को सेवा करने का अवसर मिल गया था। जिसमें निस्सीम सागर महाराज भी उक्त समय पर थे। आचार्य श्री जानते थे कि अंतिम समय निकट है लेकिन उन्होंने सभी संघों को उधर आने से रोका वह जानते थे कि यदि खवर फैल गयी तो चंद्रगिरी पर इतनी जनता कैसे समाहित होगी। मुनि श्री ने विदिशा के 2014 का चार मुनिराजों की दीक्षा का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि उस दिन कार्तिक कृष्ण अष्ठमी का दिन था यह शुभ तिथी थी।</p>
<p>आचार्य श्री बर्रो वाले बाबा भगवान आदिनाथ के दरबार से आहार चर्या को निकले हम भी उनके पीछे पीछे निकले तो पता लगा कि आज तो आचार्य श्री बहुत दूर गये है, कहां गये हैं। किला अंदर ऋषि सतभैया के यहां पर उनका पड़गाहन हुआ है। ब्रहम्चारी जी के यंहा से आहार के उपरांत लगभग 11:20 बजे तक गुरुदेव लौटे और उन्होंने मुझे बुलाया। भक्ति का समय था। ऋषि भैया का परिवार सामने थे। उन्होंने कहा कि ऋषि सामने खड़ा है उसकी बहुत भावना है और ऋषि को संकेत मिल गया और उसने गुरुदेव से निवेदन कर दिया। इस प्रकार लगभग 11:30 बजे यह सूचना बिजली की गति से आसपास पहुंची और इस प्रकार चार भैयाजी की दीक्षा का त्वरित निर्णय हो जाता है। आचार्य श्री कोई भी निर्णय पूर्व घोषणा नहीं करते थे। जब त्वरित निर्णय पर ही इतनी भीड़ हो गयी थी। यदि पूर्व सूचना हो जाए तो भीड़ सम्हाले नहीं सम्हलती।</p>
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