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	<title>मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>संस्कार ही भविष्य की दिशा तय करते हैं : मुनि श्री प्रमाण सागर जी ने बच्चों को प्रारंभ से ही धार्मिक संस्कार देने पर दिया जोर </title>
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		<pubDate>Wed, 19 Nov 2025 12:14:54 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[हिरनई गांव में आयोजित धर्मसभा में मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति इसलिए हावी हो रही है, क्योंकि हम बच्चों को संस्कार देना तो चाहते हैं लेकिन, स्वयं वैसा आदर्श प्रस्तुत नहीं कर पाते। हिरनई से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;   हिरनई। हिरनई गांव में [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>हिरनई गांव में आयोजित धर्मसभा में मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति इसलिए हावी हो रही है, क्योंकि हम बच्चों को संस्कार देना तो चाहते हैं लेकिन, स्वयं वैसा आदर्श प्रस्तुत नहीं कर पाते। <span style="color: #ff0000">हिरनई से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>  हिरनई</strong>। हिरनई गांव में आयोजित धर्मसभा में मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति इसलिए हावी हो रही है, क्योंकि हम बच्चों को संस्कार देना तो चाहते हैं लेकिन, स्वयं वैसा आदर्श प्रस्तुत नहीं कर पाते। उन्होंने कहा कि यदि बच्चों के हृदय में प्रारंभ से ही धर्म के संस्कार दिए जाएं तो उनके भटकाव की संभावनाएं अत्यंत कम हो जाती है।</p>
<p>मुनि श्री ने समझाया कि छोटे बच्चों का मन धर्म और पूजा-पाठ में स्वाभाविक रूप से लगता है, लेकिन जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं। पढ़ाई, करियर और प्रतिस्पर्धा की ओर ध्यान बढ़ जाता है। ऐसे में प्रारंभिक दिनों में दिए गए अच्छे संस्कार ही दिशा-सूचक दीपक बनते हैं। उन्होंने कहा कि यदि कभी बच्चे भटक भी जाएं तो संस्कार उन्हें वापस सही मार्ग पर ले आते हैं। इसलिए पाठशालाओं और अन्य माध्यमों से संस्कार देना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि, धार्मिक संस्कार जीवन का मूल तत्व हैं। मुनि श्री ने बच्चों के लिए सरल संदेश दिया और कहा कि धर्म भले कम करो, लेकिन अधर्म से अवश्य बचो। यदि पीढ़ी अधर्म से बचेगी तो वही सबसे बड़ा धर्म कहलाएगा। बच्चों को जीवन की मर्यादा समझाना और सही–गलत का विवेक देना ही माता-पिता का सच्चा धर्म है।</p>
<p><strong>मंदिर तो सुंदर बन गया, मन को मंदिर कैसे बनाएं? </strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि जैसे आस्था ने भगवान का सुंदर मंदिर बनाया है उसी आस्था को भीतर जगाएं तो मन भी मंदिर बन जाएगा। धर्मसभा में मुनि श्री संधानसागर जी महाराज ने शंका-समाधान कार्यक्रम का संचालन किया। उपस्थित श्रावकों ने अपने व्यावहारिक जीवन, धर्म और आस्था से जुड़े प्रश्न रखे। जिनका समाधान मुनि श्री ने अत्यंत सहजता और स्पष्टता से किया।</p>
<p><strong>मंगल विहार अटारी खैजड़ा गांव की ओर हुआ</strong></p>
<p>प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि प्रातःकालीन बेला में लाल पाषाण से निर्मित दिव्य जिनालय में मुनि श्री के मुखारबिंद से शांतिधारा हुई इसके बाद विश्वविख्यात शंका-समाधान कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। वातावरण ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो भगवान के समवशरण में इंद्रभूति गौतम अपने प्रश्न रख रहे हों और समाधान मिल रहा हो। इस अवसर पर विदिशा, गंजबासोदा, भोपाल, सागर और राहतगढ़ से आए श्रावकों ने भी अपने प्रश्न रखकर समाधान पाया। दोपहर बाद मुनि श्री का मंगल विहार अटारी खैजड़ा गांव की ओर हुआ।</p>
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		<title>मुनि श्री ने कहा जहां संतों का आवागमन वहां जैन संस्कार पलते हैं: बाबड़िया कलां में विद्या प्रमाण वसतिका गृह का शिलान्यास  </title>
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		<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 14:02:02 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज एवं मुनि श्री संधानसागर जी महाराज प्रातःकालीन बेला में बाबड़ियाकलां दिगंबर जैन मंदिर पहुंचे। इस अवसर पर कमेटी के पदाधिकारियों ने उनका पाद प्रक्षालन किया एवं आरती उतारी। प्रातःकाल श्री जी का अभिषेक एवं शांतिधारा के बाद एवं विद्या प्रमाण साधु वसतिका गृह का शिलान्यास किया गया। भोपाल से पढ़िए, [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज एवं मुनि श्री संधानसागर जी महाराज प्रातःकालीन बेला में बाबड़ियाकलां दिगंबर जैन मंदिर पहुंचे। इस अवसर पर कमेटी के पदाधिकारियों ने उनका पाद प्रक्षालन किया एवं आरती उतारी। प्रातःकाल श्री जी का अभिषेक एवं शांतिधारा के बाद एवं विद्या प्रमाण साधु वसतिका गृह का शिलान्यास किया गया। <span style="color: #ff0000">भोपाल से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> भोपाल</strong>। आचार्य गुरुदेव विद्यासागरजी के परम प्रभावक शिष्य गुणायतन प्रणेता मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज एवं मुनि श्री संधानसागर जी महाराज प्रातःकालीन बेला में बाबड़ियाकलां दिगंबरा जैन मंदिर पहुंचे। इस अवसर पर कमेटी के पदाधिकारियों ने उनका पाद प्रक्षालन किया एवं आरती उतारी। प्रातःकाल श्री जी का अभिषेक एवं शांतिधारा के बाद एवं विद्या प्रमाण साधु वसतिका गृह का शिलान्यास किया गया। इस अवसर पर मुनि श्री ने कहा कि यह बाबड़ियाकलां वालों की गुरु भक्ति का ही प्रताप है कि बार-बार संत के चरण आपके यहां पर पड़ते हैं। उन्होंने कहा कि जब में पिछली बार यहां आया था तो आप लोगों को संत निवास बनाने की प्रेरणा दी थी। जिसे आप लोगों ने तुरंत संत निवास की नींव रखकर यह बहुत बड़े पुण्य का कार्य किया है। उन्होंने कहा कि जिस स्थान पर संतों का आवागमन लगा रहता है उस स्थान पर जैन संस्कृति और संस्कार पलते हैं। उन्होंने उन सभी सौभाग्यशाली परिवारों को आशीर्वाद देते हुए कहा कि दिगंबर जैन परंपरा में साधु वसतिका का बहूत बड़ा महत्व है। उस परंपरा को आप लोगों ने मिलकर आगे बढ़ाया है। सभी परिवार आशीर्वाद के पात्र हैं। प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि मुनिसंघ दोपहर में मंगल विहार करके अवधपुरी पहुंचे एवं सांयकालीन शंका समाधान कार्यक्रम हुआ।</p>
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		<title>क्षमा करने के लिए सबसे अधिक साहस जरूरी: 14 सितंबर को भोपाल जैन समाज का क्षमावाणी महोत्सव  </title>
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		<pubDate>Wed, 10 Sep 2025 09:59:02 +0000</pubDate>
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<p><strong>आज का युग ‘रिएक्शन’ का युग है, छोटी सी बात पर रिश्ते टूट जाते हैं, पोस्ट पर कमेंट्स से भावनाएं आहत हो जाती हैं। अहंकार इतनी ऊंचाई पर बैठा है कि ‘मैं गलत नहीं हो सकता’ का भ्रम हमें अंदर से खोखला कर देता है यह उद्गार मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">भोपाल से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> भोपाल (अवधपुरी)</strong>। आज का युग ‘रिएक्शन’ का युग है, छोटी सी बात पर रिश्ते टूट जाते हैं, पोस्ट पर कमेंट्स से भावनाएं आहत हो जाती हैं। अहंकार इतनी ऊंचाई पर बैठा है कि ‘मैं गलत नहीं हो सकता’ का भ्रम हमें अंदर से खोखला कर देता है यह उद्गार मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने व्यक्त किए। क्षमावाणी पर्व आंतरिक सफाई का पर्व है जैसे दीपावली पर हम घर की सफाई करते हैं, वैसे ही क्षमावाणी पर्व आत्मा की सफाई का पर्व है। मुनि श्री ने कहा कि क्षमा मांगने को लोग कमजोरी मानते हैं,पर सच्चाई यह है कि क्षमा करने के लिए सबसे अधिक साहस चाहिए। “क्षमा वीरस्य भूषणम।” या“मिच्छामी दुक्कड़म” सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि यह हमारा संकल्प बने “मिच्छामी दुक्कड़म”का अर्थ है “ ’यदि मुझसे जाने-अनजाने कोई अपराध, कोई कटुता, कोई चुभन हुई हो, तो मैं हृदय से क्षमा चाहता हूँ।”’ मुनि श्री ने कहा कि बाहर से हम कितने ही पूजा पाठ, व्रत उपवास कर लें,यदि हमारे अंदर काम, क्रोध, लोभ,और मोह की दुवृत्तियां पनप रही है तो हमारा क्षमावाणी मनाना सार्थक नहीं हो सकता।</p>
<p><strong>विकृतियों को ‘भावनायोग’ के अभ्यास से हटाया जा सकता है</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि क्षमा करने और क्षमा मांगने में मन वाणी और व्यवहार में पवित्रता होंना जरुरी है। तन की अपवित्रता तो बाहर के जल से साफ हो सकती है, लेकिन मन की पवित्रता के लिए विद्वेष, वासना, लोभ, ईष्या, वैमनस्यता,छल, कपट से रिक्त होना जरूरी है। इन विकृतियों को ‘भावनायोग’ के अभ्यास से हटाया जा सकता है। मुनि श्री ने कहा ’भावनायोग करने से जैसा हम चाहेंगे वैसा हमारा जीवन बनेगा। मनोविज्ञान भी कहता है कि जैसा हम देखते है, जैसा हम सुनते है तथा जैसा हम महसूस करते हैं। वह सभी घटनाएं और संस्कार हमारे अवचेतन मन में अंकित हो जाते है और यहीं से हमारा अवचेतन मन हमारे चेतन मन को प्रभावित करता है, इसलिए मन को अपवित्र करने वाले संसर्ग से बचिए।</p>
<p><strong>क्षमावाणी पर्व आत्म शुद्धि का पर्व है</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा धर्म पवित्र हृदय में ही बसता है, और मन की मलिनता धर्म की तेजस्विता को मंद कर देती है। जिसका मन अपवित्र होता है, वह लोभ और लालसा से भरा एवं सदैव असंतुष्ट रहता है, जो खुद बुरा सोचता है। वह दूसरों को भी बैसा ही मानता है और वह कभी किसी को सम्मान नहीं दे सकता, क्षमावाणी पर्व आत्म शुद्धि का पर्व है आत्मशुद्धि लिए बोध वाक्यों को बार-बार दोहराइए। मैं शुद्ध आत्मा हूं। मैं पवित्र आत्मा हुं पवित्रता मेरा स्वभाव है। पवित्रता मेरा धर्म है, जब हम बार -बार इन वाक्यों को दोहराएंगे तो यह हमारे भावों को शुद्ध करने में निमित्त बनेगा। मुनिसंघ के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया आगामी 14 सितंबर रविवार को संपूर्ण भोपाल के जैन समाज का मुनिसंघ के सानिध्य में क्षमावाणी पर्व दोपहर1.30 बजे से आयोजित है। चातुर्मास चक्रवर्ती तथा सभी नवरत्न एवं विद्याप्रमाण गुरुकुलम तथा गुणायतन की पूरी टीम आपका स्वागत करने के लिए आतुर हैं।</p>
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		<title>क्षमा उनसे मांगो जिनसे तुम्हारी शत्रुता है : मुनि श्री प्रमाण सागर ने बताया उत्तम क्षमा का महत्व </title>
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		<pubDate>Sun, 07 Sep 2025 16:29:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने सभी शिविरार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि बाहरी तप के साथ जब अंतरंग के परिणामों में निर्मलता आती है तभी तप की सार्थकता होती है। आज का दिन आत्म समीक्षा का दिन है। भोपाल से पढ़िए, यह खबर&#8230; भोपाल। 32 उपवास करने वाले अजमेर (राजस्थान )से आए 65 [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने सभी शिविरार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि बाहरी तप के साथ जब अंतरंग के परिणामों में निर्मलता आती है तभी तप की सार्थकता होती है। आज का दिन आत्म समीक्षा का दिन है। <span style="color: #ff0000">भोपाल से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>भोपाल।</strong> 32 उपवास करने वाले अजमेर (राजस्थान )से आए 65 वर्षीय कैलाशचंद्र जैन सहित सोलह, दस, आठ, सात, छै, पांच तथा तीन उपवास करने वाले सभी उपासिओं का सम्मान किया गया। अविनाश जैन विद्यावाणी ने दी’ इस अवसर पर मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने सभी शिविरार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि बाहरी तप के साथ जब अंतरंग के परिणामों में निर्मलता आती है तभी तप की सार्थकता होती है। आज का दिन आत्म समीक्षा का दिन है। हमारी जिन-जिन से वैमनस्यता और कटुता हुई है। सबसे पहले उनसे क्षमा मांगना चाहिए। तभी आपका उपवास और दस दिवसीय धर्म आराधना सार्थक होगी। मुनि श्री ने कहा कि अकेले क्षमावाणी के मेंसेज भेजने से कार्य नहीं होगा, उसे अपने अंतरंग में उतारो। उन्होंने कहा कि ष्मित्रो से क्षमा तो सब मांग लेते है,क्षमा तो उनसे मांगना चाहिये। जिनसे तुम्हारी शत्रुता हैष् और यह शत्रुता और कटुता मिटाने का भाव तुम्हारे अंदर से जगना चाहिये तभी आपके परिणामों निर्मलता आएगी और जीवन का उत्थान होगा ष्भाव शुद्धी के अभाव में जीवन का उत्थान असंभव है। भाव सुधरेगा तभी भव सुधरेगा, यदि इन दस दिनों में आपके परिणामों में अंतर नहीं आया तो आपने धर्म की आराधना नहीं की मात्र ऊपरी क्रिया को किया है।</p>
<p><strong>परिणामों की निर्मलता आती है तभी तप की सार्थकता होती है</strong></p>
<p>मनुष्य जीवन की सार्थकता तभी है जब आपके जीवन में अहिंसा, संयम, और तप आये तथा अपने आपको हिंसा से दूर रख कर भावों में शुद्धि और प्रवृत्ति पर नियंत्रण हो। मुनि श्री ने कहा कि यंहा पर 32 उपवास करने बालों को देखो, इन्होंने बाहरी तप भी किया और अंतरंग तप भी किया। बाहरी तप के साथ जब अंतरंग में परिणामों की निर्मलता आती है तभी तप की सार्थकता होती है, कुछ लोगों सोलह उपवास किए तो</p>
<p>कुछ युवा कार्यकर्ताओं ने 10 उपवास भी किये और अपना कार्य भी किया। यह उनका बहूत बड़ा पुरुषार्थ है।</p>
<p><strong>सोमवार को मुनि श्री मौन के साथ उपवास रहेगा</strong></p>
<p>जो युवा दो घंटे भी भूखे नहीं रह सकते उन युवाओं के द्वारा दस दिन तक निर्जल रहना कोई सधारण पुरुषार्थ नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि तुम जो चाहो सो कर सकते हो,इन्होंने अपनी शक्ती का सही संयोजन किया है, लेकिन यह संयोजन तभी सार्थक कहलाएगा जब इनके भाव शुद्धि तथा परिणामों में निर्मलता आएगी। उन्होंने सभी तपस्वियों को आशीर्वाद देते हुए कहा कि इन दस दिनों की तपस्या को अपने जीवन में परिवर्तन लाकर अपने जीवन की स्थाई सम्पत्ति बनाइये।प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया सभी शिविरार्थियों का कमेटी के पदाधिकारियों द्वारा तिलक श्रीफल एवं अंग बस्त्र तथा धार्मिक ग्रंथ देकर सम्मानित किया गया। भी की पारणा संपन्न हुई। सोमवार को मुनि श्री मौन के साथ उपवास रहेगा।</p>
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		<title>सभी सदस्य पांच मिनट का सामूहिक भावना योग करें : अपने उपकारिओं के प्रति कृतज्ञ बने रहना अच्छे संस्कार- मुनि श्री प्रमाण सागर </title>
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		<pubDate>Thu, 14 Aug 2025 04:46:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[यदि आपके घर में अच्छे संस्कार बने रहे तो घर के सभी सदस्यों को औचित्य का बोध रहेगा। यह उद्गार मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने प्रवचन सभा में व्यक्त किए। भोपाल (अवधपुरी) से पढ़िए, अविनाश जैन विद्यावाणी की यह खबर&#8230; भोपाल (अवधपुरी)। यदि आपके घर में अच्छे संस्कार बने रहे तो घर के सभी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>यदि आपके घर में अच्छे संस्कार बने रहे तो घर के सभी सदस्यों को औचित्य का बोध रहेगा। यह उद्गार मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने प्रवचन सभा में व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">भोपाल (अवधपुरी) से पढ़िए, अविनाश जैन विद्यावाणी की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>भोपाल (अवधपुरी)</strong>। यदि आपके घर में अच्छे संस्कार बने रहे तो घर के सभी सदस्यों को औचित्य का बोध रहेगा। यह उद्गार मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने प्रवचन सभा में व्यक्त किए। नियमित प्रार्थना करने और प्रतिक्रमण करने से दोषों की मुक्ति संभव है, यदि परिवार के सभी सदस्य पांच मिनट का सामूहिक भावना योग करें तो आपके घर में कभी गलतफहमी नहीं रहेगी। मुनि श्री ने कहा कि यदि किसी से कभी कोई गलती हो जाए तो क्षमा मांगने का मनोभाव प्रत्येक सदस्य के मन में आना चाहिए। नियमित भावना योग करने से व्यक्ति समर्थ बनता है एवं वह परिस्थितियों से भागता नहीं।</p>
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		<title>‘संतान को जन्म देना एक क्रिया नहीं, एक साधना है’ : श्रावक संस्कार शिविर में प्रतिदिन प्रातः भावनायोग होगा  </title>
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		<pubDate>Mon, 11 Aug 2025 09:48:13 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अवधपुरी में सोमवार प्रातः मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने केशलोच कर मौन उपवास के साथ दिन व्यतीत किया। विगत सांयकालीन शंका-समाधान कार्यक्रम में मुनि श्री ने अनेक प्रश्नों का समाधान किया। अवधपुरी से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230; अवधपुरी। अवधपुरी में सोमवार प्रातः मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने केशलोच कर मौन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अवधपुरी में सोमवार प्रातः मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने केशलोच कर मौन उपवास के साथ दिन व्यतीत किया। विगत सांयकालीन शंका-समाधान कार्यक्रम में मुनि श्री ने अनेक प्रश्नों का समाधान किया। <span style="color: #ff0000">अवधपुरी से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>अवधपुरी।</strong> अवधपुरी में सोमवार प्रातः मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने केशलोच कर मौन उपवास के साथ दिन व्यतीत किया। विगत सांयकालीन शंका-समाधान कार्यक्रम में मुनि श्री ने अनेक प्रश्नों का समाधान किया। इसी क्रम में एक महिला ने प्रश्न किया कि स्त्री के जीवन में मां बनना एक गर्व की अनुभूति है, इस अनुभूति को कैसे सार्थक करें ? मुनि श्री ने उत्तर देते हुए कहा- आपके माध्यम से सभी गर्भवती महिलाओं को कहना चाहता हूं कि प्रतिदिन नौ मिनट का भावनायोग अवश्य करें और यदि संभव हो तो दिन में तीन बार। यह प्रयोग आपकी कोख से जन्म लेने वाली संतान को शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनाएगा।</p>
<p>उन्होंने कहा कि गर्भवती स्त्री को अपना जीवन संयम और ब्रह्मचर्य के साथ बिताना चाहिए। इस समय ललित कलाओं, महापुरुषों के चरित्र चिंतन और प्रेरणादायी साहित्य से जुड़ना चाहिए। नकारात्मक बातें, क्लेश, झगड़े और टीवी के अशांतिदायक कार्यक्रमों से दूर रहना जरूरी है। मुनि श्री ने समझाया- मां बनने के समय आपके मन का हर्ष, प्रसन्नता और सकारात्मकता सीधा बच्चे पर प्रभाव डालती है। यदि आपने यह साधना पूरी निष्ठा से की तो आप मात्र एक संतान को जन्म नहीं देंगी, बल्कि एक श्रेष्ठ मां बनकर इस धरती के भूषण को जन्म देने का सौभाग्य पाएंगी। आगामी दशलक्षण पर्व की चर्चा करते हुए मुनिश्री ने कहा कि इन दस दिनों में सुबह से शाम तक केवल औपचारिक धार्मिक क्रियाएं करने के बजाय कुछ विशेष प्रयोग अपनाएं तो जीवन में बड़ा परिवर्तन संभव है।</p>
<p>प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि अवधपुरी में आयोजित श्रावक संस्कार शिविर में प्रतिदिन प्रातः 5.45 बजे भावनायोग कराया जाएगा। जिसका लाइव प्रसारण ‘प्रमाणिक एप’ पर होगा। उन्होंने बताया कि इन 10 दिनों में व्यापारियों, उद्यमियों और बच्चों के लिए अलग-अलग विशेष सत्र होंगे। मुनि श्री ने श्रावकों से आग्रह किया कि जो लोग शिविर में प्रत्यक्ष आकर लाभ नहीं ले सकते, वे घर पर भी नियमित साधना करें और इस पावन अवसर का अधिकतम लाभ उठाएं।</p>
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