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	<title>मुनि श्री प्रांजल सागरजी महाराज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>वैवाहिक जीवन के पचास वर्ष पूर्ण करने वाले दंपत्तियों का किया सम्मान: सेमिनार में आचार्य श्री का किया विशेष पूजन, थाल सजाया पूजन  </title>
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		<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 08:45:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज सानिध्य में जिन्होंने अपने वैवाहिक जीवन पूर्ण करने वाले दंपत्तियों का का सेमिनार रखा गया। यह आयोजन अपने आप में अलौकिक था। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;  रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज सानिध्य में जिन्होंने अपने वैवाहिक जीवन पूर्ण करने वाले दंपत्तियों का का सेमिनार [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज सानिध्य में जिन्होंने अपने वैवाहिक जीवन पूर्ण करने वाले दंपत्तियों का का सेमिनार रखा गया। यह आयोजन अपने आप में अलौकिक था। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज सानिध्य में जिन्होंने अपने वैवाहिक जीवन पूर्ण करने वाले दंपत्तियों का का सेमिनार रखा गया। यह आयोजन अपने आप में अलौकिक था। आयोजन की शुरुआत में सर्वप्रथम म्यारा लुहाड़िया एवं ऐश्वी लुहाड़िया ने मंगलाचरण की प्रस्तुति दी। आयोजन के क्रम में आचार्य श्री के चरणों का प्रक्षालन करने का सौभाग्य कमलकुमार रजत लुहाड़िया परिवार को प्राप्त हुआ। शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य सुनील अमिता सुरलाया परिवार को प्राप्त हुआ। इस अवसर पर अष्ट द्रव्य के विशेष थाल सजाए गए। जो बहुत ही अलौकिक थे। साथ ही भक्ति में झूमते हुए सभी भक्तों ने आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज का पूजन किया।</p>
<p>इस बेला में मंदिर का वातावरण भक्ति से ओतप्रोत था। द्रव्य के थाल बहुत ही आकर्षक भव्य थे, जो आकर्षण का केंद्र बिंदु रहे। इस अवसर पर अखिल भारतीय विनिश्चय ग्रुप की ओर से किए गए कार्यक्रम सभी 50 वर्ष से अधिक वैवाहिक जीवन पूरे करने वाले युगल दंपती का सम्मान किया गया। उन्हें प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया। सभी ने अनुभव साझा किए और आचार्य श्री के सानिध्य को भी धन्य माना।</p>
<p><strong>अपने अनुभव साझा कर सुखद जीवन के उदाहरण दिए </strong></p>
<p>दंपत्त्यिों ने कहा कि परिवार में नोकझोक हो जाती है। फिर हम संभल जाते हैं, हमने सभी तीर्थ यात्रा पूर्ण की और परिवार में सब कुछ अच्छा है। गुरुदेव आपके द्वारा बताई गई बातों को भी हम अनुसरण करते हैं और अपने जीवन में उतारते है। साथ ही सभी को माला पगड़ी एवं प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। साथ ही सभी ने अपनी जीवन के सुखद और धार्मिक जीवन के अनुभव साझा किए, जो अपने आप में प्रेरणादायक थे। इस आयोजन के प्रेरणा स्रोत मुनि श्री प्रांजल सागरजी महाराज रहे। संचालन सयानी विनायका एवं अदिति काला ने किया। इस अवसर पर समस्त अखिल भारतीय विनिश्चय ग्रुप के सदस्यों का भी सम्मान किया एवं उन्हें प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया।</p>
<p><strong>महोत्सव पत्रिका का विमोचन किया गया </strong></p>
<p>पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव की पत्रिका का भी विमोचन किया गया। 8 नवंबर से होने वाले पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव की पत्रिका का भी विमोचन हुआ। कार्यक्रम में सभी सहयोग देने वालों का भी विशेष रूप से सम्मान किया गया।</p>
<p><strong>दांपत्य जीवन को 50 वर्ष गए हैं तो मोक्ष मार्ग अपनाएं</strong></p>
<p>आचार्य श्री आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि किसी के शादी के 50 वर्ष पूर्ण हो गए। जीवन का आनंद है कि नोक झोक प्यार-व और धार्मिकता के साथ जिया जा रहा है। जीवन में झगड़ा और प्रेम जरूरी है। झगड़ा और प्रेम दोनों जरूरी है। प्रेम का मतलब होता है कि एक दूसरे का ध्यान रखना मन से ध्यान रखना होता है। यह तब होता है जब समर्पण की भावना होती है और एक दूसरे के कल्याण के मार्ग की भावना होती है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि शादी के 50 वर्ष पूर्ण हो गए हैं तो धर्म ध्यान का लक्ष्य होना चाहिए। यदि यह हो चुके हैं तो आप जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं। समझ लेना चाहिए। यदि 50 वर्ष पूर्ण हो गए हैं अच्छे से तो दोनों को एक साथ मोक्ष मार्ग पर जाना चाहिए। यह बहुत अच्छा होगा। आचार्य श्री विरागसागरजी का उदाहरण देते हुए कहा कि आचार्य श्री जब भी दीक्षाएं देते थे तो एक जोड़ा दंपती होता था। यदि आप सभी चीजों में एक साथ रहे तो मोक्ष मार्ग में भी एक साथ रहें। कार्यक्रम में नितिन सबदरा, शुभम जैन, स्वाति बागड़िया, रिदम चेलावत, सयानी विनायका, अदिति काला आदि का सहयोग रहा।</p>
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		<title>शास्त्रों से चारित्र को बनाने वाला ज्ञान मिलता है: आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने ज्ञान की विशालता का परिचय करवाया  </title>
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		<pubDate>Sat, 04 Oct 2025 12:57:33 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[शनिवार सुबह आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने ज्ञान के विषय में प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ज्ञान सुख को देता है और सुख का परिहार करता है। यह पूरे जीवन का प्रैक्टिकल है। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। शनिवार सुबह आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने ज्ञान के विषय [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>शनिवार सुबह आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने ज्ञान के विषय में प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ज्ञान सुख को देता है और सुख का परिहार करता है। यह पूरे जीवन का प्रैक्टिकल है। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> शनिवार सुबह आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने ज्ञान के विषय में प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ज्ञान सुख को देता है और सुख का परिहार करता है। यह पूरे जीवन का प्रैक्टिकल है। जब ज्ञान का सही उपयोग होने लगता है तो किसी को समझाने की जरूरत नहीं होती। उन्होंने कहा लोग जब स्वाध्याय करने बैठते हैं तो घडी देखते हैं लेकिन, जब टीवी देखने बैठते हैं तो घड़ी को नहीं देखते हैं। टीवी देखने से भी ज्ञान मिलता है लेकिन, टीवी देखने से मिथ्या ज्ञान मिलता है। शास्त्रों से चारित्र को बनाने वाला ज्ञान मिलता है। स्वाध्याय करते समय आत्मा के रहस्य को नहीं जाना तो मरण के समय पछताना पड़ेगा।</p>
<p><strong>ज्ञान सही नहीं है, पूजन अभिषेक सही लाभ नहीं देगा</strong></p>
<p>आज का किया हुआ स्वाध्याय कल भी काम आता है परसों भी काम आता है और मृत्यु के समय भी काम आता है। मृत्यु के बाद दूसरी पर्याय में भी काम आता है। आचार्यश्री ने कहा कि उन्होंने कहा अगर ज्ञान सही नहीं है, पूजन अभिषेक सही लाभ नहीं देगा। अज्ञानी से अज्ञानी व्यक्ति, अनपढ़ व्यक्ति यदि स्वाध्याय की एक लाइन पढ़ लेता है, समझ लेता है तो वह किसी न किसी भव में इसके बल से सम्यक दर्शन को प्राप्त कर लेता है।</p>
<p><strong>कर्म निर्जरा में हेतु है तो वह है जिनवाणी </strong></p>
<p>आचार्यश्री ने स्वाध्याय करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि हमें स्वाध्याय उठाना है। शास्त्र को खोलना है, पढ़ना है। सबसे ज्यादा आत्मा की कर्म निर्जरा में हेतु है तो वह जिनवाणी है। जैसे आप घर के काम घर के ढंग से व्यापार के काम व्यापार के ढंग से करते हैं। उसी प्रकार धर्म के काम भी धर्म के ढंग से करें। इस प्रकार भावों को भी भावों के तरीके से बनाओ। यह करने में हम सफल होते हैं तो लाभ ज्ञान से प्राप्त हो सकता है। इससे पूर्व मुनि श्री प्रांजल सागरजी महाराज ने भक्तामर स्तोत्र का अध्ययन कराया।</p>
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		<title>आत्मा को समझना चाहते हो तो गुरु को समझो : मुनिश्री प्रांजल सागर जी ने आत्मा और गुरु का संबंध समझाया  </title>
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		<pubDate>Mon, 22 Sep 2025 13:29:29 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सोमवार की बेला में श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर प्रवचन सभा में आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज संघस्थ मुनि श्री प्रांजल सागरजी महाराज ने आत्मा एवं गुरु का महत्व समझाया। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। सोमवार की बेला में श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर प्रवचन सभा में आचार्य श्री विनिश्चय [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सोमवार की बेला में श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर प्रवचन सभा में आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज संघस्थ मुनि श्री प्रांजल सागरजी महाराज ने आत्मा एवं गुरु का महत्व समझाया। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> सोमवार की बेला में श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर प्रवचन सभा में आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज संघस्थ मुनि श्री प्रांजल सागरजी महाराज ने आत्मा एवं गुरु का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि यदि आत्मा को समझना चाहते हैं तो गुरु को समझो। देव शास्त्र गुरु के प्रति समर्पित रहोगे तो आत्मा का चिंतन अपने आप हो जाएगा देव शास्त्र गुरु को समझो। उन्होंने कहा जो आत्मा को जानता है। वह गुरु को जानता है और जो गुरु और आत्मा को जानता है। वह परमात्मा को जानता है। गुरु महिमा का बखान करते हुए कहा कि गुरु अमृत कल्प वृक्ष हैं। जिससे आत्मा में बंधी कालिमा कमजोर पड़ जाती है। इसीलिए गुरु चरणों में आ जाओगे तो सबकुछ होगा।</p>
<p><strong>कर्म की लीला बड़ी विचित्र है-आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी </strong></p>
<p>प्रवचन सभा में आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने कहा कि कर्म जब उदय में आते हैं तो बहुत कुछ हो जाता है। कर्म उदय के कारण राम को मिलने वाली राजगद्दी की जगह वनवास हो गया। जिसने सबसे ज्यादा समर्थन किया उसी ने वनवास दे दिया। उन्होंने कहा कि कर्म की लीला बड़ी विचित्र है। कर्म हंसते हुए को रुला देता है और रोते हुए को हंसा देता है। कर्म जब बुरा उदय में होता है तो फिक्र आती नहीं और जब कर्म अच्छा होता है तो सबको फिक्र आती है। तीव्र कर्म का जब उदय होता है तो किसी को फिक्र नहीं होती। जब कर्म का अनुभाग घटने लगता है तो सबको फिक्र होने लगती है। उन्होंने कहा कि हमारे पास बहुत कुछ है फिर भी दिमाग से निकल जाता है कि मेरे पास कुछ नहीं है सुखी होने का सबसे अच्छा उपाय है कि मेरे पास बहुत कुछ है और जितना है बहुत है।</p>
<p><strong>हम शरीर की कीमत करेंगे तो शरीर हमारी कीमत करेगा</strong></p>
<p>शरीर की इतनी कीमत है तो आत्मा की कितनी कीमत होगी। हमें समझने की जरूरत है। हमारी आत्मा की भी कीमत है, हमारी भी कीमत है, हमारी सोच की भी कीमत है और हमारे विचार की भी कीमत है। हर चीज की कीमत है। सबसे ज्यादा कीमत तो उसकी है, जो आपके अंदर धर्म विराजमान है जो बहुमूल्य है। इसमें इतनी ताकत है कि आप सही ढंग से कर लें। उसकी भूमिका बना ले तो जो आपने सोचा नहीं था वह आपको मिल जाएगा। आचार्य श्री ने जैन दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि जैन दर्शन में शरीर द्वारा धार्मिक क्रिया करने को कहा है। उन्होंने ब्रह्म मुहूर्त में पंच परमेष्ठि का ध्यान करने की सभी को सीख दी और कहा कि उसके बाद दैनिक क्रिया के बाद अभिषेक पूजन आदि में संलग्न हो जाए। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि यदि हम शरीर की कीमत करेंगे तो शरीर हमारी कीमत करेगा उन्होंने कहा कि शरीर और आत्मा दोनों का काम दुख से बचाना है। कर्म यदि हम प्रभु की आराधना करते हैं तो अशुभ शुभ में परिवर्तित हो जाते हैं विशुद्धि के साथ करे।</p>
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